19 मार्च में नौ अलग-अलग रूपों में भक्तों को दर्शन देने के लिए आ रही हैं और देशभर के देवी मंदिरों में मां के स्वागत के लिए तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। ओडिशा में मां भगवती के कई रूपों की पूजा होती है लेकिन चैत्र नवरात्रि के आगमन के साथ मां भगवती को अग्नि के रूप में पूजा जाता है और इसका संबंध विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा है। हम बात कर रहे हैं मां हिंगुला मंदिर की, जो सिद्धपीठों में शामिल है। ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित मां हिंगुला मंदिर राज्य के बाकी मंदिरों से भव्य और मन को मोह लेने वाला है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में मां की सोने से सजी प्रतिमा विराजमान है, जहां मां के चारों हाथों में अस्त्र और शस्त्र मौजूद हैं। नवरात्रि के नौ दिन मां के दिव्य शृंगार किए जाते हैं। खास बात यह है कि मां हिंगुला को अग्नि की देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त चैत्र नवरात्रि में मां के दर्शन करने के बाद भोग मंदिर में बने अग्निकुंड में डालते हैं।
स्थानीय कथाओं की मानें तो मां हिंगुला का संबंध विश्व प्रसिद्ध पुरी के जगन्नाथ मंदिर से भी है। माना जाता है कि पुरी के राजा को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आदेश दिया था कि वे मां हिंगुला की पूजा करें ताकि जगन्नाथ मंदिर की अनूठी रसोई में प्रतिदिन आने वाले विशाल प्रसाद का प्रबंधन हो सके। ऐसा माना जाता है कि देवी पुरी की रसोई में पवित्र अग्नि के रूप में प्रकट होती हैं और यही कारण है कि चैत्र के महीने में मां हिंगुला के मंदिर में ‘हिंगुला यात्रा’ निकाली जाती है। यह यात्रा न सिर्फ आध्यात्मिकता का प्रतीक है, बल्कि इस लोक उत्सव में ओडिशा की संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है।
चैत्र नवरात्रि में मां हिंगुला को समर्पित मेला भी लगता है, जिसमें भक्त नौ दिन तक भारी संख्या में मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों को मानना है कि मां हिंगुला के अग्नि रूप में दर्शन करने के बाद जिंदगी के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्त खास कर नवजात बच्चों को मां हिंगुला के दर्शन के लिए लेकर आते हैं और कुछ वहां पर मुंडन भी कराते हैं।
चैत्र नवरात्रि: मां हिंगुला के चमत्कार से जलती है जगन्नाथ मंदिर की रसोई
गर्भाशय को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये 4 आसान उपाय
गर्भाशय किसी भी महिला के शरीर का सबसे जरूरी अंग है, जो हॉर्मोन बनाने से लेकर उन्हें संतुलित करने का काम करता है। अगर गर्भाशय में किसी भी प्रकार की परेशानी है तो सबसे पहले महिला की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। आयुर्वेद से लेकर विज्ञान तक में गर्भाशय की विशेष देखभाल के तरीके बताए गए हैं। अगर गर्भाशय में किसी भी प्रकार की परेशानी होती है तो थायरायड और मोटापे के अलावा महिलाओं को सिस्ट, मासिक चक्र में बदलाव और प्रजनन क्षमता में कमजोरी की शिकायत होती है। ऐसे में हर महिला को गर्भाशय की विशेष देखभाल करनी चाहिए। आयुर्वेद से लेकर विज्ञान तक में गर्भाशय की विशेष देखभाल के तरीके बताए गए हैं, जिससे प्रजनन तंत्र को भी सुरक्षित रखा जा सकता है। पहला तरीका है सोने से पहले शांति और हल्की गर्मी का वातावरण। सोने से पहले आस-पास के वातावरण को शांत करें और हल्की लाइट में मन और शरीर दोनों को शांत करने की कोशिश करें। रात के समय शरीर खुद की मरम्मत के काम पर लग जाता है और आम यानी टॉक्सिन को निकालने का काम करता है। ऐसे में गर्भाशय के हीलिंग का काम भी शुरू हो जाता है।
दूसरा तरीका है गर्माहट देना। मासिक चक्र के दौरान गर्भाशय का संकुचन तेजी से होता है और वापस सामान्य होने में समय लगता है। ऐसे समय में हॉर्मोन परिवर्तन के साथ हल्के दर्द और सूजन का अनुभव होता है। इसके लिए हफ्ते में कम से कम दो बार गर्भाशय पर पानी की गर्म बोतल से सिकाई जरूर करें। इससे गर्भाशय की मांसपेशियों को आराम मिलता है और ऐंठन भी कम होती है।
तीसरा तरीका है खाना खाने के बाद खुद को शांत रखना। खाने के बाद शरीर की ऊर्जा को पाचन तंत्र और गर्भाशय की तरफ भेजने की कोशिश करें और शरीर की हर सांस को महसूस करें। इससे यूट्रस में जमा हो रही गंदगी निकलती है और रक्त का प्रवाह भी तेज होता है। इसके लिए खाने के कुछ समय बाद व्रजासन में बैठें।
चौथा तरीका है पीठ के निचले हिस्से और पेल्विक एरिया में सर्कुलर मोशन में मसाज करना। मसाज के लिए बादाम या जैतून का तेल ले सकते हैं। रोजाना रात को हल्के हाथ से पीठ के निचले हिस्से और पेल्विक एरिया में हल्की मसाज करें। इससे रक्त का प्रवाह कम होगा और मांसपेशियों को आराम मिलेगा।
नवरात्रि में व्रत रखने के पीछे है गहरी आयुर्वेदिक सोच
नवरात्रि में व्रत रखना सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आयुर्वेदिक सोच भी छिपी हुई है। अक्सर लोग इसे सिर्फ पूजा-पाठ या आस्था से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अगर आयुर्वेद की नजर से समझें तो यह शरीर को अंदर से रीसेट करने का एक बेहतरीन मौका होता है। दरअसल, नवरात्रि ऐसे वक्त पर आती है, जब मौसम बदल रहा होता है। इस बदलाव का असर सीधे हमारे शरीर पर पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस दौरान शरीर में वात और पित्त दोष असंतुलित हो सकते हैं, जिससे पाचन कमजोर होता है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जब हम नवरात्रि में व्रत रखते हैं और हल्का, सात्विक भोजन जैसे फल, कुट्टू, सिंघाड़ा, दही या साबूदाना खाते हैं, तो हमारा पाचन तंत्र थोड़ा आराम पाता है। रोज-रोज भारी, तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से जो दबाव बनता है, वह कम हो जाता है। इससे शरीर को खुद को ठीक करने का समय मिलता है। आयुर्वेद में पाचन शक्ति (अग्नि) को बहुत अहम माना गया है। अगर अग्नि मजबूत है, तो शरीर स्वस्थ रहता है। व्रत रखने से यह अग्नि दोबारा सक्रिय होती है और शरीर में जमा टॉक्सिन्स बाहर निकलने लगते हैं। यही कारण है कि व्रत के दौरान लोग खुद को हल्का और ज्यादा ऊर्जावान महसूस करते हैं।
सिर्फ शरीर ही नहीं, नवरात्रि का व्रत मन पर भी असर डालता है। इस दौरान लोग ध्यान, पूजा और संयम का पालन करते हैं, जिससे मानसिक शांति मिलती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह एक तरह का मेंटल डिटॉक्स की तरह काम करता है, जहां आप खुद को थोड़ा स्लो डाउन करके अंदर से संतुलित करते हैं।
एक और दिलचस्प बात यह है कि नवरात्रि में खाए जाने वाले ज्यादातर फूड आइटम्स सात्विक होते हैं, जो न सिर्फ पचने में आसान होते हैं बल्कि शरीर को जरूरी पोषण भी देते हैं। ये फूड्स शरीर को हल्का रखते हैं और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे मौसमी बीमारियों से बचाव होता है।
हिंदू नव-वर्ष के अलग-अलग रूप
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि, गुरुवार को त्योहारों का दिन है। उत्तर भारत में इसे नवरात्रि और दक्षिण-पश्चिम भारत में इसे गुड़ी-पड़वा, उगादि और चेटीचंड (सिंधी नव-वर्ष) के रूप में मनाया जा रहा है। त्योहार के नाम भले ही अलग हैं, लेकिन सभी त्योहारों का मकसद खुशी और उल्लास के साथ हिंदू नव-वर्ष का स्वागत करना है। चैत्र का महीना स्वास्थ्य और अध्यात्म की दृष्टि से काफी खास है, जिसमें नीम और गुण का विशेष महत्व है। पहले बात कर रहे हैं चैत्र नवरात्रि की। 19 मार्च से लेकर 27 मार्च तक मां भवानी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। आज घटस्थापना के साथ मां के पहले रूप, शैलपुत्री, को पूजा जाता है, जिन्हें नई शुरुआत और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। हर दिन मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा होगी।
गुड़ी-पड़वा और उगादि पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण भारत में हिंदू नव-वर्ष के रूप में मनाए जाते हैं। गुड़ी-पड़वा में घर को नीम की पत्तियों से सजाया जाता है। पूजा से लेकर वंतरवार तक नीम के पत्तों की होती है, जो जीवन के कड़वे और मीठे पलों का प्रतीक होता है। यहां गुड़ी का अर्थ है विजय ध्वज, और पड़वा का अर्थ है प्रतिप्रदा। इस दिन लोग घर में केसरी रंग का ध्वज भी लगाते हैं, जिसे सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
वहीं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में चैत्र प्रतिपदा को उगादि मनाते हैं। यह भी हिंदू नव-वर्ष के स्वागत का त्योहार है, लेकिन दक्षिण भारत में होने की वजह से उसे अलग नाम से जाना जाता है। उगादि का अर्थ है, नए युग का उदय। आज के दिन लोग सुबह उठकर तेल अभ्यंग से दिन की शुरुआत करते हैं और फिर नीम के पानी से नहाते हैं। नए कपड़े पहनकर नीम और आम के पत्तों से घर को सजाते हैं और नीम और गुड़ से बना मीठा व्यंजन भी मनाते हैं, खासतौर पर पचड़ी। पचड़ी ऐसा व्यंजन है जिसमें एक साथ पांच स्वाद मीठा, खट्टा, कड़वा, तीखा, नमकीन, कसैला मिलते हैं। यह व्यंजन जीवन के हर अनुभव का अहसास कराता है और जीवन में आने वाली हर मुश्किल से लड़ने की शक्ति भी देता है।
सिंधी समुदाय में चैत्र के दूसरे दिन चेटीचंड मनाया जाता है, और इस बार चेटीचंड का त्योहार 20 मार्च को मनाया जाएगा। यह त्योहार भी चैत्र माह से शुरू हुए हिंदू नव-वर्ष का प्रतीक है। यह दिन वरूणावतर स्वामी झूलेलाल के प्रकाट्य दिवस और समुद्र पूजा के रूप में मनाया जाता है।
खुद से प्यार कीजिए…स्वस्थ रहिए
आज के भागदौड़ भरे जीवन में खुद को खुश और स्वस्थ रखने का बेहतरीन तरीका है सेल्फ लव यानी खुद से प्यार करना। यह कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि खुद का सम्मान, स्वीकार और देखभाल करना है। जब आप खुद से प्यार करते हैं, तो तन और मन दोनों फिट और फाइन रहते हैं। नेशनल हेल्थ मिशन सेल्फ लव के बारे में जानकारी देते हुए बताता है, स्वयं का सम्मान और ध्यान रखना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि भीतर से मजबूती देने वाला एहसास है। याद रखें, मदद लेना भी खुद के प्रति प्रेम और सम्मान का संकेत है। इसके लिए खुद की तारीफ करें, जरूरत पड़ने पर मदद लें, आराम करें और खुद को प्राथमिकता दें। खुद से किया गया प्यार सबसे अच्छा प्यार है, जो आपको मजबूत, खुश और स्वस्थ बनाता है। सेल्फ लव का मतलब है खुद को अपनी कमियों, ताकतों, गलतियों और उपलब्धियों के साथ वैसे ही स्वीकार करना जैसे आप हैं। खुद के प्रति विनम्र रहना, नकारात्मक आत्म-आलोचना को कम करना, अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देना और खुद को प्रोत्साहित करना इसमें शामिल है। यह खुद को दोष देने के बजाय खुद को माफ करना, खुद की तुलना दूसरों से न करना और अपनी खुशियों को संजोना सिखाता है।
एक्सपर्ट के अनुसार, सेल्फ लव के कई फायदे हैं। यह मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। इससे तनाव, चिंता और घबराहट की समस्या दूर होती है। नकारात्मक सोच कम होने से मन शांत रहता है, खुशी और ग्रैटिट्यूड बढ़ता है। रिसर्च दिखाती है कि सेल्फ-कंपैशन से तनाव घटता है और भावनात्मक संतुलन बना रहता है। इससे आत्मविश्वास और रेजिलिएंस बढ़ता है। इससे खुद पर भरोसा मजबूत होता है। जीवन की चुनौतियों का सामना आसानी से किया जा सकता है, असफलता से टूटने की बजाय मजबूत होकर उठते हैं।
जब खुद की अहमियत करते हैं तो दूसरों से भी रिश्ते मजबूत होते हैं। सेल्फ लव की वजह से दूसरों से भी स्वस्थ और संतुलित रिश्ते बनते हैं। बाउंड्री सेट करना आसान होता है। यही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधरता है। सेल्फ लव से सेल्फ-केयर की आदत पड़ती है अच्छा खाना, व्यायाम, नींद और आराम इसमें शामिल होते हैं। इससे स्ट्रेस हार्मोन कम होते हैं, इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, दिल की बीमारियां और अन्य समस्याओं का खतरा घटता है।
वहीं, खुद को महत्व देने से जीवन में पॉजिटिव बदलाव आते हैं। लक्ष्य हासिल करने की प्रेरणा मिलती है, और आप ज्यादा उत्पादक और संतुष्ट महसूस करते हैं।
जानिए हरी सब्जियों को सही तरीके से खाने का तरीका
हमारे बुजुर्ग हमेशा हरी सब्जियां खाने की सलाह देते हैं। हरी सब्जियों का सेवन हर उम्र के लिए लाभकारी है, क्योंकि उनके सेवन से पाचन में सुधार, मजबूत प्रतिरक्षा, और हृदय स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है, हालांकि इनके सेवन का तरीका बहुत कम लोगों को पता होता है। आज के समय में सैंडविच से नूडल तक में कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल किया जाता है जो पाचन को प्रभावित करती हैं। आयुर्वेद के अनुसार हरी सब्जी खाने का भी एक सही तरीका होता है, तभी शरीर को पूरा फायदा मिलता है। हरी पत्तेदार सब्जियां पोषण से भरपूर होती हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इन्हें कम मात्रा में और सही तरीके से पकाकर खाना चाहिए, क्योंकि कई हरी सब्जियां वात दोष बढ़ा सकती हैं और पचने में भारी होती हैं। इसके लिए आयुर्वेद में कुछ बेहतर तरीके बताए गए हैं, जिससे हरी सब्जियों की पौष्टिकता बनाए रखते हुए पाचन प्रक्रिया में सरलता लाई जा सकती है।
हरी सब्जियों को कच्चा खाने से बचें, खासकर पालक, शिमला मिर्च और गोभी (पत्तागोभी)। इन सब्जियों में परजीवी टेपवर्म पाया जाता है, जो पेट से लेकर मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके साथ ही कच्ची हरी सब्जियों में वात की अधिकता होती है। पकने के बाद सब्जियों में वात की अधिकता कम हो जाती है। इसलिए हरी सब्जियों को उबालें, फिर उनका अतिरिक्त पानी निचोड़ें और अंत में घी या तेल में हल्का भूनकर पकाएं।
ध्यान रखने वाली यह भी बात है कि बुजुर्गों और बच्चों को हरी सब्जियों का सेवन कम करने दें। ऐसा इसलिए क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ शरीर में वात की अधिकता बढ़ती है और पाचन मंद पड़ जाता है। बच्चों का पाचन भी बड़ों की तुलना में कमजोर होता है। ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों दोनों को सही मात्रा और सही तरीके से सब्जियों का सेवन करने दें।
हरी सब्जियों की तुलना में बुजुर्गों और बच्चों को तोरई, टिंडा, लौकी, परवल और कुंदरू अधिक मात्रा में दें। यह हरी सब्जियों जितनी ही पौष्टिक होती है। अगर बच्चे इन सब्जियों को कम पसंद करते हैं तो उन्हें आटे में मिलाकर पराठा या मीठे के रूप में भी दिया जा सकता है।
इन सुपरफूड्स से करें मधुमेह को कंट्रोल
30 की उम्र के बाद खाने से लेकर सोने के समय में अगर परिवर्तन कर लिया जाए तो शरीर के आधे से ज्यादा रोग खुद-ब-खुद कम हो जाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कहा जाता है कि 30 के बाद आहार में मीठा और नमक दोनों की मात्रा आधी कर देनी चाहिए, लेकिन सभी के लिए ये करना बहुत मुश्किल है। बात चाहे सामान्य लोगों की हो या फिर मधुमेह से पीड़ित लोगों की, आज हम ऐसे सुपरफूड्स की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में आहार को भी औषधि माना है। अगर आहार संतुलित है तो जीवन भी संतुलित है। भविष्य में होने वाली मधुमेह की परेशानी से बचने के लिए या मधुमेह को नियंत्रित करने के सारे गुण आहार में मौजूद हैं। सबसे पहले आता है मैथी दाना और ओट्स। मैथी दाना और ओट्स दोनों ही मधुमेह को नियंत्रित करने और इंसुलिन रेजिस्टेंस को संतुलित करने में मदद करते हैं। दोनों में ग्लूकोमैनन और बीटा-ग्लूकान होता है जो घुलनशील फाइबर होते हैं और रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ने नहीं देते।
दूसरा है दालचीनी और करेला। दालचीनी और करेला दोनों ही भारतीय रसोई का हिस्सा हैं। मधुमेह से बचाव के लिए हफ्ते में तीन बार करेले का सेवन करना चाहिए और दालचीनी का इस्तेमाल खाने में और सुबह खाली पेट पानी पीने में कर सकते हैं। करेला और दालचीनी सेल्स को एक्टिव करते हैं, जिससे सेल्स ग्लूकोज का अच्छे से इस्तेमाल कर पाते हैं।
तीसरा है दालें, अलसी, सत्तू, और इसबगोल। यह सारी चीजें आसानी से किचन में मिल जाती हैं, बस उन्हें अपने आहार का हिस्सा बनाना जरूरी है। इन सभी में मैग्नीशियम, ओमेगा-3, और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं, और ये इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाते हैं। चौथा है फलों का सेवन। आहार तभी पूर्ण होता है जब दिन में एक फल का सेवन जरूर किया जाए। मधुमेह से पीड़ित मरीजों को अमरूद, सेब और नाशपाती का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये फल लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल होते हैं जो शुगर तेजी से नहीं बढ़ने देते। इसके अलावा दिनचर्या में कई तरह के बदलाव करने की जरूरत होती है, जैसे रोजाना 30 मिनट पैदल चलना, हल्की एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय से दूरी और आखिर में पूरी नींद।
नियमित त्रिकोणासन से पाएं हेल्दी लाइफस्टाइल
आज के समय में सेहतमंद और अच्छे शरीर की चाह हर कोई रखता है, लेकिन व्यस्त दिनचर्या के चलते ऐसा होना कई बार लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। ‘त्रिकोणासन’ एक ऐसा योगासन है जिसे कम समय में किया जा सकता है और जिसको करने से कई सारे लाभ भी मिलते हैं। इस योगासन को नियमित करने से मांसपेशियां लचीली और रक्त संचार बेहतर होता है। रोजाना अभ्यास करने से शरीर को दाएं और बाएं तरफ स्ट्रेच करने की आवश्यकता होती है, जिससे पीठ, हाथों और पैरों की मांसपेशियों की सक्रियता बढ़ती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह एक ऐसा योगासन है जो शरीर को लचीला, संतुलित और शक्तिशाली बनाता है। साथ ही, यह पाचन को बेहतर बनाता है और कमर व जांघों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।
इसे करने के लिए योगा मैट पर दोनों पैरों को 3 से 4 फीट की दूरी पर फैलाएं। दाएं पैर को 90 डिग्री बाहर की ओर घुमाएं और बाएं पैर को थोड़ा अंदर की ओर मोड़ें। अब दोनों हाथों के कंधों को सीधे फैलाएं और अपनी हथेलियों को नीचे की ओर रखें। धीरे-धीरे दायीं ओर झुकें और दाहिने हाथ से दाएं पैर या टखने को छूने का प्रयास करें। बायां हाथ सीधा ऊपर की ओर रखें। इस स्थिति में 20 से 30 सेकंड तक रहें। सांस सामान्य रखें। फिर धीरे से ताड़ासन में वापस आएं। इसी प्रक्रिया को बाईं ओर दोहराएं।
इसे करते समय हाथ, पैर और रीढ़ एक त्रिकोण बनाते हैं और यह तनाव कम करने में भी मददगार है, लेकिन स्लिप डिस्क या साइटिका जैसी स्थितियों में सावधानी बरतनी चाहिए।
त्रिकोणासन एक ऐसी अभ्यास क्रिया है जिसके नियमित अभ्यास से वजन नियंत्रित होता है। साथ ही, तनाव और चिंता भी कम होती है। यह साथ ही संतुलन और एकाग्रता में भी वृद्धि करता है।
त्रिकोणासन के नियमित अभ्यास से शरीर की एनर्जी बढ़ती है, हालांकि इसके अभ्यास में कई सावधानी भी बरतने की सलाह दी जाती है
बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान, 4 मई को परिणाम
नयी दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में वोट डाले जाएंगे। 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होगा। वोटों की गिनती 4 मई को होगी। पोलिंग बूथों पर पर्याप्त इंतजाम रहेंगे। साथ ही सुरक्षा की सख्त व्यवस्था रहेगी। चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 6.44 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें पुरुष मतदाता 3.28 करोड़, महिला मतदाता 3.16 करोड़ और थर्ड जेंडर 1152 मतदाता हैं। अगर फर्स्ट टाइम वोटर (18-19 साल) की बात करें तो उनकी संख्या 5.23 लाख है। 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के वोटरों की संख्या 1.31 करोड़ है। 85 साल से अधिक उम्र वाले मतदाता 3.79 लाख हैं। दिव्यांग वोटरों की संख्या 4.16 लाख है। ईवीएम को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
बता दें कि साल 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 8 चरणों में हुआ था। यह चुनाव काफी लंबा चला था, क्योंकि राज्य में 294 सीटें हैं और सुरक्षा, लॉ एंड ऑर्डर, और बड़े मतदाता आधार को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने इसे 8 फेज में कराया था।
पिछले चुनाव में भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने शानदार जीत दर्ज की थी। बंगाल की कुल 294 सीटों में से 215 पर टीएमसी का कब्जा है। पार्टी को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले थे।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरी और उसे 77 सीटें मिली थीं। दशकों से बंगाल की राजनीति पर दबदबा बनाए रखने वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस को ऐतिहासिक झटका लगा और वे एक भी सीट जीतने में असफल रहे। गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रही भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (आईएसएफ) को एक सीट मिली।
पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है। राज्य विधानसभा में 294 सीटें हैं और लगभग 40 से 50 निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और बीरभूम जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है। इनमें से कई निर्वाचन क्षेत्रों में, मतदाताओं में से 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं, जिससे चुनावी परिणामों को निर्धारित करने में उनका वोट एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।
बंगाल समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा
-दो चरणों में होगा राज्य में मतदान -हेडिंग
– 23 और 29 अप्रैल को डाले जाएंगे वोट
नयी दिल्ली । चुनाव आयोग ने रविवार को असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अहम जानकारियां साझा की। असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 9 अप्रैल को चुनाव होंगे। वहीं, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। जबकि, तमिलनाडु में एक चरण में 23 अप्रैल को मतदान होगा। इन सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश के चुनावों के नतीजे 4 मई को जारी किए जाएंगे। पांचों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चुनाव की घोषणा होने के साथ ही तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि आयोग ने पिछले कुछ दिनों में सभी चुनावी राज्यों का दौरा कर तैयारियों की समीक्षा की है और राजनीतिक दलों, अधिकारियों तथा मतदाताओं से बातचीत की है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनाव आयोग की टीम ने इन राज्यों में जाकर विधानसभा चुनाव की तैयारियों का जायजा लिया। इस दौरान सभी राजनीतिक दलों से मुलाकात कर उनके सुझाव भी लिए गए। साथ ही प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों, जिला निर्वाचन अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, राज्य निर्वाचन अधिकारियों और पुलिस महानिदेशकों से भी विस्तृत चर्चा की गई।
उन्होंने बताया कि आयोग ने युवाओं और पहली बार मतदान करने जा रहे मतदाताओं से भी संवाद किया। इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया को सुचारू बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) के काम की भी सराहना की गई। सीईसी ज्ञानेश कुमार ने कहा कि ये पांचों राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ऐसे में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया गया, ताकि कोई भी योग्य मतदाता वोट देने से वंचित न रह जाए और कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो सके। सीईसी ने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि वे अपने मताधिकार का गर्व और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा, “मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि अब आप एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने जा रहे हैं, मतदान का अधिकार। अपने वोट का इस्तेमाल गर्व और जिम्मेदारी के साथ करें। आपका वोट आपकी आवाज है। चुनाव का पर्व हम सबका गर्व है।” चुनाव आयोग के अनुसार इन पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में कुल 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह संख्या ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी और कनाडा जैसे कई देशों की कुल आबादी के बराबर है। सीईसी ने बताया कि इन चुनावों के लिए 824 विधानसभा सीटों पर मतदान कराया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए 2.19 लाख मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इसके अलावा पूरे चुनाव को निष्पक्ष और सुचारु तरीके से कराने के लिए करीब 25 लाख चुनाव अधिकारी और कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी आयोग ने व्यापक तैयारी की है। मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक चुनाव के दौरान करीब 8.50 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे, ताकि मतदान शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में हो सके। राज्यों के हिसाब से मतदाताओं की संख्या भी साझा की गई। आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल 6.44 करोड़ मतदाता हैं, जबकि असम में करीब 2.5 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। सीईसी ने बताया कि चुनाव के दौरान कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी की गई हैं। कई स्थानों पर पिंक बूथ बनाए जाएंगे, जहां पूरी व्यवस्था महिला कर्मियों द्वारा संभाली जाएगी। इसके अलावा, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान के बाद तुरंत मतदान प्रतिशत की जानकारी जारी की जाएगी। मतदान केंद्रों के अंदर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी, और मतदाताओं को उन्हें फोन बूथ के बाहर रखना होगा।




