Friday, August 28, 2026
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पहाड़ से लटका यह 500 साल पुराना गाँव

कभी विदेशियों का आना था प्रतिबंधित
नयी दिल्ली : ओमान की पहाड़ी चट्टानों में पिछले पांच सौ वर्षों से अधिक समय से एक दूरदराज बसी जनजाति एकाकी जीवन बिता रही है। मस्कट के बलुआ तटों से 195 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में ओमान का मैदानी इलाका चूना पत्थरों के एक ऊंचे पहाड़ों में तब्दील हो जाता है। 2980 मीटर ऊंचा यह पहाड़ जबाल-अल-अखदार या हरे पहाड़/ग्रीन माउंटेन के रूप में भी जाना जाता है। घुमावदार घाटियों और गहरे खड्डों से भरपूर यह देश का एक सुदूरवर्ती कोना है। सड़क खत्म होते ही आगे बढ़ने का तरीका या तो पैदल या खच्चर से या फिर ऑल टेरेन व्हिकल से रह जाता है। 20 किलोमीटर का टेढ़ा-मेढ़ा लेकिन खड़ी ढलानों वाला रास्ता चढ़ने के बाद एक खड्ड के उस पार पहाड़ी की कगार पर लगभग हवा में लटका हुआ घरों का एक छोटा सा समूह दिखाई देता है। यही अल सोगारा है। एक ऐसा दूरदराज वाला गांव जो पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है और जहां लोग पिछले 500 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं। हालांकि, ग्रीन माउंटेन को ओमान के एक अद्भुत परिदृश्य का दर्जा दिया जाता है लेकिन कुछ ही यात्री अल सोगारा पहुंच पाते हैं। वर्ष 2005 तक इस पहाड़ी श्रृंखला में विदेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित था, क्योंकि ओमान सरकार की इस क्षेत्र में एक सैन्य टुकड़ी थी। इन दिनों इस छोटे से गांव में आने-जाने के लिए आपको अपना वाहन एक पत्थरीले मार्ग के अन्त में छोड़ना होता है और फिर खड्ड के तले से ऊपर उठती हुई चट्टानी सीढ़ियों की 20 मिनट की चढ़ाई करनी पड़ती है। इस क्षेत्र में इस तरह के कई सारे गांव हैं लेकिन अल सोगारा ही ऐसा है जो अब भी बसा हुआ है। मुख्य पहाड़ी शहर सेह कताना से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर बसा अल सोगारा इस क्षेत्र का सबसे एकाकी गांव है और पूरे ओमान में सबसे सुदूरवर्ती बसे हुए प्रदेशों में से है। 14 साल पहले तक अल सोगारा में बिजली या फोन नहीं होते थे और इसकी सबसे पास की सड़क 15 किलोमीटर दूर थी। परम्परागत रूप से सामान की आवाजाही पास के निजवा और बिरकत अल मूज शहरों से खच्चरों द्वारा की जाती थी। लेकिन 2005 में, कुछ जुगाड़ू गांव वालों ने पत्थरीली सड़क तक खड्ड के ऊपर दो गड़ारियां लगाकर घाटी से सड़क तक की केबल सवारी तैयार कर ली जिससे सामान ढोया जा सके।स्थानीय बाशिंदों को ऐसा वक्त याद नहीं आता जब अल सोगारा में 45 से अधिक की आबादी रही हो। स्कूल न होने के कारण पुरानी पीढ़ियों ने घर पर ही लिखना-पढ़ना सीखा। लेकिन, 1970 के दशक से बच्चे 14 किलोमीटर दूर स्थित शहर सैक के स्कूल में जाने लगे। वहां जाने के लिए उन्हें गांव की संकरी सीढ़ी से उतरकर पहाड़ के दूसरी ओर तक पैदल जाना होता था जहां से एक कार उन्हें स्कूल तक छोड़ती थी। अल सोगारा में अपना पूरा जीवन बिताने वाले छात्र मोहम्मद नासेर अलशरीकी कहते हैं, ‘हम यहां रहते हैं और हमें इस जगह से लगाव है. लोग भिन्न होते हैं लेकिन उन्हें मातृभूमि से हमेशा प्यार होता है।’ आज इस पहाड़ी बसेरे में अलशरीकी जनजाति के पांच परिवार रहते हैं। ये पूरा समूह जॉर्डन से 1000 वर्ष पहले यहां आया और समूचे ओमान में बस गया। यहीं पर जन्मे और पले-बढ़े सलेम अलशरीकी बताते हैं कि अल सोगारा में इस वक्त केवल 25 गांव वाले हैं, गांव छोटा है इसलिए रहने वाले कम हैं। सलेम और दूसरे बाशिंदों के मुताबिक ये सभी गांव वाले अल सोगारा में 500 साल से अधिक समय से पहले आए अपने एक पूर्वज की देन हैं। इतनी पीढ़ियों के बाद भी अलशरीकी समुदाय ने प्राचीन पद्धति से घर बनाने की कला बरकरार रखी है जिसमें या तो चट्टान और चिकनी मिट्टी इस्तेमाल होती थी या फिर चट्टान को काटकर ही बसेरे बनाए जाते थे। सलेम बताते हैं, ‘हमारे पूर्वजों ने यहां आकर बाहर से भीतर की ओर दीवारें बनाई और पहाड़ों में ही रहे। अंदर से हमारे घर गुफाओं की तरह हैं। यदि दीवारें न हों तो आपको पहाड़ में एक गुफा ही दिखेगी।’ समुद्र तट से 2700 मीटर ऊपर बसा अल सोगारा ओमान के उन कुछ स्थानों में से है, जहां नियमित रूप से बर्फबारी होती है। इस बारे में मोहम्मद नासेर अलशरीकी बताते हैं, ‘यहां बहुत भीषण ठंड पड़ती है। हम चूना पत्थरों और चिकनी मिट्टी से अपने घर बनाते हैं जिससे ग्रीन माउंटेन पर पड़ने वाली ठंडक से बचा जा सके और गर्मियों में भी राहत रहे।’गांव वालों के अनुसार, उनके पूर्वजों ने वहां के सीमित संसाधनों का प्रयोग कर पहाड़ी पर टंगे उनके आवास तैयार किए जिसमें पत्थरों को पीसकर पानी में मिलाया गया और चिकनी मिट्टी की दीवारें बनाई गईं या फिर चूना पत्थरों को काटकर चट्टानों में ही कमरे तैयार किए गए। गांव वाले न केवल पहाड़ काटकर अपना घर बनाते हैं बल्कि इन्हीं घरों में अपने पशुओं के झुंडों को भी रखते हैं। कई सदियों से अल सोगारा के परिवार इन गुफाओं के मुहाने पर बाड़ लगाते हैं जिससे जंगली जानवरों से अपने पशुओं की सुरक्षा की जा सके।अलशकीरी जनजाति की तरह क्षेत्र के अन्य लोगों में भी पशुओं का अर्थ समृद्धि से है। जिस व्यक्ति के पास जितनी ज्यादा बकरियां, भेड़ें और खच्चर हों, वह उतना ही सम्पन्न माना जाता है। मोहम्मद नासेर बताते हैं कि पशुपालन के साथ वे खेती भी करते हैं और अनार, खजूर, नाशपाती, आड़ू, अखरोट, संतरे, अंजीर, लहसुन, प्याज और अन्य सब्जियां उगाते हैं। ओमान और अरब क्षेत्र के अन्य देशों के लोगों की तरह ही अल सोगारा जनजाति भी आवभगत का एक परंपरागत तरीका अपनाती है, जिसमें गांव वाले घर आए मेहमानों को पूरे तीन दिन तक खिलाने-पिलाने के बाद ही घर में रूकने का कारण पूछते हैं।ओमान के दूरदराज के क्षेत्रों में जिंदगी चलाए रखने के लिए प्राचीन बसेरों ने सिंचाई की एक ऐसी कुशल प्रणाली विकसित की जिसे ‘अफ्लाज’ कहा जाता है। इसमें पानी को गुरूत्वाकर्षण शक्ति की मदद से भूमिगत स्रोतों से उठाकर सिंचाई की जाती है। 500 ईस्वी से प्रयोग में लाई जाने वाली इन नहरों की कभी इतनी अहमियत थी कि इनकी रक्षा के लिए जगह-जगह बुर्ज बनाए गए। अल सोगारा सहित आज पूरे ओमान में इस तरह की लगभग 3000 नहरें हैं जहां भूमिगत सोते से ‘अफ्लाज’ के जरिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन, जलवायु परिवर्तन के कारण 20 से 50 किलोमीटर लंबे कई सिंचाई मार्गों में अब पहले जैसा प्रवाह नहीं रहा। ग्रीन माउंटेन भी अब धूल का बलुआ पत्थर हो चला है।मोहम्मद नासेर ने समझाया कि ये नहरें सैकड़ों साल पहले यहां रहने वाले परिवारों ने बनवाई थीं। हर परिवार दूसरे से एक नहर साझा करता था और अपने हिस्से का पानी इस्तेमाल करता था। यह हिस्सा नहर बनाने में किए गए श्रमदान पर निर्भर करता था, लेकिन अब पानी कम होने के साथ-साथ हमारी फसल भी कम हो रही है। हाल के दिनों में अल सोगारा में उपलब्ध काम की कमी की वजह से यहां के बहुत सारे निवासी काम खोजने मस्कट और निजवा चले गए हैं। इससे इस सुदूर बसी चट्टानी दुनिया का भविष्य ही खतरे में पड़ गया है। बेशक कुछ गांव वाले कभी हरे-भरे रहे इन पहाड़ों से अब दूर चले गए हों, लेकिन यहां बचे हुए लोग प्रतिदिन सुबह उठकर बकरियों को चारा देने, अपने खजूर के पेड़ों से खजूर तोड़ने और पानी लाने के लिए ‘अफ्लाज’ तक जाने जैसे रोजमर्रा के काम अब भी कर रहे हैं। मोहम्मद नासेर की मानें तो, ‘भविष्य हमेशा वर्तमान पर निर्भर करता है यदि हम इस स्थान का ध्यान रखेंगे तो हमारी अगली पीढ़ी या हमारे नाती-पोते भी यही करेंगे। लेकिन यदि हम इन घरों की देखभाल नहीं करेंगे तो ये अगले 15 वर्षों में नष्ट हो जाएंगे।’

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