फिर इतिहास लिखूँगी

सुषमा त्रिपाठी

आनन्द प्रकाशन

वर्ष 2018

उपलब्धताअमेजन तथा आनन्द प्रकाशन, कोलकाता

किताब के बारे में – 14 नारी पात्रों की कहानी आत्मकथानक शैली में आज के युग के अनुरूप कही गयी है। किताब में जो चित्र हैं, वह कवियित्री ने खुद बनाये हैं। द्रौपदी, कुन्ती, सरस्वती जैसे पात्रों को एक अलग दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है।

कालक्रम के प्रहार से खण्डहर में बदल गयी प्रस्तर मूर्तियों को कालकर उनका पुनरुद्धार करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है। इसी प्रकार इतिहास के धूलि धूसरित पन्नों में दर्ज स्त्री अस्मिता की घुट रही भिव्यक्ति को स्वर देना भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है। स्त्री मुक्ति और स्त्री विमर्श की इस इक्कसवीं सदी में कवयित्री सुषमा त्रिपाठी ने अपने कविता सँग्रह ‘फिर इतिहास लिखूँगी’ में स्त्री अस्मिता के प्रश्न को एक अलग दृष्टिकोण से, संवेदना के धरातल से उठाने का प्रयास किया है। अस्मिता का यह प्रश्न स्त्री के अस्तित्व से ही जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि उसके अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति समाज के दृष्टिकोण से टकराते हुए उद्भभूत हुआ है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों में – हम कौन थे? क्या हो गए हैं? और क्या होंगे अभी? आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी (इसी किताब से)

 

शुभजिता

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