सनातन धर्म की पौराणिक गाथाएं अंतर्मन को तृप्त कर देती हैं। भगवान शिव की जटा से निकली मां गंगा की पवित्र कथा ऐसी ही एक अलौकिक कहानी है। यह प्रसंग केवल एक पावन नदी के उत्पत्ति की पौराणिक व्याख्या भर नहीं है, बल्कि यह सिखाता है कि निश्छल भक्ति ईश्वर को आपके समीप तो ला सकती है, लेकिन उस दिव्य ऊर्जा को संभालने के लिए अनुशासन और मानसिक ठहराव की जरूरत होती है। यही कारण है कि इस पूरी गाथा में देवों के देव महादेव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भगवान शिव दिव्य शक्ति के नियंत्रक बनकर पूरे संसार के रक्षक की भूमिका निभाते हैं। जानते हैं कैसे…
शिव जी ने क्यों गंगा को अपनी जटाओं में बांधा?
इस उत्तर को समझने के लिए सबसे पहले राजा भगीरथ के चरित्र को जानना जरूरी है। भगीरथ को अटूट संकल्प और निष्काम कर्म का सबसे अच्छा उदाहरण माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा भगीरथ के पूर्वजों (राजा सगर के साठ हजार पुत्रों) की आत्माएं मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही थीं। भगीरथ का अटूट विश्वास था कि केवल मां गंगा का पावन जल ही उनके पूर्वजों के पापों से शांति प्रदान कर सकता है।
भगीरथ की तपस्या
भगीरथ की तपस्या कोई साधारण पूजा-पाठ नहीं थी। यह एक अत्यंत कठिन, धैर्यपूर्ण और बिना झुके की जाने वाली साधना थी। भगीरथ ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया ताकि मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति मिल सके। ऐसा ही हुआ, लेकिन शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग से उतरते समय मां गंगा का वेग और प्रवाह इतना तेज था कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर गिरतीं, तो उनके प्रचंड प्रहार से पूरी धरती रसातल में चली जाती और विनाश हो जाता। इससे मां गंगा को अहंकार हो गया।
जब टूटा मां गंगा का अहंकार
इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए इस कथा में भगवान शिव का आगमन होता है। बता दें, जब गंगा का प्रचंड वेग पृथ्वी की ओर बढ़ा, तब भगवान शिव ने अपने मस्तक पर अपनी जटाएं खोल दीं और गंगा की उस विशाल धारा को जटाओं के जाल में समेट लिया। गंगा शिव की जटाओं में पूरी तरह से बंदी बनकर रह गईं और उनका अहंकार व प्रचंड वेग पूरी तरह शांत हो गया। इसके बाद महादेव ने अपनी जटाओं से गंगा की अत्यंत शांत और छोटी-छोटी धाराएं पृथ्वी पर बहने के लिए मुक्त कीं।
शिव-गंगा की कथा का सार
शिव द्वारा गंगा को धारण करने की घटना में एक रहस्य छिपा हुआ है। कई लोग यह सोचते हैं कि शिव ने गंगा को रोक लिया था, लेकिन वास्तव में उन्होंने गंगा को रोका नहीं था, बल्कि उसे सही दिशा में मोड़ा था। महादेव ने गंगा की शक्ति को न तो खारिज किया और न ही उनके अस्तित्व को दबाया। इसके बजाय वे इतने स्थिर बने कि उस ऊर्जा को अपने भीतर समा सके। रोज के जीवन में हमारे सामने भी कई तरह की प्रचंड ऊर्जाएं आती हैं, जैसे अत्यधिक क्रोध, लालसा, सफलता, गहरा दुख। यदि ये भावनाएं हमारे जीवन पर सीधे और बेकाबू होकर गिरेंगी, तो हमारे संबंध और मानसिक शांति दोनों छिन्न-भिन्न हो जाएंगे।
(साभार – हर जिंदगी डॉट कॉम)




