Tuesday, March 24, 2026
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जानिए क्यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस

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गणतंत्र दिवस हर भारतीय के लिए बहुत मायने रखता है। यह दिन हम सभी के लिए बहुत महत्व का दिन है जिसे हम बेहद ही उत्साह के साथ मनाते हैं। भारत एक महान देश है और सिर्फ भारत में ही विविधता में ही एकता देखने को मिलती है। जहां विभिन्न जाति और धर्म के लोग प्यार से रहते हैं। 26 जनवरी और 15 अगस्त दो ऐसे राष्ट्रीय दिवस हैं जिन्हें हर भारतीय खुशी और उत्साह के साथ मनाता है।

26 जनवरी 1950 भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया था और भारत दिन पूर्ण गणतंत्र देश बना। भारत का संविधान लिखित सबसे बङा संविधान है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना, 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतांत्रिक देश बन गया था । देश को गौरवशाली गणतंत्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तों ने अपना बलिदान दिया उन्हें 26 जनवरी दिन याद किया जाता और उन्हें श्रद्धाजंलि दी जाती है।

गणतंत्र दिवस से जुड़े कुछ तथ्य:

  • पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था।
  • 26 जनवरी 1950 को 18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया।
  • गणतंत्र दिवस की पहली परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई थी।
  • भारतीय संविधान की दो प्रत्तियां जो हिन्दी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गई।
  • भारतीय संविधान की हाथ से लिखी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में सुरक्षित रखी हुई हैं।
  • भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने गवर्नमैंट हाऊस में 26 जनवरी 1950 को शपथ ली थी।
  • गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और हर साल 21 तोपों की सलामी दी जाती है।
  • 29 जनवरी को विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है जिसमें भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के बैंड हिस्सा लेते हैं। यह दिन गणतंत्र दिवस के समारोह के समापन के रूप में मनाया जाता है।
  • गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री अमर ज्योति पर शहीदों को श्रद्धाजंलि देते हैं जिन्होंने देश के आजादी में बलिदान दिया।

 

ये है राष्ट्रीय ध्वज की गाथा

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भारत का राष्ट्रीय ध्वज एक राष्ट्रीय प्रतीक है जिसे क्षैतिज आयताकार में बनाया गया है। इसे तीन रंगों की मदद से सजाया गया है जिसमें गहरा केसरिया (सबसे ऊपर), सफेद( बीच में) और हरा (सबसे नीचे)। सफेद रंग के बीचों-बीच एक नीले रंग का अशोक चक्र (अर्थात कानून का चक्र) बना हुआ है जिसमें 24 तिलियाँ है। 22 जुलाई 1947 में भारत के संविधान सभा ने एक मीटिंग में राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरुप को स्वीकार किया था। भारत के सत्ताधारियों द्वारा वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को अधिकारिक रुप से स्वीकार किया गया था। तीन रंगों का होने के कारण इसे तिरंगा भी कहा जाता है। ये स्वराज ध्वज पर आधारित है (अर्थात भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का ध्वज, पिंगाली वेंकैया द्वारा रुपांकित)।

भारत के लोगों के लिये राष्ट्रीय ध्वज बहुत मायने रखता है। भारत के लोगों के लिये ये बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। भारतीय ध्वज को एक खास किस्म के कपड़े से बनाया गया है जिसे ख़ादी कहते है (हाथ से काता हुआ जिसे महात्मा गाँधी द्वारा प्रसिद्ध किया गया)। इसके निर्माण और डिज़ाइन के लिये भारतीय स्टैन्डर्ड ब्यूरो जिम्मेदार होता है जबकि, ख़ादी विकास एवं ग्रामीण उद्योग कमीशन को इसके निर्माण का अधिकार है। 2009 में राष्ट्रीय ध्वज का अकेला निर्माण कर्ता कर्नाटक ख़ादी ग्रामोंद्योग संयुक्त्त संघ रहा है।
राष्ट्रीय प्रतीक से संबंधित कानून के साथ ही भारतीय ध्वज की प्रथा (किसी दूसरे राष्ट्र या ग़ैर राष्ट्रीय ध्वज) को भारत का राष्ट्रीय ध्वज नियमावली संचालित करता है। किसी भी निजी नागरिक (किसी भी राष्ट्रीय दिवस को छोड़कर) के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है। जबकि, नवीव जिंदल (निजी नागरिक) के अनुरोध पर 2002 में, सुप्रिम कोर्ट के आदेशानुसार भारत की सरकार (भारत की केन्द्रीय कैबिनेट) द्वारा ध्वज के सीमित उपयोग के कानून में बदलाव किया गया। ध्वज के अतिरिक्त इस्तेमाल के लिये 2005 में इसमें दुबारा बदलाव किया गया।

भारतीय ध्वज का अर्थ और महत्व

तीन रंगों में होने की वजह से भारतीय ध्वज को तिरंगा भी कहते है। ख़ादी के कपड़ों, बीच में चक्र और तीन रंगों का इस्तेमाल कर भारतीय ध्वज को क्षितिज के समांतर दिशा में डिज़ाइन किया गया है। ब्रिटीश शासन से भारतीय स्वतंत्रता के परिणाम स्वरुप 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया गया था। इसकी लम्बाई और चौड़ाई का अनुपात क्रमशः २:३ होता है।  आजादी और राष्ट्रीयता के प्रतीक के रुप में भारतीय ध्वज को बनाया और स्वीकार किया गया।

हमारे लिये भारतीय ध्वज का बहुत महत्व है। अलग-अलग विचारधारा और धर्म जैसै हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि का होने के बावजूद भी ये सभी धर्मो को  एक राह पर ले जाता है और हमारे लिये एकता के प्रतीक के रुप में है। इसमें मौजूद तीन रंग और अशोक चक्र का अपना अर्थ है जो इस प्रकार है:

केसरिया रंग
राष्ट्रीय ध्वज का सबसे ऊपरी भाग केसरिया रंग है;  जो बलिदान का प्रतीक है राष्ट्र के प्रति हिम्मत और नि:स्वार्थ भावना को दिखाता है। ये बेहद आम और हिन्दू, बौद्ध और जैन जैसे धर्मों के लिये धार्मिक महत्व का रंग है। केसरिया रंग विभिन्न धर्मों से संबंधित लोगों के अहंकार से मुक्ति और त्याग को इंगित करता है और लोगों को एकजुट बनाता है। केसरिया का अपना अलग महत्व है जो हमारे राजनीतिक नेतृत्व को याद दिलाता है कि उनकी ही तरह हमें भी किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के पूरे समर्पण के साथ राष्ट्र की भलाई के लिये काम करना चाहिये।

सफेद रंग
राष्ट्रीय ध्वज के बीच का भाग सफेद रंग से डिज़ाइन किया गया है जो राष्ट्र की शांति, शुद्धता और ईमानदारी को प्रदर्शित करता है। भारतीय दर्शन शास्त्र के मुताबिक, सफेद रंग स्वच्छता और ज्ञान को भी दर्शाता है। राष्ट्र के मार्गदर्शन के लिये सच्चाई की राह पर ये रोशनी बिखेरता है। शांति की स्थिति को कायम रखने के दौरान मुख्य राष्ट्रीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिये देश के नेतृत्व के लिये भारतीय राजनीतिक नेताओं का ये स्मरण कराता है।

हरा रंग
तिरंगे के सबसे निचले भाग में हरा रंग है जो विश्वास, उर्वरता ; खुशहाली ,समृद्धि और प्रगति को इंगित करता है। भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार, हरा रंग उत्सवी और दृढ़ता का रंग है जो जीवन और खुशी को दिखाता है। ये पूरे भारत की धरती पर हरियाली को दिखाता है। ये भारत के राजनीतिक नेताओं को याद दिलाता है कि उन्हें भारत की मिट्टी की बाहरी और आंतरिक दुश्मनों से सुरक्षा करनी है।

अशोक चक्र और 24 तिलीयाँ
हिन्दू धर्म के अनुसार, पुराणों में 24 संख्या बहुत महत्व रखता है। अशोक चक्र को धर्म चक्र माना जाता है जो कि समय चक्र भी कहलाता है। अशोक चक्र के बीच में 24 तिलीयाँ है जो पूरे दिन के 24 बहुमूल्य घंटों को दिखाता है। ये हिन्दू धर्म के 24 धर्म ऋषियों को भी प्रदर्शित करता है जो “गायत्री मंत्र” की पूरी शक्ति को रखता है (हिन्दू धर्म का सबसे शक्तिशाली मंत्र)। हिमालय के सभी 24 धर्म ऋषियों को 24 अक्षरों के अविनाशी गायत्री मंत्र के साथ प्रदर्शित किया जाता है (पहला अक्षर विश्वामित्र जी के बारे वर्णन करता है वहीं अंतिम अक्षर यज्ञवल्क्या को जिन्होंने धर्म पर शासन किया)।

भारतीय झंडे के मध्य में अशोक चक्र होने के पीछे भी एक बड़ा इतिहास है। बहुत साल पहले, भगवान बुद्ध को मोक्ष की प्राप्ति हुई अर्थात गया में शिक्षा मिली। मोक्ष की प्राप्ति के बाद वो वाराणसी के सारनाथ आ गये जहाँ वो अपने पाँच अनुयायी (अर्थात् पाँच वर्जीय भिक्क्षु) कौनदिन्या, अश्वजीत, भद्रक, महानाम और कश्यप से मिले। धर्मचक्र की व्याख्या और वितरण कर बुद्ध ने उन सबको अपना पहला उपदेश दिया। इसे राजा अशोक द्वारा अपने स्तंभ के शिखर को प्रदर्शित करने के लिये लिया गया जो बाद में भारतीय ध्वज के केन्द्र में अशोक चक्र के रुप में इस चक्र के उत्पत्ति का आधार बना। राष्ट्रीय झंडे के बीच में अशोक चक्र की मौजूदगी राष्ट्र में मजबूत संबंध और बुद्ध में विश्वास को दिखाता है।

12 तिलीयाँ भगवान बुद्ध के अध्यापन को बताता है जबकि दूसरी 12 तिलीयाँ अपने बराबर की प्रतीकों के साथ जोड़ें में है जैसे-अविध्या (अर्थात् ज्ञान की कमी), सम्सकारा (अर्थात् आकार देने वाला), विजनाना (अर्थात् चेतना), नमरुपा (अर्थात् नाम और रुप), सदायातना ( अर्थात् छ: इन्द्रिय जैसे- कान, आँख, जीभ, नाक, शरीर और दिमाग), स्पर्श (अर्थात् संपर्क), वेदना ( अर्थात् दर्द), तृष्णा (अर्थात् प्यास), उपदना (अर्थात् समझना), भाव (अर्थात् आने वाला), जाति (अर्थात् पैदा होना), जरामरना (अर्थात् वृद्धावस्था), और मृत्यु।

अशोक चक्र क्यों नौसेना की तरह नीले रंग में है ?
राष्ट्रीय ध्वज के सफेद पट्टी के केन्द्र में अशोक चक्र का नीला रंग, ब्रह्माण्ड की सच्चाई को दिखाता है। ये आकाश और समुद्र के रंग को भी प्रदर्शित करता है।

24 तिलियाँ क्या प्रदर्शित करती है ?
हिन्दू धर्म के अनुसार, राष्ट्रीय ध्वज की सभी 24 तिलीयाँ जीवन को दर्शाती है अर्थात् धर्म जो इस प्रकार है: प्रेम, बहादुरी, धैर्य, शांति, उदारता, अच्छाई, भरोसा, सौम्यता, नि:स्वार्थ भाव, आत्म-नियंत्रण, आत्म बलिदान, सच्चाई, नेकी, न्याय, दया, आकर्षणशीलता, नम्रता, हमदर्दी, संवेदना, धार्मिक ज्ञान, नैतिक मूल्य, धार्मिक समझ, भगवान का डर और भरोसा (भरोसा या उम्मीद)।

भारतीय तिरंगे (ध्वज) का इतिहास

एक ध्वज किसी देश का प्रतीक बनता है इसलिये किसी भी आजाद देश को एक राष्ट्र के रुप में एक अलग पहचान के लिये एक ध्वज की जरुरत पड़ती है। संविधान सभा की मीटिंग में 22 जुलाई 1947 को भारत के राष्ट्रीय ध्वज को इसके वर्तमान स्वरुप में स्वीकार किया गया था, 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से देश की आजादी से कुछ दिनों पहले। इसे तीन रंगों, अशोक चक्र और खादी की मदद से पिंगाली वेंकैया के द्वारा डिज़ाइन किया गया था।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज को क्षैतिज आकार में डिज़ाइन किया गया है जिसमें सभी तीन रंग अपने बराबर अनुपात में है। झंडे की चौड़ाई से इसके लंबाई का अनुपात 2:3 का है। बीच की सफेद पट्टी में नीले रंग का एक पहिया बना हुआ है जो 24 तिलीयों से युक्त अशोक चक्र का प्रतिनिधित्व करता है।

राष्ट्रीय ध्वज के अंतिम स्वीकारोक्त्ति के पहले, अपनी पहली शुरुआत से ये विभिन्न अद्भुत् बदलावों से गुजरा। ब्रिटिश शासन से आजादी के लिये राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान देश को अलग पहचान के लिये राष्ट्रीय ध्वज के आविष्कार और खोज अभियान की शुरुआत हुई।

भारतीय ध्वज का क्रमिक विकास

TIRANGA HISTORY

ऐसा कहा जाता है, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के ग्रीन पार्क (पारसी बागान स्क्वैयर) में 7 अगस्त 1906 में राष्ट्रीय झंडे को फहराया गया। ये साधारण रुप से डिज़ाइन किया गया ध्वज था जिसमें तीन रंगों (लाल, पीला, और हरा) से तीन क्षैतिज पट्टीयों का इस्तेमाल किया गया था। सबसे उपरी हरे रंग की पट्टी में 8 सफेद कमल के फूल बने हुए थे। बीच की पीली पट्टी में हिन्दी में “वन्दे मातरम्” लिखा हुआ था और सबसे नीचे की लाल पट्टी में अर्धचन्द्राकार बना हुआ था (किनारे के बाएँ तरफ) और सूरज (दाँयी तरफ)।

इतिहास के मुताबिक, ऐसा कहा गया कि 1907 में अपने निर्वासित क्रांतिकारी मण्डली के साथ मैडामें कामा द्वारा पेरिस में दूसरी बार भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को फहराया गया था। बाद में बर्लिन के सामाजिक सम्मेलन में उसी झंडे को प्रदर्शित किया गया था। पहले से दूसरा ध्वज थोड़ा अलग था। इसमें सबसे ऊपरी पट्टी में नारंगी रंग था जिसमें एक कमल और सात सितारे (भेदक सप्तऋषि) बने थे। मध्य के पीले रंग की पट्टी में हिन्दी में “वन्दे मातरम्” लिखा था और सबसे नीचे की हरे रंग की पट्टी में बाँयी तरफ सूरज और दाँयी तरफ अर्धचन्द्र और सितारे बने हुए थे।

इसे तीसरी बार 1917 में डॉ ऐंनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक द्वारा होमरुल आंदोलन के दौरान फहराया गया। इसे एकान्तर तरीके में पाँच लाल और चार हरी क्षैतिज पट्टीयों में डिज़ाइन किया गया था। इसमें सात भेदक सप्तऋषि सितारों के साथ बाँये शिखर में एक यूनियन जैक और दाँयी ओर शिखर पर अर्धचन्द्र और सितारा था।

1921 में, भारतीय काँग्रेस कमेटी ने बेजवाड़ा (विजयवाड़ा) में लाल और हरी रंग की दो पट्टीयों वाली ध्वज (जिसमें लाल और हरा रंग हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को प्रदर्शित करता है) तैयार की और उसे महात्मा गाँधी के पास ले गये। जहाँ पर उन्होंने बीच में एक सफेद पट्टी (दूसरे समुदायों के लिये) और एक नीले पहिये (चक्र) को लगाने का सुझाव दिया जो राष्ट्र के प्रगति को प्रदर्शित करे।

अंतत:, भारत में तिरंगे झंडे (गाँधी जी के सुझाव पर) को अंगीकृत करने के लिये 1931 में एक प्रस्ताव पास हुआ था। इसमें सबसे ऊपर नारंगी, बीच में सफेद और सबसे नीचे हरा रंग है। बीच की सफेद पट्टी के मध्य में एक घूमता हुआ पहिया बना हुआ है।

हालाँकि, संविधान सभा के सम्मेलन में 22 जुलाई 1947 में इसे पूरी तरह से अपना लिया गया था फिर भी उन लोगों ने ये फैसला किया कि थोड़े बदलाव के साथ राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया जाएगा, राष्ट्रीय ध्वज में प्रतीक के रुप में राजा अशोक के धर्म चक्र को घूमने वाले पहिये से बदला गया। यही ध्वज अंतत: आजाद भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज की नियमावली क्या है ?

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भारतीय ध्वज राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है जो लोगों की अभिलाषा और उम्मीद को दिखाता है। भारत की आजादी से अभी तक हमारे भारतीय सेनाओं ने दुश्मनों से तिरंगे को बचाया है और इसके सम्मान को बनाये रखा है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज की नियमावली पहले से निर्धारित कानूनों का समुच्चय है जो दूसरे देश के लोगों और भारतीयों द्वारा तिरंगे के उपयोग को संचालित करता है। निर्धारित मानकों (1968 में बना और 2008 में सुधार हुआ) के आधार पर भारतीय स्टैंडर्ड ब्यूरो को इसके निर्माण, डिज़ाइन, और सही इस्तेमाल के लिये नियमन करने का अधिकार दिया गया है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज नियमावली को 2002 में लिखा गया और उन्हें कुछ धाराओं के साथ मिलाया गया जैसे: “प्रतीकों के प्रावधान और नाम (गलत इस्तेमाल से रोकथाम के लिये) धारा 1950 (1950 का संख्या 12), धारा 1971 के तहत राष्ट्रीय सम्मान को ठेस पहुँचाने से निवारण के लिये (1971 के संख्या 69)। अंततोगत्वा, “भारत, के ध्वज नियमावली 2002” के रुप में 26 जनवरी 2002 में ध्वज नियमावली प्रभावी हुआ। इसके तीन भाग है जैसे कि:

  • पहले भाग में राष्ट्रीय ध्वज के सामान्य विवरण दिये हुए है।
  • दूसरे भाग में सरकारी, निजी संस्था और शिक्षण संस्थानों द्वारा इसके उपयोग को लेकर दिशा-निर्देश दिये गये है।
  • और तीसरे भाग में केन्द्रीय और राज्य सरकार तथा इनकी एजेँसीयों के द्वारा इसके इस्तेमाल को लेकर हिदायत दी गयी है।

राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग को लेकर सभी नियम, कानून और अधिकार अधिकारिक रुप से भारत के ध्वज कानून के अंतर्गत वर्णित किये गये है जो इस प्रकार है: “ सबसे ऊपरी पट्टी का रंग भारतीय केसरिया और सबसे नीचे की पट्टी का रंग भारतीय हरा होना चाहिये। बीच की पट्टी सफेद होनी चाहिये, तथा इसी पट्टी के मध्य में नीले रंग के चक्र में समान दूरी पर 24 तिलियाँ होनी चाहिये।”

राष्ट्रीय ध्वज को यदि किसी के द्वारा खादी या हाथ से बुने हुए कपड़ों के अलावा किसी और कपड़ो का इस्तेमाल करता है तो जुर्माने के साथ तीन साल की सजा का प्रावधान है। ख़ादी के लिये कॉटन, सिल्क और वुल के अलावा किसी और कपड़ों का इस्तेमाल की सख्त मनाही है। दो प्रकार के ख़ादी से झंडा तैयार होता है (ध्वज के ढ़ाँचे को बनाने के लिये ख़ादी ध्वजपट और पोल को थामे रखने के लिये ध्वज के अंतिम छोर को तैयार करने के लिये मटमैले रंग का कपड़ा आर्थात् ख़ादी-ड्क)। साथ ही कपड़े के हर एक स्क्वैयर सेंटीमीटर पर केवल 150 धागे ही रहेंगे, एक सिलाई पर चार धागे और एक स्क्वैयर फीट कपड़े का वजन 205 ग्राम होना चाहिए।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के नियमावली के नियम और विनियमन क्या है ?

26 जनवरी 2002 के कानून पर आधारित भारत के राष्ट्रीय ध्वज कानून के अनुसार, झंडा फहराने के कुछ कायदे-कानूनों को जरुर ध्यान में रखना चाहिये:

  • अपने राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के लिये विद्यार्थीयों के प्रेरणा स्वरुप इसे शिक्षण संस्थानों (जैसे कि स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, खेल कैम्प, स्कॉउट आदि) में फहराने की इज़ाजत दी गयी। झंडा फहराने के साथ ही शिक्षण संस्थानों में संकल्प की प्रतिबद्धता का पालन अवश्य होना चाहिए।
  • ध्वज के सम्मान और गरिमा का ध्यान रखते हुए किसी भी राष्ट्रीय अवसर पर सरकारी या निजी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को फहराया जा सकता है। नये नियम के सेक्शन 2 के अनुसार, आम आदमी भी अपने परिसर के अंदर झंडा फहरा सकता है।
  • ध्वज का किसी सांप्रदायिक या व्यक्तिगत लाभ के लिये कपड़े के रुप में इस्तेमाल नहीं करना है। इसे कहीं भी केवल सूर्योदय से सूर्यास्त के समय तक फहराना है।
  • इसको जानबूझकर ज़मीन, फर्श या पानी में घसीटना नहीं है।
  • किसी भी स्थिति में इसका इस्तेमाल कार, हवाई जहाज़, ट्रेन, बोट आदि के ऊपर, नीचे या किनारों को ढ़कने के लिये नहीं होना चाहिये।
  • यदि कोई राष्ट्रीय ध्वज के साथ किसी दूसरे ध्वज का उपयोग कर रहा/रही है तो उसे इस बात का एहसास जरुर होना चाहिए कि किसी दूसरे ध्वज की ऊँचाई हमारे राष्ट्रीय ध्वज से अधिक नहीं होनी चाहिए। कोई भी इसके ऊपर नहीं रखा जा सकता या इसे सज़ावट के लिये इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय ध्वज के बारे में महात्मा गाँधी के विचार

“सभी राष्ट्रों के लिये ध्वज जरुरी है। लाखों इसके लिये कुर्बान हुए। इसमें कोई शक नहीं कि एक प्रकार की मूर्तिपूजा है जो पाप का नाश करने के लिये होगी। ध्वज आदर्श को प्रस्तुत करता है। यूनियन जैक का फहराना अंग्रेजी अन्त:करण भावनाओं को उत्पन्न करता है जिसकी मजबूती को मापना कठिन है। अमेरिकन के लिये सितारे और पट्टी एक दुनिया है। इस्लाम में सर्वोच्च बहादुरी सितारों और अर्धचन्द्र को आगे ले जाना है”

“ये हमारे लिये जरुरी है कि भारतीय मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी और उन सभी के लिये जो भारत को अपना घर मानते है एक ध्वज के लिये जीयें और मरें। ”-महात्मा गाँधी

भारतीय ध्वज से संबंधित भाव

  • मै तब हाई स्कूल में था जब पंडित नेहरु ने नई दिल्ली में झंडा फहराया था- ए.पी.जे.अब्दुल कलाम
  • “शांति और समरसता में जीने के लिये, एकता और मजबूती, के साथ हमें एक लोग, एक राष्ट्र और एक ध्वज को मानना चाहिये।“- पॉलिन हैंसन
  • “मेरा मानना है कि हमारा ध्वज कपड़े और स्याही से कुछ ज्यादा है। ये विश्वभर में पहचाने जाने वाला प्रतीक है जो उदारता और आजादी के लिये खड़ा होता है। ये हमारे राष्ट्र का इतिहास है, और ये उनके खून से लिखा हुआ है जो इसे बचाने मे शहीद हुए।“- जॉन थुने
  • “हमारा ध्वज बहुत राजनीतिक विचारों में केवल एक नहीं है, बल्कि, ये हमारी राष्ट्रीय एकता की पहचान है।”- एंड़्रियन क्रोनाउर
  • “हमारा ध्वज उनका सम्मान करता है जो इसकी सुरक्षा के लिये लड़ते है, और हमारे राष्ट्र के निर्माणकर्ताओं के बलिदान को याद दिलाता है। अमेरिका के ऐतिहासिक कहानियों के सर्वश्रेष्ठ प्रतिरुप के रुप में इस राष्ट्र के सबसे उत्कृष्ठ सितारों और पट्टीयों को प्रदर्शित करते है। ”- जो बार्टोन
  • “क्या बची हुई उम्मीद है लोगों की ? एक देश, एक भाषा, एक ध्वज! ”- एलेक्जेंडर हेनरिक
  • “एक देशभक्त और नागरिक होने से ज्यादा ध्वज को उठाना और संकल्प लेने में है।”- जेसे वेनचुरा
  • “र्निदोष लोगों की हत्या के शर्म को ढ़कने के लिये कोई भी बड़ा ध्वज कम पड़ जाएगा। ”-हॉवर्ड जिन्न
  • “ध्वज को लहराने में देशभक्ति नहीं होती, लेकिन इस प्रयास में कि हमारा देश अवश्य ईमानदार और मजबूत होना चाहिये।”- जेम्स ब्रिस
  • “हम अपना सिर! और हमारा दिल! देते है अपने देश को! एक देश! एक भाषा! एक ध्वज! ”-कर्नल जॉर्ज.टी.बाल्क
    “दिलों का संयोजन, हाथों का मिलन और एकता का ध्वज हमेशा के लिये। ”- जार्ज पोप मॉरिस
  • “चलिये एक ही ध्वज के तहत जन्म ले जिसमें हम हर आवश्यकता में रैली करें, हमारा एक देश है, एक संविधान है, एक किस्मत है। ”- डेनियल वेबस्टर
  • “हमारे पास केवल एक ध्वज है, एक देश है; चलिये एक साथ होते है। हमलोग रंगों में अलग हो सकते है लेकिन भावनाओं में नहीं। बहुत कुछ मेरे बारे कहा गया है जो गलत है और जो श्वेत और काले लोग यहाँ है, जो कि शुरु से अंत तक युद्ध में मेरे साथ रहे, मेरा खंडन कर सकते है। ”- नॉथन बेडफोर्ड फौरेस्ट

आइए सुनते हैं तिरंगे का गीत

(साभार – हिन्दी की दुनिया डॉट कॉम)

 

फैशन को दीजिए देसी रंग

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देसी लुक सिर्फ गणतन्त्र दिवस, शादी या फिर 15 अगस्त का मामला नहीं हैं। रोजमर्रा की भागदौड़ के लिए जींस, टी-शर्ट, टॉप जैसे वेस्टर्न कपड़े हम सबको पसंद है, क्योंकि ये पहनने में काफी कंफर्टेबल और स्टाइलिश लगते हैं। लेकिन भारतीय कपड़े भी स्टाइल के मामले में कहीं पीछे नहीं है। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि देसी आउटफिट्स भी बेहद पसंद है। समारोह से लेकर कॉलेज और ऑफिस तक, आप इन्हें पहन सकती हैं। आखिरकार दिल तो हमारा हिन्दुस्तानी ही है इसलिए आप एक दिन ही नहीं हर बार देसी लुक आजमा सकती हैं क्योंकि भारतीय हैं हम और हमें गर्व है अपनी संस्कृति पर –

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लॉन्ग स्कर्ट – इसे आप घाघरा भी बना सकती हैं या कुरती से लेकर टॉप और क्रॉप टॉप के साथ भी पहन सकती हैं

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झुमके – एथनिक वेयर के साथ झुमके का कॉम्बिनेशन बिल्कुल परफेक्ट है। फिर चाहे आप सूट पहनें या कैज़ुअल कुर्ता, किसी के भी साथ आप इसे कैरी कर सकती हैं।

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कुर्ता – कुर्ता एक ऐसा परिधान है, जिसे हम कैज़ुअल वेयर के रूप में पहन सकते हैं। कॉलेज, हैंगआउट, ऑफिस हर जगह ये परफेक्ट होता है। एक कैज़ुअल कुर्ता आपके पास होना चाहिए, जिसे आप जींस के लेकर लैगिंग्स, पलाज़ो तक किसी के भी साथ कैरी कर पाएं।

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दुपट्टा – दुपट्टा आपके प्लेन लुक में भी देसी तड़का लगा सकता है। अगली बार अपने प्लेन सूट के साथ फुलकारी, बांधनी, लहरिया, बनारसी कोई भी मैचिंग दुपट्टा कैरी करें।

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सूट – आप सिंपल सूट्स के अलावा पटियाला, अनारकली, पलाज़ो सूट्स भी पहन सकती हैं।

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जूतियाँ या मोजरी – सूट, कुर्ता जैसे एथनिक वेयर्स के साथ जूतियां बिल्कुल देसी वाइब्स देती हैं। अपने फुटवेयर कलेक्शन में जूतियां भी शामिल करें।

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साड़ी – कोई शादी हो या ऑफिस पार्टी या कॉलेज फ्रेशर्स, साड़ी पहनना का हम कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। एक कैज़ुअल और एक हैवी साड़ी आपकी कबर्ड के लिए परफेक्ट है।

 

अरुण यह मधुमय देश हमारा

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जयशंकर प्रसाद

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अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।।

गणतन्त्र दिवस पर बिखरे तीन रंग का स्वाद

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तिरंगा पनीर पकौड़ा

TRI COLOUR PAKODA

सामग्री – 250 ग्राम पनीर, 1 छोटा कप बेसन, 1 छोटा चम्मच अचार का मसाला, 1 बड़ा चम्मच पुदीना की चटनी, 1 छोटा चम्मच टोमैटो सॉस, 1 छोटा चम्मच चिली सॉस, नमक स्वादानुसार, 1 छोटा कप कटा हुआ हरा धनिया, तलने के लिए तेल।

विधि – सबसे पहले पनीर को समान रूप से तीन भाग में काट लें और हर परत पर पुदीने की चटनी, आचार का मसाला, चिली और टोमैटो सॉस लगाकर एक के ऊपर परत रख दें। अब एक बर्तन में बेसन, 1 छोटा चम्मच तेल, लाल मिर्च, गरम मसाला , नमक, हरा धनिया और थोड़ा-सा पानी डालकर गाढ़ा घोल बना लें। अब इसमें पनीर को डिप करके डीप फ्राई कर लें। सभी टुकड़ों को ऐसे ही फ्राई करके काट लें। तिरंगा पनीर पकौड़े को चटनी और सॉस के साथ सर्व करें।

 

 

 तिरंगी बर्फी

TRI COLOUR BARFI

सामग्री -500 ग्राम मावा (खोया), 250 ग्राम शक्कर, 100 ग्राम घी, कटे हुए बादाम, कटे हुए पिस्ता, कटे हुए काजू, दो चम्मच नारियल बूरा, 2 से 3 बूंद खाने वाला हरा रंग, 2 से 3 बूंद खाने वाला केसरिया रंग, दो चुटकी केसर, 2 से 3 चाँदी वर्क की पत्ती (सजावट के लिए)

 विधि – एक कढ़ाई में घी गर्म करें, गर्म घी में बादाम, पिस्ता और काजू को भून लें। फिर दुसरी कढ़ाई में मावा भूनें हल्का गुलाबी होने पर, मावे में शक्कर डालकर चलाएं, जब शक्कर पूरी तरह घुल जाए तो गैस बंद कर दें।  फिर मावे को तीन हिस्सों में बांट लें, मावे के एक हिस्से में हरा रंग, एक हिस्सा बिना रंग का सफेद रखें, एक हिस्से में केसरिया रंग और थोड़ा केसर मिलाएं। अब एक थाली में घी लगाएं और थाली में सबसे पहले हरे रंग के मावे की परत बिछाएं, फिर सफेद मावा और सबसे ऊपर केसरिया रंग के मावे की परत बिछाएं।  बाद में मावे पर ऊपर से बादाम और पिस्ता डालकर ठंडा होने के लिए रख दें, फिर चाँदी का वर्क लगाकर मनचाहे आकार में तिरंगी बर्फी काटकर मुंह मीठा करें।

 

बनारस की बेटियों के पोस्टरों को गिनीज बुक में जगह मिली

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बनारस की बेटियों के हाथों से बनाए गए 302 पोस्टरों की सिरीज़ को गिनीज़ बुक में जगह मिली है। बनारस की बेटियों के बनाए 302 पोस्टरों की सिरीज़ को गिनीज़ बुक में जगह मिली है। यह रिकॉर्ड बनारस के डॉक्टर जगदीश पिल्लई ने फोटो जागरूकता अभियान के तहत इन पोस्टरों का इस्तेमाल कर बनाया। आइए मिलते हैं उन स्कूली बच्चियों से, जिन्होंने अपनी-अपनी सोच और नज़रिए को लेकर बेटियों पर पेंटिंग्स बनाई हैं। मैने अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहने हुए डांस करते हुए एक लड़की की तस्वीर इसलिए बनाई है कि लड़कियों को भी अपनी इच्छा के मुताबिक़ कपड़े पहनने की छूट मिलनी चाहिए और ज़िंदगी जीने की आज़ादी होनी चाहिए.

बेटी पढ़ी लिखी होती है तो पूरे घर को साक्षर करती है. लड़कों के साथ ऐसा नहीं होता। इसके बावजूद लड़कियों को पर घर-गृहस्थी का काम यह बोलकर थोप दिया जाता है कि तुम्हें एक दिन ससुराल जाना है।

मैने पेंटिंग में खुद को घर से किताब लेकर स्कूल के लिए निकलते दिखाया है।

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पूनम – मैंने अपनी पेंटिंग में बाधा दौड़ में हिस्सा लेने वाले धावक दिखाया है. मुझे खेल-कूद पसंद हैं और मैं खेलों की दुनिया में नाम कमाना चाहती हूँ। लड़कों की ही तरह लड़कियों को भी खेल-कूद की आज़ादी मिलनी चाहिए। मैं पहले स्कूल में कबड्डी खेलती थी, लेकिन घर देर से आने पर डांट पड़ती थी. मुझे कबड्डी छोड़नी पड़ी।

नेहा –मेरी पेंटिंग में एक लड़की, दीपक और किताब नज़र आएगी। कुल का चिराग बेटे को माना जाता है, लेकिन लड़कियां भी लिख-पढकर ज्ञान का प्रकाश फैला सकती है। मुझे अक्सर तब डाँट पड़ती है, जब मैं पढ़कर देर से घर पहुंचती हूं।

नेहा पटेल -मैंने अपनी पेंटिंग में मैं ख़ुद को गांव की एक लड़की की तरह दिखाया है, जो आगे चल कर स्कूल टीचर बनती है। गांव में लड़कियों के पहनावे और बाहर आने-जाने पर कई तरह के रोकटोक हैं।

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निकिता -मैंने किताब और कलम इसलिए बनाई कि इसकी ताक़त से लड़कियां ख़ुद को साबित कर सकती हैं।

मेरा इलाका लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है. शाम-रात के वक़्त अक्सर अपनी मम्मी के साथ ही घर पहुचती हूँ। डॉक्टर पिल्लई ने बताया कि इससे पहले 232 पोस्टरों के साथ यह रिकार्ड महाराष्ट्र की सागर अंजनादेवी सूर्यकांत माणे के नाम था। वे कहते हैं, “मैंने 302 पोस्टरों के ज़रिए यह रिकार्ड अपने नाम कर लिया. मोदी सरकार ने बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान छेड़ा हुआ है.”

आठ सितम्बर को बनारस के छह अलग-अलग शिक्षण संस्थानों में हुई पेंटिंग प्रतियोगिता में 516 बच्चियों ने हिस्सा लिया था. इसमें से 302 चित्रों को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने चुना। इन चुने हुए 302 चित्रों को गिनीज़ बुक के नियमानुसार पोस्टर में तब्दील कर शहर भर में लगाया गया.

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

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शादी में दहेज़ न लेकर, पहलवान योगेश्वर दत्त ने कायम की युवाओं के लिए एक मिसाल!

 

भले ही भारत के पहलवान, योगेश्वर दत्त ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने से चूक गए हो पर अपनी शादी में दहेज़ न लेने का ऐलान कर के उन्होंने ये साबित कर दिया कि उनका दिल सोने का है।

बीते शनिवार को योगेश्वर की सोनीपथ के मुरथल में हरयाणा के कांग्रेस नेता जयभगवान शर्मा की बेटी शीतल से सगाई थी और 16 जनवरी को शादी। उनकी शादी वैसे अपने आप में चर्चा का विषय है लेकिन योगेश्वर की यह शादी दहेज को लेकर भी चर्चा मे रही।

योगेश्वर ने फैसला किया था कि वह दहेज के रूप में दुल्हन के परिवार से केवल एक रुपया लेंगे।

योगेश्वर ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए कहा, “मैंने देखा है कि मेरे परिवार के लोगों ने अपनी लड़कियों के लिए कितनी मुश्किल से दहेज का पैसा जुटाया था। उनको कितनी परेशानी उठानी पड़ी मैं जानता हूं। 34 साल के योगेश्वर ने आगे कहा, ‘उसके बाद मैंने बड़े होते हुए सिर्फ दो ही चीजें सोची थीं। पहली बात तो यह है कि मैं कुश्ती में बड़ा मुकाम हासिल करूंगा और दूसरा कि दहेज नहीं लूंगा।”

उन्होंने कहा कि ‘मेरा पहला सपना पूरा हो गया है। अब दूसरे सपने और वादे को पूरा करने का वक्त है।’ योगेश्वर ने आगे कहा कि काश उनकी शादी को देखने के लिए उनके पिता रामेश्वर दत्त और मास्टर सतबीर सिंह जिंदा होते। योगेश्वर ने कहा कि उनकी इच्छा थी कि उनका दूसरा सपना पूरा होते हुए देखने के लिए उनके पिता और कोच जिंदा होते। योगेश्वर की मां सुशीला देवी ने कहा कि योगेश्वर की शादी उनके लिए खास मौका है। उन्होंने यह भी कहा कि वह दुल्हन के परिवार से शगुन के तौर पर बस एक रुपए के अलावा कुछ और नहीं लेंगी।

हालांकि हमारे देश में अब दहेज़ की प्रथा को अवैध करार कर दिया गया है, फिर भी इस कुप्रथा का पूरी तरह विनाश नहीं हुआ है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2015 में लोक सभा को लिखे अपने पत्र में सूचित किया था कि भारत में महज़ 3 साल में करीब 24,771 दहेज़ के लिए हत्या के मामले सामने आये है।

ऐसे में युवा वर्ग के लिए मिसाल माने जाने वाले योगेश्वर दत्त के इस नेक कदम से देश भर के युवाओं को एक अच्छी सीख मिलेगी।

 

बीएसएफ बना रहा है महिला बाइकर्स की स्टंट टीम

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इस साल मार्च में बीएसएफ को बाइक पर स्टंट करने वाली महिलाओं की पहली टीम मिल जाएगी। इसे नाम दिया गया है, ‘महिला जांबाज’. इस टीम को पुरुष जांबाज टीम के एक्सपर्ट सब-इंस्पेक्टर के एम कल्याण ट्रेनिंग दे रहे हैं।

देशभर की 5 हजार महिला सैनिकों में से सिर्फ 46 को इस टीम के लिए चुना गया है। ग्वालियर की बीएसएफ अकादमी टेकनपुर में पिछले साल 22 अक्टूबर से इन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है. ताकि टीम मार्च में अपनी पहली परफॉर्मेंस दे सके। दैनिक भास्कर की एक खबर के मुताबिक रोजाना इन्हें छह घंटे ट्रेनिंग दी जाती है। ये टीम अब तक 13 प्रकार के फॉर्मेशन बनाना सीख चुकी है। सीआरपीएफ भी इससे पहले महिलाओं की ऐसी टीम बना चुकी है लेकिन वह कभी 8 फॉर्मेशन से आगे नहीं जा पाईं।

लद्दाख से आईं सब इंस्पेक्टर स्टेजिंग नॉरयांग इस महिला बाइकर टीम की कैप्टन हैं। वह कहती हैं कि हमारे साथ ट्रेनिंग ले रहीं 46 में 43 लड़कियों ने कभी साइकिल भी नहीं चलाई थी लेकिन इस टीम के लिए हम बाइक चलाना सीख रही हैं।

अभी तक ये टीम 13 फॉर्मेशन पूरे कर चुकी है और इसका लक्ष्य 22 फॉर्मेशन बनाने तक पहुंचने का है। अगर टीम सभी 22 फॉर्मेशन में कुशल हो जाती है तो 2018 में राजपथ पर बीएसएफ की तरफ से पुरुषों की जगह यह टीम अपना प्रदर्शन दिखा सकेगी। अगर ऐसा हुआ तो राजपथ पर बाइक स्टंट करने वाली महिलाओं की यह देश में पहली टीम होगी।

 

प्रियंका ने दूसरी बार अपने नाम किया पीपल चॉइस पुरस्कार

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भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने ‘ग्रे’ज एनाटॉमी’ की अभिनेत्री एलेन पोम्पिओ और वियोला डेविज को पीछे छोड़ते हुए ‘2017 पीपल चॉइस अवार्ड’ में पसंदीदा ड्रामेटिक टीवी अभिनेत्री का पुरस्कार अपने नाम कर लिया है।

प्रियंका को यह पुरस्कार उनके अमेरिकी टीवी शो ‘क्वांटिको’ के लिए मिला। उनका यह दूसरा पीपल चॉइस अवार्ड है । पसंदीदा ड्रामेटिक श्रेणी में विजेता घोषित किए जाने के बाद प्रियंका ने अपनी मां मधु चोपड़ा को गले लगाया और फिर वह पुरस्कार लेने मंच पर गई।

इस श्रेणी में कैरी वाशिंगटन और ताराजी पी हेनसन भी नामित थीं। पुरस्कार मिलने से ‘अभिभूत’ प्रियंका ने कहा कि वह पॉम्पेओ, डेविस और अन्य के साथ नामित होकर सम्मानित महसूस कर रही हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘ आप लोगों का शुक्रिया। यह सफर अद्भुत रहा। मेरे साथ आज इस श्रेणी में नामित हर एक महिला, ये सभी बेहतरीन अभिनेत्रियां ही मेरे टेलीविजन शो करने का कारण हैं । ’’ इस दौरान प्रियंका के ‘बेवॉच’ के सह-कलाकार ड्वेन जॉनसन लगातार दर्शक दीर्घा से उनकी हौसला अफ़ज़ाई करते दिखे।

प्रियंका के अलावा ‘2017 पीपल चॉइस अवार्ड’ में भारतीय मूल की लिली सिंह को भी पसंदीदा यूट्यूब स्टार की श्रेणी में नामित किया गया था।

 

उर्दू शायर, गीतकार नक्श लायलपुरी का निधन

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जानेमाने उर्दू शायर और गीतकार नक्श लायलपुरी का आज सुबह अपने घर में निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। उनकी पुत्र-वधू टीना घई ने बताया कि लायलपुरी ने कल शाम सात बजे के बाद अपनी आंखें नहीं खोलीं। वह अपनी बेटी के अलावा किसी अन्य को पहचान नहीं पा रहे थे।

टीना ने कहा, ‘‘वह बहुत तकलीफ में थे। मार्च और अक्तूबर में उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गयी थी, और वह अस्पताल में भर्ती थे। वह बहुत कमजोर हो गए थे।’’ उनका अंतिम संस्कार आज शाम ओशिवारा शवदाहगृह में होगा।

टीना ने कहा, ‘‘वह अब भी उर्दू शायरी पढ़ना चाहते थे और काफी कुछ पढ़ने को बचा हुआ था। उनकी एक आंख की रोशनी खत्म हो गयी थी, लेकिन वह फिर भी पढ़ना चाहते थे, पढ़ने की उनकी प्रबल इच्छा थी।’’ उनका जन्म मौजूदा पाकिस्तान स्थित पंजाब प्रांत के लायलपुर में हुआ था। उनका नाम जसवंत राय था। फिल्मों में उन्हें पहला ब्रेक 1952 में फिल्म ‘जग्गू’ में मिला जिसमें उन्होंने ‘‘अगर तेरी आंखों से आंखें मिला दूं’’ गीत लिखा था।

उनकी चर्चित फिल्मों में ‘‘चेतना’’, ‘‘आहिस्ता आहिस्ता’’, ‘‘तुम्हारे लिए’’, ‘‘घरौंदा’’ भी शामिल हैं।