नयी दिल्ली । पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के नेता दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का अगला उच्चायुक्त बनाए जाने की घोषणा की गई है। विदेश मंत्रालय ने सोमवार को आधिकारिक रूप से इसकी जानकारी दी और कहा कि वे जल्द ही कार्यभार संभाल लेंगे।
त्रिवेदी प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे, जिन्हें हाल ही में बेल्जियम में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया है। साथ ही वह यूरोपीय यूनियन में भारत के राजदूत की भी जिम्मेदारी संभालेंगे। बांग्लादेश में त्रिवेदी की यह नियुक्ति इसलिए विशेष है क्योंकि आमतौर पर इस पद पर भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के अधिकारी को भेजा जाता है, लेकिन इस बार एक वरिष्ठ राजनेता को चुना गया है।
त्रिवेदी का एक लंबा राजनीतिक जीवन रहा है। उन्होंने 1987 में जन मोर्चा के गठन में भूमिका निभाई। जन मोर्चा का बाद में जनता दल में विलय हो गया। वे 1990 से 1996 तक गुजरात से राज्यसभा सदस्य रहे। वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में उन्होंने रेल मंत्री के रूप में कार्य किया। 2012 के रेल बजट में किराया बढ़ाने के प्रस्ताव के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। वर्ष 2021 में वे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। त्रिवेदी गुजरात से हैं लेकिन उनकी बांग्ला पर अच्छी पकड़ है। भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध शेख हसीना सरकार के अपदस्थ होने के बाद से काफी पीछे चले गए थे। हालांकि तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद संबंध फिर से पटरी पर लौटते दिख रहे हैं।
दिनेश त्रिवेदी बांग्लादेश में उच्चायुक्त नियुक्त, विदेश मंत्रालय ने की घोषणा
तमिलनाडु में मिला 8–12 हजार साल पुराना जीवाश्म स्थल
नयी दिल्ली। तमिलनाडु में 8–12 हजार साल पुराना जीवाश्म स्थल मिलने की पुष्टि हुई है। यह खोज दक्षिणी भारत के तटीय क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक इतिहास और प्राचीन समुद्री वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि यह क्षेत्र कभी समुद्र तटीय सीमा का हिस्सा था। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने एक्स पर बताया कि तमिलनाडु के थूथुकुड़ी जिले में 2023 की भारी बारिश के बाद उजागर हुए जीवाश्म स्थलों का सर्वेक्षण पूरा हो गया है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने प्रशासन के अनुरोध पर यह फील्ड स्टडी की थी। जांच में एक नए “फॉसिल बेड” की पुष्टि हुई है, जो होलोसीन काल (करीब 8,000 से 12,000 साल पुराना) का माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह खोज भारत के क्वाटरनरी काल के जीवाश्म रिकॉर्ड को और समृद्ध करेगी।
इस खोज से देश के प्राचीन वन्यजीवन, पर्यावरण और जलवायु के बारे में अहम जानकारी मिल सकेगी। यादव ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के विशेषज्ञों की सराहना करते हुए कहा कि वैज्ञानिकों के तेज और प्रभावी कार्रवाई से भारत की प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकेगा।
उल्लेखनीय है कि जीवाश्म मुख्य रूप से थूथुकुड़ी के पास पनाइयूर, पट्टिनमरुदुर और कायलपट्टिनम क्षेत्रों में पाए गए हैं।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने 104 जीवाश्म नमूने एकत्र किए हैं, जिसमें मोलस्कन (गैस्ट्रोपोड और बाइवाल्व) नमूने और जीवाश्म युक्त चट्टान के टुकड़े शामिल हैं।
यह खोज दक्षिणी भारत के तटीय क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक इतिहास और प्राचीन समुद्री वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि यह क्षेत्र कभी समुद्र तटीय सीमा का हिस्सा था।
अब निवेश के लिए सोना खरीद रहे हैं भारतीय
नयी दिल्ली । अब अधिक संख्या में भारतीय आभूषणों की तुलना निवेश के लिए सोना खरीद रहे हैं। चालू वित्त वर्ष में ऐसे उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी बढ़कर 40 प्रतिशत तक होने की उम्मीद है। सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। घरेलू रेटिंग एजेंसी केयरएज की इस रिपोर्ट के अनुसार कुल सोना की खरीद में आभूषणों की खपत का हिस्सा 2025 में गिरकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गया, जबकि लंबी अवधि का औसत 70 प्रतिशत रहा है। केयरएज के निदेशक अखिल गोयल ने कहा कि यह दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में एक भारत के सोना खरीदने के प्रतिरूप में एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है। गोयल ने कहा, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, सोने की कीमतों में तेजी और पोर्टफोलियो विविधीकरण की प्राथमिकताएं सोने की निवेश मांग को बढ़ावा देती रहेंगी। वित्त वर्ष 2026-27 में कुल स्वर्ण खपत में निवेश की हिस्सेदारी 35-40 प्रतिशत रहने का अनुमान है।रिपोर्ट में कहा गया कि 60 प्रतिशत आभूषणों की खपत अभी भी 50 प्रतिशत के वैश्विक औसत से अधिक है। भारत में निवेश की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिसका नेतृत्व गोल्ड ईटीएफ और बार तथा सिक्कों की खरीद ने किया है। यह अन्य बातों के साथ ही सुरक्षित निवेश की मांग को दर्शाता है। एजेंसी का मानना है कि सोने की कीमत अब एक स्थायी उच्च-मूल्य वाले दौर में प्रवेश कर चुकी हैं। इसे मांग में संरचनात्मक बदलाव, केंद्रीय बैंकों द्वारा निरंतर खरीद और वैश्विक व्यापक आर्थिक तथा भू-राजनीतिक अनिश्चितता से समर्थन मिल रहा है।
लिटिल थेस्पियन द्वारा चार नाटकों के अंशों का मंचन
कोलकाता । गत 25 अप्रैल को कस्बा अर्घ्य की “सैटरडे प्लेज़” श्रृंखला ने अनुचिंतन आर्ट सेंटर को मानवीय अनुभवों और भावनाओं की प्रयोगशाला में बदल दिया। लिटिल थेस्पियन ने चार नाटकों के मर्मस्पर्शी अंश प्रस्तुत किए, जिनका एकल मंचन प्रख्यात निर्देशक, अभिनेता, कवि और नाटककार उमा झुनझुनवाला ने किया। उमा झुनझुनवाला ने शुरुआत की प्रताप सहगल के कोई और रास्ता से। इंदु के रूप में उन्होंने एक व्यक्ति और एक आदर्श—दोनों को साकार किया: परंपरा में जड़ें जमाए हुए, पर उससे बंधने को तैयार नहीं, आधुनिक भारतीय स्त्री। यह एकालाप आदर्श और यथार्थ के बीच, समाज की अपेक्षाओं और स्त्री के आत्म-अधिकार के बीच की दरारों को रेखांकित करता है। झुनझुनवाला की इंदु संयत, विद्रोही और बेहद पहचानी-सी थी। उनके उठाए सवाल एक साथ सामयिक और शाश्वत लगे, और दर्शकों ने अपने ही ड्रॉइंग रूम को उसकी दुविधाओं में झलकते देखा।अंतरंग से अस्तित्ववादी की ओर बढ़ते हुए, वे सैमुअल बेकेट के एंडगेम में हुक्मरानी औरत (हैम) बन गईं। सैमुअल बेकेट का यह नाटक आधुनिकतावादी एब्सर्ड का एक उत्कृष्ट नमूना माना जाता है, जो एक अनाम सर्वनाश के बाद एक ही कमरे में कैद चार अलग-अलग पात्रों की कहानी कहता है, जहाँ वे जीवन का अर्थ तलाशने की कोशिश करते हैं। एब्सर्ड की लय पर उनकी पकड़ — घाव की तरह खिंचते मौन, बुझी हुई सटीकता से कहे गए संवाद — ने साबित किया कि उनकी अदाकारी का मील का पत्थर क्यों है| इंदु की गर्म यथार्थवादिता से हैम के ठंडे आधिपत्य तक का बदलाव चौंकाने वाला था, और जान-बूझकर ऐसा रखा गया। नाटक पतझड़ (टेनेसी विलियम्स के अंग्रेज़ी नाटक ‘द ग्लास मेनाजरी’ का हिंदुस्तानी रूपांतरण) ने एक और रंग जोड़ा। गायत्री के रूप में, भ्रम और यथार्थ की नीरसता के बीच झूलती एक माँ के किरदार में, झुनझुनवाला ने गृहस्थी की ख़ामोश हताशा को उजागर किया। बेटी की शादी को लेकर गायत्री का जुनून कोई कार्टून नहीं, बल्कि एक रक्षा-कवच था: खालीपन के ख़िलाफ़ एक नाज़ुक दीवार। यह नाज़ुकपन भावुकता से रहित होकर निभाया गया, इसलिए और भी मार्मिक लगा। इस प्रस्तुति का समापन लिटिल थेस्पियन के सह-संस्थापक दिवंगत एस. एम. अज़हर आलम द्वारा लिखित अंतिम नाटक चाक से हुआ। यहाँ झुनझुनवाला ने ज़ोहरा का किरदार निभाया — 1971 के विभाजन और उसके परिणामों से टूटे एक मुस्लिम परिवार की मुखिया। पैतृक संपत्ति के मुकदमों और बेटे की सुलगती चिंता के बीच, ज़ोहरा ने विस्थापन का भार शांत गरिमा से उठाया। यह अंश आलम की उस प्रतिभा की तीखी याद दिलाता है जो राजनीतिक को व्यक्तिगत में पिरो देती थी, और झुनझुनवाला ने उस विरासत को बिना किसी मेलोड्रामा के निभाया ।एक कलाकार को पचास मिनट में चार ज़िंदगियाँ — हर एक ज़मीन-आसमान जितनी अलग — जीते देखना रंगमंच की शुद्ध दक्षता का साक्षी होना है। झुनझुनवाला के रूपांतरण सहज थे: ठुड्डी का हल्का-सा झुकाव, साँस का बदलना, एक नई लय, और इंदु हैम बन गई, गायत्री बन गई, ज़ोहरा बन गई। नाममात्र के प्रॉप्स, अलग-अलग रंग के दुपट्टे, और बस विशुद्ध अदाकारी ।अगर कोई सूत्र था, तो वह था मंच की विरोधाभासों को समेटने की शक्ति। लिटिल थेस्पियन ने याद दिलाया कि मंच ‘नाटक’ का पर्याय नहीं है; वह कविता, एब्सर्ड, स्मृति और असहमति के लिए एक विराट स्थान है। कस्बा अर्घ्य की “सैटरडे प्लेज़” श्रृंखला ऐसे साहसिक काम के चयन के लिए सराहना की पात्र है।यह केवल एक प्रस्तुति नहीं थी। यह एक संवाद था — अभिनेता और पाठ के बीच, महाद्वीपों और दशकों के पार चार नाटककारों के बीच, और एक स्त्री और उसके भीतर समाई अनेक स्त्रियों के बीच। इसके प्रस्तुति के बाद कस्बा अर्घ्य का नाटक हैमलेट, श्री मनीष मित्रा द्वारा निर्देशित, प्रस्तुत किया गया। कोलकाता के रंगमंच प्रेमी अनुचिंतन आर्ट सेंटर से उस दुर्लभ उपहार के साथ लौटे: यह एहसास कि उन्होंने दुनिया में, और खुद में, कुछ घटते हुए देखा है।
40वें रंग अड्डा में जयंती पर याद किये गए एस. एम. अज़हर आलम
कोलकाता । लिटिल थेस्पियन ने 17 अप्रैल 2026 को दोपहर 3 बजे भारतीय भाषा परिषद में अपने संस्थापक निर्देशक एस. एम. अज़हर आलम की जयंती मनाई। इस अवसर पर 40वें रंग अड्डा के अंतर्गत ‘एस. एम. अज़हर आलम: द थिएटर मेकर’ शीर्षक से एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित हुई।प्रथम सत्र का संचालन गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता के हिंदी विभाग की डॉ. रेश्मी पांडा मुखर्जी ने किया। इसमें तीन वक्ता शामिल हुए: प्रख्यात रंगमंच समीक्षक श्री अंशुमान भौमिक ने अज़हर आलम: दशकों में उनकी अभिनय विरासत को समझने का प्रयास, विषय पर अपने विचार रखे। संतोषपुर अनुचिंतन के निर्देशक डॉ. गौरव दास ने “एस. एम. अज़हर आलम: युवा रंगकर्मियों के लिए एक संस्था” विषय पर संबोधन दिया। स्पार्क थिएटर के निर्देशक डॉ. अलमास हुसैन ने “ड्रामा डिज़ाइनिंग का फ़न और अज़हर आलम” विषय पर वक्तव्य दिया। द्वितीय सत्र का संचालन लिटिल थेस्पियन की कलाकार आकांक्षा आदित्य ने किया। इसमें निम्नलिखित विद्वानों ने अपने विचार साझा किए: प्रख्यात रंगमंच समीक्षक एवं जादवपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद लाल ने “रंगमंच का इतिहास अज़हर को क्यों याद रखेगा” विषय पर बात की। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज के डॉ. नईम अनीस ने “बेमिसाल अदाकार अज़हर” विषय पर अपने विचार रखे। रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग की प्रो. डॉ. गगनदीप ने “एस. एम. अज़हर आलम की नाटकीय दुनिया की परतें खोलना” विषय पर संबोधन दिया। लिटिल थेस्पियन के कलाकार आफ़ताब आलम ने अज़हर की असाधारण यात्रा, उनके संघर्षों और उनकी उपलब्धियों को रेखांकित किया, जबकि कवि श्री रावेल पुष्प ने उन्हें समर्पित कविता से श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। अज़हर को उनकी कला के हर पहलू के माध्यम से याद किया गया — उनके गहन लेखन, उनकी दूरदर्शी निर्देशन शैली, उनकी भावप्रवण मंच-सज्जा और उनके सशक्त अभिनय के ज़रिए। हर स्मृति उनके पीछे छोड़े गए शून्य को एक श्रद्धांजलि थी। सभी वक्ताओं का मत था कि अपने छोटे से जीवनकाल में ही अज़हर आलम ने हिंदी और उर्दू रंगमंच के विकास के लिए विराट कार्य किए और विशेष रूप से उर्दू रंगमंच का स्तर पूरे देश में ऊँचा उठाकर कोलकाता को उसका एक प्रमुख केंद्र बना दिया।कार्यक्रम का समापन उनके सम्मान में केक काटकर किया गया। इस अवसर पर कोलकाता के अनेक गणमान्य व्यक्ति, विद्यार्थी, शिक्षक और रंगमंच प्रेमी उपस्थित थे, जो अज़हर आलम को श्रद्धांजलि अर्पित करने आए थे — जिनकी उपस्थिति आज भी हर पटकथा, हर मंच और हर उस दिल में जीवित है जिसे उन्होंने छुआ।
बेथुन कॉलेज थियेटर वर्कशॉप में भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थी शामिल
हिंदी विभाग की पहल पर रंगशिल्पी का आयोजन
कोलकाता । भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने थियेटर वर्कशॉप में भाग लिया। रंगशिल्पी के डायरेक्टर प्लावन बसु द्वारा बैथुन कॉलेज के सभागार में आयोजित किया गया। यह थियेटर बेथुन कॉलेज के हिंदी विभाग और दी स्टुडेंट्स एक्टिविट सेल ड्रामा क्लब संयोजन में हुआ। इसमें थियेटर, कम्युनिकेशन और साइंस आदि के माध्यम से विद्यार्थियों को सीखने का अवसर मिला। विभिन्न कॉलेज के छात्र छात्राओं ने अभिनय की बारिकियों को सीखा और स्वयं भी भाग लिया। विद्यासागर युनिवर्सिटी, आरबीसी, रवींद्रभारती आदि आठ नौ कॉलेजों के विद्यार्थियों ने त्वरित थीम पर नाटक प्रस्तुति दी ।
बेथुन कॉलेज की डॉ राज्यश्री राव प्रधानाचार्य ने स्वागत भाषण दिया और थियेटर वर्कशॉप विद्यार्थियों के लिए प्लावन बसु ने विभिन्न प्रदर्शन किए जिसमें उन्होंने थियेटर को जीवन का महत्वपूर्ण माध्यम है।
प्लावन बसु ने थियेटर वर्कशॉप में थियेटर के तत्वों को सिखाया। उन्होंने कहा कि नाटक सबसे पुरानी विधा है जिसमें मस्तिष्क हृदय और शरीर रंग ध्वनि का संयोजन होना ही अभिनय है जो कला में अत्यंत महत्वपूर्ण और सभी का संयोजन आवश्यक है।विभिन्न क्रियाओं जैसे ताली, चलना, आवाज, शब्द अभिव्यक्ति, शब्द औजार है, रंग का महत्व आदि को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया। 160 विद्यार्थियों ने
तीन टीमों ने भाग लिया और अपने प्रभावशाली प्रदर्शन किए। धन्यवाद दिया बेथुन कॉलेज के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ नमिता जायसवाल ने । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने समूह के साथ जेनेरेशन गैप थीम पर अपना प्रदर्शन किया जो सभी की पसंद बना । भवानीपुर कॉलेज से प्रो डॉ वसुंधरा मिश्र के साथ विद्यार्थियों में स्वागत चौधरी सेम 4,कुमार शिवम सेम 4,स्वागत दलपति सेम 1,कृति कनाजिया सेम 1,दिपन्विता सामंत सेम 1,प्राची शाॉ सेम 2 की उपस्थिति रही। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
प्रो.डॉ.सत्या उपाध्याय को राहुल सांकृत्यायन सम्मान
गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार व ‘पड़ाव’ का स्थापना दिवस,संस्कृति उत्सव एवं सम्मान समारोह संपन्न
कोलकाता । ग्रंथागार संंस्थापक स्व. सिंहासन सिंह की 19वींं पुुण्य-तिथि केे उपलक्ष्य पर गरीफा मैैत्रेेय ग्रंंथागार व ‘पड़ाव’ साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था के संयुक्त तत्वाधान में स्थापना दिवस, सांस्कृतिक उत्सव एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया । 24 अप्रैल को विजित प्रतिभागियों को नैहाटी के ‘एकतान मंच’ सभागार में पुरस्कृत और सम्मानित किया गया ।कार्यक्रम की अध्यक्षता कवियत्री और कथाकार डॉ. इंदु सिंह ने की एवं मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या प्रो. डॉ. सत्या उपाध्याय। इस अवसर पर समाज, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में अपने विशेष योगदान देने हेतु ग्रंथागार के द्वारा कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्य प्रो. डॉ. सत्या उपाध्याय को “राहुल सांकृत्यायन सम्मान-2026” से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में चित्रांकन प्रतियोगिता, काव्य आवृत्ति प्रतियोगिता,निबंध प्रतियोगिता, हिंदी साहित्य,व्याकरण व राजभाषा ज्ञान प्रतियोगिता के विविध वर्गों में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को नंद जी स्मृति पुरस्कार, नारायण दुबे स्मृति पुरस्कार, डॉ. गोरखनाथ मिश्र स्मृति पुरस्कार, गोपाल प्रसाद स्मृति पुरस्कार, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना स्मृति पुरस्कार, अज्ञेय स्मृति पुरस्कार, डॉ. भोला प्रसाद सिंह स्मृति पुरस्कार, प्रो. डॉ.चंद्रकला पांडेय स्मृति पुरस्कार एवं डॉ. सूर्य देव शास्त्री स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विविध प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार पाने वाले प्रतिभागियों का नाम इस प्रकार रहा।चित्रांकन- ‘अ’ शिशु वर्ग- रौनक जयसवाल ( गुरुकुल ग्लोबल स्कूल) ‘ब’ वर्ग- अनन्या चौधरी (गौरीपुर हिंदी हाई स्कूल) ‘स’ वर्ग-संजना साव (काॅंचरापाड़ा काॅलेज) काव्य-आवृति ‘अ’ वर्ग- अनुष्का सिंह (शिक्षा निकेतन) ‘ब’- वर्ग-आर्यन यादव (शिक्षा निकेतन) ‘स’ वर्ग- अनामिका गुप्ता(ऋषि बंकिमचन्द्र काॅलेज फाॅर विमेन) निबंध ‘अ’ वर्ग – अनुप्रिया गुप्ता(गुरुकुल ग्लोबल) ‘स’ वर्ग-सुमन कुमारी राम (ऋषि बंकिमचन्द्र काॅलेज फाॅर विमेन) हिंदी ज्ञान प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता- रिया चौधरी (कलकत्ता विश्वविद्यालय) साक्षी साव (हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा)।इसके अलावा प्रतियोगिताओं में आने वाले द्वितीय,तृतीय और सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को भी पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षा डॉ इंदु सिंह व वरिष्ठ लेखिका माला वर्मा और ग्रंथागार के सदस्यों ने सम्मानित करते हुए उन्हें श्रीफल,अंग वस्त्र, सम्मान-पत्र, उपहार और सम्मान राशि भेंट की एवं डॉ. बिक्रम कुमार साव ने सम्मान पत्र का वाचन किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. इंदु सिंह ने कार्यक्रम को सुचारू रूप से संपन्न करने हेतु सभी के योगदान की प्रशंसा करते हुए आभार व्यक्त किया
नरगिस जो बनीं सिनेमा जगत की ‘शम्मी आंटी’
हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार रहे हैं, जिन्होंने मुख्य भूमिका में कम, लेकिन सहायक किरदारों के जरिए दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। उन्हीं में से एक थीं नरगिस रबादी, जिन्हें पूरी दुनिया ‘शम्मी आंटी’ के नाम से जानती है। कम ही लोग जानते हैं कि उनके नाम के साथ भी एक किस्सा जुड़ा हुआ है। 24 अप्रैल को उनकी जयंती के मौके पर जानते हैं उनके नाम से जुड़ी कहानी। जब 18 साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों में कदम रखा, तब उनका नाम ‘नरगिस’ था, लेकिन बाद में उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा। यही बदलाव आगे चलकर उनकी पहचान बन गया और वह ‘शम्मी आंटी’ के नाम से मशहूर हो गईं। नरगिस रबादी का जन्म 24 अप्रैल 1929 को मुंबई में एक पारसी परिवार में हुआ था। मात्र तीन साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई, जो पारसी समुदाय की धार्मिक सभाओं में खाना बनाकर गुजारा करती थीं। उनकी बड़ी बहन मणि रबादी फैशन डिजाइनर थीं और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हुई थीं।
इन परिस्थितियों के बीच माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद नरगिस ने एक कंपनी में सेक्रेटरी के रूप में नौकरी शुरू की। मात्र 18 साल की उम्र में उन्होंने फिल्म जगत में कदम रखा। साल 1949 में उन्हें अपनी पहली फिल्म ‘उस्ताद पेड्रो’ मिली। फिल्म के निर्माता और अभिनेता शेख मुख्तार दूसरी हीरोइन की तलाश में थे। नरगिस से मुलाकात हुई तो वे उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने उन्हें फिल्म में भूमिका दे दी, लेकिन समस्या नाम की आ गई। उस समय अभिनेत्री नरगिस दत्त पहले से ही काफी मशहूर थीं। नाम में टकराव से बचने के लिए शेख मुख्तार ने नरगिस रबादी को नाम बदलने को कहा। इसी दौरान उनका नाम ‘शम्मी’ पड़ा। शुरू में तो नाम रखने में काफी परेशानी हुई, लेकिन बाद में ‘शम्मी’ ही उनकी पहचान बन गई।
‘उस्ताद पेड्रो’ के बाद उन्हें ‘मल्हार’ फिल्म में मुख्य भूमिका मिली, जो गानों के कारण सुपरहिट रही। धीरे-धीरे शम्मी की दिलीप कुमार, नरगिस दत्त जैसी बड़ी हस्तियों के साथ गहरी दोस्ती हो गई। नरगिस दत्त उनकी सबसे अच्छी सहेली बन गईं। 30 साल की उम्र में शम्मी ने फिल्म निर्माता सुल्तान अहमद से शादी कर ली, लेकिन ये रिश्ता ज्यादा नहीं चल सका और सात साल बाद दोनों अलग हो गए। उनकी कोई संतान नहीं थी।
शुरुआत में लीड रोल करने वाली शम्मी बाद में सहायक भूमिकाओं में ज्यादा चमकीं। ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, ‘हाफ टिकट’, ‘द ट्रेन’, ‘कुदरत’, ‘हम साथ-साथ हैं’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार दर्शकों को हमेशा याद रहे। 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में उन्होंने ‘कुली नंबर 1’, ‘हम’, ‘गुरुदेव’, ‘गोपी किशन’ जैसी फिल्मों में दादी के रोल में दर्शकों का दिल जीता। उन्होंने कुल 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।
फिल्मों के अलावा टीवी पर भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं थी। ‘देख भाई देख’, ‘जबान संभाल के’, ‘श्रीमान श्रीमती’, ‘कभी ये कभी वो’ और ‘फिल्मी चक्कर’ जैसे सीरियलों में उनकी कॉमेडी टाइमिंग की खूब तारीफ हुई। अपनी प्यारी मुस्कान, मासूम चेहरा और सहज अभिनय के कारण वे घर-घर में ‘शम्मी आंटी’ बन गईं। साल 2013 में आई फिल्म ‘शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी’ में उन्होंने बोमन ईरानी के साथ काम किया।
6 मार्च 2018 को 88 वर्ष की आयु में शम्मी आंटी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
माता कैकेयी ने मुंह दिखाई में जनकनंदिनी को दिया महल
रामनगरी अयोध्या की पावन भूमि पर रामजन्मभूमि के अलावा और भी कई मंदिर हैं, जो अपने आप में भक्ति की कथा को समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर है कनक भवन, जो न केवल एक मंदिर बल्कि प्रेम, स्नेह और पारिवारिक मर्यादाओं का प्रतीक भी है। यहां राम पंचायत का अद्भुत मंदिर है, जहां भगवान श्रीराम, माता सीता और अन्य परिवारजनों की मूर्तियां ऐसी व्यवस्था में विराजमान हैं जैसे कोई सच्ची राम पंचायत बैठी हो। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सीता के अयोध्या पहुंचने पर माता कैकेयी ने उन्हें ‘मुंह दिखाई’ के रूप में यह भव्य महल उपहार में दिया था। कहा जाता है कि त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम का माता जानकी से विवाह हुआ, तब विवाह की रात्रि में श्रीराम के मन में विचार आया कि अयोध्या में सीता जी के लिए एक सुंदर भवन होना चाहिए। उसी क्षण महारानी कैकेयी को स्वप्न में एक दिव्य महल दिखाई दिया। उन्होंने यह सपना राजा दशरथ से साझा किया और अयोध्या में उसी महल की प्रतिकृति बनाने का आग्रह किया। राजा दशरथ के अनुरोध पर देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा जी ने स्वयं इस भवन का निर्माण किया, जो भव्य और खूबसूरत है। माता सीता को यह भवन स्नेहपूर्वक उपहार स्वरूप दिया गया था। यह उनका व्यक्तिगत महल था, जहां वे आराम और विश्राम कर सकें। कनक भवन की भव्य दीवारें, शांत प्रांगण और अलौकिक वातावरण आज भी उस युग की खूबसूरती, पारिवारिक प्रेम और सम्मान की कहानी सुनाते हैं। वर्तमान कनक भवन का जीर्णोद्धार 19वीं शताब्दी में ओरछा के राजा सवाई महेन्द्र प्रताप सिंह की धर्मपत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि ने करवाया था। 1891 ईस्वी में यहां प्राचीन मूर्तियों के साथ दो नए राम-सीता विग्रहों की भी स्थापना की गई।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान श्रीराम और माता सीता की सुंदर प्रतिमाएं विराजमान हैं। मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और कलाकृति देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है। राम जन्मभूमि के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित यह मंदिर अपनी भव्यता और पवित्रता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां आज भी भगवान श्रीराम और माता सीता भ्रमण करने आते हैं।
कनक भवन न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि रघुकुल की परंपराओं, आपसी प्रेम और पारिवारिक बंधनों को भी जीवंत रखता है। जब भी श्रद्धालु अयोध्या आते हैं तो कनक भवन के दर्शन अवश्य करते हैं। यहां का शांत वातावरण मन को शांति प्रदान करता है। मंदिर में राम परिवार की मूर्तियां ऐसी लगती हैं मानो वे सजीव बैठकर राम पंचायत कर रहे हों।
त्रेता युग की झलक दिखाते कनक भवन पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो अयोध्या से 152 किलोमीटर दूर है। अन्य हवाई अड्डे फैजाबाद-गोरखपुर (158 किमी), प्रयागराज (172 किमी) और वाराणसी (224 किमी) हैं।
वहीं, फैजाबाद और अयोध्या रेलवे स्टेशन प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़े हैं। लखनऊ से फैजाबाद 128 किमी और अयोध्या 135 किमी दूर है। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसें 24 घंटे उपलब्ध हैं। लखनऊ से अयोध्या सड़क मार्ग द्वारा 172 किलोमीटर की दूरी है।
परशुराम जयंती एवं शिवाजी जयंती मनाई गयी
कोलकाता । रविवार गत 19 अप्रैल 2026 को परिवार मिलन द्वारा परशुराम जयंती एवं शिवाजी जयंती बड़े ही उत्साह एवं उल्लास से मनाई गई। कार्यक्रम का प्रारंभ परिवार मिलन द्वारा संचालित संकल्प विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा डाॅ अरुण प्रकाश अवस्थी की ‘परशुराम का आह्वान’ शीर्षक कविता पाठ से हुआ। वपरशुराम जी की कविता पाठ से हुआ।
टी बोर्ड इंडिया के उपनिदेशक वरिष्ठ साहित्कार डॉ. ऋषिकेश राय ने परशुराम जी के जीवन चरित्र को बड़े ही मनमोहक रूप में श्रोताओं के मध्य प्रस्तुत किया। वरिष्ठ साहित्यकार तथा काव्य-वीणा सम्मान से सम्मानित तथा ‘युगपुरुष छत्रपति शिवाजी’ महाकाव्य के रचयिता रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र पर भावपूर्ण वक्तृता प्रेषित की।उन्होंने शिवाजी महाराज के जीवन की विभन्न घटनाओं का उल्लेख करते हुए उनके साहसी एवं रणनीतिकार स्वरूप पर विशेष प्रकाश डाला।
रक्षा मंत्रालय के रक्षा लेखा विभाग मेँ अनुवादक अमरनाथ सिंह ने रीतिकाल के वीररस के कवि भूषण के छन्दों का पाठ किया तथा संस्था के वरिष्ठ सदस्य श्री राजेन्द्र कानूनगो ने पठित छन्दों का अनुवाद कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया।
संस्था के पूर्वाध्यक्ष दुर्गा व्यास ने अतिथि वक्ताओं का परिचय देते हुए स्वागत किया, संस्था की पूर्व प्रधान सचिव अंजू गुप्ता ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। संस्था के न्यासी श्री महाबीर प्रसाद जी मणक्सिया जी ने संकल्प विद्यालय के विद्यार्थियों को उपहार देकर उनका मनोबल बढ़ाया। अन्त में संस्थाध्यक्ष श्री अरुण चूड़ीवाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सचिव अमित मूंधड़ा, रीना व्यास एवंसंकल्प विद्यालय की शिक्षिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।




