Sunday, March 22, 2026
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जानिए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की कहानी

राम मंदिर का मुद्दा हो या ज्ञानवापी मस्जिद, इन सब ऐतिहासिक मामलों में एक सरकारी विभाग मौजूद रहा है. वो है संस्कृति मंत्रालय के अधीन आने वाला आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई)। यह विभाग 3 हजार से ज्यादा स्मारकों की देखभाल कर रहा है।
इतिहास के कई दबे हुए रहस्य सामने लाने वाले एएसआई का इतिहास काफी रोचक रहा है। आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना 1861 में हुई थी। 163 सालों से काम कर रहे इस विभाग के द्वारा पेश किए गए साक्ष्य को सुप्रीम कोर्ट में भी काफी महत्व दिया जाता है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि एएसआई अपनी स्थापना के 4 साल बाद ही कंगाल हो गया था. आइए आज जानते हैं इसका इतिहास –
एशियाटिक सोसायटी – आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की शुरुआत सर विलियम जोन्स के प्रयासों से हुई थी। सर विलियम ने पुरातत्वविदों के एक समूह को इकट्ठा करके 15 जनवरी 1784 को कोलकाता में एशियाटिक सोसाइटी स्थापना की। इन पुरातत्वविदों ने भारत के विभिन्न हिस्सों के स्मारकों का सर्वेक्षण किया, जिसका सार 1788 में एशियाटिक रिसर्च नामक एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
एशियाटिक सोसायटी ने हिंदुस्तान में पुरातत्व की पहल की शुरूआत की थी। इस समूह ने प्राचीन संस्कृत और फारसी ग्रंथों के अध्ययन को भी बढ़ावा दिया। सोसायटी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में 1837 में जेम्स प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि को समझना था। इस सोसायटी के शुरुआती सदस्यों में चार्ल्स विल्किंस भी थे. चार्ल्स विल्किंस ने ही 1785 में भगवद गीता का पहला अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया था।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का गठन – भारत में आर्केलॉजिकल सर्वे की पैरवी करने में अलेक्जेंडर कनिंघम का अहम योगदान था। कनिंघम ने जेम्स प्रिंसेप के साथ काम किया था। उन्होंने पूरे भारत में स्तूपों की खुदाई की और बौद्ध स्मारकों का विस्तृत सर्वेक्षण किया। कई खुदाई में तो कनिंघम ने अपना खुद का पैसा लगाया था। हालांकि, बाद में उन्हें अहसास हुआ कि पुरातात्विक खुदाई और भारतीय स्मारकों के संरक्षण की निगरानी के लिए एक स्थायी संस्था होनी चाहिए। तब 1848 में पहली बार आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को बनाने की योजना बनायी गयी मगर ब्रिटिश सरकार ने इस प्लान को खारिज कर दिया। जल्द ब्रिटिश सरकार की कमान बदली और लॉर्ड कैनिंग भारत के गर्वनर-जनरल नियुक्त हुए। उन्होंने पुरातात्विक इकाई को मंजूरी दे दी. इस तरह साल 1861 में पहला बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का गठन हुआ. कनिंघम को इसका प्रमुख बनाया गया. लेकिन पैसों की कमी के कारण 1865 और 1871 के बीच सर्वेक्षण को निलंबित कर दिया गया।
पूरे देश में चलाया गया अभियान – साल 1871 में सर्वेक्षण को एक अलग सरकारी विभाग के रूप में पुनर्जीवित किया गया। इस बार कनिंघम ने डायरेक्टर जनरल का कार्यभार संभाला। विभाग का काम था ‘पूरे देश में एक संपूर्ण खोज करना, और उन सभी वास्तुशिल्प और बाकी अवशेषों का एक व्यवस्थित रिकॉर्ड और विवरण तैयार करना जो या तो अपनी प्राचीनता के लिए उल्लेखनीय हैं, या उनकी सुंदरता या उनकी ऐतिहासिक महत्वता। ’ कनिंघम ने काफी सारी ऐतिहासिक खोज की जिनमें अशोक की अखंड राजधानियां, गुप्त और उत्तर-गुप्त काल की वास्तुकला के नमूने, भरहुत का महान स्तूप, संकिसा, श्रावस्ती और कौशांबी जैसे प्राचीन नगरों की पहचान शामिल हैं. कनिंघम के रिटायर होने के बाद अगले कुछ सालों तक गठन में काफी अव्यवस्था रही और सर्वेक्षण रिपोर्टों का प्रकाशन भी लगभग समाप्त हो गया।
नए युग की शुरुआत – आखिरकार, लॉर्ड कर्जन ने 1901 में सर्वेक्षण को पूरी तरह से केंद्रीकृत कर दिया। जॉन मार्शल को नए डायरेक्टर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया। इसे भारतीय पुरातत्व में एक नए युग की शुरुआत बताई जाता है। जॉन मार्शल की अगुवाई में ही लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता की खोज हुई थी। 1924 में यह एक बहुत बड़ी खोज थी. वर्तमान पाकिस्तान और उत्तर पश्चिम भारत में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं से भी अधिक उन्नत थी। यह खोज प्राचीन दुनिया को लेकर हमारी समझ में एक बड़ा बदलाव लेकर आई। पुरातत्वविदों ने पाया कि प्राचीन शहर होते हुए भी वहां अच्छी तरह से निर्मित घर और सड़कें थीं। इन सब से पता चला कि दक्षिण एशिया में एक समय अत्यधिक विकसित संस्कृति रहती थी जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं थी।
भारत के बाहर भी करता है काम – आजादी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के क्षेत्र में काफी प्रगति और विकास देखा गया। राज्यों और शहरों को अलग-अलग सर्किल यानी मंडलमें बांटा गया। बड़े क्षेत्रफल वाले राज्यों में अक्सर दो या तीन सर्किल वहां के स्मारकों की सुरक्षा का काम देखते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी 37 सर्किल 3,695 से ज्यादा स्मारकों की देखभाल कर रहे हैं। एएसआई ने भारत के बाहर भी कई देशों में स्थलों की खुदाई की है और स्मारकों का रख-रखाव का काम किया है. 1986 और 1992 के बीच 12वीं शताब्दी के अंगकोर वाट मंदिरों का संरक्षण इसका बेहतरीन उदाहरण है। एएसआई ने ता प्रोम मंदिर में सुधार किया था जो अंगकोर क्षेत्र के मंदिरों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

राजस्थान में अधिकारी अब काजू बादाम नहीं चने ही खाएंगे

जयपुर। राजस्थान में गहराते वित्तीय संकट का असर अब साफ नजर आने लग गया है. राजस्थान में सरकारी कार्यालयों की होने वाली सभी बैठकों में अब अधिकारी-कर्मचारी महंगी मिठाइयों के साथ साथ समोसा, कचौरी या अन्य कीमती तथा जायकेदार नाश्ता का स्वाद नहीं ले पाएंगे। कार्मिक विभाग ने एक आदेश जारी कर समोसा, कचौरी और मिठाइयों के साथ साथ महंगे बिस्किट के उपयोग पर भी रोक लगा दी है। इस रोक की शुरुआत प्रदेश के महकमों को नियंत्रित करने वाले सचिवालय की बैठकों से की गई है।
शासन सचिवालय के विभाग के मुखिया अधिकारियों की ओर से सचिवालय समिति कक्ष -1 और समिति कक्ष -2 के साथ साथ सभी प्रकार की बैठकों में सिर्फ चने, मूंगफली और मल्टीग्रेन बिस्किट ही परोसने के आदेश जारी किए गए हैं। कार्मिक विभाग के आदेशानुसार राजस्थान सरकार ने सरकारी बैठकों में चाय-नाश्ते पर होने वाला खर्च कम करने का निर्णय लिया है। इसके कारण राज्य सरकार ने आदेश जारी कर नाश्ते में मिठाई और नमकीन परोसने पर रोक लगा दी है। आदेश के अनुसार सरकारी बैठकों में अब नाश्ते में केवल भुने चने, मूंगफली, मखाने और मल्टीग्रेन बिस्किट ही परोसे जा सकेंगे। कार्मिक विभाग के इस आदेश में सरकारी बैठकों में ब्रांडेड बोतल बंद पानी की जगह अब कांच की बोतल में पानी उपलब्ध कराया जाएगा। डिस्पोजल ग्लास और छोटे आकार की प्लास्टिक की बंद बोतलों के पानी पर भी रोक लगा दी गई है. सचिवालय सहित प्रदेशभर की बड़े बड़े अधिकारियों की अब तक होने वाली बैठकों में मिठाई, काजू-बादाम, महंगे बिस्किट, महंगी नमकीन, समोसा और चिप्स जैसी कई सामग्री परोसी जाती रही हैं। अब खर्चों में कटौती का निर्णय लेते हुए साधारण एवं स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता ही उपलब्ध हो पाएगा।

68 साल पहले की वो कहानी…जब कुंवारों और शादीशुदा के लिए था अलग टैक्स

 सरकार के बजट में आम लोगों के लिए कई घोषणाएं होती हैं। मिडिल क्‍लास के लोगों को सबसे ज्‍यादा इंतजार इनकम टैक्‍स की घोषणाओं का होता है। आजाद भारत के पहले बजट से लेकर और 2023 के बजट तक तमाम सरकारों ने कई तरह के प्रयोग किए हैं। ऐसी ही एक घोषणा करीब 68 साल पहले की गई थी। इस अनोखी घोषणा ने कुंवारे लोगों का बजट बिगड़ा कर रख दिया था। टैक्स स्लैब की वजह से कुंवारे लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया था।
जब कुंवारे लोगों पर बढ़ा गया था टैक्‍स का बोझ – बजट का ये दिलचस्‍प किस्‍सा साल 1955-56 के लिए पेश हुए बजट का है। केंद्र में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व की सरकार थी और वित्‍त मंत्री के पद पर चिंतामन द्वारकानाथ देशमुख थी। जिन्‍हें सी डी देशमुख के नाम से भी जाना जाता है। तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री ने बजट में घोषणा की थी कि शादीशुदा और अविवाहितों के लिए अलग-अलग टैक्‍स स्‍लैब रहेगा। सरकार की इस अनोखी घोषणा ने सबको हैरान कर दिया था। सरकार की इस घोषणा के बाद कुंवारे लोगों पर टैक्‍स का बोझ बढ़ गया था। सरकार ने उस वक्त शादीशुदा लोगों के लिए मौजूदा टैक्‍स एक्‍जेम्‍प्‍ट स्‍लैब बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दिया गया था जो 1,500 रुपए था और अविवाहितों के लिए इसे घटाकर 1,000 रुपए कर दिया गया था।
सरकार ने यह टैक्‍स स्‍लैब योजना आयोग की सिफारिश पर लागू किया था। भारत में शादीशुदा लोगों और कुंवारे लोगों के लिए पहली बार इस तरह की घोषणा की गई थी। 1955-56 के बजट में पहली बार हिंदी वर्जन भी लाया गया था। इसके बाद से ही एनुअल फाइनेंशियल स्‍टेटमेंट का हिंदी वर्जन और एक्‍सप्‍लेनेटरी मेमोरेंडम सर्कुलेट किया जाता है।
1955-56 में क्या था टैक्स स्लैब –  1955-56 में आए बजट के टैक्‍स स्‍लैब की बात करें तो शादीशुदा लोगों को 0 से 2,000 रुपए की कमाई पर कोई टैक्‍स नहीं था। 2,001 से 5,000 रुपये की कमाई पर 9 पाई टैक्स के रूप में देना होता था। कुंवारे लोगों की बात करें तो 0 से 1,000 रुपए की कमाई तक कोई टैक्‍स नहीं लगता था। वहीं, 1001 रुपए से 5,000 रुपये की कमाई पर 9 पाई टैक्‍स के रूप में देने पड़ते थे।

स्वाद गली : पहलवान ने गलती से बनाई डोडा बर्फी, काजू कतली कैसे बनी

अगर पूछा जाए कि सैकड़ों साल पहले भी कौन सी मिठाई हिट थी और आज भी हिट है, तो उसमें बरफी का नाम सबसे ऊपर होगा। आप मिठाई की छोटी सी बड़ी दुकान पर चले जाइए, वहां एक मिठाई तो पक्का होगी। ये होगी बर्फी. खोया, दूध और चीनी से बनी बर्फी जीभ पर एक खास मीठा टैक्स्चर देते हुए मनमोहक अंदाज में घुलती है। इसकी ना जाने कितनी किस्में भारत में तैयार की गईं. खासकर दो बर्फी दोधा और काजू कतली के पैदा होने की कहानी तो बहुत ही रोचक है।
90 के दशक की शुरुआत में जब आर्थिक उदारीकरण ने दस्तक नहीं दी थी, तब मिष्ठान भंडारों पर मात्र 5-6 तरह की मिठाइयां ज्यादा नजर आती थीं। ट्रे में सजी खोये की बर्फी, गुलाब जामुन, रसगुल्ला, कलाकंद, इमरती, जलेबी और लड्डू. कुछ मिष्ठान भंडार पर भांति-भांति की बंगाली मीठे पकवान भी होते थे। बाजारीकरण के प्रवेश के साथ मिठाई की दुनिया में भी बहुत प्रयोग हुए, नई मिठाइयां ने इंट्री मारी. इनोवेशन और फ्यूजन शुरू हुआ. सारे देश की हिट मिठाइयां हर जगह नजर आने लगीं तो नए किस्म के मीठे पकवान भी बनने लगे। पहले अगर मिठाई की दुकानों पर केवल खोया बर्फी ज्यादा सजी नजर आती थी। वहां अब बादाम बर्फी, मूंग बर्फी, ड्राईफ्रूट्स बर्फी, दोधा (डोडा) बर्फी, नारियल बर्फी, पिश्ता बर्फी, काजू कतली, तिरंगी बर्फी, चॉकलेट बर्फी…ना जाने बर्फी कितने रूपों में दिखती है. इसमें दोधा बर्फी और काजू कतली की तो बनने की कहानियां ही गजब की हैं।
दूध ओटाने का काम तो हमारे यहां शायद तब से हो रहा है जब से हमने मवेशी रखने शुरू किए और आग पर बर्तन खाने-पकाने का काम सीख लिया। सिंधु घाटी सभ्यता और इसके पहले बरफी जैसे व्यंजन बनाने का उल्लेख मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग दूध और चीनी को किण्वित करने और ऐसी मिठाइयां बेशक बनाना जानते थे।
बर्फी फारस से आई – हालांकि जो बर्फी हम खाते हैं, जो फारस से तब आई जब मुगलों ने इधर रुख किया. कुछ का कहना है कि फारस से आने वाले व्यापारी इसे लेकर आए। खैर जो भी हो लेकिन बर्फी शब्द मूलतौर पर फारसी शब्द है. जो बर्फ से बना है। इसका फारसी में शाब्दिक मतलब होगा, जमी हुई चीज । हालांकि दुनिया में बर्फी भारत से फैली. कहा जाता है कि 19वीं सदी के बीच जब भारत से गिरमिटिया मजदूर कैरिबियन देशों और मॉरीशस की ओर गए तो इसे वहां ले गए. वहां ये लोगों को बहुत भायी. अब तो खैर बर्फी दुनियाभर में लोकप्रिय है।
अलग अलग तरह की बर्फियां –  बर्फी तो अब खैर हमारे रीतिरिवाजों और पूजा अर्चना के साथ खुशियों के मौकों से भी जुड़ी है। हर बर्फी का अंदाज और जीभ पर मीठे की आनंददायी लहर पैदा करने का तरीका भी अलग है. कुछ बर्फियां चिपचिपी होती हैंय़ कुछ क्रिस्पी, कुछ दानेदार टैक्सचर वाली तो कुछ जीभ पर आते ही हल्के हल्के घुलने वाली. कई जगह इनके आकार प्रकार भी बदल जाते हैं।
कैसे एक पहलवान ने अनायास बनाई डोडा बर्फी – अब दो बर्फियों के आविष्कारों की बात, जो ठेठ भारतीय जमीन पर पैदा हुईं और दुनियाभर में फैल गईं। भूरी सुनहरी रवेदार चिपचिपी दोधा (डोडा) बर्फी कुछ लोगों को बहुत अच्छी लगती है। इसके बनने की कहानी रोचक है. ये अनायास ही बन गई। वाकया बंटवारे से पहले 1912 का है. पंजाब के एक पहलवान थे हरबंस विज. कुश्ती पहलवानी का काम करते थे। खुराक भी जबरदस्त थी. दूध और घी खाते पीते अघा चुके थे। एक दिन उन्होंने रसोई में दूध, घी, मलाई और सूखे मेवों को चीनी डालकर ओटाना शुरू किया। दूध ओटते ओटते पहले सफेद हुआ. फिर भूरा होने लगा। ड्राईफ्रूट्स और घी के मेल ने भी कमाल किया. और जो कुछ हलवे के अंदाज में बनकर सामने आया वो भूरा, गाढ़ा, चिपचिपा, रवेदार और एक अलग स्वाद वाला था। उन्होंने इसे थाली में पलटा और सपाट करके बर्फी के शेप में काट लिया। वास्तव ये जो नया स्वाद था, ये बहुत शानदार तो था ही और नया नया भी. इसे उन्होंने दोधा बर्फी कहा। ये दोधा से कब डोडा बर्फी कही जाने लगी, पता ही नहीं चला.
पहलवान को कैसे मालामाल कर दिया इस बर्फी ने – अब हरबंस विज ने ये बर्फी बनाने का काम ही शुरू कर दिया। ये पसंद की जाने लगी। उनकी दुकान बड़ी होने लगी और इस बर्फी ने उन्हें खूब पहचान दी।  खासकर पहलवान इसे बहुत खाते थे. उन्हें लगता था कि इस बर्फी से दूध, घी और मावे का पूरा न्यूट्रीशन मिल जाता है। इस बर्फी की लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि लोग दूर दूर से इसे खरीदने आने लगे।
अब ये खास बर्फी बाहर भी खूब जाती है – जब बंटवारा हुआ तो हरबंस विज पाकिस्तान के अधीन आए पंजाब से कपूरथला आ गए। पाकिस्तान में जिसने उनका घर और दुकान खरीदी। उन्होंने भी इस बर्फी को बनाने बेचने का काम जारी रखा। कपूरथला में हरबंस ने अपनी दुकान शुरू की, जो इतनी फेमस हो गई कि वहां के चौक को ही दोधा (डोडा) चौक कहा जाने लगा. रॉयल दोधा हाउस से ये मिठाई अब भी एक्सपोर्ट होती है. अब हरबंस के परिवारवाले इसको चलाते हैं।
काजू कतली की दिलचस्प कहानी – काजू कतली की कहानी भी दिलचस्प है. ये दक्षिण भारत के दक्कन में ईजाद हुई, वहां से देशभर में फैली। अब तो ये हर किसी की पसंदीदा है. इसे बनाने का श्रेय 16वीं सदी में प्रसिद्ध शेफ भीमराव को जाता है. जो मराठा साम्राज्य के राजसी परिवार में मुख्य रसोइया थे।  मराठों को मिठाई बहुत पसंद थी. भीमराव चाहते थे कि कोई नई मिठाई तैयार करें जिससे राज परिवार को प्रभावित कर सकें।
मराठा राज परिवार के रसोइए ने इसे बनाया – कहा जाता है कि भीमराव जब ये मिठाई तैयार कर रहे थे तो उनके दिमाग में फारसी स्वीट हलवा-ए-फारसी भी था। जो बादाम और चीनी से बनाया जाता था. तो उन्होंने तय किया वो काजू से नए तरह की मिठाई बनाएंगे। काजू उस क्षेत्र में भरपूर पैदा होता था. और जब भीमराव ने काजू से मिठाई बनाई तो मराठा राजघराने में खूब पसंद की गई। ये आम बरफी से कुछ ज्यादा पतली परत वाली थी तो इसे नाम दिया गया काजू कतली. ये पहले महाराष्ट्र में लोगों को भाया और फिर देश में फैल गया। अब ये भारतीय मिठाइयों में सबसे मशहूर मिठाई बन चुकी है. इसे उच्च श्रेणी की मिठाई माना जाता है।
कैसे बनाते हैं बर्फी – आमतौर पर बर्फी को गाढ़े दूध से बने खोया, दानेदार चीनी और घी से बनाया जाता है। इसमें पिस्ता, काजू, इलायची, केसर और मूंगफली जैसे मेवे मिलाये जाते हैं। इसमें कुछ क्षेत्रीय किस्मों में फल, गुलाब जल, बेसन या बादाम शामिल होते हैं जैसे नागपुर की आरेंज बर्फी का स्वाद और अंदाज दोनों बेमिसाल हैं. इनमें डाली गईं सामग्रियों के जरिए इन्हें खास रंग भी दिया जाता है। जब ये मिश्रण ठंडा हो जाता है तो इसे डायमंड, चौकोर या गोल टुकड़ों में काट लिया जाता है।
बेसन की बर्फी – यह स्वादिष्ट बर्फी मुंह में जाते ही पिघल जाती है. इसे बेसन को डीप फ्राई करके बनाया जाता है जिससे न सिर्फ बर्फी का स्वाद बेहतर हो जाता है बल्कि इसमें एक मनमोहक खुशबू भी आ जाती है. जैसे बेसन का रंग बदलता है, वैसे ही बर्फी का रंग भी बदलता है. इसमें मेवों का भी इस्तेमाल होता है।
नारियल बर्फी – नारियल बर्फी का लुभावना और साफ्ट अंदाज जीभ को अपना नजाकत से बाग-बाग कर देता है. इसे नारियल के बुरादे और खोये के साथ बनाते हैं।
बादाम बर्फी – इसे बादाम के चूरे और खोया मिलाकर बनाते हैं। इसका स्वाद भी लजीज होता है।
(साभार – न्यूज 18)

120 सालों से लोगों की सेवा कर रहा अयोध्या का श्री राम अस्पताल

अयोध्या । सदियों से अयोध्या के लोग भगवान राम से अपनी भलाई के लिए प्रार्थना करते रहे हैं, लेकिन शहर में एक और ‘श्री राम’ भी हैं। अयोध्या के ये ‘श्री राम’ 120 से अधिक सालों से गरीबों, बीमारों को राहत और सहायता प्रदान करते आ रहे हैं। अपने में ऐतिहासिक विरासत को समेटे श्री राम अस्पताल का भवन शहर के केंद्र में राम पथ से जुड़े और नवनिर्मित भव्य राम मंदिर से एक किलोमीटर से भी कम की दूरी पर स्थित है।
इमारत के मुख्य ब्लॉक में एक दीवार पर लगी पुरानी संगमरमर की पट्टिका पर एक शिलालेख है, जिस पर लिखा है – ‘माननीय राय श्री राम बहादुर द्वारा अयोध्या के गरीबों के लिए निर्मित यह अस्पताल 5 नवंबर, 1900 को शुरू किया गया था। इसकी आधारशिला फैजाबाद मंडल के आयुक्त आईसीएस जे हूपर द्वारा रखी गई थी। 12 अप्रैल, 1902 को आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर एचएच सर जेम्स डिग्स लाटूश, केसीएसआई ने सार्वजनिक उपयोग के लिए खोला था’। एक अन्य पट्टिका पर हिंदी और उर्दू में वही शिलालेख अंकित है।
कई जिलों के लोग कराते हैं इलाज – अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी यश प्रकाश सिंह ने बताया, ‘यह अस्पताल क्योंकि अयोध्या में और राम जन्मभूमि स्थल के निकट स्थित है इसलिए बहुत बड़ी संख्या में लोग सोचते हैं कि इसका नाम प्रभु श्री राम के नाम पर रखा गया है। इसके संस्थापक श्री राम एक परोपकारी व्यक्ति थे, जिन्होंने इस अस्पताल की स्थापना की थी। अस्पताल में अयोध्या और फैजाबाद के साथ-साथ गोंडा और बस्ती जिलों से भी मरीज आते हैं।’
अस्पताल में होता है मुफ्त इलाज – यश प्रकाश सिंह ने बताया कि ‘अस्पताल उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन है और इलाज मुफ्त है। कई लोग यह भी सोचते हैं कि यह एक निजी अस्पताल है।’ अस्पताल को अब आधिकारिक तौर पर राजकीय श्री राम अस्पताल कहा जाता है। अपनी स्थापना के बाद से अस्पताल ने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा की है और राम मंदिर के निर्माण के साथ बदली अयोध्या की रंगत के बाद यह भी नए जोश के साथ चिकित्सा सेवा के जरूरतमंद श्रद्धालुओं की सेवा कर रहा है।
राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह 22 जनवरी को हुआ और आम जनता के लिए इसके कपाट 23 जनवरी को खोल दिए गए। तब से अब तक लाखों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन कर चुके हैं। प्रकाश सिंह ने कहा- उद्घाटन के पहले दिन एक भक्त जो बेहोश हो गया था। उसे एम्बुलेंस में हमारे अस्पताल में लाया गया और उसे चिकित्सा सहायता दी गई, अन्य श्रद्धालु जिन्हें सांस लेने में समस्या की शिकायत थी, या जो भीड़ में घायल हो गए थे, उनकी भी देखभाल की गई। अस्पताल राम मंदिर परिसर की ओर जाने वाले मुख्य सजावटी प्रवेश द्वार से पैदल दूरी पर स्थित है। 120 बिस्तरों वाले श्री राम अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी ने कहा, ‘पहले अस्पताल की पुरानी इमारत का रंग गुलाबी था, लेकिन राम पथ के किनारे की इमारतों के समान स्वरूप के अनुरूप इसका रंग हाल में बदलकर पीला कर दिया गया।’
(भाषा इनपुट के साथ रिपब्लिक भारत डेस्क)

शोज हाउसफुल, पर सिनेमाघर खाली, क्या है कॉरपोरेट बुकिंग

फिल्में रिलीज होने के साथ सिर्फ कहानी, वीएफएक्स या फिर स्टार्स ही चर्चा में नहीं आते. आजकल एक शब्द काफी चलन में है, वो है- कॉरपोरेट बुकिंग. कभी ना कभी ये शब्द आपके कानों के पर्दे को छूते हुए जरूर गुजरा होगा।
दिसंबर 2023 में जब रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ रिलीज हुई तो उस समय भी ये शब्द सुर्खियों में आया था। फिल्म के निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा के भाई और को-प्रोड्यूसर प्रणय रेड्डी वांगा ने आईड्रीम मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था- “फिल्म की कमाई के जो आंकड़े हमने जारी किए हैं, वो बिल्कुल सटीक हैं। आजकल लोग बॉक्स ऑफिस नंबर्स पर शक करते हैं, क्योंकि आजकल बॉलीवुड में कॉरपोरेट बुकिंग पर निर्भर होने का ट्रेंड है। हमने ऐसा नहीं किया है।”
22 दिसंबर 2023 को थिएटर्स में प्रभास की फिल्म ‘सलार’ आती है. रिलीज के अगले ही दिन सोशल मीडिया पर इस फिल्म के खिलाफ ‘Scammer Salaar’ नाम का एक हैशटैग ट्रेंड करने लगता है। नेटिजंस ऐसा दावा करते हैं कि फिल्म के कलेक्शन को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने के लिए मेकर्स ने कॉरपोरेट बुकिंग की है। इतना ही नहीं, ऐसा भी दावा होता है कि बिहार के बक्सर के ‘कृष्णा सिनेमहॉल’ में सुबह 6 और 7 बजे के शोज हाउसफुल दिखाए जाते हैं, जबकि ये हॉल 6 साल पहले ही बंद हो चुका है। उस समय इस तरह की भी बातें होती हैं कि ‘बुकमाय शो’ पर इस फिल्म के मॉर्निंग शो भरे हुए दिखाए गए, लेकिन जितने बजे का शो था उस समय सारे मॉल बंद थे। पिंकविला की एक रिपोर्ट की मानें तो साल 2022 में एक एक्शन फिल्म रिलीज होती है. रिलीज से पहले ये आंकड़ा सामने आता है कि टॉप नेशनल चेन की एडवांस बुकिंग में फिल्म ने 90 हजार टिकट बेच डाले हैं जबकि वो फिल्म ओपनिंग डे पर सिर्फ 6.50 करोड़ की ही कमाई कर पाती है। हालांकि, अगर किसी फिल्म के 90 हजार टिकट बिकते हैं तो ऐसा माना जाता है कि वो पिक्चर कम से कम 15 करोड़ तो जरूर कमाएगी, जोकि हुआ नहीं था। ये कोई इकलौता मामला नहीं है. आए दिन किसी न किसी फिल्म पर कॉरपोरेट बुकिंग के आरोप लगते रहते हैं. अब चलिए यहां पर समझ लेते हैं कि आखिर ये कॉरपोरेट बुकिंग है क्या और ये काम कैसे करती है –
कॉरपोरेट बुकिंग का खेल – आज कल रिलीज हो रही सभी फिल्मों के बीच हिट-सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर होने की होड़ मची हुई है लेकिन अच्छा कलेक्शन सिर्फ वो ही फिल्में कर पाती हैं, जिसे लोग पसंद करते हैं। जिस पिक्चर को लोग नकार देते हैं उसकी कमाई में गिरावट आ जाती है. लेकिन हिट होने की इस रेस में कुछ फिल्मों के मेकर्स द्वारा खुद ही बुकिंग करवा ली जाती है, जिससे कमाई के आंकड़े को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। ऐसे में होता क्या है कि जब हम ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं तो हमें ये दिखाया जाता है कि शोज हाउसफुल हैं, लेकिन जब आप थिएटर्स पहुंचते हैं तो वहां का नजारा कुछ और ही होता है। गिने-चुने लोग ही बैठे होते हैं. ये बुकिंग बड़े पैमाने पर कई बड़ों शहरों में की जाती हैं। फिल्ममेकर्स ऐसा करके बॉक्स ऑफिस पर खुद को जीत तो दिला देते हैं और ऐसी चर्चा होनी शुरू हो जाती है कि इस फिल्म ने 100 करोड़, 200 करोड़ या 1000 करोड़ कमा डाले, लेकिन हकीकत में मेकर्स को इससे पैसे के मामले में कुछ फायदा होता नहीं है. क्योंकि वो खुद ही टिकट बुक करवाते हैं और वो पैसा अपने घर में ही घूम-फिरकर वापस आ जाता है।
फिल्म ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा ने एफएम कनाडा को कुछ समय पहले दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि एनिमल इकलौती ऐसी फिल्म है, जिसके बारे में उन्होंने जरा सा ये भी नहीं सुना कि इस फिल्म के पास कॉरपोरेट बुकिंग से पैसा आ रहा हो. उन्होंने कहा था कि ये एक ऐसी फिल्म है, जिसने अपनी मेरिट पर कमाई की है और कमाई के जो आंकड़े सामने आए हैं वो सटीक हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि- “कुछ और बड़ी फिल्में हैं जो मेरिट से ब्लॉकबस्टर हैं, लेकिन उसे और भी बड़ा ब्लॉकबस्टर साबित करने के लिए उस फिल्म के प्रोड्यूसर या हीरो कॉरपोरेट बुकिंग के नाम पर पैसे फाड़ते हैं और जो लोग बोलते हैं कि ‘बुकमाय शो’ पर फुल दिखा रहा है, लेकिन अंदर जाकर देखा तो 10 लोग बैठे हैं. ऐसा इसलिए ही होता है।”
मेकर्स को फायदा भी और नुकसान भी – कॉरपोरेट बुकिंग से जहां मेकर्स को अपनी फिल्म को बड़ा दिखाने में फायदा होता है तो वहीं दूसरी तरफ उनको भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है। इसको समझने के लि एक उदाहरण लेते हैं- मान लीजिए अगर कोई हीरो या फिर प्रोड्यूसर 8 करोड़ रुपये के टिकट खरीदता है, तो उसके बाद रिकॉर्ड में ये तो जाता है कि इस फिल्म के इतने करोड़ रुपये के टिकट बिक गए हैं, लेकिन जब वो पैसा घूम-फिरकर उनके पास वापस आता है, तो पूरा नहीं आता है. क्योंकि फिल्म ने जितने के भी टिकट बेचे हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा एक्जीबिटर्स के पास चला जाता है।

चुनाव प्रचार अभियान में बच्चों का इस्तेमाल न करें राजनीतिक दल : चुनाव आयोग

नयी दिल्ली । लोकसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों से पोस्टरों एवं पर्चों में प्रचार के लिए किसी भी रूप में बच्चों का इस्तेमाल करने से मना किया है। राजनीतिक दलों को भेजे परामर्श में निर्वाचन आयोग ने दलों और उम्मीदवारों द्वारा चुनावी प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरीके से बच्चों का इस्तेमाल किए जाने के प्रति अपनी ‘कतई बर्दाश्त नहीं करने’ की नीति से अवगत कराया। आयोग ने कहा, ‘किसी भी तरीके से राजनीतिक प्रचार अभियान चलाने के लिए बच्चों के इस्तेमाल पर भी यह प्रतिबंध लागू है, जिसमें कविता, गीत, बोले गए शब्द, राजनीतिक दल या उम्मीदवार के प्रतीक चिह्न का प्रदर्शन शामिल है।’ उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई नेता जो किसी भी राजनीतिक दल की चुनाव प्रचार गतिविधि में शामिल नहीं है और कोई बच्चा अपने माता-पिता या अभिभावक के साथ उसके समीप केवल मौजूद होता है तो इस परिस्थिति में यह दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने आगामी संसदीय चुनावों के मद्देनजर लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने में उनसे सक्रिय भागीदार बनने का आग्रह किया है।

लाक्षागृह-कब्रिस्तान विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज

53 साल बाद कोर्ट में हिंदू पक्ष की बड़ी जीत
बागपत । बागपत के बरनावा में स्थित महाभारतकालीन लाक्षागृह पर चल रहे विवाद में 53 वर्ष बाद हिंदुओं के पक्ष में फैसला आया। सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें उसने लाक्षागृह की 100 बीघा जमीन को शेख बदरूद्दीन की मजार और कब्रिस्तान बताया था। मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील की बात कही है। बरनावा में स्थित लाक्षागृह टीले की 100 बीघा जमीन को लेकर हिंदू व मुस्लिम पक्ष के बीच पिछले 53 वर्षों से विवाद चल रहा है। 31 मार्च 1970 में मेरठ के सरधना की कोर्ट में बरनावा निवासी मुकीम खान ने वक्फ बोर्ड के मुतवल्ली की हैसियत से एक वाद दायर कराया था। इसमें लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त उर्फ स्वामी को प्रतिवादी बनाया गया था। सोमवार को मुकदमे की सुनवाई पूरी हो गई और सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम शिवम द्विवेदी ने मुकदमे में फैसला सुनाते हुए मुस्लिम पक्ष के दावे को खारिज कर दिया।
मुस्लिम पक्ष का यह था दावा – दावे के अनुसार कब्रिस्तान एक ऊंचे टीले पर स्थित है जहां तकरीबन 600 साल पहले एक हजरत शेख बदरुद्दीन साहब ने अपने जिंदगी में इबादत की और फिर वहीं दफन हुए। इन बुजुर्ग का बहुत पुराना मकबरा बना है जिसके चारों तरफ हाता है और उसके करीब एक बड़ा चबूतरा बतौर मस्जिद थी और इसके आसपास भी काफी कमरे बने हुए थे। वादी ने अपने वाद में कहा कि कृष्ण दत्त उर्फ स्वामी कहीं बाहर के रहने वाले थे।
उन्होंने इस जगह को हिंदुओं के पुराने तीर्थ के ऊपर बनाया हुआ बताते हुए कब्रिस्तान को खत्म करके फिर से इसको हिंदुओं का तीर्थ बना देने की बात कही और यहां पर हवन करना शुरू कर दिया था। यह भी कहा गया कि वक्फ यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधीन है। न्यायालय में वाद शुरू होने के बाद वादी मुकीम खान और प्रतिवादी कृष्णदत्त दोनों का निधन हो गया। वर्ष 1997 में मुकदमा मेरठ से बागपत ट्रांसफर हो गया। जिसके बाद दोनों पक्ष की ओर से अन्य लोग ही वाद की पैरवी कर रहे थे।
सर्वे ऑफ इंडिया के अफसरों ने भी दी गवाही – करीब 53 साल अदालत में चले इस मुकदमे में दोनों पक्षों की ओर से ढेर सारे दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। वादी और प्रतिवादी पक्ष की ओर से कई गवाह भी पेश किए गए। प्रतिवादी पक्ष ने सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों की भी गवाही कराई थी।
हिंदू पक्ष की जीत – प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता रणबीर सिंह तोमर ने बताया, वर्ष 1997 से मुकदमे की सुनवाई बागपत न्यायालय में चल रही थी। सुनवाई के दौरान हमने सात गवाह पेश किए। इनमें सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारी की गवाही भी शामिल रही। सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज कर दिया है। यह हिंदू पक्ष की बड़ी जीत है। जमीन लाक्षागृह की ही है।
ऊपरी अदालतों के दरवाजे खुले हैं – वादी पक्ष के वकील शाहिद अली का कहना है कि न्यायाधीश ने सुनवाई के बाद मुस्लिम पक्ष के दावे को खारिज कर दिया है। मुस्लिम पक्ष के पैरोकारों के साथ बातचीत कर आगे की रणनीति बनाई जाएगी। फैसले के खिलाफ उच्च अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
यह है महाभारतकालीन लाक्षागृह – महाभारतकालीन इतिहास के अनुसार हस्तिनापुर राज सिंहासन से पांडवों को बेदखल करने के बाद दुर्योधन ने पांडवों को खत्म करने की योजना बनाई। इसके लिए वारणावर्त (अब बरनावा) में पुरोचन नाम के शिल्पी से ज्वलनशील पदार्थों लाख, मोम आदि से एक भवन तैयार कराया गया। इस भवन में पांडवों को ठहरा कर भवन में आग लगा दी। पांडवों के शुभचिंतकों ने उन्हें गुप्त रूप से इसकी सूचना पहले ही दे दी थी। आग लगते ही पांडव सुरंग से होकर बाहर सुरक्षित निकल गए। यह सुरंग हिंडन नदी के किनारे खुलती है। इसके अवशेष आज भी मिलते हैं। गांव के दक्षिण में लगभग 100 फुट ऊंचा और कई एकड़ भूमि पर फैला हुआ यह टीला लाक्षागृह के अवशेष के रूप में मौजूद है। इस टीले के नीचे दो सुरंगें स्थित हैं। बरनावा में कृष्णा व हिंडन नदी के संगम पर स्थित महाभारतकालीन ऐतिहासिक टीला लाक्षागृह को शेख बदरुउद्दीन की दरगाह व कब्रिस्तान बताने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिका सोमवार को कोर्ट से खारिज कर दिए जाने पर शांति व्यवस्था व सुरक्षा के मद्देनजर टीले पर पुलिस फोर्स तैनात की गयी ।
ये बिंदु बने फैसले का आधार
राजस्व अभिलेखों में कब्रिस्तान दर्ज नहीं मिला
6 बीघा, 7 बिस्वा, 8 बिस्वांशी पर लाखा मंडप और शेष भूमि वन विभाग के नाम दर्ज मिली
25 नवंबर 1920 को नोटिफिकेशन जारी हुआ और फिर 27 नवंबर को दोबारा नोटिफिकेशन जारी हुआ था, जिसके सापेक्ष 1965 में तहसीलदार सरधना ने एसडीओ भूमि राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने के लिए रिक्मंड किया
चार मार्च 1965 को एसडीओ सरधना ने लाखा मंडल दर्ज करने का आदेश पारित किया
28 अगस्त 1973 को मुकीम खान निगरानी योजित निरस्त हुई
1970 में यानि की 1977 फसली में कब्रिस्तान दर्ज नहीं मिला
विवादित जमीन लाखा मंडप और वन विभाग की थी, जिसमें साबित हुआ कि उक्त जमीन कब्रिस्तान के नाम पर दर्ज नहीं थी
1950 में विवादित जमीन में से 30 बीघा जमीन वन विभाग के नाम दर्ज हुई
उत्तर प्रदेश सरकार एवं वन विभाग ने गांधी धाम समिति के विरूद्ध बेदखली का वाद 10 अक्तूबर 1990 को खंडित किया
सर्वे विभाग ऑफ इंडिया ने लाक्षागृह का सर्वे किया। सर्वे के दौरान महाभारत कालीन साक्ष्य मिले

‘पुलिस बिन एक दिन’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

कोलकाता । नयी दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘पुलिस पब्लिक प्रेस’ के द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में 21 जनवरी, रविवार को किया गया था। इस संगोष्ठी का विषय ‘पुलिस बिन एक दिन’ था। इस संगोष्ठी का उद्देश भारत को अपराध मुक्त करना है और आम जनता तथा पुलिस के बीच संबंध तथा संवाद स्थापित करना है। जिसके लिए संगोष्ठी के साथ-साथ एक भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के चयनित 12 प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुति मंच पर दी। इन प्रतिभागियों का चयन ऑनलाइन चयन प्रक्रिया द्वारा किया गया था। भाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के ओंकार बनर्जी, द्वितीय स्थान सेंट ल्युक डे स्कूल की वर्षा जायसवाल, तृतीय स्थान पर कांकीनारा हाई स्कूल के पीयूष साव और चतुर्थ स्थान सेंट ल्यूक डे स्कूल की सृष्टि सिंह ने प्राप्त किया। भाषण प्रतियोगिता के निर्णायकों की रूप में वरिष्ठ कवयित्री विद्या भंडारी, जनवादी कवि राज्यवर्धन और एम.एम.टी.सी. के पूर्व निदेशक मृत्युंजय श्रीवास्तव उपस्थित थे। इस आयोजन के प्रधान अतिथि और संगोष्ठी के मुख्य वक्ता पूर्व आई.पी.एस. विजय कुमार को उनके साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया। साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में विशिष्ट योगदान और कार्यों के किए डॉ. केयूर मजमूदार, प्रो. (डॉ) संजय जायसवाल, रचना सरन, विनोद यादव, प्रिया श्रीवास्तव, चेतन चौधरी, प्रकाश किल्ला, सोनू जायसवाल, सुशील कुमार सिंघल, सुरजीत दे, दिनेश जायसवाल, तारक नाथ दुबे, अल्पना सिंह आदि को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में पुलिस पब्लिक प्रेस पत्रिका के कर्णधार पवन कुमार भूत ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

22 जनवरी का श्रीराम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह अंक

श्रीराम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह अंक – श्रीराम मंदिर आन्दोलन का इतिहास, स्वामी रामभद्राचार्य, नेताजी जयंती एवं गणतंत्र दिवस समारोह पर आधारित विविध सामग्री