पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही रहस्यों और संघर्षों से भरा है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता और अटूट आस्था की जीती-जागती कहानी है। हजारों वर्षों से यह रथयात्रा जारी है। आइए इसके प्रारंभ से लेकर इतिहास की मुख्य घटनाओं को संक्षिप्त में जानते हैं।
पौराणिक शुरुआत (सतयुग) –पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस यात्रा की शुरुआत सत्ययुग में राजा इंद्रद्युम्न के काल में हुई थी। जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियाँ महावेदी पर बनकर तैयार हुईं, तो उन्हें मुख्य मंदिर में स्थापित करने के लिए पहली बार रथों पर बैठाकर लाया गया था। तभी से हर साल इस यात्रा को मनाने की परंपरा शुरू हुई।
द्वापर युग की कथा – एक अन्य कथा के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण और बलराम कुरुक्षेत्र में अपनी गोपियों और वृंदावन वासियों से मिले, तो गोपियों ने कृष्ण के रथ की रस्सियों को खींचकर उन्हें वापस वृंदावन (मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर के प्रतीक रूप में) ले जाने का प्रयास किया था। ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी पुरी की ‘गुंडीचा यात्रा’ (रथयात्रा) का विस्तृत वर्णन मिलता है।
ऐतिहासिक प्रमाण (5वीं से 12वीं शताब्दी) – पांचवीं शताब्दी (400 ईस्वी) में भारत आए चीनी यात्री फ़ाहियान ने भी भारत में ऐसे रथ उत्सवों का वर्णन किया है।
इतिहासकारों और प्रामाणिक अभिलेखों के अनुसार, रथयात्रा का आधुनिक और भव्य रूप 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा चोडगंग देव और राजा अनंगभीम देव के शासनकाल में शुरू हुआ। उन्होंने ही वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया और रथयात्रा को राजकीय उत्सव का दर्जा दिया।
2. इतिहास की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं और आक्रमण
जगन्नाथ मंदिर और इसकी रथयात्रा पर इतिहास में कई बार विदेशी और मुग़ल आक्रमणकारियों ने हमले किए। इन हमलों के दौरान रथयात्रा को रोकने और मूर्तियों को नष्ट करने की कोशिशें की गईं, लेकिन सेवकों की सूझबूझ से भगवान हमेशा सुरक्षित रहे।
रक्तबाहु का आक्रमण (सबसे पुराना व्यवधान) – मंदिर के इतिहास (मादला पांजी) के अनुसार, प्राचीन काल में ‘रक्तबाहु’ नाम के एक राजा ने पुरी पर हमला किया था। भगवान की मूर्तियों को बचाने के लिए सेवकों ने उन्हें समुद्र के रास्ते ले जाकर सोनपुर (गोपाली) में ज़मीन के नीचे छिपा दिया था। लगभग 146 वर्षों तक भगवान वहां छिपे रहे और इस दौरान रथयात्रा पूरी तरह बंद रही। बाद में सोमवंशी राजाओं ने मूर्तियों को वापस लाकर मंदिर स्थापित किया।
सुल्तान इलियास शाह और फिरोज शाह तुगलक के हमले (14वीं सदी) -1340 ईस्वी में बंगाल के सुल्तान शम्सुद्दीन इलियास शाह ने ओडिशा पर हमला किया, जिसके कारण मूर्तियों को गुप्त स्थान पर छिपाना पड़ा।
1360 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने आक्रमण कर मंदिर को नुकसान पहुँचाया, जिससे रथयात्रा कुछ समय के लिए बाधित हुई।कालापहाड़ का खूंखार हमला (1568 ईस्वी) -यह जगन्नाथ इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। बंगाल के सुल्तान के सेनापति कालापहाड़ ने पुरी पर आक्रमण किया और मूर्तियों को उखाड़कर हुगली (गंगा) नदी के किनारे ले जाकर जलाने की कोशिश की।
लेकिन एक परम भक्त ‘बिसरा मोहंती’ ने अपनी जान जोखिम में डालकर भगवान के भीतर मौजूद ‘ब्रह्म पदार्थ’ (जो कभी नष्ट नहीं होता) को बचा लिया और उसे सुरक्षित छुपा दिया। बाद में राजा रामचंद्र देव ने नई मूर्तियां बनवाकर उस ब्रह्म पदार्थ को दोबारा स्थापित किया। इस हमले के कारण 9 वर्षों (1568 से 1577 ईस्वी) तक रथयात्रा पूरी तरह बंद रही थी।
मुग़ल सूबेदार तकी खान का हमला (1731 ईस्वी) – मुग़ल काल में ओडिशा के नायब नाज़िम तकी खान ने मंदिर पर बार-बार हमले किए। भगवान को हमलों से बचाने के लिए सेवकों ने मूर्तियों को चिल्का झील की एक गुफा में छिपा दिया था। उस दौरान भी कई सालों तक रथयात्रा पुरी के मुख्य मार्ग पर नहीं हो सकी थी।
3. आधुनिक इतिहास की कुछ खास घटनाएं
1971 में बांग्लादेश (धमराई) की रथयात्रा पर हमला -पुरी के बाद दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी और विशाल रथयात्रा वर्तमान बांग्लादेश के धमराई में होती थी (जो करीब 500 साल पुरानी थी)। 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने वहां के ऐतिहासिक 60 फीट ऊंचे विशाल रथ को जलाकर नष्ट कर दिया था। बाद में भारत सरकार की मदद से वहां दोबारा नया रथ बनाया गया।
वैश्विक पहचान (1967) –इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद के प्रयासों से 1967 में पहली बार भारत से बाहर सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) की सड़कों पर भव्य जगन्नाथ रथयात्रा निकाली गई। आज यह उत्सव लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क समेत दुनिया के 100 से अधिक देशों में मनाया जाता है।
कोविड-19 काल (2020-2021)-सदियों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब सुप्रीम को के आदेशानुसार रथयात्रा तो निकाली गई, लेकिन उसमें आम श्रद्धालुओं के आने पर पूरी तरह प्रतिबंध था। केवल मंदिर के पुजारियों और सेवकों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए रथ खींचा था।
तमाम इतिहास, 18 से अधिक बड़े आक्रमणों और आपदाओं के बावजूद भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा कभी थमी नहीं। आज भी हर साल यह उत्सव उसी ऊर्जा, भव्यता और अटूट आस्था के साथ मनाया जाता है।
(साभार – वेेबदुनिया)




