अशोक पांडेय
लो भाई खबर आ गई। खबर है रेप की। इसे रिडिफाइन या नये सिरे से परिभाषित किया गया है। वकीलों की टेंशन कम हो गई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। रेप करने की तैयारी में जुटे लोगों की राह आसान हो गई क्योंकि बाकायदा हाईकोर्ट के परम विद्वान जज साहब ने स्त्री-पुरुष के यौनांगों का चरित्र चित्रण कर दिया है। सीमा-रेखा भी तय कर दी है। कहां तक किस अंग को छूट दी जा सकती है- इसे भी परिभाषित किया जा चुका है। समाज और कानून के सिर पर रखा एक बोझ हल्का हुआ।
जज साहब से लगे हाथों अपन थोड़ी और विनती करने के मूड में हैं क्योंकि लगता है इनके दरबार से खाली हाथ नहीं लौटाया जाएगा। मि. लॉर्ड लगे हाथों चोरी, डकैती, अपहरण और देश लूटकर विदेश भागने वालों की कलाकारी को भी थोड़ी मेहनत करके डिफाइन कर दीजिए। कम से कम इससे हमारे देश के कई नेताओं को राहत मिलेगी। पॉलिटिक्स में जिन बेचारे साफ-सुथरे लोगों को घोटाले में फंसाया जाता है, उन्हें भी नये-नये तरीके खोजने में सुविधा होगी।
लेकिन एक जगह अपन के भेजे में थोड़ा लोचा है। जज साहब से अपन एक सवाल करता है, इफ यू डोंट माइंड माई लॉर्ड। करोड़ों लोगों की आबादी वाला अपना देश आजादी के बाद से आजतक डिफिकल्टी माने परेशानी में है। अभी तक हर हिन्दुस्तानी के पास पीने का साफ पानी नहीं है। हर हिन्दुस्तानी आज भी हाई ग्रेड का पढ़ा-लिखा जेंटलमैन आपकी तरह नहीं बन सकता है। देश के हर आदमी के पास काम नहीं है। जो काम था वो भी कोरोना जी के आने के बाद कल्टी मार गया। किसी एक जमीन कोई दूसरा दखल करके मकान- होटल-मॉल बना दिया है। थाने में जाओ तो मूंछों वाला दारोगा डंडे मारकर भगाता है। जो पब्लिक को बेवकूफ बनाकर वोट ले गया वो पांच साल तक इधर आने वाला नहीं है।
जज साहब, जैसे रेप का फैसला किया है ना वैसे ही कुछ इसका भी अब कर ही दीजिए। आम पब्लिक को वोट देकर नेता चुनने का हक है अपने यहां। निकम्मे और लतखोर नेता को सदन से लतियाकर भगाने का हक ही दिलवा दीजिए ना प्लीज। जनता जहां पीने के पानी को तरस रही है वहां आप हुजूर कहां ई सब रेप-वेप पर भजन गा रहे हैं। इस मुल्क ने बड़े अरमानों से आपको जज बनाया है- कुछ ऐसा कीजिए कि समाज याद रखे। ऐसे डर्टी फैसलों की अभी सुप्रीम कोर्ट में साबुन से धुलाई के भी चान्स हैं। प्लीज, अपन का सलाह मानिये और जनता को नेता चुनने की तरह ही नेता भगाने हक भी दिलवाइये। फिर सब ठीक हो जाएगा। फिर कोई सांप पांच साल तक देश को लूट नहीं सकेगा। आप अमर हो जाइयेगा। प्लीज कुछ कीजिए।
थैंक यू मी लॉर्ड ! कुछ और बोझ हल्के कर दीजिए ना
श्रीलंका में अब सांसदों को नहीं मिलेगी पेंशन
कोलंबो। श्रीलंका के सांसदों ने मंगलवार को अपनी पेंशन रद्द करने के पक्ष में भारी बहुमत से मतदान किया है। यह साहसिक कदम देश के गंभीर आर्थिक संकट और जनता के बढ़ते आक्रोश के बीच श्रीलंका सरकार द्वारा किए गए एक प्रमुख चुनावी वादे को पूरा करने के लिए उठाया गया है। 225 सदस्यीय श्रीलंकाई संसद में इस विधेयक को लेकर जबरदस्त सहमति दिखाई दी।
सांसदों ने 225 सदस्यीय सदन में 154 मतों से विधेयक पारित कर दिया, जबकि केवल दो मत इसके विरोध में पड़े। शेष विधायक मतदान के दौरान अनुपस्थित रहे। इसके पहले श्रीलंका में सांसद पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद पेंशन पाने के हकदार होते थे। नए कानून के तहत, जो लोग पहले से ही पेंशन प्राप्त कर रहे हैं या इसके लिए पात्र हैं, उन्हें भी पेंशन का भुगतान नहीं होगा।
वर्ष 2024 में चुने गए राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने अपने चुनाव अभियान के दौरान पेंशन संबंधी प्रावधान को समाप्त करने का वादा किया था। इसी तरह दिसानायके सरकार ने जनता की मांग पर पूर्व राष्ट्रपतियों को मिलने वाली सुविधाओं को सितंबर में समाप्त कर दिया।
इनमें आवास, भत्ते, पेंशन और परिवहन के लिए सरकारी अनुदान शामिल थे। विधि मंत्री हर्षना नानायक्कारा ने संसद में पेंशन संबंधी विधेयक पेश करते हुए कहा कि चुनावी वादा पूरा किया गया है और सांसदों को ऐसे समय में पेंशन प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है जब देश अपने सबसे बुरे आर्थिक संकट से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा है। श्रीलंका ने 83 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज होने पर अप्रैल 2022 में खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था। इसमें से आधे से अधिक कर्ज विदेशी लेनदारों का है।
रोबोडॉग प्रकरणः प्रमाणन की होड़ में दम तोड़ती अकादमिक गुणवत्ता
-डॉ. प्रियंका सौरभ
गलगोटिया यूनिवर्सिटी में रोबोडॉग के प्रदर्शन से जुड़ा हालिया विवाद सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया में व्यापक चर्चा का विषय बना। सतह पर यह मामला उपयुक्तता, प्राथमिकताओं या कैंपस संस्कृति से जुड़ा प्रतीत होता है, लेकिन वास्तविकता में यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में वर्षों से पनप रहे गहरे और संरचनात्मक संकट का केवल एक लक्षण है। समस्या रोबोडॉग नहीं है। समस्या यह है कि हमारे विश्वविद्यालय धीरे-धीरे क्या बनते चले गए हैं।
पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। निजी विश्वविद्यालयों, स्ववित्तपोषित कॉलेजों और डिग्री संस्थानों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। इस विस्तार को अक्सर शिक्षा तक पहुँच बढ़ने और जनसांख्यिकीय लाभ के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन जब यह विस्तार समानांतर नियमन, अकादमिक कठोरता और जवाबदेही के बिना हुआ तो इसकी क़ीमत गुणवत्ता को चुकानी पड़ी। परिणाम यह हुआ कि मात्रा बढ़ी पर गुणवत्ता लगातार गिरती चली गई।
आज देश के अधिकांश-हालाँकि सभी नहीं—निजी विश्वविद्यालय और डिग्री कॉलेज शिक्षा के केंद्र कम और डिग्री वितरण केंद्र अधिक बन गए हैं। शिक्षा एक बौद्धिक प्रक्रिया नहीं बल्कि लेन-देन बनती जा रही है- पैसे के बदले डिग्री। उपस्थिति, अकादमिक भागीदारी, प्रयोगशाला कार्य और बौद्धिक अनुशासन जैसी बातें अब अनिवार्य नहीं रहीं, बल्कि समझौते के दायरे में आ गई हैं। जो कभी उच्च शिक्षा में गैर-समझौतावादी हुआ करता था, वह अब लचीला, कमजोर और विकृत हो चुका है।
यह गिरावट विशेष रूप से उन विषयों में चिंताजनक है जहाँ कठोरता अनिवार्य है। सैद्धांतिक पढ़ाई का कमजोर होना एक बात है, लेकिन विज्ञान शिक्षा का खोखला हो जाना कहीं अधिक गंभीर है। आज स्थिति यह है कि छात्र बिना नियमित कक्षाओं में गए और बिना प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रशिक्षण लिए विज्ञान जैसे विषयों में स्नातक और परास्नातक डिग्रियाँ प्राप्त कर रहे हैं। प्रयोगात्मक कार्य- जो कभी वैज्ञानिक प्रशिक्षण की रीढ़ हुआ करता था—अब औपचारिकता बनकर रह गया है। डिग्रियाँ तो दी जा रही हैं लेकिन दक्षता सुनिश्चित नहीं की जा रही।
इस खोखलेपन के परिणाम तब स्पष्ट होते हैं जब छात्र नौकरी के लिए सामने आते हैं। रसायन विज्ञान में परास्नातक छात्र बुनियादी वैज्ञानिक अवधारणाएँ नहीं समझा पाता। कॉमर्स स्नातक डेबिट और क्रेडिट की मूल अवधारणा स्पष्ट नहीं कर पाता। प्रबंधन की डिग्री रखने वाला छात्र समस्या-समाधान और आलोचनात्मक सोच में कमजोर दिखाई देता है। ये कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं बल्कि उद्योग जगत द्वारा बार-बार देखी जा रही सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं।
स्वाभाविक रूप से इससे छात्रों और अभिभावकों में निराशा पैदा होती है। वर्षों की पढ़ाई और भारी आर्थिक निवेश के बावजूद जब रोजगार नहीं मिलता तो सवाल उठते हैं। माता-पिता यह पूछने में बिल्कुल सही होते हैं कि पढ़ाई के बाद भी बच्चा बेरोज़गार क्यों है। अक्सर इस असंतोष का निशाना सरकार बनती है, जिस पर रोजगार सृजन न कर पाने का आरोप लगाया जाता है। हालाँकि रोजगार सृजन एक नीतिगत चुनौती है लेकिन यह विमर्श एक असहज सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर देता है कि बड़ी संख्या में स्नातक वास्तव में रोजगार योग्य ही नहीं हैं।
यहीं से मूल प्रश्न जन्म लेता है। यदि छात्रों में आवश्यक ज्ञान और कौशल नहीं है तो उन्हें योग्य घोषित करने वाली डिग्रियाँ उन्हें कैसे मिल गईं? ऐसी संस्थाओं को बिना अकादमिक गुणवत्ता सुनिश्चित किए प्रमाणपत्र बाँटने की अनुमति किसने दी? इसका उत्तर हमें उच्च शिक्षा के नियामक ढाँचे में मिलता है।
भारत में उच्च शिक्षा की देखरेख कई मंत्रालयों, विभागों और नियामक संस्थाओं द्वारा की जाती है, जिनका घोषित उद्देश्य मानकों की रक्षा, गुणवत्ता सुनिश्चित करना और अकादमिक ईमानदारी बनाए रखना है। मान्यता प्रणालियाँ, निरीक्षण, मूल्यांकन और अकादमिक ऑडिट इसी उद्देश्य से बनाए गए थे। लेकिन व्यवहार में ये प्रक्रियाएँ अक्सर वास्तविक मूल्यांकन की बजाय औपचारिक अनुष्ठान बनकर रह गई हैं।
निरीक्षण प्रायः पूर्व निर्धारित होते हैं। दस्तावेज़ औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए सजाए जाते हैं। इमारतों और बुनियादी ढाँचे को शिक्षण गुणवत्ता पर प्राथमिकता दी जाती है। अनुपालन को सीखने के परिणामों से ऊपर रखा जाता है। छात्रों का वास्तविक अकादमिक अनुभव, शिक्षण की गुणवत्ता, परीक्षा की कठोरता और जिज्ञासा की संस्कृति- इन पर गंभीर और निरंतर निगरानी शायद ही होती है। नतीजतन, संस्थान शिक्षा सुधारने के बजाय नियामकों को “मैनेज” करना सीख लेते हैं।
इस नियामक शिथिलता ने एक दुष्चक्र को जन्म दिया है- संस्थान न्यूनतम अकादमिक जवाबदेही के साथ चलते रहते हैं, नियामक निगरानी का आभास बनाए रखते हैं और डिग्रियाँ लगातार जारी होती रहती हैं। इस व्यवस्था की क़ीमत न तो संस्थान चुकाते हैं, न ही नियामक बल्कि छात्र, नियोक्ता और समाज चुकाता है।
विडंबना यह है कि एक ओर उद्योग जगत योग्य मानव संसाधन की कमी की शिकायत करता है, वहीं दूसरी ओर देश शिक्षित बेरोज़गारी के गंभीर संकट से जूझ रहा है। यह कोई विरोधाभास नहीं बल्कि उस व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है जहाँ प्रमाणपत्र को क्षमता से ऊपर रखा गया है। कंपनियाँ नए कर्मचारियों को फिर से प्रशिक्षित करने पर भारी ख़र्च करने को मजबूर हैं, जबकि युवा पेशेवर आत्मविश्वास की कमी और करियर ठहराव से जूझते हैं।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार वे ईमानदार और प्रतिभाशाली छात्र हैं, जो अक्सर विकल्पों की कमी या भ्रामक ब्रांडिंग के कारण औसत संस्थानों में दाख़िला ले लेते हैं। वे मेहनत करते हैं, सीखना चाहते हैं लेकिन अंततः उन्हें अपनी काबिलियत से ज़्यादा अपनी मार्कशीट पर दर्ज संस्थान के नाम का बोझ उठाना पड़ता है। उनकी व्यक्तिगत योग्यता संस्थागत विश्वसनीयता की कमी में दब जाती है। यह केवल अन्याय नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा की बर्बादी है।
यह स्वीकार करना होगा कि भारत में आज भी कुछ उच्च-गुणवत्ता वाले संस्थान मौजूद हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते हैं। लेकिन वे अपवाद हैं, नियम नहीं। उल्लेखनीय है कि बारहवीं तक की स्कूली शिक्षा आज भी अपेक्षाकृत अधिक संरचित और नियंत्रित है। जैसे ही छात्र उच्च शिक्षा में प्रवेश करता है, निगरानी ढीली पड़ जाती है और अपेक्षाएँ धुंधली हो जाती हैं।
यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर होंगे। डिग्रियों का सामाजिक और आर्थिक मूल्य घटेगा। उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक विश्वास कमजोर होगा। योग्यता और औसतपन के बीच का अंतर और अधिक अस्पष्ट होता जाएगा। हर गली में विश्वविद्यालय जैसे वाक्य व्यंग्य नहीं बल्कि यथार्थ का वर्णन बन जाएंगे—जहाँ विश्वविद्यालय तो हर जगह होंगे, पर शिक्षा नहीं।
अब सुधार का समय है और यह सुधार ईमानदार और कठोर होना चाहिए। नियामक संस्थाओं को बॉक्स-टिकिंग से आगे जाकर परिणाम आधारित, पारदर्शी और अप्रत्याशित मूल्यांकन अपनाना होगा। शिक्षण की गुणवत्ता, सीखने के परिणाम, छात्र सहभागिता और मूल्यांकन की ईमानदारी को इमारतों और विज्ञापनों से ऊपर रखना होगा।
संस्थानों की जवाबदेही तय करनी होगी। जो कॉलेज और विश्वविद्यालय लगातार अकादमिक रूप से असफल हो रहे हैं, उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी चाहिए- सीटों में कटौती, पाठ्यक्रम निलंबन या मान्यता रद्द करने तक। उच्च शिक्षा ऐसा व्यवसाय नहीं हो सकता जहाँ असफलता की कोई क़ीमत न चुकानी पड़े।
छात्रों और अभिभावकों को भी अधिक सजग होना होगा। केवल मार्केटिंग, बुनियादी ढाँचे और ब्रांडिंग के आधार पर निर्णय लेना भविष्य के साथ समझौता है। शिक्षा कोई साधारण ख़रीद नहीं बल्कि बौद्धिक और व्यावसायिक विकास में निवेश है और ग़लत निर्णयों के दूरगामी परिणाम होते हैं।
अंततः, उच्च शिक्षा का उद्देश्य डिग्री बाँटना नहीं बल्कि सोचने-समझने वाले, सक्षम और ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करना है। जब तक यह मूल उद्देश्य पुनः स्थापित नहीं होता, तब तक रोबोडॉग जैसे विवाद आते रहेंगे- कुछ समय के लिए शोर मचाएँगे और फिर शांत हो जाएँगे, जबकि असली संकट जस का तस बना रहेगा। हमें सजावटी सुधार नहीं, बल्कि प्रणालीगत आत्ममंथन चाहिए। क्योंकि शिक्षा का संकट केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, वह चुपचाप राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
गोविंद भोग चावल को यूएन से मान्यता
कोलकाता । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की एक महत्वपूर्ण सामुदायिक पहल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान पर गर्व जताया है। मुख्यमंत्री ने यह भी जानकारी दी कि एफएओ ने पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध सुगंधित चावल गोबिंदभोग, तुलाइपांजी और कनकचूर को खाद्य और सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है। यह सम्मान राज्य के किसानों और ग्रामीण समुदाय की मेहनत का परिणाम है। इन कोशिशों को यूएन-एफएओ से मिली मान्यता, नेचुरल हेरिटेज, बायो-डायवर्सिटी, खाने और संस्कृति की विरासत को बचाने के लिए दुनिया भर में पहचाने गए अच्छे कामों के लिए एक बड़ा सम्मान है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी दी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि यूनाइटेड नेशंस ने हमारी पहल को एक बार फिर पहचान दी है। यूएन के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन ने हमारे इनोवेटिव ‘माटिर सृष्टि’ प्रोग्राम में कम्युनिटी पहल के लिए हमें इंटरनेशनल लेवल पर वैल्यूड सर्टिफिकेट दिया है, जिसे हमने 2020 में अपने सूखे पश्चिमी (पश्चिमांचल) जिलों में लॉन्च किया था।” उन्होंने कहा कि यह सम्मान प्राकृतिक विरासत और जैव विविधता के संरक्षण की श्रेणी में एक उत्कृष्ट सामुदायिक पहल के रूप में दिया गया है। इस योजना का उद्देश्य बंजर, अनुपजाऊ और एक फसल पर निर्भर भूमि को पुनर्जीवित कर उसे बहुफसली खेती, बागवानी और सब्जी उत्पादन के लिए उपयुक्त बनाना था। इस पहल के तहत भूमि सुधार, सिंचाई और पंचायत स्तर की रणनीतियों को एक साथ जोड़ते हुए समन्वित विकास मॉडल तैयार किया गया।ममता बनर्जी ने बताया कि कार्यक्रम के अंतर्गत नए तालाबों और अन्य जलस्रोतों का निर्माण किया गया तथा सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया गया। इससे न केवल खेती योग्य भूमि का दायरा बढ़ा, बल्कि लाखों ग्रामीणों को रोजगार के अवसर भी मिले। कई परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। ममता बनर्जी ने इस उपलब्धि को पूरे ग्रामीण समाज, विशेषकर बंगाल के किसानों को समर्पित करते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय पहचान राज्य के सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों की वैश्विक स्वीकृति है।
देश की 50 प्रतिशत से एआई नौकरियां बेंगलुरु और दिल्ली-एनसीआर में: रिपोर्ट
नयी दिल्ली । बुधवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु और दिल्ली-एनसीआर मिलकर देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ी 50 प्रतिशत से अधिक नौकरियों का हिस्सा रखते हैं। इनमें अकेले बेंगलुरु की हिस्सेदारी 25.4 प्रतिशत है। सीबीआरई साउथ एशिया प्राइवेट लिमिटेड की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 तक नौकरी डॉट कॉम पर उपलब्ध 64,500 से अधिक सक्रिय नौकरी लिस्टिंग के विश्लेषण में पाया गया कि दिल्ली-एनसीआर की हिस्सेदारी 24.8 प्रतिशत और मुंबई की 19.2 प्रतिशत है। इन तीनों शहरों को मिलाकर देश की लगभग 70 प्रतिशत एआई से जुड़ी नौकरियां इन्हीं क्षेत्रों में केंद्रित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियरिंग (सॉफ्टवेयर और क्वालिटी एश्योरेंस), डेटा साइंस व एनालिटिक्स और कस्टमर सक्सेस, सर्विस और ऑपरेशंस एआई भर्ती को बढ़ावा देने वाले टॉप तीन प्रमुख क्षेत्र हैं। कंपनी का कहना है कि यह रुझान दिखाता है कि एआई अब केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवसाय के फ्रंट-एंड कार्यों में भी तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारत केवल एआई के लिए कोड नहीं लिख रहा है, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि इसे वैश्विक उपभोक्ताओं के लिए कैसे लागू और संचालित किया जाए।” एआई से जुड़ी नौकरियों में बढ़ोतरी का असर ऑफिस स्पेस की मांग पर भी दिख रहा है। 2025 में ऑफिस लीजिंग में बेंगलुरु 26 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ आगे रहा। कुल ऑफिस लीजिंग गतिविधि 82.6 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच गई। इसके अलावा, देश में कुल जीसीसी (ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर) लीजिंग गतिविधि का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा भी बेंगलुरु ने हासिल किया।
दिल्ली-एनसीआर में केवल आईटी ही नहीं, बल्कि कंसल्टिंग, फिनटेक, हेल्थकेयर और पब्लिक सेक्टर जैसी विभिन्न क्षेत्रों से भी एआई की मजबूत मांग देखी जा रही है। सीबीआरई के चेयरमैन और सीईओ (भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और एमईए) अंशुमन मैगजीन ने कहा कि एआई अब केवल चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह भारत की आर्थिक और बुनियादी ढांचे की विकास गाथा का अहम हिस्सा बन चुका है।
उन्होंने कहा कि एआई पेशेवरों की बढ़ती मांग सिर्फ रोजगार का ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक कंपनियां अब भारत को केवल सेवा प्रदाता के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण नवाचार केंद्र के रूप में देख रही हैं। यह बदलाव भारत की आर्थिक संरचना और वैश्विक डिजिटल मूल्य शृंखला में उसकी स्थिति को नया रूप देगा।
भारत में 43 प्रतिशत बढ़ा दूसरी शादी का चलन
87 प्रतिशत पुरुषों को पत्नी की कमाई ज्यादा होने से दिक्कत नहीं
नयी दिल्ली । अक्सर फिल्मी सितारों की सेकेंड मैरिज की खबर सुनने को मिलती है। पर, आम भारतीय में भी दूसरी शादी का ट्रेंड बढ़ता दिख रहा है। एक स्टडी में बताया गया है कि भारत में दूसरी शादी का 43 प्रतिशत ट्रेंड बढ़ा है। साथ ही शादी को लेकर जाति, पार्टनर का चुनाव आदि को लेकर भी कई बातें सामने आई हैं। 36 गुण देखने वाले लोग अब सिर्फ एकाध गुण वाले पार्टनर को खोज रहे हैं। जीवनसाथी की “मॉडर्न मैचमेकिंग रिपोर्ट 2026″ के आधार पर भारतीय विवाहों में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। साल 2016 में जहां शादी के लिए औसत उम्र 27 साल थी, वहीं, 2025 तक यह बढ़कर 29 साल हो गई है। सर्वे के मुताबकि, अब 50 प्रतिशत लोग 29 साल की उम्र में अपना पार्टनर खोजना शुरू करते हैं, क्योंकि वे सामाजिक दबाव के बजाय करियर की स्थिरता और खुद की पहचान को ज्यादा महत्व देते हैं। साथ ही भारत में दूसरी शादी का ट्रेंड भी बढ़ता दिख रहा है। सेकेंड मैरिज का ट्रेंड 2016 में 11 प्रतिशत तो वहीं, 2025 में 16 प्रतिशत के साथ 43 प्रतिशत तक बढ़ता दिख रहा है। इस हिसाब से भारत में दूसरी शादी को लेकर तेजी से दिलचस्पी बढ़ती दिख रही है। समाज में तलाक और दूसरी शादी को लेकर सोच बदली है। जीवनसाथी की हर 6 में से 1 सफलता की कहानी अब दूसरी शादी करने वालों की होती है। 2016 में 91 प्रतिशत लोग जाति को एक अनिवार्य शर्त मानते थे, लेकिन 2025 तक यह घटकर केवल 54 प्रतिशत रह गया है। महानगरों में तो यह आंकड़ा और भी कम (49 प्रतिशत) है, जो दिखाता है कि अब जाति से ज्यादा आपसी समझ मायने रखती है। कैपिटल सिटी जैसे- लखनऊ, जयपुर और भोपाल जैसे शहरों के युवा अपने शहर से ज्यादा दिल्ली में पार्टनर ढूंढना पसंद करते हैं। वैसे भी दिल्ली दिलवालों की है इसलिए, शायद लोगों को यहां पार्टनर खोजने में दिलचस्पी है। अब केवल एक व्यक्ति के कमाने का दौर खत्म हो रहा है। 42 प्रतिशत लोग मानते हैं कि पति-पत्नी दोनों को बराबर योगदान देना चाहिए। साथ ही, 87 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नी की उनसे ज्यादा कमाई होने पर सहज हैं। इस तरह से सोच भी बदलती दिख रही है। इतना ही नहीं, आज के दौर में “सही समय” से ज्यादा “सही इंसान” का मिलना महत्वपूर्ण हो गया है। लोग सही साथी मिलने पर 3-6 महीने के भीतर शादी करने के लिए तैयार रहते हैं।
कुंडलिनी शक्ति-विकासक योग बढ़ाएगा एकाग्रता और चुस्ती
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज़्यादातर लोग एक ही शिकायत करते हैं कि दिनभर सुस्ती बनी रहती है और काम में मन नहीं लगता। सुबह उठते ही थकान महसूस होती है, दिनभर शरीर भारी-भारी सा रहता है और ध्यान जल्दी भटक जाता है। चाहे पढ़ाई हो, ऑफिस का काम हो या घर की जिम्मेदारियां, एकाग्रता की कमी हर किसी की परेशानी बन चुकी है। ऐसे में अगर कोई आसान और असरदार उपाय मिल जाए, तो उससे बेहतर क्या हो सकता है? योग में ऐसी कई सरल क्रियाएं हैं जो बिना ज़्यादा मेहनत के शरीर और दिमाग दोनों को सक्रिय कर देती हैं। इन्हीं में से एक है कुंडलिनी शक्ति-विकासक क्रिया। यह क्रिया दिखने में भले ही बहुत साधारण लगे, लेकिन इसके फायदे कमाल के हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे करने के लिए न तो ज्यादा जगह चाहिए और न ही किसी खास उपकरण की जरूरत होती है।
इस योग क्रिया को करने से सुस्ती धीरे-धीरे दूर होने लगती है। पैरों की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं और शरीर में रक्त संचार तेज होता है। इसका सीधा असर हमारे ऊर्जा स्तर पर पड़ता है। कुछ ही दिनों के अभ्यास से शरीर हल्का महसूस होने लगता है और सुबह-सुबह आलस कम हो जाता है।
कुंडलिनी शक्ति-विकासक का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है। इस क्रिया को करते समय शरीर की गति और सांसों का तालमेल बनता है, जिससे दिमाग वर्तमान क्षण पर केंद्रित रहता है। यही वजह है कि इसे करने के बाद मन ज्यादा शांत और फोकस्ड महसूस करता है। जो लोग पढ़ाई करते हैं या मानसिक कार्य ज्यादा करते हैं, उनके लिए यह योग क्रिया खास तौर पर फायदेमंद मानी जाती है।
अगर आप रोजाना सिर्फ 5 मिनट इस योग क्रिया के लिए निकाल लें, तो कुछ ही समय में फर्क महसूस होने लगता है। शुरुआत में इसे 20-25 बार करना पर्याप्त होता है। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ने पर अपनी क्षमता के अनुसार इसकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। बेहतर परिणाम के लिए इसे सुबह खाली पेट या शाम को हल्के व्यायाम के रूप में किया जा सकता है।
इस क्रिया को करते समय ध्यान रखने वाली सबसे अहम बात यह है कि शरीर पर ज़ोर न डालें। शुरुआत में गति धीमी रखें और जैसे-जैसे अभ्यास बढ़े, वैसे-वैसे लय में तेजी लाएं। अगर घुटनों या पैरों में किसी तरह की समस्या हो, तो डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
इन सुपरफूड्स से करें मधुमेह को कंट्रोल
तीस की उम्र के बाद खाने से लेकर सोने के समय में अगर परिवर्तन कर लिया जाए तो शरीर के आधे से ज्यादा रोग खुद-ब-खुद कम हो जाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कहा जाता है कि 30 के बाद आहार में मीठा और नमक दोनों की मात्रा आधी कर देनी चाहिए, लेकिन सभी के लिए ये करना बहुत मुश्किल है। बात चाहे सामान्य लोगों की हो या फिर मधुमेह से पीड़ित लोगों की, आज हम ऐसे सुपरफूड्स की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में आहार को भी औषधि माना है। अगर आहार संतुलित है तो जीवन भी संतुलित है। भविष्य में होने वाली मधुमेह की परेशानी से बचने के लिए या मधुमेह को नियंत्रित करने के सारे गुण आहार में मौजूद हैं। सबसे पहले आता है मैथी दाना और ओट्स। मैथी दाना और ओट्स दोनों ही मधुमेह को नियंत्रित करने और इंसुलिन रेजिस्टेंस को संतुलित करने में मदद करते हैं। दोनों में ग्लूकोमैनन और बीटा-ग्लूकान होता है जो घुलनशील फाइबर होते हैं और रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ने नहीं देते।
दूसरा है दालचीनी और करेला। दालचीनी और करेला दोनों ही भारतीय रसोई का हिस्सा हैं। मधुमेह से बचाव के लिए हफ्ते में तीन बार करेले का सेवन करना चाहिए और दालचीनी का इस्तेमाल खाने में और सुबह खाली पेट पानी पीने में कर सकते हैं। करेला और दालचीनी सेल्स को एक्टिव करते हैं, जिससे सेल्स ग्लूकोज का अच्छे से इस्तेमाल कर पाते हैं।
तीसरा है दालें, अलसी, सत्तू, और इसबगोल। यह सारी चीजें आसानी से किचन में मिल जाती हैं, बस उन्हें अपने आहार का हिस्सा बनाना जरूरी है। इन सभी में मैग्नीशियम, ओमेगा-3, और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं, और ये इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाते हैं। चौथा है फलों का सेवन। आहार तभी पूर्ण होता है जब दिन में एक फल का सेवन जरूर किया जाए। मधुमेह से पीड़ित मरीजों को अमरूद, सेब और नाशपाती का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये फल लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल होते हैं जो शुगर तेजी से नहीं बढ़ने देते। इसके अलावा दिनचर्या में कई तरह के बदलाव करने की जरूरत होती है, जैसे रोजाना 30 मिनट पैदल चलना, हल्की एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय से दूरी और आखिर में पूरी नींद।
सॉल्टलेक के कई बाजारों की होगी कायापलट
– बजट में दोगुना हुआ आवंटन
कोलकाता । सॉल्टलेक के कई मार्केट की हालत को सुधारने का बीड़ा विधाननगर नगर निगम ने उठाया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में मार्केट में सुधार के लिए 2 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। पिछले साल इस खाता में मात्र 1 करोड़ रुपया ही आवंटित हुआ था। इसका अर्थ है कि मार्केट की हालत को सुधारने के लिए एक ही झटके में विधाननगर नगर निगम ने आवंटन दोगुना कर दिया है पर अचानक क्यों आवंटन दोगुना कर सॉल्टलेक के मार्केट व बाजारों की हालत को सुधारने की पहल की जा रही है? मिली जानकारी के अनुसार ऑनलाइन शॉपिंग के साथ कदमताल मिलाते हुए खरीदारों को आकर्षित करने के उद्देश्य से ही यह फैसला लिया गया है। इस बारे में विधाननगर की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने बताया कि जीडी, ईडी, बीडी, ईसी, सीए और एबी-एसी बाजारों में मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। अब एजी, एए और एयू बाजारों की मरम्मत की योजना बनायी जा रही है। नगर निगम सॉल्टलेक के कुल 16 मार्केट की मरम्मत करने का फैसला लिया गया है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मार्केट की छत और दीवारों की मरम्मत की जाएगी। पेवर टाइल्स लगायी जाएगी, बिजली के कनेक्शन का आधुनिकीकरण और शौचालयों की मरम्मत की जाएगी।बताया जाता है कि जीडी ब्लॉक के बाजारों में पहले चरण का काम खत्म करने में करीब 1.3 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। विधाननगर के मेयर परिषद राजेश चिरीमार ने बताया कि दूसरे चरण का काम जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा। वहीं वैशाखी बाजार के लिए लगभग 70 लाख रुपए के खर्च से विशेष परियोजना शुरू करने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास भेजा गया है। लगभग 3 साल पहले वैशाखी बाजार में शेड टूटकर गिरने की वजह से 5 लोग घायल हो गए थे। इसलिए इस बाजार की सुरक्षा व मरम्मत पर खास तौर पर ध्यान दिया जा रहा है। विधानगर नगर निगम के एक अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में काफी लोग ऑनलाइन शॉपिंग करना पसंद करते हैं। इसकी वजह से स्थानीय बाजारों में लोगों की भीड़ कम होती जा रही है। इसलिए बाजारों को आकर्षक बनाने की कोशिशें की जा रही है। इससे आम लोग दुकानों पर आकर खरीदारी करने के लिए उत्साहित होंगे। अगर मार्केट की संरचनाएं अच्छी होंगी तो स्थानीय व्यवसायियों का रोजगार भी बढ़ेगा। उम्मीद की जा रही है कि इसके माध्यम से ही नगर निगर का राजस्व टैक्स भी बढ़ सकेगी।
यूपीआई बना लेनदेन का सबसे पसंदीदा माध्यम : रिपोर्ट
– रुपे डेबिट कार्ड को बढ़ावा देने की जरूरत
नयी दिल्ली। नकद लेन-देन को पीछे छोड़ते हुए अब यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) भुगतान का सबसे पसंदीदा जरिया बन गया है। हालांकि, गांवों तथा छोटे कस्बों में रुपे डेबिट कार्ड के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लक्षित हस्तक्षेप की जरूरत है। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) की जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने 13-14 फरवरी को आयोजित चिंतन शिविर के दौरान ‘रुपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य वाले भीम-यूपीआई (व्यक्ति-से-व्यापारी) लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन योजना का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है।
इस रिपोर्ट में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने, भुगतान अवसंरचना को मजबूत करने और वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में सरकार के प्रोत्साहन ढांचे की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल लेन-देन में वर्ष 2021 से वर्ष 2025 के बीच लगभग 11 गुना वृद्धि हुई है, जिसमें कुल डिजिटल लेन-देन में यूपीआई की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 80 फीसदी हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मूल्यांकन से पता चलता है कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों में डिजिटल भुगतान को अपनाने में महत्वपूर्ण और निरंतर वृद्धि हुई है। सर्वेक्षण में शामिल उपयोगकर्ताओं में यूपीआई सबसे पसंदीदा लेन-देन माध्यम के रूप में उभरा है, जिसका प्रतिशत 57 फीसदी है, जो नकद लेनदेन (38 फीसदी) से कहीं अधिक है। इसका मुख्य कारण उपयोग में आसानी और तत्काल धन हस्तांतरण की क्षमता है। सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण व्यापक प्राथमिक सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें 15 राज्यों के 10,378 उत्तरदाताओं को शामिल किया गया है, जिनमें 6,167 उपयोगकर्ता, 2,199 व्यापारी और 2,012 सेवा प्रदाता शामिल हैं। अध्ययन से पता चलता है कि 90 फीसदी उपयोगकर्ताओं ने यूपीआई और रुपे कार्ड का उपयोग करने के बाद डिजिटल भुगतान में अपना विश्वास बढ़ाया है, साथ ही नकदी के उपयोग और एटीएम से निकासी में उल्लेखनीय कमी आई है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण के निष्कर्षों से भविष्य की नीति निर्माण में मूल्यवर्धन होने और भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम के लिए निरंतर समर्थन सुनिश्चित होने की उम्मीद है। ये रिपोर्ट आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने वाले लचीले, समावेशी और सुरक्षित डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है।




