Monday, January 26, 2026
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बंगाल से प्रसेनजीत समेत 11 लोगों को पद्म पुरस्कार

कोलकाता । गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं की सूची जारी की गयी है। देशभर के कुल 131 लोगों को यह सम्मान प्रदान किया जाने वाला है जिसमें से 11 दिग्गज पश्चिम बंगाल से हैं। इस साल जितने लोगों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा उनमें से पद्मविभूषण और पद्मभूषण पुरस्कारों की सूची में पश्चिम बंगाल से किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं है।लेकिन इस साल 11 बंगाल वासियों को पद्मश्री पुरस्कार मिलने वाला है। इनमें से एक नाम जो इस समय सोशल मीडिया पर वायरल भी हो चुका है, वह है ‘बुम्बादा’ यानी प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय।इसके अलावा जिन 11 दिग्गजों को पद्मश्री पुरस्कार मिलने वाले हैं, उनमें शामिल हैं – अशोक कुमार हल्दार (साहित्य और शिक्षा), गंभीर सिंह योनजून (साहित्य और शिक्षा), हरिमाधव मुखर्जी (मरणोपरंत) (शिल्पकला), ज्योतिष देवनाथ (शिल्पकला), कुमार बोस (शिल्पकला), महेंद्रनाथ राय (साहित्य और शिक्षा),प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय (शिल्पकला), रविलाल टुडू (साहित्य और शिक्षा), सरोज मंडल (मेडिसिन, तरुण भट्टाचार्य (शिल्पकला), तृप्ति मुखर्जी (शिल्पकला)
बता दें, संथाली साहित्य में अपने योगदान की वजह से कालना के बादला नोआरा निवासी रविलाल टुडू को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। वर्ष 2022 में उन्हें पश्चिम बंगाल सरकार ने बंगभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया था। वहीं पिछले करीब 4 दशकों से बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय रहे प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। इस साल पद्म पुरस्कारों की सूची में 5 लोगों को पद्म विभूषण सम्मान भी मिलेगा। 13 लोगों को पद्म भूषण सम्मान मिलेगा लेकिन इन दोनों पद्म पुरस्कारों के प्राप्तकर्ताओं की सूची में बंगाल के कोई व्यक्ति शामिल नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली का दिल्ली में निधन

नयी दिल्ली। ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (बीबीसी) के वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली का रविवार को निधन हो गया। वह लगभग 90 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती टुली के निधन की उनके करीबी मित्र और पत्रकार सतीश जैकब ने पुष्टि की। मार्क टुली का जन्म 24 अक्टूबर 1935 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने बीबीसी में लंबा कार्यकाल बिताया और करीब 22 वर्षों तक नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख रहे। स्वतंत्र पत्रकारिता में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। टुली ने भारत से जुड़ी अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को कवर किया, जिनमें प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का अंतिम संस्कार, इंदिरा गांधी के साक्षात्कार, ऑपरेशन ब्लू स्टार, राजीव गांधी की हत्या और अयोध्या विवाद शामिल हैं। लेखक और प्रसारक के रूप में भी टुली ने इंडिया इन स्लो मोशन, नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया और द हार्ट ऑफ इंडिया जैसी चर्चित पुस्तकें लिखीं। बीबीसी रेडियो के कार्यक्रम समथिंग अंडरस्टुड के प्रस्तुतकर्ता के रूप में उन्होंने समाज, आस्था और मानवीय मूल्यों पर गहन चर्चा की। वह शेख मुजीबुर रहमान का साक्षात्कार लेने वाले शुरुआती पत्रकारों में रहे और 1977 में भारत लौटकर कई बार इंदिरा गांधी का साक्षात्कार किया। उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले जरनैल सिंह भिंडरावाले से बातचीत की और बाद में एसजीपीसी प्रमुख गुरचरण सिंह तोहरा का भी इंटरव्यू लिया। उन्होंने राजीव गांधी की हत्या, नरसिम्हा राव युग का आगमन और 1992 में अयोध्या विवादित ढांचा विध्वंस जैसी घटनाओं को रोडियो पर प्रस्तुत किया। टुली ने ‘अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल’, ‘द हार्ट ऑफ इंडिया’ और ‘इंडिया: द रोड अहेड’ जैसी पुस्तकें लिखीं और कई डॉक्यूमेंट्री भी बनाई। उनके योगदान के लिए उन्हें 2002 में ब्रिटेन सरकार ने नाइटहुड की उपाधि दी, जबकि भारत सरकार ने 2005 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

धर्मेंद्र व केरल के पूर्व सीएम वीएस अच्युतानंदन को मरणोपरान्त पद्म विभूषण

-रोहित शर्मा, हरमनप्रीत, प्रसेनजीत को मिलेगा पद्मश्री
नयी दिल्ली । केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कार 2026 की घोषणा कर दी है, जिसमें अभिनेता धर्मेंद्र और पूर्व सीएम वीएस अच्युतानंदन (मरणोपरांत) सहित पांच हस्तियों को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। खेल जगत में, क्रिकेटर रोहित शर्मा और हरमनप्रीत कौर को उनके योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार मिला है। गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘पद्म पुरस्कारों’ की घोषणा कर दी है। इस साल बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीएस अच्युतानंदन सहित पांच प्रतिष्ठित हस्तियों को देश का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्म विभूषण दिया गया है। इस वर्ष देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान, पद्म विभूषण, पांच विशिष्ट हस्तियों को प्रदान किया गया है, जिन्होंने कला, साहित्य और सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान दिया है। मनोरंजन जगत के दिग्गज और बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र को कला (सिनेमा) के क्षेत्र में उनके शानदार करियर के लिए यह सम्मान मिला है। सार्वजनिक मामलों में उनके महत्वपूर्ण कार्यों के लिए केरल के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीएस अच्युतानंदन (मरणोपरांत) और केटी थॉमस को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया है। इनके अलावा, शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाली मशहूर वायलिन वादक एन राजम को कला के क्षेत्र में और पी नारायणन को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट सेवा के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। पद्म भूषण पाने वालों में महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, विज्ञापन जगत के दिग्गज दिवंगत पीयूष पांडे, मशहूर बैंकर उदय कोटक, और भाजपा नेता वीके मल्होत्रा शामिल हैं। साथ ही, मनोरंजन जगत से मलयालम सुपरस्टार ममूटी और लोकप्रिय गायिका अलका याग्निक को भी इस सम्मान से नवाजा गया है। खेल और शिक्षा जगत के कई सितारों को इस साल पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया है। खेल की दुनिया में भारतीय क्रिकेट का गौरव बढ़ाने वाले दो बड़े नामों पुरुष टीम के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा और महिला टीम की वर्तमान कप्तान हरमनप्रीत कौर भुल्लर को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है। इनके साथ ही भारतीय महिला हॉकी टीम की गोलकीपर सविता पूनिया को भी खेल में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। मनोरंजन जगत की बात करें तो दिग्गज अभिनेता सतीश शाह (मरणोपरांत) और टॉलीवुड के मशहूर अभिनेता प्रसेनजीत चटर्जी को यह सम्मान दिया गया है। वहीं, शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले यूजीसी के अध्यक्ष और जेएनयू के पूर्व कुलपति मामिडाला जगदीश कुमार को भी पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। इस साल की सूची में कुल 19 महिलाएं शामिल हैं, जबकि 16 लोगों को यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है। सूची में 6 विदेशी प्राप्तकर्ता भी शामिल हैं। ये पुरस्कार हर साल राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं।

15 साल बाद कोलकाता मेट्रो में शुरू हुई रिटर्न टिकट की व्यवस्था

-एक ही बार में खरीदें आने-जाने का टिकट
कोलकाता । मेट्रो में किसी समय यात्री आने और जाने दोनों तरफ का टिकट बुक कर सकते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे लोकल ट्रेनों में होता है। लेकिन बाद में इस व्यवस्था को हटा दिया गया। अब एक बार फिर से कोलकाता मेट्रो लगभग 15 सालों बाद रिटर्न टिकट खरीदने की व्यवस्था को शुरू करने जा रहा है। इस बारे में कोलकाता मेट्रो के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी एसएस कन्नान ने कहा कि हम प्रयोगात्मक रूप से रिटर्न टिकट की व्यवस्था को शुरू कर रहे हैं। एक बार यात्री टिकट खरीदकर उसे एंट्री गेट पर स्कैन कर अंदर जाने के बाद वापसी की यात्रा के समय उन्हें फिर से टिकट बुक करने की जरूरत नहीं होगी। सीधे एंट्री गेट पर टिकट को स्कैन कर वापसी की यात्रा के लिए अंदर जा सकेंगे। उन्होंने बताया कि जो यात्री वापसी की यात्रा के लिए रिटर्न टिकट बुक करेंगे उन्हें अपना टिकट संभाल कर रखना होगा। बताया जाता है कि मेट्रो रेल में रिटर्न टिकट की सेवा को शुरू कर दिया गया है। बताया जाता है कि पांचों रुट पर ही रिटर्न टिकट की सुविधा उपलब्ध है। गौरतलब है कि 1 अगस्त 2011 से कोलकाता मेट्रो में रिटर्न टिकट की व्यवस्था को बंद कर दिया गया था। उस दिन से टोकन सिस्टम को शुरू किया गया था। इस सुविधा की वजह से जिन यात्रियों के पास मेट्रो का स्मार्ट कार्ड नहीं होता है, उन्हें आते और जाते दोनों समय ही टिकट काउंटर की लाइन में खड़े होकर अपना समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं होगी। यात्रियों में सिंगल टिकट व्यवस्था को लेकर काफी नाराजगी देखी जा रही थी। रिटर्न टिकट बुकिंग व्यवस्था को फिर से शुरू करने की मांग पिछले लंबे समय से यात्री कर रहे थे। एक अन्य समस्या भी हो रही थी। कोलकाता मेट्रो का न्यूनतम किराया ₹5 है। इसके अलावा कोलकाता मेट्रो के किराए का स्लैब 15, 25 और 35 रुपए का भी है। जिस वजह से खुदरा रुपये की समस्या भी शुरू हो जाती थी। अक्सर काउंटर पर कार्यरत कर्मचारियों के साथ यात्रियों की खुदरा को लेकर बहस होती रहती थी। इन बातों को ध्यान में रखते हुए ही कोलकाता मेट्रो प्रबंधन ने फिर से रिटर्न टिकट बुकिंग व्यवस्था को शुरू करने का फैसला लिया।

जब नेताजी ने अंग्रेजों से लड़कर किया मां सरस्वती की पूजा का आयोजन

सरस्वती पूजा भी है और भारत माता के सपूत महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संग्रामी नेताजी का जन्मदिन भी है। यह तस्वीर एक ऐतिहासिक तस्वीर है। 20वीं सदी के दूसरे दशक में, कोलकाता के सिटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने मांग की थी कि वे अपने कॉलेज में सरस्वती पूजा बड़े धूमधाम से मनाना चाहते हैं। लेकिन कॉलेज मैनेजमेंट से उन्हें अनुमति नहीं मिली। वजह कुछ और नहीं थी, इस कॉलेज के मैनेजमेंट के सभी सदस्य ब्रह्म समाज से थे, इनलोगों में मूर्ति पूजा का निषेध था। इस पर बड़ा हंगामा शुरू हो गया। नेताजी उस समय एक उभरते हुए नेता थे, उन्होंने बहुत कम उम्र में काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। सिटी कॉलेज के स्टूडेंट्स उनके पास गए और उनसे इस मामले में दखल देने का अनुरोध किया। नेताजी ने अलग-अलग तरह की पूजाओं के लिए छोटे-बड़े कई आंदोलनों का सूत्रपात भी किया था। सिटी कॉलेज की घटना के बाद नेताजी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच व्यक्तिगत रिश्ते बहुत खराब हो गए थे क्योंकि रवींद्रनाथ ने भी मैनेजमेंट का ही साथ दिया था। उस समय बहुत से बंगाली समाज के लोगों को भी इस घटना से काफी कष्ट हुआ था। बाध्य होकर नेताजी को कॉलेज परिसर के बाहर ही व्यापक स्तर पर सरस्वती पूजा का आयोजन करना पड़ा था।
बाद में, बेशक, नेताजी और रवींद्रनाथ के बीच पिता-पुत्र जैसा अटूट रिश्ता बन गया , लेकिन यह एक अलग कहानी है।जब नेताजी जेल में थे, उस समय भी कोई पूजा होती तो वे ब्रिटिश अधिकारियों को जेल में उस पूजा का आयोजन करने के लिए बाध्य कर देते थे। यहाँ तक कि सबसे आखिर में, जब उन्हें जेल भेजा गया, तो उन्होंने दुर्गा पूजा करने के अनुरोध के साथ आंदोलन भी किया था। इसके लिए वे जानलेवा भूख हड़ताल भी शुरू किए थे।

(जानकारी साभार – डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी)

पुरोहित के बिना एआई से हुई सरस्वती पूजा

उत्तर 24 परगना। फूलों की डालियां सज चुकी थीं, फल काटे जा चुके थे और आल्पना (द्वार सजाने) का काम जारी था। पीले वस्त्रों में सजे कचिकांचों के बीच धूप-धुना जलाकर पूजा शुरू करने की तैयारी पूरी थी, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी पुरोहित की तलाश शुरू हुई। तभी सामने आया एक नया और चौंकाने वाला समाधान—कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)।
बनगांव के सुभाषपल्ली निवासी सुषोभन घोष की पहल पर इस वर्ष सरस्वती पूजा पारंपरिक पुरोहित के बिना, एआई की मदद से संपन्न हुई। मोबाइल फोन के माध्यम से एआई द्वारा शुद्ध संस्कृत मंत्रों का उच्चारण कराया गया, जिसे सुनकर परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों ने एक साथ मंत्रोच्चारण कर पूजा पूरी की। शुशोभन घोष ने बताया कि पुरोहित के इंतजार की समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने यह प्रयोग किया। एआई की मदद से मंत्रों को पंचांग के अनुसार जांचा गया और सही विधि से पूजा संपन्न की गई। उन्होंने कहा कि आज हर किसी के पास मोबाइल और इंटरनेट है। सोचा, क्यों न एआई का इस्तेमाल कर देखा जाए। एआई ने पंचांग के नियमों के अनुसार पूरे मंत्र संस्कृत में पढ़े, जिससे हमलोग आसानी से पूजा कर सके। इस अनोखी पूजा में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाओं ने भी संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि एआई की सहायता से मंत्र और विधि समझकर पूजा करने से उन्हें मानसिक तृप्ति मिली। हालांकि इस घटना को लेकर पुरोहित समाज में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कुछ लोगों ने इसे भविष्य में पेशे पर असर डालने वाला बताया। वहीं, कई का मानना है कि एआई को सहायक के रूप में अपनाया जा सकता है, न कि पूर्ण विकल्प के तौर पर।
विद्या और बुद्धि की देवी की पूजा में एआई के इस प्रयोग ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में मानव जीवन के साथ-साथ धार्मिक परंपराओं में भी तकनीक की भूमिका और बढ़ सकती है।

हावड़ा में 103 वर्षों से जारी है मां सरस्वती की अखंड साधना

-आज भी कायम ब्रिटिश कालीन रीत

हावड़ा। हावड़ा के पंचाननतला की संकरी गलियों में स्थित देवी सरस्वती का शताब्दी प्राचीन मंदिर श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत एक उत्कृष्ट परंपरा का वाहक बना हुआ है। एक नंबर उमेश चंद्र दास लेन स्थित यह सरस्वती मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला के साथ साथ 103 साल पुरानी अटूट परंपरा के लिए भी जाना जाता है।

इस मंदिर की नींव 28 जून, 1923 को रखी गई थी। ब्रिटिश शासनकाल से ही यहां विद्या की देवी मां सरस्वती की नित्य पूजा का विधान चला आ रहा है। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, इसे बंगाल के सबसे प्राचीन सरस्वती मंदिरों में से एक माना जाता है। मंदिर का नाम हावड़ा जिला स्कूल के पूर्व प्रधानाध्यापक उमेश चंद्र दास के नाम पर है। मंदिर में प्रतिष्ठित मां सरस्वती की चार फुट ऊंची प्रतिमा श्वेत पत्थर से निर्मित है, जिसे उमेश चंद्र दास के पुत्र रणेश चंद्र दास ने विशेष रूप से जयपुर से मंगवाया था। हंस पर विराजमान और हाथ में वीणा धारण किए हुए मां ‘महाश्वेता’ का यह रूप अत्यंत मनमोहक है।

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा ‘108 मिट्टी के पात्र’ हैं। सरस्वती पूजा के दिन देवी को 108 मिट्टी के सकोरों में बताशा और फल अर्पित किए जाते हैं। मंदिर के स्थापना काल से शुरू हुई यह रीत आज एक सदी बाद भी अपरिवर्तित है। वसंत पंचमी के अवसर पर पूरे मंदिर को बसंती रंग की आभा से सजाया जाता है, जहां छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का तांता लगा रहता है।

कोलकाता में वायु प्रदूषण पर निगम की पहल काफी नहीं, मानते हैं पर्यावरणविद्

कोलकाता। कोलकाता में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए कोलकाता नगर निगम (केएमसी) द्वारा उठाए गए कदमों को पर्यावरणविदों ने अपर्याप्त करार दिया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा प्रदूषण के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिए जाने के एक दिन बाद मेयर फिरहाद हकीम ने शहर के सभी थानों और ट्रैफिक गार्ड को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया था। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रयास “बहुत कम और बहुत देर से” किए गए हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि कोलकाता लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है, लेकिन कई आवश्यक उपायों को अब तक सख्ती से लागू नहीं किया गया। बुधवार को मेयर फिरहाद हकीम ने नगर निगम मुख्यालय में एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें पर्यावरण विभाग और उद्यान विभाग के प्रभारी मेयर-इन-काउंसिल सदस्य, कोलकाता पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी तथा विभिन्न सरकारी और निजी एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। हालांकि, निगम सूत्रों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण बैठक में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। बैठक में मेयर ने खुले में आग जलाने, वाहनों से निकलने वाले धुएं, सूखी पत्तियों और लकड़ी जलाने जैसी गतिविधियों पर सख्ती से नियंत्रण के निर्देश दिए। उन्होंने निर्माण स्थलों को घेरने, धूल अधिक उडऩे वाले इलाकों में नियमित रूप से पानी का छिडक़ाव करने और निर्माण कार्यों से उत्पन्न मलबे को सडक़ों पर जमा न होने देने पर भी जोर दिया। मेयर ने विक्टोरिया मेमोरियल के आसपास रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) के निर्माण कार्यों के दौरान धूल नियंत्रण के लिए विशेष सतर्कता बरतने को कहा। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि मेट्रो निर्माण स्थलों को हरे जाल (ग्रीन नेट) से ढका जाएगा और पर्याप्त पानी का छिडक़ाव अनिवार्य होगा। पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों, खासकर काला धुआं छोडऩे वाले डीजल वाहनों पर निगरानी बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए। मेयर ने कहा कि सडक़ों पर पड़े निर्माण मलबे को तेजी से हटाने के लिए विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी निर्माण स्थल पर नियमों का पालन नहीं किया गया तो कार्य रोक दिया जाएगा। इसके अलावा, शहर के विभिन्न हिस्सों में, खासकर सडक़ों पर, दिन में कम से कम 16 घंटे दो पालियों में स्प्रिंकलर और मिस्ट कैनन के जरिए पानी का छिडक़ाव किया जाएगा। पर्यावरणविद और ग्रीन टेक्नोलॉजिस्ट सोमेंद्र मोहन घोष ने कहा कि कोलकाता के लिए खराब वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) की स्थिति में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) को तत्काल लागू करना समय की मांग है। उन्होंने बताया कि डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं, कचरा जलाना और निर्माण से उडऩे वाली धूल शहर में प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। जनवरी 2026 में कोलकाता में एक्यूआई 314 तक पहुंचने की बात भी सामने आई है, जो गंभीर श्रेणी में आता है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि दक्षिण कोलकाता के पर्यावरण-संवेदनशील रवींद्र सरोवर क्षेत्र में झील के किनारे खुले कचरा डंप से विषैले धूल कण हवा में फैल रहे हैं। साथ ही, सडक़ किनारे ठेलों और दुकानों में स्वच्छ ईंधन जैसे एलपीजी या विद्युत और सौर ऊर्जा आधारित उपकरणों के उपयोग पर जोर दिया गया। विक्टोरिया मेमोरियल जैसे ईको-सेंसिटिव जोन में डीजल वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने की भी मांग की गई। गौरतलब है कि, 19 जनवरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल, विशेषकर कोलकाता में बढ़ते प्रदूषण पर स्वत: संज्ञान लिया था। इस मामले में एक स्वत: जनहित याचिका दर्ज की गई है, जिसे पहले से दायर दो अन्य जनहित याचिकाओं के साथ जोड़ा गया है। इस पर अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।

एसएससी ने जारी की उच्च माध्यमिक शिक्षकों की अंतिम मेधा सूची

कोलकाता । पश्चिम बंगाल के हजारों शिक्षित युवाओं के लंबे समय से चले आ रहे इंतज़ार का अंत करते हुए स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) ने बुधवार देर शाम उच्च माध्यमिक (कक्षा 11वीं–12वीं) के लिए शिक्षक नियुक्ति की अंतिम मेधा सूची जारी कर दी। आयोग के अनुसार, इस सूची में कुल लगभग 18 हजार 900 अभ्यर्थियों के नाम शामिल हैं, जिनमें से 12 हजार 445 रिक्त पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। आयोग ने इस बार नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतते हुए पैनल, प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) के साथ-साथ असफल अभ्यर्थियों की सूची भी सार्वजनिक की है। उल्लेखनीय है कि 11वीं–12वीं श्रेणी के 35 विषयों में कुल 12 हजार 445 रिक्तियां घोषित की गई थीं। इस नियुक्ति प्रक्रिया के तहत पहले चरण में 19 हजार 921 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था। बाद में उच्च न्यायालय के निर्देश पर 156 अन्य अभ्यर्थियों को भी दस्तावेज़ सत्यापन के लिए आमंत्रित किया गया। इस प्रकार कुल 20 हजार 077 अभ्यर्थी इस प्रक्रिया में शामिल हुए। दस्तावेज़ सत्यापन की प्रक्रिया 18 नवंबर से चार दिसंबर तक चली। दस्तावेज़ सत्यापन के दौरान 1 हजार 287 अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई। आयोग सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य कारण आयु सीमा, जाति प्रमाण पत्र और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित विसंगतियां रहीं। इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार कक्षा नौवीं–दसवीं और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्ति में अनियमितताओं के कारण ‘दागी’ करार दिए गए 269 अभ्यर्थियों को भी सूची से बाहर किया गया है। साक्षात्कार के पश्चात 303 अन्य अभ्यर्थियों के नाम भी हटाए गए हैं। अब अभ्यर्थियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्ति के लिए परामर्श (काउंसलिंग) प्रक्रिया कब से शुरू होगी। आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गुरुवार से सोमवार तक राजकीय अवकाश है। ऐसे में 27 जनवरी, मंगलवार को कार्यालय खुलने के बाद ही परामर्श तिथियों की आधिकारिक घोषणा की जाएगी। हालांकि, विकास भवन के सूत्रों का संकेत है कि आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इसी माह के अंत तक काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। गौरतलब है कि तीन अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राज्य में लगभग 26 हजार शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं। इसके बाद नए सिरे से परीक्षा और चयन प्रक्रिया शुरू की गई। वर्तमान सूची को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। कई अभ्यर्थियों का आरोप है कि ‘योग्य’ और ‘कार्यरत’ शिक्षकों को अनुभव के 10 अंक दिए जाने के बावजूद अनेक पात्र उम्मीदवार अंतिम सूची से बाहर रह गए हैं या उन्हें प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया है।

नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करती है ‘वसंतपंचमी’

वसंतपंचमी (२३ जनवरी) पर विशेष

-आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वसंत ऋतु की मस्ती और उल्लास के क्षण में वसंतपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मानव-हृदय मे नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करता है। सरस्वती की आराधना इस पर्व की विशेषता है। वस्तुत: सरस्वती ‘कला’ और ‘साहित्य’ की देवी हैं, जिनका भारतीय संस्कृति में शीर्ष स्थान है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में सरस्वती ‘नागेश्वरी’, ‘भारती’, ‘शारदा’, ‘हंसवाहिनी’, ‘वीणावादिनी’ इत्यादिक नामों से विश्रुत हैं तथा अत्यन्त विस्तारपूर्वक उनकी महिमा का वर्णन भी किया गया है। इसी आधार पर देश के विभिन्न भू-भागों में वसंतपंचमी के अलौकिक अवसर पर माँ शारदा का अर्चन-पूजन-स्तवन अतीव श्रद्धापूर्वक किया जाता है। वसंतपंचमी का पर्व भगवती सरस्वती को समर्पित रहता है।
अब आइए! ‘वसंतपंचमी’ का व्याकरणिक ज्ञान प्राप्त करें। वसंतपंचमी में दो शब्द हैं :– ‘वसंत’ और ‘पंचमी’। हम पहले ‘वसंत’ शब्द को समझेँगे। यह ‘वस्’ धातु का शब्द है, जिसमे ‘झच्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इस प्रकार ‘वसंत’ शब्द का सर्जन होता है। हेमन्त और ग्रीष्म के मध्य की ऋतु ‘वसंत’ है। अब समझते हैं, ‘पंचमी’ को। पंचम शब्द मे ‘ङीष्’ प्रत्यय के जुड़ने से ‘पंचमी’ शब्द की रचना होती है। चान्द्रमास के प्रत्येक पक्ष की पाँचवीं तिथि ‘पंचमी’ कहलाती है। इस प्रकार ‘वसंतपंचमी’ का अर्थ हुआ- ‘माघमास की शुक्लपंचमी’। इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहा गया है। यदि आप ‘वसंतपंचमी’ को अलग-अलग करके ‘वसंत पंचमी’ लिखते हैं तो आपका लेखन अशुद्ध माना जायेगा। आप इसे शुद्धतापूर्वक दो प्रकार से लिख सकते हैं :– (१) वसंतपंचमी (२) वसंत-पंचमी।
‘वसंतपंचमी’ पर्व-आयोजन के मूल में एक मोहक कथा है। आप भी श्रवण करें :–
जब सृष्टि का आरम्भ होने का समय आ गया था तब भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को अपने पास बुलाया और उन्हें आदेश किया था- आप मनुष्य-योनि की रचना आरम्भ करें। ब्रह्मा ने भगवान् विष्णु का आदेश ग्रहण करने के पश्चात् मनुष्य-योनि की रचना की थी; परन्तु ब्रह्मा अपनी उस रचना से संतुष्ट नहीं थे। वे भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और उनसे पुन: रचना करने के लिए अनुमति माँगी थी। विष्णु ने अपनी अनुमति दे दी थी। वे अपने लोक ‘ब्रह्मलोक’ लौट आये। अब वे सृष्टिरचना-प्रक्रिया से जुड़ गये। उन्होंने अपने कमण्डल से जल निकालकर उसे पृथ्वी पर छिड़क दिया था, जिसके कारण पृथ्वी में प्रतिक्रिया होने लगी, फलस्वरूप पृथ्वी पर कम्पन होने लगा तथा देखते-ही-देखते, एक अद्भुत शक्ति प्रकट हो गयी, जिसकी चार भुजाएँ थीं, जो सुदर्शना थी। उस चतुर्भुजी देवी के एक हाथ में वीणा और दूजा हाथ वर देने की मुद्रा में था। उनके अन्य दो हाथों में पुस्तक और माला थी। उस चतुर्भुजी देवी ने अपने प्रकट होते ही वीणा का सुमधुर झंकार किया था, जिससे संसार के समस्त जीवधारियों को वाणी प्राप्त हो गयी थी। उस प्रभाव का अनुभव करते ही, ब्रह्मा ने उस देवी का ‘वाक्देवी’/’वाग्देवी’/’वाणी की देवी सरस्वती’ का नामकरण किया था।
माँ सरस्वती की सर्वप्रथम आराधना करके ‘सरस्वती-पूजन’ का समारम्भ श्री कृष्ण ने किया था। इसके लिए सिर पर मुकुट, गले में वैजयन्तीमाला, हाथों में मुरली धारण करते हुए, उन्होंने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की अभ्यर्थना की थी।
‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ के ‘प्रकृति- खण्ड’ में कहा गया है कि श्री कृष्ण द्वारा पूजित होने पर माँ सरस्वती समस्त लोक मे सबके द्वारा पूजी जायेंगी। इसी अवसर पर श्री कृष्ण ने सरस्वती को यह वर दिया था– हे सरस्वती! अब तुम्हारी पूजा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक माघमास की शुक्लपंचमी की तिथि से समारम्भ हो जायेगी, जो यही विद्यारम्भ की तिथि भी कहलायेगी।
वास्तव में, सरस्वती जलदेवी हैं। सरस्वती नदी के नाम पर ही उनका उल्लेख किया जाता है। उनका जल हिमालय से निर्गत होता है, जो दक्षिण-पूर्व प्रवहमानता के साथ तीर्थराज प्रयाग-स्थित गंगा-यमुना के साथ संगम कर, ‘त्रिवेणी’ के नाम से अभिहित होने लगता है। सरस्वती को ‘वाग्देवी’ और ‘ज्ञानदेवी’ की संज्ञा से भी विभूषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल में इसी सारस्वत अवसर पर गुरुकुलों और आश्रमों के स्नातकों के ‘दीक्षान्त-समारोह’ आयोजित किये जाते थे।
वसंत को ‘ऋतुराज’ भी कहा जाता है। यों तो सिद्धान्तत: वसंत ऋतु तीन महीने की होती है; तापमान सामान्य रहता है; न तो अधिक शीत की ठिठुरन और न ही अधिक ग्रीष्म की तपन।
फाल्गुन (‘फागुन’ का तत्सम शब्द)-मास है; शिशिर ऋतु का अन्त हो रहा है। वह शीत, जिसने क्या मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे-पेड़; अर्थात् समस्त जड़-चेतनजगत् मे अपने तीक्ष्ण प्रहारों से ‘ठिठुरन’ ला दी थी, अब वही आतंकी शीत अन्तिम श्वास ले रहा है। हवा में गरमाहट आ गयी है। वसंत का आगमन हो रहा है। उसके स्वागत और अभिनन्दन के लिए लताओं और वृक्षों ने नूतन परिधान धारण कर लिये हैं। सरसों वासंती साड़ी पहन इतरा रही है; इठला रही है तथा वसुधा पर सर्वत्र बिछी हरीतिमा पर अठखेलियाँ खेल रही है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो क्षितिज वसुन्धरा के साथ संवाद करने और अभिरम्भ (भींचकर गले लगाने के लिए उद्यत) करने के लिए मचल हो उठा हो; नभ में विहगवृन्द उन्मुक्त भाव के साथ अपने वक्षप्रान्त को लहरा-लहराकर यों उड़ान भर रहे हैं, मानो अवनि और अम्बर-तल में स्वच्छ चाँदनी सम्पूर्ण आभा और प्रभा के साथ अपनी समुपस्थिति अंकित करा रही हो; पक्षियोँ का कलरव यों प्रतीत होता है, मानो उनका वृन्द (समूह) समवेत स्वर मे ‘स्वागत-गान कर रहा हो; भौंरे विरुदावली गुनगुना रहे हैं; बौर की सम्पन्नता से आम की डालियाँ विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो रही हैं; वहीं पुष्पवाटिका मे रंग-विरंगे पुष्पों से सुशोभित पौधे यत्र-तत्र-सर्वत्र अपना सौरभ बिखेर रहे हैं। मन-प्राण को सम्मोहित करनेवाले ऐसे प्रफुल्ल वातावरण मे कुसुमाकर ‘वसंत’ का पादप्रक्षेप (पदार्पण) होता है।
वसंतऋतु में प्रकृति अपना नव शृंगार करती है। रंग-विरंगे पुष्पोँ से अलंकृत उसका कोमल शरीर दर्शकगण को मन्त्रमुग्ध कर लेता है। ऐसे वातावरण की सृष्टि होती है, मानो प्रकृति ‘नव वधू’-सी प्रतीत हो रही हो, जिससे प्रेरित होकर ही कोकिल कूजती है; भ्रमर गुनगुनाते हैं; अन्य पक्षी कलरव कर, उसका यशोगान करते हैं तथा मानव रागरंग और और वसंत की मादक गन्ध से मस्त हो जाते हैं। मस्ती के ऐसे ही क्षण मे ‘फाग’ का स्वर स्वत: फूट पड़ता है।
सृष्टि-सौन्दर्य की झाँकी वनो, उपवनो, पर्वतीय क्षेत्रों तथा ग्राम्यांचलों में ही देखने को मिलती है, जहाँ प्रकृति एवं निसर्ग के मनोहारी रूप के दर्शन होते हैं।
सुबह-शाम खेतों की ओर निकल आइए, आपको सरसों के पीले-पीले फूल, हवा मे लहराती जौ-गेहूँ की बालियाँ, छीमियाँ/छेमियाँ तथा श्वेत-नीले फूलोँ से लदे और धरती पर फैले हुए पौधे आपका मन मोह लेँगे और आम्र-मंजरियाँ अपनी सुगन्ध से आपको सम्मोहित कर लेंगी। नगरों में ऐसे मोहक परिदृश्य से नगरवासी वंचित रहते हैं। वसंत की बहार का वास्तविक आनन्द तो पर्वतीय और ग्रामीणजन ही ले पाते हैं।
वसंत के आगमन का प्रभाव प्रकृति पर ही नहीं, मानव के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वसंतऋतु में प्रात: उन्मुक्त और स्वच्छ हवा मे टहलना, स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। इससे पाचनशक्ति मे वृद्धि होती है और शरीर नीरोग रहता है। चूँकि वसंतऋतु मे वायु विशुद्ध और सुगन्ध से सराबोर रहती है इसलिए उसमे श्वास लेने से फेफड़ों मे किसी प्रकार के रोग होने की सम्भावना जाती रहती है। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण होने से मन उत्साह से भरा रहता है; आलस्य पास फटकने नहीं पाता। इस प्रकार वसंतऋतु का आगमन मानव के लिए एक ईश्वरीय वरदान की भाँति है।

जो लोग ‘वसंतऋतु की उपयोगिता और महत्ता को मात्र हिन्दू-सम्प्रदाय में देखते-पाते हैं, उन्हें अपना दृष्टि-विस्तार करना होगा। सूफ़ी-सम्प्रदाय के धर्माचार्योँ ने भारत के मुसलमानों के मध्य वसंतऋतु की महिमा का मण्डन किया है। मुग़ल-काल से ही सूफ़ीजन के बहुचर्चित देव-उपासनास्थलों में वसंतपर्व की महत्ता को रेखांकित किया गया है, जिसका बोध करने के लिए ‘निज़ाम औलिया का वसंत’, ‘ख़्वाजा बख़्तियार काकी का वसंत’, ‘खुसरो का वसन्त’ इत्यादिक का अनुशीलन किया जा सकता है। अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया गीत-संगीत के साथ वसंतऋतु के प्रति आस्थावान् थे। सूफ़ी कवि खुसरो स्वरचित गीत-गायन करते थे :–

“आज वसंत मना ले सुहागन, आज वसंत मना ले। अंजन-मंजन कर पिया मोरी, लम्बे नेहर लगा ले।”
बांग्लादेश मे बंगाली कैलेण्डर के अनुसार, वसंतऋतु (बोशोन्तो उत्सोब) के प्रथम दिन बंगाली मास फाल्गुन का आयोजन किया जाता है और पश्चिम बंगाल में पारिवारिक उत्सव, मेला इत्यादिक आयोजित किया जाता है। पाकिस्तान मे वसंत पर्व सीमित रूप में मनाया जाता है। वहाँ का जनमानस इसी पर्व को ‘जश्ने बहाराँ’ के नाम से लगभग एक माह तक मनाता है। लाहौर और पंजाब में वसंत का उत्साह देखते ही बनता है। लाहौर में ‘वसंत-मेला’ का आयोजन धूमधाम के साथ किया जाता है। वहाँ के भारतीय कालूराम ने अट्ठारहवीँ शताब्दी के उस भारतीय बलिदानी की पुण्य स्मृति में वसंतपर्व का आयोजन समारम्भ किया था, जिसने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से अस्वीकार कर दिया था। राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत उस वीर सुपूत का नाम ‘हक़ीक़त राय’ था। महाराजा रणजीत सिंह लाहौर में इसी अवसर पर कई उत्सव आयोजित करते थे; पतंगबाज़ी भी होती थी। पंजाबत प्रान्त में भी ‘वसंतपंचमी’ का हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया जाता था। होलिकोत्सव का आरम्भ भी इसी अवसर पर होता है। भारतीय गाँवों मे सांस्कृतिक वातावरण का सर्जन होने लगता है; ढोलक पर थाप पड़ने लगती है। सम्पूर्ण वातावरण हर्ष और उल्लास से भर जाता है।

ऋतुराज वसंत वस्तुत: धरती पर भगवान् का प्रतिनिधि बनकर आता है। उसके साम्राज्य मे छोटे-बड़े, निर्धन-धनी प्रफुल्ल रहते हैं। वह जन-जन में नव कृति की उमंग भरता है। वह ऐसा उदार और कृपालु राजा है, जो जन-कल्याण के लिए अपनी सम्पूर्ण सम्पदा और विभूति जन-जन पर न्योछावर कर देता है। वह प्रतिवर्ष हमसे कुछ लेने के लिए नहीँ, अपितु देने के लिए ही आता है। ऐसे पर्व की जय हो, जो जड़-चेतन को अपने आगमन से प्रमुदित करता रहता है।

(लेखक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैं।)