Monday, January 5, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog

कहानी पूर्वोत्तर भारत की – भाग -3 पूर्वोत्तर भारत और महाभारत का सम्बन्ध

डॉ. सुधा कुमारी
भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा जो सात राज्यों का समूह है, मुख्य भाग से काफी दूर माना जाता है। आज की तारीख में इस हिस्से में भेजा जानेवाला व्यक्ति थोड़ा असहज महसूस करेगा और इतनी दूर जाने से हिचकेगा। किन्तु यहाँ प्रवास करनेवाले को धीरे धीरे मालूम होता है कि यह भाग प्राचीन भारत से कितना जुड़ा हुआ था।प्राचीन कथाएँ इसका बयान करती हैं। विशेष रूप से महाभारत काल की कई यादें यहाँ से जुड़ी हुई हैं। पांडवों ने इस हिस्से में प्रवास किया था और महाबली भीम ने हिडिम्बा नामक युवती से विवाह किया था। हिडिम्बा आसाम के बोड़ो जनजाति की सुंदर लड़की थी और भीम एक वर्ष तक यहाँ वास कर पुत्र के जन्म के उपरांत वापस चले गए। यह इतिहास का दुखद हिस्सा है। ऊपर से हिडिम्बा और हिडिम्ब को राक्षस जाति का बताकर आर्यावर्त्त ने उस दुखी पत्नी के साथ कोई न्याय नहीं किया। उनका पुत्र घटोत्कच भी महाभारत युद्ध में पिता की ओर से लड़कर वीरगति को प्राप्त हो गया। इस जनजाति में कुछ समुदाय यज्ञ भी करते हैं। वे ब्रह्म में विश्वास करते है और हिडिम्बा देवी को अपने पूर्वज के रूप में पूजते हैं। बोड़ो जनजाति का यह क्षेत्र बांगलादेश से अवैध घुसपैठ के कारण उपद्रव ग्रस्त रहा है। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में तेज बहती पहाड़ी नदियों ने मिट्टी कटाव और साथ में लाए हुए पत्थरों के जमाव के कारण काफी नुकसान पहुँचाया है।
बोड़ो जनजाति की भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इनमें कई लोग साहित्य में अत्यंत प्रतिभाशाली, हस्त शिल्पकार, कलाकार एवं खेल-कूद में अव्वल हैं। इनका क्षेत्र हस्तकला एवं कपड़े की उत्कृष्ट बुनाई के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ की वस्त्रकला में सुंदर रंगों का प्रयोग किया जाता है। वैसे तो पूर्वोत्तर के हर राज्य में सूती वस्त्र की हथकरघा निर्मित सुन्दर कलात्मक पोशाकें बनती हैं। मगर आसामी रेशम की हथकरघा निर्मित कलात्मक पोशाकें पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा पूरे भारत में विख्यात हैं। भारत के दूसरे राज्यों में भी आसाम का बना पाट रेशम और एरी रेशम काफी प्रचलित है। एरी रेशम बनाने की विधि को अहिंसक माना जाता है क्योंकि इसमें रेशम का कीड़ा नहीं मरता। हाँ, यह रेशम थोड़ा मोटा अवश्य होता है।
आसाम में तेजपुर का नाम सभी ने सुना होगा। तेजपुर में सैनिक छावनी है। पुराने समय में यहाँ नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया (नेफा) का मुख्यालय रहा है। भौगोलिक दृष्टिकोण से आसाम को अपर आसाम (अरुणाचल प्रदेश से आसाम में प्रवेश करने वाला ब्रह्मपुत्र घाटी का पहाड़ी भाग ), मिडल आसाम ( ब्रह्मपुत्र घाटी का मध्य भाग ) और लोअर आसाम ( ब्रह्मपुत्र घाटी का आसाम से बांग्लादेश जाने वाला समतल भाग ) के रूप में देखा जाता है। ब्रह्मपुत्र अपर आसाम से प्रवेश करता है और लोअर आसाम में धुबरी होते हुए बांगला देश में पदमा नदी बनकर चला जाता है।
गुवाहाटी से 2 घंटे की दूरी पर स्थित तेजपुर शोणितपुर जिले का मुख्यालय है और ब्रह्मपुत्र के मध्य भाग पर यानी मध्य आसाम में अवस्थित है। चाय के बगान मध्य आसाम से अपर आसाम तक पाए जाते हैं। तेजपुर से चाय बगान और फैक्ट्रियाँ शुरू हो जाती है।आर्य कथाओं के अनुसार, तेजपुर की जनजाति के राजा बाणकी पुत्री उषा ने स्वप्न में श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध को देखा और मोहित हुई। उसकी सहेली चित्रलेखा ने उसके वर्णन करने पर अनिरुद्ध का चित्र बनाया और उसे हरण करके तेजपुर लाई जहाँ अनिरुद्ध ने भी उषा को पसंद किया। पर उनका विवाह आसान नहीं था। यहाँ श्रीकृष्ण की राजा बाण से लड़ाई हुई। इस युद्ध में श्रीशिव ने बाण राजा का साथ दिया। फिर काफी मुश्किल से युद्ध को रोका गया।उसके बाद अनिरुद्ध का विवाह उषा से हुआ। उस खूनी युद्ध की छाया शोणितपुर और तेजपुर के नाम पर पड़ी है। असमिया भाषा में ‘तेज’ का अर्थ ‘रक्त’ होता है और संस्कृत में शोणित का अर्थ भी ‘रक्त’ होता है।
उषा और चित्रलेखा की स्मृति दिलाता सुंदर उद्यान तेजपुर में चित्रलेखा पार्क कहलाता है जहाँ ऊँचे – ऊँचे तालवृक्षों की कतार है, छोटी- सी झील है और महाभारत कालीन समय का एहसास कराते पुराने चट्टानों के अवशेष हैं।यहाँ से थोड़ी दूर पर तेजपुर में ही अग्निगढ़ नामक एक सुंदर उद्यान है जो एक टीले पर स्थित है। यहाँ सीढ़ियों से ही जाया जा सकता है।यहाँ पर उषा को कैदकर रखा गया था क्योंकि आर्य जाति और जनजाति – दोनों ही उषा और अनिरुद्ध के विवाह के विरुद्ध थे।उस स्थिति को दर्शाती हुई मूर्तियाँ हर जगह लगी हुई हैं।
आसाम में गुवाहाटी शहर में जहाँ नीलाचल पर्वत पर देवी कामाख्या का निवासहै, वहाँ नरक नामक असुर का पर्वत बताया जाता है। यहाँ श्री कृष्ण ने उससे युद्ध किया और मार दिया था। कारण यह बताया जाता है कि वह एक असुर था, सोलह हजार कन्याओं को अपहरण कर बंदी बना चुका था और उनसे विवाह करनेवाला था।उन कन्याओं ने मुक्ति के बाद पिता के घर जाने से इन्कार किया क्योंकि कई वर्ष पूर्व अपहरण होने से घर का पता भूल गई थीं और नरकासुर की बंदिनी को पिता के घर सम्मान मिलना सुनिश्चित नहीं था।कृष्ण ने उन सभी कन्याओं से विवाह किया और द्वारका ले गए।आश्चर्य की बात है कि उन सोलह हजार कन्याओं में से किसी के घरवालों ने ढूँढा या नहीं, कृष्ण से विवाह के बाद भी वे कभी अपनी कन्याओं से मिलने आए या नहीं, इसका कुछ भी पता नहीं है।कृष्ण ने अपनी दैवी शक्तियों का प्रयोग किया होता तो वे सभी लड़कियाँ पिता के घर ससम्मान लौट सकती थीं।
आर्यावर्त्त की प्राचीन कथाओं में राजा बाण को असुर कहा गया है जबकि वह तेजपुर की जनजाति के राजा थे।उत्तर भारत के प्रसिद्ध हिंदी कवि भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखा है :
‘बानासुर की सैन को, हनन लगे भगवान।’
यह असुर शब्द का प्रयोग ठीक नहीं।राजा बाण, नरक, बोडो जनजाति के राजकुमार हिडिम्ब और हिडिम्बा- यहाँ तक कि दक्षिण भारत के दानवीर राजा बलि को भी – इन्हीं शब्दों से संबोधित किया गया है।शायद आर्यों ने अपने सभी विपक्षी समुदायों और शत्रुओं के लिए ‘अनार्य’ उपाधि के साथ – साथ ‘असुर’, ‘दैत्य’ और ‘राक्षस’ – शब्दों का अनिवार्य रूप से प्रयोग किया था और अपनी लोक कथाओं में आवश्यकता के अनुसार उनके सींग – पूँछ भी उगा दिए थे।वर्ना धरती पर डायनासोर जैसे दैत्य तो मनुष्य के जन्म से बहुत पहले ही समाप्त हो चुके थे।
कृष्ण और भीम के बाद अर्जुन का जिक्र आता है। अर्जुन शिवजी को प्रसन्न कर पाशुपत अस्त्र पाने के लिये पूर्वोत्तर के जंगलों में तपस्या करने आए थे।शिव ने किरात (भील) के रूप में उनसे युद्ध कर परीक्षा ली और फिर प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।अर्जुन का संबंध मणिपुर से बताया जाता है। वहाँ की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन ने विवाह किया था और एक पुत्र को जन्म भी दिया था। पर उसे अपने साथ नहीं ले गए और उनका वह पुत्र मणिपुर में माता के साथ ही रहा। आर्यकथाओं में इससे आगे का उल्लेख नहीं किया गया हैं। किन्तु मणिपुरी नृत्य में और वहाँ के एक समुदाय ( मेईटी ) की जीवन शैली और नृत्य – कला में महाभारत काल और कृष्णभक्ति की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
महाभारत में परशुराम का भी जिक् रहुआ है। परशुराम का सम्बन्ध पूर्वी अरुणाचल प्रदेश से है। हिंदी कथाओं के अनुसार परशुराम की माता रेणुका थीं जिनका उल्लेख गन्धर्व राज चित्रग्रीव के सन्दर्भ से किया गया है। परशुराम के पिता जमदग्नि ने पत्नी से क्रोधित होकर स्वयं रेणुका की हत्या न करके अपने बेटे से मातृह्त्या का यह जघन्य कृत्य करवाया। निश्चित रूप से जमदग्नि पितृसत्तात्मक (पुरुष प्रधान) समाज का प्रतीक है और यह घटना पितृसत्ता का ही परिणाम है। सम्पूर्ण घटना पूर्वोत्तर भारत के तपोवन में घटी थी। मातृह्त्या का जघन्य पाप करने के कारण परशुराम के हाथ शक्तिहीन हो गए और दुबारा फरसा उठा नहीं पाए। वह फरसा पत्थरों में ही गड़ गया। अपने पाप के बोझ से मुक्ति पाने के लिये परशुराम को पूर्वोत्तर भारत में लोहित नदी के तट( आज अरुणाचल प्रदेश का वर्तमान इलाका ) पर प्रवास करना पड़ा।यह स्थान दुर्गम और छुपा हुआ है। कई वर्षों तक वहाँ प्रवास करने और लोहित नदी की शीतल धार में स्नान करने के बाद परशुराम को मातृहत्या के भीषण पाप से मुक्ति मिली। हमारे हिंदी या आर्य कथा- साहित्य में ये लिखा गया है कि परशुराम ने माता की हत्या के बाद पिता से वरदान में माता का जीवन मांग लिया था। मगर परशुराम के पश्चात्ताप का यह जिक्र नहीं किया गया है। शायद नारियों की पूजा करनेवाला पुरुष – प्रधान आर्य समाज मातृहत्या को भी पुण्य समझता था!
लोहित नदी पापियों को मुक्ति दे या न दे, पर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश का यह दुर्गम स्थल है अत्यंत मनोरम। सुंदर पर्वत, हरियाली से भरी ढलान, बड़े – बड़े सफ़ेद पत्थरों से भरा तट और ढलान से गिरता बर्फ – सा स्वच्छ शुभ्र प्रपात जो नीली धारा बनकर पत्थरों के तट के बीच अविकल, कलकल बहता है।इस स्थल का नाम ‘परशुराम कुंड’ परशुराम के नाम पर पड़ा है। यहाँ प्रतिवर्ष लोग स्नान करने आते हैं। पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में परशुराम कुंड के रास्ते में तथा अन्य जगहों पर नारंगी के कई बगान हैं जिनके बारे में अधिकांश भारतीयों को पता भी नहीं होगा। वहाँ ‘ऑरेंज फेस्टिवल’ में पारम्परिक पोशाक में सांस्कृतिक आयोजन होते है। आवश्यकता है कि अरुणाचल प्रदेश की इस वन – सम्पदा का अच्छी तरह से उपयोग किया जाय और वहाँ नारंगी से सम्बंधित उद्योग- धंधे विकसित किये जायँ।
परशुराम कुंड से थोड़ी दूर पर नामसाई नामक जगह के पास बुद्ध का’ गोल्डन पगोडा’ है जिसके विशाल हरे – भरे प्रांगण में छोटे – छोटे गेस्ट हाउस बने हैं। भोजन की व्यवस्था गेस्ट हाउस से थोड़ा हटकर एक अलग भोजनालय में की गयी है।यह स्थान अत्यंत शांत और स्वच्छ है। अरुणाचल के इस इलाके के बाद उत्तर दिशा में आगे बढ़ने पर ब्रह्मपुत्र का दुर्गम तट आता है जिसके नीचे बड़े – बड़े पत्थरों से भरी ब्रह्मपुत्र नदी की तलहटी है। ढोला सदिया सड़क पुल 2019 में बना है।इससे पहले जाड़े में यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी की धारा सूख जाने पर गाड़ियाँ इस दुर्गम पथ पर पत्थरों से गुजरकर नाव के पास पहुँचती थीं जो अपने आप में बहुत कठिन सफर होता था। इसके बाद रोइंग का तटवर्ती इलाका आता है जहां गाड़ियों को एक अलग तरह के पुल से गुजरना होता है। रोइंग के पश्चिम में काफी आगे जाने पर सियांग नदी के किनारे बसा पासीघाट है। रंग–बिरंगे पत्थरों से भरी सियांग की खूबसूरत घाटी के ऊपर सजा हुआ पासीघाट एक हिल – स्टेशन जैसा शांत और मनोरम दिखता है।यहाँ यह बताना आवश्यक है कि अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्रफल काफी बड़ा है और इसके पूर्वी भाग से पश्चिमी भाग में जाने के लिए असम से होकर जाना पड़ता है। ये दोनों भाग पहाड़ों और नदियों से जुड़े है।पश्चिमी अरुणाचल में इसकी राजधानी ईटानगर और तावांग की खूबसूरत बर्फीली घाटी है जिसके दृश्य किसी भी सैलानी को कश्मीर की तरह मोह लेते है।
महाभारत काल के अति विशिष्ट पुरुषों का पूर्वोत्तर भारत से संपर्क और गहरा संबंध देखकर प्रतीत होता है कि हमने उन्हें समुचित आदर और महत्व नहीं दिया।इतनी सारी ऐतिहासिक बातें भारत के मुख्य भाग में ज्ञात नहीं होती हैं। इतिहास ने पूर्वोत्तर भारत और आर्य सभ्यता के इतने घनिष्ठ और आत्मीय संबंधों को तथा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को बड़ी सावधानी से अपने पन्नों में छुपा लिया।इसके बावजूद, पूर्वोत्तर भारत जहाँ अर्जुन, भीम, अनिरुद्ध जैसे विख्यात कुमारों के दिल कभी धड़के थे और स्वयं कृष्ण ने विवाह किया था, आज भी देश की मुख्य धारा का आकर्षण केंद्र बना हुआ है।दिल्ली का राजपथ हो या कोई और जगह – असम का खूबसूरत फुलाम गामोसा (अंग वस्त्र) अक्सर मह्त्वपूर्ण कंधों को सुशोभित करता रहता है।अब समय आ गया है कि यहाँ की जनजातियों की अच्छी परंपराओं को मुख्य धारा में अपनाया जाय। पूर्वोत्तर भारत में सामाजिक विषमता और कुरीतियाँ न्यूनतम हैं।आपसी आदर और सम्मान है। सामाजिक व्यवस्था कुंठा मुक्त, सुसंस्कृत और सराहनीय है।
हिन्दी प्रधान प्रांतों में सामाजिक व्यवस्था पुरुष – प्रधान तो है ही, महिलाओं को अनावश्यक रूढ़ियों से सख्ती से जकड़कर भी रखती है। इन प्रांतों में एक भी उत्सव नहीं जिसे स्त्री- पुरुष, युवा- युवतियाँ, बालक- बालिकाएँ साथ- साथ आनन्दपूर्वक मनाएँ और संगीत पर उल्लास से थिरक सकें। केवल धार्मिक अनुष्ठान या फिर पति की पूजा वाले करवा चौथ जैसे व्रत होते हैं। होली के नाम पर हुड़दंग, कीचड़ और सामाजिक असुरक्षा अधिक दिखते हैं। होली के दिन कोई महिला सड़क पर सुरक्षित महसूस नहीं करती। दो – चार दिन पहले से ही होली का हुड़दंग शुरू हो जाता है। होलिका की जगह यदि अपनी गलत रीतियों को समाप्त कर दें तो बेहतर हो। एक दीवाली ही है जिसमें पटाखे, आतिशबाजी और दीपमाला धरा – गगन को प्रकाशमान करते हैं। पर दीपोत्सव में भी धार्मिक पुट दे दिया जाता है। हिंदी – प्रधान प्रान्तों में महिला सबसे ज्यादा असुरक्षित और हमले का शिकार होती है, राह चलते असभ्य दृष्टि और असभ्य शब्दवाणों को झेलती है। यदि पूर्वोत्तर की तरह सामूहिक उत्सव और प्रसन्नता के पर्व इन प्रांतों में भी आयोजित होते तो सामाजिक स्थिति बेहतर हो सकती थी। यह विचार हिंदीभाषी प्रान्तों को कम दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें शांति और उल्लास का संदेश देने के लिए है।

(स्रोत – नवभारत टाइम्स)

कहानी पूर्वोत्तर भारत की : भाग -2 प्राचीन आख्यानों में भारत और पूर्वोेत्तर भारत

आज जब भारत तकनीक, विज्ञान और वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है, उसी समय हमारे समाज के भीतर एक ऐसा मौन घाव भी है, जो दिखता नहीं—पर पीड़ा देता है। यह घाव है अपने ही देश के उत्तर–पूर्वी राज्यों (सेवेन सिस्टर्स) को “अलग” समझने का।
उनकी आँखों की आकृति, उनकी त्वचा का वर्ण,उनकी वेशभूषा,उनकी बोली— इन सबको आधार बनाकर जब कोई उन्हें “पराया” कह देता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता—भारत की आत्मा सिसकती है।
भारतवर्ष: केवल देश नहीं, संस्कार की भूमि
संस्कृत में “भारत” शब्द का अर्थ है—
“भा” धातु = प्रकाश, ज्ञान
“रत” = जो उसमें रत हो
भारत अर्थात—जो ज्ञान और धर्म के प्रकाश में रत हो। यह परिभाषा किसी नक्शे से नहीं,
चेतना से जुड़ी है।इस भारतवर्ष में उत्तर–पूर्व, उत्तर–पश्चिम, दक्षिण, मध्य—ये दिशाएँ थीं, विभाजन नहीं। वैदिक दृष्टि: एकत्व का घोष
ऋग्वेद उद्घोष करता है—
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
(ऋग्वेद 10.191.2)
व्याख्या:
– साथ चलो
– साथ बोलो
– और तुम्हारे मन एक हों यह मंत्र किसी सभा के लिए नहीं था, यह समूचे भारतवर्ष के लिए जीवन-सूत्र था।

उत्तर–पूर्व और वैदिक परंपरा का संबंध

कामरूप और शक्ति-साधना
असम का कामरूप केवल एक क्षेत्र नहीं था—
वह शक्ति की आराधना का केन्द्र था।
कामाख्या पीठ— जहाँ आज वैदिक मंत्र, तांत्रिक विधि और प्रकृति-पूजन एक साथ जीवित हैं।
यह वही शक्ति है जिसकी स्तुति में कहा गया—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।”

प्राग्ज्योतिष और अरुणाचल
पुराणों में अरुणाचल क्षेत्र को प्राग्ज्योतिष कहा गया— जहाँ सबसे पहले सूर्य का प्रकाश पड़े।
यह केवल भौगोलिक सत्य नहीं,
आध्यात्मिक संकेत है— ज्ञान का प्रथम आलोक।

मणिपुर और महाभारत
जब कोई मणिपुर को “अलग” कहता है,
तो क्या वह यह भूल जाता है कि—
अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की राजकुमारी थीं
महाभारत केवल ग्रंथ नहीं, भारत की स्मृति है—
और मणिपुर उस स्मृति का अंग है।

संस्कृति अलग, संस्कार एक
संस्कृत में संस्कृति का अर्थ है— “संस्कारयति इति संस्कृति:” जो मनुष्य को संस्कारित करे, वही संस्कृति है।
उत्तर–पूर्व की संस्कृतियों में— प्रकृति को देवता माना गया पर्वत, नदी, वृक्ष पूज्य हैं,सामूहिक जीवन को प्राथमिकता है यही तो वैदिक दृष्टि है— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
(अथर्ववेद)
विविधता पर नहीं, उपहास पर लज्जा होनी चाहिए, किसी की आँखें छोटी हैं— तो क्या उसकी देशभक्ति भी छोटी हो जाती है?
किसी का पहनावा अलग है— तो क्या उसका त्याग कम हो जाता है?
जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि रूप नहीं, राष्ट्र भावना महत्वपूर्ण है, उस दिन भारत सच में एक होगा।

भारत एक देह है, उत्तर–पूर्व उसकी धड़कन

काशी आत्मा है,
तो कामाख्या शक्ति है।
यदि गंगा शिरा है,
तो ब्रह्मपुत्र प्राण है।
यदि राम भारत की मर्यादा हैं,
तो उत्तर–पूर्व भारत की मौन साधना है।

अंतिम संस्कृत संदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
जो अपने-पराए का भेद करता है, वह संकीर्ण है। उदार वही है,
जिसके लिए पूरा भारत एक परिवार है।

आज पूर्वोत्तर के जिन सात राज्यों को सात बहनों के नाम से हम जानते हैं, वे राज्य पश्चिम बंगाल और असम के विभाजन के फलस्वरूप स्वतंत्र रूप से अस्त्तिव में आए हैं। ये छोटे राज्य मणिपुर, मेघालय अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और मिजोरम हैं। प्राग्तिैहासिक काल के पन्नों को खंगालें तो पता चलता है कि भगवान परशुराम और कार्तवीर्य अर्जुन के बीच जो भीषण युद्ध हुआ था, उसके अंतिम आततायी को परशुराम ने अरूणाचल प्रदेश में जाकर मारा था। अंत में यहीं के ‘लोहित क्षेत्र‘ में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी में अपना रक्त-रंचित फरसा धोया था। बाद में स्मृतिस्वरूप यहां पांच कुण्ड बनाए गए, जिन्हें समंतपंचका रूधिर कुण्ड कहा जाता है। ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं। इस क्षेत्र में यह दंतकथा भी प्रचालित है कि इन्हीं कुण्डों में भृगुकुल भूशण परषुराम ने युद्ध में मारे गए योद्धाओं का तर्पण किया था। परशुराम यही नहीं रूके, उन्होंने शुद्र और इस क्षेत्र की जो आदिम जनजातियां थीं, उनका यज्ञोपवीत संस्कार करके उन्हें ब्रह्मण बनाया और सामूहिक विवाह किए।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व से पश्चिम की सामरिक और सांस्कृतिक यात्रा की। द्वारिका एवं माणिपुर में सैन्य अड्डे स्थापित किए। इसीलिए इस पूरे क्षेत्र की जनजातियां अपने को रामायण और महाभारत काल के नायकों का वंशज मानती हैं। यही नहीं ये अपने पुरखों की यादें भी जीवित रखे हुए हैं। सूर्यदेव को आराध्य मानने वालीं अरूणाचल की 54 जनजातियों में से एक मिजो-मिष्मी जनजाति खुद को भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी रूक्मणी का वंशज मनती हैं। दंतकाथाओं के अनुसार, आज के अरूणाचल क्षेत्र स्थित भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। उनके पिता का नाम भीष्मक एवं भाई का नाम रूक्मंगद था। जब कृश्ण रूक्मणी का अपहारण करने गए तो रूक्मंगद ने उनका विरोध किया। परमवीर योद्धा रूक्मंगद को पराजित करने के लिए कृश्ण को सुदर्शन चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पर रूक्मणि का ह्रदय पसीज उठा और उन्होंने कृष्ण से अनुरोध किया कि वे भाई के प्राण न लें, सिर्फ सबक सिखाकर छोड़ दें। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को रूक्मंगद का आधा मुंडन करने का आदेश दिया। रूक्मंगद का यही अर्द्धमुंडन आज सेना के जवानों की ‘हेयर स्टाइल‘ मानी जाती है। मिजो-मिष्मी जनजाति के पुरूष आज भी अपने बाल इसी तरह से रखते हैं। दिल्ली में निदो नामक जिस युवक के बालों पर नोकझोंक हुई थी, उसके बाल इसी परंपरागत तर्ज के थे। वास्तव में वह भगवान कृष्ण द्वारा निर्मित परंपरा का निर्वाह कर रहा था, जिस कृष्ण की पूजा उत्तर भारत समेत समूचे देश में होती है। यदि वाकई देश के लोग इस लोककथा से परिचित होते तो शायद निदो पर जानलेवा हमला ही नहीं हुआ होता?
मेघालय की खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 13 लाख है। यह जनजाति आज भी तीरंदजी में प्रवीण मानी जाती है। किंतु हैरानी यह है कि धनुष-बाण चलाते समय ये अंगूठे का प्रयोग नहीं करते। ये लोग अपने को एकलव्य का वंशज मानते हैं। यह वही एकलव्य है, जिसने द्रोणाचार्य के मागंने पर गुरूदक्षिणा में अपना अंगूठा दे दीया था। इसी तरह नागालैंड के शहर दीमापुर का पुराना नाम हिडिंबापुर था। यहां की बहुसंख्यक आबादी दिमंशा जनजाति की है। यह जाति खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानती है। दीमापुर में आज भी हिडिंबा का वाड़ा है। यहां राजवाड़ी क्षेत्र में स्थित शतंरज की बड़ी- बड़ी गोटियां पर्यटकों के आर्कशण का प्रमुख केंद्र्र हैं। किवदंती है कि इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र वीर घटोत्कच शतरंज खेलता था।
म्यांमार की सीमा से सटे राज्य माणिपुर के जिले उखरूल का नाम उलूपी-कुल का अपभ्रंश माना जाता है। अर्जुन की एक पत्नी का नाम भी उलूपी था जो इसी क्षेत्र की रहने वाली थी। तांखुल जनजाति के लोग खुद को अर्जुन और उलूपी का वंशज मानते हैं। ये लोग मार्शलआर्ट में माहिर माने जाते हैं। अर्जुन की दूसरी पत्नी चित्रांगदा भी मणिपुर के मैतेयी जाति से थी। यह जाति अब वैष्णव बन चुकी है। असम की बोडो जनजाति खुद को सृष्टि के रचीयता ब्रह्मा का वंशज मानती है। असम के ही पहाड़ी जिले कार्बी आंगलांग में रहने वाली कार्बी जनजाति स्वंय को सुग्रीव का वंशज मानती है। देश के तथाकथित मार्क्सवादी प्रगतिशील इतिहासकार रामायण और महाभारत कालीन पात्रों व नायकों को भले ही मिथक मानते हों,लेकिन यह मिथकियता पूर्वोत्तर राज्यों के रहवासियों को रक्त व धर्म आधारित सांस्कृतिक एकरूपता से जोड़ती है तो यही वह स्थिति है, जिसका व्यापाक प्रचार संर्कीण सोच के लोगों को खंडित मानसिकता से उबार सकता है। हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, लोक और दंत कथाओं में ज्ञान के ऐसे अनेक स्रोत मिलते हैं,जो हमें सीमांत प्रदेषों में भी मूल भारतीय होने के जातीय गौरव से जोड़ते हैं। लिहाजा जरूरी है कि हम सांस्कृतिक एकरूपता वाली इन कथाओं को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करें ? पूर्वोत्तर राज्यों में रक्तजन्य जातीय समरसता के इस मूल-मंत्र से जातीय एकता की उम्मीद की जा सकती है।

(इनपुट – प्रवक्ता डॉट कॉम)

वायु सेना प्रमुख ने स्वदेशी हथियारों की आपूर्ति पर दिया जोर

नयी दिल्ली । एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) की दो दिवसीय नेशनल सेमिनार ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ रविवार को बेंगलुरु के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स में शुरू हुई। सेमिनार के उद्घाटन संबोधन में वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एक बार फिर स्वदेशी हथियारों की समय पर आपूर्ति करने पर जोर दिया है। उन्होंने एडीए को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस की उड़ान के 25 साल पूरे होने पर बधाई दी और आज के लगातार बदलते समय में वायु सेना को ऑपरेशनली तैयार रखने के लिए कहा। इस मौके पर डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी कामत ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर जोर दिया, जिससे विकसित भारत @2047 का विजन पूरा हो सके। सेमिनार में आधुनिक एयरोस्पेस प्रौद्योगिकी के अलग-अलग पहलुओं का अन्वेषण करना है, जिसमें अगली पीढ़ी के एयरक्राफ्ट के लिए विनिर्माण और संयोजन, डिजिटल विनिर्माण, एरोडायनामिक्स, प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी, फ्लाइट टेस्टिंग टेक्नीक, डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन चैलेंज, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और एवियोनिक्स, फाइटर एयरक्राफ्ट में मेंटेनेंस चैलेंज, एयरक्राफ्ट डिजाइन पर ध्यान केंद्रित किया जाना है। सेमिनार में भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के भविष्य और एलसीए तेजस के स्केच से स्क्वाड्रन तक के सफर के बारे में बताया जाएगा। एडीए ने एलसीए तेजस को डिजाइन और विकसित किया है, जिसके 5,600 से ज्यादा सफल फ्लाइट परीक्षण हो चुके हैं। इससे सरकारी लैब, एकेडमिक इंस्टीट्यूट और इंडस्ट्री समेत 100 से ज्यादा डिजाइन वर्क सेंटर जुड़े थे। एलसीए को चौथी पीढ़ी का फाइटर बनाने के लिए कार्बन कंपोजिट, हल्के मटेरियल, फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल, डिजिटल यूटिलिटी मैनेजमेंट सिस्टम, ग्लास कॉकपिट वगैरह जैसी कई खास तकनीक विकसित की गईं।

कहानी पूर्वोत्तर भारत की : भाग -1 भारत की संवेदना- सात राज्य, सात बहनें

भारत के उत्तर -पूर्वी राज्य या पूर्वोत्तर भारत और अलग – अलग क्षेत्रों में अपना योगदान देने वाले वहां के लोग हमारे भारत का ही अभिन्न अंग हैं। हाल ही में देहरादून में एंजल चखमा कांड में जो हुआ, हम उसकी तह में नहीं जाते मगर पूर्वोत्तर भारत के साथ होने वाला सौतेला व्यवहार एक सच्चाई है। मोमो, चाइनीज और चीनी बुलाने वाले लोग यह नहीं जानते है कि ये राज्य भारत के लिए कितने जरूरी है और बेशकीमती हैं और इसके लिए दोषी हम और आप तो हैं ही, सरकारें भी हैं जिन्होंने हमारी किताबों तक, हमारी जनता तक इन राज्यों की संस्कृति को, इतिहास को, समस्याओं तक पहुंचने ही नहीं दिया। हमें गर्व होना चाहिए हमारी सात बहनों पर और उनके भाई सिक्किम पर, वे हैं जो हंमारी सीमाओं पर डंटे हैं, हमारी रक्षा कर रहे हैं। जिस जम्मू – कश्मीर पर सारे संसाधन खर्च किये जाते रहे, आज भी वहां के लोग खुद को भारतीय नहीं कहना चाहते मगर हमारी सात बहनों के वासी गर्व के साथ खुद को भारतीय कहते हैं। शुभजिता के संसाधन सीमित हैं मगर उद्देश्य एक कि हम अपनी सात बहनों और उनके भाई को समझें। आखिर ऐसे कैसे कोई बाहरी व्यक्ति हमें इनसे अलग करने की बात कहकर चला जाता है..तो एक कोशिश है हमारे सात राज्यों को समझने की…हम कोशिश करेंगे कि इन राज्यों की संस्कृति, उनका इतिहास, योगदान आप तक लाने की…जिसकी जानकारी हमने इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से ली है। हम कोई क्रांति नहीं कर रहे, हम बस कोशिश कर रहे हैं कि भारत अपने हिस्से को समझे और समुचित सम्मान दे…शुरुआत परिचय से

-सम्पादक 

………………………………………………………………………………………..

यह लेख जागरण जोश से जो गरिमा झा ने लिखा है

भारत के सात बहन राज्यों की राजधानियाँ: यह लेख भारत के सात बहन राज्यों और उनकी राजधानियों पर चर्चा करता है। बहन राज्यों के बारे में विस्तार से जानें। भारत की सात बहनों की राजधानियाँ: क्या आपको भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित राज्यों के नाम याद हैं? क्या आप जानते हैं कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में से सात बहनें हैं और एक उनका भाई है? ये राज्य न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशिष्टता के कारण भी विशेष महत्व रखते हैं। ये राज्य हैं अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा। आइए इनके बारे में और अधिक जानें।
भारत के सात बहन राज्य कौन से हैं?
पूर्वोत्तर के सात राज्यों को भारत के सात बहन राज्य कहा जाता है। ये राज्य हैं- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा। भारत के सात बहन राज्यों की यह उपाधि अक्सर पूर्वोत्तर के इन राज्यों को संदर्भित करती है। सिक्किम को आमतौर पर इन राज्यों का भाई कहा जाता है।
इन्हें भारत की सात बहनें क्यों कहा जाता है?
इन राज्यों को इनकी परस्पर निर्भरता और समानता के कारण सात बहनें कहा जाता है। इस नाम के पीछे एक और कारण यह है कि इन पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग सिलीगुड़ी कॉरिडोर है, जिसे ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जाना जाता है। आइए भारत के सात राज्यों की राजधानियों पर एक नजर डालते हैं-
राज्य -अरुणाचल प्रदेश, राजधानी -ईटानगर
राज्य – असम, राजधानी-दिसपुर
राज्य – मणिपुर, राजधानी -इम्फाल
राज्य- मेघालय, राजधानी -शिलांग
राज्य – मिजोरम, राजधानी -आइजोल
राज्य – नगालैंड, राजधानी -कोहिमा
राज्य – त्रिपुरा, राजधानी -अगरतला
अरुणाचल प्रदेश – अरुणाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ है भोर की रोशनी से जगमगाते पहाड़ों की भूमि। यह भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है। एनसीईआरटी के अनुसार, यह 20 फरवरी 1987 को भारत गणराज्य का पूर्ण राज्य बना। 20 जनवरी 1972 तक इसे उत्तर-पूर्वी सीमांत एजेंसी (एनईएफए) के नाम से जाना जाता था। इसके बाद, यह केंद्र शासित प्रदेश बन गया और इसका नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया। एक रोचक तथ्य यह है कि अरुणाचल प्रदेश चार देशों – पश्चिम में भूटान, पूर्व में म्यांमार और उत्तर में तिब्बत और चीन – के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। राजधानी, ईटानगर का नाम राजधानी परिसर में स्थित 14वीं शताब्दी ईस्वी के ‘ईटा किले’ (ईंटों से बना किला) से लिया गया है।
असम – असम को अक्सर पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह राज्य सिलीगुड़ी के पास ‘चिकन नेक’ नामक भू-पट्टी के माध्यम से देश के शेष भाग से जुड़ा हुआ है। असम भूटान और बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। दिसपुर इसकी राजधानी है। एनसीईआरटी के अनुसार, असम मुख्य रूप से दो नदी घाटियों से मिलकर बना है: उत्तर में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित घाटी; और दक्षिण में बराक नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित घाटी। इन दोनों घाटियों के बीच पहाड़ियों की लंबी श्रृंखला (कार्बी, उत्तरी कछार और बराइल) फैली हुई है, जो राज्य की अधिकांश हरियाली और वन्यजीवों का स्रोत हैं। इसी अनूठी भौगोलिक विशेषता के कारण राज्य को ‘लाल नदी और नीली पहाड़ियों की भूमि’ के नाम से भी जाना जाता है।
मणिपुर – मणिपुर का शाब्दिक अर्थ है ‘रत्नों की भूमि’। इसके उत्तर, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में क्रमशः नागालैंड, असम और मिजोरम स्थित हैं। इम्फाल मणिपुर की राजधानी है। राज्य मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में विभाजित है: मध्य भाग में स्थित मैदानी क्षेत्र जिसे इम्फाल घाटी के नाम से जाना जाता है और पहाड़ी क्षेत्र। घाटी में मैतेई जनजाति के लोग रहते हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में कुकी, पुरम, तंगखुल आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।
मेघालय – मेघालय शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है — ‘मेघ’ का अर्थ है ‘बादल’ और ‘आलय’ का अर्थ है ‘निवास’, इस प्रकार इसका अर्थ है ‘बादलों का निवास’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, मेघालय भारत में सबसे अधिक वर्षा प्राप्त करने वाले राज्य के रूप में जाना जाता है। यह राज्य अपनी हरी-भरी पहाड़ियों और मनमोहक झरनों के लिए भी प्रसिद्ध है। उत्तर और पूर्व में यह असम से और दक्षिण और पश्चिम में बांग्लादेश से घिरा हुआ है। शिलांग मेघालय की राजधानी है। खासी, जयंतिया और गारो जनजातीय समूह इस राज्य के निवासी हैं। मेघालय को 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
मिजोरम- मिजोरम का अर्थ है ‘पहाड़ी लोगों की भूमि’। इसकी राजधानी आइजोल है। यह दक्षिण और पूर्व में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। एनसीईआरटी के अनुसार, 1986 में भारत सरकार और मिज़ो नेशनल फ्रंट के बीच ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद, इसे 20 फरवरी 1987 को राज्य का दर्जा दिया गया था। भारत के सभी राज्यों में मिजोरम में जनजातीय लोगों की जनसंख्या सबसे अधिक है।
नगालैंड – नागालैंड सात बहन राज्यों में से एक है। इसकी सीमा पश्चिम में असम और म्यांमार, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ हिस्से तथा दक्षिण में मणिपुर से लगती है। इसकी राजधानी कोहिमा है। एनसीईआरटी के अनुसार, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय नागालैंड असम प्रांत का हिस्सा था। 1957 में असम के नागा हिल जिले और तुएनसांग सीमांत क्षेत्र को मिलाकर एक प्रशासनिक इकाई बनाई गई। इसके बाद 1 दिसंबर 1963 को इसे आधिकारिक तौर पर राज्य का दर्जा दिया गया।
त्रिपुरा -त्रिपुरा भारत का तीसरा सबसे छोटा राज्य है। अगरतला इसकी राजधानी है। त्रिपुरा उत्तर-पूर्व में असम और मिजोरम के साथ सीमा साझा करता है और उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में बांग्लादेश से घिरा हुआ है। ब्रिटिश शासन के समय त्रिपुरा एक रियासत थी। 1949 में, यह राज्य स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया।
(साभार – दैनिक जागरण जोश)

संस्कृति को सहेजिए, भारत सुरक्षित हो जाएगा

वर्ष 2026 आ गया है और यह वह समय है जब हम बहुत सी विषम परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। बंगाल में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और उस पार बांग्लादेश में हिन्दुओं का उत्पीड़न जारी है, वह मारे जा रहे हैं। दूसरी तरफ हम भारतीय ही एक दूसरे से अनजान हैं। सच कहा जाए तो इस देश को नेताओं द्वारा किये जा रहे तुष्टीकरण का दीमक चाट रहा है। एक तरफ दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारतीय लोगों को स्वीकार करना नहीं चाहते। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लोगों को प्रताड़ित करना आम बात है। एसआईआर के बाद पता चल रहा है कि हमारे देश की सरकारी नौकरियों पर विदेशी बांग्लादेशी बैठे हैं और उनको प्रश्रय दिया जा रहा है। हम सब अपनी डफली, अपना राग बजा रहे हैं। कश्मीरी हैं कि वे खुद को भारतीय नहीं कहना चाहते है। मुस्लिम हैं कि उनको वंदे मातरम् से लेकर अशोक स्तम्भ तक आपत्ति है। हिन्दुओं को सिक्खों को अलग किया जा रहा है और उत्तर -पूर्व भारत को तो हमने कभी समझा ही नहीं। हमारी किताबों से पू्र्वोत्तर भारत गायब है। हम लोकतांत्रिक होने का चाहे जितना भी दंभ भरें मगर सरकारों का सौतेला व्यवहार एक सच्चाई है। विकास इन राज्यों तक नहीं पहुंचा और इसका फायदा अलगाववादी ताकतें उठा रही हैं। सच तो यह है कि अगर हमारे उत्तर पूर्व के लोग अपनी सूरत के कारण आपको मोमो, चाइनीज और बहुत कुछ लगते हैं तो डियर, बाकी भारतीयों आप भी बांग्लादेशी और पाकिस्तानी कहकर कूटे जा सकते हो, बाहरी हमले हमसे पहले हमारे उत्तर-पूर्व के भाई- बहन झेलते हैं, कड़ाके की ठण्ड झेलते हैं, विकास के मामले में सबसे पीछे रखे गए…और उनके कारण ही हमारे बोल वचन निकल रहे हैं। ये सरकारों की गलती है कि उत्तर पूर्व भारत का इतिहास, उनकी संस्कृति से हम अनजान हैं, वैसे भी उत्तर भारतीयों का मिजाज कुछ अलग ही रहता है, उनको धन्यवाद कहिये क्योंकि देश भक्ति में उत्तर- पूर्व भारत बाकी सब पर 20 छोड़िए 21 पड़ेगा। हैरत इस बात की है प्रताड़ित करने वालों में वह लोग भी शामिल हैं जो खुद दूसरे राज्यों से धक्के मारकर निकाले जा रहे हैं। हम कश्मीरी हैं, पंजाबी हैं, गुजराती, बिहारी, बंगाली, मद्रासी, कन्नड़ में बंटे हैं मगर भारतीय अब तक नहीं बन सके हैं। हमें याद रखना होगा कि अपनी पहचान को बनाए रखते हुए हमें अलग-अलग फूलों को गूंथने के लिए हिन्दी की जरूरत है। सरकारें लड़वाती रहेंगी मगर उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है जिसने अहंकार की चाशनी में डुबोकर हमारी भारतीयता को ढक दिया है। भारत की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति को हर दिशा से सहेजना हम सबका कर्त्तव्य है। नववर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं।

जापान को पछाड़कर भारत बना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

नयी दिल्‍ली। भारत अब 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) के साथ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत ने जापान को पछाड़कर यह मुकाम हासिल किया है। इस उपलब्धि के साथ ही भारत 2030 तक जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बनने के लिए तैयार है। इस वक्त अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी और चीन दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
वित्त वर्ष 2025-26 की (जुलाई-सितंबर) दूसरी तिमाही में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 8.2 फीसदी रही है, जो पिछली तिमाहियों के मुकाबले काफी बेहतर है। पहली तिमाही में 7.8 फीसदी और पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की चौथी तिमाही में 7.4 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई थी। जीडीपी की ये ग्रोथ दिखाती है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था न सिर्फ स्थिर है, बल्कि तेजी से आगे बढ़ रही है। भारत पहले से ही दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारतीय अर्थव्‍यस्‍था की इस ग्रोथ में निजी खपत और मजबूत घरेलू मांग का बड़ा हाथ है। केंद्र सरकार का कहना है कि देश में बेरोजगारी दर में गिरावट आ रही है और महंगाई भी नियंत्रण के दायरे में बनी हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर विश्‍व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और मूडीज रेटिंग्‍स जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सकारात्मक अनुमान जताए हैं। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.2 फीसदी कर दिया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने चालू वित्‍त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.3 फीसदी कर दिया है, जो पहले 6.8 फीसदी था। रिजर्व बैंक के मुताबिक घरेलू मांग, आयकर और जीएसटी में सुधार, कच्चे तेल की नरम कीमतें, सरकार का शुरुआती कैपिटल खर्च और अनुकूल मौद्रिक हालात इस तेजी के पीछे सबसे बड़े कारण हैं।
…………………

नहीं रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया

ढाका (बांग्लादेश)। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष खालिदा जिया का निधन हो गया। उन्होंने गत 30 दिसम्बर को 80 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। खालिदा जिया के निधन की घोषणा बीएनपी मीडिया सेल ने अपने ऑफिशियल फेसबुक पेज पर की। सनद रहे, खालिदा जिया को 23 नवंबर को एवरकेयर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खालिदा के बेटे तारिक रहमान हाल ही में करीब 17 साल बाद लंदन से बांग्लादेश लौटे हैं। बांग्लादेश के समाचार पोर्टल बीएसएस और द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बांग्लादेश टेलीविजन और बांग्लादेश बेतार पर दोपहर 12 बजे एक साथ प्रसारित टेलीविजन संबोधन में कहा, ”पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन पर मैं तीन दिन के राजकीय शोक और उनके नमाज-ए-जनाजा के दिन कल एक दिन की सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा करता हूं।” मुख्य सलाहकार ने जनाजा और शोक के दौरान सभी से अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने का आग्रह किया।

उत्तर बंगाल के चार जिलों में बांग्लादेशी नागरिकों के लिए होटल बंद

सिलीगुड़ी। उत्तर बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेश के नागरिकों को लेकर नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। सिलीगुड़ी, मालदा और कूचबिहार के बाद अब दक्षिण दिनाजपुर के बालुरघाट में भी होटल मालिकों ने बांग्लादेश के नागरिकों को कमरा देने से साफ इनकार कर दिया है। चारों जिलों में होटल के बाहर पोस्टर और फ्लेक्स लगाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि देश का अपमान करने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है।
होटल कारोबारियों का कहना है कि यह फैसला किसी दबाव में नहीं बल्कि देश के सम्मान के लिए लिया गया है। बालुरघाट में कई होटलों के बाहर साफ लिखा गया है कि बांग्लादेशी नागरिकों को यहां कमरा नहीं दिया जाएगा। होटल मालिकों का तर्क है कि अगर कारोबार का नुकसान भी होता है तो वह मंजूर है, लेकिन देश की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता। इस फैसले से बांग्लादेश के नागरिकों की परेशानी काफी बढ़ गई है। इलाज और अन्य जरूरतों के लिए भारत आने वाले कई लोग सिलीगुड़ी और मालदा में होटल नहीं मिलने के कारण भटकने को मजबूर हैं। बीते तीन दिनों में 10 से ज्यादा बांग्लादेश के नागरिक भारत में दाखिल हुए हैं, लेकिन सिलीगुड़ी में होटल नहीं मिलने पर वे किराये के घर या अन्य अस्थायी ठिकाने तलाश रहे हैं। इस स्थिति को लेकर सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। सिलीगुड़ी पुलिस कमिश्नरेट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि जो लोग वैध तरीके से भारत आए हैं, उन्हें कहीं न कहीं ठहरना ही होगा। मामला संवेदनशील है और पुलिस पूरे हालात पर नजर बनाए हुए है। कूचबिहार में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। जिले के लगभग सभी होटलों के रिसेप्शन पर नोटिस और फ्लेक्स टांग दिए गए हैं, जिनमें बांग्लादेशी नागरिकों को कमरा न देने की बात लिखी है। सीमा क्षेत्र चांगड़ाबांधा के होटलों में भी यही स्थिति है। होटल मालिकों का कहना है कि देश के खिलाफ माहौल बनाने वालों के साथ किसी तरह का व्यवसाय नहीं किया जाएगा। दक्षिण दिनाजपुर के बालुरघाट में इस फैसले को आम लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। बताया जा रहा है कि हिली अंतरराष्ट्रीय थल बंदरगाह से आवाजाही भी अब काफी कम हो गई है और रोजाना करीब 100 लोग ही सीमा पार कर रहे हैं। बालुरघाट शहर और आसपास करीब 22 छोटे-बड़े होटल हैं और सभी होटल मालिक इस फैसले पर एकजुट नजर आ रहे हैं। मालदा में स्थिति और भी गंभीर है। वहां बांग्लादेश से आने वाले कई लोग होटल न मिलने के कारण रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर समय काटने को मजबूर हैं। मालदा होटल ओनर्स एसोसिएशन का कहना है कि पहले बांग्लादेश में भारत विरोधी नारेबाजी बंद होनी चाहिए और शांतिपूर्ण माहौल बहाल होना चाहिए, तभी होटल दोबारा खोले जाने पर विचार होगा। वहीं, सीमा पर पहुंचे कुछ बांग्लादेशी पर्यटकों का कहना है कि उनके देश में जो हालात बने हैं, उसके लिए आम नागरिक जिम्मेदार नहीं हैं। इसके बावजूद भारत आकर होटल न मिलने से उन्हें परेशानी हो रही है।

79 हजार करोड़ के रक्षा प्रस्तावों को केंद्र की मंजूरी

नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने तीनों सेनाओं की जरूरतों को देखते हुए हथियार और गोला-बारूद खरीदने के लिए 79 हजार करोड़ रुपये को मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सोमवार को हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में लिए गए इन फैसलों से सशस्त्र बलों की परिचालन क्षमताओं को बढ़ावा मिलेगा। जरूरी मंजूरियों में टी-90 मुख्य युद्धक टैंक की मरम्मत करने और एमआई-17 हेलीकॉप्टर के मिड-लाइफ अपग्रेड के प्रस्ताव शामिल हैं, जिनका मकसद ऑपरेशनल तैयारी को बढ़ाने के लिए युद्ध संपत्तियों की सर्विस लाइफ बढ़ाना है। बैठक में आर्टिलरी रेजिमेंट के लिए लॉइटर म्यूनिशन सिस्टम, लो लेवल लाइट वेट रडार, पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम के लिए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट एम्युनिशन और ​भारतीय सेना के लिए इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम ​एमके-II की खरीद को ​मंजूरी दी गई।​ लॉइटर म्यूनिशन का इस्तेमाल टैक्टिकल टारगेट पर सटीक हमला करने के लिए किया जाएगा, जबकि लो लेवल लाइट वेट रडार छोटे साइज के, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अनमैन्ड एरियल सिस्टम का पता लगा​कर उन्हें ट्रैक करेंगे। लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट, हाई वैल्यू टारगेट पर असरदार तरीके से हमला करने के लिए पिनाका रॉकेट सिस्टम की रेंज को बढ़ाएंगे। इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम ​एमके-II​ की रेंज​ ज्यादा है, ​जो सेना की जरूरी संपत्तियों की सुरक्षा करेगा। नौसेना के लिए बोलार्ड पुल टग्स, हाई फ्रीक्वेंसी सॉफ़्टवेयर डिफ़ाइंड रेडियो मैनपैक खरीदने और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग रेंज रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम​ को लीज पर लेने के लिए आवश्यकता की स्वीकृति​ (एओएन) दी गई। बोलार्ड पुल टग्स के शामिल होने से ​नौसेना के ​जहाजों और​ पनडुब्बियों बंदरगाह में पैंतरेबाज़ी​ में मदद मिलेगी।​ यह प्रणाली बोर्डिंग और लैंडिंग ऑपरेशन के दौरान लंबी दूरी के सुरक्षित​ संचार सुविधा को बढ़ाए​गी, जबकि हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग रेंज रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम हिंद महासागर क्षेत्र​ में लगातार खुफिया, निगरानी, टोही और भरोसेमंद समुद्री डोमेन जाग​रुकता​ पक्का करेगा। बैठक ​में वायु सेना के लिए ऑटोमैटिक टेक-ऑफ लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम, एस्ट्रा ​एमके-II मिसाइल, फ़ुल मिशन सिम्युलेटर और स्पाइस-1000 लॉन्ग रेंज गाइडेंस किट वगैरह खरीदने की मंजूरी दी गई। ऑटोमेटिक टेक-ऑफ लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम के आने से एयरोस्पेस सेफ्टी के माहौल में कमी पूरी होगी, क्योंकि इससे लैंडिंग और टेक-ऑफ़ की हाई डेफ़िनिशन ऑल-वेदर ऑटोमैटिक रिकॉर्डिंग मिलेगी। ज़्यादा रेंज वाली एस्ट्रा ​एमके-II मिसाइलें ​लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता बढ़ाकर दुश्मन के ​विमानों को बेअसर करने की क्षमता​ बढ़ाएंगी। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट ​(एलसीए) तेजस के लिए फ़ुल मिशन सिम्युलेटर पायलटों की ट्रेनिंग को किफायती और सुरक्षित तरीके से बढ़ाएगा, जबकि ​स्पाइस-1000 ​भारतीय वायु सेना की ​लंबी दूरी की सटीक स्ट्राइक क्षमता को बढ़ाएगा। ​

अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगाई

– केंद्र व संबंधित राज्यों को दी नोटिस
नयी दिल्ली । अरावली खनन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी सोमवार को अपने पुराने फैसले पर रोक लगा दी। ऐसे में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले और मुद्दों का अध्ययन करने के लिए एक नई कमेटी बनाने के निर्देशों का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) सुप्रीम कोर्ट के इस नई समिति को हर जरूरी सहयोग देगा। अपने पोस्ट में मंत्री ने साफ किया कि अभी भी अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज देने या पुरानी लीज को नवीनीकरण करने पर पूरी तरह रोक जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि सरकार अरावली पहाड़ियों की सुरक्षा और दोबारा सुधार के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
उधर, कांग्रेस ने भी सोमवार को अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। पार्टी ने केंद्र सरकार और खास तौर पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव पर हमला बोलते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस पहले से ही इस नई परिभाषा का विरोध कर रही थी। ऐसे में पार्टी का कहना है कि अगर यह परिभाषा लागू होती, तो अरावली पहाड़ियों को खनन, रियल एस्टेट और अन्य परियोजनाओं के लिए खोल दिया जाता, जिससे पहाड़ों को भारी नुकसान होता। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ‘उम्मीद की एक किरण है। उन्होंने कहा कि अब इस मुद्दे पर और विस्तार से अध्ययन होगा। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस नई परिभाषा का विरोध पहले ही फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी भी कर चुकी है। बता दें कि इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर विगत 24 दिसंबर को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नए निर्देश जारी किए थे। इनमें केंद्र सरकार ने कहा है कि नए खनन के लिए मंजूरी देने पर रोक संपूर्ण अरावली क्षेत्र पर लागू रहेगी। इसका उद्देश्य अरावली रेंज की अखंडता को बचाए रखना है। इन निर्देशों का लक्ष्य गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक शृंखला के रूप में अरावली का संरक्षण करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है।