Saturday, February 14, 2026
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शुभजिता के दस वर्ष – डॉ. वसुंधरा मिश्र द्वारा प्रेषित शुभकामना संदेश

13 फरवरी 2016 को शुभजिता ने एक दशक की यात्रा की और सफलतापूर्वक आज अपने कार्यक्षेत्र को बढा़ रही है, यह बहुत ही सुखद संदेश है। मैं भी संभवतः विगत सात आठ वर्षों से लगातार इसकी गतिविधियों को पढ़ती रही हूँ ।इसकी संपादक और संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार सुषमा त्रिपाठी की मेहनत रंग लाई है। हिंदी मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सुषमा जी की दूरदर्शिता ने शुभजिता को उत्तरोत्तर आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।हिंदी जगत में विभिन्न पोर्टल, वेबसाइट और पत्रिकाओं की प्रतिस्पर्धा में संघर्षों के बीच महानगर में हिंदी शुभजिता ने एक पहचान बनाई है जो काबिलेतारीफ है ।आज पुस्तक प्रकाशन , विज्ञापन, यूट्यूब और सोशल मीडिया से पूरी तरह से जुड़ी है शुभजिता। ईमानदार और निष्पक्ष होकर सुषमा जी ने एक महिला होते हुए हिंदी पत्रकारिता और मीडिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी तरह शुभजिता उत्तरोत्तर उन्नति करती रहे। कहते हैं कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ‘। सुषमा जी ने इस यात्रा के कठिन दौर में हौसला नहीं छोड़ा और निरंतर अपने लक्ष्य के प्रति जागरूक रहीं। मंगलकामना के साथ बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं

– डॉ वसुंधरा मिश्र, हिंदी प्राध्यापिका, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज

महाशिवरात्रि: शिव-शक्ति के दिव्य मिलन का महापर्व

-उदय कुमार सिंह

सनातन संस्कृति में महाशिवरात्रि का अत्यंत विशिष्ट और गूढ़ महत्व है। हिंदू धर्म में फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव की आराधना, तपस्या और साधना का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। महाशिवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि यह आत्मिक शुद्धि, आध्यात्मिक जागरण और शिव-शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक भी है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से संपूर्ण वातावरण शिवमय हो जाता है। भक्त व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

शिव और शक्ति ब्रह्मांड के मूल सत्य का प्रतीक वास्तव में शिव और शक्ति का संबंध केवल देव–देवी का नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के मूल सत्य का प्रतीक है। शिव शुद्ध चेतना हैं, वह मौन हैं, स्थिर हैं, असीम हैं। शक्ति उस चेतना की सक्रिय ऊर्जा हैं, जो सृष्टि को गति देती है, आकार देती है और परिवर्तन का कारण बनती है। शिव बिना शक्ति के शव के समान माने गए हैं और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन ऊर्जा। इसी कारण कहा गया है कि शिव और शक्ति अलग नहीं, एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं।

शिव को पुरुष तत्व कहा गया है, जो साक्षी भाव में स्थित रहते हैं। वह न सृजन करते हैं, न संहार की इच्छा रखते हैं, केवल सबकुछ होते हुए देखते हैं। वहीं शक्ति स्त्री तत्व हैं, जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शक्ति ही ब्रह्मा से सृष्टि कराती हैं, विष्णु से पालन कराती हैं और रुद्र से संहार कराती हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप शिव–शक्ति की अद्भुत एकता का सबसे गहरा प्रतीक है। इस रूप में आधा शरीर शिव का और आधा शक्ति का होता है, जो यह दर्शाता है कि पुरुष और स्त्री, स्थिरता और गति, ज्ञान और क्रिया सब एक ही सत्य के अभिन्न भाग हैं। यह रूप यह भी सिखाता है कि संतुलन के बिना सृष्टि संभव नहीं।

तंत्र शास्त्र में शक्ति को कुंडलिनी के रूप में माना गया है, जो मानव शरीर में मूलाधार में सुप्त अवस्था में रहती हैं। जब साधना द्वारा यह शक्ति जाग्रत होकर सहस्रार तक पहुंचती है, तब वह शिव से मिलन करती है। यही मिलन आत्मज्ञान, समाधि और मोक्ष का द्वार खोलता है। इसीलिए कहा गया है कि साधना में शक्ति का जागरण और शिव में लय होना ही अंतिम लक्ष्य है। शिव विनाश के देवता नहीं बल्कि परिवर्तन के अधिपति हैं और शक्ति केवल माया नहीं बल्कि चेतना को व्यक्त करने वाली दिव्य शक्ति हैं। जब जीवन में स्थिरता आती है तो शिव का तत्व कार्य करता है और जब परिवर्तन आता है तो शक्ति सक्रिय होती हैं। हर श्वास में शक्ति है और हर शांति में शिव।

शिव और शक्ति का रहस्य यह सिखाता है कि संसार में जो भी द्वैत दिखाई देता है, वह वास्तव में एक ही सत्य का विस्तार है। जब साधक इस सत्य को अनुभव कर लेता है, तब बाहर शिव की खोज समाप्त हो जाती है और भीतर शक्ति जाग्रत होकर स्वयं शिव का साक्षात्कार करा देती।

शिव-शक्ति के मिलन की रात्रि – धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि वह पावन रात्रि है जब देवों के देव महादेव और जगत जननी माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसी कारण इस पर्व को शिव और शक्ति के मिलन की रात्रि कहा जाता है। शिव को पुरुष तत्व और शक्ति को प्रकृति का स्वरूप माना गया है। इन दोनों का मिलन ही सृष्टि के सृजन, संतुलन और संचालन का आधार है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा, नियम और संयम के साथ शिवपूजन, जप, तप और व्रत करता है, उस पर भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की विशेष कृपा बरसती है। ऐसे भक्तों के जीवन से रोग, शोक, दरिद्रता और मानसिक कष्ट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि का वास होता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से महाशिवरात्रि का महत्व – महाशिवरात्रि का महत्व केवल पौराणिक या धार्मिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी है। योग और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, यह वह रात्रि होती है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने उच्चतम स्तर पर होती है। इस रात्रि में की गई साधना, ध्यान और मंत्र जाप साधक को विशेष आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करता है। इसी कारण महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष विधान बताया गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस रात्रि में जागरण कर भगवान शिव का ध्यान करने से आत्मा का शुद्धिकरण होता है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि – अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ही महाशिवरात्रि क्यों कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वर्ष के प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि आती है, जिसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि को सभी शिवरात्रियों में श्रेष्ठ माना गया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इसी तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसके अतिरिक्त यह भी मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान शिव ने शिवलिंग स्वरूप में स्वयं को प्रकट किया था। इन्हीं कारणों से इसे साधारण शिवरात्रि न कहकर महाशिवरात्रि कहा गया।

रात्रिकालीन विवाह और निशीथ काल का महत्व – हिंदू धर्म में रात्रिकालीन विवाह मुहूर्त को अत्यंत शुभ माना गया है। भगवान शिव का विवाह भी देवी पार्वती से रात्रि के समय ही हुआ था। जिस दिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि मध्यरात्रि यानी निशीथ काल में होती है, उसी दिन महाशिवरात्रि मनाने की परंपरा है। निशीथ काल को शिव साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। इस काल में की गई पूजा, जप और अभिषेक से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है और साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

महाशिवरात्रि 2026: तिथि और पंचांग विवरण – पंचांग के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 15 फरवरी 2026 को सायं 05:04 बजे होगा, जबकि इस तिथि का समापन 16 फरवरी 2026 को प्रातः 05:34 बजे होगा। इस प्रकार वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व रविवार, 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा।

संक्षिप्त विवरण

• महाशिवरात्रि की तिथि: 15 फरवरी 2026, रविवार

• निशीथ काल पूजा समय: 15 फरवरी 2026 की रात 11:52 बजे से 16 फरवरी 2026 को 12:42 बजे तक। इस दौरान शिवभक्तों को भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए लगभग 50 मिनट का समय प्राप्त होगा।

चार प्रहर पूजा का विशेष विधान – महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर भगवान शिव की पूजा करने का विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है। प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग पदार्थों से अभिषेक और मंत्र जाप करने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

प्रथम प्रहर की पूजा

समय: सायंकाल 06:01 से रात्रि 09:09 बजे तक

अभिषेक: दूध से

मंत्र: ॐ ह्रीं ईशानाय नमः

द्वितीय प्रहर पूजा

समय: रात्रि 09:09 से 16 फरवरी 2026 को 12:17 बजे तक

अभिषेक: दही से

मंत्र: ॐ ह्रीं अघोराय नमः

तृतीय प्रहर पूजा

समय: 16 फरवरी 2026 को 12:17 से 03:25 बजे तक

अभिषेक: घी से

मंत्र: ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः

चतुर्थ प्रहर पूजा

समय: 03:25 से प्रातः 06:33 बजे तक

अभिषेक: शहद से

मंत्र: ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः

चारों प्रहरों में विधिपूर्वक की गई पूजा से शिव कृपा प्राप्त होती है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पौराणिक कथा: कुबेर और महाशिवरात्रि – पुराणों में महाशिवरात्रि से जुड़ी अनेक कथाएं वर्णित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, पूर्वजन्म में कुबेर ने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की उपासना कर ली थी। इस पुण्य के प्रभाव से उन्हें अगले जन्म में शिवभक्ति की विशेष कृपा प्राप्त हुई और वे देवताओं के कोषाध्यक्ष बने। यह कथा महाशिवरात्रि पर की गई पूजा के अद्भुत प्रभाव को दर्शाती है।

शिवयोग और सिद्ध योग का महत्व –महाशिवरात्रि का शुभारंभ शिवयोग में होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिवयोग को शिव आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस योग में गुरुमंत्र, पूजन संकल्प और साधना विशेष फल प्रदान करती है। इसके पश्चात सिद्ध योग आरंभ होता है, जो मंत्र साधना, जप और ध्यान के लिए श्रेष्ठ माना गया है। सिद्ध योग में मध्यरात्रि के समय शिव मंत्रों का जाप विशेष फलदायी होता है।

गृहस्थों के लिए साधना संबंधी सुझाव – महाशिवरात्रि पर गृहस्थ श्रद्धालु भी सरल विधि से भगवान शिव और माता शक्ति की साधना कर सकते हैं। रात्रि के समय रुद्राभिषेक, मंत्र जप और ध्यान विशेष फल प्रदान करते हैं। सामान्य गृहस्थों के लिए प्रातःकाल और संध्या समय शिव-शक्ति की आराधना करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। दोपहर बाद चतुर्दशी तिथि लगने पर शिव पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। वास्तव में महाशिवरात्रि सनातन संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जो भक्तों को आत्मिक शुद्धि, साधना और ईश्वर से जुड़ने का अनुपम अवसर प्रदान करता है। इस पावन रात्रि में श्रद्धा और विधि-विधान से की गई शिव आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

(साभार – हिन्दुस्तान समाचार)

कहानी पूर्वोत्तर भारत की -भाग -9 -बजट में करें अरुणाचल प्रदेश की शानदार यात्रा

प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और एडवेंचर से भरपूर जगह की तलाश अरुणाचल प्रदेश में जाकर खत्म होती है। पूर्वोत्तर भारत का यह खूबसूरत राज्य बर्फ से ढके पहाड़, घने जंगल, नदियां और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। इस जादुई जगह पर घूमने का मन हर किसी का हो सकता है। इसके लिए आप आईआरसीटीसी के टूर पैकेज का लाभ उठा सकते हैं। जिसमें आपको हर तरह की सुविधा मिलेगी और साथ ही बजट में अरुणाचल की हसीन वादियों का दीदार कर सकेंगे। आईआरसीटीसी के इस टूर पैकेज का नाम अरुणाचल वाया पूर्व गुवाहाटी शांति का प्रवेश द्वार है। बता दें कि अरुणाचल प्रदेश की कई जगहें बौद्ध मठों के लिए जानी जाती है। यह मठ देश की शांति का प्रतीक माने जाते हैं। जिसकी वजह से इसका नाम भी इस तरह रखा गया है। इस खास टूर पैकेज की शुरुआत 13 जून 2025 से होगी। जिसमें पर्यटकों को एसी ट्रैवलर बस से घुमाया जाएगा। इस टूर पैकेज में आपको अरुणाचल प्रदेश की कई जगहों पर घूमने का मौका मिलेगा। जहां तेजपुर से लेकर दिरांग, माधुरी झील, बोमडिला संगेस्टार झील, जंग झरना, हॉट वाटर स्प्रिंग आदि जगहें देखने को मिलेंगी। इसके अलावा बम ला दर्रा और चीन सीमा और तवांग में भी कई जगह घूमाई जाएगी। पर्यटक यहां पर हाइकिंग, ट्रैकिंग और कैंपिंग भी कर सकते हैं। अरुणाचल प्रदेश के इस टूर पैकेज में प्रति व्यक्ति का किराया 44900 रुपए तय किया गया है। वहीं दो लोगों के साथ शेयर करने पर यह 33370 रुपए और तीन लोगों के एक साथ सफर करने पर किराया 30930 रुपए है। इसके अलावा 5 से 11 साल तक के बच्चों के लिए किराया 25690 रुपए है और बिना बेड के किराया 18760 रुपये है। इस शानदार टूर पैकेज में यात्रियों को रहने से लेकर खाने पीने की भी व्यवस्था मिलेगी। टूर पैकेज से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप आईआरसीटीसी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर विजिट कर सकते हैं। परिवार या दोस्तों के साथ इस टूर पैकेज का मजा लिया जा सकता है।

कहानी पूर्वोत्तर भारत की – भाग -8 अरुणाचल प्रदेश की कला एवं शिल्‍पकला (भाग – 2 )

अरूणाचल प्रदेश अनेक जनजातियों तथा उप-जनजातियों का निवास-स्‍थान है। इसमें शिल्‍पकारी की विपुल परंपरा है जो इन जनजातियों द्वारा सृजित विविध कला एवं शिल्‍पकला में अपने आप को प्रकट करती है। मोनपास, शेरडुकपेन, अका, बुगुन और अन्‍यों सहित बौद्ध धर्मावलंबी, खूबसूरत मुखौटे, दरी तथा काष्‍ठ के रंगीन बर्तन बनाते हैं। बंगीस और अपतानी थैला टोप, आभूषण इत्‍यादि बनाते हैं। खमतीस और वांग्‍चांस अपनी काष्‍ठ नक्‍काशी के लिए जाने जाते हैं। डाफला महिलाओं द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाए जाने की कला विख्‍यात है।
आभूषण – आभूषण निर्माण अरूणाचल प्रदेश में व्या पक रूप से अपनायी जाने वाली एक शिल्पैकला है। चांदी के कारीगर का कार्य अधिक जटिल और कलात्मलक होता है। उसके द्वारा परंपरागत आभूषणों के विनिर्माण में पहला चरण आभूषण कें मोम का सांचा निर्मित करना है। ऐसा वैक्स स्टींक या ऑयल को गर्म करके किया जाता है और फिर मोम तथा लकड़ी के बने मानक सांचो पर रखा जाता है। जहां डिजाइन अनिवार्य होती हैं वहां उन्हेंम महीन वैक्सह क्वामइल से बनाया जाता है और जहां जरूरत होती है उसे चाकू से काटा जाता है। मोम का सांचा तैयार होते ही अगला चरण सांचे तथा धातु के लिए मिट्टी के पात्र का निर्माण करना है। इस प्रयोजनार्थ चिकनी मिट्टी तथा चारकोल के चूर्ण के एक गीले मिश्रण जिसे टकम कहा जाता है, प्रयुक्त् किया जाता है। बांस के ढांचे पर एक पिंड रखा जाता है और इसे चाकू और राल से चपटे आकार का बनाया जाता है। इस ढांचे को पहले चारकोल के चूर्ण से भीतर ढका जाता है और उसके बाद इस पर रखा जाता है। मोम के छोटे डाट को इससे चिपकाया जाता है जो इसके दूसरे सिरे को केले की पत्तीह की छोटी नली की पेंदी के प्रवेश मार्ग से जोड़ता है। अंतत: सांचे तथा नली को चारकोल के चूर्ण से ढका जाता है जिसे चिकनाईदार आकार दिया जाता है और आग के निकट सूखने दिया जाता है। कुछ समय के बाद केले की नली को हटा दिया जाता है और खाली स्थािन को धातु के टुकड़ों से भर दिया जाता है। इसका मुहाना बर्तन के टुकड़ों से ढक दिया जाता है तथा चारकोल के चूर्ण से सील कर दिया जाता है। यह पुन: सूखा हुआ हो जाता है। नली के करीब-करीब केंद्र में एक छिद्र कर दिया जाता है और मिट्टी का बर्तन अगली प्रक्रिया के लिए तैयार हो जाता है जो जलाने का है। ताजा वृक्ष के कठोर और शुष्क् काष्ठर का इस्तेऔमाल धातु को गलाने के लिए किया जाता है। मिटटी का बर्तन जिसका मुख नीचे की ओर होता है, भटठी पर अवलंबित होता है। इसे ईंधन की लकड़ी से ढका जाता है और इस पर आग लगाया जाता है। करीब बीस मिनट के बाद धातु का परीक्षण छिद्र में लोहे की छड़ डालकर किया जाता है। जब यह तरल पदार्थ में बदल जाता है और फिरोजा ज्वा ला निर्मुक्तर होती है, मिटटी के बर्तन को बांस के दो मजबूत चिमटों के दो जोड़ों की सहायता से हटाया जाता है और धीरे-धीरे उल्टाु घुमाया जाता है। ढांचे में रखा गया मोम तब तक जल जाता है और डाट (प्लहग) गायब हो चुका होता है और गली हुई धातु को ढांचे में जाने के लिए स्थांन छोड़ जाता है। मोम के ढांचे द्वारा निर्मित रिक्तय स्थायन को गली हुई धातु भर देती है। इसे तकनीकी रूप से मोम सांचा प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है और यह मेक्सिको तथा विश्वत के अन्य भागों में प्रचलित है। इस प्रकार ढाले गए आभूषणों को मिट्टी के पात्र को तोड़कर बाहर निकाला जाता है। इसे साफ और चमकीला बनाने के लिए इसे चाकू से खुरचा जाता है तथा पत्थीरों से रगड़ा जाता है।
विभिन्न रंगों तथा आकारों के मनकों के अलावा सजावट में पक्षियों के नीले पंखों तथा भौरों के हरे रंग का प्रयोग किया जाता है। नोक्टेगस तथ वांचू जनजातीय लोग अपने अनोखे तथा विशिष्टे पैटर्न में मनकों को बुनते हैं। वांचू शीशे के मनके, जंगली बीजों, बेंत, बांस तथा सरकंडे से कान के आभूषण बनाते हैं।
गैलोंग महिलाएं ईयरप्लबग तथा कान की बालियां पहनती हैं। प्ल ग सामान्यआत: पत्तेव, लकड़ी या बांस के होते हैं जबकि बालियां भारी होती हैं क्योंाकि वे लोहे की बनी होती हैं। बालियां अनेक चक्रों में मुड़ी होती हैं और इनका प्रयोग विशेषकर करका गैलोंग महिलाओं द्वारा किया जाता है। महिलाओं की कान-पालियां प्राय: आभूषणें के भारी वजन के कारण कट जाती है। फिर भी, महिलाएं उन्हेंह पहनना कभी भी नहीं छोड़ती है। ऐसे मामलों में बालियां कान-पालियों में नहीं पहनी जाती है वरन कान की पालियों के नीचे एक धागे की सहायता से लटकी हुई होती हैं। मनके के कंठहार पुरूषों तथा महिलाओं, दोनों द्वारा समान रूप से पहने जाते हैं। प्रत्येहक मनके का इसके रंग तथा चमक के अनुसार अपना मूल्यह होता है। कभी-कभी मनके के कंठहार इतने अधिक और भारी होते हैं कि छातियों के ऊपर कोई वस्त्रु नहीं होता है, ये मनके कंठहार उन्हेंभ आसानी से ढक सकते हैं। पीतल के कंगन सामान्यो होते हैं और महिलाएं कलाई से केहुनी तक बढ़ती हुई परिधि के साथ तीन से आठ कंगन पहनती हैं। कमन के चारों ओर, पुरूष बेंत की अनेक पटिटयां पहनते हैं जो निरंतर इस्तेामाल से चमक और चिकनाई प्राप्त कर लेती हैं। महिलाओं द्वारा अपनी कमर के चारों ओर लोहे के कुंडल जो अलग-अलग संख्यास में होते हैं तथा बेंत के धागे अथवा सूत के साथ बंधे होते हैं, पहने जाते हैं। बड़ा कुंडल मध्य में आगे की ओर लटकता हुई होता है और उत्तेरवर्ती कुंडलों का आकार क्रमश: कम होता जाता है और ये जांघों की ओर सबसे बड़े कुंडल के दोनों ओर होते हैं। महिलाएं प्राय: बेंत की पायल पहनती हैं। टखने तथा घुटने के बीच पैरों पर बेंत की कारीगरी की पतली पटटी बुनी हुई होती है। गैलोंग महिलाएं धातु के सिक्कोंा से बने कंठहारों को बहुत पसंद करती हैं। ऐसे कंठहारों में सामान्यहत: एक रूपए, आठ आने तथा चार आने का सिक्काघ होता है। सिक्कोंब पर हुक बने होते हैं और ये धागे से लटके रहते हैं। पत्थ रों से जडि़त चमड़े का कमरबंद एक अन्यक आभूषण होता है। पत्थुर सामने से बड़े तथा किनारे की ओर छोटे होते हैं। ऐसे एक कमरबंद में 100 से 150 पत्थयर सामान्यतत: होते हैं।
अका महिलाएं चांदी के अनेक आभूषण पहनती हैं। चांदी के सामान्ये आभूषण मेलू हैं-छाती के ऊपर पहना जाने वाला चपटे-आकार का आभूषण, रोम्बिन-बड़ी कर्ण घुंडी, गिचली-कान की बालियां तथा गेजुई-कंगन। संपन्नन महिलाएं विशेषकर चांदी के चैनवर्क का जूड़ा पहनती हैं जिसे लेंछी कहते हैं। इन आभूषणों के साथ-साथ महिलाएं अनेक रंगों के मनके के कंठहार भी गले के चारों ओर पहनती हैं। ऐशेरी के नाम से ज्ञात पैतृक कंठहार महिलाओं द्वारा सर्वदा और पुरूषों द्वारा अक्सलर पहना जाता है। यह विवाह के समय दूल्हेस को दिए जाने वाले लड़की के दहेज का एक आवश्यरक भाग बनता है। इसे पवित्र और अन्यह आभूषणें की अपेक्षा अधिक मूल्यावान माना जाता है क्यों्कि यह घर की पैतृक संपत्ति का भाग होता है। ईडु मिशमिस के आभूषण थोड़े और साधारण होते हैं। पुरूष तथा महिलाएं अनेक तरह के मनकों के कंठहार पहनती हैं। सर्वाधिक सामान्यो कंठहार अरूलाया है जिसमें एक साथ जुड़े चालीस से साठा उजले मनके होते हैं। एक अन्य तरह का कंठहार बीस में छोटे-छोटे उजले मनकों से बना लेकपोन होता है। प्राय: पुरूष तथा महिलाएं दोनों कान के फैले हुए पालियों में बांस का टुकड़ा पहनते हैं। कुछ चांदी के सिक्कोंो से या लाल तथा नीले मनकों से अलंकृत चांदी की बालियां पहनते हैं। अकखरे चांदी के पतले प्ले ट से निर्मित कान की बाली होती है और महिलाओं द्वारा पहनी जाती है।
हथियार – प्राचीन काल से ही हथियार जनजातीय जीवन का अभिन्नी अंग रहा है। हालांकि कुछ हथियार अप्रचलित हो गए हैं और उनकी जगह आधुनिक हथियारों ने ने ली है, फिर भी परंपरागत हथियारों का उनका अपना स्थाेन है। हथियारों का प्रयोग युद्ध तथा शिकार और दैनिक कार्य में किया जाता है। ऐसे सभी हथियारों का निर्माण स्थाकनीय तौर पर किया जाता है। अका लोगों का सर्वाधिक महत्विपूर्ण हथियार तीर-धनुष है जिन्हेंह क्रमश: टकेरी और मू के नामों से जाना जाता है और इनका प्रयोग शिकार में व्याहपक रूप से किया जाता है। प्रयोक्तार की आवश्यिकता के अनुसार हथियारों का आकार भिन्न -भिन्नत हो सकता है। शिकार में प्रयुक्तर किए जाने वाले बड़े हथियार लोहे के सिरों से सज्जित होते हैं और इन पर एकोनाइट जहर का लेप किया जाता है। धनुष प्राय: कंधों से लटके होते हैं जबकि तीर थाऊवाऊ नामक बांस के तरकश में रखी जाती है।
एक अन्यं हथियार जो मूल रूप से युद्ध से संबद्ध किंतु अब रक्षा से संबद्ध है, एक तरह की अपरिष्कृ त बरछी है जिसका एक सिरा लोहे के तीक्ष्णह कीलों से नोकदार बनाया जाता है। इसे लक्ष्यक पर दूर से फेंका जाता है। युद्ध तथा शांति दोनों में प्रयुक्तब किया जाने वाला सर्वाधिक सामान्यद हथियार दाव होता है। यह लोगों के दैनिक कार्य जैसे कि लकड़ी तथा बांस के टुकड़े काटने, झाडि़यों और वन में अन्य़ पेड़ों को साफ करने इत्याकदि में व्या पक रूप से उपयोगी होता है। यह इस्पाोत का बना होता है और प्रयोग नहीं किए जाने की स्थिति में प्राय: बांस के आवरण से ढंका जाता है। दाव के लिए स्थाथनीय शब्दा वेट्ज है।
.तीर-धनुष -तीर-धनुष अका की तरह पइलीबोस भी विभिन्नल तरह के हथियारों का प्रयोग करते हैं। वे इसे एक विशेष स्था न पर रखते हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त। किए जाने वाले कुछ हथियार निम्नहलिखित हैं:-
क) उई-बेंत के धागे के साथ बांस का धनुष
ख) उपुक-लोहे के सिरे अथवा जहर रहित बांस की तीर
ग) मोरा-लोहे के सिरे के साथ बांस की तीर
घ) गेब-बु-बांस के ढक्क न के साथ खोखले बांस से निर्मित तरकश
ड.) नईबु-लकड़ी के लंबे डंडे तथा लोहे की धार के साथ नोकदार बरछा। इसमें शुष्कव और कठोर काष्ठे के लंबे डंडे से बना एक बरछा होता है। धातु के शीर्ष के नीचे याक या घोड़े के बाल का गुच्छाो होता है।
च) योक्सीा–इस्पाात का एक बड़ा दाव या तलवार
छ) सोतम-बांस तथा बेंत से निर्मित कवच
ज) चोबुक-यह दाव अथवा बेंत से बना तथा लकड़ी की पटिटयों के टुकड़ों से सुदृढ़ किए गए खंजर को रखने का आवरण है।
झ) एग-गई-वृक्षों को गिराने तथा बलि के दौरान मिथुन को मारने के लिए प्रयुक्तक किए जाने वाली लोहे की कुल्हाबड़ी है।
बेंत की मजबूत किस्म् से सर के चारों ओर किनारों के साथ अथवा रहित युद्ध की हेल्मेाट। ऐसी बेंत और भालू या टेकिन अथवा मिथुन के चमड़े से शरीर की आवरण अथवा कवच अथवा पैर के आवरण अथवा लेग गार्ड भी बनाए गए।
काष्‍ठ–नक्‍काशी –
हेड हंटिंग – हेड हंटिंग काष्ठं-नक्का शी अरूणाचल प्रदेश के कुछ जनजातियों के बीच प्रचलित परंपरा है। मोंपस, खमतिस, वांचो, फोम, कोनयक जनजातियां इस कला में महत्वसपूर्ण स्थालन धारण करती हैं। नागालैंड के मामले की ही तरह काष्ठप नक्कारशी को मुख्य।त: तीन श्रेणियों के अंतर्गत अभिव्यनक्ति मिलती है: प्रथमत:, हेड हंटिंग, दूसरा मोरूंग या पुरूषों की युवावस्थाह के शयनागार तथा तीसरा, योद्धाओं और अन्य महत्वरपूर्ण व्य क्तियों के लिए खड़ी की गई अंत्ये,ष्टि की मूर्तियां। मानव की आकृति की नक्कावशी करने में सिर पर विशेष ध्या न दिया जाता है। इन चित्रों की नक्कामशी कम उभार के साथ की जाती है और ये अत्यचधिक यथार्थवादी हैं। प्राय: योद्धा को चित्रित करने वाली प्रतिमाओं को विशेष कौड़ी बेल्टं तथा कई अन्यो कलाकृतियों से सजाया जाता है। सिर का शीर्ष गोलाकार किया जाता है और प्राय: यह बाल की कटाई का कुछ संकेत होता है। टैटू के निशानों को ध्याटनपूर्वक निरूपित किया जाता है और अधिकांश आकृतियां कुछ कपड़ों से और सिर पर बाल के गुच्छोंा या कान में मनकों के साथ सज्जित होती हैं।
वांचो के नक्काहशीकारों के पास सिर के साथ उनकी व्येस्तयता के बावजूद अनुपात की गहन जानकारी होती है। हाल ही में कई नक्काकशी वाली आकृतियों में परंपरागत नियत रूप से परिवर्तन देखा जाता है। सुडौल आसनों को विषम आसनों द्वारा प्रतिस्थाशपित किया जाता है, उभरी हुई कलाकृतियों का प्रयोग विभिन्नस विषय-वस्तुहओं में किया जाता है।
मोंपा काष्ठा नक्कालशीकार खूबसूरत प्या,ले, तश्तकरियां, फल के कटोरे बनाते हैं और रैतिक नृत्या और मूक नाटक के लिए बेहतरीन मुखौटों की नक्का‍शी करते हैं। शेरदुकपेन, खंपा तथा मोंपा ऐसे मुखौटे बनाते हैं जो करीब-करीब वास्तेविक चेहरों की तरह दिखते हैं जबकि कुछ पक्षियों और जानवरों को निरूपित करते हैं और कुछ लंगूरों तथा पुरूषों के टेढे मुहों, बुरी आत्माब को भगाने के लिए ग्वाूइयर के साथ महिलाओं को निरूपित करते हैं। मुखौटे लकड़ी के एकल टुकड़े जो भीतर से खोखला होता है, से बने होते हैं, आंखों तथा मुंहों के लिए छिद्र प्राय: किंतु सर्वदा नहीं बनाए जाते हैं; अधिकांश मुखौटे रंगयुक्तु होते हैं किंतु पुराने मुखौटे प्राय: काले और रंगहीन पाए जाते हैं। महिलाएं कभी भी मुखौटे नहीं पहनती हैं जो केवल पुरूषों और लड़कों द्वारा इस्तेकमाल किया जाता है। खंपटिस खूबसूरत धार्मिक चित्र बनाते हैं। .
मुखौटा-नृत्‍य
मुखौटा, दैत्‍य खोम्‍पती जनजाति – कुछ जनजातीय समुदायों की विशेषकर अरूणाचल प्रदेश में धार्मिक आस्‍था कुछ हद तक हिंदु धर्म तथा बौद्ध धर्म से प्रभावित रही है। शेरदुकपेंस और मोंपा के लोग अनेक तरह के रैतिक मुखौटा नृत्‍य करते हैं जिनमें से थुतोतदम सर्वाधिक आकर्षक होता है। नर्तक खोपडि़यों को निरूपित करने वाले मुखौटे पहनते हैं तथा कंकालों की तरह तैयार की गई पोशाकें पहनते हैं। रैतिक नृत्य में यह प्रदर्शित किया जाता है कि मृत्‍यु के बाद आत्‍मा का परलोक में स्‍वागत किया जाता है। तोरग्‍याप महोत्‍सव में ऐसे बहुत तरह के मुखौटे नृत्‍य प्रस्‍तुत किए जाते हैं जिनका लक्ष्‍य बुरी आत्‍माओं को दूर भगाना तथा सालोंभर समृद्धि, अच्‍छी पैदावार और अनुकूल मौसम सुनिश्चित करना है।
मुखौटा, पक्षी मोनपा जनजाति – मोंपा के लोग अरपोस नृत्य। प्रस्तुवत करते हैं जिसमें करीब 25 नर्तक जो प्राचीन योद्धा की तरह हेल्मेसट पहने हुए होते हैं और तलवार और शील्डी रखते हैं, यह प्रदर्शित करते हैं कि किस तरह जनजाति के पूर्वजों ने अपने शत्रुओं पर जीत हासिल की। इस प्रस्तु ति का समापन एक नृत्य कार्यक्रम जिसे गैलोंग छम कहा जाता है जिसमें करीब 10 नर्तक अत्ययधिक रंगीन पोशाक और शानदार हेडगियर पहने हुए प्रस्तुयति करते हैं, से होता है।
सभी मुखौटेदार मूक नाटकों जिन्हें शेरदुकपेंस प्रस्तुित करते हैं, में सर्वाधिक मनमोहक याक नृत्य होता है। दो व्यरक्तियों द्वारा कठपुतली जानवर बनाया जाता है जो काले कपड़े के पीछे छिपे होते हैं, काले कपड़े से जानवर का शरीर बनता है। कठपुतली याक का सिर लकड़ी का बना होता है। इसकी पीठ पर देवी की मूर्ति बैठती है। तीन मुखौटेदार व्यसक्ति कठपुतली जानवर के चारों ओर नृत्यै करते हैं। वे पौराणिक सूरवीर एपापेक और दो पुत्रों को निरूपित करते हैं। वेरियर एल्विन ने द आर्ट ऑफ द नॉर्थ-ईस्टि फ्रंटियर ऑफ इंडिया में सूचित किया है, ‘‘उत्तसरी सियांग में यांग सांग यू घाटी के लामा समृद्धि, खुशी तथा स्वांस्य्ंग सुनिश्चित करने के लिए द्रुबचूक के एक सप्ता‘ह लंबे महोत्स व में प्रति वर्ष मुखौटे वाले नृत्य प्रस्तुचत करते हैं। उनमें भी हिरण, पक्षी तथा सूअर के नृत्‍य होते हैं जिनके लिए आकर्षक मुखौटे तथा भड़कीली पोशाकें होती हैं। अन्‍य मूक नाटकों से राजाओं और रानियां राक्षस और भांड़ निरूपित होते हैं। अत्‍यधिक मनोरंजक अराकाचोछम का सृजन हुआ, ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान बुद्ध ने देखा कि लोग कितने उदास हैं तो उन्‍होंने भांड अराकाचों और उसकी पत्‍नी को लोगों को खुश रखने के लिए भेजा और वे हंसने लगे। ऐसे ही नृत्‍य गीलिंग और अन्‍यत्र के मेंबास द्वारा प्रस्‍तुत किए जाते हैं।
धूम्रपान पाइप – पाइबोस धूम्रपान के शौकीन होते हैं, अत: वे लकड़ी तथा बांस की जड़ों से धूम्रपान के पाइप बनाते हैं परंतु वे अपने पड़ोसियों बोकर्स, रामोस और मेम्बाास से वस्तुं विनिमय व्यायपार के जरिए धातु के पाइपों का भी प्रापण करते हैं। एलाक-टिडु-लकड़ी से निर्मित धूम्रपान पाइप, एले-टिटु-बांस की जड़ से निर्मित धूम्रपान पाइप, रा-टिडु-उत्कीकर्ण तथा लंबी टोंटी वाले धातु के पाइप, अटा-टिडु-चांदी से निर्मित धूम्रपान पाइप
नृत्‍य एवं संगीत – नृत्य व लोगों की सामाजिक-सांस्कृ तिक विरासत का एक महत्व पूर्ण पहलू होता है। वे महत्वतपूर्ण अनुष्ठामनों पर, उत्संवों के दौरान तथा मनोरंजन के लिए भी नृत्यं करते हैं। अरूणाचल के लोगों के नृत्यप सामूहिक होते हैं-जहां पुरूष और महिलाएं, दोनों भाग लेते हैं। तथापि, कुछ ऐसे भी नृत्यो होते हैं जैसे कि मिशमी पुजारियों का आइगो नृत्यू, अदीस निकोल्सन और वांची का युद्ध नृत्यथ, बौद्ध धर्मावलंबी जनजातियों का रैतिक नृत्य जो पुरूषों के नृत्य होते हैं। महिलाओं को इन नृत्यों में भाग लेने की अनुमति नहीं होती है।
लोगों के कुछ महत्वऔपूर्ण लोक नृत्यअ अजीलामू (मोंपा), रोप्पीै (निशिंग), बुईया (निशिंग), हुरकामी (अपातनी), पोपिर (अदि), पासी कोंग्सी (आदि), चलो (नोकल), पोनुंग (अदि), रेखम पद (निशिंग), शेर और म्यूतर नृत्य (कोंपा) इत्याबदि हैं। अधिकांश नृत्यऔ सामान्य्त: गायक-मंडली द्वारा गाए गीतों के साथ प्रस्तुपत किए जाते हैं। पाइबोस के लोकगीत उनके लोक इतिहास, पौराणिक कथा और उनके ज्ञात अतीत के वर्णन से अधिक संबद्ध होते हैं। गीतों की विषय-वस्तु एं जीव-जंतुओं या जानवरों को शामिल करते हुए दंत कथाओं तथा नैतिक पतन को निर्दिष्टज करने वाले महत्वतपूर्ण शब्दोंज जैसी होती हैं।
विभिन्‍न अवसरों पर गाए जाने वाले उनके महत्‍वपूर्ण लोक गीत निम्‍नलिखित हैं:
जा-जिन-जा: भोज तथा आनंदोत्‍सव के मौके पर, विवाहों या अन्‍य सामाजिक सम्‍मेलनों के दौरान यह गीत गाया जाता है। पुरूष तथा महिलाएं दोनों इसे गायक-मंडली में अथवा अलग-अलग गाते हैं। किंतु जैसे ही गाना शुरू होता है, वे सभी लोग जो उपस्थित होते हैं गीत गाने में उनका साथ देते हैं।
बरई: यह एक ऐसा गीत होता है जो उनके इतिहास, उनके धार्मिक साहित्‍य तथा पौराणिक कथा को वर्णित करता है। इसके संपूर्ण चक्र को पूरा होने में घंटों लग जाते हैं। यह महोत्‍सवों अथवा महत्‍वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक जनसभाओं के अवसर की भी एक विशेषता है। जा-जिन-जा और बरई दोनों पाइनोस लोगों में अतीत के प्रति लगाव की भावना पैदा करते हैं क्‍योंकि उनके जरिए उनके पूर्वजों की गौरव-गाथाओं का वर्णन किया जाता है।
नईयोगा: यह तब गाया जाता है जब किसी विवाह समारोह का समापन होता है और दुल्‍हन पक्ष के लोग दुल्‍हन को उसके घर छोड़कर वापस लोटते हैं। इसकी विषय वस्‍तु खुशी से संबंधित होती है। इसमें दुल्‍हन को उसकी भावी जीवन के लिए दी गई सलाह निहित होती है।
मिट्टी के बर्तन बनाने की कला (पॉटरी) – डाफिया महिलाएं इस शिल्‍प में दक्ष होती हैं। इसकी पौराणिक कथा यह है कि अबो ताकम प्रथम डाफिया कुम्‍हार था और उससे यह कला महिलाओं को अंतरित हो गई। इस प्रक्रिया में देकम नामक एक विशेष प्रकार की मिट्टी को लकड़ी के हथौड़े से एक बड़े पत्‍थर पर कूटा जाना निहित होता है। जब यह चूर्ण में परिणत हो जाती है तो उसमें पानी मिलाया जाता है और इसे हथौड़े से तब तक पीटा जाता है जब तक कि इसमें अपेक्षित मृदुता न आ जाए। गीली मिट्टी की पिंडों को घर ले जाया जाता है। महिलाएं अपनी जांघ के ऊपर टाट के बोरे अथवा पुराने तंतु के कंबल को फैलाकर बैठती है। वह एक ढ़ेला उठाती है और उसे अपनी अंगुली से अपरिष्‍कृत बर्तन का रूप देती है जिसके शीर्ष पर एक छोटा छिद्र होता है और इसके चारों ओर कोर होता है। जब ऐसे कई अपरिष्‍कृत बर्तनों को आकार दे दिया गया होता है तो उन्‍हें अंगीठी के ऊपर सबसे ऊपर की तश्‍तरी में सूखने के लिए रखा जाता है। अगले दिन वे अंतिम प्रसंस्‍करण के लिए तैयार होते हैं। ऐसा उसके मुंहाने के छिद्र से होते हुए एक पत्‍थर को उसकी गहराई में ढकेला जाता है ताकि दोनों किनारों में सही उभार हा सके, इन्‍हें बाहरी भाग से कमगी से पीटा जाता है ताकि उन्‍हें चपटा करके पतला किया जा सके। कमगी बांस की एक छड़ी होती है जिस पर परंपरागत डिजाइन होती है। यह बर्तन के भाग पर डिजाइन के निशानों को छोड़ देता है। इस प्रक्रिया को तब तक जारी रखा जाता है जब तक कि वांछित गोल आकृति, आकार और परिष्‍करण हासिल न हो जाए।
परिष्‍कृत बर्तनों पर किसी तरह की पॉलिश अथवा चमक नहीं की जाती है। सुखाते समय उन्‍हें सावधानीपूर्वक छाया में रखा जाता है। जब ये पूरी तरह से सूख जाते हैं तो उन्‍हें घर के बाहर एक अंगीठी में डाला जाता है। वहां कोई ईंट की भट्ठी अथवा मिट्टी के बर्तन का चूल्‍हा नहीं होता है। हालांकि कोई गड्ढ़ा यदि उपलब्‍ध हो, में बर्तनों के ऊपर जलती हुई जलावन की लकड़ी डालना सहज हो जाता है। किसी बर्तन को सेंकने के लिए लगभग 40 मिनट पर्याप्‍त होते हैं। पॉट्री खाना बनाने के बर्तनों तक ही सीमित होती है।

 

 

कहानी पूर्वोत्तर भारत की – भाग -7- अरुणाचल प्रदेश का मनोरम आंगन (भाग -1)

अरुणाचल प्रदेश भारतीय संघ का 24वां राज्य है, जो पश्चिम में भूटान से, पूर्व में म्यानमार से, उत्तर तथा पूर्वोत्तर में चीन से और दक्षिण में असम के मैदानों से घिरा है। अरुणाचल प्रदेश को विश्व के सर्वाधिक उत्कृष्ट, विविधतापूर्ण तथा बहुभाषी जनजातीय क्षेत्रों में से एक क्षेत्र के तौर पर जाना जाता है। अरुणाचल पूर्वोत्तर क्षेत्र का सबसे बड़ा राज्य है (क्षेत्रवार)। यह पूरा क्षेत्र वर्ष 1873 से अलग-थलग था जब अंग्रेजों ने यहाँ मुक्त आवाजाही बंद कर दी थी। वर्ष 1947 के बाद अरुणाचल पूर्वोत्तर सीमावर्ती एजेंसी (एनईएफए) का हिस्सा बन गया। वर्ष 1962 में चीन के आक्रमण से इसका नीतिगत महत्व सामने आया, और बाद में भारत सरकार ने असम के चारों ओर के सभी क्षेत्रों को राज्य का दर्जा देते हुए एजेंसी का विभाजन कर दिया।अरुणाचल प्रदेश का उल्लेख साहित्य में मिलता है जैसे कलिका पुराण और महाभारत तथा रामायण महाकाव्य में। यह मान्यता है कि ऋषि व्यास ने यहाँ साधना की थी और रोइंग के उत्तर में पहाड़ियों पर स्थित दो गांवों के पास बिखरे ईंट की संरचना के अवशेष भगवान कृष्ण की सहचरी रुक्मणी का महल था। छठे दलाई लामा का जन्म भी अरुणाचल प्रदेश की धरती पर हुआ था।
इस भूमि को अब विश्व के एक जैवविविधता विरासत स्थल के रूप में प्रशंसा मिलनी शुरू हुई है, जहां ऊंचे पहाड़ों वाली विस्तृत भौगोलिक विविधता है और जहां की जलवायु स्थितियों में ऊष्णकटिबंधीय से शीतोष्ण तथा पहाड़ी तक की विविधता है, और जहां सहगामी जीवन के साथ वनस्पति तथा जीवों की बहुत सारी किस्में है।अरुणाचल प्रदेश घने सदाबहार वनों तथा विभिन्न धाराओं, नदियों तथा घाटियों और कुल क्षेत्र के 60% से अधिक क्षेत्र में स्थित वनस्पति तथा जीवों की सैंकड़ों-हजारों प्रजातियों से संपन्न है। इसकी नदियां मछली पकड़ने, नौका विहार और राफ्टिंग के लिए आदर्श हैं और इसका भूभाग ट्रैकिंग, हाइकिंग और एक शांत वातावरण में छुट्टियाँ मनाने के लिए उपयुक्त है। ऊपरी क्षेत्र सभी प्रकार के साहसिक पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए आदर्श भूक्षेत्र उपलब्ध कराते हैं और ऐसे अवसरों की खोज में रहने वाले पर्यटकों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं। यहाँ पक्षियों की 500 से अधिक प्रजातियाँ रिकॉर्ड की गई हैं, जिनमें से कई अत्यधिक खतरे में हैं और इस राज्य के लिए सीमित हैं, जैसे सफ़ेद पंखों वाली बतख, स्क्लेटर, मोनल बंगाल फ्लोरियन आदि। विशाल आकार के पेड़, प्रचुर मात्रा में बेल तथा लताएँ और बेंत तथा बांस की बहुतायत अरुणाचल को सदाबहार बनाते हैं। भारत में पाई जाने वाली ऑर्किड की लगभग एक हजार प्रजातियों में से 500 से अधिक अकेले अरुणाचल में पाई जाती हैं। कुछ ऑर्किड दुर्लभ हैं और इन्हें लुप्तप्राय श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। यहाँ का वन्य जीवन भी इतना ही समृद्ध तथा विविध है,जिनमें हाथी, बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, सफ़ेद लंगूर, लाल पांडा, कस्तूरी और “मिथुन” (Bos Forntails) जंगली तथा अर्द्ध पालतू दोनों स्वरूप में विद्यमान है) शामिल हैं। यहाँ की भूमि उत्तर-दक्षिण की ओर की श्रेणियों से गुजरते हुए उत्तरी सीमा के साथ-साथ हिमालय पर्वत श्रेणी के साथ अधिकतर पर्वतीय है। ये राज्य को पाँच नदी घाटियों में विभाजित करते हैं: कामेंग,सुबनसिरी,सियांग,लोहित और तिरप। ये सभी हिमालय से हिम-पोषित होती हैं और असंख्य नदियां तथा छोटी नदियां भी इसी प्रकार पोषित होती हैं। इन नदियों में सबसे शक्तिशाली सियांग है जिसे तिब्बत में सांग्पो कहा जाता है, और जो असम के मैदानों में दिबांग तथा लोहित के इसके साथ जुडने के बाद ब्रह्मपुत्र बन जाती है। प्रकृति ने यहाँ के लोगों को सुंदरता की एक गहरी समझ दी है जो उनके गीतों, नृत्य और शिल्प में अभिव्यक्त होती है।
इस राज्य में 26 प्रमुख जनजातियाँ और बहुत सी उप जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें से अधिकतर समुदाय जातीय रूप से समान हैं और एक मूल से निकले हैं परंतु एक-दूसरे से भौगोलिक रूप से अलग होने के कारण इनकी भाषा, पहनावे और रिवाजों में कुछ विशिष्ट विशेषताएँ आ गई हैं।
पहला समूह तवांग और पश्चिम कामेंग जिले के मोन्पा और शेर्दुक्पेन हैं। ये महायान बौद्ध मत की लामा परंपराओं का अनुसरण करते हैं। मेम्बा और खाम्बा सांस्कृतिक रूप से इनके समान होते हैं जो उत्तरी सीमा के साथ ऊंचे पहाड़ों में रहते हैं; राज्य के पूर्वी भाग में निवास करने वाले खांप्ति और सिंगपो हिनायान बौद्ध मत को मानने वाले बौद्ध हैं।
लोगों का दूसरा समूह आदि, आका, आपातानी, बांगनी, निशिंग, मिशमी, मिजी, तंगसा आदि, जो सूर्य तथा चंद्रमा नामत: दोनयी पोलो और अबोतानी की पूजा करते हैं, जो इनमें से अधिकतर जनजातियों के मूल पूर्वज हैं। इनकी धार्मिक प्रथाएँ प्रमुख रूप से कृषि के चरणों अथवा चक्रों के अनुसार हैं।
तीसरे समूह में नोकटे और वांचो शामिल हैं, जो तिरप जिले में नागालैंड के साथ स्थित क्षेत्र के हैं। ये मेहनती लोग हैं जिन्हें उनके संरचित ग्रामीण समाज के लिए जाना जाता है जिसमें वंशानुगत ग्राम प्रमुख अभी भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नोकटे लोग वैष्णव मत के प्रारंभिक स्वरूप को भी मानते हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत – अरुणाचल की पूरी जनसंख्या को उनके सामाजिक-राजनैतिक धार्मिक संबंधों के आधार पर तीन सांस्कृतिक समूहों में विभाजित किया जा सकता है। यहाँ तीन धर्मों का पालन किया जाता है। कामेंग और तवांग जिले में मोन्पा और शेर्दुक्पेन, जो उत्तर में तिब्बतियों से मिले, बौद्ध धर्म की लामा परंपरा को अपनाया, जबकि लोहित जिले में खांप्ति महायान बौद्ध मत को मानते हैं। दूसरा समूह तिरप जिले के नोकटे और वांचो का है, जिनके दक्षिण में असम के लोगों से लंबे संबंधों के कारण उन्होंने हिन्दू धर्म अपना लिया।
ये लोग अपने शिकारों के सिर एकत्रित करने की प्रथा से जुड़े हैं। तीसरे समूह में आदि, आका, अपातानी, निशिंग आदि शामिल हैं – जो कुल जनसंख्या का एक प्रमुख हिस्सा है, जो अपनी पुरातन मान्यताओं और प्रकृति तथा डोनयी-पोलो (सूर्य तथा चंद्रमा) की पूजा की देशी संकल्पनाओं को बनाए रखे हुए हैं। अपातानी, हिल मिरी और आदि लोग बेंत तथा बांस की आकर्षक वस्तुएँ बनाते हैं। वांचो लोग उनके द्वारा लकड़ी तथा बांस पर नक्काशी करके बनाई गई मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
अर्थव्यवस्था – अरुणाचल प्रदेश की लगभग 35% जनसंख्या के लिए कृषि प्रमुख व्यवसाय है। कुल जोते गए क्षेत्र के 17 प्रतिशत में सिंचाई उपलब्ध है। यहाँ की प्रमुख फसल चावल है जिसे घाटी के निचले क्षेत्रों में और कुछ सीढ़ीदार ढलानों में उगाया जाता है। मक्का, बाजरा, दालें, आलू, गेहूं और सरसों अन्य महत्वपूर्ण फसलें हैं। राज्य के कुल क्षेत्र का लगभग 62% वन क्षेत्र है। यहाँ बड़े पैमाने पर कोई निर्माण उद्योग नहीं है तथापि कुछ कोयले तथा लिग्नाइट का खनन किया जाता है। प्रमुख उद्योग वन आधारित हैं। वन उत्पाद, विशेष रूप से बांस महत्वपूर्ण संसाधन है। आरा मिल, प्लाईवुड तथा पोशिश मिल, चावल मिल, फल संरक्षण इकाइयां, साबुन तथा मोमबत्ती निर्माण, स्टील फैब्रिकेशन, तेल निकालने के कारखाने मध्यम तथा लघु उद्योग क्षेत्रों में हैं। डोलोमाइट, अयस्क, चूना पत्थर, ग्रेफ़ाइट, क्वार्टजाइट, क्यानाइट, माइका लौह-अयस्क, ताँबा अयस्क के भंडार भी रिपोर्ट किए गए हैं। बुनाई सार्वभौमिक शिल्प है, अत्यधिक रंगीन कपड़े अधिकतर महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे हैं। बहुरंगी मुखौटे,लकड़ी पर बारीक नक्काशी, बेंत, बांस तथा फाइबर के काम यहाँ के लोगों के उत्तम कलात्मक मिजाज का स्पष्ट प्रमाण हैं।लोगों के पारंपरिक हथकरघा कौशल को विकसित करने की दृष्टि से मोन्पा कालीनों, स्कर्टों और मिशमी बैगों तथा शॉलों आदि के लिए एक स्थिर निर्यात बाजार है। सरकार ने विभिन्न कुटीर उद्योग, प्रशिक्षण-सह-उत्पादन केंद्र स्थापित किए हैं जहां स्थानीय लड़कों तथा लड़कियों को विभिन्न शिल्पों में प्रशिक्षित किया जाता है ताकि उन्हें इन शिल्प का प्रयोग करके उनकी आजीविका का अर्जन करने में सक्षम बनाया जा सके। शिल्प केंद्र लोगों को उनके उत्पादों के लिए बाजार खोजने में भी सहायता कर रहे हैं।
त्योहार – त्योहार लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। त्योहार सामान्यत: कृषि से संबंधित होते हैं और या तो भगवान को धन्यवाद देने के लिए अथवा अच्छी फसल हेतु प्रार्थना करने के लिए प्रथागत उल्लास से जुड़े होते हैं। महत्वपूर्ण त्योहार हैं आदि लोगों के मोपिन और सोलुंग, मोन्पा और शेर्दुक्पेन लोगों का लोस्सार और हिल मिरी लोगों का बूरी-बूट, अपातानी लोगों का द्री, तगिन लोगों का सी-डोनयी, निशिंग लोगों का न्योकुम, ईदु मिशमी लोगों का रेह, मिशमी लोगों का तमलादु, नोकटे लोगों का लोकु, तंगसा लोगों का मोल, खांप्ति और सिंगपो लोगों का संकेन, मिजी लोगों का खान, तगिन के अकास लोगों का नेची दौ, वांचो लोगों का ओजियले, खोवा लोगों का क्ष्यात-सोवाई, निशिंग लोगों का लोंगते यूल्लो ।
पर्यटन स्थल – अलोंग, अन्नीनि, भिस्मकनगर (पुरातात्विक स्थल), बोमडिला(2530 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय के भूक्षेत्र और बर्फ से ढकी पर्वत श्रेणियों का एक मनोरम दृश्य दिखाता है), चांगलोंग, दोपरिजो, इटानगर (राजधानी, ऐतिहासिक ईटा किले के उत्खनित अवशेषों और आकर्षक गंगा झील [गेकर सिनयी] के साथ) पासीघाट, मलिनिथन (पुरातात्विक स्थल), सेस्सा (ऑर्किड उद्यान),नामधापा (चांगलांग जिले में वन्य जीव अभयारण्य),परसुरामकुंड (तीर्थ स्थल),तवांग (12,000 फुट की ऊंचाई पर 400 वर्ष पुराना बौद्ध मठ, जो प्रसिद्ध टोर्ग्वा त्योहार से संबंधित है, देश का सबसे बड़ा मठ है और 6ठे दलाई लामा का जन्म स्थान है),जाइरो,तिपी (7500 से अधिक ऑर्किड वाला ऑर्किड उद्यान),आकाशीगंगा (ब्रह्मपुत्र का विहंगम दृश्य),ताली घाटी (पर्यावरणीय पर्यटन),रोइंग और मियाओ ।

बाजार में आया अन्नपूर्णा का ऑफसाइड, ब्रांड अम्बैसडर सौरभ गांगुली

कोलकाता । एफएमसीजी ब्रांड बनने वाली अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड कंपनी द्वारा आयोजिक समारोह में  कंपनी के ब्रांड एंबेसेडर पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली ने कंपनी के नए ब्रांड “ऑफसाइड” को धमाकेदार तरीके से लॉन्च किया। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली गत सितंबर 2025 से कंपनी के साथ ब्रांड एंबेसडर के तौर पर जुड़े हुए हैं। “ऑफसाइड”, कंपनी के शहरी और सेमी-अर्बन मार्केट में स्ट्रेटेजिक विस्तार को दिखाता है, जो इसकी पहले से मौजूद ग्रामीण डिस्ट्रीब्यूशन की ताकत को और भी बेहतर बनाता है। नए ब्रांड का मकसद स्नैक्स और कन्वीनियंस फ़ूड सेगमेंट में कस्टमर की बदलती पसंद को पूरा करना है। लॉन्च इवेंट के मौके पर कंपनी की सीनियर लीडरशिप, डिस्ट्रीब्यूटर और कई दूसरे लोग भी शामिल हुए। 2015 में शुरू हुई अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड 100 से ज़्यादा स्नैक और फ़ूड प्रोडक्ट बनाती और बेचती है, जिसमें वेस्टर्न स्नैक्स, पारंपरिक नमकीन, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रायम्स, आलू के चिप्स, बेकरी प्रोडक्ट और कन्फेक्शनरी शामिल हैं। कंपनी का डिस्ट्रीब्यूशन पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और उत्तर पूर्वी राज्यों के 80,000 से ज़्यादा गांवों और 250 कसबो में फैला हुआ है। कंपनी के डिस्क्लोज़र के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025 में अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड ने ₹407 करोड़ का रेवेन्यू रिपोर्ट किया, जो साल-दर-साल 54 प्रतिशत का ग्रोथ दिखाता है। ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट 12 प्रतिशत के मार्जिन के साथ ₹47 करोड़ रहा, जबकि नेट प्रॉफ़िट ₹22 करोड़ बताया गया है। मौजूदा समय में कंपनी की बढ़ती अर्निंग्स के कारण इसकी शेयर बढ़कर ₹9.86 हो गई। अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड के चेयरमैन और संस्थापक रितेश साव ने कहा, “ऑफसाइड” का लॉन्च अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड के एक मज़बूत रीजनल प्लेयर से एक ब्रांड-ड्रिवन “एफएमसीजी” कंपनी बनने के सफ़र में एक अहम कदम है। बदलते कंज्यूमर की उम्मीदों के साथ, खासकर शहरी और सेमी-अर्बन इंडिया में, ऑफसाइड को क्वालिटी, अफोर्डेबिलिटी और भरोसे की हमारी कोर फिलॉसफी पर कायम रहते हुए कंटेंपररी प्रोडक्ट्स देने के लिए बनाया गया है। ब्रांड के साथ सौरव गांगुली का जुड़ना एक्सीलेंस और नेशनल रेलिवेंस के लिए हमारे कमिटमेंट को और मज़बूत करता है। इस मौके पर, अन्नपूर्णा स्वादिष्ट लिमिटेड के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, रोहित सिंघानिया ने कहा, “ऑफसाइड” हमारी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ स्ट्रैटेजी का सेंटर है, क्योंकि हम शहरी मार्केट और मॉडर्न ट्रेड चैनल्स में अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं।

एमएसएमई इकोसिस्टम के लिए गेम-चेंजर साबित होगा बजट : ममता बिन्नानी

कोलकाता । सीएस (डॉ.) एडवोकेट ममता बिनानी, (प्रेसिडेंट, एमएसएमई डेवलपमेंट फोरम, पश्चिम बंगाल) ने कहा, बजट 2026 में 10,000 करोड़ रुपये के डेडिकेटेड एमएसएमई ग्रोथ फंड की घोषणा, अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर भारत के माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज को मजबूत करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। यह दूरदर्शी पहल न केवल एमएसएमई को इनोवेशन, मॉडर्नाइजेशन और स्केल करने के लिए जरूरी पूंजी प्रदान करेगी, बल्कि रणनीतिक रूप से इस सेक्टर को ग्लोबल ट्रेड में होने वाली रुकावटों से भी बचाएगी।
ऐसे समय में जब एमएसएमई क्षेत्र, लिक्विडिटी की चुनौतियों, देरी से पेमेंट और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं, यह फंड बेहतर प्रतिस्पर्धा, ग्लोबल बाजारों तक बेहतर पहुंच और वैल्यू चेन में गहरे इंटीग्रेशन के लिए एक उत्प्रेरक का काम करेगा। बजट में बेहतर क्रेडिट एक्सेस और स्ट्रक्चरल सपोर्ट उपायों के साथ, यह कदम भारत के औद्योगिक विकास, रोज़गार सृजन और निर्यात क्षमता की रीढ़ एमएसएमई की पूरी क्षमता को सामने लाने के लिए सरकार की स्थायी प्रतिबद्धता को दिखाता है। हम केंद्र सरकार की इस इस दूरदर्शी कदम का स्वागत करते हैं, जो समावेशी विकास को बढ़ावा देगा, इस सेक्टर को और भी ज्यादा मजबूत करेगा और वास्तव में यह बजट आत्मनिर्भर एमएसएमई इकोसिस्टम को बनाने में कारगर पहल साबित होगा। ममता बिनानी पश्चिम बंगाल एमएसएमई डेवलपमेंट फोरम की अध्यक्ष हैं। सुश्री बिन्नानी ने कॉरपोरेट गवर्नेंस और सीएसआर 2016 में उत्कृष्टता के लिए आईसीएसआई राष्ट्रीय पुरस्कार, वर्ष 2016 के लिए निदेशक संस्थान के गोल्डन पीकॉक पुरस्कार, वर्ष 2016 के लिए सराहनीय सीएसआर गतिविधि के लिए एसोचैम पुरस्कार के जूरी सदस्य के रूप में कार्य किया है। कोलकाता नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल बार एसोसिएशन की उपाध्यक्ष, मर्चेंट चैंबर ऑफ कॉमर्स-लीगल अफेयर्स काउंसिल के अध्यक्ष और इंसोल इंडिया के कार्यकारी समिति की सदस्य भी हैं। वह इंटरनेशनल वूमेंस इंसोलवेंसी एंड रिस्ट्रक्टरिंग कॉन्फेडरेशन (आईएआईआरसी) बोर्ड की सदस्य भी हैं और वर्तमान में इंडिया नेटवर्क की सह-अध्यक्ष हैं।

कंटेंपरेरी लाइफस्टाइल ब्रांड “सेनेस” की लॉन्चिंग

कोलकाता । सेनकों हाउस का नया कंटेंपरेरी लाइफस्टाइल बहुप्रतीक्षित ब्रांड “सेनेस” कोलकाता के बाजार में उतर चुका है। ब्रांड की लांचिंग पर अभिनेत्री तारा सुतारिया की मौजूदगी उपस्थित रहीं। सेनेस के एलजीडी (लैब-ग्रोन डायमंड) प्रोडक्ट्स सस्टेनेबल लग्जरी, इको-फ्रेंडली इनोवेशन और एक नए जमाने के नज़रिए को दर्शाते हैं, जबकि इसकी लेदर रेंज जिम्मेदार सोर्सिंग और पर्यावरण के प्रति जागरूक प्रथाओं पर आधारित है। इसके अलावा, परफ्यूम कलेक्शन को रिफाइंड सेंसरी अनुभवों को जगाने के लिए तैयार किया गया है, जो इस ब्रांड के अत्याधुनिक, जागरूक दृष्टिकोण को दर्शाता है – यह ब्रांड नैतिकता और सुंदरता को सहजता से एक साथ लाता है। इस मौके पर अभिनेत्री तारा सुतारिया ने ब्रांड के साथ अपने जुड़ाव के बारे में बताते हुए कहा कि, जिस चीज़ ने मुझे सच में सेनेस की ओर आकर्षित किया, वह है सस्टेनेबिलिटी के प्रति इसकी प्रतिबद्धता, साथ ही सहजता से स्टाइलिश बने रहना। यह नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे बेहद विचारशील, जिम्मेदार और खूबसूरती से तैयार की गई है। मुझे ऐसे ब्रांड का हिस्सा बनकर खुशी हो रही है जो डिज़ाइन और उद्देश्य दोनों को महत्व देता है। इधर, कोलकाता में लॉन्चिंग मौके पर, जोइता सेन (डायरेक्टर, हेड ऑफ मार्केटिंग एंड डिज़ाइन्स, हाउस ऑफ सेनको) ने कहा कि “सेनेस” आधुनिक लग्जरी की एक अभिव्यक्ति है, जो जिम्मेदारी और क्राफ्ट्समैनशिप में गहराई से निहित है। कोलकाता में इस लॉन्च के साथ, हम एक ऐसा अनुभव बनाना चाहते थे जो ब्रांड की आत्मा को दर्शाता हो – जहाँ सस्टेनेबल इनोवेशन, कंटेंपरेरी डिज़ाइन और विचारशील कहानी एक साथ आते हैं।

 

भवानीपुर कॉलेज में कार्तिकेय वाजपेयी की पुस्तक दि अनबिकमिंग पर चर्चा

कोलकाता । बहु-प्रतिभाशाली लेखक, वकील और आध्यात्मिक विचारक कार्तिकेय वाजपेई ने गत 5 फरवरी को भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज की लाइब्रेरी में अपनी पहली पुस्तक’ द अनबेकमिंग’ पर अपने विचारों को साझा किया । इस कार्यक्रम में अनुभवी फिल्म हस्ती बरुण चंदा द्वारा संचालित यह सत्र छात्रों और संकाय सदस्यों दोनों के लिए एक आकर्षक और समृद्ध अनुभव साबित हुआ। रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह और प्रातःकालीन कॉमर्स सत्र की वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने दोनों ही अतिथियों को कॉलेज मोमेंटो और शाॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया ।
कार्यक्रम के आयोजन सहायक कॉलेज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री मिराज डी शाह , श्रीमती सोहिला भाटिया और प्रो चंपा श्रीनिवासन रहे । रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने स्वागत भाषण दिया।
बातचीत के दौरान, वाजपेई ने अपनी पुस्तक के केंद्रीय विषय पर विस्तार से बताया, जिसमें आत्म-साक्षात्कार और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग के रूप में अनसीखने के महत्व पर जोर दिया गया। उन्होंने कथा के साथ-साथ काम को आकार देने वाले दार्शनिक विचारों में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की।
सत्र का मुख्य आकर्षण भावातीत ध्यान करने के साथ समाप्त हुआ। लेखक ने सभी विद्यार्थियों शिक्षक शिक्षिकाओं और अतिथियों को ध्यान करवाया। छात्रों ने बहुत ही उत्साह से भाग लिया। विद्यार्थियों ने लेखक और मॉडरेटर दोनों से विचारशील और बौद्धिक रूप से उत्तेजक प्रश्न पूछे गए ।इस कार्यक्रम में साठ से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया।डाॅ संपा सिन्हा बासु, डॉ त्रिदिब सेनगुप्ता, डॉ वसुंधरा मिश्र आदि शिक्षकों की उपस्थिति रही।

लिटिल थेस्पियन ने किया दस दिवसीय नाट्य कार्यशाला का आयोजन

कोलकाता । लिटिल थेस्पियन ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एक्सटेंशन प्रोग्राम विभाग, नई दिल्ली) संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से 22 दिसंबर 2025 से 21 जनवरी 2026 तक कोलकाता स्थित ‘अनुचिंतन आर्ट्स सेंटर’ में 30 दिवसीय प्रस्तुतिपरक नाट्य कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का विचार निर्देशक उमा झुनझुनवाला का था। कार्यशाला का केंद्रबिंदु नए और अनुभवी कलाकारों की छिपी प्रतिभाओं को रचनात्मक गतिविधियों के ज़रिये बाहर लाना था, जिसमें अभिनय की कला, दृश्य संयोजन और मंच के पीछे का ज्ञान शामिल था। कार्यशाला में अभिनय के अलग-अलग तरीकों और विभिन्न शैलियों, सह-कलाकारों के साथ तालमेल, मंच परे का समन्वय और भाषण एवं ध्वनि परिवर्तन पर काम किया गया।

तीन दक्ष रंगकर्मियों ने नए कलाकारों को रंगमंच के विभिन्न पहलुओं के बारे में बताया। श्री अमित बनर्जी (संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता) ने कलाकारों की आवाज़, ध्वनि परिवर्तन और अभिनय के विभिन्न बारीकियों से परिचित कराया। मनीष मित्रा (निदेशक, कसबा अर्घ्य) ने मंच की साज-सज्जा और निर्देशन पर काम किया, जबकि डॉ. गगनदीप (सहायक प्राध्यापक, नाट्य विभाग, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय) ने कलाकारों को दृश्य संयोजन की दुनिया से परिचित कराया। इस कार्यशाला में कोलकाता के और अन्य राज्यों से कुल मिलाकर 25 कलाकारों ने सहभागिता की । इस कार्यशाला का समापन नाटक ‘दफ्तर’ के मंचन के साथ हुआ, जो उमा झुनझुनवाला द्वारा लिखा गया एक तीखा व्यंग्य है, जो दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार, उदासीनता और अक्षमता पर कटाक्ष करता है। यह नाटक यमराज के दफ्तर में खुलता है, जहाँ परलोक की नौकरशाही हमारे अपने संसार को दर्शाती है। यह नाटक कालातीत मुद्दों से रूबरू करवाता है, जहाँ किसान जो ज़मीन जोतने के बावजूद अपने परिवार को खिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं; हाशिए पर पड़े निचली जातियों और वर्गों के लोग सम्मान के लिए लड़ रहे हैं; एक मोची जिसे अपने परिवार के लिए रोटी मांगने की हिम्मत करने पर ज़िंदा जला दिया गया और एक अकालपीड़ित आम आदमी, जो परिवार और उम्मीद से वंचित है एवं सीता और द्रौपदी के समय से महिलाओं द्वारा सहे गए असहनीय कष्टों को दर्शाया गया है; फिर भी, अंधेरे के बीच इनसान उम्मीद की रोशनी से चिपके रहते हैं, एक बेहतर कल के लिए जीते हैं। उमा झुनझुनवाला की तीखी आलोचना अतीत और वर्तमान के बीच की अंधेरी असमानताओं पर प्रकाश डालती है। इस नाटक का निर्देशन डॉ. गौरव दास ने किया और मो. आसिफ़ अंसारी सहायक निर्देशक थे। शानदार रोशनी की संकल्पना राहुल सरदार ने तैयार की थी, भावपूर्ण गायन अनन्या भास्कर ने प्रस्तुत किया और त्रिदिब साहा ने पर्कशन बजाया। खूबसूरत कोरियोग्राफी नयन साधक और समर मृधा ने की। जिन प्रतिभागियों ने भाग लिया और अभिनय किया उनमें गुंजन अज़हर, संगीता व्यास, एनी दास, नुपूर भौतिका, नव्या शंकर, स्नेहा दास, बबीता शर्मा, श्रीमंती सेन, फ़िरोज़ हुसैन, आदित्य वत्स, अर्पित कुमार, बापन नस्कर, कौशिक चक्रवर्ती, कुशाग्र सक्सेना, सम्राट चक्रवर्ती, लिटन सरकार, मोहित, राम आश्रय साव, सत्यम पांडे, सौरिक बेरा, सुभाशीष बाग, सहबाज़ खान, राहुल सरदार, नयन साधक, बिप्लब नस्कर शामिल थेl