Friday, February 27, 2026
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बड़ाबाजार में को मिला पहला निजी हेरिटेज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल

कोलकाता । चारनॉक हॉस्पिटल ने सेंट्रल कोलकाता में पश्चिम बंगाल के पहले प्राइवेट हेरिटेज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल का उद्घाटन किया। अत्याधुनिक उपकरणों के साथ खुले इस अस्पताल ने बंगाल के हेल्थकेयर लैंडस्केप में एक ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज की है। 250 बेडों की क्षमता वाले इस मल्टी सुपर स्पेशियलिटी फैसिलिटी अस्पताल ने लगभग 200 साल पुरानी ग्रेड I हेरिटेज बिल्डिंग, जिसे पहले लोहिया मातृ सेवा सदन के नाम से जाना जाता था, इस अस्पताल में नई जान फूंक दी है, जिसमें संरक्षित लेगेसी आर्किटेक्चर को कटिंग-एज मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ नये तरीके से जोड़ा गया है। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल के उद्घाटन मौके पर सम्मानीय अतिथियों में मेयर फिरहाद बॉबी हकीम , शशि पांजा ( एमआइसी, इंडस्ट्री, कॉमर्स और एंटरप्राइज महिला एवं बाल विकास और समाज कल्याण, पश्चिम बंगाल सरकार), चंद्रिमा भट्टाचार्य (एमआईसी, वित्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, भूमि एवं भूमि सुधार, शरणार्थी एवं पुनर्वास, पश्चिम बंगाल सरकार), सुजीत बोस (अग्निशमन राज्य मंत्री, पश्चिम बंगाल सरकार), दोला सेन (संसद सदस्य), विवेक गुप्ता (विधायक), देबोप्रसाद बाग (विधायक), राजेश कुमार सिन्हा (पार्षद), एलोरा साहा (पार्षद), तारक नाथ चट्टोपाध्याय (पार्षद), मृणाल साहा (पूर्व पार्षद), स्मिता बख्शी (पूर्व विधायक), संजय बख्शी (पूर्व विधायक), प्रशांत शर्मा (चारनोक हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक) के साथ समाज की कई दूसरी जानी-मानी हस्तियां इसमें शामिल हुए। लगभग 4 बीघे ज़मीन पर फैले, चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल की एक-एक अत्याधुनिक व्यवस्थाएं एवं यहां की मशीनों का रेस्टोरेशन मरीजों की हितों के अनुसार है। जिसने ग्रेड I स्ट्रक्चर की आर्किटेक्चरल शान और हेरिटेज कैरेक्टर को बनाए रखा है, साथ ही इसे मॉडर्न सुपर स्पेशियलिटी हेल्थकेयर से जुड़ी सभी सुविधाओं से लैस रखा गया है। इस अस्पताल के आधुनिकीकरण में 250 करोड़ रुपये से ज़्यादा की लागत आई है।

यह अस्पताल मरीजों की सुविधा एवं उन्हें स्वस्थ व शेहदमंद रखने के लिए एक ऐतिहासिक प्रॉपर्टी के अडैप्टिव रीयूज़ का एक अनोखा और मिसाल है। इस अस्पताल से लगभग 1,000 से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है, जो लोकल इकॉनमी में बड़ा योगदान देगा। गिरीश पार्क मेट्रो स्टेशन से 500 मीटर की दूरी पर मौजूद इस अस्पताल के खुलने से बड़ाबाजार, जोरासांको, नीमतला घाट स्ट्रीट और विवेकानंद रोड में रहने वाले लोगों को काफी ज्यादा फायदा होगा। इसके अलावा यहां पहुंचने के और भी कई एक्सेस पॉइंट हैं, अस्पताल में बड़ी पार्किंग की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल में वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधाएं है, जिसे पूरी टर्शियरी और क्रिटिकल केयर सर्विस देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। 250 बेडों की क्षमता वाले इस अस्पताल में 90 से ज़्यादा वार्ड बेड और 20 प्राइवेट केबिन हैं, जिन्हें कई क्रिटिकल केयर स्पेशलिटीज़ में 70 आइसीयू बेड की सुविधा भी मिलेगी। हॉस्पिटल में 4-6 स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, डेडिकेटेड कैथ लैब, सीटीवीएस और न्यूरो ऑपरेशन थिएटर, 10 बेड का इमरजेंसी डिपार्टमेंट और 10 बेड की डायलिसिस यूनिट भी उपलब्ध हैं। इसके साथ यहां एडवांस्ड डायग्नोस्टिक और इमेजिंग सुविधाएँ भी मिलेंगी। इस अस्पताल में एक ही छत के नीचे आसान, टेक्नोलॉजी से चलने वाली देखभाल से जुड़ी कई सुविधाएं मिलेगी। मीडिया से बात करते हुए चारनॉक हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक प्रशांत शर्मा ने कहा, पूरे बंगाल में काफी ज़्यादा पोटेंशियल वाली कई हिस्टोरिक प्रॉपर्टीज़ का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल के ज़रिए, हमने दिखाया है कि हेरिटेज कंज़र्वेशन और मॉडर्न हेल्थकेयर एक साथ आसानी से चल सकते हैं। सेंट्रल कोलकाता में खासकर बड़ाबाज़ार और उसके आस-पास के इलाके लंबे समय से एक वाइब्रेंट कमर्शियल हब रहे हैं, लेकिन पाँच किलोमीटर के दायरे में एक मॉडर्न प्राइवेट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल तक यहां उपलब्ध नहीं थी। चार्नॉक लोहिया हॉस्पिटल की लॉन्चिंग के साथ हम इय इलाके की ज़रूरी कमी को पूरा कर रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज को एडवांस्ड केयर समय मिलने से मरीज की जान बच सकती है। हमारा विज़न वर्ल्ड-क्लास हेल्थकेयर को लोगों के रहने और काम करने की जगह के करीब लाना है, जो हमारी पेशेंट फर्स्ट की फिलॉसफी के मुताबिक है।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में शोभा डे के साथ संवाद सत्र 

कोलकाता । एक्साइड कोलकाता लिटरेरी मीट के एक भाग के रूप में, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 फरवरी को सुबह 10:30 बजे सोसाइटी हॉल में “एक राष्ट्र का जन्म, एक बेटी का जन्म” विषय पर सुश्री शोभा डे के साथ एक इंटरैक्टिव सत्र का आयोजन किया। सत्र का मुख्य आकर्षण एक प्रसिद्ध भारतीय लेखिका, स्तंभकार और सांस्कृतिक आइकन सुश्री शोभा डे के साथ एक आकर्षक बातचीत थी। अपनी निर्भीक आवाज़ और समकालीन दृष्टिकोण के लिए जानी जाने वाली, उन्होंने अपने जीवन, लेखन यात्रा और समाज की टिप्पणियों से लिए गए अंतर्दृष्टिपूर्ण विचारों को साझा किया। सुश्री शोभा डे ने अतीत में फंसे रहने के बजाय भविष्य की ओर देखने के महत्व के बारे में बात की। .अपने स्वयं के जीवन में आए बदलावों और पिछले कुछ वर्षों में भारत के परिवर्तन के बीच समानताएं बनाते हुए, उन्होंने इस बात पर विचार किया कि औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारतीय होने का क्या मतलब है और स्वतंत्रता का विचार कैसे विकसित हो रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के भारत की असली ताकत उसके लोगों में निहित है। युवा पीढ़ी, विशेषकर युवा लड़कियों को संबोधित करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया को एक शक्तिशाली उपकरण बताया जिसका प्रभाव पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सोशल मीडिया को ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिसके बारे में माता-पिता को घबराने की ज़रूरत है, बल्कि इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए जिसे समझदारी से समझने, नियंत्रित करने और संसाधित करने की आवश्यकता है। उन्होंने हिंग्लिश के एक ऐसी भाषा के रूप में उभरने के बारे में भी बात की जो सड़कों और रोजमर्रा की बातचीत की लय को दर्शाती है, जिसने उनके लेखन को बहुत प्रभावित किया। आत्म-खोज के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने छात्रों को खुद को पहचानने के लिए प्रोत्साहित किया कि वे वास्तव में कौन हैं और अपनी आवाज खुद खोजें। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि लेखन कौशल को मजबूत करने में पढ़ना कैसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इच्छुक लेखकों से वे जो करते हैं उसके प्रति सच्चा प्यार विकसित करने का आग्रह किया। शोभा डे ने दर्शकों को याद दिलाया कि लेखन व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है और युवा लेखकों को बस लिखना शुरू करने के लिए प्रेरित किया, और उन्हें आश्वस्त किया कि दृढ़ता के साथ स्पष्टता और दिशा मिलती है।

सफलता पर अपना दृष्टिकोण साझा करते हुए, उन्होंने एक सफल महिला को वह महिला बताया जिसके पास ना कहने की शक्ति है। उन्होंने छात्रों को उन स्थितियों से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित किया जो असुविधा का कारण बनती हैं, चाहे वह आकर्षक नौकरी का अवसर हो या कोई ऐसी स्थिति जो खुशी से समझौता करती हो। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि लैंगिक समानता एक जन्मसिद्ध अधिकार है और इस पर बिना किसी हिचकिचाहट के विश्वास किया जाना चाहिए। सत्र के अंत में, उन्होंने महत्वाकांक्षी पाठकों और लेखकों के लिए कई पुस्तकों की सिफारिश की, जिससे उन्हें अपनी साहित्यिक रुचियों को गहरा करने के लिए प्रेरणा मिली।  यह कार्यक्रम दोपहर 12:00 बजे सुश्री शोभा डे को रेक्टर और छात्र मामलों के डीन, प्रो. दिलीप शाह द्वारा सम्मानित किए जाने के साथ संपन्न हुआ। यह सत्र एक विचारोत्तेजक और प्रेरक अनुभव साबित हुआ, जिससे दर्शकों को लेखन, पहचान और स्वयं के प्रति सच्चे बने रहने के साहस पर बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई। रिपोर्टर: आमना शमीम और नीलेशा नाथ थे और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में मनाया गया अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

कोलकाता । भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में कवयित्री, उपन्यासकार और अनुवादक साहित्यकार तृष्णा बासक रहीं ।इस अवसर पर उडिया उर्दू मारवाड़ी गुजराती हिंदी आदि विभिन्न भाषाओं में अपने वक्तव्य और कविताएं सुनाई गई। प्रो शंख आचार्य ने विज्ञापन में प्रादेशिक भाषा के प्रयोग के विषय में जानकारी दी ।उदाहरण अमूल का देते हुए न लोकल एजेंसी द्वारा प्रादेशिक और क्षेत्रीय भाषाओं को पूरे भारत में हर भाषा का प्रयोग हो रहा है, स्लाइड प्रेजेंटेशन द्वारा समझाया। कार्यक्रम की शुरुआत उत्तिया चट्टोपाध्याय के उद्घाटन गीत से हुई। रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने संस्कृत में एक श्लोक द्वारा भाषा की सुगमता और मधुरता को अपने वक्तव्य में रखा ।मुख्य अतिथि तृष्णा बासक ने वैश्विक स्तर पर अपनी बात विनोद कुमार शुक्ल और केदारनाथ सिंह की पंक्तियों से बात की शरुआत करते हुए विस्तार से अपनी मातृभाषा पर विचार प्रकट किया। दो कविताएं भी सुनाई । शिल्पा शर्मा ने उड़िया , वनिता शर्मा ने मारवाड़ी , डॉ रेखा नारिवाल ने मारवाड़ी गीत पधारो म्हारे देश , डॉ वसुंधरा मिश्र ने हिंदी , डॉ सम्पा सिन्हा बासु ने बांग्ला , आर्शी ने उर्दू , फोरम शाह ने गुजराती , डॉ श्रद्धा सिंह ने हिंदी भाषा में अपने वक्तव्य और कविताएं रखी साथ ही मातृभाषा के विषय में अपनी-अपनी बात रखी ।
डॉ कस्तूरी मुखर्जी ने कार्यक्रम का संचालन किया ।कार्यक्रम बांग्ला विभाग के द्वारा आयोजित किया गया। साठ से अधिक शिक्षक शिक्षिकाओं, विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।विद्यार्थियों ने बांग्ला में गीत ‘आमी बांग्ला के भालोभाषी’ द्वारा कार्यक्रम का अंत किया गया। डॉ मिली समाद्दार ने सभी को धन्यवाद दिया और नाश्ते मिठाई के पैकेट दिए गए। बंगाली विभाग ने 21 फरवरी, 2026 को सोसाइटी हॉल में हुआ। यह जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

पिता को खोया, चोट से लड़ी, परिवार का सहारा बनीं,  ब्यूटी डुंगडुंग की प्रेरक कहानी

नयी दिल्ली । महज 22 वर्ष की उम्र में भारतीय महिला हॉकी टीम की फॉरवर्ड ब्यूटी डुंगडुंग अपने कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी उठाए हुए हैं। इस समय वह बेंगलुरु में भारतीय महिला हॉकी टीम के राष्ट्रीय शिविर में पसीना बहा रही हैं, लेकिन मैदान पर वापसी उनके जीवन की सबसे कठिन लड़ाई रही है।
साल 2023 में घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें लगभग दो वर्षों तक पुनर्वास से गुजरना पड़ा। इस दौरान वह लगातार यह सोचती रहीं कि क्या वह दोबारा भारत के लिए खेल पाएंगी। लेकिन मैदान की शारीरिक पीड़ा से भी बड़ा दुख उन्हें निजी जीवन में झेलना पड़ा—चोट के दौरान ही उनके पिता का निधन हो गया।
ब्यूटी ने हॉकी इंडिया के हवाले से कहा, “चोट के समय ही मेरे पिता का देहांत हो गया। मैं घर और शिविर के बीच लगातार आ-जा रही थी। एक साथ बहुत कुछ हो रहा था। कई बार लगा कि शायद अब वापसी नहीं हो पाएगी।”
झारखंड के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं ब्यूटी के लिए उनके पिता ही सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे। आर्थिक तंगी के बीच जब वह केवल पांच वर्ष की थीं, तब उनके पिता ने बांस से उनकी पहली हॉकी स्टिक बनाई थी, क्योंकि असली स्टिक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। बाद में उन्होंने बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम भी किया।
वह भावुक होकर कहती हैं, “जब पापा थे तो बहुत सहारा था। अब सब कुछ मुझे खुद संभालना है।” ब्यूटी अपने परिवार की मुख्य आधार हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी में नौकरी के माध्यम से वह पूरे परिवार का खर्च उठाती हैं। अपने भाई के परिवार की मदद करने के साथ-साथ भतीजी और भतीजों की पढ़ाई का खर्च भी वहन करती हैं। उनकी मां आंशिक रूप से लकवाग्रस्त हैं और स्मृति कमजोर हो चुकी है, जिनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है।
ब्यूटी कहती हैं, “कभी-कभी तनाव हो जाता है। मां चीजें भूल जाती हैं और बार-बार पूछती हैं कि मैं घर कब आऊंगी। जब मैं बाहर रहती हूं तो मन उन्हीं के पास रहता है।” अंतरराष्ट्रीय हॉकी के दबाव और घर की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन ब्यूटी हार मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है, “अगर ज्यादा सोचूंगी तो खुद ही परेशान हो जाऊंगी। इसलिए पूरा ध्यान खेल पर लगाती हूं। अच्छा लगता है कि मैं अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पा रही हूं।”
जब भावनात्मक बोझ बढ़ जाता है, तो वह अपनी टीम के साथियों का सहारा लेती हैं। उन्होंने कहा, “अगर मैच से पहले मन ठीक नहीं होता तो मैं साथियों से खुलकर कहती हूं कि आज मेरा मन भारी है, मुझे प्रेरित करें। टीम हमेशा मेरा साथ देती है,”
लंबे संघर्ष के बाद ब्यूटी ने फिर से लय हासिल करनी शुरू कर दी है। वह एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी और हाल ही में आयोजित हॉकी इंडिया लीग में भी खेल चुकी हैं। अब वह हैदराबाद, तेलंगाना में होने वाले वर्ष 2026 के एफआईएच महिला हॉकी विश्व कप क्वालीफायर की तैयारियों के लिए राष्ट्रीय शिविर में कड़ी मेहनत कर रही हैं। अपनी तेज दौड़ और गेंद प्राप्त करने की क्षमता के लिए पहचानी जाने वाली ब्यूटी स्ट्राइकिंग सर्कल में आत्मविश्वास दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रही हैं।
ब्यूटी डुंगडुंग अब केवल खेल के लिए नहीं खेलतीं। हर बार जब वह हॉकी स्टिक थामती हैं, तो उसमें उनकी मां की देखभाल, परिवार का भविष्य और उस पिता की याद जुड़ी होती है, जिन्होंने बांस से उनकी पहली स्टिक बनाकर उनके सपनों को आकार दिया था।

होली में आरामदायक रहे फैशन का सजीला अंदाज

होली का त्योहार रंगों, मस्ती और पकवानों का मिलन है। लेकिन असली मजा तभी आता है जब आप अपने कपड़ों में कंफर्टेबल महसूस करें और आपकी स्किन भी सेफ रहे। होली में फैशन का ट्रेंड पूरी तरह से स्किन-फ्रेंडली और रिलैक्स्ड लुक की तरफ जा रहा है। इस बार लोग भारी-भरकम कपड़ों की जगह ऐसे फैब्रिक चुन रहे हैं जो हल्के हों और भीगने के बाद शरीर पर चिपके नहीं। सही आउटफिट सिर्फ फोटो अच्छी आने के लिए नहीं, बल्कि रंगों के केमिकल और धूप से बचने के लिए भी जरूरी है।
होली पर फैब्रिक पसंद करना काफी मुश्किल होता है। सिंथेटिक या मोटे जींस जैसे कपड़े पानी सोखकर भारी हो जाते हैं और स्किन को छील सकते हैं। इन सब से बचने के लिए पहने यह कपड़े
प्योर कॉटन : होली के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं। यह पसीना सोखता है, हवा लगती रहती है और धूप में आपकी स्किन को ठंडा रखता है।
लिनेन: अगर आप थोड़ा एलीट और क्लासी लुक चाहते हैं, तो लिनेन का कुर्ता या शर्ट पहनें। यह बहुत जल्दी सूखता है और दिखने में बहुत कूल लगता है।
सॉफ्ट मलमल : लड़कियों के लिए मलमल की कुर्तियां बेस्ट हैं। ये बहुत हल्की होती हैं और त्यौहार की भाग-दौड़ में आपको बिल्कुल बोझ महसूस नहीं होने देतीं। होली पर सफेद रंग पहना सबको बेहद पसंद है। सफेद कपड़ों पर जब गुलाल के अलग-अलग शेड्स चढ़ते हैं, तो वह अपने आप में एक यादगार डिजाइन बन जाता है। लेकिन अगर आप सफेद से हटकर कुछ ट्राई करना चाहते हैं, तो इस होली ब्राइट नियॉन, लेमन येलो और स्काई ब्लू जैसे रंग काफी ट्रेंड में हैं। गहरे कलर जैसे काला या गहरा नीला पहनने से बचें, क्योंकि उन पर रंगों की खूबसूरती नजर नहीं आती। हल्के पेस्टल शेड्स आपकी होली की पिक्चर्स को सोशल मीडिया के लिए एकदम परफेक्ट बना देंगे।

यहां होलिका दहन पर जलती आग पर चलते हैं पुजारी

रंगों के पर्व होली की शुरुआत ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज के साथ हो चुकी है। फूलों की होली, लठमार या लड्डू की होली, सभी मन मोहते हैं। वहीं, कृष्ण नगरी मथुरा के फालैन गांव में अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां के निवासी सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन भक्ति और विश्वास के साथ करते हैं। मथुरा जिले के फालैन गांव में सदियों पुरानी होलिका दहन की परंपरा आज भी जीवंत है, जो भक्त प्रह्लाद की आस्था और अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है। यह गांव ‘प्रह्लाद की नगरी’ के नाम से जाना जाता है और यहां होलिका दहन केवल अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, तपस्या और साहस का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, फालैन गांव का होलिका दहन आस्था का अद्भुत उत्सव है। होलिका दहन से लगभग 45 दिन पहले गांव का पुजारी कठोर व्रत, तप, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि-शयन और विशेष अनुष्ठान शुरू करता है। प्रह्लाद मंदिर में रहकर वह दिन में एक बार भोजन करता है और सात्विक जीवन जीता है।
इसके बाद होलिका दहन की रात, प्रह्लाद कुंड में स्नान और पूजा के बाद विशाल होलिका प्रज्वलित की जाती है। जब आग प्रचंड रूप ले लेती है और अंगारे दहकने लगते हैं, तब पुजारी नंगे पैर, निडर होकर जलती हुई होलिका के बीच से गुजरता है या दौड़ लगाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है। यह परंपरा सतयुग से चली आ रही मानी जाती है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी है।
होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की आस्था से वह खुद जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। फालैन में पुजारी इसी घटना का जीवंत रूप निभाते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ।

मथुरा–वृंदावन की दिव्य यात्रा और 10 प्रमुख दर्शनीय स्थल

मथुरा और वृंदावन केवल घूमने की जगहें नहीं हैं, बल्कि वे अनुभूति हैं, जिन्हें महसूस किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि और उनकी बाल लीलाओं से जुड़ी यह पावन धरती श्रद्धा, आस्था और इतिहास का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु, साधक और पर्यटक यहां के मंदिरों, घाटों और गलियों में बसती भक्ति को करीब से महसूस करते हैं। यात्रा की दृष्टि से ये दोनों नगर एक-दूसरे के बेहद निकट हैं, जिससे दर्शन और भ्रमण सुगम हो जाता है।

मथुरा: श्रीकृष्ण की जन्मभूमि

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर – मथुरा का यह प्रमुख तीर्थ स्थल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान के रूप में पूजित है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही भक्तिमय वातावरण मन को शांति से भर देता है। यहां निरंतर गूंजते भजन, कीर्तन और श्रद्धालुओं की आस्था इस स्थान को विशेष बनाती है।

द्वारकाधीश मंदिर –राजसी स्वरूप में श्रीकृष्ण को समर्पित यह मंदिर मथुरा की पहचान माना जाता है। इसकी भव्य वास्तुकला और रंगीन सजावट, विशेष रूप से त्योहारों के समय, दर्शकों को आकर्षित करती है।

विश्राम घाट – यमुना नदी के तट पर स्थित यह घाट धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहां विश्राम किया था। संध्या आरती के समय यहां का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है।

गीता मंदिर – लाल पत्थर से निर्मित यह मंदिर अपने भव्य स्वरूप के साथ-साथ दीवारों पर अंकित भगवद्गीता के श्लोकों के लिए प्रसिद्ध है। आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में आने वाले यात्रियों के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

कंस किला – मथुरा के ऐतिहासिक स्थलों में शामिल यह किला पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। यह स्थान नगर के गौरवशाली अतीत और उसकी सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करता है।

वृंदावन: श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की धरती

बांके बिहारी मंदिर – वृंदावन का सबसे प्रसिद्ध मंदिर, जहां श्रीकृष्ण के बाल रूप के दर्शन होते हैं। यहां की आरती और भक्तों की उमंग से भरी भीड़ वातावरण को जीवंत बना देती है।

इस्कॉन मंदिर (कृष्ण–बलराम मंदिर) – श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर अपनी भव्यता और शांति के लिए जाना जाता है। यहां होने वाले कीर्तन और भजन मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।

प्रेम मंदिर – भव्य संगमरमर से बना यह मंदिर राधा–कृष्ण की लीलाओं को दर्शाती सुंदर नक्काशियों के लिए प्रसिद्ध है। रात्रि में प्रकाश से सजा यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

राधारमण मंदिर – 16वीं शताब्दी से जुड़ा यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। यहां स्थापित स्वयं प्रकट विग्रह की पूजा भक्तिभाव से की जाती है।

सेवा कुंज और निधिवन – वृंदावन का यह पावन उपवन रहस्य और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां राधा–कृष्ण की रास लीला संपन्न होती थी, जिसके कारण इस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व है।

दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन

नयी दिल्ली । दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का गत 12 फऱवरी को निधन हो गया। उनके परिवारिक मित्र शम्मी नारंग ने यह जानकारी दी। माहेश्वरी 71 वर्ष की थीं और 1980 और 1990 के दशक में टीवी समाचार जगत के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक थीं। उन्होंने 1976 से 2005 तक दूरदर्शन पर समाचार वाचिका के रूप में कार्य किया था। माहेश्वरी उस दौर में दूरदर्शन की जानी-मानी समाचार वाचिका थीं, जब प्रसारण पूरे दिन में कुछ ही घंटों तक सीमित था। नारंग ने ‘एक्स’ और इंस्टाग्राम पर इस खबर की जानकारी देते हुए पोस्ट किया। नारंग ने कहा, ‘‘दूरदर्शन में मेरी पूर्व सह-समाचार प्रस्तोता सरला माहेश्वरी के निधन की जानकारी देते हुए मुझे अत्यंत पीड़ा हो रही है।’’

उन्होंने माहेश्वरी को ‘‘शिष्टता और विनम्रता की साक्षात प्रतिमूर्ति’’ के रूप में याद किया। नारंग ने सोशल मीडिया मंच पर पोस्ट किया, ‘‘मुझे यह बताते हुए बहुत दुख हो रहा है कि दूरदर्शन में मेरी पूर्व सह-समाचार प्रस्तोता सरला माहेश्वरी का निधन हो गया है… वह न केवल दिखने में सुंदर थीं बल्कि हृदय से भी कहीं अधिक उदार थीं, भाषा पर उनकी अद्भुत पकड़ थी और वह ज्ञान का भंडार थीं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘दूरदर्शन के पर्दे पर उनकी उपस्थिति का एक विशिष्ट प्रभाव था। वह सभी का सम्मान करती थीं और जिस भी क्षेत्र का हिस्सा होती थीं, उसे एक नयी दिशा देती थीं।’’ खबरों के मुताबिक, माहेश्वरी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन में काम करना शुरू किया था। तीन दशकों के अपने करियर में माहेश्वरी ने टेलीविजन समाचारों के श्वेत-श्याम से रंगीन प्रसारण में परिवर्तन को देखा। दूरदर्शन नेशनल ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘दूरदर्शन परिवार की ओर से श्रीमती सरला माहेश्वरी को भावभीनी श्रद्धांजलि। वह दूरदर्शन की एक सम्मानित और प्रतिष्ठित समाचार वाचिका थीं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज, सटीक उच्चारण और गरिमामय प्रस्तुति से भारतीय समाचार जगत में एक विशेष स्थान बनाया था। उनकी सादगी, संयम और व्यक्तित्व ने दर्शकों के दिलों में गहरा विश्वास अर्जित किया।’’

साहित्यकार शंकर का 92 वर्ष की आयु में निधन

कोलकाता । प्रख्यात बंगाली साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी, जिन्हें उनके लेखकीय नाम ‘शंकर’ के रूप में जाना जाता है, का शुक्रवार को निधन हो गया। 92 वर्षीय लेखक ने गत 20 फरवरी को एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह अपने पीछे दो बेटियों को छोड़ गए हैं। साहित्यकार शंकर ने शहरी जीवन की साधारण दिखने वाली वास्तविकताओं को कालजयी कथाओं में रूपांतरित किया। उनकी कई कृतियों पर विख्यात फिल्मकार सत्यजीत रॉय ने फिल्में बनाईं, जिनमें ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित शंकर अपने चर्चित उपन्यास ‘चौरंगी’ के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं। इस उपन्यास ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। बारिश से भीगे कोलकाता और ग्रैंड होटल की रोशनी से प्रेरित यह उपन्यास काल्पनिक ‘शाहजहां होटल’ की दुनिया के माध्यम से महानगर के अभिजात्य समाज, व्यापारिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करता है।

‘चौरंगी’ पर 1968 में बनी फिल्म ने भी अपार लोकप्रियता हासिल की और यह कृति कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई। शंकर की कृतियां साहित्य और सिनेमा के बीच एक सशक्त सेतु बनीं। ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ सत्यजीत रॉय की चर्चित ‘कलकत्ता त्रयी’ का हिस्सा रहीं। इसके अलावा उनके उपन्यास ‘मन सम्मान’ पर हिंदी फिल्म ‘शीशा’ का निर्माण हुआ।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कलकत्ता उच्च न्यायालय में अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर नोएल बारवेल के क्लर्क के रूप में की थी। अपने गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘कतो अजानारे’ की रचना की, जिससे उनके साहित्यिक जीवन की औपचारिक शुरुआत हुई।

शंकर का साहित्य केवल शहरी जीवन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवाओं के लिए भी व्यापक लेखन किया और संस्मरणात्मक कृतियों में सामाजिक टिप्पणियों के साथ स्मृतियों को सजीव रूप दिया। उनके लेखन में स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित शोधपरक कृतियां भी शामिल हैं, जिनमें आध्यात्मिक और मानवीय दोनों पक्षों को उकेरा गया।

वर्ष 2021 में उन्हें आत्मकथात्मक कृति ‘एका एका एकाशी’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तकों का अनुवाद अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, गुजराती, फ्रेंच और स्पेनिश सहित कई भाषाओं में हुआ।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “बंगाली साहित्य का उज्ज्वल नक्षत्र” बताया और कहा कि उनका निधन सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

शंकर ने अपने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता-उत्तर भारत के शहरी समाज की आकांक्षाओं, द्वंद्वों और नैतिक उलझनों को सजीव रूप दिया। उनके निधन से न केवल एक लोकप्रिय उपन्यासकार का अंत हुआ है, बल्कि उस साहित्यिक युग का भी समापन हुआ है जिसने महानगर के जीवन को अमर शब्दों में ढाला।

रेवड़ी नहीं रोजगार के अवसर पैदा करें : सुप्रीम कोर्ट

-फ्री ब्रिज पर की सख्त टिप्पणी
नयी दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजना संस्कृति यानी फ्री ब्रिज पर सख्त टिप्पणी की है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्यों को सलाह दी कि मुफ्त चीजें बांटने के बजाय, रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, भारत में हम कैसी संस्कृति बना रहे हैं? क्या यह वोट पाने की नीति नहीं बन जाएगी? फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब अगली सुनवाई में तय होगा कि ऐसे मुफ्त बिजली योजनाओं पर क्या नियम लागू होंगे।सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। दरअसल, राज्य सरकार ने कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में सब्सिडी स्कीम की घोषणा की थी। इससे पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पर फाइनेंशियल दबाव पड़ा। राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यों में अपनाई गई मुफ्त सुविधाओं की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा डालती है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत समेत जजों ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा ज्यादातर राज्य पहले से ही घाटे में हैं, फिर भी विकास को छोड़कर मुफ्त सुविधाएं बांट रहे हैं। कोर्ट ने साफ कहा- जो लोग भुगतान नहीं कर सकते, उन्हें सहायता देना समझ में आता है। लेकिन अमीर-गरीब में फर्क किए बिना सबको मुफ्त देना गलत नीति है। इस दौरान कोर्ट ने चेतावनी दी और कहा अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली मिलती रही तो लोगों में काम करने की भावना कम हो जाएगी।