अंग्रेजी भाषा का शब्द Juggernaut (जिसका अर्थ होता है एक ऐसी विशाल और अजेय शक्ति जिसे रोका न जा सके) दरअसल भगवान ‘जगन्नाथ’ के नाम और उनकी रथयात्रा के विशाल रूप को देखकर ही लिया गया है। आपने श्री जगन्नाथ मंदिर के चमत्कारों के बारे में सुना होगा, चलिए अब जानते भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के बारे में 12 रोचक जानकारी –
1. हर साल बनते हैं नए रथ – रथयात्रा के लिए हर साल तीनों रथों (भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ) का निर्माण नए सिरे से किया जाता है। खास बात यह है कि इनमें किसी भी तरह के धातु, कील या नट-बोल्ट का इस्तेमाल नहीं होता। पूरा रथ केवल लकड़ी और जोड़ लगाने की पारंपरिक तकनीकों से बनता है। इन रथों को बनाने वाले कारीगरों को ‘भोई सेवक’ कहा जाता है। वे बिना किसी आधुनिक नक्शे या इंजीनियरिंग टूल्स के, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सीखी गई पारंपरिक नाप (हाथ और उंगलियों के नाप) से इतने विशाल रथों का सटीक ढांचा तैयार कर देते हैं।
2. नीम के पेड़ों की खोज –रथों को बनाने के लिए किसी भी साधारण पेड़ की लकड़ी काम में नहीं ली जाती। इसके लिए ‘दारू’ (विशेष नीम के पेड़) की खोज की जाती है। इन पेड़ों पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के प्राकृतिक निशान होने चाहिए। इसके लिए दशपल्ला के जंगलों से विशेष पेड़ चुने जाते हैं और वसंत पंचमी के दिन से लकड़ी काटने की अनुमति मिलती है।
3. छेरा पहरा – रथयात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति राजा खुद आकर सोने की मूंठ वाली झाड़ू से रथ के रास्तों और मंडप की सफाई करते हैं। इस रस्म को ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है, जो यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब एक समान हैं। सोने की झाड़ू से रथ के चबूतरे को साफ करते हैं और चंदन का पानी छिड़कते हैं। इसके बाद ही रथों को खींचने की अनुमति मिलती है।
4. रथों के अलग रंग, नाम और पहियों की संख्या – तीनों भाई-बहनों के रथों का आकार, रंग और नाम अलग-अलग होते हैं। नंदीघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ (लाल और पीले रंग का)। तालध्वज: भाई बलभद्र का रथ (लाल और हरे रंग का)। दर्पदलन: बहन सुभद्रा का रथ (लाल और काले रंग का)।
पहियों की संख्या: नंदीघोष में 16, तालध्वज में 14 और दर्पदलन रथ में 12 पहिये होते हैं। इन पहियों के निर्माण का भी अपना एक खास ज्योतिषीय महत्व होता है।
5. 15 दिनों तक बीमार होते हैं भगवान -रथयात्रा से ठीक पहले (ज्येष्ठ पूर्णिमा को) भगवान को 108 घड़ों के पानी से स्नान कराया जाता है, जिसे ‘स्नान यात्रा’ कहते हैं। इसके बाद मान्यता है कि भगवान बीमार हो जाते हैं और 15 दिनों तक एक विशेष कक्ष में आराम करते हैं, जिसे ‘अनासर’ कहा जाता है। इस दौरान भक्तों को उनके दर्शन नहीं होते और उन्हें केवल काढ़े का भोग लगाया जाता है।
6. गुंडीचा मंदिर – यह यात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर करीब 3 किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर तक जाती है, जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है। यहाँ तीनों भाई-बहन 7 दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर वापस लौटते हैं, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ कहा जाता है। यह यात्रा ‘बड़ा डांड’ (पुरी की मुख्य चौड़ी सड़क) से होती हुई 3 किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर पहुंचती है। माना जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडीचा के सम्मान में भगवान यहाँ आते हैं, क्योंकि उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
7. पहांडी बीजे –इसका मतलब है भगवान को गर्भगृह से रथों तक लाना। यह बहुत ही मनमोहक दृश्य होता है। सेवक भारी-भरकम काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियों को मखमली तकियों के सहारे धीरे-धीरे झुलाते हुए, शंख और नगाड़ों की गूंज के बीच मंदिर से बाहर लाते हैं। सुभद्रा जी को सेवक हाथों में उठाकर लाते हैं, जबकि जगन्नाथ जी और बलभद्र जी को विशेष गद्देदार रस्सियों के सहारे लाया जाता है।
8. मजार पर रुकता है रथ – पुरी में ‘बड़ा डांड’ (मुख्य मार्ग) पर स्थित यह मज़ार पर रथ को रोका जाता है। 17वीं शताब्दी के मुस्लिम कवि सालबेग भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे। वे रथयात्रा के रास्ते में ही कुटिया बनाकर रहते थे। एक बार रथयात्रा के समय वे पुरी से बाहर थे और समय पर नहीं पहुंच पा रहे थे। उन्होंने व्याकुल होकर भगवान से तब तक रुकने की प्रार्थना की, जब तक वे दर्शन न कर लें। जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ उनकी कुटिया के पास पहुंचा, वह अचानक वहीं रुक गया। हाथी-घोड़े और लाखों श्रद्धालु मिलकर भी उसे टस से मस नहीं कर पाए। रथ तभी आगे बढ़ा जब सालबेग ने वहां पहुंचकर भगवान के दर्शन कर लिए। सालबेग की मृत्यु के बाद उसी स्थान पर उनकी मज़ार बनी। आज भी उनकी भक्ति के सम्मान में रथयात्रा के दौरान भगवान का रथ कुछ देर के लिए इस मज़ार पर ज़रूर रोका जाता है।
9. रथों के खींचने का क्रम और यात्रा का मार्ग – लाखों श्रद्धालु विशाल रस्सियों (जिन्हें ‘शंखचूड़’ कहा जाता है) के सहारे रथों को खींचना शुरू करते हैं। रथों को आगे बढ़ाने का एक तय नियम है: सबसे आगे भाई बलभद्र का रथ ‘तालध्वज’ चलता है। बीच में बहन सुभद्रा का रथ ‘दर्पदलन’ चलता है। सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ चलता है।
10.हेरा पंचमी – यात्रा के पांचवें दिन एक बेहद दिलचस्प रस्म होती है। माता लक्ष्मी (भगवान जगन्नाथ की पत्नी) नाराज होकर गुंडीचा मंदिर आती हैं क्योंकि भगवान उन्हें मुख्य मंदिर में ही छोड़ आए थे। गुस्से में माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के रथ का एक टुकड़ा तोड़ देती हैं और गुपचुप तरीके से ‘हेरा गोहरी’ मार्ग से वापस लौट जाती हैं।
11. बहुड़ा यात्रा –9 दिन पूरे होने पर आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान वापस मुख्य मंदिर के लिए निकलते हैं। वापसी में रथ थोड़ी देर के लिए ‘मौसी मां मंदिर’ पर रुकता है, जहाँ भगवान को उनका पसंदीदा ‘पोड़ा पीठा’ (चावल और गुड़ से बना एक विशेष पैनकेक) भोग लगाया जाता है।
12. लक्ष्मी जी को मनाने की अंतिम रस्म (नीलाद्रि बिजे) – जब भगवान वापस मुख्य मंदिर पहुंचते हैं, तो माता लक्ष्मी गुस्से में मंदिर का मुख्य दरवाजा बंद कर देती हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ के सेवकों और माता लक्ष्मी की दासियों के बीच एक मजेदार संवाद (गीतों के रूप में) होता है। अंत में, भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को मनाने के लिए उन्हें ‘रसगुल्ला’ उपहार में देते हैं। इस मीठी मनुहार के बाद माता लक्ष्मी दरवाजा खोलती हैं और भगवान दोबारा गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इस अंतिम रस्म को ‘नीलाद्रि बिजे’ कहा जाता है।
(साभार – वेबदुनिया)




