Sunday, June 28, 2026
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अमझेरा जहाँ श्रीकृष्ण ने किया था रूक्मिणी हरण

मध्यप्रदेश के धार जिले में बसा कस्बा है अमझेरा। यही वह जगह है जहां से श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था। मंदिर के पीछे बनी नाली नुमा निशाल द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान है। भक्तों का मानना है कि यह मंदिर कामना पूर्ति करता है। यदि प्रेमी-प्रेमिका यहां आकर विवाह बंधन में बंधने की कामना करें तो वह जरूर पूरी होती है।  अमझेरा का इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है। कुंदनपुर, कुन्डिनपुर और अंबिकापुर के नाम से प्रसिद्ध यह नगर द्वापरकाल में कुंदनपुर के नाम से विख्यात था। यहां राजा भीष्मक का राज्य था। उनके पांच पुत्र थए रुक्मी, कूक्मरत, रुक्मबाहु, रुक्मकेश, रुक्ममाली और एक बेहद खूबसूरत पुत्री थी रुक्मणी।
तस्वीर – साभार अमका झमका मंदिर की फेसबुक वॉल

 

राजा भीष्मक ने रुक्मणि का विवाह चंदेरी के राजा शिशुपाल से तय कर दिया लेकिन रुक्मणि स्वयं को श्रीकृष्ण को अर्पित कर चुकी थी। जब उसे अपनी सखी से पता चला कि उसका विवाह तय कर दिया गया है तब रुक्मणि ने वृद्ध ब्राह्मण के साथ कृष्ण को संदेश भेजा। कृष्ण रुक्मणि का पत्र पाते ही कुंदनपुर की ओर निकल पड़े। रुक्मणि रोज अमझेरा के अंबिका मंदिर में पूजा के लिए आती थी। इसी अम्बिका माता के मंदिर से श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का हरण किया।

मंदिर के भीतर प्रतिमाएँ..

रुक्मिणि ने यहीं अंबिका माता की पूजी की। मंदिर के तीन फेरे लिए और श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने चार घोडों के रथ पर हरण कर लिया। जब श्रीकृष्ण रुक्मणि को लेकर जा रहे थे तब रुक्मणि के भाई रुक्मी ने उनका विरोध किया। श्रीकृष्ण ने रुक्मी को यहां से सवायोजन दूर भोजकट वन में बांध दिया। इस जगह को आज भी लोग भोपावर के नाम से जानते हैं।

कृष्ण कालीन इस मंदिर में प्राणप्रतिष्ठित अंबिका माता की मूर्ति को बेहद चमत्कारिक माना जाता है। पूरे विश्व में यह एकमात्र मूर्ति है जिसमें मां की योनी से सर्प निकलता है और शरीर पर तीन स्तन हैं। इसलिए इसे त्रिस्तनीय माता भी कहा जाता है। मां का मुख पश्चिम मुखी है। मंदिर के पास ही श्मशान है। इसलिए इस मंदिर को लोग तांत्रिक स्थल मानते हैं।

कृष्ण रुक्मणि का हरण करके ले जा रहे थे तब रुक्मणि के भाई रुक्मी ने कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था। इस समय श्री कृष्ण के रथ में चार घोड़े जुते हुए थे। उन्होंने इतनी तेजी से रथ दौड़ाया कि मंदिर के पिछले हिस्से में रथ के पहियों के निशान आ गए। यह निशान आज भी मौजूद हैं।

(साभार – श्रीराम टूरिज्म)

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