कोलकाता । पश्चिम बंगाल के हजारों शिक्षित युवाओं के लंबे समय से चले आ रहे इंतज़ार का अंत करते हुए स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) ने बुधवार देर शाम उच्च माध्यमिक (कक्षा 11वीं–12वीं) के लिए शिक्षक नियुक्ति की अंतिम मेधा सूची जारी कर दी। आयोग के अनुसार, इस सूची में कुल लगभग 18 हजार 900 अभ्यर्थियों के नाम शामिल हैं, जिनमें से 12 हजार 445 रिक्त पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। आयोग ने इस बार नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतते हुए पैनल, प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) के साथ-साथ असफल अभ्यर्थियों की सूची भी सार्वजनिक की है। उल्लेखनीय है कि 11वीं–12वीं श्रेणी के 35 विषयों में कुल 12 हजार 445 रिक्तियां घोषित की गई थीं। इस नियुक्ति प्रक्रिया के तहत पहले चरण में 19 हजार 921 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था। बाद में उच्च न्यायालय के निर्देश पर 156 अन्य अभ्यर्थियों को भी दस्तावेज़ सत्यापन के लिए आमंत्रित किया गया। इस प्रकार कुल 20 हजार 077 अभ्यर्थी इस प्रक्रिया में शामिल हुए। दस्तावेज़ सत्यापन की प्रक्रिया 18 नवंबर से चार दिसंबर तक चली। दस्तावेज़ सत्यापन के दौरान 1 हजार 287 अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई। आयोग सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य कारण आयु सीमा, जाति प्रमाण पत्र और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित विसंगतियां रहीं। इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार कक्षा नौवीं–दसवीं और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्ति में अनियमितताओं के कारण ‘दागी’ करार दिए गए 269 अभ्यर्थियों को भी सूची से बाहर किया गया है। साक्षात्कार के पश्चात 303 अन्य अभ्यर्थियों के नाम भी हटाए गए हैं। अब अभ्यर्थियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्ति के लिए परामर्श (काउंसलिंग) प्रक्रिया कब से शुरू होगी। आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गुरुवार से सोमवार तक राजकीय अवकाश है। ऐसे में 27 जनवरी, मंगलवार को कार्यालय खुलने के बाद ही परामर्श तिथियों की आधिकारिक घोषणा की जाएगी। हालांकि, विकास भवन के सूत्रों का संकेत है कि आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इसी माह के अंत तक काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। गौरतलब है कि तीन अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राज्य में लगभग 26 हजार शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं। इसके बाद नए सिरे से परीक्षा और चयन प्रक्रिया शुरू की गई। वर्तमान सूची को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। कई अभ्यर्थियों का आरोप है कि ‘योग्य’ और ‘कार्यरत’ शिक्षकों को अनुभव के 10 अंक दिए जाने के बावजूद अनेक पात्र उम्मीदवार अंतिम सूची से बाहर रह गए हैं या उन्हें प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया है।
नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करती है ‘वसंतपंचमी’
वसंतपंचमी (२३ जनवरी) पर विशेष
-आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वसंत ऋतु की मस्ती और उल्लास के क्षण में वसंतपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मानव-हृदय मे नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करता है। सरस्वती की आराधना इस पर्व की विशेषता है। वस्तुत: सरस्वती ‘कला’ और ‘साहित्य’ की देवी हैं, जिनका भारतीय संस्कृति में शीर्ष स्थान है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में सरस्वती ‘नागेश्वरी’, ‘भारती’, ‘शारदा’, ‘हंसवाहिनी’, ‘वीणावादिनी’ इत्यादिक नामों से विश्रुत हैं तथा अत्यन्त विस्तारपूर्वक उनकी महिमा का वर्णन भी किया गया है। इसी आधार पर देश के विभिन्न भू-भागों में वसंतपंचमी के अलौकिक अवसर पर माँ शारदा का अर्चन-पूजन-स्तवन अतीव श्रद्धापूर्वक किया जाता है। वसंतपंचमी का पर्व भगवती सरस्वती को समर्पित रहता है।
अब आइए! ‘वसंतपंचमी’ का व्याकरणिक ज्ञान प्राप्त करें। वसंतपंचमी में दो शब्द हैं :– ‘वसंत’ और ‘पंचमी’। हम पहले ‘वसंत’ शब्द को समझेँगे। यह ‘वस्’ धातु का शब्द है, जिसमे ‘झच्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इस प्रकार ‘वसंत’ शब्द का सर्जन होता है। हेमन्त और ग्रीष्म के मध्य की ऋतु ‘वसंत’ है। अब समझते हैं, ‘पंचमी’ को। पंचम शब्द मे ‘ङीष्’ प्रत्यय के जुड़ने से ‘पंचमी’ शब्द की रचना होती है। चान्द्रमास के प्रत्येक पक्ष की पाँचवीं तिथि ‘पंचमी’ कहलाती है। इस प्रकार ‘वसंतपंचमी’ का अर्थ हुआ- ‘माघमास की शुक्लपंचमी’। इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहा गया है। यदि आप ‘वसंतपंचमी’ को अलग-अलग करके ‘वसंत पंचमी’ लिखते हैं तो आपका लेखन अशुद्ध माना जायेगा। आप इसे शुद्धतापूर्वक दो प्रकार से लिख सकते हैं :– (१) वसंतपंचमी (२) वसंत-पंचमी।
‘वसंतपंचमी’ पर्व-आयोजन के मूल में एक मोहक कथा है। आप भी श्रवण करें :–
जब सृष्टि का आरम्भ होने का समय आ गया था तब भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को अपने पास बुलाया और उन्हें आदेश किया था- आप मनुष्य-योनि की रचना आरम्भ करें। ब्रह्मा ने भगवान् विष्णु का आदेश ग्रहण करने के पश्चात् मनुष्य-योनि की रचना की थी; परन्तु ब्रह्मा अपनी उस रचना से संतुष्ट नहीं थे। वे भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और उनसे पुन: रचना करने के लिए अनुमति माँगी थी। विष्णु ने अपनी अनुमति दे दी थी। वे अपने लोक ‘ब्रह्मलोक’ लौट आये। अब वे सृष्टिरचना-प्रक्रिया से जुड़ गये। उन्होंने अपने कमण्डल से जल निकालकर उसे पृथ्वी पर छिड़क दिया था, जिसके कारण पृथ्वी में प्रतिक्रिया होने लगी, फलस्वरूप पृथ्वी पर कम्पन होने लगा तथा देखते-ही-देखते, एक अद्भुत शक्ति प्रकट हो गयी, जिसकी चार भुजाएँ थीं, जो सुदर्शना थी। उस चतुर्भुजी देवी के एक हाथ में वीणा और दूजा हाथ वर देने की मुद्रा में था। उनके अन्य दो हाथों में पुस्तक और माला थी। उस चतुर्भुजी देवी ने अपने प्रकट होते ही वीणा का सुमधुर झंकार किया था, जिससे संसार के समस्त जीवधारियों को वाणी प्राप्त हो गयी थी। उस प्रभाव का अनुभव करते ही, ब्रह्मा ने उस देवी का ‘वाक्देवी’/’वाग्देवी’/’वाणी की देवी सरस्वती’ का नामकरण किया था।
माँ सरस्वती की सर्वप्रथम आराधना करके ‘सरस्वती-पूजन’ का समारम्भ श्री कृष्ण ने किया था। इसके लिए सिर पर मुकुट, गले में वैजयन्तीमाला, हाथों में मुरली धारण करते हुए, उन्होंने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की अभ्यर्थना की थी।
‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ के ‘प्रकृति- खण्ड’ में कहा गया है कि श्री कृष्ण द्वारा पूजित होने पर माँ सरस्वती समस्त लोक मे सबके द्वारा पूजी जायेंगी। इसी अवसर पर श्री कृष्ण ने सरस्वती को यह वर दिया था– हे सरस्वती! अब तुम्हारी पूजा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक माघमास की शुक्लपंचमी की तिथि से समारम्भ हो जायेगी, जो यही विद्यारम्भ की तिथि भी कहलायेगी।
वास्तव में, सरस्वती जलदेवी हैं। सरस्वती नदी के नाम पर ही उनका उल्लेख किया जाता है। उनका जल हिमालय से निर्गत होता है, जो दक्षिण-पूर्व प्रवहमानता के साथ तीर्थराज प्रयाग-स्थित गंगा-यमुना के साथ संगम कर, ‘त्रिवेणी’ के नाम से अभिहित होने लगता है। सरस्वती को ‘वाग्देवी’ और ‘ज्ञानदेवी’ की संज्ञा से भी विभूषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल में इसी सारस्वत अवसर पर गुरुकुलों और आश्रमों के स्नातकों के ‘दीक्षान्त-समारोह’ आयोजित किये जाते थे।
वसंत को ‘ऋतुराज’ भी कहा जाता है। यों तो सिद्धान्तत: वसंत ऋतु तीन महीने की होती है; तापमान सामान्य रहता है; न तो अधिक शीत की ठिठुरन और न ही अधिक ग्रीष्म की तपन।
फाल्गुन (‘फागुन’ का तत्सम शब्द)-मास है; शिशिर ऋतु का अन्त हो रहा है। वह शीत, जिसने क्या मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे-पेड़; अर्थात् समस्त जड़-चेतनजगत् मे अपने तीक्ष्ण प्रहारों से ‘ठिठुरन’ ला दी थी, अब वही आतंकी शीत अन्तिम श्वास ले रहा है। हवा में गरमाहट आ गयी है। वसंत का आगमन हो रहा है। उसके स्वागत और अभिनन्दन के लिए लताओं और वृक्षों ने नूतन परिधान धारण कर लिये हैं। सरसों वासंती साड़ी पहन इतरा रही है; इठला रही है तथा वसुधा पर सर्वत्र बिछी हरीतिमा पर अठखेलियाँ खेल रही है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो क्षितिज वसुन्धरा के साथ संवाद करने और अभिरम्भ (भींचकर गले लगाने के लिए उद्यत) करने के लिए मचल हो उठा हो; नभ में विहगवृन्द उन्मुक्त भाव के साथ अपने वक्षप्रान्त को लहरा-लहराकर यों उड़ान भर रहे हैं, मानो अवनि और अम्बर-तल में स्वच्छ चाँदनी सम्पूर्ण आभा और प्रभा के साथ अपनी समुपस्थिति अंकित करा रही हो; पक्षियोँ का कलरव यों प्रतीत होता है, मानो उनका वृन्द (समूह) समवेत स्वर मे ‘स्वागत-गान कर रहा हो; भौंरे विरुदावली गुनगुना रहे हैं; बौर की सम्पन्नता से आम की डालियाँ विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो रही हैं; वहीं पुष्पवाटिका मे रंग-विरंगे पुष्पों से सुशोभित पौधे यत्र-तत्र-सर्वत्र अपना सौरभ बिखेर रहे हैं। मन-प्राण को सम्मोहित करनेवाले ऐसे प्रफुल्ल वातावरण मे कुसुमाकर ‘वसंत’ का पादप्रक्षेप (पदार्पण) होता है।
वसंतऋतु में प्रकृति अपना नव शृंगार करती है। रंग-विरंगे पुष्पोँ से अलंकृत उसका कोमल शरीर दर्शकगण को मन्त्रमुग्ध कर लेता है। ऐसे वातावरण की सृष्टि होती है, मानो प्रकृति ‘नव वधू’-सी प्रतीत हो रही हो, जिससे प्रेरित होकर ही कोकिल कूजती है; भ्रमर गुनगुनाते हैं; अन्य पक्षी कलरव कर, उसका यशोगान करते हैं तथा मानव रागरंग और और वसंत की मादक गन्ध से मस्त हो जाते हैं। मस्ती के ऐसे ही क्षण मे ‘फाग’ का स्वर स्वत: फूट पड़ता है।
सृष्टि-सौन्दर्य की झाँकी वनो, उपवनो, पर्वतीय क्षेत्रों तथा ग्राम्यांचलों में ही देखने को मिलती है, जहाँ प्रकृति एवं निसर्ग के मनोहारी रूप के दर्शन होते हैं।
सुबह-शाम खेतों की ओर निकल आइए, आपको सरसों के पीले-पीले फूल, हवा मे लहराती जौ-गेहूँ की बालियाँ, छीमियाँ/छेमियाँ तथा श्वेत-नीले फूलोँ से लदे और धरती पर फैले हुए पौधे आपका मन मोह लेँगे और आम्र-मंजरियाँ अपनी सुगन्ध से आपको सम्मोहित कर लेंगी। नगरों में ऐसे मोहक परिदृश्य से नगरवासी वंचित रहते हैं। वसंत की बहार का वास्तविक आनन्द तो पर्वतीय और ग्रामीणजन ही ले पाते हैं।
वसंत के आगमन का प्रभाव प्रकृति पर ही नहीं, मानव के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वसंतऋतु में प्रात: उन्मुक्त और स्वच्छ हवा मे टहलना, स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। इससे पाचनशक्ति मे वृद्धि होती है और शरीर नीरोग रहता है। चूँकि वसंतऋतु मे वायु विशुद्ध और सुगन्ध से सराबोर रहती है इसलिए उसमे श्वास लेने से फेफड़ों मे किसी प्रकार के रोग होने की सम्भावना जाती रहती है। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण होने से मन उत्साह से भरा रहता है; आलस्य पास फटकने नहीं पाता। इस प्रकार वसंतऋतु का आगमन मानव के लिए एक ईश्वरीय वरदान की भाँति है।
जो लोग ‘वसंतऋतु की उपयोगिता और महत्ता को मात्र हिन्दू-सम्प्रदाय में देखते-पाते हैं, उन्हें अपना दृष्टि-विस्तार करना होगा। सूफ़ी-सम्प्रदाय के धर्माचार्योँ ने भारत के मुसलमानों के मध्य वसंतऋतु की महिमा का मण्डन किया है। मुग़ल-काल से ही सूफ़ीजन के बहुचर्चित देव-उपासनास्थलों में वसंतपर्व की महत्ता को रेखांकित किया गया है, जिसका बोध करने के लिए ‘निज़ाम औलिया का वसंत’, ‘ख़्वाजा बख़्तियार काकी का वसंत’, ‘खुसरो का वसन्त’ इत्यादिक का अनुशीलन किया जा सकता है। अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया गीत-संगीत के साथ वसंतऋतु के प्रति आस्थावान् थे। सूफ़ी कवि खुसरो स्वरचित गीत-गायन करते थे :–
“आज वसंत मना ले सुहागन, आज वसंत मना ले। अंजन-मंजन कर पिया मोरी, लम्बे नेहर लगा ले।”
बांग्लादेश मे बंगाली कैलेण्डर के अनुसार, वसंतऋतु (बोशोन्तो उत्सोब) के प्रथम दिन बंगाली मास फाल्गुन का आयोजन किया जाता है और पश्चिम बंगाल में पारिवारिक उत्सव, मेला इत्यादिक आयोजित किया जाता है। पाकिस्तान मे वसंत पर्व सीमित रूप में मनाया जाता है। वहाँ का जनमानस इसी पर्व को ‘जश्ने बहाराँ’ के नाम से लगभग एक माह तक मनाता है। लाहौर और पंजाब में वसंत का उत्साह देखते ही बनता है। लाहौर में ‘वसंत-मेला’ का आयोजन धूमधाम के साथ किया जाता है। वहाँ के भारतीय कालूराम ने अट्ठारहवीँ शताब्दी के उस भारतीय बलिदानी की पुण्य स्मृति में वसंतपर्व का आयोजन समारम्भ किया था, जिसने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से अस्वीकार कर दिया था। राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत उस वीर सुपूत का नाम ‘हक़ीक़त राय’ था। महाराजा रणजीत सिंह लाहौर में इसी अवसर पर कई उत्सव आयोजित करते थे; पतंगबाज़ी भी होती थी। पंजाबत प्रान्त में भी ‘वसंतपंचमी’ का हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया जाता था। होलिकोत्सव का आरम्भ भी इसी अवसर पर होता है। भारतीय गाँवों मे सांस्कृतिक वातावरण का सर्जन होने लगता है; ढोलक पर थाप पड़ने लगती है। सम्पूर्ण वातावरण हर्ष और उल्लास से भर जाता है।
ऋतुराज वसंत वस्तुत: धरती पर भगवान् का प्रतिनिधि बनकर आता है। उसके साम्राज्य मे छोटे-बड़े, निर्धन-धनी प्रफुल्ल रहते हैं। वह जन-जन में नव कृति की उमंग भरता है। वह ऐसा उदार और कृपालु राजा है, जो जन-कल्याण के लिए अपनी सम्पूर्ण सम्पदा और विभूति जन-जन पर न्योछावर कर देता है। वह प्रतिवर्ष हमसे कुछ लेने के लिए नहीँ, अपितु देने के लिए ही आता है। ऐसे पर्व की जय हो, जो जड़-चेतन को अपने आगमन से प्रमुदित करता रहता है।
(लेखक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैं।)
गुणवत्ता परीक्षण में फेल हुए 45 दवाओं के बैच
– 5 प्रमुख कंपनियां भी शामिल
कोलकाता । बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने हाल ही में राज्य में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है, जिसने चिकित्सा जगत और आम जनता के बीच चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी की गई ताजा सूची के अनुसार, विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित दवाओं के 45 विशिष्ट बैच गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। इस सूची में राज्य की पांच प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों के नाम भी शामिल हैं, जो इस पूरे मामले को और अधिक गंभीर बनाता है। इस सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम ‘पश्चिम बंगाल फार्मास्युटिकल्स’ का है, जिसके ‘रिंगर्स लैक्टेट सलाइन’ के एक विशेष बैच (03बी3911) को गुवाहाटी की एक लैब ने परीक्षण के बाद असुरक्षित घोषित किया है। गौरतलब है कि पिछले साल भी इसी कंपनी के सलाइन को लेकर काफी विवाद हुआ था, जिसके बाद सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस बार भी दिसंबर में लिए गए नमूनों की जांच के बाद विभाग ने इसे फिर से विफल पाया हैराज्य की अन्य कंपनियों में हावड़ा की ‘लाइफ फार्मास्युटिकल्स’ का क्रोमोस्टेट इंजेक्शन, जगाछा स्थित ‘डायमंड ड्रग्स’ का एल्युमीनियम हाइड्रोक्साइड जेल, कोलकाता की ‘सनी इंडस्ट्रीज’ का पोटेशियम क्लोराइड और ‘कैपलेट इंडिया’ का ओआरएस (ओआरएस) घोल भी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहा। इन दवाओं के नमूनों की जांच कोलकाता की विभिन्न प्रयोगशालाओं में की गई थी। स्वास्थ्य विभाग ने केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड की कंपनियों द्वारा निर्मित एंटीबायोटिक्स और कफ सीरप जैसे कई उत्पादों के विशिष्ट बैचों को भी इस सूची में शामिल किया है। विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि इन चिन्हित बैचों की दवाओं का उपयोग तुरंत बंद कर दिया जाए। साथ ही, संबंधित कंपनियों और वितरकों को आदेश दिया गया है कि वे बाजार में मौजूद इन दवाओं के स्टाक को अविलंब वापस लें (रिकॉल करें)। सरकार के इस कड़े रुख का उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवाओं के निर्माण में बरती जा रही लापरवाही पर लगाम लगाना है।
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पाकिस्तान में 2.5 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज की ताजा रिपोर्ट ने संघीय सरकार की शिक्षा आपात नीति की पोल खो दी है।रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2.5 करोड़ ( 25 मिलियन) बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं। देश में शिक्षा पर कुल खर्च 5 खरब (500 बिलियन रुपये) तक पहुंच गया है। इस खर्च का बड़ा हिस्सा अब सरकार के बजाय आम पाकिस्तानी परिवार उठा रहे हैं। दुनिया न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज ने कहा कि देश के इतिहास में यह पहली बार है कि शिक्षा पर परिवारों का खर्च सरकार के शिक्षा बजट से ज्यादा हो गया है। रिपोर्ट के 15वें संस्करण के अनुसार, 25 मिलियन से ज्यादा बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि जनता शिक्षा पर 280 अरब रुपये खर्च कर रही है, जबकि सरकारी निवेश घटकर 220 अरब रुपये हो गया है। नतीजतन, शिक्षा का 56 प्रतिशत वित्तीय बोझ जनता उठा रही है और सिर्फ 44 प्रतिशत सरकार उठा रही है। माता-पिता प्राइवेट स्कूलों की फीस पर 1,31,0 अरब रुपये , कोचिंग और ट्यूशन पर 613 अरब रुपये और शिक्षा से जुड़े अन्य निजी खर्चों पर 878 अरब रुपये खर्च करने के लिए मजबूर हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज के कार्यकारी निदेश डॉ. सलमान हुमायूं ने कहा कि जब शिक्षा पर परिवारों का खर्च सरकारी निवेश से ज्यादा हो जाता है, तो यह एक गंभीर समानता संकट का संकेत देता है। विश्व बैंक की वरिष्ठ शिक्षा विशेषज्ञ अजा फारुख के अनुसार, प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता चलन इस बात का सबूत है कि परिवार सरकारी शिक्षा के दायरे से बाहर निकलना पसंद कर रहे हैं।
राज्य में सिविल सेवा के 140 पदों पर होगी नियुक्ति, अधिसूचना जारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश सरकार ने डब्ल्यूबीसीएस (पश्चिम बंगाल सिविल सेवा) अधिकारियों को बड़ी सौगात दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अधिकारियों से किया गया अपना वादा निभाते हुए राज्य में कुल 140 अतिरिक्त पदों के सृजन को मंजूरी दी है। इस संबंध में बुधवार को नवान्न से आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। राज्य के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव ने “राज्यपाल के आदेशानुसार” जारी अधिसूचना में बताया कि इस फैसले के तहत विशेष सचिव स्तर के 40 नए पद और संयुक्त सचिव स्तर के 100 नए पद बनाए गए हैं। नवान्न सूत्रों के अनुसार, इस निर्णय से डब्ल्यूबीसीएस (कार्यपालिका) अधिकारियों के एक बड़े वर्ग को पदोन्नति और वरिष्ठ प्रशासनिक जिम्मेदारियां मिलने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से अधिकारी संगठन अतिरिक्त पदों के सृजन की मांग कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि, डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर अपनी मांग रखी थी, जिस पर मुख्यमंत्री ने लिखित रूप से आश्वासन दिया था। विधानसभा चुनाव से पहले इस आश्वासन के अमल में आने को प्रशासनिक हलकों में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि वरिष्ठ पदों की संख्या बढ़ने से राज्य के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती मिलेगी और अनुभवी अधिकारियों की सेवाओं का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
मकर संक्रान्ति पर आयोजित हुई अंतरंग काव्य गोष्ठी
कोलकाता। साहित्य और संस्कृति की राजधानी कही जाने वाली कोलकाता नगरी में यूं तो संस्थाओं की कमी नहीं है जो नियमित कार्यक्रम करवाती रहती हैं, इसके अलावा कुछ ऐसे साहित्य प्रेमी भी रहे हैं जो अपने आवास पर इस तरह के आयोजन चुनिंदा साहित्यकारों को लेकर किया करते थे। इधर हाल के वर्षों में रचनाकार के संस्थापक सुरेश चौधरी अपने आवास पर ऐसे आयोजन करते रहते हैं। उर्वशी श्रीवास्तव ने सबसे पहले अपने बचपन से लेकर अब तक के साहित्यिक सफर पर चर्चा की और फिर काव्य की रसधार में सभी ने मकर स्नान किया, जिसमें शामिल रहे- सर्वश्री प्रमोद शाह नफ़ीस, सुरेश चौधरी, विमला पोद्दार,रावेल पुष्प, मृदुला कोठारी, वसुंधरा मिश्रा,रचना सरन अन्य। इस तरह के अंतरंग आयोजन ने मकर संक्रान्ति को यादगार बना दिया।
पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी में पुस्तक मित्र कार्यक्रम
कोलकाता । पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी, सूचना एवं संस्कृति विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार के तत्वाधान में शुक्रवार 16 जनवरी 2025 को “पुस्तक मित्र” कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। पुस्तक मित्र श्रृंखला की यह पंचम कड़ी थी जिसकी चयनित पुस्तक थी प्रसिद्ध कवि, लेखक और विचारक सुरेश चौधरी ‘इन्दु’ जी का शोधपरक संकलन “भ्रम और भ्रांतियाँ”।इस पुस्तक में अनेक ऐसी हिंदू परंपराओं, जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अंधविश्वास कहकर नकार देते हैं, उनसे संबंधित वैज्ञानिक तर्कों की व्याख्या और वर्षों से प्रसारित मिथकों की सत्यता भी आँकडों के साथ स्थापित की गई है।
पाठकों में पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा जागृत करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई इस श्रृंखला का संयोजन और संचालन अकादमी की सदस्य रचना सरन और शुभा चूड़ीवाल करती हैं।
रचना सरन ने सभी अतिथियों का स्वागत कर कार्यक्रम प्रारम्भ किया। शुभा चूड़ीवाल ने विशेषज्ञों और लेखक का परिचय देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट की। अकादमी के वरिष्ठ सदस्य रावेल पुष्प जी ने उत्तरीय और माला प्रदान कर अतिथियों का अभिनन्दन किया। कवि आलोक चौधरी ने सुरेश चौधरी जी द्वारा रचित जगदम्बा स्तुति प्रस्तुत की। डॉ. शिप्रा मिश्रा जी ,मीतू कनोडिया जी और प्रणति ठाकुर जी ने पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण अंशों का पाठ किया। विशेषज्ञ के रूप में डॉक्टर वसुंधरा मिश्र जी और डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय जी उपस्थित थीं। डॉ वसुंधरा मिश्रा ने कहा कि यदि हम सहस्त्र वर्षों की परंपराओं को सही तरीके से समझते, तो दृश्य भिन्न होता।संपूर्ण वांग्मय को गलत धारणाओं पर रखा गया है।पुस्तक के सभी अध्यायों पर उन्होंने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की बातें लिखना एक लेखक के लिए यह चुनौती भरा कार्य है । अपनी बात रखते हुए डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि इतिहास में उतना सत्य नहीं होता जितना साहित्य में क्योंकि इतिहास लिखवाया जाता है और साहित्य स्वयं लिखा जाता है। उन्होंने इस पुस्तक को समसामयिक मुद्दों के चिंतन -अचिंतन की गंभीर नोटबुक बताया और कहा कि यह पुस्तक भारतीयता की खोज है। लेखक सुरेश चौधरी ने अकादमी के प्रति आभार प्रकट करते हुए बताया कि इस पुस्तक को लिखने के लिए उन्होंने 7वर्ष तक शोध तथा तथ्यों की पुनः पुष्टि की। उन्होंने पुस्तक में संकलित तथ्यों के संदर्भों के बारे में भी जानकारी दी। दर्शकों ने बहुत रुचि के साथ इस कार्यक्रम को सुना और अपनी जिज्ञासाओं को लेखक के समक्ष रखा। उनके प्रश्नों का सुरेश चौधरी ने विस्तार से जवाब दिया। कार्यक्रम के अंत में रावेल पुष्प सर ने धन्यवाद ज्ञापित करके आने वाले कार्यक्रमों की घोषणा की। हिंदी अकादमी की इस अनोखी साहित्यिक श्रृंखला को सभी ने सराहा।
संवेदना से समाज की यात्रा है कविता कोठारी का काव्य संग्रह ‘प्रयाण’

विद्वानों का मानना है कि मानव हृदय अनंत रूपात्मक जगत के नाना रूपों और व्यापारों में भटकता रहता है लेकिन जब मनुष्य अहं की भावना का परित्याग करता है तो वहाँ विशुद्ध अनुभूति रह जाती है। तब वह मुक्त हृदय रह जाता है ।हृदय की इस मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। कहा गया है – कवि परिभूः स्वयंभू – कविता में सत्य शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। अनुभूति और अभिव्यक्ति इन दो आधार पर कविता टिकी होती है।
‘प्रयाण ‘केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि एक यात्रा है—संवेदना से समाज तक, शब्दों से मौन तक, और अनुभव से आत्मा तक। यह संग्रह उन भावनाओं को स्वर देता है, जो अक्सर हमारी भाषा में नहीं आ पातीं, लेकिन भीतर कहीं गहराई से हमें छूती हैं।
इस संग्रह की कविताएं निजी भी हैं और सामाजिक भी। कवयित्री इन दोनों के बीच की उस महीन रेखा पर खड़ी हैं, जहाँ एक स्त्री, एक मानव और एक संवेदनशील आत्मा अपने समय, समाज और अपने अंतर्मन से संवाद करती है। कुछ कविताएं सामाजिक विडंबनाओं पर टिप्पणी करती हैं, वहीं कुछ कविताएं पाठक के भीतर गूंज बनकर उतरती हैं—बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं।
यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए अनमोल है जो कविता को केवल पंक्तियों में नहीं, भावनाओं और परिवर्तन की प्रक्रिया में महसूस करना चाहते हैं। एक ऐसा साहित्यिक प्रयास है जो वर्तमान समय में सामाजिक यथार्थ और स्त्री-मन की जटिलताओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। यह संग्रह आधुनिक हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो एक शिक्षिका अपने बच्चों को सीख देते हुए उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाने के सपने देखती है।
विषयवस्तु की दृष्टि से देखा जाए तो वहां विविधता है—ध्यान योग, आत्म विश्वास, संकल्प, आत्मनिर्भरता की आकांक्षा, स्त्री अस्मिता की खोज, और सामाजिक चुप्पियों के विरुद्ध एक सशक्त स्वर। लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रत्येक कविता में पाठक को संवेदना से जोड़ने में सफल होती हैं। कहीं शब्दों के माध्यम से तो कहीं मौन के माध्यम से कविताएं में भाषा सौष्ठव, शिल्प कला और संवादात्मक प्रभाव है। यह शैली इस बात का प्रमाण है कि लेखक संवेदना को सहजता से बरतने में विश्वास रखती हैं, दिखावे से नहीं।उनकी कविताओं में दो आसमां(Pg-19) कविता समाज में व्याप्त असमानता को दर्शाती है , मनभावन सावन (पृष्ठ 42) में प्रकृति चित्रण और शिक्षक जीवन (पृष्ठ 52) में एक शिक्षिका होने के कारण शिक्षक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण लक्षित है, रंगमंच (पृष्ठ 89) में आध्यात्मिक स्वर आदि कविताएं पठनीय और प्रेरणादायक हैं ।’मनभावन सावन’ में कवयित्री के भावों को समझा जा सकता है जहांँ शब्दों की झनकार और प्रकृति का उल्लास उमड़ रहा है। वे कहती हैं – –
‘आया मनभावन सावन हर्षित धरती अंबर
तज जीर्ण पुरातन वसन नव नूतन परिधान किया धारण
सुंदर मनमोहक आनन खिला-खिला है नव यौवन
औढ़ धानी चूनर धरा करती श्रृंगार स्निग्ध मनोरम।
हाथों पर हरित हिना पुलकित गात हर्षे हिया
शोभित सकल कानन उपवन चहुदिश फैली हरीतिमा
झूमे श्यामल घनघोर घटा उतरे रिमझिम बैरन बदरा
होगा प्रिय से पुनर्मिलन दर्शन को तरसे अखियां। ‘
हमें ऐसे साहित्य को न केवल पढ़ना चाहिए, बल्कि उसका समर्थन भी करना चाहिए, ताकि संवेदना और सामाजिक चेतना की यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
कविता कोठारी द्वारा रचित ‘प्रयाण ‘काव्य संग्रह लिंक जॉन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित स्वरचित कविताओं का संग्रह है। 2025 में आए इस कविता संग्रह में कवयित्री कविता कोठारी का शब्दों का वह अंत: सफर है जिसमें उनके अविस्मरणीय अनुभव, एहसास और उनकी व्यक्तिगत सोच है ।उनकी चिंतन धारा में पिरोई शब्दों की मणिमला है जिसकी एक एक कविता रत्न जटित मणियाँ हैं ।
प्रयाण की 80 कविताओं में विविध रंगों के भाव और अनुभव हैं । सभी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है मानो बहुत दिनों बाद एक परिष्कृत हिंदी भाषा की कविताओं को पढ़ने का शुभ अवसर मिला।
आध्यात्मिक भाव और साथ में समसामयिक विषयों पर अपने शब्दों को भाव देते हुए कवयित्री बहुत ही सजग और चेतनता से परिपूर्ण है।
इन कविताओं की यात्रा का उद्देश्य है ‘व्यष्टि से समष्टि’ की ओर जाने का, सच्चिदानंद को प्राप्त करना। हमारा देश महावीर ,बुद्ध ,विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि महापुरुषों का का देश रहा है जहाँ विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का मंथन होता आया है और
सात्विक अतः चेतना ,आध्यात्मिकता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को महत्व दिया गया है ।इस सात्विक राह में मनुष्य शरीर भी अपनी शक्तियों को केंद्रित कर आत्मोद्धार करने में सक्षम हो सकता है, रचनाओं की ऐसी विशिष्टता दिखाई पड़ती है।
गीता में भी कहा गया है ‘आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरा- त्मन:’ (गीता अध्याय 6 ,श्लोक 5 ) अर्थात् मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु, जो व्यक्ति अंतरात्मा में ही सुख वाला होगा, आत्मा में ही रमन करने वाला होगा और जो आत्मा में ही ज्ञान वाला होता है, वह सच्चिदानंद परमात्मा के साथ एकाकी भाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त करता है ।(गीता अध्याय 5 , श्लोक 24 )
‘प्रयाण’ की कविताएं एक ऐसी उर्ध्वमुखी जीवन की कला से जुड़ी हुई है जो एक श्रेष्ठ और सुसंस्कृत नागरिक की रचना करने का संदेश देती है। बुद्ध ने कहा था ‘अप्प दीपो भव’ अपने दीपक स्वयं बनो ,अपने प्रकाश स्वयं बनो। व्यक्ति अपने ज्ञान और आंतरिक शक्ति से प्रकाशित हो सकता है ।
दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं ही अपना मार्गदर्शक और प्रकाश स्तंभ बन सकता है। आत्मनिर्भरता और आत्मज्ञान से परिपूर्ण कविताएं हैं जिन्हें पढ़कर पाठक अपने भीतर छिपी हुई क्षमता को उभार सकता है।
‘आओ बात करें’ कविता में कवयित्री कहती है-‘ एकांत और मौन से खोज लाएं ‘ मन की खुशी को ढूंढा जा सकता है।
कविता कोठारी एक मनोचिकित्सक भी हैं जो समाज के लोग जो मानसिक तनाव,चिंता आदि के शिकार हो रहे हैं ऐसे लोगों की कौंसिलिंग भी करती हैं।
वर्तमान में बच्चे, युवा, बूढ़े और महिलाओं की मानसिक स्थितियों में परिवर्तन आया है जिससे एकाकीपन,अवसाद और तनाव भरी जिंदगी से जुड़ी समस्या का हल भी बताती हैं।यह हल व्यक्ति के भीतर ही छिपा है।
बतौर शिक्षिका कविता कोठारी का आदेश इन कविताओं में कहीं न कहीं दिखाई पड़ ही जाता है।
‘मुक्ति का आह्वान'( पृष्ठ 40 )में–
‘स्व के दायरे से निकल
दे आहुति परमार्थ यज्ञ’ (पृष्ठ 40)।
‘सतयुग लौटा लाना है अब'( पृष्ठ 40)
कवयित्री ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, विश्वास घात, षड्यंत्र के बढ़ते प्रकोप से दुखित है। छल- कपट की इस राह पर चलकर मनुष्य अपनी कब्र खुद खोद रहा है और रसातल में जा रहा है( पृष्ठ 39)।
‘प्रयाण ‘का अर्थ ही है यात्रा शुरू करना ,आगे बढ़ना और यह आगे बढ़ाने की गति का प्रतीक है। उत्कृष्ट बुद्धि ,चमक और तरक्की का प्रतीक है ।ऐसा प्रयत्न जो सकारात्मक प्रगति के लिए इस्तेमाल होता है ।हिंदू दर्शन में आत्मा की यात्रा या उसके अंत को भी प्रयाण कहा जाता है लेकिन कवयित्री आशावादी है और सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयाण का उपयोग किया गया है।
व्यक्तियों के अंतःकरण में जो समाज चेतना है उसी चेतना के धरातल पर ही विभिन्न अनुभूतियांं व्यक्ति के अंतःकरण का धर्म होकर समाज का धर्म बन जाती है।
कवयित्री की कविता का आरंभ ही हुआ है ‘सुसंस्कार’ शीर्षक से जो उनके भावों की यात्रा को सुनिश्चित कर देती है ।उनका कहना है कि –
अनुशासित ,संयमित जीवन,
सफलता का है अचूक मंत्र …
करुणा और विनम्रता से होगा
उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण (पृष्ठ 11 -12)
कवयित्री कविता कोठारी एक सजग और चेतनता से पूर्ण शिक्षिका रही हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप उनकी कविताएं अपना आकार लेती हैं। आपकी कविताओं को नैतिक ,सामाजिक और आध्यात्मिक एवं भाषा शिल्प सौष्ठव की दृष्टि से देखा जा सकता है।
सुंदरता को रेखांकित करते हुए बहुत ही अच्छा संदेश देती हैं– सुंदरता की परिभाषा में—
बाह्य सौंदर्य होता भ्रामक ..
वास्तविक सौंदर्य है प्राण तत्व
सत्य शिव और सुंदर जीवन धारा
उम्र छलावा (पृष्ठ 13 )
‘न खोओ परमार्थ में ‘अहंकार, आलस्य, विषय विलास, परनिंदा आदि कलुषित विचारों से दूर एक आत्मा शुद्ध व्यक्ति की मांग करती हैं।
अंतर चक्षु, अंतर सफर, यादों से मुलाकात, परमार्थ आदि कविताएं ध्यान और अपने व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक कविताएं हैं।
कविता ‘आओ बात करें’ (पृष्ठ60 ) में उनकी यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है — जहां कवियत्री ‘सकारात्मक ऊर्जा ,आत्म शक्ति से भर लें’ कह कर मानो अपनी सभी कविताओं का सार कह देती है। ‘ध्यान योग’ पर जोर देखकर अपने ही अंदर के आनंद को खोजने की बात करती है।
उनकी कविताओं में मुक्ताकाश, गर्भ संस्कार ,मुझसे ही मेरा जन्म हुआ, जीवन का आधार विश्वास ,चलो लौट चलें, विकृत दर्पण और संबंध नहीं ,स्वधर्म है मां आदि कविताएं भावों को व्यक्त करने वाली और पठनीय कविताएँ भी हैं।
भाषा में छायावादी पुट और विशुद्ध हिंदी की रचनात्मक झलकियाँ दिखाई पड़ती हैं । जीवन जीने की कला सिखाती इन कविताओं में जैन धर्म, बौद्ध धर्म और भगवद्गीता की बहुत सी बातें परिलक्षित होती हैं।
क्विक कॉमर्स की दस मिनट वाली डिलिवरी पर लगी सरकारी रोक
– ब्लिंकिट ने हटाई 10 मिनट की डिलीवरी
नयी दिल्ली । सरकार ने क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म की 10 मिनट की डिलीवरी पर रोक लगा दी है। इस जेप्टो, ब्लिंकिट, स्विगी आदि जैसे प्लेटफार्म 10 मिनट में डिलीवरी नहीं दे पाएंगे। श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने इस सर्विस पर रोक लगाई। यह मामला हैदराबाद में सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक शख्स की मौत से जुड़ा है। जेप्टो ने उस शख्स को अपना कर्मचारी नहीं बताया था। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने प्रमुख डिलीवरी एग्रीगेटर्स के साथ इस मामले में बात की। अंत में उन्होंने 10 मिनट की डिलीवरी की समय सीमा को हटाने के लिए राजी कर लिया। डिलीवरी की समय सीमा से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो और स्विगी सहित प्रमुख प्लेटफार्मों के साथ एक बैठक आयोजित की गई थी। सूत्रों के अनुसार, ब्लिंकिट ने पहले ही निर्देश पर कार्रवाई की है और अपनी ब्रांडिंग से 10 मिनट की डिलीवरी का वादा हटा दिया है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अन्य एग्रीगेटर भी इसी राह पर चलेंगे। इस कदम का उद्देश्य गिग वर्कर्स (अस्थायी या फ्रीलांस काम करने वाले) की सुरक्षा, संरक्षा और काम करने की बेहतर स्थिति सुनिश्चित करना है। हाल के संसद सत्र में आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भारत के गिग वर्कर्स की परेशानियों के बारे में आवाज उठाई थी। उन्होंने क्विक कॉमर्स और अन्य ऐप-आधारित डिलीवरी और सेवा व्यवसायों के लिए नियमों की मांग की थी। साथ ही गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों की आवश्यकता पर जोर दिया था। संसद में अपने हस्तक्षेप में राज्यसभा सदस्य ने गिग वर्कर्स के लिए गरिमा, सुरक्षा और उचित वेतन की मांग की।
वयोवृद्धों के लिए बिहार में आसान हुई जमीन व फ्लैट की रजिस्ट्री
पटना। बिहार में 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को बड़ी राहत देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जमीन और फ्लैट की रजिस्ट्री प्रक्रिया को आसान बनाने के निर्देश जारी किए हैं। अब वृद्धजनों को घर बैठे निबंधन की सुविधा मिलेगी, जिससे उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर जानकारी दी कि सात निश्चय-3 के सातवें निश्चय ‘सबका सम्मान–जीवन आसान’ के तहत 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों के लिए जमीन और फ्लैट के निबंधन की प्रक्रिया को सरल किया जा रहा है। इसके तहत अब घर पर ही निबंधन से जुड़ी सभी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि अक्सर यह देखा गया है कि 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों को जमीन या फ्लैट की रजिस्ट्री से जुड़े कार्यों के निष्पादन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग द्वारा चलंत निबंधन इकाई के माध्यम से निश्चित समय-सीमा के भीतर घर पर ही दस्तावेजों के निबंधन की सुविधा प्रदान की जाएगी। इसके लिए आवेदक ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। मुख्यमंत्री ने बताया कि इन सभी व्यवस्थाओं को 01 अप्रैल 2026 से लागू करने का निर्देश संबंधित विभागों के अधिकारियों को दिया गया है।





