Wednesday, March 11, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog

संभ्रांत वर्गों में बिहार लगातार उपहास का शिकार होता रहता है। लालू प्रसाद की घटना को स्वाभाविक रूप से इस बात के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है कि अगर बिहार की जातिगत कट्टरता और देहाती तौर-तरीकों को हावी होने दिया गया तो देश का क्या हाल होगा। लेकिन सच तो यह है कि बिहार तो सिर्फ एक हिस्सा है; राजनीतिक संस्कृति का पतन पूरे देश में तेजी से हुआ है, यह बात तो स्पष्ट है।स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की भूमिका को भुला देना कृतघ्नता का पर्याय होगा। जयप्रकाश नारायण अपने उच्च नैतिक सिद्धांतों और नवप्रवर्तक के रूप में सदा अमर रहेंगे; उनकी सभ्यता भी अद्वितीय थी। सहजानंद सरस्वती अब भुला दिए गए हैं; लेकिन उन्हीं की विरासत का लाभ कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछली शताब्दी के मध्य दशकों में बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए उठाया। राज्य के मुख्यमंत्रियों में असाधारण सत्यनिष्ठा वाले कर्पूरी ठाकुर का उदाहरण लीजिए। और देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बारे में चाहे जो भी राय हो, दलित जगजीवन राम राष्ट्रीय स्तर पर सबसे चतुर और सक्षम मंत्रिमंडल मंत्रियों में से एक थे। क्या हमें बिहार के प्रख्यात विद्वान राहुल सांकृत्यायन के संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में प्रभाव को नजरअंदाज करना चाहिए? यह पितृसत्ता समाज एक औरत को हमेशा उसके सौंदर्यता या सहनशीलता के पैमाने पर तौलता है। ऐसे ही खूबसूरत औरत थी- तारकेश्वरी सिन्हा। वह कोई राजकुमारी या अभिनेत्री नहीं बल्कि एक राजनेत्री थी, जो अपने नेतृत्व क्षमता के लिए बेहद मशहूर थी। उनका जन्म 26 दिसंबर 1926 को नालंदा जिला के तुलसीगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉक्टर श्री नंदन प्रसाद सिन्हा था। इनकी माता का नाम राधा देवी था। तारकेश्वरी सिन्हा की दो बहन और एक भाई था। उनके पिता पेशे से एक सिविल सर्जन थे। खुद शिक्षित होने के साथ-साथ उस समय में भी उनके पिता लड़कियों की शिक्षा को बहुत महत्व देते थे।

जब साल 1942 में देश में भारत छोड़ो आंदोलन की लहरें उठी तब तारकेश्वरी सिन्हा ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी बीच लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से वह इकोनॉमिक्स की पढ़ाई करने लंदन चली गई। वहां भी वह डिबेट में हिस्सा लेती रहती और अपने तर्कों से लोगों पर एक गहरा प्रभाव डालती थी। हालांकि उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापस लौटना पड़ा। आजादी के पहले तक तो बिहार के सभी नेता उनके व्यक्तित्व से रूबरू हो चुके थे। लेकिन भारत के आजाद होते ही केंद्र मे जवाहरलाल नेहरू और दूसरे नेता भी उन्हें जानने- पहचानने लगे थे।

साल 1952 में उन्हें कांग्रेस ने टिकट दिया और बिहार की राजधानी पटना के पूर्वी क्षेत्र का उम्मीदवार बनाया। उस क्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानी पंडित शीलभद्रया जी का खूब वर्चस्व था लेकिन तारकेश्वरी सिन्हा ने उन्हें भारी मतों से हराया और कांग्रेस पार्टी की ओर से वह संसद पहुंची। मात्र 26 साल की उम्र में ही संसद में पहुंचने वाली वह पहली महिला थी। जब संसद में इन्होंने अपना पहला वक्तव्य दिया था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने 5 मार्च 1971 को छपे एक अंक में इस बात की पुष्टि भी की थी कि एक जमाने में इंदिरा गांधी ने उन्हें जितना नापसंद किया था शायद ही किसी और को किया होगा। इंदिरा गांधी के बाद वह एकमात्र महिला थी जो उस समय हमेशा सुर्खियों में रहती थी। तारकेश्वरी की प्रारंभिक शिक्षा बड़ौदा से हुई थी। जिसकी गिनती पूरे हिंदुस्तान में लड़कियों के लिए सबसे अच्छे विद्यालयों में होती थी। तारकेश्वरी ने वहां से अपना मैट्रिकुलेशन किया, फिर इनका नामांकन पटना के बांकिपुर कॉलेज में हुआ। वहां वह कॉलेज राजनीति में खा़सी दिलचस्पी लेने लगी और पहली ही दफा में इन्हें बिहार के छात्र कांग्रेस का वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया। तारकेश्वरी की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी को देख इनके पिता घबरा गए। उन्होंने जल्द ही उनकी शादी सिवान में स्थित चैनपुर ग्राम के श्री निधि देव नारायण सिन्हा से कर दिया। वह कोलकात्ता में पति के साथ उनकी पैतृक हवेली में रहने लगी। उनके पति पेशे से अधिवक्ता थे लेकिन बाद में उन्होंने इंडियन ऑयल में बतौर मैनेजर भी काम किया। इनकी दो बेटे और दो बेटियां थी। उनके पिता ने तो तारकेश्वरी की शादी यह सोचकर कराई थी कि अब शायद वह गृहस्थी में मन लगाएंगी। लेकिन तारकेश्वरी चाह कर भी खुद को राजनीति से दूर नहीं रख पाईं।

एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखें तो, द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और 1947 में देश की स्वतंत्रता के बीच के उत्साहपूर्ण समय को याद करना भी उतना ही प्रासंगिक है। देश में उथल-पुथल मची हुई थी; छात्र हर जगह प्रदर्शन कर रहे थे, या तो भारतीय राष्ट्रीय सेना के नायकों के मुकदमे का विरोध कर रहे थे या बंबई के बैलार्ड पियर में नौसैनिकों के साहसिक विद्रोह की प्रशंसा कर रहे थे। बिहार की दो कॉलेज छात्राएं, जो अभी किशोर ही थीं, उस दौर में राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा गईं। उनमें से एक, रामदुलारी सिन्हा, लंबे समय तक प्रसिद्धि नहीं पा सकीं। दूसरी, तारकेश्वरी सिन्हा, ने एक के बाद एक कई उपलब्धियां हासिल कीं।

छात्र कांग्रेस से निकलकर बिहार की गुटबाजी से भरी राजनीति में कदम रखते हुए उन्होंने दृढ़ता और साहस दोनों का परिचय दिया। बिहार के ग्रामीण इलाकों से निर्मम दक्षता से अतिरिक्त धन निकालने वाले जमींदार परिवार की वंशज, उनका बचपन एक कॉन्वेंट में बीता था और कॉलेज में प्रवेश करते ही उन्होंने 1942 और उसके बाद के वर्षों की उथल-पुथल का रोमांच चखा। बेहद आत्मविश्वासी, वह अंग्रेजी और हिंदी दोनों में धाराप्रवाह थीं, महत्वाकांक्षी थीं और उनमें भरपूर आकर्षण भी था। वह राजनीति की उथल-पुथल में सहजता से ढल गईं। अपनी सुंदरता के अलावा, उन्हें अच्छे कपड़े पहनना पसंद था और मेकअप का उन्हें विशेष शौक था। हालांकि, यह मानना ​​मूर्खता होगी कि यही उनकी एकमात्र खूबी थी। उनका सबसे बड़ा गुण था अदम्य साहस, जिसे कुछ लोग उद्दंडता भी कहते थे। उन दिनों महिला मुक्ति एक अनसुनी अवधारणा थी; महिला अध्ययन का प्रसार अभी अमेरिकी परिसरों से निकलकर वैश्विक स्तर पर होना बाकी था। तारकेश्वरी को ऐसे संभावित बदलावों का कोई आभास नहीं था। उन्होंने अकेले ही नारी शक्ति का निर्माण किया और महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई लड़ी। यद्यपि उन्होंने यह लड़ाई समाज के संभ्रांत ढांचे के भीतर लड़ी, फिर भी उनकी वीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता। आखिरकार, बाद में हुए अधिकांश आंदोलन भी मध्यम वर्ग तक ही सीमित रहे; समाज के निचले तबके में मौजूद वे महिलाएं जिन्हें व्यापक गरीबी और लैंगिक असमानता के विनाशकारी प्रभावों से बचाने के लिए वास्तव में व्यापक सुरक्षा की आवश्यकता है, वे आज भी उपेक्षित हैं।

इसलिए तारकेश्वरी का मूल्यांकन उनके युग और परिवेश के संदर्भ में किया जाना चाहिए। राजनीतिक दांव-पेचों का सामना करते हुए, उन्होंने पहली लोकसभा के लिए चुनाव जीता। वह युवा, साहसी और निडर थीं। वह मंत्रियों को प्रश्नों, प्रश्नों और अंतहीन पूरक प्रश्नों से परेशान करती थीं, और जरा से विरोध पर भी व्यवस्था के प्रश्न उठाती थीं। मावलंकर और अनंतसयनम आयनगर जैसे सख्त पीठासीन अध्यक्षों को भी उनकी उमंग को नियंत्रित करना मुश्किल लगता था। हैरान जवाहरलाल नेहरू को लगा कि उन्हें इसका समाधान मिल गया है। उन्होंने उन्हें उपमंत्री बनाया और अपने विनोदी स्वभाव के साथ, वित्त मंत्रालय में मोरारजी देसाई के साथ नियुक्त कर दिया। लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ। विपरीत स्वभाव वाले लोग एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं; कट्टर प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी मोरारजी को इस उद्दंड युवती की बेबाकी पसंद आई; वहीं उन्हें भी मोरारजी में एक उदार संरक्षक मिला, जो निश्चित रूप से एक रूढ़िवादी स्वभाव का था। जब मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री बनाया गया तब तारकेश्वरी सिन्हा को उप-वित्त मंत्री का पद दिया गया। साल 1969 में जब कांग्रेस पार्टी दो भागों में बंटी तब उन्होंने भी मोरारजी खेमे का ही समर्थन किया लेकिन साल 1977 में वह फिर से कांग्रेस में वापस लौट आईं। साल 1977 में उन्होंने बिहार के बेगुसराय ज़िले से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन हार गई। इसके बाद उन्होंने साल 1978 में समस्तीपुर से भी चुनाव लड़ा लेकिन इन्हें दोबारा हार का सामना करना था। आखिरकार राजनीति छोड़कर वह समाज सेवा के कामों में व्यस्त हो गई।

आम तौर पर, उप-मंत्रिस्तरीय पद को आरामदेह पद माना जाता है। तारकेश्वरी इस धारणा को मानने को तैयार नहीं थीं। मोरारजी को मनाकर उन्होंने एक विशिष्ट कार्यक्षेत्र की जिम्मेदारी हासिल कर ली और अपनी योग्यता साबित करने के लिए दृढ़ संकल्पित थीं। वे बिना किसी औपचारिकता के, अधिकारियों के कमरों में घुस जाती थीं, चाहे उनका पद कुछ भी हो। वे व्यापार संतुलन और भुगतान संतुलन के बीच का अंतर जानना चाहती थीं; उन्हें विकास, निवेश और पूंजी-उत्पादन अनुपात के बीच के जटिल संबंध को समझना पड़ा; उन्हें यह समझाने में मदद करनी पड़ी कि कीन्स का प्रच्छन्न बेरोजगारी से क्या तात्पर्य था।

उस समय गुमनामी के अंधेरे को तोड़कर बाहर आने वाली वह इकलौती उपमंत्री थीं। हालांकि, बदनामी फैलाने वालों ने आराम नहीं किया, बल्कि उन्होंने उनके हेयरस्टाइल और उनके द्वारा लगाए जाने वाले तेज़ फ्रेंच परफ्यूम का उपहास उड़ाया। वहीं, इसी भीड़ ने बिहार के ही रहने वाले और लंबे समय तक संसदीय मामलों के केंद्रीय मंत्री रहे सत्य नारायण सिन्हा के चेहरे से निकलने वाली इत्र की खुशबू के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।

साठ के दशक में तारकेश्वरी के लिए हालात और भी प्रतिकूल हो गए। इंदिरा गांधी महिला राजनीतिज्ञों से दूरी बनाए रखने में विश्वास रखती थीं; इस मामले में उन्होंने अपनी चाची और बिहार के मैदानी इलाकों की उस तेजतर्रार महिला के बीच कोई भेद नहीं किया। इसलिए यह स्वाभाविक था कि जब कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ी, तो वह मोरारजी देसाई के साथ पुराने नेताओं के खेमे में रहीं, जिनका समय खराब होने लगा था। आपातकाल के बाद जनता पार्टी की जीत ने तारकेश्वरी के उत्साह को कुछ समय के लिए फिर से जगाया। लेकिन पार्टी जल्द ही टूट गई, और उत्तर भारतीय माहौल में दरारें अक्सर बढ़ती ही जाती हैं। हालांकि उन्होंने जनता दल के एक गुट से अपने संबंध बनाए रखे, लेकिन स्थिति पहले जैसी नहीं रही। एक समय ऐसा आया जब वह राजनीतिक मंच से गायब हो गईं।

ग्लैमर क्षणभंगुर संयोग है; यह ऊपरी दिखावा है। इसलिए इसे भूल जाइए। तारकेश्वरी का असली खजाना उनकी सहज मित्रता और उससे जुड़ी गरिमा थी। एक खास घटना आज भी याद आती है। जुलाई 1984 में, फारूक अब्दुल्ला ने देश में केंद्र-राज्य संबंधों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने हेतु सभी विपक्षी दलों को एक सम्मेलन में आमंत्रित किया था। उस समय पार्टी के महासचिव ईएमएस नंबूदिरिपाद ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। हालांकि गर्मी का मौसम था, श्रीनगर में सुबह और शाम काफी ठंड रहती थी। ठंड से बचने के लिए ईएमएस के पास सिर्फ एक पुराना बुना हुआ स्वेटर था जो गले और आस्तीनों से फट रहा था। तारकेश्वरी ने ईएमएस को स्वेटर उतारने के लिए राजी किया; उन्होंने अपना शॉल उनके चारों ओर लपेटा, बुनाई की सुई और ऊन मंगवाई, स्वेटर की मरम्मत की और एक प्यारी सी मुस्कान के साथ ईएमएस को वापस सौंप दिया। यह एक ऐसा प्रदर्शन था जिसने एक ही बार में एक महान नेता के प्रति सम्मान, स्नेह और नारीत्व की गरिमा को व्यक्त किया।तारकेश्वरी सिन्हा के भाई गिरीश नारायण सिंह हिंदुस्तान में एयर इंडिया में पायलट थे। छोटी उम्र में ही एक प्लेन क्रैश में उनका देहांत हो गया था। तारकेश्वरी ने उनके नाम पर तुलसी गढ़ में एक अस्पताल का निर्माण कराया जहां मुफ्त में इलाज होता था। वह अस्पताल आज भी कार्यरत है। उन्हें पढ़ने-लिखने का बड़ा शौक था। वह हमेशा लेख लिखती रहती थी। बड़े समाचार पत्रों में इनके लेख छपते थे। इनका देहांत 80 साल की उम्र में 14 अगस्त 2007 को हुआ पर अफसोस की बात है की ऐसी प्रतिभाशाली, विकासशील महिला की मृत्यु किसी भी अखबार या पत्रिका का समाचार नहीं बनीं।

असल मुद्दा तो यही था। तारकेश्वरी ने जेंडर के मुद्दे पर उन महिलाओं से कहीं पहले लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की, जिन्होंने अब सड़क पर कब्जा जमा रखा है। उन्होंने एक और बात साबित की; एक स्वतंत्र महिला को न तो नारीत्व की गरिमा और न ही गृहस्थी का त्याग करना पड़ता है।

(साभार – द टेलिग्राफहिन्दी फेमिनिज्म इन इंडिया से साभार )

 बिहार कोकिला : विंध्यवासिनी देवी

बिहार कोकिला- विंध्यवासिनी देवी का जन्म पाँच मार्च उन्नीस सौ बीस को उनके नाना बाबू चतुर्भुज सहाय के घर हुआ था। इनके पिता बाबू जगत बहादुर प्रसाद ब्रह्मपुर रोहतक (नेपाल) के रहने वाले थे।बचपन में घर वाले उन्हें बिंदा कहकर पुकारते थे। उनके नाना भजन गाता थे। विंध्यवासिनी भी उनके साथ बैठकर भजन गातीं। यहीं से उनका मन संगीत में रम गया और 7 वर्ष की उम्र तक आते-आते वह लोकगीतों के गायन में सिद्ध हो चुकी थीं। नाना के प्रोत्साहन से गुरु क्षितीश चंद्र वर्मा से सानिध्य में उनकी संगीत में विधिवत शिक्षा आरंभ हुई।पढ़ने लिखने में उन्हें मन नहीं लगता था। नन्ही बिंदा ने नाना के साथ अयोध्या की यात्रा की। वहाँ बाबा गोमती दास को उन्होंने “जय जय गिरिबरराज किशोरी।

जय महेश-मुखचंद्र चकोरी।।

जय जय वदन षडानन दुति त्राता।

जगत जननि दामिनी दुति गाता।।

गाकर सुनाया।

मात्र 11 वर्ष की आयु में सहदेश्वर चंद्र वर्मा से विंध्यवासिनी का विवाह हुआ। र्मा पारसी थियेटर में संगीत निर्देशक थे।  उन्होंने विंध्यवासिनी देवी को संगीत की शिक्षा भी दी।1945 ईस्वी में पटना आई और आर्य कन्या विद्यालय में संगीत शिक्षिका के पद पर नियुक्त हुई। इसलिए ससुराल में भी उन्हें संगीत का वातावरण मिला। 1945 में विंध्यवासिनी का पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। पटना आने के बाद उन्होंने हिन्दी विद्या पीठ, प्रयाग से विशारद और देवघर से साहित्य भूषण की उपाधि प्राप्त की और फिर पटना के आर्य कन्या विद्यालय में संगीत शिक्षिका की रूप में नौकरी शुरू की। 1949 में लड़कियों की संगीत शिक्षा के लिए उन्होंने विंध्य कला मंदिर की स्थापना की। इस संस्थान को वह अपना मानस पुत्री कहती थीं।

1948 में विंध्यवासिनी देवी द्वारा निर्मित संगीत रूपक ‘मानव’ को जबर्दस्त ख्याति मिली। बिहार सरकार की अनुशंसा पर उसे अनेक बार मंचित किया गया। उनके इसी संगीत रूपक की वजह से आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक जगदीश चंद माथुर का ध्यान विंध्यवासिनी देवी की ओर आकृष्ट हुआ और उन्होंने औपचारिकताओं की सीमा तोड़कर बिहार की इस कला प्रतिभा को आकाशवाणी के पटना केंद्र में लोकसंगीत संयोजिका के पद पर नियुक्त किया। 1979 तक वे इसी पद पर कार्यरत रहीं। पटना में आकाशवाणी केन्द्र की स्थापना के उद्घाटन समारोह में विंध्यवासिनी देवी के स्वरचित गीत- भइले पटना में रेडियो के शोर, बटन खोल द तनि सुन सखिया”   के साथ सम्पन्न हुआ। उनके गाये भोजपुरी लोकगीत सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि मॉरीशस, फिजी जैसे देशों में गूँजते रहे। उनके गीत भावे ना मोहि अंगनवा, बिनु मोहनवां बादल गरजे ला, चमके बिजुरिया ता पर बहेला पवनवां। जैसे सावन झहरत बुंदिया वइसे झरेला मोर नयनवां, जाइ बसल मधुबनवां। कुब्जा सवत साजन बिलमावल, जाइ बसल मधुबनवां। अबले सखि! मोर मोर पिया ना अइले, बीतल मास सवनवां।

विंध्य कहे जिया धड़केला, सजनी कगवा बोलत अंगनवां।

विंध्यवासिनी देवी बहुमुखी प्रतिभा शाली लोकगायिका थी। उन्होंने सभी ऋतुओं, पर्व-त्यौहारों और संस्कारों से जुड़े परंपरागत गीत को तो अपना स्वर दिया ही है, मौलिक लोकगीतों की भी रचना की है। 1962-63 में पहली मगही फ़िल्म”भइया” के संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के निर्देशन में उन्होंने अपना स्वर दिया। हरिमोहन झा लिखित मैथिली फ़िल्म “कन्यादान” में गायन के साथ-साथ संगीत निर्देशन भी  किया। रेणु के मैला आँचल पर बनी फिल्म “डागदर बाबू” में भी उन्होंने स्वर दिया।भूपेन हजारिका के संगीत-निर्देशन में बनी फिल्मछठ मइया की महिमा में भी स्वर दिया है। विमाता फ़िल्म में “डोमकच” और झिझिया की लोक प्रस्तुति से उन्हें काफी ख्याति और प्रशंसा मिली। उन्होंने पटना में विंध्यकला मंदिर नाम की सांगीतिक संस्था की स्थापना की जहाँ छात्रों को संगीतकी  शिक्षा दी जाती है। 1983 में रामनवमी के दिन इन्होंने लोक रामायण का प्रणयन आरम्भ किया। ये गीत  रामायण के सातों काण्डो  पर आधारित हैं। उन्होंने लोकसंगीत सागर नामक एक ग्रन्थ की रचना की है जिसमें 15 हजार से अधिक लोक गीत हैं। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित भोजपुरी, मगही और  मैथिली के संस्कार गीतों की स्वरलिपि तैयार कर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी एक और कृति ऋतुरंग भी उल्लेखनीय है। ऋतुरंग में भारत की छहों ऋतुओं की सुषमा, महत्ता और विशेषताओं को गीतबद्ध   गया है। इसके अतिरिक्त सम सामयिक विषयों पर आधारित मौलिक गीत रचकर सफल गीतकार होने का परिचय दिया है। उन्होंने वर्षामंगल, सामा-चकेवा, जट-जटिन, झिझिया, डोमकच, बखो-बखाइन, पवड़िया आदि का उल्लेख किया जा सकता है। 1957 में संगीत-नाटक अकादमी द्वारा प्रथम बार नाटक प्रतियोगिता में सम्मिलित बेनीपुरी जी की प्रसिद्ध नाट्यकृति अम्बपाली का उन्होंने सफल निर्देशन किया था। आचार्य शिवपूजन सहाय द्वारा “लोकसंगीत आचार्या 1974 में तथा भारत सरकार द्वारा “पद्मश्री” से सम्मानित  किया गया। इसके अलावे पृथ्वीराज अवार्ड, बिहार रत्न, बिहार गौरव जैसी सम्मान उपाधियों के अतिरिक्त1954 में संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली के प्रथम राष्ट्रपति संगीत महोत्सव में स्वर्णपदक देकर इन्हें सम्मानित किया गया। 18 अप्रैल 2006 को पटना के कंकड़बाग में 86 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया।

विंध्यवासिनी देवी फिल्में में भी सफल रहीं। फिल्मों में उन्होंने अपनी शुरुआत मगही फिल्म ‘भैया’ से की, जिसमें संगीत निर्देशन चित्रगुप्त का था और गीत के बोल विंध्यवासिनी देवी के थे। उन्होंने मैथिली फिल्म कन्यादान के लिए संगीत निर्देशन और गीत लेखन का भी कार्य किया।

(साभार – फोकआर्टोपीडियाटीचर्स ऑफ बिहार)

बुढ़ापे में अकेले न पड़ें और किसी पर बोझ न बनें

ज़मीन के झगड़ों में न पड़ें: सिर्फ “पड़ोसी को सबक सिखाने” के लिए अपना जीवन कोर्ट-कचहरी की सीढ़ियों पर मत गंवाइए। हो सकता है केस खत्म होने से पहले ही आप दुनिया छोड़ दें। और अगर लड़कर ज़मीन जीत भी ली, तो वहाँ आप नहीं—वकील ही बसेंगे।

पुरानी गाड़ियाँ बोझ बन सकती हैं: पाँच लाख का फ़ायदा हो रहा है ऐसा सोचकर पुरानी गाड़ियाँ घर मत लाइए। अगर गाड़ी सड़क से ज़्यादा समय गैराज में खड़ी रहती है, तो दिल का दौरा गाड़ी को नहीं—आपको आएगा।

अपनी संपत्ति ट्रांसफर करने की जल्दी न करें : आज भले ही बच्चे “भगवान जैसे” लगें, लेकिन एक बार सारी संपत्ति उनके नाम कर दी, तो उसी घर में आप “अनचाही चीज़” बन सकते हैं। बच्चे बुरे नहीं होते, लेकिन दुनिया निर्दयी है। आख़िरी साँस तक कुछ न कुछ अपने नाम पर ज़रूर रखें।

अपनी आख़िरी बचत सुरक्षित रखें : ३० साल की कमाई से बनी पेंशन बच्चों के बिज़नेस में मत लगाइए। अंत में दवाइयों के लिए आपको उन्हीं बच्चों के सामने हाथ फैलाना पड़ सकता है।

बच्चों के घर से चिपक कर न रहें : सिर्फ “वे हमारे बच्चे हैं” कहकर उनके निजी जीवन में दख़ल न दें। ज़्यादा नज़दीकी आपका प्यार उनके लिए बोझ बन सकता है। अपने लिए एक छोटी-सी जगह बनाइए और स्वतंत्र जीवन जिएँ।

तीर्थयात्रा के लिए बच्चों का इंतज़ार न करें : “जब उन्हें छुट्टी मिलेगी तब वे मुझे ले जाएँगे” ऐसा सोचकर प्रतीक्षा मत कीजिए। जब उन्हें समय मिलेगा, तब शायद आप चलने लायक भी न रहें। जब तक ताक़त है, अपने पसंदीदा स्थानों पर जाइए—चाहे अकेले ही क्यों न हों।

आज जो खाने का मन हो, वही खाइए : अपने जीवनसाथी (पति/पत्नी) को आज ही उनकी पसंद की चीज़ खिलाइए। खाने की थाली लेकर श्मशान में रोते हुए कहना—“उन्हें यह बहुत पसंद था”—सिर्फ़ दिखावा है।

अपने लिए आराम की व्यवस्था करें : मौत के दिन तक काम का पहाड़ मत ढोते रहिए। अगर आप सुबह से रात तक बस दौड़ते ही रहे, तो अंत में कुछ भी नहीं जीता होगा। अपने शरीर को ज़रूरी आराम दीजिए।

नींद से बड़ा कोई इलाज नहीं : बेकार की अनिद्रा कम करें और शांति से सोएँ। जब आप बीमार पड़ेंगे, तब कोई आपका दर्द बाँटने नहीं आएगा—वह आपको अकेले ही सहना होगा।

यह कभी न भूलें कि आप अकेले ही आए हैं : यह उम्मीद करना कम कीजिए कि कोई आपके लिए सब कुछ करेगा। एक दिन आपकी परछाईं भी आपका साथ छोड़ देगी। मृत्यु भी अकेली होती है—इसलिए अकेले रहना खुशी-खुशी सीखिए।

खुशी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो कोई आपको दे -खुशी वह है जो आपको खुद ही पैदा करनी होती है।

जब आपका पति/पत्नी स्वस्थ हों, तब छोटे-बड़े हर काम को खुद करना सीखने में ज़रा भी संकोच न करें।

चाहे आपने वसीयत लिख दी हो, उसे बदलने का पूरा अधिकार आपके पास है—यह याद रखें।

अगर वारिस आपको सताते हों या परेशान करते हों, तो याद रखें—आज कानून और जिला प्रशासन आपके साथ है।

रोज़ टहलने की आदत डालें और यदि पुराने दोस्त या रिश्तेदार हों, तो उनके साथ अपने युवावस्था की यादें ज़रूर साझा करें।

हमेशा याद रखें कि एक दिन जीवन का हिसाब पूरा हो जाएगा; उस अंतिम दिन के लिए मानसिक रूप से तैयार रहिए।

अंत में, यह जानकर कि आप कुछ भी साथ नहीं ले जाएँगे—सबके साथ प्रेम और मित्रता से पेश आएँ, ज़रूरतमंदों की मदद करें और स्वयं को एक अच्छा इंसान बनाइए ।

छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पहुंचे कोलकाता

कोलकाता। छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा के कोलकाता आगमन के अवसर पर सेठ सूरजमल जालान संस्थान में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परिचर्चा आयोजित की गई। इस बैठक में साहित्य के विविध विषयों पर सार्थक चर्चा हुई तथा छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित किए जाने वाले आगामी राष्ट्रीय कार्यक्रम की रूपरेखा भी तय की गई। परिचर्चा में कलकत्ता महानगर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी तथा उमेशचंद्र कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. कमल कुमार ने अपने विचार रखते हुए प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। बैठक का वातावरण अत्यंत आत्मीय और विचारपूर्ण रहा, जिसमें उपस्थित साहित्यकारों ने साहित्य, भाषा और पत्रकारिता के विविध आयामों पर अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, दिव्या प्रसाद, परमजीत कुमार पंडित, अरविन्द तिवारी, विवेक तिवारी तथा संदीप कुमार भी उपस्थित रहे और उन्होंने भी कार्यक्रम की सफलता के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत किए।

 

महिला दिवस पर ‘फिट इंडिया पिंक साइक्लोथॉन’

कोलकाता। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रविवार सुबह कोलकाता की सड़कों पर उत्साह और ऊर्जा का अनोखा माहौल देखने को मिला। नारी शक्ति के सम्मान और महिलाओं में फिटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से यहां भव्य ‘फिट इंडिया पिंक साइक्लोथॉन’ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने स्वयं साइकिल चलाकर महिलाओं की फिटनेस, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण का संदेश दिया। इस अवसर पर शहर की सैकड़ों महिलाओं, युवाओं और नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और महिला सशक्तिकरण के इस अभियान का समर्थन किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. मांडविया ने कहा, “साइकिल चलाना न केवल स्वास्थ्य के लिए सरल और प्रभावशाली उपाय है, बल्कि यह पर्यावरण को स्वच्छ और सुरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब देश की महिलाएं सशक्त और स्वस्थ होंगी, तभी समाज और राष्ट्र भी समृद्ध होगा। महिला सशक्तिकरण ही राष्ट्र निर्माण की असली नींव है।”

इस अवसर पर कई प्रतिष्ठित हस्तियां भी मौजूद रहीं। इनमें ओलंपियन और अर्जुन पुरस्कार विजेता बॉम्बेला देवी लैशराम, माउंट एवरेस्ट विजेता पियाली बसाक, भारतीय महिला फुटबॉल टीम की गोलकीपर अद्रिजा सरखेल, ओलंपियन सुष्मिता सिंह रॉय तथा भारत स्काउट्स एंड गाइड्स, कोलकाता के मुख्य आयुक्त डॉ. अविनाश कुमार गुप्त शामिल थे।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में नेताजी सुभाष पूर्वी केंद्र, कोलकाता के क्षेत्रीय निदेशक (प्रभारी) श्री सिबानंदा मिश्रा, उप निदेशक टी. एस. चव्हाण, सहायक निदेशक कुमार आकाश नायक सहित समस्त प्रशिक्षकों, स्टाफ और कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान और भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने साइक्लिंग के माध्यम से फिटनेस, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया। ‘फिट इंडिया पिंक साइक्लोथॉन’ ने न केवल महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया, बल्कि समाज में समानता और सशक्तिकरण के संदेश को भी मजबूत किया।अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने कोलकाता में नारी शक्ति के उत्सव को नई ऊर्जा और प्रेरणा के साथ मनाने का अवसर प्रदान किया।

वेट लॉस थाली में बदल दें आम थाली

– मिताली जैन

अगर आप वजन कम करने के साथ-साथ उसे हमेशा बनाए रखना चाहते हैं तो इसका सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपनी आम थाली को ही वेट लॉस थाली में बदल दें। मतलब, आसान ट्रिक बस यही है कि आपको खाना बदलना नहीं है, बल्कि उसे स्मार्टली खाना है। तो चलिए आज इस लेख में हम आपको ऐसे ही कुछ आसान ट्रिक्स के बारे में बता रहे हैं, जो आपकी रेगुलर थाली को वेट लॉस थाली में बदल देंगे-

आधी प्लेट में हों सब्जियां –अपनी थाली को वेट लॉस थाली बनाने के लिए आप उसमें सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं। कोशिश करें कि आपकी थाली में मौसमी सब्जियां, सलाद जैसे खीरा, गाजर, टमाटर, सॉटे की हुई सब्ज़ियां व पत्तेदार सब्ज़ियां मौजूद हों। दरअसल, सब्ज़ियों में फ़ाइबर ज्यादा और कैलोरी कम होती है। जिसकी वजह से आपका पेट काफी हद तक भर जाता है और आप नेचुरली रोटी और चावल कम खाते हैं।

प्रोटीन सोर्स जरूर हो शामिल – आप अपनी थाली में दाल, राजमा, छोले, पनीर, दही व स्प्राउट्स आदि को जरूर रखें। यह ना केवल भूख कंट्रोल करने और पेट को ज्यादा देर तक भरा रखने में मदद करता है। बल्कि इससे आपकी स्नैक्स की क्रेविंग्स भी कम होती है।

कार्ब्स रखें कम  –अक्सर लोग कार्ब्स को अपना दुश्मन मानते हैं और वजन कम करने के लिए इसे डाइट से बाहर रखने की कोशिश करें। आपको कार्ब्स पूरी तरह से अवॉयड नहीं करना चाहिए, बल्कि पोर्शन कंट्रोल करें। मसलन, आपकी प्लेट में 1 रोटी या आधा कप चावल काफी हैं। यह बिना ज्यादा कैलोरी के बैलेंस एनर्जी देते हैं।

अपना खाना सलाद से शुरू करें – आप खाना किस तरह खाते हैं, इससे भी काफी फर्क पड़ता है। जब भी आप अपना मील लें तो सबसे पहले सलाद खाएं। इसमें फाइबर होता है, जो खाने की स्पीड को स्लो करता है और कुल कैलोरी इनटेक को कम करता है। इससे आपको पता भी नहीं चलता और आप खुद ब खुद ओवरईटिंग से बच जाते हैं।

(साभार – प्रभासाक्षी)

 

श्रृंगार में छिपा है हार्मोनल संतुलन का राज

सजना-संवरना हर एक महिला को खूब पसंद है। चाहे त्योहार हो या कोई खास मौका महिलाएं बनने-संवरने का कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। लड़कियों को मेकअप करने का भी काफी शौक होता है। बिंदी हो या फिर काजल व चूड़ियां आपकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सजने-सांवरने आपकी से सेहत का राज छिपा हुआ है। आपको यकीन नहीं हो रहा होगा, तो चलिए आपको बताते है कि, आयुर्वेदिक डॉक्टर के मुताबिक आपके श्रृंगार में सचमुच में हार्मोनल बैलेंस राज छिपा हुआ। आइए आपको बताते हैं श्रृंगार कैसे हार्मोन्स बैलेंस करता है।

– आयुर्वेद  के मुताबिक महिलाओं की हार्मोनल हेल्थ का सीधा संबंध इनके नर्वस सिस्टम, बॉडी हीट और अपन वायु यानी उस एनर्जी के बैलेंस से होता है, तो पीरियड्स और रिप्रोडक्टिव बैलेंस के लिए जरूरी है।

– अगर आप श्रृंगार करती हैं तो आपको इन चीजों को बैलेंस करके हार्मोन्स हेल्थ को सुधार करता है। कुमकुम बिंदी माथे के अजन हिस्से में लगाई जाती है और इसकी वजह स्ट्रेस कम होता है और इमोशंस में उतार-चढ़ाव नहीं होता है। वहीं, यह तनाव को कम करके मेंस्ट्रुअल हेल्थ को सुधारने में मदद करता है।

– अगर आप पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए काजल की तासीर ठंडी होती है। हमारी आंखे पित्त दोष से जुड़ी होती हैं। ऐसे में काजल लगाने से सिरदर्द और चिड़चिड़ापन कम हो जाता है। यह पीरियड्स से पहले शरीर में बढ़ रही हीट को कम करने में मदद करता है।

– मोती से बनी ज्वैलरी को ठंडक देने वाली और मानसिक शांति बढ़ाने वाली माना जाता है। जिन महिलाओं को अक्सर चिड़चिड़ापन, मूड में उतार-चढ़ाव या शरीर में ज्यादा गर्मी महसूस होती है, उनके लिए इसे पहनना फायदेमंद माना जाता है। माना जाता है कि यह पीएमएस से जुड़े लक्षणों को संतुलित करने में भी मदद कर सकती है।

– चूड़ियों से कलाई पर हल्का प्रेशर पड़ता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है।

– नाभि के नीचे चांदी के गहने पहनती है, तो इससे हैवी ब्लीडिंग कम होती है। इसके साथ ही, शरीर की अतिरिक्त हीट भी दूर होती है और पीएमएस के लक्षण कम होते हैं।

– अगर नाभि से ऊपर सोने के गहने पहनें तो काफी फायदेमंद होता है। इससे शरीर को ताकत और पोषण मिलता है।

– वहीं, नथ पहनने से रिप्रोडक्टिव हेल्थ बैलेंस करती है।

– सिंदूर और मांग टीका भी हार्मोनल और इमोशनल बैलेंस में मदद करता है।

(साभार – प्रभासाक्षी)

व्यवस्था के खिलाफ कलम चलाने वाले साहिर

20वीं सदी के सबसे बेहतरीन गीतकार और कवि में से एक रहे साहिर लुधियानवी का 08 मार्च को जन्म हुआ था। साहिर के गीतों और शायरी को आज भी लोग खूब पसंद करते हैं। उन्होंने अपने गीतों और शायरियों के जरिए जुल्मों और गैर-बराबरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। साहिर लुधियानवी शब्दों के सच्चे जादूगर थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर साहिर लुधियानवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…पंजाब के लुधियाना के करीमपुरा में 08 मार्च 1921 को साहिर लुधियानवी का जन्म हुआ था। वह एक पंजाबी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। साहिर का असली नाम अब्दुल हई है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा लुधियाना से पूरी की। कॉलेज टाइम से ही वह अपने शेर और शायरी के लिए प्रख्यात हो  गए थे।                                                                                    साहिर एक भारतीय कवि और संगीतकार थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए तमाम गाने भी लिखे।साहिर लुधियानवी ने अपने काम से फिल्म जगह में अच्छी जगह बनाई थी। साल 1949 में आई फिल्म ‘आजादी की राह’ से उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने 4 गाने लिखे थे। फिर साल 1951 में आई फिल्म ‘नौजवान’ के लिए साहिर ने गाने लिखे। उनको सबसे अधिक सफलता साल 1951 में आई फिल्म ‘बाजी’ से मिली थी। इन गानों के संगीतकार एस डी बर्मन थे। उस दौरान साहिर को गुरुदत्त की टीम का हिस्सा माना जाता है। बर्मन के साथ साहिर की आखिरी फिल्म ‘प्यासा’ थी। इसके बाद दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गए। जिसका कारण बर्मन और साहिर की राहें अलग हो गईं।साहिर लुधियानवी की कविताएं और शायरी दत्ता नायक को काफी ज्यादा पसंद थीं। जिस कारण साहिर ने दत्ता नायक के साथ तमाम फिल्मों के लिए गाने लिखे थे। साहिर लुधियानवी ने फिल्म ‘चंद्रकांता’, ‘दास्तान’, ‘मिलाप’, ‘इज्जत’ और ‘दाग’ के लिए भी गाने लिखे थे।बताया जाता है कि साहिर लुधियानवी ने लता मंगेशकर से ज्यादा फीस की डिमांड की थी। साहिर का कहना था कि भले ही उनको लता से एक रुपए ही ज्यादा दिया जाए, लेकिन उनको लता से ज्यादा फीस दी जाए। जिसके कारण साहिर और लता के बीच मतभेद हो गए थे। वहीं 25 अक्तूबर 1980 को 59 साल की उम्र में साहिर लुधियानवी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। जिसके बाद उनको मुस्लिम रीति-रिवाज के साथ जुहू में दफनाया गया था।

खेल के मैदान में परचम लहराती बेटियां

देश की आधी आबादी आज के दौर में किसी से कम नहीं हैं। देश की बेटियों ने हर क्षेत्र में देश का मान बढ़ाया है। साल 2025 में कुछ ऐसी महिला एथलीटहुईं हैं जिन्होंने मैदान की सीमाओं को लांघकर सफलता की एक नई इबादत लिखी है। क्रिकेट के मैदान से लेकर शतरंज की बिसात तक महिला खिलाड़ियों ने अपने हुनर का लोहा मनवाया है। हमारी इस खास रिपोर्ट में उन चुनिंदा महिलाओं के बारे में बताते हैं जो खेल जगत में सुपरविमेन बन कर उभरी हैं –

स्मृति मंधाना – दुनिया की बेहतरीन महिला क्रिकेटरों में से एक भारत की स्टार बल्लेबाज स्मृति मंधाना ने अपने क्रिकेट करियर में कई उपलब्धियां अपने नाम की है। उन्होंने न केवल अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से टीम इंडिया को पहली बार महिला वनडे वर्ल्ड कप का चैंपियन बनाया। खास बात ये है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ महज 50 गेंदों में शतक जड़कर विराट कोहली के सबसे तेज भारतीय अंतर्राष्ट्रीय शतक का रिकॉर्ड ध्वस्त किया। उनके इसी असाधारण प्रदर्शन के लिए उन्हें बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्स विमेन ऑफ द ईयर 2025 के प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। मंधाना ने वनडे वर्ल्ड कप 2025 के 9 मैचों में 54.25 की औसत से 434 रन बनाकर भारत की सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बनी थीं।

शीतल देवी – जहां हम बिना हाथों के किसी भी काम को करने के बारे में सोच के भी डर जाते हैं वहां शीतल देवी देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल बनी हैं। जम्मू-कश्मीर की शीतल देवी अब पैरा आर्चरी की दुनिया में एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। 2025 में उन्होंने अपनी बादशाहत कायम की। इश बेटी ने साउथ कोरिया में आयोजित वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप 2025 में व्यक्तिगत कंपाउंड इवेंट में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया था। शीतल देवी के हाथ नहीं हैं लेकिन वो पैरों और कंधों की मदद से अचूक निशाने के लिए पहचानी जाती हैं। उन्होंने महज 18 साल की उम्र में वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप 2025 के फाइनल में वर्ल्ड नंबर-1 खिलाड़ी को मात देकर देश को गोल्ड दिलाया था।

सुरुचि सिंह  – भारत के लिए निशानेबाजी की दुनिया में नया चेहरा बनकर उभरी सुरुचि सिंह ने साल 2025 की सबसे सटीक शूटर बनकर देश का मान बढ़ाया है। उन्होंने म्यूनिख और ब्यूनस आयर्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप में लगातार तीन व्यक्तिगत गोल्ड मेडल जीतकर गोल्डन ट्रेबल का दुर्लभ कारनामा कर दिखाया था। खास बात ये है कि सुरुचि वर्तमान में 10 मीटर एयर पिस्टल श्रेणी में दुनिया की नंबर-1 रैंकिंग वाली महिला निशानेबाज हैं। पेरू के लीमा में हुई आईएसएसएफ वर्ल्ड कप 2025 में जब भारती निशानेबाज सुरुचि सिंह ने महिलाओ की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में गोल्ड जीता था। तब उन्होंने अपने ही देश की मनु भाकर को हराया था।

दिव्या देशमुख – वहीं शतरंज जैसे खेल में पुरुषों का दबदबा होने के बावजूद दिव्या देशमुख ने शतरंज की दुनिया में बड़ा नाम कमाया है। दिव्या ने 2025 में इस खेल में अपनी चालों से दुनिया के दिग्गज ग्रैंडमास्टर्स को मात दी है। दिव्या ने जुलाई 2025 में जॉर्जिया के बाटुमी में आयोजित फिडे महिला शतरंज वर्ल्ड कप 2025 जीतकर इतिहास रचा था। दिव्या ने अनुभवी कोनेरू हम्पी को मात देकर ये खिताब अपने नाम किया था। इसके साथ ही दिव्या इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय महिला बनी हैं। जिसके बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा ग्रैंडमास्टर की उपाधि भी दी गई, जो भारतीय शतरंज के इतिहास में एक मील का पत्थर है।

(साभार – प्रभासाक्षी)

महिलाओं के प्रति बदला है नजरिया

-रमेश सर्राफ धमोरा

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने और लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए मनाया जाता है।  यह जागरूकता बढ़ाने, बाधाओं को तोड़ने और सभी के लिए समान अवसरों को बढ़ावा देने का दिन है।  यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं तो समाज और राष्ट्र मजबूत होते है।  यह समानता और अधिकारों के लिए एक वैश्विक आंदोलन है, जो महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक है। यह एक ऐसा दिन है जो महिलाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हर साल 8 मार्च 1911 से पूरे विश्व में मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाना है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की थीम है दान से लाभ है, जो उदारता, सहयोग और सामूहिक प्रगति के मूल्यों को बढ़ावा देता है। यह अभियान इस बात पर प्रकाश डालता है कि महिलाओं का समर्थन करना और लैंगिक समानता को आगे बढ़ाना सभी के लिए व्यापक सामाजिक और आर्थिक लाभ ला सकता है। इस अभियान का मूल विचार यह है कि जब महिलाएं शिक्षा, नेतृत्व, उद्यमिता, विज्ञान, कला और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सशक्त होती हैं, तो इससे मजबूत समुदाय और साझा समृद्धि का निर्माण होता है। सहयोग और समान अवसरों को प्रोत्साहित करके, यह अभियान समाज में समावेशी विकास और सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देना चाहता है। भारत में महिलाओं की सुरक्षा और इज्जत का खास ख्याल रखा जाता है। अगर हम इक्कीसवीं सदी की बात करे तो यहां की महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला काम कर रही है। अब तो भारत की संसद ने भी महिलाओं के लिये लोकसभा व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक पास कर दिया है। उससे आने वाले समय में भारत की राजनीति में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जायेगी। देश में महिलाओं को अब सेना में भी महत्वपूर्ण पदो पर तैनात किया जाने लगा है। जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है।

यहां महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार है। महिलायें देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है तथा विकास में भी बराबर की भागीदार है। आज के युग में महिला पुरुषों के साथ ही नहीं बल्कि उनसे दो कदम आगे निकल चुकी है। महिलाओं के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भारतीय संविधान के अनुसार महिलाओं को भी पुरुषों के समान जीवन जीने का हक है। भारत में नारी को देवी के रूप में देखा गया है। कहा जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। प्राचीन काल से ही यहां महिलाओं को समाज में विशिष्ट आदर एवं सम्मान दिया जाता है।

भारत में वर्षो से महिला सुरक्षा से जुड़े कई कानून बने है। इसमें हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट 1856, इंडियन पीनल कोड 1860, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872, मैरिड वीमेन प्रॉपर्टी एक्ट 1874,चाइल्ड मैरिज एक्ट 1929, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, इंडियन डाइवोर्स एक्ट 1969, मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन एक्ट 1986, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हर्रास्मेंट ऑफ वुमन एट वर्किंग प्लेस एक्ट 2013 आदि। इसके अलावा 7 मई 2015 को लोक सभा ने और 22 दिसम्बर 2015 को राज्य सभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी बदलाव किया है। इसके अन्तर्गत यदि कोई 16 से 18 साल का किशोर जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी कठोर सजा का प्रावधान है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक साल 2023 में भारत में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,05,861 अपराध दर्ज किए गए। इन अपराधों में बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, साइबर अपराध, और अपहरण जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न के सामने आए हैं।जो समाज में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी उदासीनता को दर्शाते हैं। इससे पहले 2022 में 4,45,256 मामले, 2021 में 4,28,278मामले 2020 में 3,71,503 मामले दर्ज किए गए थे।

राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा। राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर से पूरे साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 28,811 शिकायतें मिलीं। इसमें 16 हजार से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश राज्य से आए हैं। आंकड़े हैरान कर देने वाली हैं। क्योंकि आयोग में ये शिकायत गरिमा के अधिकार कैटेगरी के अंतर्गत दर्ज किया गया है। इसके बाद दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2,411 मामले दर्ज किए गए। महाराष्ट्र में 1,343, बिहार में 1,312 और मध्य प्रदेश में 1,165 इतने मामले दर्ज किए गए हैं।

2023 के 12 महीने बाद जारी किए गए इस रिपोर्ट में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध में दहेज उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसे अपराध दर्ज किए गए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की यह रिपोर्ट महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता दिखाती है। आंकड़ों के मुताबिक देश भर में यौन उत्पीड़न के 805 मामले, साइबर अपराध के 605 मामले, पीछा करने की 472 मामले और सम्मान से जुड़े अपराध के खिलाफ  409 शिकायतें दर्ज कराई गईं। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बलात्कार के मामले भी शामिल हैं। साल 2023 में बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के 1,537 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद गरिमा के अधिकार के तहत 8,540, घरेलू हिंसा के 6,274, दहेज उत्पीड़न के 4,797, छेड़छाड़  के 2,349,और महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता के 1,618  मामले दर्ज किए गए।

2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले 2022 की तुलना में कम हुए हैं। 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 30,864 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि 2023 में यह संख्या घटकर 28,278 हो गई। यह एक सकारात्मक संकेत है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। साल 2022 के बाद से शिकायतों की संख्या में कमी देखी गई है। जब 30,864 शिकायतें प्राप्त हुई थी, जो 2014 के बाद से सर्वाधिक आंकड़ा था। जहां तक बात महिलाओं की सुरक्षा की आती है तो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अभूतपूर्व निर्णयों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई प्रबंध किये हैं। आज भारत में महिलायें पहले की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित है। हम एक तरफ महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी का दर्जा देकर उन्हे आगे बढ़ा रहें है। वहीं दूसरी तरफ उनके साथ अत्याचार की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आये दिन हमें महिलाओं के साथ बलात्कार, दुर्व्यवहार होने की घटनाये सुनने को मिलती रहती है। ऐसी घटनाओं से महिला सशक्तिकरण के अभियान को धक्का लगता हैं।देश में महिलाओं के प्रति खराब होते माहौल को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं अपितु हर आम आदमी की भी है। हम सभी को आगे आकर महिला सुरक्षा की लड़ाई में महिलाओं का साथ देना होगा तभी देश की मातृ शक्ति सर उठा कर शान से चल सकेगीं। अब महिलाओं को समझना होगा कि आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। इन परम्पराओं को बदलने का बीड़ा स्वयं महिलाओं को ही उठाना होगा। तभी समाज में उनके प्रति सोच बदल पायेगी।

(साभार – प्रभासाक्षी)