– ब्लिंकिट ने हटाई 10 मिनट की डिलीवरी
नयी दिल्ली । सरकार ने क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म की 10 मिनट की डिलीवरी पर रोक लगा दी है। इस जेप्टो, ब्लिंकिट, स्विगी आदि जैसे प्लेटफार्म 10 मिनट में डिलीवरी नहीं दे पाएंगे। श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने इस सर्विस पर रोक लगाई। यह मामला हैदराबाद में सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक शख्स की मौत से जुड़ा है। जेप्टो ने उस शख्स को अपना कर्मचारी नहीं बताया था। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने प्रमुख डिलीवरी एग्रीगेटर्स के साथ इस मामले में बात की। अंत में उन्होंने 10 मिनट की डिलीवरी की समय सीमा को हटाने के लिए राजी कर लिया। डिलीवरी की समय सीमा से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो और स्विगी सहित प्रमुख प्लेटफार्मों के साथ एक बैठक आयोजित की गई थी। सूत्रों के अनुसार, ब्लिंकिट ने पहले ही निर्देश पर कार्रवाई की है और अपनी ब्रांडिंग से 10 मिनट की डिलीवरी का वादा हटा दिया है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अन्य एग्रीगेटर भी इसी राह पर चलेंगे। इस कदम का उद्देश्य गिग वर्कर्स (अस्थायी या फ्रीलांस काम करने वाले) की सुरक्षा, संरक्षा और काम करने की बेहतर स्थिति सुनिश्चित करना है। हाल के संसद सत्र में आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भारत के गिग वर्कर्स की परेशानियों के बारे में आवाज उठाई थी। उन्होंने क्विक कॉमर्स और अन्य ऐप-आधारित डिलीवरी और सेवा व्यवसायों के लिए नियमों की मांग की थी। साथ ही गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों की आवश्यकता पर जोर दिया था। संसद में अपने हस्तक्षेप में राज्यसभा सदस्य ने गिग वर्कर्स के लिए गरिमा, सुरक्षा और उचित वेतन की मांग की।
क्विक कॉमर्स की दस मिनट वाली डिलिवरी पर लगी सरकारी रोक
वयोवृद्धों के लिए बिहार में आसान हुई जमीन व फ्लैट की रजिस्ट्री
पटना। बिहार में 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को बड़ी राहत देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जमीन और फ्लैट की रजिस्ट्री प्रक्रिया को आसान बनाने के निर्देश जारी किए हैं। अब वृद्धजनों को घर बैठे निबंधन की सुविधा मिलेगी, जिससे उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर जानकारी दी कि सात निश्चय-3 के सातवें निश्चय ‘सबका सम्मान–जीवन आसान’ के तहत 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों के लिए जमीन और फ्लैट के निबंधन की प्रक्रिया को सरल किया जा रहा है। इसके तहत अब घर पर ही निबंधन से जुड़ी सभी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि अक्सर यह देखा गया है कि 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों को जमीन या फ्लैट की रजिस्ट्री से जुड़े कार्यों के निष्पादन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग द्वारा चलंत निबंधन इकाई के माध्यम से निश्चित समय-सीमा के भीतर घर पर ही दस्तावेजों के निबंधन की सुविधा प्रदान की जाएगी। इसके लिए आवेदक ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। मुख्यमंत्री ने बताया कि इन सभी व्यवस्थाओं को 01 अप्रैल 2026 से लागू करने का निर्देश संबंधित विभागों के अधिकारियों को दिया गया है।
कुत्तों से कटवाया तो हरजाना भरेंगी राज्य सरकारें : सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर कुत्तों के काटने से किसी बुजुर्ग या बच्चे की मौत होती है तो हम कुछ न करने के लिए राज्य सरकार को जवाबदेह मानते हुए उस पर भारी जुर्माना लगाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी। उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों को खुले में खाना खिलाने वालों के रवैये पर सवाल खड़ा करते हुए यह टिप्पणी की। आवारा कुत्तों के मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती लोगों को भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर लोगों को कुत्तों को खाना खिलाना ही है, तो अपने घर में खिलाइये। उन्हें घर में रखिए। कुत्ते क्यों सड़क पर घूमते रहे, गन्दगी फैलाते रहे या लोगो को काटते रहे। उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि क्या सारे जज़्बात कुत्तों के लिए ही है, इंसानों के लिए नहीं। कोर्ट ने कहा कि अगर 9 साल की बच्ची को आवारा कुत्ते मार डालते हैं, तो इसके लिए किसको जिम्मेदार माना जाए। क्या कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती संगठन को इसके लिए जिम्मेदार न माना जाए।
49वां कोलकाता पुस्तक मेला 22 जनवरी से
कोलकाता। अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला का 49वां संस्करण आगामी 22 जनवरी से शुरू होने जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोपहर चार बजे मेले का औपचारिक उद्घाटन करेंगी। इस वर्ष मेले का ‘फोकल थीम कंट्री’ दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना होगा। पुस्तक प्रेमियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कोलकाता मेट्रो रेल ने इस बार विशेष प्रबंध किए हैं। हावड़ा से एस्प्लेनेड होते हुए सीधे मेला प्रांगण (करुणामयी/सेंट्रल पार्क) तक पहुंचना अब और भी सुगम होगा। मेट्रो अधिकारियों के अनुसार, मेले के दौरान यात्रियों की संभावित भीड़ को देखते हुए अतिरिक्त ट्रेनें चलाई जाएंगी। पुस्तक मेले की अवधि में रात दस बजे तक मेट्रो सेवा उपलब्ध रहेगी। वहीं, रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में भी विशेष सेवाएं जारी रहेंगी। इसके अलावा, मेले में मेट्रो का विशेष बूथ लगाया जाएगा, जहां यूपीआई के माध्यम से डिजिटल टिकट खरीदे जा सकेंगे। इस वर्ष के पुस्तक मेले में दुनिया के 20 देशों की सहभागिता होगी और एक हजार से अधिक प्रकाशक एवं प्रतिभागी हिस्सा लेंगे। मेले के कुल नौ प्रवेश द्वारों (तोरण) में से दो तोरण अर्जेंटीना की पारंपरिक वास्तुकला से प्रेरित होकर तैयार किए जा रहे हैं, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होंगे।
मेला आयोजकों ने इस वर्ष बंगाल की साहित्यिक विभूतियों को सम्मानित करने की विशेष पहल की है—
प्रवेश द्वार : हाल ही में दिवंगत साहित्यकार प्रफुल्ल राय और प्रतुल मुखर्जी के नाम पर दो प्रवेश द्वार बनाए जाएंगे।
साहित्यकार शैलजानंद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर एक द्वार उनके नाम समर्पित होगा। लिटिल मैगजीन पवेलियन, कवि राहुल पुरकायस्थ के नाम पर नामकरण।
बाल साहित्य जगत : प्रसिद्ध कलाकार मयूर चौधरी के जन्मशती वर्ष के अवसर पर चिल्ड्रेन पैविलियन (शिशु मंडप) को उनके नाम पर समर्पित किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला केवल पुस्तकों की खरीद-बिक्री का मंच नहीं, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति का जीवंत उत्सव है।
कलकत्ता हाईकोर्ट के नये चीफ जस्टिस बने सुजय पाल
कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय को नया मुख्य न्यायाधीश मिल गया है। न्यायमूर्ति सुजय पाल को उच्च न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे लंबे समय से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे। 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक में उनके नाम की सिफारिश को मंजूरी दी गई थी। उल्लेखनीय है कि, कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी. शिवगणनम सितंबर, 2025 में सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद न्यायमूर्ति सौमेन सेन को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। बाद में न्यायमूर्ति सेन के नाम की सिफारिश मेघालय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए होने के बाद वे वहां कार्यभार संभालने चले गए। इसके पश्चात न्यायमूर्ति सुजय पाल को कलकत्ता उच्च न्यायालय का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। अब उन्हें पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई है। न्यायमूर्ति सुजय पाल का जन्म और पालन-पोषण मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने जबलपुर के एक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबे समय तक अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस की। वर्ष 2011 में उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने कई वर्षों तक न्यायिक दायित्वों का निर्वहन किया। जुलाई, 2025 में उनका तबादला कलकत्ता उच्च न्यायालय में किया गया था।
कहानी पूर्वोत्तर की – भाग -6 – उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानी
भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, और सिक्किम जैसे राज्य शामिल हैं जो देश के भौगोलिक और राजनीतिक, प्रशासनिक प्रभाग दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में योगदान की बात करें तो हम हमेशा गांधीजी, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह आदि के केंद्रीय नेतृत्व को याद करते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता के लिए भारत का संघर्ष एक जन संघर्ष था जिसमे पूर्वोत्तर से किंवदंतियों की भागीदारी भी अहम् थी, लेकिन उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानी- संभुधन फोंगलो – असम के कछार पहाड़ियों में जन्मे वीर संभुधन फोंगलो, भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले प्रमुख दिमासा स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। संभुधन फोंगलो ने उत्तरी कछार पहाड़ियों में व्यापक यात्रा की, जन प्रतिरोध को प्रोत्साहित किया, संपर्क स्थापित किए और अनुयायियों को संगठित किया। वे बड़ी संख्या में युवाओं को भर्ती करने में सफल रहे और उन्होंने एक क्रांतिकारी बल और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए। हाइपौ जादोनांग – मणिपुर के तामेंगलोंग क्षेत्र में जन्मे नागा आध्यात्मिक नेता हाइपो जादोनांग धीरे-धीरे क्रांतिकारी बन गए जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज किस प्रकार नागाओं पर अपना धर्म और जीवनशैली थोप रहे हैं, और उन्होंने महसूस किया कि नागाओं को धर्म परिवर्तन कराने के प्रयास उनकी स्वदेशी आस्था, रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए एक गंभीर खतरा हैं। जादोनांग ने नागा संस्कृति के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए काम किया और अंग्रेजों के साम्राज्यवादी और आध्यात्मिक उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह किया। न्गुलखुप हाओकिप – मणिपुर के कुकी मिलिशिया समूह के नेता ने ब्रिटिश सेना के विस्तार के खिलाफ विद्रोह किया और लड़ाई लड़ी। एंग्लो-कुकी युद्ध (1917-19) के बाद अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और इम्फाल और फिर असम ले जाकर कैद कर लिया। न्गुलखुप हाओकिप को कुकी युद्ध नायक कहा जाता है क्योंकि कई बार उन्हें बहला-फुसलाकर आत्मसमर्पण कराने की कोशिशों के बावजूद उन्होंने गिरफ्तारी तक अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। वेज़ो स्वुरो –वेज़ो स्वारो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी थे। 16 वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात नेताजी से उनके घर के पास हुई। नेताजी का शिविर पास ही था, इसलिए बोस के निमंत्रण पर वे और उनका एक मित्र फावड़े लेकर वहाँ गए। उन्होंने घने बाँस के झुरमुटों में छिपकर शिविर में काम किया और दो बार ब्रिटिश बमबारी से बच निकले। उन्होंने बंकर बनाए और बोस की मदद करने के लिए उत्साहित थे। भाषा की बाधाओं के बावजूद, उन्होंने नेताजी के लिए फल और अन्य सामान इकट्ठा किए। उन्होंने नेताजी को गाँव घुमाया। गाँव ने जापानी और आईएनए सैनिकों को उनके प्रवास के दौरान 300 टन चावल दान में दिए। श्री विसार विश्वंतो अंगामी – श्री विसार विश्वंतो अंगामी, जिन्हें विसार के नाम से भी जाना जाता था, नागालैंड के पहले शिक्षित युवाओं में से एक थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने जापानी सेना और अपने गांव वालों की दुभाषिया और मध्यस्थ के रूप में मदद की। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण उन्हें अंग्रेजों ने 1944 से 1945 तक कैद में रखा। अप्रैल 1944 में जब जापानी सेना जाखमा गांव पहुंची, तो उन्हें गांव वालों से संवाद करने के लिए एक शिक्षित व्यक्ति की आवश्यकता थी। श्री विसार ने जापानी सेना को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक तस्वीर दिखाई, जिसे देखकर जापानी सेना ने उन्हें ब्रिटिश जासूस समझ लिया। हालांकि, श्री विसार कोहिमा युद्ध के कमान अधिकारी श्री मियासाके से मिलने में सफल रहे। श्री विसार भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) में शामिल हुए और सैनिकों के बीच सम्मान अर्जित किया।मनिराम देवान – वह असम के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। उन्होंने असम का पहला चाय बगान स्थापित किया था। 1857 के विद्रोह के दौरान उनके खिलाफ साजिश रचने के लिए उन्हें अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।
किआंग नंगबाह – वह मेघालय के एक मात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिनको 30 दिसंबर 1862 को पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में गॉलवे शहर में इवामुसियांग में सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दिया था। 2001 में, भारत सरकार ने पुण्यस्मरण के लिए डाक टिकट जारी किया गया था।
तजी मिडरें – वह भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र के एलोपियन गाँव से थे। उन्होंने ब्रिटिश के अपवित्र विस्तार का विरोध करने के लिए एक मिश्मी नेतृत्व की स्थापना की थी। दिसंबर 1917 में उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उसके बाद असम के तेजपुर ले जाया गया, जहां उन्हें फांसी दे दी गई थी।
रानी गाइदिन्ल्यु – वह एक रोंग्मी नागा आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थीं, जिन्होंने ब्रिटिश प्राधिकरण के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध को विद्रोह कर दिया था जिसके कारण उन्हें आजीवन कारावास की सजा हो गयी थी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘रानी’ की उपाधि दी और उसके बाद वे रानी गाइदिन्ल्यु के नाम से ही मशहूर हो गयी। स्वतंत्रता के बाद, उन्हें रिहा कर दिया गया और बाद में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
कुशल कोंवार – वे असम के निवासी थे और भारत के एक स्वतन्त्रता सेनानी थे जिन्हें भारत छोड़ो आन्दोलन के अन्तिम चरण (1942-43) में अंग्रेजों ने फाँसी दे दी थी।
शूरवीर पसल्था – वह पहले मिज़ो स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1890 में ब्रिटिश प्राधिकरण के अपवित्र विस्तार का विरोध करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया था।
हेम बरुआ (त्यागवीर) – वह असम के सोनितपुर जिले के के एक मात्र स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें असम में आधुनिक साहित्यिक आंदोलन के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद, वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और कई बार गुवाहाटी से लोकसभा के लिए चुने गए थे।
यू तिरोत सिंग श्याम – वह 19वीं शताब्दी के खासी लोगों के नेताओं में से एक थे। उन्होंने अपने वंश को सिमीलीह वंश से जोड़ कर खासी लोगों को एक जुट कर दिया था। वह खासी पहाड़ियों का हिस्सा, नोंगखलाव का सिमीम (प्रमुख) थे। उन्होंने खासी पहाड़ियों पर नियंत्रण करने के ब्रिटिश प्रयासों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी पुण्यतिथि (17 जुलाई, 1835) को हर साल मेघालय में राजकीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है।
भोगेश्वरी फुकनानी – उनका जन्म असम के नौगांव में हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से कई महिलाओं को प्रेरित किया और उनमें से एक बड़ा नाम भोगेश्वरी फुकनानी का था. जब क्रांतिकारियों ने बेरहमपुर में अपने कार्यालयों का नियंत्रण वापस ले लिया था, तब उस माहौल में पुलिस ने छापा मार कर आतंक फैला दिया था। उसी समय क्रांतिकारियों की भीड़ ने मार्च करते हुये “वंदे मातरम्” के नारे लगाये। उस भीड़ का नेतृत्व भोगेश्वरी ने किया था। उन्होंने उस वक़्त मौजूद कप्तान को मारा जो क्रांतिकारियों पर हमला करने आए थे। बाद में कप्तान ने उन्हें गोली मार दी और वह जख़्मी हालात में ही चल बसी।
बीर टिकेन्द्र जीत सिंह -वह स्वतन्त्र मणिपुर रियासत के राजकुमार थे। उन्हें वीर टिकेन्द्रजीत और कोइरेंग भी कहते हैं। वे मणिपुरी सेना के कमाण्डर थे। उन्होने ‘महल-क्रान्ति’ की, जिसके फलस्वरूप 1891 में अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध शुरू हुआ। अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर सार्वजनिक रूप से उन्हें फांसी दी थी।
कनकलता बरुआ – उनका जन्म असम में 1924 में हुई थी तथा असम के सबसे महान योद्धाओं में से एक हैं। वह असम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू की गई स्वतंत्रता पहल के लिए “करो या मरो” अभियान में शामिल हुई थी और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान असम में भारतीय झंडा फेहराने के लिये आगे बढ़ते हुये उनकी मृत्यु हो गई थी।
मातमोर जमोह – वह एक क्रांतिकारी नेता थे जो ब्रिटिश वर्चस्व को पसंद नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने उन ब्रिटिश अधिकारियों को मारना शुरू कर दिया, जो लोगों के जीवन में हस्तक्षेप करते थे।
चेंगजापो कूकी (डोंगल) – उन्हें डूंगेल कबीले के ऐसन के प्रमुख के रूप में जाना जाता है। कई ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वह चेंगजापो कूकी के रूप में लोकप्रिय है। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अधीन भारतीय राष्ट्रीय सेना के सदस्य थे। टोगन नेन्गमिन्ज़ा – मेघालय के गारो हिल्स क्षेत्र के एक स्वतंत्रता सेनानी, तोगान नेन्गमिन्ज़ा गारो जनजाति से संबंध रखते थे। उन्होंने अपनी मातृभूमि पर कब्जा करने आए ब्रिटिश बलों के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। उनके योद्धाओं के दल ने सोते हुए ब्रिटिश सैनिकों पर हमला किया और शुरुआत में उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया, लेकिन ब्रिटिशों के आधुनिक हथियार गारो योद्धाओं की तलवारों और भालों के सामने टिक नहीं पाए। तोगान नेन्गमिन्ज़ा और उनके दल ने अंतिम व्यक्ति तक लड़ाई लड़ी और ब्रिटिश बलों द्वारा चलाई गई गोलियों की बौछार में शहीद हो गए। यू तिरोट सिंग सिएम- मेघालय में खासी पहाड़ियों के नोंघखलाव क्षेत्र के एक सिएम (प्रमुख) यू तिरोट सिंह ने खासी पहाड़ियों पर ब्रिटिश आक्रमण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। अपनी युद्ध रणनीति, वीरता और ब्रिटिश कब्जे के विरुद्ध खासी क्षेत्र पर अटूट नियंत्रण के लिए उन्हें सम्मानित किया जाता है। यू तिरोट सिंह सिएम 1823 से 1833 तक चले एंग्लो-खासी युद्ध के सबसे साहसी नेताओं में से एक थे। एंग्लो-खासी युद्ध के दौरान, खासी सेना के पास आग्नेयास्त्रों की कमी थी और उनके पास केवल तलवारें, ढालें, धनुष और बाण थे। इसलिए, उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का सहारा लिया, जो लगभग चार वर्षों तक चला। तिरोट सिंह को अंततः जनवरी 1833 में अंग्रेजों ने पकड़ लिया और ढाका भेज दिया। उनकी पुण्यतिथि, 17 जुलाई, मेघालय में हर साल राजकीय अवकाश के रूप में मनाई जाती है। शांतिभूषण नाग – शांति भूषण, सूर्य सेन (जिन्हें ‘मास्टर दा’ के नाम से जाना जाता है) नामक विद्रोही समूह से प्रेरित थे, जिन्होंने अंग्रेजों के हथियार भंडार पर छापा मारा था। शांति भूषण उन विद्रोहियों में से एक थे और 1930 के चटगांव शस्त्रागार आंदोलन के प्रमुख योजनाकारों में से एक थे। चटगांव शस्त्रागार पर छापे में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों के साथ झड़प के दौरान उनके सिर में गोली लगी, लेकिन वे भागने में सफल रहे। सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने के कारण उन्हें 1930 में लंबे समय तक जेल में भी रहना पड़ा। उनके भाई, फणी भूषण, भी स्कूल में पढ़ते समय ही इस आंदोलन में शामिल हो गए थे। उन्हें कोमिला जेल में कैद रखा गया, जहां से उन्हें रिहा कर अगरतला वापस भेज दिया गया। त्रिपुरा चंद्र सेन – निबारनचंद्र सेन के पुत्र त्रिपुरा चंद्र सेन कद में लंबे, मजबूत और गोरे रंग के थे, जो उन्हें सबसे अलग बनाता था। त्रिपुरा चंद्र ने किशोरावस्था में ही चटग्राम के क्रांतिकारी समूह में शामिल हो गए। उनके आकर्षक व्यक्तित्व और सभी के साथ सहजता से घुलमिल जाने की क्षमता के कारण वे क्रांतिकारी स्वयंसेवी बल के ब्रिगेडियर बन गए। साथी क्रांतिकारियों के साथ, त्रिपुरा चंद्र ने 1930 में शस्त्रागार पर छापे में भाग लिया, जिसके बाद जलालाबाद युद्ध हुआ। यह युद्ध सुरमा घाटी लाइट हॉर्स और पूर्वी सीमांत राइफल्स के खिलाफ था, जिसमें 1500 गोरखा सैनिक शामिल थे। त्रिपुरा चंद्र ने बहादुरी से उनकी स्थिति का बचाव किया, लेकिन दुर्भाग्य से इस दौरान उन्होंने अपनी जान गंवा दी। त्रिलोचन पोखरेल –पूर्वी सिक्किम क्षेत्र के गांधीवादी त्रिलोचन पोखरेल, जिन्हें ‘वंदे पोखरेल’ के नाम से भी जाना जाता है, महात्मा गांधी और उनके अहिंसा के सिद्धांतों से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने गांधीजी के आंदोलनों जैसे ‘असहयोग आंदोलन’, ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर पोखरेल ने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर सूती धोती और लकड़ी की खड़ी चप्पलें पहनना शुरू कर दिया। उन्होंने सिक्किम के किसानों के बीच महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन और सविनय अवज्ञा के विचारों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ने वाले पहले सिक्किमी व्यक्ति थे। उन्होंने उत्तरी बंगाल और सिक्किम में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। हेलेन लेपचा – हेलेन लेपचा, जिन्हें सबित्री देवी के नाम से भी जाना जाता है, गांधीजी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा थीं और स्वदेशी लेपचा समुदाय से थीं। वे 1917 में चरखा और खादी आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने 1920 में बिहार की बाढ़ के दौरान सहायता की और महात्मा गांधी का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने उन्हें साबरमती आश्रम में आमंत्रित किया, जहाँ वे सबित्री देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। पश्चिम बंगाल और बिहार के स्वतंत्रता संग्राम में सबित्री देवी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1921 में, उन्होंने कलकत्ता में कोयला खदान श्रमिकों के एक बड़े समूह का नेतृत्व करते हुए एक जुलूस निकाला, जिसमें कई प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भी उपस्थित थे। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कुर्सियों की नजरबंदी से भागने में मदद की। 1942 में, वे भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय थीं। दल बहादुर गिरी –दल बहादुर गिरि, जिन्हें “पहाड़ों का गांधी” भी कहा जाता है, दार्जिलिंग कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने सिक्किम में राजमहल में मुख्य क्लर्क के रूप में काम करते हुए अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 1918 में, उन्होंने कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन दिवसीय अधिवेशन में भाग लिया। वहां उनकी मुलाकात महात्मा गांधी और देशबंधु चित्रंजन दास से हुई। अधिवेशन के बाद, वे एक बदले हुए व्यक्तित्व के साथ लौटे। 1921 में, वे स्थानीय रिंक हाउस में उपायुक्त द्वारा आयोजित एक बैठक में गए। उन्होंने उपायुक्त के खिलाफ खड़े होकर हंगामा खड़ा कर दिया और भीड़ ने उनकी बहादुरी की सराहना की। उन्हें 27 जनवरी, 1921 को जेल भेज दिया गया, और वे जेल जाने वाले पहले गोरखा गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी बन गए।
(स्रोत – माउंटेन इको, नवभारत टाइम्स)
मकर संक्रांति त्योहार के पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांत
-पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
हर साल 14 जनवरी को हम मकर संक्रांति मनाते हैं। यह एकमात्र भारतीय त्योहार है जो सौर कैलेंडर के दिन मनाया जाता है। बाकी सभी भारतीय त्योहार चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं इसलिए सौर कैलेंडर के अनुसार उनके मनाने के दिन हर साल बदलते रहते हैं। खगोल विज्ञान, गणित और ज्यामिति सहित प्राचीन भारतीय विषयों में संस्कृत तकनीकी शब्द “संक्रांति” का इस्तेमाल किया जाता था। महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों में से एक, मकर संक्रांति भारत के कई क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन आधिकारिक तौर पर नई फसल का मौसम शुरू होता है। हालांकि, मकर संक्रांति का सांस्कृतिक महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ रहते हैं; अलग-अलग राज्य इसे अलग-अलग नामों से मनाते हैं लेकिन उसी स्नेह के साथ।
मकर संक्रांति का त्योहार एक खगोलीय घटना पर आधारित हैः सूर्य का दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में स्पष्ट ग्रहण संबंधी बदलाव। विज्ञान के अनुसार, यह सूर्य के खगोलीय भूमध्य रेखा को पार करने का संकेत देता है, जो शीतकालीन संक्रांति के बाद सूर्य के उत्तर की ओर बढ़ने की खगोलीय घटना है। सनातनी सूर्य की पूजा करते हैं और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, उसे एक खगोलीय पिंड और एक सचेत देवता दोनों के रूप में देखते हैं। मकर संक्रांति पर सुबह से शाम तक, चैतन्य चारों ओर व्याप्त रहता है। इसलिए, साधना (आध्यात्मिक अभ्यास) में लगे साधक को अधिक चैतन्य का सबसे बड़ा लाभ मिल सकता है। चैतन्य के परिणामस्वरूप साधकों में परम अग्नि सिद्धांत, या तेजतत्व भी बढ़ता है। मकर संक्रांति साधना के लिए एक उत्कृष्ट दिन है। सूर्य का उत्तर की ओर गमन सर्दियों के अंत और उत्तरी गोलार्ध में अधिक दिन की रोशनी का संकेत देता है। अतीत में, यह कृषि चक्रों के साथ-साथ होता था: फसलें कट जाती थीं, फसलें भंडारित की जाती थीं और नई खेती की तैयारी शुरू हो जाती थी। अलाव जलाना, पतंग उड़ाना और नदी में नहाना व्यावहारिक मूल के सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के उदाहरण हैं, जैसे गर्मी देना, लंबे दिनों का स्मरण करना और मौसमी नदी प्रवाह और फसल कटाई के बाद खाली समय से जुड़े औपचारिक शुद्धिकरण। मकर संक्रांति उत्सव का एक अनिवार्य घटक छत पर इकट्ठा होना और सूरज के नीचे पतंग उड़ाना है। इस प्राचीन प्रथा का वैज्ञानिक महत्व है क्योंकि, लंबी सर्दियों के बाद, सूर्य अंततः हमारी ऊर्जा को फिर से भरता है और हमारे शरीर को बैक्टीरिया और बीमारियों से शुद्ध करता है, हम खुशी-खुशी पतंग उड़ाते हैं।
सार्वभौमिक त्योहार – देश के अलग-अलग हिस्सों में इस दिन के उत्सवों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है: मध्य भारत में सुकरात, असमिया हिंदुओं में भोगली बिहू, तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय हिंदुओं में पोंगल और उत्तर भारतीय हिंदुओं और सिखों में लोहड़ी। जिस तरह भारत के कई हिस्सों में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है, उसी तरह एशिया के अन्य हिस्सों में भी इसे दूसरे नामों से और इसी तरह के कारणों से मनाया जाता है। उदाहरण के लिए, मकर संक्रांति उत्सव को थाईलैंड में सोंगक्रान और कंबोडिया में मोहा संगक्रांता के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा, दुनिया भर के लोग, खासकर भारतीय मूल के लोग, अपनी विरासत से जुड़ाव के कारण मकर संक्रांति मनाते हैं। अनोखे लड्डू बनाने के लिए जो सच में इस मौके को खास बना दें, तिल और गुड़ का एक खास मिश्रण तैयार किया जाता है। इन लड्डुओं को खाने का कारण यह है कि तिल के हर दाने में तेल से मिलने वाले तत्व होते हैं। सर्दियों में त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है और उसे सुरक्षा और मुलायम बनाए रखने के लिए नमी की ज़रूरत होती है। इसलिए, तिल के लड्डू खाना, जो इस उत्सव का एक ज़रूरी हिस्सा है, यह त्वचा को नमी देता है। अक्सर तिल-गुड़ कहे जाने वाली ये मिठाइयाँ मकर संक्रांति उत्सव की परंपराओं को दिखाती हैं और माना जाता है कि ये समुदाय में सद्भाव बढ़ाती हैं।
पर्यावरण की देखभाल – पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना प्रकृति का सम्मान करने के अलावा मकर संक्रांति मनाना उनके लिए भारतीय परंपरा के प्रति वफादार रहने और मकर संक्रांति के सार को बनाए रखने का एक तरीका है बायोडिग्रेडेबल पतंग उड़ाना कुछ अनोखी पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं में से एक है जो अब मकर संक्रांति उत्सव का एक अभिन्न अंग बन गई हैं। संघ के लिए, पारंपरिक मूल्यों और मकर संक्रांति के सार का त्याग किए बिना जीवन स्थितियों और सामुदायिक लाभों को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न सामाजिक अभियानों में भाग लेना उत्सव का एक और पहलू है।
समाज में सद्भाव और प्राकृतिक दुनिया के प्रति श्रद्धा को प्रोत्साहित करने के लिए, हम अपनी ऊर्जा को फिर से भर सकते हैं, अपने मन और आत्मा को खुशी से भर सकते हैं और इस भावना को दूसरों तक फैला सकते हैं। यह मकर संक्रांति के वास्तविक महत्व और उद्देश्य का सम्मान करने में योगदान देता है।
(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)
28 हजार अंतरराष्ट्रीय रन बनाने वाले दुनिया के तीसरे खिलाड़ी बने विराट
वडोदरा । भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने एक और कीर्तिमान अपने नाम कर लिया है। वडोदरा में न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले वनडे मैच में 25 रन बनाते ही कोहली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 28 हजार रन पूरे किए। वह इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दुनिया के तीसरे खिलाड़ी बन गए हैं। भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर इस लिस्ट में पहले स्थान पर हैं। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 34357 रन बनाए हैं। दूसरे नंबर पर अब विराट आ गए हैं। उन्होंने श्रीलंका के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी कुमार संगाकारा को पीछे छोड़ दिया है। संगाकारा ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 28016 रन बनाए थे। विराट इससे आगे निकल गए हैं। कोहली ने इस 28 हजार अंतरराष्ट्रीय रन के आंकड़े को अपने 557वें मैच में पार किया। सचिन ने 664 अंतरराष्ट्रीय मैच में 34357 रन बनाए हैं। अपने करियर में तेंदुलकर ने 100 शतक और 164 अर्धशतक लगाए। विराट अबतक 84 अंतरराष्ट्रीय शतक और 145 अर्धशतक लगा चुके हैं। पहले वनडे मैच की बात करें, तो भारतीय टीम के कप्तान शुभमन गिल ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया। टॉस हारकर बल्लेबाजी करने उतरी न्यूजीलैंड ने 50 ओवर में 8 विकेट खोकर 300 रन बनाए। इस लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम को रोहित शर्मा और शुभमन गिल ने सधी हुई शुरुआत दिलाई। रोहित 26 बनाकर आउट हुए। इसके बाद विराट कोहली ने मैदान पर आते ही शानदार बल्लेबाजी और अर्धशतक जड़ दिया। वह फिलहाल 52 रन बनाकर खेल रहे हैं।
एक्स ने हटाए 600 अकाउंट और 3500 से अधिक पोस्ट
– अश्लील सामग्री पर केंद्र सरकार की आपत्ति के बाद कार्रवाई
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार के आदेश के बाद एक्स ने कई यूजर्स पर एक्शन लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स ने 600 अकाउंट को डिलीट कर दिया है। साथ ही एक्स ने अपने प्लेटफॉर्म से 3500 से ज्यादा पोस्ट भी हटा दी हैं। केंद्र सरकार ने एक्स पर मौजूद अश्लील सामग्री पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद एक्स ने यह कदम उठाया है। एक्स ने सरकार को आश्वासन दिया है कि वो इस प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री प्रकाशित करने की अनुमति नहीं देगा और सरकारी नियमों का पालन करेगा। केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने एक्स के खिलाफ चेतावनी जारी की थी, जिसके एक हफ्ते बाद की ये कार्रवाई सामने आई है। केंद्रीय मंत्रालय ने ग्रोक पर एआइ के ‘घोर दुरुपयोग’ और महिलाओं को अशोभनीय रूप से बदनाम करने के लिए ‘अपमानजनक या अश्लील’ तरीके से उनकी तस्वीरें या वीडियो बनाने और साझा का आरोप लगाया। मंत्रालय ने एक्स को चेतावनी दी थी कि 72 घंटे की समय सीमा का पालन न करने पर कंपनी को कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। बता दें कि एलन मस्क के प्लेटफार्म एक्स के एआई चैटबाट ग्रोक की ओर से महिलाओं और बच्चों की अश्लील तस्वीरें बनाने का आरोप है। इसे लेकर दुनिया भर की सरकारों ने चिंता जाहिर करते हुए ग्रोक की आलोचना की है। इस लिस्ट में भारत के अलावा फ्रांस, ब्राजील, मलेशिया और यूरोपियन यूनियन का नाम शामिल है। गैर-लाभकारी समूह एआइ फोरेंसिक ने कहा कि उसने 25 दिसंबर से एक जनवरी के बीच ग्रोक द्वारा बनाई गई 20,000 तस्वीरों का विश्लेषण किया और पाया कि दो प्रतिशत में बिकनी या पारदर्शी कपड़ों में 18 या उससे कम उम्र के व्यक्ति को दर्शाया गया है।
हर पुराण में है जिसका उल्लेख, 12 ज्योतिर्लिंगों से एक सोमनाथ मंदिर
गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों से एक स्थापित है। पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में विस्तार से बताई गई है। सोमनाथ को सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर असल में चंद्रदेव ने बनवाया था। उन्होंने दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से शादी की थी, लेकिन वह रोहिणी को सबसे ज्यादा प्यार करते थे। इससे खफा होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्र देव यानी सोम को श्राप दिया था कि उनका तेज धीरे-धीरे कम हो जाए। इस श्राप से दुखी होकर सोम ने शिव जी की पूजा की और शिव ने उन्हें वरदान दिया कि कम हुआ तेज धीरे-धीरे करके वापस आ जाएगा। इसलिए ही अमावस और पूर्णिमा का जन्म हुआ। ऐसे में चंद्रदेव ने सोमनाथ शिवलिंग की स्थापना की। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया। कहते हैं कि सोमनाथ के मंदिर में शिवलिंग हवा में स्थित था। यह एक कौतुहल का विषय था।

जानकारों के अनुसार यह वास्तुकला का एक नायाब नमूना था। इसका शिवलिंग चुम्बक की शक्ति से हवा में ही स्थित था। कहते हैं कि महमूद गजनबी इसे देखकर हतप्रभ रह गया था। सोमनाथ का बाण स्तंभ भी छठी शताब्दी से वहां मौजूद है। इसका जिक्र कुछ किताबों में भी किया गया है। असल में इस स्तंभ के ऊपर लिखा है- ‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव, पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग’ यानी इस बिंदु से दक्षिणी ध्रुव तक सीधी रेखा है। माना जाता है कि सोमनाथ के मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है उसके अंदर भगवान कृष्ण की स्यमंतक मणि छुपाई गई है। माना जाता है कि इस मणि को जो भी चीज छूती है वह सोना बन जाती है। माना जाता है कि इस मणि के अंदर ही ऐसी ताकत थी जिसके कारण वह शिवलिंग हवा में तैरता रहता था और जब महमूद गजनवी आया था तब वह हवा में उड़ते शिवलिंग को देखकर डर गया था जिसके कारण उसने अपने सैनिकों को कहा था कि वह शिवलिंग को तोड़ दो। कुछ का मानना है कि शिवलिंग के ऊपर और नीचे कुछ ऐसे पत्थर लगे हुए थे जिससे एक मैग्नेटिक फील्ड बनती थी जिसके कारण ही शिवलिंग हवा में उड़ता था। बात जो भी हो, यह दावा किया जाता है कि जब गजनवी आया था तब सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग हवा में उड़ा करता था। सर्वप्रथम इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। इसी जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया।
इसके बाद महमूद गजनवी ने सन् 1024 में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी संपत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे हजारों लोग मारे गए थे। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मंदिर के अंदर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे।
महमूद के मंदिर तोड़ने और लूटने के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के सौन्दर्यीकरण में योगदान किया था।
सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मंदिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-संपदा लूटकर ले गया। मंदिर को फिर से हिन्दू राजाओं ने बनवाया। लेकिन सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1412 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया।
बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के अधिकार में आ गया तब 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया।
भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल लेकर नए मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। उनके संकल्प के बाद 1950 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। 6 बार टूटने के बाद 7वीं बार इस मंदिर को कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में बनाया गया। इसके निर्माण कार्य से सरदार वल्लभभाई पटेल भी जुड़े रह चुके हैं। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
(स्रोत – वेबदुनिया एवं हर जिंदगी)





