Monday, January 12, 2026
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28 हजार अंतरराष्ट्रीय रन बनाने वाले दुनिया के तीसरे खिलाड़ी बने विराट

वडोदरा । भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने एक और कीर्तिमान अपने नाम कर लिया है। वडोदरा में न्‍यूजीलैंड के खिलाफ पहले वनडे मैच में 25 रन बनाते ही कोहली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 28 हजार रन पूरे किए। वह इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दुनिया के तीसरे खिलाड़ी बन गए हैं। भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर इस लिस्ट में पहले स्थान पर हैं। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 34357 रन बनाए हैं। दूसरे नंबर पर अब विराट आ गए हैं। उन्होंने श्रीलंका के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी कुमार संगाकारा को पीछे छोड़ दिया है। संगाकारा ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 28016 रन बनाए थे। विराट इससे आगे निकल गए हैं। कोहली ने इस 28 हजार अंतरराष्ट्रीय रन के आंकड़े को अपने 557वें मैच में पार किया। सचिन ने 664 अंतरराष्ट्रीय मैच में 34357 रन बनाए हैं। अपने करियर में तेंदुलकर ने 100 शतक और 164 अर्धशतक लगाए। विराट अबतक 84 अंतरराष्ट्रीय शतक और 145 अर्धशतक लगा चुके हैं। पहले वनडे मैच की बात करें, तो भारतीय टीम के कप्‍तान शुभमन गिल ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया। टॉस हारकर बल्लेबाजी करने उतरी न्‍यूजीलैंड ने 50 ओवर में 8 विकेट खोकर 300 रन बनाए। इस लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम को रोहित शर्मा और शुभमन गिल ने सधी हुई शुरुआत दिलाई। रोहित 26 बनाकर आउट हुए। इसके बाद विराट कोहली ने मैदान पर आते ही शानदार बल्लेबाजी और अर्धशतक जड़ दिया। वह फिलहाल 52 रन बनाकर खेल रहे हैं।

एक्स ने हटाए 600 अकाउंट और 3500 से अधिक पोस्ट

– अश्लील सामग्री पर केंद्र सरकार की आपत्ति के बाद कार्रवाई
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार के आदेश के बाद एक्स ने कई यूजर्स पर एक्शन लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स ने 600 अकाउंट को डिलीट कर दिया है। साथ ही एक्स ने अपने प्लेटफॉर्म से 3500 से ज्यादा पोस्ट भी हटा दी हैं। केंद्र सरकार ने एक्स पर मौजूद अश्लील सामग्री पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद एक्स ने यह कदम उठाया है। एक्स ने सरकार को आश्वासन दिया है कि वो इस प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री प्रकाशित करने की अनुमति नहीं देगा और सरकारी नियमों का पालन करेगा। केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने एक्स के खिलाफ चेतावनी जारी की थी, जिसके एक हफ्ते बाद की ये कार्रवाई सामने आई है। केंद्रीय मंत्रालय ने ग्रोक पर एआइ के ‘घोर दुरुपयोग’ और महिलाओं को अशोभनीय रूप से बदनाम करने के लिए ‘अपमानजनक या अश्लील’ तरीके से उनकी तस्वीरें या वीडियो बनाने और साझा का आरोप लगाया। मंत्रालय ने एक्स को चेतावनी दी थी कि 72 घंटे की समय सीमा का पालन न करने पर कंपनी को कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। बता दें कि एलन मस्क के प्लेटफार्म एक्स के एआई चैटबाट ग्रोक की ओर से महिलाओं और बच्चों की अश्लील तस्वीरें बनाने का आरोप है। इसे लेकर दुनिया भर की सरकारों ने चिंता जाहिर करते हुए ग्रोक की आलोचना की है। इस लिस्ट में भारत के अलावा फ्रांस, ब्राजील, मलेशिया और यूरोपियन यूनियन का नाम शामिल है। गैर-लाभकारी समूह एआइ फोरेंसिक ने कहा कि उसने 25 दिसंबर से एक जनवरी के बीच ग्रोक द्वारा बनाई गई 20,000 तस्वीरों का विश्लेषण किया और पाया कि दो प्रतिशत में बिकनी या पारदर्शी कपड़ों में 18 या उससे कम उम्र के व्यक्ति को दर्शाया गया है।

हर पुराण में है जिसका उल्लेख, 12 ज्योतिर्लिंगों से एक सोमनाथ मंदिर

गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों से एक स्थापित है। पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में विस्तार से बताई गई है। सोमनाथ को सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर असल में चंद्रदेव ने बनवाया था। उन्होंने दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से शादी की थी, लेकिन वह रोहिणी को सबसे ज्यादा प्यार करते थे। इससे खफा होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्र देव यानी सोम को श्राप दिया था कि उनका तेज धीरे-धीरे कम हो जाए। इस श्राप से दुखी होकर सोम ने शिव जी की पूजा की और शिव ने उन्हें वरदान दिया कि कम हुआ तेज धीरे-धीरे करके वापस आ जाएगा। इसलिए ही अमावस और पूर्णिमा का जन्म हुआ। ऐसे में चंद्रदेव ने सोमनाथ शिवलिंग की स्थापना की। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया। कहते हैं कि सोमनाथ के मंदिर में शिवलिंग हवा में स्थित था। यह एक कौतुहल का विषय था।

सरदार पटेल का ऐतिहासिक दौरा

जानकारों के अनुसार यह वास्तुकला का एक नायाब नमूना था। इसका शिवलिंग चुम्बक की शक्ति से हवा में ही स्थि‍त था। कहते हैं कि महमूद गजनबी इसे देखकर हतप्रभ रह गया था। सोमनाथ का बाण स्तंभ भी छठी शताब्दी से वहां मौजूद है। इसका जिक्र कुछ किताबों में भी किया गया है। असल में इस स्तंभ के ऊपर लिखा है- ‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव, पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग’ यानी इस बिंदु से दक्षिणी ध्रुव तक सीधी रेखा है। माना जाता है कि सोमनाथ के मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है उसके अंदर भगवान कृष्ण की स्यमंतक मणि छुपाई गई है। माना जाता है कि इस मणि को जो भी चीज छूती है वह सोना बन जाती है। माना जाता है कि इस मणि के अंदर ही ऐसी ताकत थी जिसके कारण वह शिवलिंग हवा में तैरता रहता था और जब महमूद गजनवी आया था तब वह हवा में उड़ते शिवलिंग को देखकर डर गया था जिसके कारण उसने अपने सैनिकों को कहा था कि वह शिवलिंग को तोड़ दो। कुछ का मानना है कि शिवलिंग के ऊपर और नीचे कुछ ऐसे पत्थर लगे हुए थे जिससे एक मैग्नेटिक फील्ड बनती थी जिसके कारण ही शिवलिंग हवा में उड़ता था। बात जो भी हो, यह दावा किया जाता है कि जब गजनवी आया था तब सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग हवा में उड़ा करता था। सर्वप्रथम इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। इसी जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया।

इसके बाद महमूद गजनवी ने सन् 1024 में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी संपत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मंदिर की रक्षा के लिए निहत्‍थे हजारों लोग मारे गए थे। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मंदिर के अंदर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे।
महमूद के मंदिर तोड़ने और लूटने के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के सौन्दर्यीकरण में योगदान किया था।
सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मंदिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-संपदा लूटकर ले गया। मंदिर को फिर से हिन्दू राजाओं ने बनवाया। लेकिन सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्‍फरशाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1412 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया।
बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के अधिकार में आ गया तब 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया।
भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल लेकर नए मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। उनके संकल्प के बाद 1950 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। 6 बार टूटने के बाद 7वीं बार इस मंदिर को कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में बनाया गया। इसके निर्माण कार्य से सरदार वल्लभभाई पटेल भी जुड़े रह चुके हैं। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
(स्रोत – वेबदुनिया एवं हर जिंदगी)

युवा दिवस पर विशेष : युग निर्माता स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) पर विशेष

– सोमेश्वर बोड़ाल

वे इस दुनिया में इंसान के रूप में सिर्फ़ उनतालीस साल रहे। उन्होंने कोई नया सिद्धांत प्रतिस्थापित नहीं किया और न ही कोई तथाकथित सुधार आंदोलन शुरू किया। उन्होंने जो किया वह बदलते समय के हिसाब से शाश्वत सनातन हिंदू धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप था। जैसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने हिंदू समाज को इस्लामी हमले से बचाया, वैसे ही स्वामी विवेकानंद ने भी ब्रिटिश राज में यूरोपियन हमले का मुकाबला किया और तथाकथित पढ़े-लिखे, मॉडर्न हिंदुओं का हिंदू धर्म और संस्कृति में विश्वास वापस दिलाया। हिंदू धर्म में स्वामी विवेकानंद का एक बड़ा योगदान मुश्किल हालात में दुनिया के सामने धर्म की सच्ची और पूरी पहचान पेश करना था- उन्होंने हिंदू संस्कृति की पहचान को पूरा होने का एहसास दिलाया।
स्वामी विवेकानंद के अभ्युदय से पहले, हिंदू समाज अलग-अलग समुदायों में बंटा हुआ लगता था, हर कोई कमोबेश आज़ाद था और हर कोई दूसरों से बेहतर होने का दावा करता था। इन समुदायों को हिंदू धर्म की आम बुनियाद की कोई साफ़ समझ नहीं थी। सिस्टर निवेदिता ने लिखा:- “धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के भाषण के बारे में, यह कहा जा सकता है कि जब उन्होंने अपना भाषण शुरू किया, तो उनका विषय ‘हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं’ था, लेकिन जब उन्होंने भाषण खत्म किया तो हिंदू धर्म ने एक नया रूप ले लिया था।”
स्वामी विवेकानंद ने सबसे पहले दिखाया कि पूरे हिंदू धर्म में कुछ बुनियादी बातें हैं जो सभी समुदायों को एक आम नींव के तौर पर मंज़ूर हैं। स्वामी विवेकानंद ने न सिर्फ़ हिंदू धर्म को उसकी पूरी पहचान दी बल्कि उसे एक भी किया।
पश्चिम में पहले हिंदू मिशनरी के रूप में, स्वामी विवेकानंद ने 1893 में अमेरिका में धर्म संसद में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और अगले कुछ वर्षों तक वहां हिंदू धर्म का प्रचार करके, वे स्वयं हिंदू एकता के प्रतीक बन गए।
अपने भाषणों और पत्रों के माध्यम से, उन्होंने हिंदुओं की चेतना को जागृत किया, उन्हें उनकी साझी विरासत की याद दिलाई और उनके बीच एकता के बंधन को मजबूत किया।
हिंदू धर्म संस्थाओं, रीति-रिवाजों, प्रथाओं, विश्वास प्रणालियों, दर्शन, धर्मों, देवताओं, शास्त्रों और बहुत कुछ का एक विशाल संग्रह है, जो एक साथ मिलकर इसकी उल्लेखनीय विविधता का निर्माण करते हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को उसकी सारी विविधताओं के साथ अपनाया। उन्होंने संपूर्ण वेदों, ज्ञान कांड और कर्मकांड दोनों को स्वीकार किया। सभी ऋषि-मुनि; मूर्ति पूजा से लेकर इंसान के रूप में भगवान की पूजा तक- उन्होंने सबकुछ स्वीकार किया, किसी भी चीज़ को वर्जित नहीं रखा। हिंदू धर्म के सभी अलग-अलग पहलुओं को अपनाकर और उनमें नई जान डालकर, श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद ने उन्हें संरक्षित करने में मदद की।
स्वामीजी हिंदू धर्म को “यूनिवर्सल” बनाना चाहते थे, जो सभी लोगों और सभी जातियों के लिए हो। स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को न सिर्फ़ यूनिवर्सल बनाया बल्कि उसे गतिशील भी बनाया। वह चाहते थे कि भारत की आध्यात्मिकता का पुराना संदेश दुनिया के सभी कोनों में फैले और भारतीय आध्यात्मिकता सभी लोगों तक पहुँचे।
19वीं सदी में, पश्चिम के लोगों की भारत और हिंदुओं के बारे में नकारात्मक राय थी। हिंदू धर्म को अंधविश्वास का धर्म माना जाता था। स्वामी विवेकानंद की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक इस गलत धारणा को बदलना था। स्वामीजी के अनुसार, धर्म का एक ज़रूरी अंदरूनी हिस्सा होता है और एक कम ज़रूरी बाहरी आवरण होता है। बाहरी आवरण में पौराणिक कथाएँ, रीति-रिवाज, त्योहार वगैरह होते हैं। ज़रूरी मूल में आध्यात्मिकता शामिल है। स्वामीजी ने दिखाया कि आध्यात्मिकता के मामले में हिंदू धर्म बाकी सभी धर्मों से बेहतर है। स्वामी विवेकानंद का एक और योगदान पुराने भारतीय ऋषियों के विचारों के सार के तौर पर उपनिषदों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाना था।
स्वामी विवेकानंद के प्रभाव से हिंदू धर्म में योग की अहमियत को आज पूरी दुनिया में पहचान मिली है। स्वामीजी ने योग को वेदांत के प्रैक्टिकल पहलू के तौर पर पेश किया। उन्होंने हिंदू मठों के लिए रिवाइवल, रीऑर्गेनाइज़ेशन और खास लक्ष्य तय करने में गाइड किया। स्वामी विवेकानंद ने मठों के जीवन को एक नई दिशा देकर और आध्यात्मिक जीवन के हमेशा रहने वाले सिद्धांतों को बड़े मॉडर्न समाज के हिसाब से बदलकर उसे फिर से ज़िंदा करने का रास्ता दिखाया। हिंदू मठों के इतिहास में, श्री शंकराचार्य पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदू मठों के जीवन को बनाने के लिए एक खास फ्रेमवर्क दिया। उन्होंने दस ऑर्डर या दशनामी शुरू किए, जिसमें भिक्षुओं के काम तय किए गए और उन्हें ऑर्गनाइज़ किया गया। श्री शंकर के समय से ही, भिक्षु पूरे भारत में अद्वैत वेदांत के टीचर और प्रचारक के तौर पर निकले। स्वामीजी ने मठों की ताकत का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए करने की योजना बनाई।
रामकृष्ण मिशन इसी का नतीजा है। सिर्फ़ रामकृष्ण मिशन ही नहीं बल्कि देश में अभी काम कर रहे ज़्यादातर आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी संगठन स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लेते हैं। इस बहुत ज़्यादा मैटेरियलिस्टिक मॉडर्न ज़माने में भी, जो लोग अपने निजी फ़ायदों को छोड़कर और दुनियावी खुशियों को नज़रअंदाज़ कर धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रहे हैं, वे स्वामीजी को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। स्वामीजी की शिक्षाएँ देश के अंदर और बाहर से हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति पर हो रहे वैचारिक हमलों का मुकाबला करने में हमारा सबसे मज़बूत हथियार भी हैं। स्वामीजी ने कहा, “अगले पचास सालों तक, हमारी भारत माता ही हमारी एकमात्र देवी हो।”

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

(साभार – हिन्दुस्थान समाचार)

बुर्काधारियों को गहने नहीं बेचेंगे बिहार के ज्वेलर्स

हिजाब, मास्क या हेलमेट पर भी प्रतिबंध
-सुरक्षा कारणों से लिया गया फैसला
पटना । बिहार में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए आभूषण व्यापारियों ने दुकानों में बुर्का, हिजाब, मास्क या हेलमेट पहनकर प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऑल इंडिया ज्वैलर्स फेडरेशन के इस फैसले के तहत, बढ़ती कीमतों और अपराध के जोखिम को देखते हुए ग्राहकों को खरीदारी से पहले चेहरे की पहचान कराना अनिवार्य होगा।
बिहार में आभूषण व्यापारियों द्वारा अपनी दुकानों के बाहर नोटिस लगाने के बाद विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें बुर्का, नकाब, मास्क या हेलमेट पहने ग्राहकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के झांसी में भी आभूषण व्यापारियों ने ऐसा ही निर्णय लिया था और अब इसका असर बिहार में भी देखने को मिल रहा है। राज्य भर में आभूषण की दुकानों के मालिकों ने नोटिस लगाए हैं जिनमें कहा गया है कि ग्राहकों को दुकानों में प्रवेश करने से पहले अपने चेहरे को ढकने वाले मास्क को हटाना होगा। इस कदम ने एक राजनीतिक बहस छेड़ दी है। ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन के बिहार अध्यक्ष अशोक कुमार वर्मा ने बताया कि राज्य भर के जिला अध्यक्षों के साथ बैठक के बाद यह निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि ग्राहकों को आभूषण की दुकानों में प्रवेश करने से पहले मास्क, हेलमेट, बुर्का या हिजाब हटाने के लिए कहा जाएगा। वर्मा के अनुसार, यह कदम पूरी तरह से सुरक्षा के दृष्टिकोण से उठाया गया है, क्योंकि अतीत में कई घटनाओं में लोगों ने अपने चेहरे छुपाए थे, जिससे पुलिस के लिए भी पहचान करना मुश्किल हो गया था। उन्होंने बताया कि पटना सेंट्रल एसपी को फोन पर इस निर्णय की जानकारी दे दी गई है और डीजीपी, मुख्य सचिव और गृह विभाग को भी पत्र भेजे गए हैं। वर्मा ने कहा कि अधिकांश आभूषण ग्राहक महिलाएं हैं और उनकी गरिमा को ध्यान में रखते हुए, विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया जाएगा—विशेषकर इसलिए कि कई दुकानों में महिला बिक्री कर्मचारी भी हैं। हालांकि, यदि कोई ग्राहक मना करता है, तो दुकान आभूषण नहीं बेचेगी। उन्होंने यह भी बताया कि सोने और चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर होने के कारण सुरक्षा जोखिम बढ़ गए हैं। गोपालगंज, छपरा, देहरी-ऑन-सोन, आरा, बक्सर, भागलपुर, गया, सासाराम, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, औरंगाबाद, जहानाबाद, पटना और नवादा सहित अन्य जिलों के प्रतिनिधियों ने बैठक में भाग लिया। इस निर्णय के बाद, पटना की अधिकांश आभूषण दुकानों ने इस तरह के नोटिस लगा दिए हैं। प्रमुख आभूषण केंद्र माने जाने वाले बकरगंज में व्यापारियों ने सुरक्षा कारणों से इस कदम को आवश्यक और उचित बताया। इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए, असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय प्रवक्ता आदिल हसन ने कहा कि वे इस फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं की गरिमा की रक्षा भी जरूरी है। हसन ने कहा कि सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा नियम लागू होता है, तो दुकानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिला बिक्री कर्मचारी महिला ग्राहकों से बातचीत करें।

कहानी पूर्वोत्तर भारत की – भाग -5 – पूर्वोत्तर भारत की सबसे पुरानी जीवित जनजातियां

पूर्वोत्तर भारत तब से विश्व यात्रियों और मानवविज्ञानी की कल्पना पर कब्जा कर रहा है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा नामक आठ राज्यों से जुड़े ये क्षेत्र अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली के लिए व्यापक रूप से विख्यात है और दुनिया भर से लोग पूर्वोत्तर भारत की सुंदरता को देखने के लिए यहां आते हैं।
विशेष रूप से, भूमि सौ से ज्यादा आकर्षक जनजातियों का घर है और दिलचस्प बात ये है कि हर एक जनजाति की अपनी संस्कृति और जातीयता है जो सुंदर है।
गारो जनजाति, मेघालय – गारो हिल्स में रहने वाले मेघालय की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा गारो है. ये दुनिया के कुछ शेष मातृवंशीय समाजों में से एक है, जहां बच्चे अपनी मां से अपने कबीले की उपाधि लेते हैं।
परिवार की सबसे छोटी बेटी को संपत्ति उसकी मां से विरासत में मिलती है, जबकि बेटे युवावस्था में आने पर घर छोड़ देते हैं। वो लड़के नोकपंते नामक एक कुंवारे छात्रावास में रहते हैं और वो शादी के बाद अपनी पत्नी के घर में रहते हैं।
सूमी जनजाति, नागालैंड – प्रमुख जातीय समूहों में गिने जाने वाले, सूमी नागालैंड के जुन्हेबोटो जिले और दीमापुर जिले के हैं। ईसाई मिशनरियों के आने से पहले सूमी नागालैंड की शिकार करने वाली जनजातियों में से एक हुआ करते थे। उनमें से बहुत कम जीववाद का अभ्यास करते हैं। जनजाति के दो प्रमुख त्योहार हैं, तुलुनी (8 जुलाई) और अहुना (14 नवंबर)।
कुकी जनजाति, पूर्वोत्तर – इस जनजाति के लोग सभी पूर्वोत्तर राज्यों में रहते हैं लेकिन मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं. कुकी जनजातियों के गांव आमतौर पर बारीकी से बने घरों के समूह होते हैं। जनजाति के पुरुष रंगीन संगखोल या जैकेट और फेचावम या धोती पहनते हैं। जनजाति की महिलाएं हर समय झुमके, कंगन, चूड़ियां और हार के साथ गहन रूप से अलंकृत होती हैं।
खासी जनजाति, मेघालय – खासी जनजाति पूर्वोत्तर में प्रमुख आदिवासी समुदाय है, जो मेघालय की कुल आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा है। खासी मुख्य रूप से खासी और जयंतिया पहाड़ियों में रहते हैं और मातृसत्तात्मक समाज का पालन करते हैं। इस जनजाति में महिलाएं सभी प्रमुख भूमिकाएं निभाती हैं और पुरुषों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। महिलाओं को जनजाति में सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं।
देवरी जनजाति, असम और अरुणाचल प्रदेश – देवरी जनजाति मुख्य रूप से असम के शिवसागर, जोरहाट, डिब्रूगढ़, लखीमपुर, तिनसुकिया जिलों और अरुणाचल के लोहित और चांगलांग जिलों में निवास करती है। वो मंगोलोइड स्टॉक के चीन-तिब्बती परिवार से संबंधित हैं और पुराने समय में, वो मंदिरों में पुजारी के रूप में काम करते थे।
बोडो जनजाति, असम – बोडो जनजाति ज्यादातर असम से संबंधित है, लेकिन ये देश के दूसरे हिस्सों में भी चली गई है. बोडो लोग भारत के इस हिस्से में चावल की खेती, चाय बागान और मुर्गी पालन के लिए जिम्मेदार हैं। बुनाई और रेशमकीट पालन भी बोडो की आजीविका का हिस्सा है. चावल उनका मुख्य भोजन है, जबकि जू माई (चावल की शराब) उनका घरेलू पेय है।
भूटिया जनजाति, सिक्किम – भूइता तिब्बत से सिक्किम चले गए और उत्तरी सिक्किम के लाचेन और लाचुंग क्षेत्रों में रहते हैं. यहां के लोग भूटिया बोलते हैं, जो तिब्बती भाषा की एक बोली है। इस जनजाति को सबसे विकसित और शिक्षित लोगों के रूप में जाना जाता है। भूटिया ज्यादातर सरकारी क्षेत्रों और व्यापार में काम करते हैं. जनजाति की महिलाएं भारी शुद्ध सोने के आभूषण पहनने के लिए लोकप्रिय हैं।
इनके घर भी काफी अनोखे होते हैं और ज्यादातर आयताकार आकार के होते हैं। इन्हें खिन कहा जाता है. भेड़ और याक प्रजनन उनके व्यवसाय का मुख्य स्रोत हैं।
अपतानी जनजाति, अरुणाचल प्रदेश – उत्तर पूर्व में सबसे विशिष्ट जनजातियों में से एक अपतानी जनजाति है। अपतानी भारत में अरुणाचल प्रदेश के निचले सुबनसिरी जिले में जीरो घाटी में रहते हैं और अपतानी, अंग्रेजी और हिंदी भाषा बोलते हैं। उनकी गीली चावल की खेती और कृषि प्रणाली काफी प्रभावशाली हैं। वास्तव में, यूनेस्को ने पारिस्थितिकी को संरक्षित करने के “अत्यंत उच्च उत्पादकता” और “अद्वितीय” तरीके के लिए अपतानी घाटी को विरासत स्थल के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। आप अपतानी महिलाओं को उनके विशिष्ट नाक छिदवाने और गहनों से और पुरुषों को उनके टैटू से पहचान पाएंगे।
अंगामी जनजाति, नागालैंड और मणिपुर – ये नागालैंड का एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है. लेकिन, मणिपुर में भी कई अंगामी पाए जा सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में चावल और अनाज की खेती उनके प्रमुख व्यवसायों में से एक है। जनजाति के पुरुष शॉल पहनते हैं जबकि महिलाएं मेखला पहनती हैं, एक रैपराउंड स्कर्ट. रंगीन आभूषण दोनों लिंगों के जरिए पहने जाते हैं। ये जनजाति अपने लकड़ी के शिल्प के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें बेंत के फर्नीचर भी शामिल हैं. बांस की टहनियों के साथ सूअर का मांस उनका मुख्य भोजन है।
आदि जनजाति, अरुणाचल प्रदेश – अरुणाचल प्रदेश के मूल निवासी, आदि जनजाति पहाड़ियों से संबंधित हैं और उनके अपने गांव, कानून और परिषद हैं. जनजाति आगे कई उप जनजातियों में विभाजित है। जनजाति के पुरुष बेंत, भालू और हिरण की खाल के हेलमेट पहनते हैं, ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि वो किस क्षेत्र से संबंधित हैं।
यहां की महिलाएं अपनी उम्र और वैवाहिक स्थिति के अनुसार कपड़े पहनती हैं। अविवाहित महिलाएं बेयोप पहनती हैं, जो उनके पेटीकोट के नीचे पांच से छह पीतल की प्लेटों से बना एक आभूषण होता है। आदिवासी सूअर और दूसरे जानवरों को फंसाने और शिकार करने में लगे हैं।
(स्रोत – टीवी 9 हिन्दी डॉट कॉम)

 

मकर संक्रांति विशेष – तिलकुट

इतिहास – बिहारी व्यंजनों ने भारत के क्षेत्रीय व्यंजनों में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। राज्य के पारंपरिक व्यंजन, जैसे  लिट्टी चोखा, पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। हालांकि, बिहारी व्यंजनों में कई अन्य व्यंजन भी शामिल हैं, जैसे चना घुगनी, दाल पीठा और कई पारंपरिक मिठाइयाँ। पारंपरिक मिठाइयों की बात करें तो सबसे पहले स्वादिष्ट  ठेकुआ याद आता है , जिसे ज्यादातर  छठ पर्व के दौरान बनाया जाता है । ठेकुआ की तरह ही एक और खास व्यंजन है, जो आपके स्वाद को झकझोर देगा। तिलकुट एक मीठा और नमकीन व्यंजन है जो केवल सर्दियों में ही मिलता है। इसका 150 साल पुराना इतिहास है और इसे सबसे पहले गया के रामना स्थित टेकारी रियासत में बनाया गया था। कहा जाता है कि राजा को तिलकुट बहुत पसंद था और उन्होंने तिलकुट बनाने की कला को बढ़ावा दिया था।

बिहार में तिलकुट तीन प्रकार के होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना अलग स्वाद होता है। पहला है सफेद तिलकुट, जो परिष्कृत चीनी से बनता है और सबसे आम है। दूसरा है शक्कर तिलकुट, जो अपरिष्कृत चीनी से बनता है, और तीसरा है गहरे भूरे रंग का तिलकुट, जो गुड़ से बनता है। यह भारत के फसल उत्सव मकर संक्रांति के दौरान बनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्यंजन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिलकुट का मुख्य घटक तिल है, जिसे यमराज (मृत्यु के देवता) का आशीर्वाद प्राप्त है। इसलिए, इसे अमरता का बीज माना जाता है और यह समृद्ध भविष्य का प्रतीक है।

 तिलकुट एक पौष्टिक मिठाई है जो पिसे हुए तिल से तैयार की जाती है। यह उन मिठाइयों में से एक है जिन्हें बनाने में कौशल और सावधानीपूर्वक तैयारी की आवश्यकता होती है, क्योंकि कोई भी गलती इस पारंपरिक व्यंजन के शानदार स्वाद को बिगाड़ सकती है। इसे चीनी के साथ पिसे हुए तिल को गोल करके पकाया जाता है। फिर इसे गुड़ और रुई के साथ उचित तापमान पर पकाया जाता है और फिर तिलकुट बनाने का सबसे अनोखा और कठिन चरण आता है, उन्हें बिस्कुट जैसे आकार में पीटना।

 

सामग्रीसफेद तिल, देसी घी, गुड़, इलायची पाउडर

 विधि- तिलकुट बनाने के लिए आपको करीब 150 ग्राम सफेद तिल लेने हैं। तिल के बराबर यानि 150 ग्राम गुड़ लें और 1 टीस्पून देसी घी ले लें। एक कड़ाही में तिल को मीडियम फ्लेम पर हल्का ब्राउन होने तक भून लें। बिना तेल या घी के तिल आसानी से भुन जाते हैं। बस बीच-बीच में चलाते रहें जिससे तिल नीचे से जलें नहीं। जब तिल हल्के ठंडे हो जाएं को मिक्सी में दरदरा पीस लें। अब कड़ाही में गुड़ को बारीक टुकड़ों में तोड़कर डालें और इसमें 1 चम्मच पानी मिलाकर चाशनी तैयार कर लें। गुड़ को चलाते रहें जिससे जल्दी पिघल जाए। जब गुड़ कड़ाही को छोड़ने लगे और उसमें बबल बन जाएं तो चाशनी को चेक कर लें। एक चम्मच में पानी लें और उसमें गुड़ की चाशनी की 1-2 बूंद डालकर 10 सेकेंड के लिए छोड़ दें। अब चेक करें अगर चाशनी तार जैसी खिंच रही है तो इसे थोड़ी देर और पकाएं। धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए गुड़ को और पका लें। अब एक बार फिर से चम्मच में कुछ बूंदे डालकर चेक करें। चाशनी को इतना पकाना है कि चिपक खत्म हो जाए और गुड़ आसानी से टूट जाए। अब गैस की फ्लेम एकदम कम कर दें और पिसे हुए तिल को थोड़ा-थोड़ा करके चाशनी में मिलाते जाएं। गैस बंद कर दें और अब तिलकुट को सेट कर लें। इसके लिए एक चपटी कटोरी या कोई ढक्कन लें और उसमें नीचे थोड़ा घी लगाएं। तैयार मिश्रण को कटोरी में डालें और बेलन की नोक वाली साइड से दबाएं। अब तिलकुट की शेप बनकर तैयार हो जाएगी।

सर्दियों में तिलकुट खाने के फायदे 

आयुर्वेदिक डॉक्टर चंचल शर्मा के अनुसार, तिल में भरपूर मात्रा में हेल्दी फैट्स, फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, जिंक, मैग्नीशियम और विटामिन्स होते हैं। साथ ही इसमें अच्छी मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं। वहीं गुड़ में अच्छी मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आयरन, जिंक, विटामिन-ए, बी, ई और सी जैसे पोषक तत्व और एंटी-ऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं। ऐसे में सर्दियों में तिलकुट को खाने से स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते हैं।

शरीर को मिलेगी एनर्जी- तिलकुट में बहुत से पोषक तत्व होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर को नेचुरल रूप से एनर्जी देने, थकान और कमजोरी को दूर करने में मदद मिलती है।

इम्यूनिटी बूस्ट करे- तिलकुट में एंटी-ऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर की इम्यूनिटी को बूस्ट करने और इंफेक्शन से बचाव करने में मदद मिलती है।

शरीर को गर्म रखे- तिल और गुड़ दोनों की तासीर गर्म होती है। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर को अंदर से गर्म रखने और सर्दी से बचाव करने में मदद मिलती है। इससे ठंड लगने से बचाव करने में मदद मिलती है।

खून की कमी दूर करे- तिलकुट में अच्छी मात्रा में आयरन होता है। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर में खून की कमी को दूर करने और में मदद मिलती है।

स्किन के लिए फायदेमंद- तिलकुट में अच्छी मात्रा में हेल्दी फैट्स होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर को नेचुरल रूप से डिटॉक्स करने में मदद मिलती है, जिससे स्किन को गहराई से पोषण देने और स्किन को नेचुरल रूप से हेल्दी बनाए रखने में मदद मिलती है।

पाचन में सुधार करे- तिलकुट में अच्छी मात्रा में फाइबर होता है। ऐसे में इसका सेवन करने से पाचन प्रक्रिया में सुधार करने और इससे जुड़ी समस्याओं से बचाव करने में मदद मिलती है।

हड्डियों के लिए फायदेमंद- तिलकुट में मौजूद तिल में भरपूर मात्रा में कैल्शियम होता है। ऐसे में इसका सेवन करने से हड्डियों को मजबूती देने में मदद मिलती है, जिससे हड्डियों की समस्याओं से बचाव करने में मदद मिलती है।

पोषक तत्वों की कमी को दूर करे- तिलकुट में बहुत से पोषक तत्व होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर में आयरन, कैल्शियम और हेल्दी फैट्स जैसे पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में मदद मिलती है।

सावधानियां – तिलकुट का सेवन सीमित मात्रा में करें, तिल से किसी भी तरह की एलर्जी होने या परेशानी होने पर तिलकुट का सेवन करने से बचें। इसके अलावा, ब्लड शुगर या किसी मेडिकल कंडीशन से पीड़ित व्यक्ति को तिलकुट का सेवन डॉक्टर की सलाह के साथ ही करना चाहिए।

(स्रोत – टाइम्स नाउ हिन्दी, इंडिया टीवी और स्लर्प डॉट कॉम)

विदेशी धरती पर हिंदी को पहचान दिला रहे हैं तोमियो मिजोकामी

जब हिंदी की वैश्विक यात्रा की बात होती है, तो पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी का नाम स्वाभाविक रूप से उन हस्तियों में लिया जाता है जो इसे सशक्त करने में लगे हैं। जापान जैसे गैर-हिंदी भाषी देश में हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को अकादमिक पहचान दिलाने वाले प्रोफेसर मिजोकामी भारत–जापान सांस्कृतिक संबंधों के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक माने जाते हैं। विश्व हिंदी दिवस पर उनकी उपस्थिति यह स्पष्ट संदेश देती है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सभ्यताओं को जोड़ने वाला एक सेतु है।
जापान से भारत तक एक अकादमिक यात्रा
1941 में जापान के कोबे शहर में जन्मे प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी को बचपन से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन और भाषाओं के प्रति गहरी रुचि रही। उन्होंने वर्ष 1965 में ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से भारतीय अध्ययन में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद भारत आकर भाषा अध्ययन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। कई भारतीय भाषाओं के विद्वान हैं पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामीकई भारतीय भाषाओं के विद्वान हैं पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी।
1965 से 1968 के बीच उन्होंने इलाहाबाद में हिंदी और विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में बांग्ला भाषा का गहन अध्ययन किया। इसी दौरान भारतीय समाज की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से उनका गहरा आत्मिक जुड़ाव बना।
भारतीय भाषाओं के अंतरराष्ट्रीय विद्वान
प्रोफेसर मिजोकामी ने 1972 में दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त और समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित रहा, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष मान्यता मिली। वे हिंदी, पंजाबी, बांग्ला, उर्दू, गुजराती, मराठी, तमिल, कश्मीरी, सिंधी सहित कई भारतीय भाषाओं में दक्ष हैं। उन्हें पंजाबी भाषा पर शोध करने वाला पहला जापानी विद्वान माना जाता है। इसके अलावा वे अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं में भी पारंगत हैं।
ओसाका विश्वविद्यालय से वैश्विक मंच तक
दशकों तक ओसाका विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं के अध्यापन के बाद वर्ष 2007 से वे प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में सक्रिय हैं। उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में भी पंजाबी भाषा का अध्यापन किया, जिससे भारतीय भाषाओं की वैश्विक पहुंच और मजबूत हुई। उनकी प्रमुख पुस्तकों में इंट्रोडक्शनरी पंजाबी, पंजाबी रीडर, प्रैक्टिकल पंजाबी कन्वरशेसन और लैंग्वेज कॉन्टैक्ट इन पंजाब शामिल हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है।
अनुवाद के माध्यम से आध्यात्मिक संवाद
प्रोफेसर मिजोकामी ने गुरु नानक देव जी की पवित्र रचना जपजी साहिब का जापानी भाषा में अनुवाद कर सिख दर्शन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को जापान तक पहुंचाया। इसके अलावा उन्होंने द सिक्ख्स : देयर रिलिजियस बीलीफ्स एंड प्रैक्टिसेज जैसी महत्वपूर्ण कृतियों का भी जापानी अनुवाद किया। उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से उन्होंने केवल शब्दों नहीं बल्कि भारत की आत्मा को जाना है। भारतीय भाषाओं और संस्कृति के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित सिविल इन्वेस्टिचर समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया, जो जापान में भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार की औपचारिक स्वीकृति का प्रतीक है।
हिरोशिमा में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोफेसर मिजोकामी से भेंट कर उनके आजीवन योगदान की सराहना की। प्रधानमंत्री ने कहा – प्रोफेसर मिजोकामी जैसे विद्वानों ने भाषा और साहित्य के माध्यम से भारत और जापान के बीच स्थायी पुल बनाए हैं। इस मुलाकात को भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सशक्त उदाहरण माना गया। 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस हिंदी को वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रतीक है। प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी ने इस उद्देश्य को दशकों पहले ही अपने जीवन का मिशन बना लिया था। जापान में हिंदी को अकादमिक सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक और प्रेरणादायक रही है। जब भारत और जापान के रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध नई ऊंचाइयों पर हैं। प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी का जीवन यह सिद्ध करता है कि भाषा, ज्ञान और संस्कृति सीमाओं से परे लोगों को जोड़ते हैं। वे केवल एक विद्वान नहीं, बल्कि भारत–जापान मित्रता के जीवंत प्रतीक हैं – और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रेरणा भी।

छरहरा दिखने के लिए फैशन में रखें इन बातों का ध्यान

 स्लिम और ट्रिम दिखने के लिए, महिलाएं अक्सर अपने आहार और व्यायाम पर ध्यान देती हैं, साथ ही साथ अपने कपड़ों का भी चयन सावधानी से करती हैं।स्लिम और ट्रिम दिखने के लिए, महिलाओं को अपने शरीर के आकार के अनुसार कपड़े पहनने चाहिए। अपने शरीर के आकार को जानें ड्रेस में स्लिम और ट्रिम दिखने के लिए, सबसे पहले अपने शरीर के आकार को जानना जरूरी है। यदि आप अपने शरीर के आकार को नहीं जानती हैं, तो आपको अपने कपड़ों का चयन करना मुश्किल होगा। अपने शरीर के आकार को जानने के लिए, अपने आप को एक आईने में देखें और अपने शरीर के अच्छे और कमजोर हिस्सों को पहचानें।
अपने शरीर के आकार के अनुसार कपड़े पहनें
एक बार जब आप अपने शरीर के आकार को जान जाएं, तो अपने शरीर के आकार के अनुसार कपड़े पहनें। यदि आपका शरीर स्लिम है, तो आप फिट और टाइट कपड़े पहन सकती हैं। यदि आपका शरीर कर्वी है, तो आप फ्लेयर और स्कर्ट जैसे कपड़े पहन सकती हैं।
अपने शरीर के अच्छे हिस्सों को उभारें
अपने शरीर के अच्छे हिस्सों को उभारने के लिए, आप उन हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करने वाले कपड़े पहन सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपके पास अच्छे पैर हैं, तो आप शॉर्ट्स या स्कर्ट पहन सकती हैं।
अपने शरीर के कमजोर हिस्सों को छुपाएं
अपने शरीर के कमजोर हिस्सों को छुपाने के लिए, आप उन हिस्सों को ढकने वाले कपड़े पहन सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपके पास कमजोर पेट है, तो आप हाई-वेस्ट पैंट या स्कर्ट पहन सकती हैं।
रंगों का चयन करें
रंगों का चयन भी आपके शरीर के आकार और रंग को प्रभावित कर सकता है। यदि आप स्लिम और ट्रिम दिखना चाहती हैं, तो आप डार्क रंगों का चयन कर सकती हैं। डार्क रंग आपके शरीर को स्लिम और लंबा दिखा सकते हैं।
पैटर्न का चयन करें
पैटर्न का चयन भी आपके शरीर के आकार को प्रभावित कर सकता है। यदि आप स्लिम और ट्रिम दिखना चाहती हैं, तो आप वर्टिकल पट्टियों वाले कपड़े पहन सकती हैं। वर्टिकल पट्टियां आपके शरीर को लंबा और स्लिम दिखा सकती हैं।
फिटिंग का ध्यान रखें
फिटिंग का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। यदि आपके कपड़े बहुत ढीले हैं, तो आप मोटी दिख सकती हैं। यदि आपके कपड़े बहुत टाइट हैं, तो आप असहज महसूस कर सकती हैं। इसलिए, अपने कपड़ों की फिटिंग का ध्यान रखें और उन्हें अपने शरीर के अनुसार समायोजित करें।

गले में सूजन और खराश से छुटकारा दिलाएंगे आयुर्वेदिक नुस्खे

मौसम के बदलाव के साथ ही गले में खराश और सूजन एक आम समस्या बन जाती है। यह शुष्क हवा, हीटर का अधिक उपयोग, ठंडी हवा में सांस लेना, प्रदूषण और अनियमित खान-पान जैसे छिपे कारणों से भी ट्रिगर होती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में कफ दोष का संचय बढ़ता है, जो गले में जलन और सूजन पैदा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू उपाय कफ को संतुलित कर गले को राहत प्रदान करते हैं। सर्दियों में हवा सूखी हो जाती है, जिससे गले की म्यूकस लेयर ड्राई होकर वायरस के प्रवेश को आसान बनाती है। हीटर के सामने बैठना गले को और शुष्क करता है, जबकि सुबह ठंडी हवा और ठंडे-गर्म पेय का मिश्रित सेवन सूजन बढ़ाता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे उपाय प्रभावी हैं जो कफ निकालकर गले को नमी और गर्माहट देते हैं। इनमें हींग-शहद का लेप है। हींग के एंटीवायरल गुण कफ को ढीला कर जलन कम करते हैं। मिश्री-सौंफ-काली मुनक्का को उबालकर काढ़ा बनाएं और इसे पीने से गला नम रहता है, सूजन शांत होती है। गुनगुने पानी में हल्दी और कुचली लौंग मिलाकर गरारा करना भी लाभदायी होता है। हल्दी में करक्यूमिन होता है, जो सूजन घटाता है, जबकि लौंग दर्द में राहत देता है।
अदरक और गुड़ गर्म कर उसका भाप लेने से कफ ढीला होता है और खराश में तुरंत आराम मिलता है। नींबू के छिलके गर्म कर गर्दन पर रखें। इसके लिमोनीन से गला मॉइस्चराइज होता है। तुलसी का चूर्ण शहद में मिलाकर लें। तुलसी के एंटीसेप्टिक गुण वायरस रोकते हैं। इसके साथ ही गुनगुना तिल का तेल नाक में 2-2 बूंद डालें। यह गले के सूखेपन को दूर कर नमी प्रदान करता है। ये उपाय न केवल लक्षणों को कम करते हैं, बल्कि कफ असंतुलन की समस्या भी दूर करते हैं। एक्सपर्ट के अनुसार, इन देसी नुस्खों को मौसम के अनुसार अपनाएं। गंभीर मामलों में डॉक्टर से परामर्श लें।