मुम्बई । पूरे दक्षिण एशिया में अपनी खनकती आवाज के जादू से करीब आठ दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका पद्म विभूषण आशा भोसले आज अपनी सुरमयी यात्रा को विराम देकर अनंत में विलीन हो गयीं। मुंबई में अपने आवास पर दिल का दौरा पड़ने के बाद कल आशा भोसले को ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। रविवार दोपहर वेंटीलेंटर पर उनकी सांसों की वीणा थम गई और संगीत के सातों सुर शोक में डूब गये। उनके पुत्र आनंद भोसले ने अस्पताल के बाहर मीडिया को बताया कि आज अपराह्न उनकी मां आशा भोसले अपने नश्वर शरीर को छोड़ कर अनंत यात्रा पर चलीं गईं। कल दिन में 11 बजे से लोग उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन करेंगे और अपराह्न चार बजे शिवाजी पार्क स्थित श्मशान में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की जाएगी।
आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को गोआर, सांगली में हुआ था, जो उस समय सांगली की रियासत (अब महाराष्ट्र में) का हिस्सा था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर मराठी और कोंकणी थे। उनकी माता शेवंती (गुजराती) थीं। आशा भोसले के पिता एक सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और मराठी संगीत मंच पर अभिनेता और थे। नौ साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया और उनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और फिर मुंबई चला गया। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्होंने और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने फिल्मों में गाना और अभिनय करना शुरू कर दिया। आशा का पहला फिल्मी गीत मराठी फिल्म ‘माझा बाई’ (1943) का “चला चला नव बाला” था। इसका संगीत दत्ता दावजेकर ने तैयार किया था। उन्होंने 1948 में हिंदी फिल्म ‘चुनरिया’ के लिए “सावन आया” गीत गाया। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म थी, जिससे उन्होंने अभिनय की शुरुआत की। उनका पहला एकल हिंदी फिल्मी गीत 1949 में फिल्म ‘रात की रानी’ के लिए था। 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध 31 वर्षीय गणपतराव भोसले से शादी कर ली।
आशा की शादी कामयाब नहीं रही। उनके पति गणपतराव ने उन्हें घर से निकाल दिया। अपने तीसरे बच्चे की गर्भावस्था के दौरान वह दो बच्चों के साथ मायके लौट आईं। उन्होंने गीत गाकर, पैसे कमाकर और बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपना जीवन जारी रखा। उन्होंने 1950 के दशक में हिंदी फिल्मों के अधिकांश पार्श्व गायकों की तुलना में कहीं अधिक गाने गाए। इनमें से अधिकतर गाने कम बजट वाली फिल्मों में थे। उन्हें शुरुआती लोकप्रियता परिणीता (1953), बूट पॉलिश (1954), सीआईडी (1956) और नया दौर (1957) जैसी फिल्मों के लिए गाए गए गानों से मिली।
कहा जाता है कि ओपी नैय्यर ने आशा भोसले को उनकी पहचान दिलाई। ओपी नैय्यर और आशा भोसले के कुछ गाने मधुबाला (हावड़ा ब्रिज, 1958) और “ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा”, (मेरे सनम, 1965) पर फिल्माए गए “आइए मेहरबान” हैं। “आओ हुज़ूर तुमको” (किस्मत) और “जाइये आप कहाँ” (मेरे सनम) आदि हैं। उन्होंने तुमसा नहीं देखा (1957), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), और कश्मीर की कली (1964) जैसे गाने रिकॉर्ड किए। नैय्यर ने अपने सबसे लोकप्रिय युगल गीतों जैसे “उड़े जब जब जुल्फें तेरी” (नया दौर), “मैं प्यार का राही हूं” (एक मुसाफिर एक हसीना), “दीवाना हुआ बादल” और “इशारों इशारों में” (कश्मीर की कली) के लिए मोहम्मद रफी और आशा जी के युगल गीतों का भी इस्तेमाल किया।
आशा भोसले से संगीतकार रवि ने कई लोकप्रिय गाने गवाये। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘वचन’ के लिए गीत गाए थे। हम सभी को इस फिल्म का मधुर लोरी गीत “चंदा मामा दूर के” याद है, जो बच्चों का सदाबहार पसंदीदा गीत है। उन्होंने कई फिल्मों के लिए भजन भी गाए। उनका एक भजन “तोरा मन दर्पण” (काजल) बेहद लोकप्रिय हुआ था। वक्त, चौदहवीं का चांद, गुमराह, बहू बेटी, चाइना टाउन, आदमी और इंसान, धुंध, हमराज़ आदि जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों के लिए भी गाने रिकॉर्ड किए। सचिन देव बर्मन या एस.डी बर्मन ने काला पानी, काला बाजार, इंसान जाग उठा, लाजवंती, सुजाता और तीन देवियां (1965) जैसी फिल्मों में कई हिट गाने दिए। इनमें सबसे मशहूर गाना बिमल रॉय की फिल्म बंदिनी (1963) का “अब के बरस” था। इसी तरह ज्वेल थीफ (1967) का मोहक गाना “रात अकेली है” भी काफी लोकप्रिय हुआ और यह तनुजा पर फिल्माया गया था।
पंचम के नाम से लोकप्रिय उनके पति राहुल देव बर्मन ने भी आशा भोसले को नयी उंचाई देने में अहम भूमिका निभाई। 1966 में फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ के लिए संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन के साथ युगल गीत गाने पर आशा को खूब लोकप्रियता मिली। बताया जाता है, जब आशा ने नृत्य गीत “आजा आजा” सुना, तो उन्हें लगा कि वह इस पश्चिमी धुन को गा नहीं पाएंगी। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और लगभग 10 दिनों तक इसका अभ्यास किया। “आजा आजा” के साथ-साथ उन्होंने “ओ हसीना जुल्फोंवाली” और “ओ मेरे सोना रे” जैसे गीत भी गाए, जो सफल हुए और उन्हें अलग पहचान मिली। उनके कुछ अन्य प्रसिद्ध गानों में “पिया तू अब तो आजा” (कारवां) और “ये मेरा दिल” (डॉन) “दम मारो दम” (हरे रामा हरे कृष्णा, 1971), “दुनिया में” (अपना देश, 1972), और “चुरा लिया है तुमने” (यादों की बारात, 1973) आदि गीत शामिल हैं।
आरडी बर्मन ने आशा भोसले और किशोर कुमार के युगल गीत भी रिकॉर्ड किए और कुछ प्रसिद्ध गाने “जाने जान” (जवानी दीवानी) और “भाली भाली सी एक सूरत” (बुड्ढा मिल गया) हैं। 1980 के दशक में बर्मन और आशा ने कई गाने और लोकप्रिय युगल गीत “ओ मारिया!” रिकॉर्ड किया। (सागर). राहुल देब बर्मन ने आशा भोसले से कुछ मधुर बंगाली गाने भी गवाए जैसे मोहुये जोमेछे आज मोउ गो”, ”चोखे चोखे कोठा बोलो”, ”चोखे नामे बृष्टि” (‘जाने क्या बात है’ का बंगाली संस्करण), ‘बंशी सुने की घोर थका जाए”, ”सोंध्या बेलाए तुमी आमी” और ”आज गुनगुन गुन गुंजे अमर” (‘प्यार दीवाना’ का बंगाली संस्करण) होता है”।
शंकर-जयकिशन ने भी आशा भोसले के साथ काम किया। “परदे में रहने दो” गाने के लिए उन्हें दूसरा फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। उन्होंने शंकर-जयकिशन के लिए प्रसिद्ध गीत “जिंदगी एक सफर है सुहाना” (अंदाज़, 1971) भी गाया। उन्होंने बूट पॉलिश (1954), श्री 420 (1955), जिस देश में गंगा बहती है (1960), जंगली (1961), एन इवनिंग इन पेरिस (1968), और कल आज और कल (1971) आदि में भी आशा की आवाज का इस्तेमाल किया।
एक अंतराल के बाद आशा भोसले की वापसी ए आर रहमान की “रंगीला” (1994) गाने से हुई। “तन्हा तन्हा” और “रंगीला रे” जैसे गाने खूब लोकप्रिय हुए। उनके हिट गानों में “मुझे रंग दे” (तक्षक), “राधा कैसे ना जले” (लगान, उदित नारायण के साथ युगल गीत), “कहीं आग लगे” (ताल), “ओ भंवरे” (दाउद, केजे येसुदास के साथ युगल गीत), “वेनिला वेनिल्ला” (इरुवर, 1999), “सितंबर माधम” (अलाईपायुथे, 2000) और “धुआं धुआं” शामिल हैं। (मीनाक्षी, 2004) शामिल हैं। आशा भोसले ने संगीतकार अनु मलिक के साथ कई हिट गाने रिकॉर्ड किए हैं। उनके प्रसिद्ध गाने ये लम्हा फिलहाल” (फिलहाल) और ”किताबें बहुत सी” (बाजीगर) आदि हैं। 1950 और 1960 के दशक में, आशा जी ने अनु मलिक के पिता सरदार मलिक के लिए भी गाया था, और सबसे खास तौर पर सारंगा (1960) में।
उन्होंने 2012 में सुर क्षेत्र में जज की भूमिका भी निभाई। 79 वर्ष की आयु में, उन्होंने 2013 में फिल्म ‘माई’ में मुख्य भूमिका के साथ अभिनय की शुरुआत की। इस फिल्म में उन्होंने अल्जाइमर रोग से पीड़ित और अपने बच्चों द्वारा त्यागी गई 65 वर्षीय मां का किरदार निभाया। आशा जी ने मई 2020 में आशा भोसले ऑफिशियल नाम से अपना यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया।
आशा भोसले का एक और गुण था—खाना पकाना। एक बार एक समाचार पत्र को दिए एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उनका गायन करियर सफल नहीं होता तो क्या होता, तो उन्होंने कहा था, “मैं बावर्ची बन जाती। मैं चार घरों में खाना बनाकर पैसे कमा लेती।” उन्होंने दुबई, कुवैत, आबू धाबी, दोहा, बहरीन और काहिरा में रेस्तरां खोला था। रेस्तरां की इस श्रृंखला की देखरेख वाफी ग्रुप करता है।
आशा भोसले ने आठ दशकों में 12 हजार से अधिक गीत गाये और तीन पीढ़ियों की नायिकाओं को उन्होंने अपनी आवाज़ दी। उन्हें अपने शानदार करियर में अनगिनत पुरस्कार और सम्मान मिले जिनमें प्रमुख 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स (7 सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका सहित), दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 2000 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पद्म विभूषण शामिल हैं। 2001 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया। वर्ष 2011 में संगीत इतिहास में सबसे ज्यादा स्टूडियो रिकॉर्डिंग करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता देते हुए गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में उनका नाम दर्ज किया गया। वर्ष 2021 में उन्हें महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अलावा, उन्हें आईआईएफए, बीएफजेए और कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया और डॉक्टरेट की तीन मानद उपाधियां प्रदान की गयीं।





