बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इतिहास के एक ऐसे पन्ने को छेड़ दिया, जहां दुख, दर्द, त्याग और वेदना छिपी है… जौहर। उन्होंने मोटे तौर पर जौहर करने वाली औरतों को कायर कहा है। उनकी दलील है कि अगर कोई मुझसे जबरन ‘संबंध’ बनाने आता है, तो क्या मुझे जान दे देनी चाहिए। स्वरा का जवाब है, नहीं।
इस मामले पर कोई भी ठोस राय बनाने से पहले जौहर का इतिहास समझना जरूरी है। आखिर जौहर क्या था… और स्त्रियां इसे क्यों करती थीं।
राजस्थान के इतिहास में जौहर की कई प्रमुख घटनाओं का जिक्र मिलता है। चित्तौड़ में 1303, 1535 और 1568 के तीन जौहर सबसे प्रसिद्ध हैं। 1535 में बहादुर शाह के हमले के बाद रानी कर्णावती की अगुआई में जौहर हुआ। 1568 में अकबर की चित्तौड़ विजय के दौरान जौहर हुआ। रणथंभौर में 1301 में अलाउद्दीन खिलजी और चंदेरी में 1528 में बाबर की जीत के बाद भी जौहर के उल्लेख मिलते हैं।
चित्तौड़ के 1303 वाले जौहर को रानी पद्मिनी से जोड़ा जाता है। हालांकि, पद्मिनी की कहानी का सबसे विस्तृत उल्लेख 1540 में मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत में मिलता है। 1303 के समकालीन स्रोतों में उनका जिक्र नहीं है। लेकिन, कुल मिलाकर ये तो साफ है कि राजस्थान में जौहर की परंपरा रही है। अब सवाल उठता है कि क्यों?
अब फर्ज कीजिए कि आप एक किले के भीतर बंद हैं। दुश्मनों ने चारों तरफ से किले को घेर रखा है। महीनों बीत गए। खाने-पीने का सामान खत्म होता जा रहा है। हर दिन लड़ाई हो रही है। किले की दीवारें टूट रही हैं। आपको पता है कि कहीं से मदद की कोई आस नहीं है।
फिर एक दिन फैसला होता है… आखिरी फैसला। पुरुष आखिरी लड़ाई के लिए किले का दरवाजा खोलकर बाहर निकलेंगे। उन्हें पता है कि वे वापस नहीं आएंगे। इसे ‘शाका’ कहते हैं। जैसे महिलाओं के लिए जौहर था, वैसे पुरुषों के लिए शाका। मतलब कि आत्म बलिदान। शाका में किले के पुरुष केसरिया वस्त्र पहनकर अंतिम लड़ाई के लिए निकलते थे, सिर पर कफन बांधकर।
अब किले के भीतर महिलाएं और बच्चे रह जाती हैं। उनके सामने सवाल रहता है कि जीतने वाली सेना उनके साथ क्या सलूक करेगी। शायद बुरा सलूक, शायद बहुत ही बुरा सलूक। यही अनिश्चितता जौहर की परंपरा की जड़ है। जौहर करने वाली औरतें आग से नहीं डरती थीं, ऐसा कहना इतिहास को छोटा कर देना होगा। वे जरूर डरती होंगी।
आग में जलना दर्दनाक है। जौहर करने वाली महिलाओं में गर्भवती महिलाएं भी रही होंगी। कुछ के हाथ में छोटे बच्चे रहे होंगे। कुछ की गोद में नवजात रहे होंगे। कुछ ने तो ठीक से दुनिया देखी भी नहीं होगी। तो फिर जिंदा आग में जाने का फैसला क्यों करती थीं?
इसका जवाब सिर्फ ‘जबरदस्ती’ का खौफ नहीं कहा जा सकता। बेशक जबरदस्ती होने का डर था। बल्कि ये तकरीबन तय ही था। लेकिन दर्द की दुनिया उससे भी बड़ी है। युद्ध हारने के बाद स्त्रियों का क्या होगा? उन्हें कौन ले जाएगा? बच्चों का क्या होगा? उन्हें किस बाजार में बेचा जाएगा? वे किसकी ‘संपत्ति’ बन जाएंगी। उन्हें खरीदने वाला उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा? क्या पति और बेटे उनकी आंखों के सामने मार दिए जाएंगे?
और सबसे डरावनी बात शायद ये थी कि किसी को नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है।
मध्यकालीन युद्ध में हारने वालों की जिंदगी अक्सर जीतने वालों की गुलाम हो जाती। पुरुषों को मार दिया जाता था। बंदी बना लिया जाता। औरत और बच्चे दास बन जाते। स्त्रियों को घरेलू काम, दरबारों या हरमों में भेजा जा सकता था। उन्हें ‘यौन दासी’ बनाया जा सकता था। यह कोई बाद की फिल्मी कल्पना न थी। दिल्ली सल्तनत के स्रोतों में महिला दासों और उपपत्नियों का विस्तार से जिक्र है।
इसलिए किले में बैठी किसी महिला के लिए डर सिर्फ इतना नहीं था कि उसके साथ जबरदस्ती होगी। डर यह था कि उसकी पूरी जिंदगी अब उसकी नहीं रहेगी। उसका शरीर। उसकी शादी। उसका धर्म। उसके बच्चे। उसका नाम। उसकी पहचान। सब किसी दूसरे के हाथ में जा सकते हैं।
यही वह जगह है, जहां जौहर का मनोविज्ञान शुरू होता है। उनके सामने दो रास्ते होते थे। पहले में मौत तय थी। दूसरे में कुछ भी तय नहीं था। कई बार अनिश्चित और लगातार चलने वाला भय तत्काल मृत्यु से भी ज्यादा असहनीय हो सकता है। आग में उतरने वाली महिला जानती थी कि आगे क्या होगा। चंद पलों में सब खत्म।
लेकिन दुश्मन के हाथ जिंदा पड़ने पर क्या होगा? उन्हें नहीं पता था। शायद किसी को नहीं पता था।
राजपूत समाज में स्त्रियों को घर और कुल मर्यादा भी समझा जाता था। बेशक आज बहुत से लोग इसे पितृसत्तामक कहते हैं। लेकिन, स्त्रियां परिवार, कुल और राज्य की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई थीं। राजा की पत्नी का बंदी बनना सिर्फ एक महिला की निजी त्रासदी नहीं माना जाती। वो पूरे राजवंश की राजनीतिक हार होती थी।
जौहर की हर महिला के पास एक जैसा विकल्प नहीं था। हमारे पास किसी जौहर की सामूहिक महिला गवाही नहीं है। आग में उतरने से पहले हजारों महिलाओं ने क्या सोचा, इसकी कोई डायरी नहीं है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि हर महिला पूरी तरह अपनी इच्छा से गई। लेकिन ये भी नहीं कह सकते कि हर महिला को जबरदस्ती धकेल दिया गया।
कुछ महिलाएं शायद पूरी तरह दृढ़ थीं। कुछ डर रही होंगी। कुछ अपने बच्चों के लिए गई होंगी। कुछ अपने परिवार के साथ। कुछ शायद इसलिए गई होंगी क्योंकि उनके सामने कोई दूसरा सामाजिक रास्ता ही नहीं था। और कुछ के लिए आग सचमुच उस जिंदगी से बेहतर लगी होगी, जिसकी कल्पना उन्होंने दुश्मन के हाथ पड़ने के बाद की थी।
यहीं जौहर का सबसे अहम सवाल पैदा होता है, जिसका स्वरा भास्कर ने जिक्र किया है। क्या किसी महिला के लिए जिंदा रहना हमेशा बेहतर विकल्प था?
आज इसका हां में जवाब देना बहुत आसान है। क्योंकि आज बहुत से लोगों के लिए ‘यौन संबंध’ शायद सिर्फ आनंद का विषय हैं। लेकिन, उस भीषण बर्बरता युग में ऐसा न था। आज तो प्रगतिशील लोग महिलाओं को वैवाहिक जीवन में एक थप्पड़ पर तलाक की वकालत करते हैं। मगर उस स्त्री के बारे में सोचिए, जिसकी हर एक सांस किसी की गुलामी में बीतने वाली थी।
उन महिलाओं के पास बाहर की दुनिया से संपर्क नहीं था। किसी दूसरे शहर में काम खोजने का सवाल नहीं था। कानून उसके अधिकार की रक्षा नहीं करने वाला था। किसी महिला आश्रय गृह का सवाल नहीं था। उसके पास पासपोर्ट नहीं था कि किसी दूसरे देश चली जाए। इसलिए आज की परिस्थितियों के हिसाब से उन्हें कायर बताना या उनके पक्ष को न समझना बहुत गलत होगा।
उन महिलाओं की पूरी दुनिया किले की दीवारों के भीतर थी। युद्ध में हार के बाद वह दुनिया खत्म होने वाली थी। जौहर का विचार शायद इसी जगह सबसे ताकतवर बनता है। जब कोई व्यक्ति सोचने लगता है कि उसकी पुरानी दुनिया पूरी तरह खत्म हो चुकी है, तो उसके लिए ‘बाद में क्या होगा’ की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है।
और जौहर ही क्यों, मरने के तो और भी तरीके हो सकते थे? जहर, कुआं, तालाब…। ये सवाल भी अक्सर उठता है। इसका जवाब भी इतिहास देता है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के 2025 में International Review of the Red Cross में प्रकाशित एक शोध में कहा गया कि युद्ध में जीत के बाद मृत शरीरों के साथ यौन कृत्य होते रहे हैं। कई मामलों में ये यौन इच्छा के बजाय वर्चस्व, अपमान, हिंसा और शत्रु को नीचा दिखाने का मामला होता था।
यही वजह है कि चित्तौड़ की प्रमुख घटनाओं को केवल धार्मिक, जातीय या नारीवाद के चश्मे से देखना गलत होगा। हर जौहर के पीछे अलग युद्ध था। अलग राजनीति थी। अलग शासक थे। लेकिन किले के भीतर बैठी महिलाओं के सामने पैदा होने वाला भय लगभग एक जैसा रहा होगा।
और उस भय से बचने के लिए बहुत सी राजपूत स्त्रियों ने आत्म बलिदान चुना। पुरुषों ने भी चुना। क्या जिन पुरुषों ने युद्ध में हार तय जानकर भी आत्म बलिदान किया, वो कायर थे? फिर स्त्रियों ने भी तो वही किया, बस वो उन्होंने अलग रणभूमि चुनी। बेशक मैं यहां जौहर का महिमामंडन नहीं कर रहा। शायद होना भी नहीं, क्योंकि वो ऐतिहासिक अतीत का भीषण जख्म है।
लेकिन जौहर का मजाक तो नहीं बनना चाहिए। जौहर करने वाली स्त्रियों या शाका करने वाले पुरुषों को कायर नहीं कहा जाना चाहिए। ये उनका अपमान होगा।
(इतिहास की बात फेसबुक पेज से साभार)




