Tuesday, March 24, 2026
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स्टार्ट अप के लिए बिजनेस प्लान के साथ समर्पण देखते हैं रतन टाटा

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ग्वालियर।रतन टाटा सिंधिया स्कूल की स्थापना दिवस के मौके पर स्टूडेंट्स से रुबरू थे। स्टूडेंट्स ने अपने कैरियर से लेकर बिजनेस आइडिया से जुड़े कई सवाल पूछे। टाटा ने भी बेझिझक होकर कहा कि जैसे लड़की के गुण देखकर प्रेम करो, वैसे ही स्टार्टअप में छिपी हुई संभावनाओं और उसे शुरू करने वाले व्यक्ति की गंभीरता को पहचानकर इनवेस्ट करो।

रतन टाटा जब सिंधिया स्कूल पहुंचे तो उन्होंने परंपरागत भाषण देने की बजाय स्टूडेंट्स से बातचीत शुरू कर दी। स्टूडेंट्स ने भी अपने फ्यूचर और बिजनेस के मंत्र पूछे। टाटा ने कहा कि किसी भी स्टार्टअप में इनवेस्ट करने से पहले उनका बिजनेस प्लान और उसे शुरू करने वाले का समर्पण देखता हूं।

-यह ठीक लड़की के प्रेम करने जैसा है, जिसमें उसके सभी गुण देखे जाते हैं। एक स्टूडेंट ने पूछा कि पेरेंट्स कहते हैं ज्यादा नंबर लाओ, तभी टिक पाओगे। इस पर टाटा का जबाव था मार्क्स से टेलेंट का आंकलन नहीं हो सकता। टाटा ने बताया कि बिल गेट्स और स्टीव जॉब ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की, लेकिन बहुत सफल हुए। भारत के भ्रष्टाचार के बारे में टाटा ने कहा कि उनकी कंपनियों ने काम के लिए कभी रिश्वत नहीं दी। हालांकि इससे नुकसान भी उठाना पड़ा। इस मामले मे कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहिए।

रतन टाटा ने स्टूडेंट्स से कहा कि आने वाला समय ऐसा होगा, जब देश में सभी बराबर होंगे। सब काम मेरिट के आधार पर होंगे। खासतौर से देश में अभिव्यक्ति की पूरी आजादी होनी चाहिए। स्टूडेंट्स को उन्होंने सलाह दी कि एजूकेशन को केवल नंबर लाने का जरिया नहीं समझे, बल्कि अपने अंदर लीडरशिप और स्किल डेवलप करें। सफलता आपके कदमों में होगी। टाटा ने बताया कि उनकी कंपनी हमेशा ऐसा प्रोडक्ट लेकर मार्केट में आई, जिस पर लोग भरोसा कर सकें। यही सफलता का राज है।

 

‘डाबर घराने’ की 16 साल की दीया ने लॉन्च किया सफाई से जुड़ा स्टार्ट अप

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आज के समय में जहां स्कूल जाने वाले ज्यादातर बच्चे सेल्फी और नए ब्रांड्स के चक्कर में बिजी हैं, वहीं दीया बरमन ने एक मिसाल पेश की है। दीया ने महज 16 साल की उम्र में अपना स्टार्टअप शुरू किया है। उनकी यह उपलब्ध‍ि इसलिए खास हो जाती है क्योंकि उनके नाम के साथ डाबर इंडिया का नाम जुड़ा है। बता दें कि दीया डाबर ग्रुप के वाइस चेयरमैन अमित बर्मन की बेटी हैं। उन्होंने अपने पापा के नक्शेकदम पर चलते हुए इस बिजनेस को स्टार्ट किया है। बरमन परिवार की 16 साल की इस होनहार बेटी ने FMCG के अंदर वाले अपने स्टार्टअप को रोग फ्री RogFree नाम दिया है। इस स्टार्टअप का मकसद ग्रामीण भारत के ऐसे लोगों के स्वास्थ्य और हाइजीन में सुधार लाने का है खासकर गरीब बच्चों के लिए.

दीया ने अपने काम की शुरुआत में दिल्ली के सभी मेजर हॉस्पिटलिटी चेन्स जैसे ओबरॉय, जेडब्ल्यू मेरियट, रेडिसन ब्लू  आदि से इस्तेमाल में लाने के बाद बचे हुए साबुन जमा करना शुरू किया। इसके बाद इन साबुनों को एक ऐसी यूनिट में भेजा गया जहां इन्हें गर्म करके दोबारा पिघलाया गया और फिर इन्हें फ्रेश सोप का रूप देकर रोग फ्री यानि RogFree ब्रांड का नाम दिया गया। इन साबुनों को गांव के बच्चों और लोगों में मुफ्त बंटवाया जा रहा है.

दीया का कहना है कि उनके दिमाग में ये आइडिया तब आया जब वह एक होटल में हाथ धो रही थीं। उसी समय हाउसकीपिंग स्टाफ ने वो सारे साबुन वहां से हटा दिए जबकि ये सिर्फ एक ही बार यूज हुए थे। तभी उनको लगा कि ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्हें ये बेसिक चीजें नहीं मिलतीं और इस वजह से वो लोग बीमारियों का शिकार होते हैं। बस यहीं से उन्होंने बेकार समझ लिए जाने वाले साबुनों को नए तरीके से इस्तेमाल में लाने की प्लानिंग कर ली।

दिल्ली में इस काम की शुरुआत करने के बाद दीया RogFree को मुंबई भी ले जाना चाहती हैं। वाकई दीया की सोच और उनका काम काबिले तारीफ है।

 

आलोक पर्व पर बिखेरिए स्वाद का जादू

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केसर इलायची श्रीखंड

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सामग्री- दही- 3 कप पाउडर वाली चीनी- 1\2 कप इलायची पाउडर- 1 चम्‍मच केसर- चुटकीभर दूध- 2 चम्‍मच (गरम) गार्निशिंग के लिये- सूखे मेवे

विधि- दही को मलमल के कपड़े में बांध कर टांग दीजिये। करीबन 4 घंटों के लिये। फिर इसे निकाल लें और एक बडे़ कटोरे में रखें। अब इसमें चीनी, इलायची पाउडर और केसर वाला दूध मिलाएं। श्रीखंड को सर्विंग बाउल में डालें। सूखे मेवे से गार्निश करें। फिर फ्रिज में रख दें जिससे यह ठंडा हो जाए।

 

पनीर मक्‍खनवाला

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सामग्री- 1 बड़ी प्‍याज 3 से 4 टमाटर ½ इंच अदरक 3 से 5 लहसुन की कलियां 2 जावित्री 2 से 3 हरी इलायची 1 इंच दालचीनी 2 से 3 लौंग 2 चम्‍मच काजू 1 कप पानी बाकी की सामग्री- 250 से 300 ग्राम पनीर 1 चम्‍मच कश्‍मीरी लाल मिर्च पावडर या देगी मिर्च ¼ कप लो कैलोरी क्रीम 1 तेज पत्‍ता 1 हरी मिर्च 1.5 कप पानी ¾ चम्‍मच कस्‍तूरी मेथी ¼ गरम मसाला पावडर 1 चम्‍मच शहद या ½ चम्‍मच चीनी 2 से 2.5 चम्‍मच बटर 1 चम्‍मच क्रीम गार्निश करने के लिये 1 चमच घिसी पनीर गार्निष करने के लिये ½ इंच बारीक घिसी अदरक नमक- स्‍वदाअनुसार थोड़ी धनिया पत्‍ती

विधि- सबसे पहले कटी प्‍याज, टमाटर, अदरक, लहसुन, काजू, दालचीनी, लौंग और इलायची को 1 कप पानी डाल कर पैन में पका लें। इसे तब तक पकाएं जब तक की यह गल न जाए। फिर 15 मिनट के बाद इसे ठंडा होने के लिये किनारे रखें। जब यह ठंडी हो जाए तब इसे मिक्‍सर में पीस लें। काजू तक अच्‍छी तरह से पिस जाना चाहिये। अब उसी पैन में बटर डालें। फिर उसमें तेज पत्‍ता डाल कर चलाएं। इसके बाद उसमें मखनी पेस्‍ट डाल कर चलाएं। ऊपर से लाल मिर्च पावडर डाल कर धीमी आंच पर पकाएं। मसाले को अच्‍छी तरह से पका लें। जब मसाला बटर को छोड़ने लगे तब उसमें बीच से कटी हरी मिर्च, नमक और पानी डालें। अब इसे फिर चलाएं। 2 से 3 मिनट तक पकाएं। अब इसमें शहद या चीनी डालें। उसके बाद इसमें क्रीम, कसूरी मेथी और गरम मसाला डाल कर चलाएं और आंच को बंद कर दें। अब पनीर मक्‍खनवाला को क्रीम, घिसी पनीर, बारीक घिसी अदरक और धनिया पत्‍ती से सजा कर सर्व करें।

भारत-पकिस्तान सीमा पर बसे तीन बच्चो की दोस्ती की कहानी!

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कहते है बच्चे भगवान् का रूप होते है। और भगवान् की कभी किसीसे कोई दुश्मनी नहीं होती; उनके लिए सब एक जैसे होते है। भारत- पकिस्तान की दुश्मनी की खबरों के बीच ऐसे ही कुछ बच्चो की कही कुछ बाते हर किसी के दिलों को छु रही है।

इन बच्चो की ये मासूम बातें फेसबुक पर ‘ह्युमंस ऑफ़ पकिस्तान‘ नामक एक पेज ने साझा की है। फेसबुक के इस पोस्ट में दो स्कूल जाने वाले बच्चो ने सीमा पार रह रहे अपने हिन्दुस्तानी दोस्त का ज़िक्र किया है।

ये बच्चे आपस में कभी नहीं मिले। पर स्कूल से घर वापस जाते हुए ये तीनो, रोज़ साथ मिलकर एक खेल खेलते है। ये खेल उस नदी में पत्थर फेंकने का है, जो दोनों देशो के बीच बहती है। खेल के नियम बिलकुल सरल है; जिसका पत्थर जितनी दूर फेंका जायेगा, जीत उसी की होगी।

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“हमारा एक दोस्त है, जो नदी के उस पार रहता है। वो भी हर रोज़ इसी वक़्त स्कूल से वापस आता है। वो वहां खड़े होकर नदी में पत्थर फेंकता है। हम भी इस तरफ से पत्थर फेंकते है। जिसका पत्थर सबसे दूर पहुंचता है वो जीत जाता है। हम ये खेल रोज़ खेलते है।”

-“तुम्हारे दोस्त का नाम क्या है?”

“हमे नहीं पता। नदी के पानी के शोर की वजह से एक दुसरे से बात करना मुश्किल होता है। बस हम इतना जानते है कि वो हिन्दुस्तानी- कश्मीरी है, क्यूंकि वो नदी के उस पार रहता है।”

इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर करीब 19,000 लोगो ने साझा किया है। ये बात शायद इस बात का सबूत है कि शायद अब भी हम सभी इन बच्चो की तरह अमन ही चाहते है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

 

 

 

 

 

युद्ध के उन्माद की शिकार औरत की कहानी है बल्कान की औरतें

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आज दुनिया में जितनी भी हिंसा हो रही है, वह चाहे दंगों की शक्ल में हो, आतंकवाद हो, या फिर सेनाओं द्वारा की जाने वाली हिंसा, इन सब के पीछे धार्मिक एवं सांस्कृतिक असहिष्णुता अक्सर मुख्य कारक होती है | यह असहिष्णुता घृणा और उन्माद तक पहुँच जाती है और इस उन्माद का सबसे आसान शिकार बनती है – औरत | मानवीय मूल्यों की निर्मम हत्या होने लगती है | जब गोलियां चलती हैं तो इंसान से पहले इंसानियत की छाती छलनी होती है |

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 इसी विषय पर केंद्रित जूल्स टास्का का नाटक ‘बाल्कन वुमेन’ नब्बे के दशक मे यूगोस्लाविया के विघटन के समय क्रिश्चियन सर्बों व मुस्लिम बोसनियंस के बीच हुए युद्ध में धार्मिक विद्वेष और बदले की भावना से उत्पन्न इंसानी व गैर इंसानी जज़्बों के अंतर्द्वंद्व को अत्यंत मार्मिकता से प्रदर्शित करता है | ‘युद्ध निषेध’ की यह त्रासदी कहीं न कहीं यूरिपिडीज़ के ग्रीक नाटक ‘ट्रॉय की औरते’ से भी प्रभावित है और भारतीय उप-महाद्वीप की स्थितियों के बेहद करीब है |  कभी वास्तविक चरित्रों के रूप में, कभी चरित्रों के अंतर्मन के रूप में मनोभावों को उभारने के लिये अज़हर आलम का प्रकाश और मुरारी रायचौधुरी के संगीत का संयोग अदभुत बन पड़ा है |

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इस नाटक के असाधारण व तीव्र भावनात्मक स्थितियों व घटनाक्रमों के द्वंद्व को निर्देशक मुश्ताक़ काक ने  सभी स्तरों पर एक नई सृजनात्मकता एवं प्रयोगात्मकता दी है |  कोरस के अभिनेताओ व अभिनेत्रियों ने नाटक में मौजूद भय, वीभत्स और खौफ़नाक रसों को संप्रेषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है l  अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला जैसे अनुभवी एवं कुशल अभिनेताओ और हीना परवेज़, सागर सेनगुप्ता, चंद्रेयी मित्र तथा कोरस में अनीता दास, कुमकुम राय, रुपाश्री, शबरीन खातुन, अर्चना भट्टाचार्य, सैबल दत्ता, सतीश चौधुरी, राघव रे, शुभंकर, बिप्लव, अभिषेक मिश्र, जीत गुप्ता आदि के परिश्रम ने इस नाटक को शानदार बनाया है l

नाटक – बल्कान की औरतें

मूल नाटक – द बाल्कन विमेन्स, लेखक – जूल्स टस्का

अनुवाद – उमा झुनझुनवाला

संगीत – मुरारी रायचौधरी

मंच तथा प्रकाश सज्जा – एस.एम. अजहर आलम

डिजाइन तथा निर्देशन – मुश्ताक काक

 

देश की लड़कियां बेहद क्षमतावान, बस उन्हें निखारने की जरूरत : साक्षी

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मिर्जापुर : रियो ओलम्पिक की महिला कुश्ती में कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक ने आज कहा कि देश की लड़कियों में खेलों के लिहाज से बहुत क्षमता है, बस उसे निखारने की जरूरत है।

साक्षी ने मिर्जापुर के कछवां में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट का उद्घाटन करने के बाद कहा कि खेल के क्षेत्र में देश की लड़कियों में काफी क्षमता और प्रतिभा है, लेकिन जरूरी प्रशिक्षण के अभाव में वे सामने नहीं आ पातीं।

उन्होंने कहा कि प्रतिभावान लड़कियों को अगर समुचित प्रशिक्षण और सहयोग मिले तो वे भी अन्तरराष्ट्रीय फलक पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं।

रियो ओलम्पिक में कांस्य पदक विजेता ने कहा कि उन्होंने यह साबित किया है कि लड़कियों को सही प्रशिक्षण मिले तो वह आसमान छू सकती हैं।

सत्यनारायण खेल संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट के पुरष विजेता को डेढ़ लाख रपये और महिला वर्ग की विजेता को एक लाख रपये नकद पुरस्कार दिया जाएगा।

डिप्रेशन में घुटन महसूस करती थीं दीपिका, मां बनीं मददगाार

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नई दिल्ली.दीपिका पादुकोण भी कभी डिप्रेशन से गुजर चुकी हैं। वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर अपने एनजीओ लिव लव लाफ के ‘दोबारा पूछो’ प्रोग्राम के लॉन्चिंग के दौरान उन्होंने यह आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि डिप्रेशन में हमें परेशान न होकर उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरे लिए इससे बाहर निकलना आसान नहीं था। लेकिन मां ने मेरी मदद की। मैं उनसे कहना चाहूंगी कि अगर वे नहीं होतींं, तो आज मैं यहां नहीं होती। यह वाकया सुनाते हुए वे रो पड़ींं।

– दीपिका ने सोमवार को इस प्रोग्राम में बताया- “दो साल पहले मेरे पेरेंट्स मुझसे मिलने मुंबई आए थे। मेरी बहन भी साथ थी। सभी लोग जाने के लिए पैकिंग कर रहे थे। मैं अपने बेडरूम में अकेली थी। मां मेरे पास आईं और पूछा सब कुछ ठीक है? मैंने कहा- हां। उन्होंने मुझसे फिर पूछा कि यह काम से रिलेटेड है? मैंने कहा- नहीं। उन्होंने फिर पूछा परेशानी की वजह कुछ और है? मैंने कहा -नहीं।”

– “उन्होंने मुझसे दो या तीन बार पूछा। मैं घुटन महसूस कर रही थी। फिर मैं रो पड़ी।”

– “मैं कहना चाहूंगी कि अगर आज मेरी मां नहीं होतींं, तो मैं आज यहां नहीं होती। इस मुश्किल वक्त में मेरा सपोर्ट करने के लिए थैंक्स। मैं सपोर्ट करने के लिए अपनी बहन, पिता और दोस्तों के लिए भी थैंक्स कहना चाहूंगी।”

– “मैं लंबे समय तक डिप्रेशन की स्थिति में नहीं रह सकती थी। मैं इससे जल्दी निकलना चाहती थी। दरअसल, हर प्रॉब्लम का हल अपने अंदर ही होता है। मैंने भी अपनी स्ट्रेंथ को खोजा था। यही मैं दूसरों से कहना चाहती हूं।”

हम सेंसिटिविटी खोते जा रहे हैं

– दीपिका ने कहा- “आज के दौर में हम अपनी सेंसिटिविटी खोते जा रहे हैं। हमें अपनी सेंसिटिविटी को बचाए रखना होगा।”

– “यह समझना जरूरी है कि आज हम बहुत कॉम्पिटीटर बन गए हैं, जो एक अच्छी बात है, लेकिन हम अपने आसपास के लोगों को लेकर कम सेंसिटिव भी हुए हैं।”

– “आपके पास फैमिली और दोस्त होने चाहिए, जो आपके लिए हर समय खड़े हों। इससे डिप्रेशन से गुजर रहे शख्स को बाहर निकलने में मदद मिलती है।”

एक साल पहले शुरू किया था यह कैम्पेन

– दीपिका ने पिछले साल अक्टूबर में ‘लिव लव लाफ’ एनजीओ की शुरुआत की थी। इसका मकसद डिप्रेशन से पीड़ित लोगों की मदद करना और लोगों के बीच अवेयरनेस लाना है।

कब हुईं डिप्रेशन की शिकार

– दीपिका ने इससे पहले भी डिप्रेशन में जाने की बात मानी थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था- “यह सब 2014 में शुरू हुआ था। तब सब कुछ अच्छा चल रहा था। मैंने 2013 में किए गए काम के बदले कई अवॉर्ड जीते थे। एक दिन में सुबह उठी तब मुझे पेट काफी खाली-सा लगा। उस समय मैं खुद को दिशाहीन महसूस कर रही थी। मैं यह जान नहीं पा रही थी, ऐसा क्यों हो रहा है? मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं। मैंने रोना शुरू कर दिया था।”

 

गौहर खान ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ से जुड़ीं

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मुंबई: अदाकारा गौहर खान, वरूण धवन-आलिया भट्ट अभिनीत ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में नजर आएंगी ।वरूण ने अपने, आलिया और गौहर वाला एक वीडियो इंस्टाग्राम के जरिए प्रशंसकों से साझा किया है ।लघु वीडियो की शुरूआत में वरूण ने कहा, ‘‘हैलो साथियों, बद्रीनाथ की दुल्हनिया की टीम में हमारे साथ खानों में से एक हैं।’’ इसपर आलिया ने जोड़ा ‘‘और लेडी खान’’ गौहर कदम रखेंगी । अदाकारा इस को लेकर काफी रोमांचित हैं । उन्होंने वरूण और आलिया के साथ वीडियो के अंत में कहा, ‘‘ये दोनों मेरे पसंदीदा अदाकार हैं और इनके साथ काम करके बहुत खुश हूं।’’ ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ वर्ष 2014 में आयी ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की दूसरी किस्त है ।

 

किसी लग्जरी कार की तरह इस ऑटो के यात्रियों को मिलती हैं ऐसी सुविधाएं

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नई दिल्ली. यदि आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं तो ऑटो रिक्शा में बैठें ही होंगे। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे ऑटो ड्राइवर के बारे में सुना है, जो अपने पैसेंजर के लिए वाई-फाई, मैगजीन, टीवी, टेबलेट जैसी सर्विसेस देता है। चेन्नई के इस ऑटो ड्राइवर का नाम अन्ना दुरई है। अन्ना के ऑटो में घूमना किसी लग्जरी कार के एक्सपीरियंस से कम नहीं है। स्कूल ड्रॉपआउट हैं अन्ना, हर महीने कमाते हैं 50 हजार रुपए…

– बता दें कि अन्ना के फेसबुक में 10 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं।

– 30 साल के अन्ना एक स्कूल ड्रॉप आउट हैं। वे चेन्नई के थिरुवनमयुर-शौलिंगनलूर रोड पर एक शेयर-ऑटो चलाते हैं। उनके शेयर-ऑटो में एक बार में 6 पैसेंजर्स सवार हो सकते हैं।

– उनके ऑटो को चेन्नई में अमेजिंग ऑटो भी कहा जाता है। अन्ना मूलतः थंजावुर जिले से हैं। चार साल की उम्र में वे अपने दो भाइयों और एक बहन के साथ चेन्नई आ गए थे।
– 2012 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई अधूरी छोड़कर ऑटो चलाने लगे। उनके ऑटो को अमेंजिंग ऑटो के नाम से जाना जाता है।

हर महीने कमाते हैं 50 हजार रुपए, कस्टमर्स पर खर्चते हैं 10 हजार रुपए

– शुरुआत में अन्ना आम ऑटो ड्राइवर की तरह ही काम किया करते थे। बाद में उन्हें लगा कि अपने पैसेंजर्स को अच्छी सर्विस देने के लिए कुछ अलग करना चाहिए।
– इसके लिए उन्होंने ऑटो में 20 अलग-अलग तरह के अखबारों और मैगजीन रखना शुरू किया। – उन्होंने कुछ पैसे जमा करके अपने ऑटो में वाई-फाई भी लगवाया। उनकी ज्यादातर सवारियां आईटी सेक्टर से होती थीं। इसके चलते उन्होंने 7 हजार रुपए में एक टैबलेट खरीदा।

– हर महीने 50 हजार रुपए की कमाई करने वाले अन्ना 10 हजार रुपए तो कस्टमर्स की सुविधाओं में ही खर्चते हैं।

ऑटो में है रिचार्ज की सुविधा

– अन्ना ने अपने ऑटो में एक कार्ड स्वीपिंग मशीन का भी इंतजाम कर रखा है। इसके अलावा ऑटो में प्रीपेड मोबाइल को रिचार्ज करने के भी इंतजाम हैं।
– वह नियमित तौर पर एक कस्टमर-रिलेशनशिप कॉन्टेस्ट भी चलाते हैं, जिसमें वह अपने पैसेंजर्स से पांच सवाल पूछते हैं। जिसमें वह एक हजार रुपए तक जीत सकता है।
– इसके अलावा वह टीचर्स को फ्री राइड देते हैं। यही नहीं, वह उन नर्सों को भी फ्री राइड देते हैं, जो एचआईवी इन्फेक्टेड लोगों की सेवा करती हैं।

 

इस क्रिकेटर को बुलाते हैं टाइगर, ट्रॉफीज रखने के लिए पिता से मांगा था बड़ा घर

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पुणे: महाराष्ट्र टीम के कैप्टन स्वप्निल गुगाले (351रन नॉटआउट) ने अंकित बावने के साथ मिलकर रणजी में किसी भी विकेट के लिए सबसे लंबी पार्टनरशिप का 70 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ डाला। ‘टाइगर’ नाम से फेमस पुणे के रहने वाले स्वप्निल ने 11 साल की उम्र में पिता से कहा था, पापा बड़ा घर ले लीजिए इस घर में मेरी ट्रॉफीज के लिए जगह नहीं बचेगी। 5 साल की उम्र से खेल रहे हैं क्रिकेट…

25 वर्षीय स्वप्निल की इस सफलता पर उनके पुणे स्थित घर में जश्न का माहौल है। बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। उनके पिता मनसुख गुगाले ने स्वप्निल के बचपन की यादों को साझा करते हुए बता कि, वे 5 साल की उम्र से क्रिकेट खेल रहे हैं। एक दिन बेटे को बैट से खेलता देख मनसुख ने तय किया कि, वे उन्हें क्रिकेटर ही बनाएंगे।  अपने दोनों बेटों (रोहित और स्वप्निल) का दाखिला एक ऐसे स्कूल (सेठ दगडूराम कटारिया स्कूल) में करवाया जहां तीन प्ले ग्राउंड थे। उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने इसका विरोध भी किया लेकिन मनसुख नहीं माने। उन्होंने स्वप्निल की पढ़ाई से ज्यादा उनके क्रिकेट पर फोकस किया।  स्वप्निल के करियर में एक बड़ा योगदान उनके स्कूल के कोच विलास गोगरे का भी है, विलास उन्हें छठवीं क्लास से ट्रेनिंग दे रहे हैं।

कोच की मेहनत और अपनी लगन से स्वप्निल 11 साल की उम्र में स्कूल टीम में शामिल हो गए और एक मैच ने उन्हें लाइमलाइट में ला दिया। स्वप्निल के भाई रोहित गुगाले ने बताया कि, “जी.एन पेटिट और कटारिया स्कूल के बीच मैच था। कटारिया स्कूल को 130 रन चाहिए थे और उनके 17 रन पर 6 विकेट गिर चुके थे।”
“इसके बाद क्रीज पर स्वप्निल उतरे और उन्होंने टीम के टेलेंडर्स(पीछे के खिलाड़ियों) के साथ मिलकर यह मैच जीत लिया। रोहित ने बताया कि, “पुणे के नेहरु स्टेडियम में ट्रायल चल रहे थे। पूरे राज्य से तकरीबन 500 खिलाड़ी यहां पहुंचे थे।”  “स्वप्निल ने पहले 250 खिलाड़ियों में, फिर 25 में और अंत में महाराष्ट्र के प्लेइंग 11 में जगह बना ली। स्वप्निल की परफॉर्मेंस देख सिलेक्टर भी हैरान हो गए थे।”

बोलने-सुनने में सक्षम नहीं हैं मां

स्वप्निल के परिवार में रोहित और मनसुख के अलावा उनकी मां राजश्री गुगाले, भाभी वर्षा गुगाले और 3 साल की भतीजी हिरल है। उनकी इस सफलता के पीछे उनकी मां और भाभी का बड़ा हाथ है। स्वप्निल की डाइट की पूरी जिम्मेदारी उनकी भाभी के ऊपर है। उनकी मां राजश्री बोलने और सुनने में सक्षम नहीं हैं। इसके बावजूद उन्होंने स्वप्निल को हमेशा क्रिकेट खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोहित ने बताया कि,”मां बोल नहीं सकती, लेकिन उन्होंने हम दोनों भाइयों की परवरिश में कभी कोई कमी नहीं रखी।”

स्वप्निल अपनी फिटनेस के लिए डेली दो घंटे जिम में पसीना बहाते हैं।  इसके बाद वे ग्राउंड में तकरीबन 5-6 घंटे क्रिकेट प्रैक्टिस करते हैं।क्रिकेट के अलावा स्वप्निल को म्यूजिक बहुत पसंद है, वे हर बड़े रॉक स्टार को फॉलो करते हैं।

स्वप्निल पुणे में ‘टाइगर’ नाम से फेमस हैं। यह नाम उनके पिता ने उन्हें दिया है।

मनसुख ने बताया कि, “स्वप्निल बचपन से बहुत शरारती और जिद्दी स्वभाव के हैं। वे एक टाइगर की तरह फुरतीले और कभी न थकने वाले खिलाड़ी रहे हैं।””हमें इस बात का विश्वास है कि, स्वप्निल एक दिन टीम इंडिया का पार्ट जरुर बनेंगे।”

मनसुख के मुताबिक, स्वप्निल ने लगभग हर बड़े मैच में ट्रॉफी जीती है।  उन्होंने एक किस्से को याद करते हुए बताया कि,”जब स्वप्निल छोटे थे तो उन्होंने एक दिन मुझे से कहा,पापा मैं हर मैच में ट्रॉफी लेकर आता हूं। हमारा ये घर बहुत छोटा है इन्हें रखने के लिए।”बेटे के इस सपने को पूरा करने के लिए मनसुख ने एक बड़ा घर लिया। आज उनका ये घर भी स्वप्निल की ट्रॉफीज से भरा पड़ा है। बेटे की सफलता के बाद घर में बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है।  मनसुख ने बताया कि, वे जैन कम्युनिटी से आते हैं। बेटे की सफलता पर पूरे जैन समुदाय ने उन्हें बधाइयां दी हैं।

पिता को टीम इंडिया में सिलेक्शन की उम्मीद

इस मैच में स्वप्निल ने 351 नॉटआउट स्कोर किया है। वे ट्रिपल सेंचुरी स्कोर करने वाले महाराष्ट्र के चौथे बैट्समैन हैं। स्वप्निल ने पहला रणजी ट्रॉफी मैच 2010 में राजस्थान के खिलाफ खेला था। इसके बाद उन्हें 2014 तक कोई बड़ा मौका नहीं मिला। 2015 में उन्होंने कुछ खास स्कोर नहीं किया, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से फिर एक बार 2016 में वे कमाल करने में कामयाब हुए हैं। ये फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनका पर्सनल बेस्ट भी है। स्वप्निल शुरू से ही कैप्टन मटेरियल रहे हैं। वे अब तक क्रिकेट के लगभग सभी फॉरमेट में कप्तान रह चुके हैं।
उनके लीडरशिप में महाराष्ट्र ने 2009 में अंडर-19 वीनू मांकड़ ट्रॉफी और 2014 में कूंच बिहार ट्रॉफी जीती थी। वर्ल्ड रिकॉर्ड से चूकने पर मनसुख का कहना है कि, “स्वप्निल की इस परफारमेंस से पूरा परिवार खुश है।” “उन्होंने टीम के लिए खेला अगर मैच 4 की जगह पांच दिन का होता तो यह वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बन सकता था।” सचिन, सहवाग समेत टीम इंडिया के कई बड़े नाम स्वप्निल के खेल की तारीफ कर चुके हैं।