दीपंकर एडबार
रानाघाट (नदिया) । बंगाल में दुर्गापूजा की तैयारियां शुरू होते ही पारंपरिक सूती गमछे की मांग एक बार फिर बढ़ने लगी है। दुर्गापूजा, कालीपूजा और जगद्धात्री पूजा से लेकर विवाह, उपनयन और अन्नप्राशन जैसे सामाजिक-धार्मिक आयोजनों में आज भी गमछे का इस्तेमाल जारी है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी तौलिये के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद पसीना पोंछने, आसानी से साथ ले जाने और जल्दी सूखने जैसी खूबियों के कारण सूती गमछे की अपनी अलग जगह बनी हुई है। लेकिन बाजार में मांग कायम रहने के बावजूद इस पारंपरिक उत्पाद को बनाने वाले करघे धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं।
कारीगरों के अनुसार, समस्या मांग की कमी से ज्यादा उत्पादन लागत और बाजार कीमत के बीच बढ़ते अंतर की है। सूत और बिजली की कीमत बढ़ने के साथ-साथ पावरलूम पर तैयार होने वाले सस्ते पॉलिएस्टर मिश्रित गमछों ने हाथ से बुने गमछों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
दशकों से इस पेशे से जुड़े कारीगर कंचन विश्वास के अनुसार, कभी नदिया के गमछे की मांग बंगाल के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी थी। मुंबई सहित कई शहरों में इसकी आपूर्ति होती थी और विदेशों तक भी माल भेजा जाता था। लेकिन अब वह बाजार काफी सिमट गया है। उनका कहना है कि महंगे सूत और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण कारीगरों को उचित मजदूरी देना मुश्किल हो रहा है। नतीजतन नई पीढ़ी इस पेशे में आने से कतरा रही है।
अनुभवी कारीगर अरुण मित्र के मुताबिक, एक शुद्ध सूती गमछे की कीमत करीब 120 से 132 रुपये पड़ती है। इसके मुकाबले पावरलूम पर बने पॉलिएस्टर गमछे 60-70 रुपये में बाजार में उपलब्ध हैं। कीमत में लगभग आधे का अंतर होने के कारण आम खरीदारों का एक वर्ग सस्ते विकल्प की ओर जा रहा है। इससे हाथ से बुने सूती गमछों का बाजार लगातार दबाव में है।
त्योहारों के दौरान हालांकि ऑर्डर कुछ बढ़ जाते हैं। पूजा-पर्व और सामाजिक आयोजनों के कारण गमछे की मांग में मौसमी तेजी आती है। लेकिन कारीगरों का कहना है कि बढ़े हुए ऑर्डर का फायदा उनकी आय में उसी अनुपात में नहीं पहुंचता। कच्चे माल, बिजली और मजदूरी की बढ़ती लागत के कारण अतिरिक्त उत्पादन का मुनाफा बेहद सीमित रह जाता है।
सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। कारीगरों का दावा है कि पूरे दिन काम करने और एक से अधिक करघे या मशीन चलाने के बावजूद 400-500 रुपये प्रतिदिन कमाना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में युवा पीढ़ी इस पारंपरिक पेशे के बजाय दूसरे रोजगार की तलाश कर रही है।
इससे बंगाल के गमछा उद्योग के सामने एक अजीब स्थिति पैदा हो गयी है-बाजार में गमछे की मांग अभी भी है, लेकिन उसे बनाने वाले हाथ लगातार कम हो रहे हैं।
कारीगरों और उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कच्चे माल की कीमत, बाजार तक पहुंच, उचित मजदूरी और सस्ते मशीन निर्मित उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर प्रभावी सरकारी सहायता जरूरी है। अन्यथा आने वाले वर्षों में बंगाल का पारंपरिक गमछा बाजार में तो दिखाई देगा, लेकिन उसे बनाने वाले पारंपरिक करघे और कारीगर धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं।




