कोलकाता । तुलसी आज अपने समय की अपेक्षा वर्तमान समय में अधिक विरोध झेल रहे हैं, किंतु समाज, इतिहास, संस्कृति और मानस-पटल के केंद्र से उनके रचनात्मक अवदान एवं मानस-समृद्धि को कोई मिटा नहीं सकता। ये उद्गार हैं डॉ राहुल अवस्थी के जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उन्होंने कहा तुलसी पर लगाए गए आरोपों का उत्तर उनकी कृतियों में ही रेखांकित है। रामचरितमानस में उनकी मौलिक उद्भावनाओं का कोई सानी नहीं है। वर्तमान यांत्रिक दौर में तुलसी साहित्य की चर्चा अत्यंत प्रासंगिक है। तुलसी की रचनाएँ आज भी समाज और संस्कृति को दिशा देने की क्षमता रखती हैं।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ताजा टी.वी. के निदेशक एवं छपते–छपते के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर ने तुलसीदास की व्यापक मानवीय दृष्टि को रेखांकित करते हुए कहा, धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर तुलसी ने रामचरितमानस लिखा। उन्होंने वनवासी राम का चित्रण मनुष्य के रूप में किया और समाज को प्रेरणा दी कि मनुष्य अपने कर्मों से पूजा जा सकता है। उन्होंने तुलसी के साहित्य में निहित मानवतावादी चेतना और कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि को विशेष रूप से रेखांकित किया।
अतिथियों का सम्मान अरुण प्रकाश मल्लावत, महावीर बजाज, श्रीमोहन तिवारी ने उत्तरीय, पुस्तक एवं श्रीराम मंदिर का प्रतीक चिह्न देकर किया।
पुस्तकालय के उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आधुनिक युग में रामकथा पर अनेक काव्यों की रचना हुई है, किंतु तुलसीदास द्वारा प्रणीत राम-काव्य अपनी विशिष्टताओं के कारण अद्वितीय है।
पुस्तकालय की गतिविधियों तथा उसकी समृद्ध परंपरा का परिचय पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. कमल कुमार ने तथा पुस्तकालय अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय के प्राथमिक विभाग की छात्राओं द्वारा मंगलाचरण की मनोहारी प्रस्तुति से हुआ। इसके पश्चात् प्राथमिक विभाग की छात्राओं ने रामचरितमानस के चयनित पदों का भावपूर्ण गायन प्रस्तुत किया। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विभाग की छात्राओं ने ‘रामलला नहछू’ की सांगीतिक प्रस्तुति कर वातावरण को भक्तिरस एवं तुलसीमय बना दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में भागीरथ सारस्वत, दीनानाथ पांडेय, लक्ष्मी जायसवाल, रामजी पंडित, विवेक तिवारी, माधव राय, राहुल दास तथा पुस्तकालय के कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।




