Sunday, May 31, 2026
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मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी

रेखा श्रीवास्तव

आज मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी पढ़ी। वैसे यह कहानी पहले भी पढ़ी थी। जितनी बार पढ़ती हूँ, उतनी ही बार कुछ नया लगता है। सबसे बड़ी खास बात लगती है कि उनकी कहानी पात्रों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। स्पष्ट तरीके से लिखती है। यह कहानी भी वैसी ही है। नाम से ही स्पष्ट है कि ज्ञान देने वाली स्त्री। यह एक चिट्ठी है, अपनी प्यारी बहनों के नाम। आज के समय में तो चिट्ठी का नामों निशान नहीं। इसलिए यह और भी ज्यादा प्रासंगिक है। इसके माध्यम से आज की लड़कियों को चिट्ठी का ज्ञान भी होगा। और सबसे बड़ी बात है कि लड़कियाँ जो कम उम्र की होती है, शादीशुदा आदमी से प्रेम कर बैठती है। शादीशुदा इंसान उसके भोले भाले मन का बहुत अच्छे से फायदा उठाता है। वह बहुत ही साधारण भाषा में स्कूल, कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों को बताना चाहती है कि जब वह नौकरी में आयीं, तो उनको अपने ही बॉस शिंदे से प्रेम हो गया। पुरुष अपना घर, परिवार बचाते हुए ही बाहरी प्रेम कैसे जिंदा रखते हैं। वह अपनी मीठी-मीठी बातों से कम उम्र की लड़कियों का दिल ले लेते हैं और उनकी भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं। शिंदे उम्मीद दिलाता रहता है कि वह सारे सुख देगा, लेकिन वहीं बहुत चालाकी से यह भी स्पष्ट करता रहता है कि उसको पत्नी के नाम से ही कितनी चिढ़ है। वह इस कहानी के माध्यम से कहना चाहती है कि यह ज्ञान देने के चक्कर में उनकी गृहस्थी तक टूट सकती है, लेकिन फिर भी वह अपने प्यार के बारे में बताकर युवतियों को बचाना चाहती है। वह लड़कियों को खुलेआम सावधान करती है कि शादीशुदा का बाहरी प्यार छलावा के अलावा कुछ भी नहीं है। वह अपनी पत्नी से प्रेम करें या न करें, लेकिन उनकी गृहस्थी की गाड़ी यथावत चलती रहती है। घर, मकान बनता रहता है, बच्चे भी बड़े होते रहते हैं और सारी जिम्मेदारियाँ भी चलती रहती है। बस, उन सब से थकने पर उन्हें बाहर एक सुकून भरी जगह चाहिए, बस प्रेमिका मात्र उतना ही स्थान बना पाती है। युवतियाँ चाहे कितने भी सपने देख लें, कितने भी साल लगा दें, लेकिन उसकी जिंदगी वैसी ही वैसी ही वीरान रह जायेगी। जब शिंदे को लगता है कि उसकी पत्नी को उसके प्यार के बारे में शक हो सकता है, तो तुरंत अपना तबादला करवा लेता है। यानी अपने घर-गृहस्थी पर कोई आंच नहीं देना चाहता है। कहानी के अंत में वह स्पष्ट करती हैं कि अगर प्रेम करना है तो शादी शुदा औरतें ही शादीशुदा पुरुषों से प्यार करें, जिससे ना ही किसी को कोई उम्मीद हो, प्रेम हो, जब तक प्रेम किये , प्रेम किये वापस अपने खूटे पर। उन्होंने यह बात व्यंग्य में की है, या वास्तव में । यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन उनकी कहानी पढ़ने के बाद सोचने पर विवश करती है। इसलिए शायद मुझे उनकी कहानी अच्छी लगती है। इस कहानी में जहाँ एक तरफ आगाह है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के लिए एक रास्ता भी दिखाया गया है। वहीं, दूसरी तरफ यह भी समझा जा सकता है कि 42 वर्षीय महिला जब कम उम्र में थी अपने ही बॉस से प्रेम कर बैठती है, लेकिन वह चाहती है कि मेरी तरह अन्य कोई लड़की शादीशुदा पुरुष से प्रेम में न फंसे, इसलिए आगाह करने के लिए अपनी बहनों को यह पत्र लिखती है और कहती है कि अगर प्रेम करना ही है तो शादीशुदा महिलाओं को ही शादीशुदा पुरुषों से प्रेम करना चाहिए, जिससे कुछ भी खोने जैसा नहीं होता। प्रेम हुआ तो बढ़िया, नहीं तो अपने खूटे में वापस। मेरे ख्याल से यह शादीशुदा पुरुष, जो कम उम्र की लड़कियों से प्रेम करते हैं, उन्हें सपना दिखाते हैं और वह सालों बाद भी केवल उसको प्रेमिका बना कर रखते हैं। उन पुरुषों का राज खुलेआम खोल कर पुरुषों का चरित्र चित्रण किया है। या फिर यह भी कहना चाहती होंगी कि हम महिलाएं हमेशा कुछ खोये, यह तो कोई जरूरी नहीं। जिस तरफ शादीशुदा पुरुष बाहर प्यार करके कुछ भी खोता नहीं है, उसी तरह महिलाएं भी कुछ खोये नहीं।

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