Tuesday, July 7, 2026
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सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन

भारतीय लोककला जगत के लिए 5 जुलाई 2026 का दिन एक अपूरणीय क्षति लेकर आया। छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण से सम्मानित लोक कलाकार डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स  में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। पिछले कई सप्ताह से उनका उपचार चल रहा था और 27 मई से वे अस्पताल में भर्ती थीं। चिकित्सकों के अनुसार उन्होंने तड़के लगभग 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स रायपुर प्रशासन ने की। तीजन बाई के निधन से केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला, साहित्य और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित अनेक राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक हस्तियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
डॉ. तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला साधना नहीं छोड़ी। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाएं सुनने और गाने का शौक था। उनके नाना से उन्हें पंडवानी की प्रारंभिक शिक्षा मिली। महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह किशोरी आगे चलकर भारतीय लोककला का सबसे बड़ा चेहरा बनेगी।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं का गायन, अभिनय और कथा-वाचन एक साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कलाकार केवल गाता ही नहीं बल्कि अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और संगीत के माध्यम से पूरे महाभारत को जीवंत कर देता है।
इस लोकशैली की दो प्रमुख विधाएं हैं—
  • वेदमती शैली – बैठकर गायन।
  • कापालिक शैली – खड़े होकर नाटकीय अभिनय के साथ प्रस्तुति।
तीजन बाई पहली महिला कलाकार थीं जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को अपनाकर सामाजिक परंपराओं को चुनौती दी। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
जब तीजन बाई ने कापालिक शैली में प्रस्तुति देना शुरू किया, तब समाज के एक बड़े वर्ग ने इसका विरोध किया। उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। हाथ में तंबूरा लेकर जब वे मंच पर महाभारत के पात्रों को जीवंत करती थीं, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय, सहज संवाद शैली और मंच संचालन ने पंडवानी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
तीजन बाई ने केवल भारत ही नहीं बल्कि फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय लोककला का परचम लहराया। विदेशी दर्शक उनकी भाषा भले पूरी तरह न समझ पाते हों, लेकिन उनके अभिनय, भाव और प्रस्तुति की ऊर्जा सभी को मंत्रमुग्ध कर देती थी। यही कारण है कि आज पंडवानी का नाम विश्वभर में सम्मान के साथ लिया जाता है।
लोककला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए—
  • पद्मश्री (1988)
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
  • पद्म भूषण (2003)
  • पद्म विभूषण (2019)
इनके अलावा उन्हें देश-विदेश के अनेक सांस्कृतिक सम्मानों से भी सम्मानित किया गया।
तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान थीं। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रतिभा परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की आत्मा और महाभारत की अमर गाथा को अपनी बुलंद आवाज के माध्यम से उन्होंने पूरी दुनिया तक पहुंचाया। उनका जाना भारतीय लोककला के इतिहास में एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनकी आवाज भले आज खामोश हो गई हो, लेकिन पंडवानी के हर स्वर, हर कथा और हर मंच पर तीजन बाई सदैव जीवित रहेंगी।
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