मिदनापुर, विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर भारतेन्दु जयंती और ‘हिंदी और जातीय एकता’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. दामोदर मिश्र ने किया। इस अवसर पर पंकज सिंह, प्रियंका गुप्ता, सुजाता सिंह, मेधा, रूपल साव, के. अनुशा, गायत्री, प्रियंका अग्रवाल ने आलेख प्रस्तुत किया तथा राहूल शर्मा, मिथिलेश, चंदना मंडल, प्रकाश त्रिपाठी, अनिल सरोज, रेशमी, सुजाता सिंह, खुशबू यादव, सुनील कुमार, शारदा ने स्वचरित कविताओं का पाठ किया। इसके साथ ही हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया था, जिसमें पहला स्थान सुनील कुमार का रहा और दूसरे स्थान पर के. अनुशा रही। डॉ. स्वाती वर्मा ने हिंदी की संवैधानिक स्थिति पर प्रकाश डाला। प्रो. प्रियंका मिश्र ने कहा कि हिंदी को दैनिक जीवन में शामिल किया जाना चाहिए तभी सही मायने में हिंदी का विकास होगा। डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि हिन्दी ने जातीय एकता को बल प्रदान किया है। नवोनीता दास ने काव्य संगीत की प्रस्तुति की। कार्यक्रम का सफल संचालन पंकज सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन मौसमी गोप ने किया।
दुर्गापूजा पर बीएफएस ने बच्चों को दिया मुस्कान का तोहफा
बेस्ट फ्रेंड्स सोसायटी (बीएफएस) ने हाल ही में रिफ्यूज के जरूरतमंद बच्चों को चादरें, तकिए और तकिए के कवर प्रदान किए। यह संस्था की स्वस्थ जीवनशैली परियोजना का अंग है। बीएफएस के प्रेसिडेंट राजीव लोढ़ा ने यह इन बच्चों को नींद और स्वस्थ जीवन देने में मददगार होगा। रिफ्यूज के बासुदेव ने संस्था के प्रयास की सराहना की।
साइंस्टिला 2016 का आयोजन
साइंस्टिला 2016 का आयोजन हाल ही में कलकत्ता विश्वविद्यालय में किया गया। गत 7 वर्षों से विज्ञान के प्रसार के उद्देश्य से युवा वैज्ञानिकों के इस फोरम विज्ञान पर आधारित प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती रही हैं। हर साल की तरह इस बार भी पोस्टर चित्रांकन, स्लोगन, लेखन और भाषण प्रतियोगिता और साइंस क्विज का आयोजन किया गया।
साइंस्टिला 2016 ईश्वर चंद्र विद्यासागर की 125वीं पुण्यतिथि और डेवी सेफ्टी लैम्प के 200 साल की पूर्ति को समर्पित था। विभिन्न शिक्षण संस्थानों के 200 विद्यार्थियों ने इन प्रतिभागियों ने भाग लिया। साइंस क्लब के प्रवक्ता भास्कर बसु ने बताया कि यह आयोजन विज्ञान के प्रति विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करेगी, ऐसी उनकी उम्मीद है।
लायंस क्लब ऑफ कोलकाता ने प्रदान किए गुरुकुल अवार्ड्स
शिक्षा के क्षेत्र में लायंस क्लब ऑफ कोलकाता, डिस्ट्रिक्ट 322बी2 का गुरुकुल अवार्ड्स काफी उल्लेखनीय है। हाल ही यह पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया जिनमें विभिन्न बोर्डों के मेधावी विद्यार्थियों, प्रिंसिपलों तथा शिक्षाविदों को सम्मानित किया गया। फेसेस के सहयोग से आयोजित इस पुरस्कार समारोह में फेसेस के प्रेसिडेंट इमरान जाकी, मिसेज इंडिया इंटरनेशनल ऋचा शर्मा, बेलारूस के कौंसुल जनरल सीताराम शर्मा के अतिरिक्त गुरुकुल अवार्ड्स के संस्थापक तथा चेयरमैन आशीष झुनझुनवाला भी उपस्थित थे। संस्था मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति भी देती है।
तस्वीरों में दिखी शोर से मुक्त कोलकाता की चाह
आधुनिक कोलकाता शोर से भरी जिंदगी का शहर है मगर कोलकाता को शोर नहीं चाहिए और वाहनों के हॉर्न से मुक्त कोलकाता की चाह दिखी एक चित्र प्रर्दशनी में।
यह प्रदर्शनी एक्रोपॉलिस मॉल की ओर से लगायी गयी थी जिसका उद्घाटन राज्य के परिवहन मंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने चित्रकार तथा सांसद जोगेन चौधरी की मौजूदगी में किया।
यह अपनी तरह की पहली प्रदर्शनी थी जिसमें हॉर्न के दुष्प्रभावों को 21 तस्वीरों के जरिए पेश किया गया और जागरूकता लाने की कोशिश की गयी।
इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर वड़ोदरा के सचिन कलुस्कर थे।
एक शाम: महाश्वेता देवी के नाम
हाल ही मेंं इंडियन वीमेन प्रेस क्लब ने प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी की स्मृति में एक भव्य आयोजन किया. इस अवसर पर अलग अलग क्षेत्र की नामी हस्तियों ने महाश्वेता देवी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपनी मुलाकातों और यादों को साझा किया। वरिष्ठ साहित्यकार नासिरा शर्मा, सांत्वना निगम, अपूर्वानंद, सोहेल कपूर, अंतरा देवसेन और अमिति सेन ने अपने अपने अनुभव सुनाये. महाश्वेता देवी के जीवन कला में रिकॉर्ड किये गए उनके बंगला इंटरव्यू का विडियो दिखाया गया, जिसें अंग्रेज़ी के सब-टाइटल्स थे.
एक महान हस्ती जिसने अपने जीवन कला में कई सामाजिक बंधन तोड़े और साथ ही नए आयाम खड़े किये. यानी उन्होंने जो तोडा उसके विघटन से हुए नुकसान की (अगर कोई नुकसान हुआ हो तो) भरपूर भरपाई भी की.
उनके अपने ही शब्दों में,” मैंने बहुत काम किया है. मैंने ढेरों ढेर कपडे धोये हैं, बहुत बहुत जनों के लिए खाना पकाया है, बड़े-बड़े और ढेरों ढेर बर्तन मांजे और धोये हैं.”लेखन उनके लिए इसी तरह का एक काम ही था. जिसे वे बेहद लगन और प्रेम के साथ करती थी. जीवन जीने के कई ज़रूरी तत्वों की तरह, जैसे सांस लेना और भोजन करना.
महाश्वेता देवी ने एक सामान्य मध्यवर्गीय जीवन जिया. उसे पूरी तरह जिया. उसे पूरी तरह स्वीकार किया. और फिर उसकी लाचार और नाकारा बंदिशों को तोड़ कर समाज को ख़ास कर स्त्री को एक नयी राह दिखाई. एक ऐसी राह जिस पर वे खुद चलीं. उसके कांटो से अपने पांवों को बिधवाया, पीड़ा सही, बहते खून को खुद ही साफ़ किया और साथ ही कई और जीवन सवारे.
उन्होंने अपने रोज़मर्रा के जीवन से स्त्री की आज़ादी को बहुत खूबसूरती से परिभषित किया. अपनी पहली शादी के नाकाम हो जाने के बाद वे कहती हैं, “मैं अब आज़ाद हूँ. और मुझे बड़ा अच्छा लगता है. कोई बंदिश नहीं. किसी को यह बताने की पाबंदी नहीं कि कहाँ गयी थी, क्यूँ गयी थी, किसके साथ गयी थी.”पुरुषों के लिए जो बाते सामान्य होती हैं उन्हें पाने के लिए स्त्रियों को कितना कड़ा संघर्ष करना पड़ता है इसकी वे जीवंत उदाहरण थी.
साधारण कद की साधारण दिखने वाली बेहद असाधारण व्यक्तित्व की स्वामिनी महाश्वेता देवी ने ‘हज़ार चौरासी की माँ‘ लिख कर जो ख्याति हासिल की वह ‘हज़ार चरौसी की माँ‘ ने जो आयाम खड़े किये उसके मुकाबले में शायद कम ही रही होगी। उनके पोते तथागत जो स्वयं एक पत्रकार है, ने भी अपने कई संस्मरण इस मौके पर साँझा किये. किस तरह एक दादी माँ अपने पोते को लाड करती थी. किस तरह जब जवाबदेही का वक़्त आता था तो कठोर अभिभावक का रूप धारण कर लेती थी. कि किस तरह उनके आख़िरी वक़्त में उनकी क्षीण देह को देख कर पूरा परिवार दुःख और लाचारी से जूझता रहा। अपूर्वानंद का अनुसार कैसे एक मध्यवर्ग की महिला मध्यवर्ग के तथाकथित संस्कारों को अस्वीकार करती है, लेकिन उसी मध्यवर्ग के कई आयामों को अपना संबल बना कर आगे बढ़ती है. और इस प्रक्रिया में समाज को बहुत कुछ नया दे कर जाती है. कैसे एक पढ़े लिखे परिवार की पढ़ी लिखी सुसंस्कृत महिला आदिवासिओं के जीवन को बेहद करीब से देख कर उनमें से एक हो कर, उन पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पूरे सिस्टम और सरकार के खिलाफ खडी हो जाती है. ये एक महाश्वेता देवी ही कर सकती थी. उन सा दूसरा उदाहरण खोजने से भी नहीं मिलेगा।
बाजार को अपनाकर भी हिन्दी अपनी पहचान मजबूत कर सकती है
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सुषमा त्रिपाठी
एक युवा और कर्मठ साहित्य व संस्कृतिप्रेमी से बात हो रही थी। वो प्रोफेशनल हैं और एक कॉरपोरेट कम्पनी में काम करते हैं, तनख्वाह भी अच्छी है मगर उनको एक ही परेशानी है। दरअसल, यह परेशानी तो हर सृजनात्मक व्यक्ति की है जो कुछ अलग और दूसरों के लिए करना चाहता है। यहाँ हम यह बता दें कि कुछ करने का मतलब सिर्फ कम्बल, चश्मा औऱ पाठ्यपुस्तकें या छात्रवृत्ति बाँटना नहीं होता। हालाँकि इसका भी अपना महत्व है औऱ यह जरूरी भी है मगर यह काफी नहीं है क्योंकि दान किसी को सक्षम नहीं बनाता। खैर, हम तो साहित्य और संस्कृति की बात कर रहे हैं जिसे हम बाजार के हाथ में छोड़ने को तैयार नहीं हैं मगर इस सच्चाई को भी हम दरकिनार नहीं कर सकते कि किसी काम को सुचारू रखना हो तो आप बाजार को नजरअंदाज नहीं कर सकते। किसी भी कार्यक्रम और योजना को चलाना हो तो आर्थिक सम्बल भी जरूरी होता है और इसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक जागरुकता भी जरूरी है। बस, हमारी बात का जो मुद्दा है, वह यही है क्योकिं हिन्दी को चाहने वालों और सराहने वालों की समस्या यहीं से शुरू होती है क्योंकि वे हिन्दी पर खर्च नहीं करते। उनके पास रेस्तरां, कॉन्वेंट स्कूल, मल्टीप्लेक्स समेत हर चीज पर खर्च करने की कूबत है मगर हिन्दी की किताबें, नाटक या किसी कार्यक्रम पर खर्च करना बोझ लगता है। वह तारीफ जी भरकर करेंगे, अच्छी – अच्छी बातें करेंगे मगर उसका उत्साह बढ़ाने के लिए टिकट या खरीदने की बात उनके दिमाग में नहीं आएगी। ये समस्या बांग्ला और अँग्रेजी के साथ नहीं है क्योंकि वहाँ लोग टिकट खरीदते हैं। पुस्तक मेले में बांग्ला व अन्य भाषाओं के स्टॉल पर उमड़ने वाली भीड़ उस रुचि को दर्शाती है और बुकसेलर्स एंड पब्लिशर्स गिल्ड का कारोबार साहित्य के साथ आयोजकों को भी ऊर्जा देता है कि वे लगातार तीन दशक से इतना भव्य आयोजन करते आ रहे हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि हिन्दी को बाजार को अछूत क्यों मानना चाहिए और बाजार के माध्यम से अगर हिन्दी का प्रचार करें तो क्या बुराई है? तालाब को साफ करना हो तो तालाब में घुसकर ही उसे साफ किया जा सकता है और अगर आप बाजार को तालाब समझते हैं तो आप उसमें घुसना होगा। जब आप बाजार में घुसेंगे तो उससे रोजगार जुड़ेगा और रोजगार जुड़ेगा तो जनता भी जुड़ेगी, ये तय है। अगर आप किसी कार्यशाला या प्रशिक्षण पर शुल्क लगाते हैं तो उसके जरिए होने वाली आय भले ही कम हो मगर उत्साह जरूर बढ़ाएगी। जब लोग खर्च करेंगे तो उस कार्यक्रम में गहराई से जुड़ेंगे और अगर कोई कमी हुई तो आपको बताएंगे क्योंकि उनकी कमाई का एक अंश इस कार्यक्रम से जुड़ा है। जो आय होती है, उससे आप किसी प्रतिभा को सामने लाने में मदद कर सकते हैं और यकीन मानिए हिन्दी से बाहर भी लोग हें जो रुचि रखते हैं। अगर साहित्य और इतिहास से जुड़े विषयों को ऑडियो – विजुअल माध्यम शिक्षण संस्थानों और बाजार में कुछ शुल्क लेकर पहुँचाया जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। मुकाबला करना हो तो वही हथियार आजमाना पड़ता है जो आपका शत्रु इस्तेमाल कर रहा है। हम मानते हैं कि अँग्रेजी हमारी शत्रु नहीं है मगर यह तो मानना होगा कि उसके पास बाजार की ताकत है और यही उसे मजबूत बना रही है। अगर सुल्तान के साथ हरिवंश राय बच्चन की सीडी रहती है तो क्या हर्ज है, कोई एक तो खरीदेगा। अगर प्रेमचंद की कहानियाँ सीडी या ऐप्स पर उपलब्ध हैं तो कोई क्यों नहीं इस्तेमाल करेगा। हिन्दी से प्रेम है तो पहले खरीद कर पढ़ने की आदत डालिए और किसी भी आयोजक, लेखक या प्रकाशक से, सिर्फ इसलिए कि आप समाज में स्थान रखते हैं, ये उम्मीद करना छोड़िए कि आप तक हर चीज निःशुल्क पहुँचे क्योंकि हर आयोजन पर मेहनत होती है और हर प्रकाशन में खर्च होता है। जब तक वह लागत नहीं निकलती या लाभ नहीं होता, ऐसे आयोजन लाभ में नहीं बदल सकते और लाभ नहीं होगा तो किसी भी युवा में इतनी ऊर्जा नहीं बचेगी कि दोबारा इस सृजन में उसी उत्साह से जुड़े क्योंकि उसको साहित्य के साथ घर भी चलाना है। अगर आय होगी तो घर भी प्रोत्साहित करेगा वरना यह वक्त की बर्बादी भर ही रहेगी और एक समय के बाद पत्रिका, प्रकाशन और आयोजन बंद हो जाएंगे जैसे कि आज हो रहे हैं। हम हिन्दी शिक्षण अथवा आयोजनों अथवा साहित्य को लेकर ऐप्स तैयार क्यों नहीं कर सकते? प्रतियोगिता बढ़ेगी तब लोग अपनी रचनाओं पर और मेहनत करेंगे जिससे सृजन और बेहतर होगा और जब प्रसार होगा तो साहित्य और संस्कृति, दोनों का विस्तार होगा और वह वहाँ पहुँचेगी, जहाँ आप चाहते हैं इसलिए खरीदने और खर्च करने की संस्कृति भी बेहद जरूरी है। डिजिटल इंडिया को हिन्दी में लागू करने की जरूरत है और जनता तक पहुँचना है तो हिन्दी को बाजार को अछूत मानना छोड़ना होगा। बाजार को अपनाकर भी हिन्दी अपनी पहचान मजबूत कर सकती है।
साड़ी पहनते वक्त भूलकर भी न करें ये गलतियां
पूजा सामने आ रही है और पूजा में साड़ी तो पहननी है। साड़ी ऐसा पहनावा है जो पारंपरिक होते हुए भी आपको हॉट लुक दे सकता है। सलीके से पहनी गई साड़ी जहां खूबसूरत फिगर को निखार सकती है वहीं आपके फिगर की कमियों को छिपा भी सकती है।दूसरी ओर, साड़ी बांधना एक ऐसी कला है जिसमें हुई छोटी सी चूक भी आपके लुक को बिगाड़ सकती है। जानिए, साड़ी पहनने के दौरान हमें किन गलतियों से बचना चाहिए।
सबसे पहले बात करते हैं साड़ी पहनते वक्त आपकी चप्पल कौन सी है। आपको जिस मौके के हिसाब से साड़ी पहननी है, उसमें आप कितनी हील पहनेंगी, इसका संबंध आपकी साड़ी के लुक से है।
साड़ी पहनते वक्त आप वहीं चप्पल पहनें जिसे पहनकर आप बाहर निकलेंगी। इससे साड़ी की लंबाई आपकी लंबाई से मेल खाएगी और साड़ी अधिक ग्रेसफुल लगेगी। हम यहाँ जो साड़ियाँ दिखाने जा रहे हैं वे अस्मित गारमेंट्स मेंं उपलब्ध हैे जो कि पत्रकार शिल्पी सिन्हा का कलेक्शन हैं। शिल्पी फिलहाल घर से ही ये काम कर रही हैं मगर उनकी हैंडप्रिंटेड साड़ी या टसर या सिल्क साड़ी आपका लुक एथेनिक बना सकती हैे –
ज्वेलरी और एसेसरीज
आप साड़ी बांधने के दौरान अगर बहुत अधिक पिन का इस्तेमाल करती हैं तो यहां आपसे चूक हो सकती है। साड़ी पिन लगाते वक्त यह सामने न आए, इसका ध्यान रखना जरूरी है। कोशिश करें कि सभी पिन साड़ी में ही छिप जाएं।
बहुत पतले फैब्रिक की साड़ी पर अधिक पिन लगाने से बचें क्योंकि इससे कपड़ा फटने का डर बना रहता है।
इतना ही नहीं, साड़ी के साथ आप अगर जी भर कर ज्वेलरी पहन रही हैं तो यह भी आपके लुक को खराब करने के लिए काफी है।
ज्वेलरी का चुनाव करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है कि किस साड़ी पर हेवी ज्वेलरी चलेगी और किस पर लाइट। हल्की साड़ी पर थोड़ी हेवी ज्वेलरी फबती है जबकि हेवी साड़ी को आप बिना ज्वेलरी या हल्की ज्वेलरी के साथ पहनें तो बेहतर होगा।
बहुत अधिक प्रयोग
साड़ी पहनने में अगर आप निपुण हैं तो यकीनन अलग-अलग मौकों के हिसाब से साड़ी के साथ प्रयोग करती होंगी। ऐसे में साड़ी के साथ आप जितना अधिक प्रयोग करेंगी, गलतियों का रिस्क उतना ही बढ़ेगा।
ऐसे में आप जिस तरह से साड़ी बांधने में माहिर हों, उसी के साथ प्रयोग करें। हो सके तो आप किसी तीसरे से जरूर राय ले लें।
आजकल साड़ी के साथ ब्लाउज में भी कई तरह के प्रयोगों का चलन है। ऐसे में आप किस साड़ी के साथ कौन सा ब्लाउज पहनेंगी, उसपर जरूर ध्यान दें। हेवी साड़ी के साथ सिंपल ब्लाउज, लाइट साड़ी के साथ हेवी और स्टाइलिश ब्लाउज बेहतर चुनाव हो सकता है।
शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी
किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। वास्तविक रूप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी है-शिक्षार्थी और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक।
तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं। यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। शिक्षण का धंधा देश में आधुनिक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
प्राचीनकाल की ओर देखें तब भारत में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु थे, अब शिक्षक हैं। शिक्षक और गुरु में भिन्नता है। गुरु के लिए शिक्षण धंधा नहीं, बल्कि आनंद है, सुख है। शिक्षक अतीत से प्राप्त सूचना या जानकारी को आगे बढ़ाता है, जबकि गुरु ज्ञान प्रदान करता है।
सूचना एवं ज्ञान में भी भिन्नता है। सूचना अतीत से मिलती है, जबकि ज्ञान भीतर से प्रस्फुटित होता है। गुरु ज्ञान प्रदान करता है और शिक्षक सूचना।
शिक्षा विकास की कुंजी है। विश्वास जैसे आवश्यक गुणों के जरिए लोगों को अनुप्रमाणित कर सकती है। विकसित एवं विकासशील दोनों वर्ग के देशों में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका समझी गई है। भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है।
इसे विडंबना ही कहें कि हम आज तक सर्व स्वीकार्य शिक्षा व्यवस्था कायम नहीं कर सके। उल्लेखनीय है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद आज 19 वर्ष की आयु समूह में दुनिया की कुल निरक्षर आबादी का लगभग 50 प्रतिशत समूह भारत में है। कहा जाता है कि तरुणाई देश का भविष्य है।
राष्ट्र निर्माण में युवा पीढ़ी की अहम भूमिका है। इस संदर्भ में भारत की स्थिति अत्यधिक शर्मनाक और हास्यास्पद ही मानी जा सकती है। देश में लगातार हो रहे नैतिक एवं शैक्षणिक पतन से हमारे युवा वर्ग पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
देश के विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष बेरोजगार नौजवानों की फौज तैयार करते जा रहे हैं। किसी ने ठीक ही कहा है – “सत्ता की नाकामी राजनीतिक टूटन को जन्म देती है।” हमारी राजनीतिक पार्टियां, जातियों में विघटित हो रही हैं।
परिणामस्वरूप मानव समाज आत्म केंद्रित और स्वार्थ केंद्रित होता जा रहा है। आज देश की राजनीति में काम और योग्यता का मूल्यांकन न होकर धन, बल और बाहुबल का बोलबाला है। लोकतंत्र के गौरव और प्रतिष्ठा का प्रतीक हमारी संसद वैचारिक प्रवाह चिंतन मनन की जगह द्वेष, कलह, झूठी शान और दिखावे के स्वर उभरते नजर आते हैं।
देश के कर्णधारों की कथनी-करनी के बीच बढ़ते अंतर ने मानव-मानव के बीच आस्था और विश्वास का संकेत खड़ा कर दिया है। व्यावसायिकता की आंच से मानवीय संवेदनाएं ध्वस्त हो रही हैं और हमारी कथित भाग्य विधाता शिक्षक समाज राष्ट्र में व्याप्त इस भयावह परिस्थिति को निरीह और असहाय प्राणी बनकर मूकदर्शक की भांति देखने को विवश हैं।
दुर्भाग्य से हमारे देश में समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत अत्यधिक दयनीय और जर्जर कर दी गई है।
शिक्षक शिक्षण छोड़कर अन्य समस्त गतिविधियों में संलग्न हैं। वह प्राथमिक स्तर का हो अथवा विश्वविद्यालयीन, उससे लोकसभा, विधानसभा सहित अन्य स्थानीय चुनाव, जनगणना, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा अन्य इस श्रेणी के नेताओं के आगमन पर सड़क किनारे बच्चों की प्रदर्शनी लगवाने के अतिरिक्त अन्य सरकारी कार्य संपन्न करवाए जाते हैं।
देश की शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षकों की मौजूदा चिंतनीय दशा के लिए हमारी राष्ट्रीय और प्रादेशिक सरकारें सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जिसने शिक्षक समाज के अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। शिक्षा वह है, जो जीवन की समस्याओं को हल करे, जिसमें ज्ञान और काम का योग है?
आज विद्यालय में विद्यार्थी अध्यापक से नहीं पढ़ते, बल्कि अध्यापक को पढ़ते हैं। वर्षभर उपेक्षा और प्रताड़ना सहन करने वाले समाज के दीनहीन समझे जाने वाले आज के कर्मवीर, ज्ञानवीर पराक्रमी और स्वाभिमानी शिक्षकों को 5 सितंबर को राष्ट्रीय राजधानी सहित देशभर में सम्मान प्रदान कर सरकार शिक्षक दिवस की औपचारिकता पूरी करती है।
संभावना आज की असीमित एवं अपरिमित है। निष्क्रिय समाज सक्रिय दुर्जनों से खतरनाक है। किसी महापुरुष द्वारा व्यक्त यह कथन हमें भयावह परिदृश्य से उबारने की प्रेरणा दे सकता है।
(लेखक द हेरिटेज स्कूल में शिक्षक हैं। आई०सी०एस०ई एवं आई०एस०ई० हिन्दी तथा पश्चिम बंगाल प्राथमिक तथा हिन्दी शिक्षकों की विभिन्न कार्यशालाओं का संचालन भी करते रहते हैं)
कहीं आप भी तो नहीं करते ये फैशन गलतियाँ!
पुरुषों द्वारा की जाने वाली फैशन संबंधित आम गलतियां उनके दिनचर्या में इस तरह घुल-मिल गई हैं कि उन्हें इन सामान्य या आम गलतियों के प्रभाव का एहसास भी नहीं होता। स्वयं को इस श्रेणी में शामिल होने से बचाने के लिए, नीचे दिए गए सुझावों का पालन करें तथा स्वयं को इस शर्मिंदगी से बचाकर सबसे श्रेष्ठ दिखें।
गलत माप वाले कपड़े – ज्यादातर पुरुष अपने शरीर के माप से भी अधिक खुले कपड़े पहनते हैं। सही फिटिंग वाले कपड़े आपको एक अलग पहचान दे सकते हैं। बैगी पैंट, एक बड़ी कमीज़ के लटकते कंधे आपकी एक अच्छी तस्वीर नहीं दर्शाते। अगर आपको बाज़ार में उपलब्ध बने बनाए कपड़े ठीक नहीं आते तो आप अपना माप किसी दर्जी को देकर अपने लिए कपड़े सिलवा सकते हैं।

आपकी पतलून की बाटम की लंबाई – आपकी पतलून की बाटम की लंबाई ना ज्यादा लंबी ना ज्यादा छोटी होनी चाहिए। अपनी चाइनो, खाकी पतलून या ड़ेनिम को बेवजह ना मोड़े, इसके बाटम को तभी मोड़े जब इस बेरंगी पतलून को पहने बिना आप रह नहीं पाते। आपकी पतलून, खाकी पतलून या चाइनो की लंबाई आपके जूते की एड़ी जितनी होनी चाहिए और जीन की लंबाई उससे और थोड़ी लंबी होनी चाहिए। पतलून इतनी लंबी नहीं होनी चाहिए कि वह फर्श को चूमती फिरे। आपकी पतलून या खाकी की लंबाई एक या आधी इंच कम होनी चाहिए, इतनी की आपकी पतलून का बाटम पूरे आपके पैरों तक पहुंचे। अगर आपकी पतलून का बाटम बड़ा है तो उसे किसी दर्जी से कटवाकर छोटा करा लें।
छोटी आस्तीन वाली कमीज़ के साथ टाई कभी ना पहनें – यकीन मानिए, यह पहनावे में की गई सबसे बड़ी गलती होगी। इस सामाजिक छवि को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता है। टाई को हमेशा पूरी आस्तीन वाली कमीज़ के साथ ही पहने, और आराम करते समय आप अपनी आस्तीन को मोड़ सकते हैं।
पतलून के साथ पहने जाने वाले बेमेल रंग के मोजे – पहनावे का नियम यह है कि आपको जूतों के रंग से मेल खाते मोजे पहनने के बजाय आपकी पतलून के रंग से मेल खाते रंग के मोजे पहनने चाहिए। यह नियम औपचारिक पोशाक पर पूरी तरह लागू होता है और ड़ेनिम या अनौपचारिक पोशाक के साथ सफेद मोजे पहनें।

सही एक्सेसरीज़ पहनें – आपकी घड़ी का पट्टा तथा बेल्ट का रंग एक दूसरे से मेल खान चाहिए। नियम के अनुसार, आपके बेल्ट का रंग, आपकी घड़ी का पट्टा और आपके जूते एक दूसरे के साथ पूरी तरह से मेल खाने चाहिए। इन एक जैसे दिखने वाले रंगों के थोड़े से अंतर को स्वीकार किया जा सकता है लेकिन यह भी रंगों के बीच के अंतर की मात्रा पर निर्भर करता है। रंगों में बहुत ज्यादा अंतर स्वीकार नहीं किया जाता। यही नियम इन वस्तुओं की बनावट और चमक पर भी लागू होता है। अगर आपने स्पोट्स जूते पहने हैं तो उसके साथ एक पतला बेल्ट पहनने के बजाय एक चौड़ा बेल्ट पहने। सैंड़ल के साथ मोजे…..नहीं! – इस तरह का बेमेल पहनावा कभी ना पहने।
आभूषणों से ना लदें – अगर आप एक रॉक स्टार नहीं हैं, तो एक साथ इतने सारे आभूषणों को कभी ना पहने। आदर्श रूप से पुरुषों के आभूषणों में घड़ी, शादी की अंगूठी और कफ की कड़ी शामिल हैं। आप चाहे तो एक ब्रेसलेट या गले में एक चेन पहन सकते हैं, लेकिन निश्चित रूप से इन्हें एक औपचारिक पहनावे के साथ ना पहने। साथ ही, एक साथ इन सारी चीजों को संभालना भी सीखें।
टाई की लंबाई – आपकी टाई आपके बेल्ट से थोड़ी सी ऊपर होनी चाहिए लेकिन ध्यान रहें कि आपकी टाई की नोक बिलकुल आपके बेल्ट के बकसुए के मध्य में हो। अपनी टाई की गांठ को ठीक से बांधना ना भूले, अगर आप अपनी टाई की गांठ को ठीक से ना बांध पाए तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप से पहनावे के बुनियादी नियम में कहीं चूक हो गई है। टाई की चौड़ाई बदलते फैशन पर निर्भर करती है।
बटुए के कारण कमीज़ की या पतलून की जेब का फूलना – फैशन की इस गलती को लगभग हर पुरुष करता है। इस गलती से यह पता चलती है कि या तो आपकी पतलून बहुत तंग है और इसलिए उसमें बटुए के लिए कोई जगह नहीं है जिसके कारण आपकी जेब फूल गई है, या फिर आपका बटुआ बहुत बड़ा या बहुत चौड़ा है। यकीन मानिए, यह गलती आपको एक ऐसे पुरुष के रुप में दर्शाती है जिसे पहनावे की कोई समझ नहीं है। अपने बटुए में से कुछ अतिरिक्त चीजों को निकालें और उसे थोड़ा सा हल्का बनाएं।












