Saturday, June 27, 2026
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बंगाल बजट-2026: कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढ़ाकर 38 प्रतिशत किया गया

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपने पहले पूर्ण बजट में राज्य के लाखों सरकारी कर्मचारियों, अर्द्ध-सरकारी कर्मियों, शिक्षकों, शिक्षकेतर कर्मचारियों और पेंशनधारकों को बड़ी राहत दी की है।

वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त ने सोमवार को विधानसभा में वर्ष 2026-27 का बजट पेश करते हुए महंगाई भत्ते (डीए) में अतिरिक्त 20 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की। इस फैसले के बाद राज्य कर्मचारियों का कुल महंगाई भत्ता 18 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो जाएगा।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि बढ़ी हुई दरें आगामी एक अक्टूबर से प्रभावी होंगी। इसके साथ ही पेंशनभोगियों को भी 20 प्रतिशत अतिरिक्त महंगाई राहत (डीआर) देने का निर्णय लिया गया है। लंबे समय से महंगाई भत्ते और बकाया भुगतान की मांग कर रहे कर्मचारी संगठनों के लिए यह घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

विधानसभा में बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त ने कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारी, अर्द्ध-सरकारी संस्थानों के कर्मी, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी शासन की योजनाओं को धरातल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके योगदान को सम्मान देते हुए सरकार ने महंगाई भत्ते में उल्लेखनीय वृद्धि का निर्णय लिया है।

उन्होंने कहा, “राज्य के कर्मचारियों और पेंशनधारकों को वर्तमान 18 प्रतिशत महंगाई भत्ते के अतिरिक्त 20 प्रतिशत और दिया जाएगा। इसके बाद कुल महंगाई भत्ता 38 प्रतिशत हो जाएगा। यह निर्णय कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।”

पश्चिम बंगाल में महंगाई भत्ते को लेकर पिछले कई वर्षों से विवाद और आंदोलन जारी था। पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कर्मचारी संगठन केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समान डीए देने और बकाया राशि का भुगतान करने की मांग करते रहे थे। इस मुद्दे को लेकर राज्यभर में कई प्रदर्शन हुए और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।

फरवरी में पेश अंतरिम बजट के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने महंगाई भत्ते में चार प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की थी। हालांकि कई कर्मचारी संगठनों ने आरोप लगाया था कि घोषित बढ़ोतरी का लाभ पूरी तरह लागू नहीं किया गया। इसके बाद कर्मचारियों के बीच असंतोष बना हुआ था।

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने शासनकाल में राज्य की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए केंद्र के समान डीए देने की मांग को कई बार अस्वीकार किया था। नई भाजपा सरकार ने सत्ता संभालने के बाद कर्मचारियों के इस लंबे समय से लंबित मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए अपने पहले पूर्ण बजट में बड़ा फैसला लिया है।

राज्य की भाजपा सरकार ने केवल महंगाई भत्ता बढ़ाने की घोषणा ही नहीं की, बल्कि बकाया डीए के भुगतान की प्रक्रिया शुरू करने के संकेत भी दिए हैं। हालांकि इसके संबंध में विस्तृत समयसीमा और वित्तीय प्रावधानों की घोषणा बाद में किए जाने की संभावना है। कर्मचारी संगठनों की निगाह अब इस बात पर टिकी है कि सरकार बकाया भुगतान को लेकर क्या रोडमैप प्रस्तुत करती है।

 

बंगाल में 4.38 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश, एक लाख सरकारी नौकरियां

-डीए में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा

-कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 18 से बढ़ाकर 38 प्रतिशत

-कल्याणी में नया हवाई अड्डा और दादनपात्रबार में गहरे समुद्री बंदरगाह की घोषणा

कोलकाता । पश्चिम बंगाल की पहली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने सोमवार को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4.38 लाख करोड़ रुपये का महत्वाकांक्षी बजट विधानसभा में पेश किया। वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त ने बजट प्रस्तुत करते हुए राज्य में रोजगार सृजन, सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, औद्योगिक निवेश और आधारभूत संरचना के विकास को सरकार की प्राथमिकता बताया। बजट में एक लाख सरकारी रिक्त पदों पर नियुक्ति, कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बड़ी वृद्धि, बेरोजगार युवाओं के लिए नई सहायता योजना तथा कई बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की घोषणा की गई है।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि वर्तमान सरकार को पूर्ववर्ती सरकार से 8.15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का संचित ऋण विरासत में मिला है। इसके बावजूद सरकार विकास और जनकल्याण के बीच संतुलन बनाते हुए राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सभी मौजूदा कल्याणकारी योजनाएं जारी रहेंगी, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाएगा कि उनका लाभ केवल वास्तविक और पात्र लाभार्थियों तक ही पहुंचे। इसके लिए लाभार्थी सत्यापन प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।

बेरोजगारी की चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने विभिन्न विभागों में एक लाख रिक्त पदों को भरने का ऐलान किया है। प्रस्तावित नियुक्तियों में 20 हजार पद पुलिस विभाग में, 50 हजार पद राज्य संचालित विद्यालयों में शिक्षकों और शिक्षण कर्मियों के लिए तथा शेष 30 हजार पद अन्य सरकारी विभागों में भरे जाएंगे। महिलाओं को सरकारी सेवाओं में अधिक अवसर देने के उद्देश्य से कुल नियुक्तियों में 33 प्रतिशत पद उनके लिए आरक्षित रखे जाएंगे। इसके अलावा आवश्यकतानुसार अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का भी प्रावधान किया जाएगा।

राज्य सरकार ने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी राहत देते हुए महंगाई भत्ते (डीए) में 20 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की है। इसके बाद डीए 18 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो जाएगा। यह संशोधित दर एक अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगी। वहीं नागरिक स्वयंसेवकों के मासिक मानदेय में 2,000 रुपये की वृद्धि का भी प्रावधान किया गया है।

इसके अलावा विधायकों के स्थानीय क्षेत्र विकास कोष की राशि 70 लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दी गई है, जिससे वे अपने क्षेत्रों में विकास कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेंगे।

बजट में महिलाओं, युवाओं और ग्रामीण आबादी के लिए कई नई घोषणाएं की गई हैं। अन्नपूर्णा योजना के लिए 36 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत 25 से 60 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

सरकार ने ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने के लिए 125 दिन की ग्रामीण कार्य योजना का विस्तार करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत 25 लाख अतिरिक्त लाभार्थियों को शामिल किया जाएगा।

उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायता देने के लिए एकमुश्त 25 हजार रुपये की वित्तीय मदद देने की घोषणा की गई है। वहीं बेरोजगार युवाओं के लिए ‘नई भरोसा योजना’ शुरू की जाएगी, जिसके तहत पात्र बेरोजगार स्नातकों को 3,000 रुपये प्रतिमाह तथा अन्य पात्र बेरोजगारों को 2,000 रुपये प्रतिमाह की सहायता दी जाएगी।

राज्य सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर भी विशेष जोर दिया है। आयुष्मान भारत योजना के लिए 3,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। सरकार का अनुमान है कि इस योजना से राज्य के लगभग सात करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिलेगा।

इसके अलावा राजनीतिक हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए भी वित्तीय सहायता की व्यवस्था की गई है। झाड़ग्राम में जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए प्रारंभिक रूप से 10 करोड़ रुपये का कोष निर्धारित किया गया है।

बुनियादी ढांचे के विकास को गति देने के लिए बजट में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की घोषणा की गई है। नदिया जिले के कल्याणी में 1,500 एकड़ भूमि पर एक नए हवाई अड्डे की स्थापना की जाएगी। वित्त मंत्री ने कहा कि इससे कोलकाता स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बढ़ रहे यात्री दबाव को कम करने में मदद मिलेगी। इसके लिए राज्य सरकार जल्द ही उपयुक्त भूमि का चयन करेगी।

इसके अलावा पुरुलिया, मालदा और बालुरघाट में नए हवाई अड्डों का निर्माण किया जाएगा, जबकि कूचबिहार हवाई अड्डे के विस्तार की योजना भी बजट में शामिल की गई है।

औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पूर्व मेदिनीपुर जिले के दादनपात्रबार में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर एक गहरे समुद्री बंदरगाह की स्थापना की जाएगी। सरकार का मानना है कि इस परियोजना से राज्य में समुद्री व्यापार को नई गति मिलेगी और बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित होगा।

साथ ही अलीपुरद्वार जिले के हासीमारा और पश्चिम मेदिनीपुर जिले के कलाईकुंडा स्थित भारतीय वायुसेना अड्डों के विस्तार में भी राज्य सरकार सहयोग करेगी।

वित्त मंत्री ने बताया कि बड़े निवेशकों को आकर्षित करने के लिए शहरी भूमि सीमा एवं विनियमन अधिनियम, 1976 की समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के निवेश प्रस्तावों को राज्य सरकार की एकल खिड़की प्रणाली के माध्यम से सभी आवश्यक स्वीकृतियां उपलब्ध कराई जाएंगी।

राज्य की भाजपा सरकार ने दानकुनी-लुधियाना तथा दानकुनी-सूरत समर्पित माल ढुलाई गलियारों से जुड़े भूमि अधिग्रहण संबंधी मुद्दों के समाधान का भी आश्वासन दिया है। इसके साथ ही संकटग्रस्त कलकत्ता शेयर बाजार के पुनरुद्धार के लिए भी राज्य सरकार आवश्यक सहयोग प्रदान करेगी।

वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त ने कहा कि यह बजट राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने, रोजगार सृजन को बढ़ावा देने, सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने और पश्चिम बंगाल को औद्योगिक निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

मनुष्य के चित्त का भटकाव रोकता है योग

-अरुण कुमार दीक्षित

योग का अर्थ जोड़ होता है। योग व्यक्ति के अन्तस का रसायन शास्त्र परिवर्तित कर देता है। योग से व्यक्ति के अंदर प्रेम रस के स्रोत आने लगते हैं। नई चेतना आने लगती है। ऊर्जा से मनुष्य भर जाता है। व्यक्ति अप्रेम से प्रेम की ओर उन्मुख हो जाता है। व्यक्ति द्वैत से अद्वैत की यात्रा में आ जाता है। ऐसा योगी जन कहते आए हैं। हमारे जैसों ने हमने योग किया। अमुक ने योग किया। कुछ घटित नहीं हुआ। फलित नहीं हुआ। हम तत्काल निष्कर्ष पर जाते हैं। हमें वह नहीं हो रहा जो शास्त्रों में बताया गया है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म तुम्हें करना है। तुम फल क्या आएगा इस निष्कर्ष में न पड़ो। श्रीकृष्ण कहते हैं “कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनः” तुम्हारा अधिकार कर्म करने का ही है। परिणाम पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। परिणाम में तुमसे संबंध नहीं है। तुम फल से असंबद्ध ही रहो। वे आगे कहते हैं “मा कर्मफलहेतुर्भ” तुम स्वयं को अपने कर्मों फलों का कारण मत जानो। वह निष्काम कर्म की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं फल की ओर ध्यान न देकर पूरी शक्ति कर्म पर लगा दो। यहां यह भी लगता है कि जब पूरी शक्ति किसी कर्म में लगेगी तो बहुत संम्भव है परिणाम अच्छा आएगा। गीता में योग के विषय में कहा गया है कि जीव का परमात्मा के साथ जो सम्बंध है वह योग है। वस्तु व्यक्ति क्रिया, पदार्थ, घटनाओं वस्तुओं आदि के सम्बंध भोग है। योग नित्य और भोग अनित्य है।

पतंजलि श्रीकृष्ण के बाद हुए। पतंजलि योगाश्चितवृत्ति निरोध की देशना में है। पतंजलि कहते हैं योग से मनुष्य के चित् की वृत्तियों का निरोध हो जाता है। चित्त का भटकाव रुक जाता है। चित्त का व्यापार रुक सकता है। मगर पतंजलि का यह वक्तव्य बड़ा कठिन मालूम पड़ता है। योग में कैसे उतरा जाए। कोई योग का विद्यार्थी पहली सीढ़ी में क्या करे। यहाँ ध्यान रहे की बात चित्त वृत्ति के निरोध की हो रही है। रोकने की हो रही है। और हम जीवन व्यापार में लगातार उठते बैठते लगे रहते हैं। हम आँख बंद कर योग के लिए बैठते हैं हमको सब दृश्य लाभ-हानि के दिखाई देने लगते हैं। तभी संपत्ति भी दिखाई देने लगती है। यहाँ फिर वही बात है कि माया पीछा करती है। बड़ी कठिनाई है? योग से यह कठिनाई चली जाती है। और योग में उतरने के पहले ही यह कठिनाइयां योग में जाने नहीं देती हैं। जीवन के अनेक नए पुराने दृश्य दिखाई देने लगते हैं। जैसे ही आँख बंद कर बैठे वैसे जगत सामने नृत्य करता है। ज्ञानी जनो ने इसे माया कहा। कबीर ने कहा कि माया महाठगिनी हम जानी।

लोग गुरुओं के पास जाते हैं वह व्यायाम को योग बताने लगते हैं। यह और झंझट है। योग में व्यायाम आ गया। व्यायाम और कसरत योग से भिन्न है। हाँ व्यायाम से शरीर हष्ट-पुष्ट बलिष्ठ बनता है। व्यायाम और आहार की शुद्धता आलस्य नही आने देते हैं। आहार ठीक नहीं तो शरीर खराब होगा। आहार उत्तेजक है या अधिक है तो शरीर मन दोनों उत्तेजना में रहेंगे। इसलिए शुद्ध आहार से शुद्ध विचार आते हैं। मगर चेतना का स्तर ऊर्ध्व नहीं होता है। योग बिलकुल अलग बात है।

पतंजलि योग की पहली सीढ़ी में कहते हैं। यम। यम के पांच अर्थ बताए गए हैं। पहला है अहिंसा। मन और वचन शब्दों से किसी को कष्ट न होने पाए। कोई आपसे दुखी न होने पाए। दूसरा है सत्य। अब यह और कठिन है। सत्य का व्यवहार करना है। दिन-रात झूठ के व्यवहार हैं। व्यापार भी हैं। राजनीति में दिनभर असत्य बोलने की कार्यवाही है। ईशावास्योपनिषद की एक ऋचा में कहा गया है, कि परम सत्य का मुँह हिरण्यमय स्वर्ण पात्र से ढंका है। उपनिषदों में सत्य (ब्रह्म) को निराकार अजन्मा कहा गया है। उपनिषद दार्शनिक और खोज पर जोर देते हैं। गीता में ज्ञान के साथ कर्म कर्तव्य पर जोर है। सत्य को ही बोला जाए सत्य को पहले ही जान लिया जाए। यहाँ फिर तब योग की आवश्यकता पर प्रश्न है। तीसरा है अस्तेय। चोरी न करना। किसी वस्तु की चोरी न करना। यहां चोरी न करना सनातन में निंदित रहा है। भारतीय संस्कृति में बुद्ध, महावीर, श्री अरविंद भी चोरी नहीं करने और अहिंसा पर जोर देते हैं। गांधी ने भी अहिंसा पर जोर दिया। यहाँ पतंजलि चोरी न करने की बात को भी योग से जोड़ते हैं। चित्त से जोड़ते हैं। चोरी न करना योग में उतरने में सहायक बता रहे हैं। अहिंसा को सत्य को चित्त की वृत्ति से जोड़कर योग में जाने का मार्ग वे प्रशस्त करते दिखाई देते हैं। फिर कहते हैं ब्रह्मचर्य। अपनी इंद्रियों को संयम में रखना। अपनी ऊर्जा को बचाकर रखना। इसके बाद है अपरिग्रह। अर्थात वस्तुओं को एकत्रित न करना। संग्रह न करना।

यहाँ निर्मल चित्त योग की नदी पार करने की यात्रा में सहायक होगा। गीता में ही कृष्ण कह रहे हैं योग शारीरिक अभ्यास नहीं है। आत्मा और परमात्मा के मिलन के समभाव में रहकर अपना कर्तव्य निर्वाह ही योग है। गीता अध्याय 2 में श्लोक 48 में उन्होंने “समत्वं योग उच्चते कहा है”। कृष्ण कहते हैं कि सफलता या असफलता की चिंता किए बिना समभाव में रहकर अपना कर्तव्य निर्वाह ही योग है। फिर वह कर्म योग की बात करते हैं। निष्काम कर्म को श्रेष्ठ कह रहें हैं। गीता में योग के तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं। पहला कर्म योग निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना। दूसरा भक्ति योग पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के साथ ईश्वर की शरण में जाना। तीसरा है ज्ञान योग। विवेक और ज्ञान योग के माध्यम से सत्य को जानना। योग व्यायाम नहीं है आत्मा का परमात्मा से मिलन और जीवन जीने की उत्कृष्ट कला है योग। गीता में योग कर्मसु कौशलम् अर्थात कर्म में कुशलता। श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मों की पूरी कुशलता और संतुलन के साथ करना ही योग है। यहां कुशलता का अर्थ चतुराई नहीं है बल्कि अनासक्त फल की इच्छा के बिना कर्तव्य पालन है।

वहीं, पतंजलि ने दुख के पांच कारण बताए हैं, जिन्हें योग द्वारा समाप्त किया जा सकता है। इनमें पहला है अविद्या या असत्य को सत्य मान लेना। दूसरा है “अस्मिता” अहंकार या स्वयं को शरीर और मन समझ लेना। तीसरे को पतंजलि ने राग कहा है। सुख के प्रति अत्यधिक मोह राग है। और चौथा है अप्रिय के प्रति और अनुभवों के प्रति गुस्सा किया जाना। सफलता के दो स्तम्भ बताएं हैं। मन को स्थिर करने और योग में सफलता के दो उपाय हैं। इसके लिए अभ्यास प्राथमिक है। मन को शांत रखने के लिए लंबे समय तक नियंत्रण का प्रयास करना। दूसरा है वैराग्य अर्थात बाहरी दुनिया की क्षणिक और भौतिक वस्तुओं के प्रति इच्छा का त्याग करना। योग वह अवस्था है जो मनुष्य को संसार के दुखों के बंधनों से मुक्त कर देती है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

साभार – हिन्दुस्तान समाचार

लिटिल थेस्पियन का 42वाँ रंग अड्डा सम्पन्न

कोलकाता । सुमित्रानंदन पंत एवं डॉ. प्रताप सहगल को समर्पित, लिटिल थेस्पियन का 42वाँ रंग अड्डा 31 मई को त्रिप्ति मित्रा सभागार में आयोजित किया गया। दोपहर की शुरुआत, नई दिल्ली के वरिष्ठ नाटककार प्रताप सहगल द्वारा रचित नाटक ‘कोई और रास्ता’ की मनोहारी एकल प्रस्तुति से हुई, जिसे उमा झुनझुनवाला (निर्देशक, लिटिल थेस्पियन) ने मंचित किया। दर्शक पूरे समय बँधे रहे और भावुक होकर भरपूर सराहना की। झुनझुनवाला के सूक्ष्म अभिनय और प्रभावी मंचीय उपस्थिति ने श्रोताओं को गहरे चिंतन में डुबो दिया—नाटक द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर सोचने को विवश किया। इसके बाद प्रो. रेशमी पांडा मुखर्जी ने प्रताप सहगल के नाट्य साहित्य पर विचार रखे। उन्होंने कहा: “प्रताप सहगल के नाटकों में हमेशा कोई खोज होती है — वह कुछ खोजते हैं,” जो साधारण मानवीय समझ से परे सत्य की तलाश है। उन्होंने नाटककार की दर्शकों, निर्देशकों और अभिनेताओं से सक्रिय संवाद की महत्ता पर बल दिया और सहगल को इसका उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
प्रो. मुखर्जी ने सहगल के चर्चित नाटक ‘अन्वेषक’ का भी उल्लेख किया—जिसमें यह संदेश है कि कट्टर और रूढ़ सोच प्रगति में बाधक बनती है। साथ ही रंग बसंती, बुल्लेशाह और यूँ बनी महाभारत जैसे नाटकों पर भी प्रकाश डाला। दूसरे भाग में सुमित्रानंदन पंत की प्रसिद्ध कविता ‘वे आँखें’ की नाट्य प्रस्तुति हुई, जिसे संतोषपुर अनुचिंतन के कलाकारों ने प्रस्तुत किया और निर्देशक डॉ. गौरव दास ने परिकल्पित किया। कलात्मक रूप से सजी यह प्रस्तुति डॉ. दास की आत्मीय स्वर-लहरी से और समृद्ध हुई, जो पृष्ठभूमि में एक सम्मोहक धुन बन गई। दर्शकों ने उत्साह से ध्वनि को से सराहा। कार्यक्रम का समापन विश्व हिंदी परिषद, पश्चिम बंगाल इकाई की शिक्षा शाखा की अध्यक्ष श्वेता गुप्ता के सूचनाप्रद और रोचक व्याख्यान से हुआ, जिसमें उन्होंने सुमित्रानंदन पंत के साहित्यिक योगदान, काव्य-दृष्टि और रचनाओं की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

लिटिल थेस्पियन की नवीनतम प्रस्तुति ‘पत्थर’

लिटिल थेस्पियन ने इस्माइल चूनारा के अंग्रेज़ी नाटक दा स्टोन, का उमा झुनझुनवाला द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद पत्थर का मंचन गत 12 जून को अनुचिंतन आर्ट सेंटर में किया गया | नाटक ‘पत्थर’ जीवन को दो लोगों तक सीमित कर देता है: पति और पत्नी। उनकी साधारण गृहस्थी उस “अदृश्य पत्थर” से चकनाचूर हो जाती है जो अचानक उनके दरवाज़े पर आ जाता है। जो शुरू में एक भौतिक रुकावट है, वह मनोवैज्ञानिक आतंक में बदल जाती है। पत्थर का अर्थ बढ़ता जाता है – डर, जड़ता, सामाजिक दबाव, अवसाद – यहाँ तक कि घर से बाहर निकलना भी असंभव लगने लगता है।निर्देशक डॉ. गौरव दास व्याख्या करने की जल्दी नहीं करते। वे रूपक को साँस लेने देते हैं। परिणाम, एक ऐसा नाटक है जो एक साथ बेतुका भी लगता है और दर्दनाक हद तक वास्तविक भी। मंच एक जाल बन जाता है और आप उनके सिकुड़ते संसार को महसूस करते हैं।गुंजन अज़हर और मो. आसिफ़ अंसारी पूरे नाटक का भार अद्भुत संयम से उठाते हैं। कोई अतिनाटकीयता नहीं। “पत्नी” खीज से घबराहट और फिर सुन्नता तक बहुत छोटे-छोटे बदलावों में जाती है। “पति” झूठे आत्मविश्वास और लाचारी के बीच झूलता है। उनकी खामोशियाँ भी शब्दों जितनी मुखर हैं। साथ मिलकर वे रिश्ते को जीता-जागता बना देते हैं। राहुल सरदार की प्रकाश परिकल्पना और बिप्लब नस्कर का संगीत नाटक का मूड गढ़ते हैं। समर मृधा और नयन सदक की कोरियोग्राफी भी उतनी ही असरदार। नाटक ‘पत्थर’ इस बात पर मार्मिक टिप्पणी है कि डर को एक बार अंदर पनपने दो तो वह घर बना लेता है । यह सवाल करता है: क्या हम वास्तविक रुकावटों के कारण फँसे हैं, या इसलिए कि हमने मान लिया है कि निकलना व्यर्थ है? महामारी के बाद की दुनिया में जहाँ कई लोग नौकरी, घर या चिंता में “कैद” महसूस करते हैं, ऐसे में यह नाटक बेचैन करने वाला लगता है। दूसरा नाटक संतोषपुर अनुचिंतन की प्रस्तुति ‘वे आँखें’ – सुमित्रानंदन पंत की कविता पर आधारित नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया । अगर ‘पत्थर’ अंदर मुड़ता है, तो गौरव द्वारा नाट्य रूपांतरित और निर्देशित ‘वे आँखें’ हमें बाहर देखने पर मजबूर करती है। यह रूपांतरण पंत की कविता से एक किसान का चित्र बनाता है – उसका अंतहीन श्रम, ज़मीन से जुड़ाव, और शोषण व अनिश्चितता जो उसके जीवन को गढ़ते हैं, भले ही वह “समाज की रीढ़” कहा जाए। डॉ. गौरव दास की अपनी भावपूर्ण आवाज़, पृष्ठभूमि में करुणा नहीं गरिमा देती।समर मृधा, नयन सदक, मेहली दास, अनिकेत मजूमदार, अकुलीना मित्रा, तृषा दास, पार्थो पाइक और रंजीता रॉय ने अपने पात्रों को बखूबी निभाया । प्रकाश और मंच सज्जा बिप्लब नस्कर का था ।‘पत्थर’ और ‘वे आँखें’ को साथ मंचित करना एक सधी हुई सोच थी। एक नाटक कहता है: “हम खुद को कैद करते हैं।” दूसरा कहता है: “समाज दूसरों को कैद करता है।” इस अंतर ने दोनों को और मज़बूत किया।

रियल एस्टेट का नया ‘पावर हब’ बन रहा है कोलकाता

कोलकाता । भारत में रियल एस्टेट सेक्टर का हर बड़ा उछाल हमेशा एक खास पैटर्न पर चलता है। इसकी शुरुआत अक्सर अविश्वास से होती है, जिसके बाद इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होता है और अंत में बड़े पैमाने पर निवेश के लिए पैसा आता है। जब तक आम बाजार इस बदलाव को पूरी तरह समझ पाता है, तब तक नई कीमतों पर एंट्री करने का मौका हाथ से निकल चुका होता है। वर्तमान में कोलकाता बिल्कुल इसी निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दशकों तक देश के सबसे कम आंके गए महानगरों में से एक रहने के बाद, अब कोलकाता एक नए विकास चक्र की ओर बेहद तेज गति से बढ़ रहा है।

शहरी विकास के इस बदलते दौर में अब खरीदारों की सोच पारंपरिक आवास (अपार्टमेंट) से हटकर ऐसी जमीनों या संपत्तियों की ओर मुड़ रही है जिनकी उपलब्धता बेहद सीमित है। इस श्रेणी में ‘रिवरफ्रंट डेवलपमेंट’ यानी नदी के किनारे स्थित रियल एस्टेट का महत्व सबसे ज्यादा माना जा रहा है। दुनिया भर के बड़े शहरों में नदी के अग्रभाग (वॉटरफ्रंट) की जमीनें भौगोलिक सीमाओं के कारण बेहद सीमित होती हैं, जिससे समय के साथ इनके मूल्यों में भारी बढ़ोतरी होती है। कोलकाता में गंगा नदी के साथ लोगों का गहरा सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव रहा है, लेकिन अब तक बहुत कम प्रोजेक्ट्स ने निवासियों को नदी के किनारे रहने का यह वास्तविक और आलीशान अनुभव दिया है।

बाजार के इसी दीर्घकालिक दृष्टिकोण को समझते हुए प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी एल्कॉव रियल्टी ने श्रीरामपुर में ‘न्यू कोलकाता’ नदी के किनारे रहने के अनुभव को सिर्फ एक लग्जरी सुविधा के तौर पर नहीं, बल्कि जिंदगी जीने के एक बेहद निजी तरीके के तौर पर पेश करता है। जहाँ नदी कभी-कभी मिलने वाली अनुभव के बजाय रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। यहाँ रहने वाले लोग सुबह उठते ही नदी के नजारों का बिना किसी रुकावट के दीदार करते हैं, नदी के किनारे अपनी निजी जगह का आनंद लेते हैं, पानी के पास बैठकर परिवार के साथ यादगार पल बिताते हैं, और कोलकाता के सबसे शाश्वत भावनात्मक आधारों में से एक से जुड़े रहते हैं।

एल्कॉव रियल्टी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर यशस्वी श्रॉफ के अनुसार, रियल एस्टेट में सबसे बड़े और मुनाफे वाले अवसर तब पैदा होते हैं जब कोई शहर बदलाव के दौर से गुजर रहा होता है, न कि उसके पूरी तरह बदल जाने के बाद। बुनियादी तौर पर दुर्लभ और गहरा भावनात्मक महत्व रखने वाली ऐसी संपत्तियां बाजार के परिपक्व होने के बाद भी हमेशा शाश्वत बनी रहती हैं क्योंकि उन्हें दोबारा नहीं बनाया जा सकता।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में  पाठ्यचर्या ढांचे पर चर्चा 

कोलकाता । वाणिज्य विभाग (प्रातःकालीन सत्र ) ने 13 जून 2026 को स्टाफरूम में एक विशेष अकादमिक चर्चा का आयोजन किया। विषय था ‘एनईपी पाठ्यचर्या ढांचे के तहत चौथे वर्ष के नियमों और विनियमों को नेविगेट करना। इसमें विभाग के 25 शिक्षकों ने भाग लिया। बर्दवान विश्वविद्यालय के बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग से डॉ अभिक केआर मुखर्जी को एक वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था और उन्होंने अनौपचारिक चर्चा के दौरान व्यावहारिक सुझाव दिए। उनके सुझावों पर विस्तार से चर्चा हुई और यह स्पष्ट हो गया कि आगे के रास्ते के लिए विभिन्न विषय विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास की आवश्यकता होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि वाणिज्य छात्रों के बीच रुचि पैदा करने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करके अनुसंधान में सीखने की कमी को पूरा किया जा सकता है। हम ऐसी अनौपचारिक चर्चाओं से ज्ञान प्राप्त करने के लिए तत्पर हैं।प्रातः कालीन सत्र की वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी और रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह की उपस्थिति में यह अनौपचारिक चर्चा संपन्न हुई। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

स्त्री जन्म से नहीं बनती, उसे बनाया जाता है

 लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न’ पुस्तक को पढ़ते हुए

डॉ वसुंधरा मिश्र, हिंदी प्राध्यापिका, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता

‘लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न ‘ डॉ नमिता जायसवाल की सद्य प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक ही वर्तमान युग की कहानी कहता प्रतीत हो रहा है।’अंतर्मन के स्वर में’ लेखिका ने सिमोन द बोउवार की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ ‘स्त्री जन्म से नहीं बनती, उसे बनाया जाता है ‘उद्धृत की हैं संभवतः जहांँ से साहित्य समाज में लिंग भेद की संरचना का उद्भव होता है।स्त्री, पुरुष और ट्रासंजेंडर आदि को किस प्रकार लिंग में विभाजित किया गया है। यह कहानी पुरुष सत्ता की वह मार्मिक और बेदर्द पन्ना है जहांँ अपने ही समाज की स्त्री को समानता का अधिकार नहीं दिया गया, वहाँ कानून व्यवस्था भी फेल हो गई है।इक्कीसवीं सदी में स्त्री की स्थिति बदली है परंतु समानता की मंजिल अभी भी दूर है ।इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर अनुत्तरित हैं।
2025 में 184 पृष्ठों की यह पुस्तक आनंद प्रकाशन कोलकाता से छपी है।
स्त्री अस्मिता को रेखांकित करती इस पुस्तक में लेखिका डॉ नमिता जायसवाल ने हिंदी कथा साहित्य की नामचीन महिला कथाकारों के कथा साहित्य को खंगालते हुए स्त्री अस्मिता, स्त्री सत्ता, स्त्री संघर्ष, स्त्री अधिकार, स्त्री चेतना, स्त्री स्वातंत्र्य आदि के साथ – साथ स्त्री जीवन के विविध संदर्भों और परिप्रेक्ष्य को बहुत ही बारीकी से जांच पड़ताल करते हुए उद्घाटित किया है ।यह एक ऐसा वैचारिक और सामाजिक आंदोलन है, जो पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के अधिकारों, उनकी स्थिति, और पहचान पर चर्चा करता है। यह मुख्य रूप से समाज में लैंगिक असमानता (Gender inequality) को समाप्त कर महिलाओं को सशक्त, स्वतंत्र और समान अधिकार दिलाने की वकालत करता है।
एक ही पुस्तक में आपको स्त्री विषयक साहित्य की वृहद शोध परक दृष्टि मिल जाएगी जिससे पाठक रूबरू हो सकते हैं। लेखिका ने माना है कि आज स्त्रियाँ आधुनिक युग में जी रही हैं। शिक्षा और संवैधानिक समानता भी मिली है लेकिन क्या जमीनी स्तर पर स्त्री समानता और सम्मान प्राप्त कर रही है? संभवतः नहीं। लेखिका स्त्री को समाज में एक स्वतंत्र, सक्षम और समान मानव के रूप में स्वीकृति चाहती है।
इस पुस्तक में लेखिका के 13 लेख हैं जिनमें कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, राजी़ सेठ, सूर्य बाला, नासिरा शर्मा, मेत्रैयी पुष्पा, मंजुल भगत आदि स्थापित महिला कथाकारों के उपन्यासों की सृजनधर्मिता से स्त्री अस्मिता के विविध पहलुओं को समझा गया है। वहीं ‘स्त्री सत्ता अस्तित्व और अस्मिता’ लेख समकालीन उपन्यास, शहरी परिवेश में मध्यवर्गीय स्त्री का द्वंद जिसमें नब्बे के दशक के उपन्यास के संदर्भ में है। समकालीन कहानी के संदर्भ में और आकड़ों के आईने में स्त्री इक्कीसवीं सदी में स्त्री की बदलती स्थिति के संदर्भ को रेखांकित किया गया है।
पितृसत्तात्मक सोच ने लिंग भेद द्वारा स्त्री – पुरुष भेद कर किस प्रकार से स्त्री जीवन को हाशिए या दोयम दर्जे की स्थिति में पहुंचा दिया ये सभी लेख इस बात के साक्षी हैं ।सन् 1958 में लिखे उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ की लेखिका कृष्णा सोबती ने नायिका पाशो के जीवन की कठिन यात्रा का वर्णन किया है जहांँ पितृसत्तात्मक समाज में वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है। भोगवाद पर टिका पुरुष समाज किस प्रकार एक स्त्री देह (पृष्ठ 15 – 16 लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न का शोषण करता है ) को मनचाहे इस्तेमाल की वस्तु समझता है। डार पितृसत्तात्मक समाज की एक शर्त है जहांँ स्त्री को अपने अस्तित्व पहचान स्वतंत्रता और व्यक्तित्व की कीमत चुकानी पड़ती है। मित्रो मरजानी उपन्यास में भी कृष्णा सोबती ने मित्रो अन्याय का प्रतिवाद करने वाली एक निर्भीक और जुझारू स्त्री है ।उषा यादव लिखती हैं कि नारी के परंपरागत रूप से पृथक कृष्णा सोबती की मित्रो उनकी नितांत अपनी सृष्टि है। (पृष्ठ 26, लिंग भेद) पुरुषत्व का गुण वह स्त्री को दबाए जाने में नहीं बल्कि उसे मानवी के रूप में पुरुष द्वारा देखे जाने को समझती है। (पृष्ठ 26, वही) मित्रो मरजानी नई पीढ़ी के लिए प्रेरक पात्र है जो अपनी इच्छाओं और अधिकारों के लिए समाज के विरोध में खड़ी होती है और यही स्वतंत्रता चाहती है। इक्कीसवीं सदी में भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही है, सटीक उत्तर नहीं मिल रहा है। 1944 से ‘लामा’ कहानी से कृष्णा सोबती से अपने लेखन की शुरुआत की थी।
प्लेटॉनिक प्रेम की त्रासदी लेख में मंजुल भगत द्वारा लिखा पहला उपन्यास ‘टूटा हुआ इंद्रधनुष’ में प्लेटॉनिक प्रेम की अस्वाभाविकता का वर्णन है। इसमें स्त्री पुरुष के प्रेम संबधों और पति पत्नी के वैवाहिक रिश्तों को दर्शाया गया है।
ठीकरे की मंगनी में नासिरा शर्मा कथन के माध्यम से कहती हैं कि हालात की मार से पैदा हुई एक लड़की ‘महरूख’ की कहानी है जो जिंदगी को अपने नजरिए से देखकर उसको एक पहचान, एक अर्थ देती हुई जनसमुदाय की आवाज में उदय होती है। (पृष्ठ 47, लिंग भेद) वह भी अपने जीवन के सारे अनुभवों का निचोड़ निकालती है तो उसे लगता है कि संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के बावजूद आज भी स्त्री दासी है और पुरुष स्वामी। वह समझ चुकी है कि यह लड़ाई एक दो दिन की नहीं पूरे एक सदी तक लड़ी जाने वाली है। (पृष्ठ 49, वही) इसके लिए संघर्ष और आत्मविश्वास की आवश्यकता है। नासिरा शर्मा ने मुस्लिम समाज की स्त्रियों के दर्द को लिखा है ।वे मानती हैं कि स्वयं को स्थापित करने के लिए स्त्री को पहले आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना आवश्यक है ।

नासिरा शर्मा एक ऐसी महिला उपन्यासकार हैं जिन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से संस्कार प्रदत्त ढंग से बंधी पढ़ी-लिखी प्रबुद्ध स्त्री चरित्र की मानसिकता, मनोविज्ञान और उसके स्व संघर्ष को परिभाषित किया है। ठीकरे की है मंगनी की नायिका महरूख के माध्यम से उन्होंने मुस्लिम समाज में स्त्री की नियति का चित्रण किया है।अंत में वे कहती हैं कि अपनी लड़ाई स्त्री को अंतत स्वयं ही लड़नी पड़ती है। पृष्ठ 53

सूर्यबाला की यामिनी कथा 1990का उपन्यास है। इसमें स्त्री परिवार में अपने को टुकड़े टुकड़े में बांटकर जीती भारतीय स्त्री के जीवन जीने की त्रासदी भरी बाध्यता की कथा है जहां अस्मिता की तलाश और मोह के बंधन के मकड़जालों यामिनी खुद ही अपने दुखों की वज़ह है।

ग्रामीण परिवेश में स्त्री विमर्श के सुलगते प्रश्न शीर्षक से मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास बेतवा बहता रहे विश्व सदी का अंतिम दशक उपन्यास के क्षेत्र में सक्रियता की दृष्टि से बहुत है महत्वपूर्ण है। मैत्रेयी पुष्पा 90 के दशक की ऊर्जावान बहु चर्चित लेखिका हैं जिन्होंने ग्रामीण परिवेश में रची बसी स्त्री के अंतर्मन की गहराइयों को टटोला, उकेरा और रेखांकित किया है।’बेतवा बहती रही’ सन् 1993 का उपन्यास है जिसमें बुंदेलखंड के ग्रामीण परिवेश की कथा है।राजी सेठ ने सन् 1995 में’ निष्कवच ‘लिखा जिसमें दो अलग-अलग कथाएं होते हुए भी उनमें एक तारतम में है। आज जब चारों ओर पुरुष प्रधान समाज में नारी के प्रति हो रहे अन्याय और अत्याचार को उजागर किया जा रहा है,इस कथा में दो युवतियां दो होनहार युवकों को उनकी धूरी से हटाकर उनका भरपूर शोषण करती हुई उन्हें हतप्रभ कर देती हैं ,पूरी तरह ध्वस्त कर देती हैं और अपनी इस करने पर इतराती हैं ।यह एक नए मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक आयाम के साथ प्रस्तुत किया गया है।

बाजारवाद के चक्रव्यूह में फंसी स्त्री का चित्रण ‘आवां’ उपन्यास के माध्यम से किया गया है जिसकी कथाकार चित्रा मुद्गल है।यह उपन्यास सन् 1999में लिखा गया और 544पृष्ठों का वृहद उपन्यास है। इसमें निम्न मध्यवर्गीय परिवार की जरूरत मंद लड़की नमिता देशपांडे की रोजगार की तलाश में घर से बाहर निकलने, उसके भटकाव, मोहभंग और वापसी की कथा है । आवां में शोषण के माध्यमों, तरीकों एवं मूल्यों का पर्दाफाश किया गया है। आम आदमी को सक्रिय ,समझदार और जुझारू बनाने के लिए आवां को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। पृष्ठ 98

इक्कीसवीं सदी में पहुंच कर भी भारत का मध्यवर्गीय और निम्न वर्गीय समाज या इस वर्ग की स्त्रियां जूझ रही हैं।ये प्रश्न अनुत्तरित है।

समय सरगम कृष्णा सूक्ति का उपन्यास सन् 2000 में वृद्धों के जीवन पर लिखा गया इसमें मनुष्य जीवन की सार्थकता निरर्थकता के बीच बहस और उसके सही सार्थक अर्थ को खोजने का प्रयास है। आज भारत में ही नहीं वैश्विक स्तर पर वृद्धों की स्थिति पर चिंतन हो रहा है। वृद्धों की समस्या हमारे समाज में बढ़ते जा रही है। इस उपन्यास में कृष्णा सोबती ने वरिष्ठ नागरिकों को जीवन रसास्वादन करने के लिए प्रेरित किया है। 25 वर्षों पहले प्रकाशित उपन्यास ‘समय सरगम’ में नई राह दिखाई है,हिंदी की यह पहली लेखिका हैं जिन्होंने लिंग, वर्ग, जाति ,संप्रदाय और धर्म को सीधे-सीधे अस्वीकार किया है। पृष्ठ 107

समकालीन उपन्यास के संदर्भ में लेखिका डॉ नमिता जायसवाल ने स्त्री सत्ता, अस्तित्व और अस्मिता में विभिन्न उपन्यासों के माध्यम से वर्तमान समाज में महिला अधिकार की पुरुष के साथ उसकी समानता और समाज के हर क्षेत्र में उसकी भागीदारी, विश्व स्तर पर एक नई चेतना की गुहार लगा रही है। सामाजिक एवं पारिवारिक ढांचे में जो समस्याएं अधिकांशतः जन्म लेती हैं उनका संबंध मुख्यतः स्त्री जाति से ही होता है। आज भी स्त्री मानसिक और शारीरिक रूप से जूझ रही हैं बस मात्र उसके उत्पीड़न के तरीके बदल गए हैं।

‘तिरछी बौछार ‘की विस्मिता, ‘यामिनी कथा’ की यामिनी गीतांजलि श्री की ‘माई’ की माई अपने सामंती पारिवारिक परिवेश में इस संघ के माध्यम से पूरी तरह निचोड़ी गई स्त्री चरित्र हैं। आज आधुनिक युग में भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद और मानवीय मूल्यों के विनाशकारी परिवर्तन मानव अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा है। पहले तो समाज के भीतर के असुरक्षा थी और अब तो वैश्विक स्तर पर प्रगट असुरक्षा से अस्मिता का अभिप्राय भी इस बदलते परिवेश में बदलेगा ही।

समकालीन दौर में’दलित अस्मिता’ और ‘स्त्री अस्मिता’पर भी लेखिका ने विभिन्न साहित्यिक,सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर स्त्री विमर्श के विषय में लिखा है।

अस्मिता की चाह में समकालीन लेखिकाओं ने अपने उपन्यासों में स्त्री विषयक समस्या और समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। समाज में स्त्री पर होने वाली शारीरिक हिंसा, भावनात्मक हिंसा,यौन हिंसा संबंधी आंकड़े भी दिए हैं और उनकी विशद विवेचना की है।

यह पुस्तक स्त्री विमर्श और उनकी विभिन्न समस्याओं का दस्तावेज है जिसमें प्रश्न बहुत हैं लेकिन उनके उत्तर आज भी अनुत्तरित ही हैं।कुछ उत्तरों का समाधान हुआ है लेकिन जितना मिलना चाहिए वह भी समाज की भेंट चढ़ जाता है। स्त्री पुरुष का लिंग भेद आज भी मानवीयता के स्तर पर शर्मसार करने वाला ही है। स्त्रियों के सबलीकरण के साथ महिलाओं के सामने चुनौतियों की आज भी कमी नहीं है।
आने वाले समय में संभवतः स्त्री अपने प्रश्नों के और पुरुषों के प्रश्नों के भी उत्तर देने में सक्षम होगी। हिंदी में महादेवी वर्मा पहली कवयित्री थीं जो साहित्य की स्त्री क्रांतिकारी दृष्टि , व्यावहारिक और गहरी सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत थी। उन्होंने भारतीय नारी को मात्र ‘देवी’ या ‘पुरुष की छाया’ मानने वाली रूढ़िवादी परंपरा का खंडन किया और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व, आर्थिक आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भी वकालत की।
नमिता जायसवाल की ‘लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न’ हिंदी साहित्यकारों , शोधार्थी और सामान्य पाठकों के लिए पढ़ने के लिए संग्रहणीय पुस्तक है ।शुभकामनाओं सहित।

इस साल सामान्य से कम होगी बारिश

– देशभर में धीमी रहेगी मानसून की रफ्तार

नयी दिल्ली । भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने शनिवार को कहा कि इस वर्ष देश में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। विभाग के अनुसार, अब तक मानसून दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत, पूर्वोत्तर राज्यों और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके बाद देश के अन्य क्षेत्रों में इसकी रफ्तार धीमी रहने की उम्मीद है। मीडिया से बातचीत करते हुए आईएमडी के वैज्ञानिक प्रदीप शर्मा ने कहा कि अल नीनो प्रभाव अब सक्रिय हो चुका है और पूरे मानसून सीजन के दौरान इसके बने रहने की संभावना है। उन्होंने कहा, “दक्षिण-पश्चिम मानसून के दीर्घकालिक पूर्वानुमान के अनुसार इस साल पूरे देश में सामान्य वर्षा का लगभग 98 प्रतिशत यानी सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है।”
आईएमडी के एक अन्य वैज्ञानिक नरेश कुमार ने बताया कि पिछले दो दिनों से पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश और गरज-चमक की गतिविधियां देखने को मिल रही हैं।
उन्होंने कहा, “इसके लिए पहले ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था। फिलहाल पश्चिमी विक्षोभ उत्तर हरियाणा और उससे सटे क्षेत्रों में सक्रिय है। इसके प्रभाव से शनिवार को पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और हिमालयी क्षेत्रों में बारिश और गरज-चमक जारी रहने की संभावना है। इस दौरान 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं।”
उन्होंने बताया कि दिल्ली-एनसीआर के लिए शनिवार को येलो अलर्ट जारी किया गया है, जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है।
नरेश कुमार ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में हल्की बारिश और तेज हवाओं की संभावना को देखते हुए येलो अलर्ट जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी विक्षोभ के असर से उत्तर भारत के तापमान में पिछले दिनों 6 से 8 डिग्री सेल्सियस की गिरावट दर्ज की गई है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में तापमान 4 से 6 डिग्री तक बढ़ सकता है, लेकिन यह सामान्य या सामान्य से कम स्तर पर ही रहेगा।
आईएमडी के अनुसार, मानसून दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश हिस्सों को कवर कर चुका है और महाराष्ट्र तक पहुंच गया है, लेकिन इसके आगे बढ़ने की गति फिलहाल धीमी पड़ गई है।
विभाग ने बताया कि मानसून पूर्वोत्तर भारत और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भी पहुंच चुका है। अगले दो से तीन दिनों में इसके बिहार, ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के अधिक हिस्सों तक पहुंचने की संभावना है, हालांकि इसके बाद इसकी प्रगति धीमी रह सकती है।

 

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गृहिणी भी राष्ट्र निर्माता, हर महीने मिले 30 हजार रुपये : सुप्रीम कोर्ट

-सड़क हादसों में मुआवजा नीति पर सुनाया फैसला

 नयी दिल्ली । देशभर में सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के परिवारों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा मिलना चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि उनके काम की तुलना किसी कुशल मजदूर की दिहाड़ी से करके उनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।

मामले में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने एक नया सिद्धांत तय करते हुए कहा कि किसी हादसे में गृहिणियों की मौत होने पर, उनके द्वारा की जाने वाली देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम 30000 रुपये प्रति महीना (3.6 लाख रुपये सालाना) मानी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने जोर दिया कि यह रकम ‘प्रणय सेठी’ मामले में तय अन्य सभी मुआवजा नियमों के अलावा होगी। बता दें कि इन मामलों में अब तक देश की अदालतें और एक्सीडेंट ट्रिब्यूनल किसी हादसे में जान गंवाने वाली गृहिणियों का मुआवजा तय करने के लिए एक ‘काल्पनिक आय’ मानती थीं। इसके लिए राज्य के न्यूनतम वेतन को आधार बनाया जाता था, जो कि बहुत कम होता था। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने ढर्रे को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू काम और परिवार की देखभाल की असली आर्थिक और सामाजिक कीमत को सिर्फ मजदूरों के वेतन से नहीं तौला जा सकता। महिलाओं का योगदान अमूल्य है, भले ही उन्हें इसके लिए कोई सैलरी न मिलती हो।

मामले में कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को लेकर सख्त और अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने मुआवजे के मामलों में हो रही इस भारी देरी पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना के दावों का निपटारा आमतौर पर एक साल के भीतर हो जाना चाहिए। अगर पीड़ितों को दशकों तक इंतजार करना पड़े, तो कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक फैसला पंजाब के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने 2003 में फैसला दिया, लेकिन यह मामला सालों-साल कानूनी दांवपेच में फंसा रहा। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस पर दिसंबर 2024 में जाकर फैसला सुनाया, यानी हादसे के 23 साल बाद।