Saturday, April 4, 2026
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राजनीति की गलियों से इश्क के मकां तक….सचिन – सारा का प्यार

वर्ष 2004 में मकर संक्रांति का त्योहार गुजर चुका था। दिल्ली में ठंड जोरों पर थी. 20, केनिंग लेन में गहमागहमी थी। अगले दिन यहां ऐसी शादी होने वाली थी, जिसपर सत्ता के गलियारों की भी खास नजर थी. 15 जनवरी को ये घर शादी का गवाह बना। दूल्हा थे सचिन पायलट और दूल्हन सारा अब्दुल्ला. ये घर था दौसा से कांग्रेस सांसद रमा पायलट का… लोग कम थे. सुरक्षा ज्यादा. सारा के पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला लंदन में थे। भाई उमर अब्दुल्ला अंपेडिसाइटस के इलाज के लिए दिल्ली के बत्रा हास्पिटल में भर्ती हो चुके थे यानि वधू पक्ष की ओर से किसी ने शादी में शिरकत नहीं की।
ये शादी अब्दुल्ला परिवार को मंजूर नहीं थी। जिस देश में रोज धर्म और जातियों के नाम पर तलवारें खिंचती हों, उसमें ये शादी कुछ नहीं बल्कि काफी अलग और खास थी. क्योंकि लड़का हिन्दू था और लड़की मुसलमान।
शादी हुई. सचिन और सारा पति-पत्नी बन गए। शादी को अब 14 साल हो चुके हैं। दोनों के दो बेटे हो चुके हैं. कभी सियासत में कदम नहीं रखने की बात करने वाले सचिन अब देश के संभावनाशील युवा नेता के रूप में धाक जमा चुके हैं। सारा सामाजिक कामों में व्यस्त रहती हैं। दोनों परफेक्ट कपल हैं. दोनों की शादी को कोई फिल्मी स्टाइल वाली शादी कहता है तो कोई इसे प्यार की मिसाल मानता है। वैसे दोनों के प्यार और शादी की कहानी बेहद खूबसूरत लवस्टोरी लगती है।

आसान नहीं थी डगर
ये प्रेम कहानी इतनी आसान थी नहीं। मोड़ इतने टेढ़े और मुश्किल थे कि उन पर संतुलन बनाकर चलना और मंजिल तक पहुंच पाना मुश्किल ही नहीं असंभव सा लग रहा था। सारा और सचिन पायलट को शादी के कुछ ही महीनों बाद रॉन्डिवू विद सिमी ग्रेवाल शो में आमंत्रित किया गया। दोनों शादी के बाद पहली बार किसी टीवी शो पर गए थे। सारा ने कहा, ‘हम दोनों के परिवारों में दोस्ताना था और मेल-मुलाकातें होती रहती थीं. लिहाजा हम दोनों एक दूसरे को बचपन से ही जानते थे।’

लेकिन ये प्रेम कहानी शुरू कब हुई? शायद शादी के तीन साल से कुछ अधिक समय पहले। वो दोनों लंदन में थे. किसी पारिवारिक क्रार्यक्रम में मिले थे… और एक दूसरे के प्रति आकर्षण महसूस किया था। दोनों नजदीक आए। रोमांस शुरू हुआ। तब तक सचिन लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर भारत आ चुके थे। अब सारा पढ़ाई के लिए लंदन में थीं।

दोनों परिवारों में हुआ तगड़ा विरोध
दोनों ने महसूस किया कि वो एक दूसरे के लिए ही बने हैं। उन्हें लगने लगा कि अब शादी कर लेनी चाहिए। ये बात अब घर में बतानी थी। उन्हें अंदाजा तक नहीं था कि जब वो अपने परिवारों के सामने ये सब बताएंगे तो विरोध की चिंगारियां भी निकलने लगेंगी।

सारा ने सिमी ग्रेवाल से कहा, “हम दोनों के पिता अच्छे दोस्त थे। लंबे समय से एक दूसरे को जानते थे। लेकिन दिक्कतें शुरू हो गईं. दोनों परिवारों में विरोध हुआ। सबकुछ बहुत कठिन हो गया था। ऐसा लगने लगा कि शायद हम शादी कर ही नहीं पाएं। हमें भी नहीं मालूम था कि क्या कुछ कैसे होगा। कैसे रास्ता बनेगा। हम कुछ गलत नहीं कर रहे थे। हमारे सामने दो रास्ते थे या तो सबको खुश करें और इंतजार करें या फिर ये तय करें कि जो करना है तो कर लिया जाए।”

हैरान करने वाला था अब्दुल्ला परिवार का रुख
सचिन तो अपने परिवार को मनाने में सफल हो गए, लेकिन सारा के लिए ये बिल्कुल संभव नहीं हो सका। उनके पिता और भाई दोनों ने प्रेम विवाह किया था। पिता ने कैथोलिक क्रिश्चियन महिला से शादी की थी तो भाई ने सिख से। उनके घर में धर्म की कहीं कोई कट्टरता जैसा माहौल नहीं था, लेकिन पिता और भाई को ये रिश्ता कतई मंजूर नहीं था। हालांकि सचिन को अब्दुल्ला परिवार में पसंद किया जाता था।

एक कश्मीरी पत्रकार कहते हैं, “अब्दुल्ला परिवार को शायद लग रहा था कि जम्मू कश्मीर के मुसलमान पसंद नहीं करेंगे कि उनके परिवार की लड़की एक हिन्दू से शादी करे।

यहां तक की अब्दुल्ला परिवार के मित्रों के लिए ये हैरानी की बात थी, क्योंकि इस परिवार को हमेशा से खुले दिमाग वाला माना जाता रहा था। मित्रों के लिए ये अचरज की बात थी कि फारूक शादी के इतने खिलाफ क्यों हैं। मीडिया में तब यहां तक खबरें आईं कि फारूक शादी होने पर बेटी से रिश्ता तोड़ लेंगे। हालांकि अब्दुल्ला परिवार की कड़वाहट कुछ ही महीनों में खत्म हो गई। दोनों परिवारों में रिश्ते सामान्य हो गए। फारूक उसके बाद कई बार सचिन के साथ राजनीतिक मंच पर भी नजर आए.

शादी के दिन अब्दुल्ला परिवार का नहीं होना यही जाहिर भी कर रहा था। शादी को लेकर सारा प्रतिबद्ध थीं। लिहाजा शादी हुई। शादी के समय सचिन एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहे थे। समय का फेर देखिए कि शादी के कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनाव हुए। सचिन को राजनीति में आना पड़ा। उन्होंने राजस्थान की दौसा सीट से चुनाव लड़ा। 26 साल की उम्र में वह बड़े अंतर से जीत हासिलकर लोकसभा पहुंचे। यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में वह कॅरपोरेट मामलों के मंत्री बनाए गए।

मंत्रालय में तब उनके पर्सनल सेक्रेटरी (नाम नहीं देने का अनुरोध) रहे एक शख्स ने इस दंपति को करीब से देखा। वह कहते हैं, “ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे को खूब समझते हैं। आमतौर पर राजनीति में रहने पर परिवार के लिए समय बहुत कम हो जाता है, लेकिन मैंने कभी सारा मैडम को शिकायत करते नहीं देखा।” उन्होंने एक वाकया बताया, “सचिन सर के पहले बेटे का पहला बर्थ-डे था। हर कोई वर्थ-डे में आया था, लेकिन सर नहीं पहुंच सके. मौसम की वजह से फ्लाइट टल गई। इसी तरह दूसरे बर्थ-डे पर भी हुआ सारा मैडम ने कोई शिकायत नहीं की. वह काफी समझदार हैं.”

वह कहते हैं,  “एक कपल के रूप में मुझे अगर दोनों को नंबर देना हो तो दस में दस नंबर दूंगा।” वह सारा पायलट से जुड़ा एक और वाकया बताया, “सचिन पायलट के घर पर काम करने वाले एक सर्वेंट के नवजात बेटे के दिल में छेद था। सारा खुद उसे लेकर एम्स में डॉक्टर को दिखाने गईं। साथ सचिन सर को भी ले गईं।”

सारा और सचिन के दो बेटे हैं- आरान और विहान. सारा ने पिछले कुछ सालों में महिलाओं के लिए समाजसेवा करके अपनी एक पहचान बनाई है। वह जानी मानी योगा इंस्ट्रक्टर भी हैं. सचिन राजस्थान की राजनीति में व्यस्त हैं। हाल ही में वहां तीन सीटों पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस की जीत का सेहरा सचिन के सिर ही बंधा है।

(साभार)

भगवान शिव-पार्वती की पुत्री….अशोक सुंदरी

भगवान शिव की एक पुत्री भी थीं। जिनका नाम था ‘अशोक सुन्दरी’ इनका विवाह राजा नहुष से हुआ था। अशोक सुंदरी देवकन्या हैं, इस बात का उल्लेख पद्मपुराण में मिलता है, अशोक सुंदरी को भगवान शिव और पार्वती की पुत्री बताया गया है।

दरअसल माता पार्वती के अकेलेपन को दूर करने हेतु कल्पवृक्ष नामक पेड़ के द्वारा ही अशोक सुंदरी की रचना हुई थी। पद्म पुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती विश्व में सबसे सुंदर उद्यान में जाने के लिए भगवान शिव से कहा। तब भगवान शिव पार्वती को नंदनवन ले गए, वहां माता को कल्पवृक्ष से लगाव हो गया और उन्‍होंने उस वृक्ष को लेकर कैलाश आ गईं।

कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष है, पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने हेतु उस वृक्ष से यह वर मांगा कि उन्‍हें एक कन्या प्राप्त हो, तब कल्पवृक्ष द्वारा अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। माता पार्वती ने उस कन्या को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जैसे शक्तिशाली युवक से होगा।

एक बार अशोक सुंदरी अपने दासियों के साथ नंदनवन में विचरण कर रहीं थीं तभी वहां हुंड नामक राक्षस का आया। जो अशोक सुंदरी के सुंदरता से मोहित हो गया और उसने अशोक सुंदरी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।

लेकिन अशोक सुंदरी ने अपने भविष्य के बारे में बताते हुए विवाह के बारे में भी बताया कि उनका विवाह नहुष से ही होगा। यह सुनकर राक्षस ने कहा कि वह नहुष को मार डालेगा। ऐसा सुनकर अशोक सुंदरी ने राक्षस को शाप दिया कि उसकी मृत्यु नहुष के हाथों ही होगी। वह घबरा गया जिसके चलते उसने नहुष का अपहरण कर लिया।

उस समय नहुष काफी छोटे थे। नहुष को राक्षस हुंड की एक दासी ने बचाया। इस तरह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में नहुष बड़े हुए और उन्होंने हुंड का वध किया। इसके बाद नहुष तथा अशोक सुंदरी का विवाह हुआ तथा वह ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की अशोक सुंदरी माता बनीं।

 

वृन्दावन में हैं अनोखा मंदिर……प्रेम मंदिर

प्रेम मंदिर उतर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले की प्रसिद्ध नगरी वृंदावन में एक स्थित एक विशाल और खूबसूरत मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज ने भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया था। इस मंदिर का निर्माण पूरे विश्व में प्रेम प्रेम का सन्देश देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण व राधा रानी की दिव्य प्रेम लीलाओं की साक्षी वृंदावन नगरी में करवाया गया था। ये मंदिर लीलाधर श्री कृष्ण को समर्पित है. ये एक धर्मिक और आध्यात्मिक परिसर है जो मथुरा जिले के वृन्दावन के बाहरी इलाके में 54-एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस दिव्य मंदिर की निर्माण नींव जनवरी 2001 में श्री कृपालु जी महाराज द्वारा रखी गयी थी। इस मंदिर के निर्माण कार्य को समाप्त होने में 11 वर्ष का समय और लगभग 100 करोड़ की धनराशि का व्यय हुआ था। प्रेम मंदिर का उद्घाटन समारोह 15 फरवरी से 17 फरवरी 2012 के मध्य आयोजित किया गया था।
इस मंदिर के निर्माण में इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है। प्रेम मंदिर के भव्य भवन का निर्माण राजस्थान और उत्तर प्रदेश के हज़ारो शिल्पकारों ने मिल कर किया था. इस पुरे मंदिर का मंदिर का निर्माण सफ़ेद संगमरमर द्वारा किया गया है जिसकी रोशनी सफेद दूधिया रंग की है। प्रेम मंदिर दिल्ली-आगरा-कोलकाता के NH – 2 पर छटीकरा से लगभग 3 किलोमीटर वृंदावन की ओर भक्तिवेदांत स्वामी मार्ग पर स्थित है।
वृंदावन का ये मंदिर भारतीय शिल्पकला का एक अनूठा और नायाब उदाहरण है। यहाँ के पूज्य देवता श्री राधा गोविन्द (राधा कृष्णा) और सीता राम है। प्रेम मंदिर के नजदीक 73000 वर्ग फीट के क्षेत्रफल में फैला एक स्तंभ रहित, गुबंद आकार के सत्संग कक्ष (hall) का निर्माण किया गया है जिसमे एक समय से 25000 व्यक्ति समा सकते है।

इतिहास :-सं 1946, में जब कृपालु महाराज मात्र 24 वर्ष के थे, उन्होंने वृंदावन में एक विशाल मंदिर के निर्माण करने की शपथ ली थी। अपने अन्य दोस्त, गरगरा के श्री राम शंकर शर्मा, मानगढ़ के श्री लक्ष्मी नारायण और इटौरा के श्री सूर्य भूषण के साथ श्री महाराज जी मंदिरों के दर्शन करने के लिया वृंदावन गए। उस समय ये सभी मित्र संस्कृत व्याकरण का अध्ययन कर रहे थे। जब उन्होंने रंग जी मंदिर को देखा तो उन्होंने अपने मन में विचार किया की मुझे भी वृंदावन में एक विशाल मंदिर का निर्माण करना चाहिए। महाराज जी की ये बात सुनकर उनके मित्र उनका उपहास करने लगे और कहने लगे की मंदिर बनाना कोई बच्चों का खेल नहीं है।
कई बार उनके दोस्तों को ये एहसास हुआ था की वो कोई साधारण बालक नहीं है, बल्कि एक दैवीय शक्ति वाले व्यक्ति है लेकिन इस बार उन्हें यकीन नहीं हो रहा था की वास्तव में उनके लिए ये संभव है। 14 जनवरी 2001 को हज़ारो भक्तों की उपस्थिति में उन्होंने इस दिव्य मंदिर की नींव रखी। लगभग 12 वर्ष का समय और 1000 से अधिक श्रमिकों की मेहनत के बाद प्रेम मंदिर को एक आकार डिजाइन दिया गया। इसके अलावा छैनी और हथोड़े की मदद से इस विशाल मंदिर के भीतरी परिसर को तराशा गया था। इसके अतिरिक्त श्री राधा कृष्ण की अद्भुत लीलाओं को तराशने के लिए कुछ रोबोटिक्स मशीनों का भी प्रयोग किया गया था। इस तरह की विशेष मशीनों का प्रयोग इससे पूर्व भारत में नहीं किया गया था। वृंदावन स्थल का विकास स्वयं श्री कृपालु जी महाराज द्वारा किया गया था जिनका खुद का आश्रम वृंदावन में ही स्थित है।

वास्तुकला और डिजाइन :-

इस मंदिर का निर्माण और इसकी कल्पना केवल और केवल महाराज द्वारा की गयी थी। महाराज के विचार और दृष्टिकोण को प्रसिद्ध सोमपुरा परिवार के महान मूर्तिकार श्री सुमन राय त्रिवेदी और उनके पुत्र श्री मनोज सुमन राय त्रिवेदी द्वारा दोहराया गया जिन्हे गुजरात के महान मंदिर सोमनाथ के रचयता का सम्मान (गौरव) दिया जाता है। वृंदावन में स्थित श्री राधा कृष्ण और सीता राम का ये अनोखा मंदिर प्राचीन भारतीय कला और वास्तुकला को प्रदर्शित करता है। प्रेम मंदिर का पूर्ण निर्माण इटैलियन पत्थर से किया गया है, जिसमे अद्भुत नक्काशी और परिष्कृत शिल्पकला और कीमती पत्थरो से जडे हुए नमूने देखने को मिलते है।
ये मंदिर वृंदावन की एक अद्वितीय आध्यात्मिक संरचना है। इस मंदिर के ध्वज को मिलाकर इसकी ऊँचाई 125 फीट. है जिसमे 190 फीट लम्बा और 128 फीट चौड़ा चबूतरा है. मंदिर के चबूतरे पर एक परिक्रमा मार्ग का निर्माण किया गया है जिसके द्वारा श्री कृष्ण राधा की लीलाओं के 48 स्तंभों की खूबसूरती का दृश्य देखा जा सकता है जिनका निर्माण मंदिर की बाहरी दीवारों पर किया गया है। मंदिर की दीवारें 3.25 ft. मोटी है। मंदिर की गर्भ गृह की दीवार की मोटाई 8 फीट है जिस पर एक विशाल शिखर, एक स्वर्ण कलश और एक ध्वज रखा गया है। मंदिर की बाहरी परिसर में 84 स्तंभ है जो श्री कृष्ण की लीलाओं को प्रदर्शित करते है जिनका उल्लेख श्रीमद्भगवद में किया गया है।

 

किशोरों और युवाओं की समस्या सुलझायेगी सिनी की टीनलाइन

 

हम जो सोचते हैं और जो कहना चाहते हैं या कई बार हमारे साथ कुछ ऐसा होता है जिसकी शिकायत हम पहुँचाना चाहते हैं। ऐसा बच्चों के साथ भी होता है और किशोरावस्था में भी होता है…।किशोरावस्था मतलब टीनेजर्स…एक ऐसी उम्र जो उलझन भरी होती है जिसकी अपनी समस्यायें होती हैं, दिक्कतें होती हैं। दरअसल, 13 से 19 साल के भीतर हमारे शरीर में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं और आवाज भी बदल जाती है…मगर अपनी बात समझा पाना बहुत बार टीनेजर्स के लिए मुश्किल हो जाता है क्योंकि न तो आप छोटे रह ।जाते हैं और न ही इतने बड़े हो पाते हैं कि अपने फैसले खुद ले सकें। ये एक आम समस्या है मगर टीनेजर्स का एक बड़ा वर्ग है जो हमारे आस – पास है और बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है क्योंकि उसके पास हमारी तरह शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और समाज में आगे बढ़ने की सुविधा और पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। यही स्थिति युवाओं की भी है जबकि इस उम्र में भी मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। इन सारी समस्याओं से निपटने के लिए बहुत सी संस्थायें काम कर रही हैं और इनमें ही शामिल है सिनी। सिनी ने हाल ही में किशोरों और कम उम्र के युवाओं के लिए देश की पहली टॉल फ्री हेल्पलाइन सेवा शुरू की। सिनी ने यह नयी परिसेवा अपने 43वें स्थापना दिवस पर यह परिसेवा शुरू की जिसका उद्घाटन राज्य की स्वास्थ्य राज्य मंत्री चन्द्रिमा भट्टाचार्य ने किया।

दरअसल सिनी ने 2002 में टीनलाइन शुरू की थी जो कि एक काउंसिलिंग सेवा थी। इसके तहत युवाओ कों स्वास्थ्य और यौन स्वास्थ्य के साथ मनोसामाजिक यानि साइको सोशल, भावनात्मक और पारिवारिक समस्याओं से संबंधित परामर्श दिये जाते थे। काउंसिलिंग इस उम्र में युवाओं को समस्याओं को पहचानकर उनका निवारण करने में सहायक होती है। इससे वे सामाजिक. मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होकर आगे बढ़ पाते हैं  और खुद को अभिव्यक्त कर पाते हैं। सिनी द्वारा हाल में पेश की गयी टॉल फ्री टेलि काउंसिलिंग सेवा इसी टीनलाइन के कार्यों का विस्तार है। आप टॉल फ्री नम्बर (1800-121-5323) पर अपनी समस्यायें बता सकते हैं।

सिनी की असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. इन्द्राणी भट्टाचार्य ने बताया कि इस हेल्पलाइन पर युवाओं के अतिरिक्त अभिभावकों पर भी परामर्श दिया जायेगा जिससे वे अपने बच्चों को समझकर उनकी समस्यायें सुलझा सकें।

आरम्भिक तौर पर यह काउंसिलिंग 5 दिनों तक यानि सोमवार से शुक्रवार (सुबह 9.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक) 10 साल से 24 साल तक के किशोरों और युवाओं को दी जायेगी। सिनी टीनलाइन अभिभावकों को भी परामर्श देगी। इसके अतिरिक्त फेस टू फेस काउंसिलिंग सेवा भी जारी रहेगी यानि आप अपनी समस्यायें मिलकर बता सकते हैं और सलाह भी ले सकते हैं।

सुनना तो जरूरी है

हमारी समस्याओं का समाधान एक ही है कि हम सुनें और बात करें। जरूरी है कि बच्चों और टीनेजर्स व युवाओं की बात सुनी जाये तो कहीं न कहीं आपको भी अपने अभिभावकों को सुनना होगा, समझना होगा क्योंकि जुड़ने का रास्ता तो यही है और जुड़कर आगे बढ़ना ही समाधान भी है।

 

घर से भागे प्रेमी जोड़ों को मिलती है इस मंदिर में शरण, स्वयं भगवान शिव करते हैं उनकी रक्षा

“दो प्यार करने वालों की मदद खुद भगवान करता है। पूरी दुनिया चाहे प्रेमी जोड़ियों के खिलाफ हो जाए लेकिन ऊपरवाला कभी उन जोड़ों का साथ नहीं छोड़ता”। आपने अक्सर ऐसी लाईनें फिल्मों में सुनी होंगी लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहां सच में भगवान दो प्यार करने वालों की रक्षा करते हैं। यहां घर से भाग के आए प्रेमी जोड़ों को शरण मिलती है। हम बात कर रहे हैं शांघड गांव के देवता शंगचुल महादेव मंदिर की।

हर जाति और धर्म के प्रेमी जोड़ों को मिलती है शरण

हिमाचल प्रदेश जितना प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है उतना ही अपनी परंपराओं के लिए भी प्रख्यात है। हिमाचल के कुल्लु में स्थित शांघड गांव के देवता शंगचुल महादेव अपने यहां आए प्रेमियों को शरण देते हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रेमियों की रक्षा करते हैं। शंगचुल मंदिर पांडव कालीन ऐतिहासिक धरोहरों में से एक माना जाता है। किसी भी धर्म या जाति के प्रेमी जोड़े यहां पहुंचते हैं तो भगवान शिव उन्हें अपनी शरण में ले लेते हैं। महादेव मंदिर का सीमा क्षेत्र करीब 100 बीघा में फैला है। इस सीमा में आया हुआ हर युगल शिव की शरण में आया हुआ माना जाता है।

गांव में पुलिस के आने तक की है मनाही

इस अनोखे गांव और मंदिर की नियमों के अनुसार इस गांव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध है। इसी के साथ कोई भी यहां पर शराब, सिगरेट और चमड़े का सामान लेकर नहीं आ सकता है। इसी गांव में किसी भी प्रकार के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और लड़ाई-झगड़े और ऊंची आवाज में बात नहीं करता है। गांव में देवता का फैसला ही सर्वमान्य होता है। यहां आए प्रेमी जोड़ों के मामले जब तक निपट नहीं जाते हैं, तब तक शंगचुल महादेव मंदिर के पंडित उन्हें भगवान शिव का मेहमान मानते हुए उनकी सेवा करते हैं।

पांडवों की भी की थी रक्षा

इस मंदिर के लिए पौराणिक मान्यता है कि महाभारत के काल में पांडवों को आज्ञातवास मिलने के बाद वो इस गांव में आए थे और इस स्थान पर कुछ समय के लिए रुके थे। पांडवों की हत्या करने के लिए कौरव भी इस स्थान पर आए तो शंगचुल महादेव ने कौरवों को रोका और कहा कि ये मेरा क्षेत्र है, जो भी मेरी शरण में आता है उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। महादेव के क्रोध से डरकर कौरव वापस लौट गए थे। उसके बाद से जो भी समाज से ठुकराया प्रेमी युगल महादेव की शरण में आता है स्वयं शिव उनकी देखभाल करते हैं और उनकी परेशानियों को खत्म कर देते हैं।

 

गुजरात की मीना कैसे बन गईं सबकी ‘पैड दादी’

”भारत में लोग कई चीजें दान करते हैं, लेकिन सैनिटरी पैड और अंडरगार्मेंट दान करने के बारे में ज़्यादातर लोग सोच भी नहीं पाते. लेकिन ज़रा उनके बारे में सोचिए जो इन्हें ख़रीद ही नहीं पाते।’ ये कहना है 62 साल की मीना मेहता का जो गुजरात के सूरत में रहती हैं। सूरत के सरकारी स्कूलों की लड़कियां उन्हें पैड दादी कह कर बुलाती हैं जबकि झुग्गियों में रहने वाली लड़कियां उन्हें ‘पैड वाली बाई’ के तौर पर जानती हैं।

भारत के पैडमैन के बारे में तो हम पहले से जानते हैं, लेकिन पैड दादी के बारे में बहुत कम जानकारी है।

हर महीने बांटती हैं पांच हज़ार पैड

मीना हर महीने 5,000 पैड दान करने के लिए सूरत में अलग-अलग स्कूलों और झुग्गियों का चक्कर लगाती हैं। वह झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों को एक किट देती हैं।

मीना पहले लड़कियों को सिर्फ़ पैड दिया करती थीं, लेकिन जब वह झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों से मिलीं तो उन्हें पता चला कि सिर्फ़ पैड देना ही काफ़ी नहीं है क्योंकि इन लड़कियों के पास पैड इस्तेमाल करने के लिए अंडरगार्मेंट भी नहीं हैं।

लड़कियों की इस दिक्कत को दूर करने के लिए उन्होंने ‘हेल्थ किट’ देने के बारे में सोचा। इस हेल्थ किट में आठ सैनेटरी पैड, दो अंडरवियर, शैंपू और साबुन होते हैं।

मीना ने बीबीसी गुजराती को बताया, ”जब साल 2004 में तमिलनाडु में सुनामी आई थी। तब इंफ़ोसिस फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्ति ने पीड़ितों को सैनेटरी पैड बांटे थे। उन्होंने सोचा था कि लोग पीड़ितों को खाना और अन्य चीजें दे रहे हैं, लेकिन उन बेघर महिलाओं का क्या जिन्हें माहवारी हो रही होगी? उनके इन्हीं शब्दों से मुझे काम करने की प्रेरणा मिली।”

”बाद में मैंने कुछ ऐसा देखा जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया और जो मैं आज कर रही हूं उसके लिए मजबूर कर दिया। मैंने देखा कि दो लड़कियां कचरे से इस्तेमाल किए गए पैड ले रही थीं।

मैंने उनसे पूछा कि वो इन पैड का क्या करने वाली हैं। उन्होंने कहा कि वो इन्हें धोएंगी और उसके बाद फिर से इस्तेमाल करेंगी। यह सुनकर मेरे होश उड़ गए। इसके बाद मैंने अपनी कामवाली और अन्य पाँच लड़कियों को पैड देने शुरू किए. ​फिर मैं स्कूलों में भी जाकर पैड बांटने लगी।”

मीना ने आगे बताया, ”जब मैं स्कूल में पैड देने गई तो एक लड़की मेरे पास आई और कान में बोली, दादी आप हमें पैड दे रही हैं, लेकिन हमारे पास पैड इस्तेमाल करने के लिए अंडरवियर ही नहीं है। तब से मैं अंडरवियर भी दे रही हूँ। वहीं, झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों को साफ़-सफ़ाई की जानकारी न होने के कारण वो संक्रमण का शिकार हो जाती हैं इसलिए मैं उन्हें पूरी किट देती हूं.”

उन्होंने कहा, ”सुधा मूर्ति ये सुनकर बहुत हैरान थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि वो कई सालों से महिलाओं के लिए काम कर रही हैं, लेकिन ये बात कैसे उनके दिमाग़ में कभी नहीं आई? बाद में उन्होंने मुझे एक लाख रुपये के सैनेटरी पैड दो बार भेजे।”

विदेश से भी मिली मदद

मीना कहती हैं कि शुरुआत में इस काम में होने वाले खर्चे में उनके पति मदद किया करते थे। उन्होंने मीना को 25 हज़ार रुपये दिए थे. लेकिन, बाद में कई और लोग इस अभियान से जुड़ गए। लंदन, अफ़्रीका और हांगकांग से कई लोगों ने मीना की इस अभियान में मदद की। अब मीना मेहता मानुनी संस्थान चलाती हैं। मीना ने बताया कि जिन महिलाओं ने पैड का इस्तेमाल शुरू किया वो कहती हैं कि अब उन्हें खुजली या अन्य सफ़ाई संबंधी समस्याएं नहीं होतीं. वो आराम से काम कर सकती हैं।

भारत में माहवारी से जुड़े टैबू के बारे में मीना ने बीबीसी गुजराती से कहा, ”क्या हम सब्ज़ी बेचने वाली किसी औरत से सब्ज़ी खरीदने से पहले पूछते हैं कि उसे माहवारी है या नहीं? माहवारी को लेकर ये छुआछूत और टैबू अस्वीकार्य हैं।”

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

गुजरात की दो लड़कियों ने केले के रेशों से बनाया सेनेटरी पैड

 

इन दिनों अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ की काफी चर्चा है। उनकी यह फिल्म सैनिटरी पैड बनाकर क्रांति लाने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने ग्रामीण महिलाओं के लिए सस्ते नैपकिन बनाने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। इसी तरह गुजरात के मेहसाणा जिले में दो लड़कियों ने भी सस्ते और इको फ्रेंडली पैड के मॉडल पेश किए हैं। इन पैड्स की खास बात यह है कि इन्हें पूरी तरह से ऑर्गैनिक तरीके से तैयार किया गया है। यानी कि ये स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के काफी अनुकूल हैं। इन दोनों लड़कियों का नाम राजवी और धार्मि पटेल हैं।

मेहसाणा के आनंद निकेतन स्कूल की नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली दोनों लड़कियों ने स्कूल लेवल पर पहले इसे प्रदर्शित किया था। उसके बाद वड़ोदरा में सीबीएसई की जोन लेवल पर साइंस एग्जिबिशन में उसे दिखाया गया। वहां इस प्रॉजेक्ट और इनकी सोच की काफी तारीफ हुई। भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मॉडल को अब राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में दिखाने के लिए दिल्ली ले जाया जाएगा। इसका परीक्षण भी किया जा रहा है। जिसके लिए इसे एक अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में दे दिया गया है। वहां पर इस बात की जांच की जाएगी कि यह स्त्रियों के इस्तेमाल के लिए उचित है या नहीं।

अभी सिर्फ 15 सैंपल अस्पताल को दिए गए हैं। धर्मि और राजवी को स्कूल की तरफ से पूरा सपोर्ट मिला। स्कूल के प्रबंधक बिपिन भाई पटेल और प्रिंसिपल डॉ. ट्रेशा पॉले ने बताया कि स्कूल के टीचर जॉनी अब्राहम और तपस्या ब्रह्मभट्ट के मार्गदर्शन में कक्षा 9 की स्टूडेंट्स धार्मि पटेल ओर राजवी पटेल ने यह सेनेटरी पेड तैयार किया है। उन्होंने इसके लिए काफी रिसर्च किया और वड़ोदरा की एक एजेंसी से संपर्क कर केले के खराब हो चुके तने से रेशे निकाला गया। उन रेशों से ये पैड तैयार किए गए।

राजवी के टीचर जॉनी अब्राहम ने बताया कि इस पेड को ट्रायल के लिए महेसाणाा के सिविल हॉस्पिटल में दे दिया गया है। स्कूल इन पैड्स को बड़े पैमाने पर प्रॉडक्शन करने पर विचार कर रहा है। केले के पेड़ का बेकार तना इसके लिए बहुत ही उपयोगी है। तने से रेशे निकालकर उससे पैड बनाया जाता है। इस वजह से यह पर्यावरण के लिए काफी अच्छा है और महिलाओं के लिए अनुकूल भी है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी कीमत भी ज्यादा नहीं है। गरीब महिलाएं भी आराम से इसे खरीद सकेंगी। क्योंकि इसकी कीमत 5 रुपये आंकी गई है। इस्तेमाल के बाद यह पैड किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता और उसी में मिल जाता है।

(साभार – योर  स्टोरी)

 

नहीं रहीं जनरल ज़िया और मुशर्रफ़ से भिड़ने वालीं आसमां जहांगीर

पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष और जानीमानी मानवाधिकार कार्यकर्ता आसमा जहांगीर का 66 साल की उम्र में लाहौर में निधन हो गया। बीबीसी से बात करते हुए मुंज़े जहांगीर ने अपनी मां के निधन की पुष्टि की। उनका कहना था कि वे इस वक्त देश से बाहर हैं और उनके भाई ने उन्हें इस ख़बर के बारे में बताया।

रिपोर्टों के मुताबिक़ आसमा जहांगीर की तबियत रविवार को ही अचानक ख़राब हुई जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अपने असाधारण साहस, बहादुरी और ताउम्र समाज के पिछड़े लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली आसमा जहांगीर पाकिस्तान के घर-घर में जानी जाती थीं।

आसमा पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली महिला अध्यक्ष थीं और उन्हें महिला सशक्तिकरण का आइकॉन माना जाता था।

वो अपने सहयोगी वकील आज़म तारार से फ़ोन पर बातें कर रही थीं, तभी उन्हें बहुत तेज़ दर्द हुआ और फ़ोन उनके हाथ से छूट गया।

मीडिया से बात करते हुए आज़म तारार ने कहा कि उन्हें उनकी चीख सुनाई दी, पहले उन्होंने सोचा कि उनका कोई पोता गिर गया है लेकिन फ़ोन कट गया।

आज़म ने कहा कि उन्होंने फिर फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन 15 मिनट के बाद जब उनके घर के एक सहायक ने फ़ोन पर बताया कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया है।

आसमा के निधन पर शोक

पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी और क़ानून से जुड़े लोगों को इस मौत से बेहद सदमा लगा है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजनेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है। अपने शोक संदेश में प्रधानमंत्री शाहिद खाक़ान अब्बासी ने क़ानून, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की।

पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश साक़िब निसार ने अपने शोक संदेश में न्यायपालिका की आज़ादी और पाकिस्तान के संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने में उनके योगदान की प्रशंसा की।

अपने शोक संदेश में मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, “वो एक मुखर महिला थीं और अपनी कड़ी मेहनत और क़ानूनी पेशे के प्रति प्रतिबद्धता की बदौलत उनकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी।”

कई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले

आसमा ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार दूत के रूप में भी काम किया था। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इसमें स्वीडन के नोबल पुरस्कार के विकल्प के रूप में विख्यात 2014 में मिला फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भी शामिल है।

उन्हें देश की राजनीति में सेना के प्रभाव का मुखर आलोचक माना जाता था। उन्होंने ज़िया उल हक़ और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की तानाशाह सरकारों के ख़िलाफ़ संर्घषों का नेतृत्व किया था।

जनरल ज़िया और मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ लड़ीं

साल 2007 में जब पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने पूर्व न्यायाधीश इफ़्तिखार मुहम्मद चौधरी को उनके पद से हटा कर देश में आपातकाल घोषित कर दिया था तो वो न्यायपालिका की बहाली के लिए आंदोलन में सबसे आगे थीं।

उन्हें अपने कॅरियर के दौरान मौत की धमकी, पिटाई और जेल जाने तक का सामना करना पड़ा। उन्हें 1983 में ज़िया उल हक शासन के दौरान मानवाधिकारों की बहाली के लिए आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए जेल जाना पड़ा और फिर 2007 में जनरल मुशर्रफ़ के राज के दौरान न्यायपालिका की बहाली को लेकर उन्हें जेल भेजा गया।

मानवाधिकार की पैरोकार

आसमा जहांगीर पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के सह-संस्थापकों में से थीं और उन्होंने इसके लिए सालों तक बतौर महासचिव और अध्यक्ष काम किया। वो दक्षिण एशिया फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स की सह-अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ की उपाध्यक्ष रहीं।

उन्होंने अपनी सारी जिंदगी अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों के मामलों का प्रतिनिधित्व किया.

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट

आसमा जहांगीर का जन्म 27 जनवरी 1952 को लाहौर में हुआ था। लाहौर के ही कॉन्वेंट ऑफ़ जीसस एंड मैरी से ग्रैजुएशन और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी से उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की।

वे कानून की आगे की पढ़ाई के लिए स्विटज़रलैंड, कनाडा और अमरीका भी गईं। लाहौर के क़ायदे-आज़म लॉ कालेज में उन्होंने संविधान भी पढ़ाया था। उन्होंने दो किताबें भी लिखीं- डिवाइन सैंक्शन? द हदूद ऑर्डिनेंश (1988) और चिल्ड्रेन ऑफ़ ए लेसर गॉडः चाइल्ड प्रिसनर्स ऑफ़ पाकिस्तान (1992)।

 

छात्राओं को मिली सैनेटरी नैपकिन वाली उड़ान

आज जब सोशल मिडिया से लेकर हर ओर सेनेटरी पैड के प्रयोग को लेकर चर्चाओं का शोर मचा है, ऐसे में कोलकाता की भूमि पर कार्यरत एक स्वयं सेवी संस्थान (उड़ान) ने एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। आज संस्थान की ओर से हावड़ा शिक्षा सदन (गर्ल्स) में संक्रमण मुक्त मासिक स्राव विषय पर एक ज्ञानवर्द्धक परिचर्चा आयोजित की गई। जिसमें छात्राओं को संक्रमण मुक्त मासिक स्राव, सेनेटरी नैपकिन के प्रयोग के साथ साथ इससे जुड़े कई भ्रांतियों को दूर करने के लिए वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित बातें भी बताई गयी।

इस मौके पर उपस्थित एनजीओ के संस्थापक एवं निदेशक अभिनव गुप्ता जी ने बताया इस विषय पर जागरूकता का अधिकतम अभाव है।साथ ही स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध होना अतिआवश्यक है। सचिव श्रीमती सोफिया खान ने बताया कि शीघ्र ही उड़ान की ओर से सेनेटरी नैपकिन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट उत्तरपाड़ा में लगाया जा रहा है जिसके जरिये हर महीने 75000 छात्राओं को निःशुल्क सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराया जा सकेगा। संस्थान की सदस्या सुश्री गिरिजा शर्मा ने बताया कि उड़ान की ओर से ईस तरह के कार्यक्रम कई स्कूलों में ईसी महीने में करने की योजना है। हावड़ा शिक्षा सदन (गर्ल्स) की प्रिंसिपल श्रीमती निराला ठाकुर ने संस्थान की पहल की अत्यधिक सराहना की।

अभिजात्यता छोड़कर मुखर बनिये, तभी रहेंगी किताबें और सलामत रहेंगे आप

इस बार पुस्तक मेले की जगह बदल गयी है। देखा जाये तो इसका असर सकारात्मक ही पड़ा है मगर गौर करने वाली बात यह है कि हिन्दी के स्टॉल लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके बावजूद कि हिन्दी पाठक खोजकर – भटककर अपनी काम की किताबें ढूँढ रहे हैं और छुट्टी के दिनों में भीड़ भी अच्छी – खासी हो रही है मगर प्रकाशकों और पाठकों का मजबूत रिश्ता कोलकाता पुस्तक मेले में नजर नहीं आता। आमतौर पर प्रकाशक इसका ठीकरा कभी पाठकों पर फोड़ते हैं तो कभी आयोजकों पर गुस्सा निकालते हैं मगर सच्चाई तो कुछ और ही है। किताबें लिखी जा रही हैं, छप रही हैं मगर पाठकों तक पहुँचने की कोशिश नहीं हो रही है। न तो प्रकाशक इस बात को लेकर गम्भीर हैं और न ही शिक्षण संस्थान या साहित्यिक संस्थायें इस बात को लेकर सोच रही हैं।

हिन्दी साहित्य को साहित्यकारों, आलोचकों और शिक्षा व कला वर्ग की एक खास दुनिया में समेट दिया गया है। अभिजात्यता ऐसी कि फिल्मों और अच्छी हिन्दी फिल्मों के अवदान को हम याद नहीं रखते और मजे की बात यह है कि हमारा ध्यान इन किताबों पर तब ही जाता है, जब किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है। किताबों को आम जनता तक पहुँचाना भी हिन्दी की जिम्मेदारी है। इसके लिए हमें अपने स्वार्थ से परे होकर सोचने की जरूरत है। बांग्ला और अँग्रेजी की अच्छी बात यह है कि उनको सिनेमा से परहेज नहीं है और न ही इन भाषाओं के लेखकों को किसी बॉलीवुड कलाकार के साथ मंच साझा करने में परेशानी है इसलिए साहित्यिक हस्तक्षेप इन भाषाओं के सिनेमा को मजबूत करता है। हिन्दी में इसका उल्टा है और हिन्दी के लेखक, बुद्धिजीवी और आलोचक सिनेमा से जुड़ने को अपनी तौहीन समझते हैं। एक अजीब प्रकार की हेय दृष्टि से कलाकारों को देखा जाता है और सलूक ऐसा किया जाता है मानो हिन्दी साहित्य पर हिन्दी के साहित्य जगत का एकाधिकार हो।

इस दृष्टि को तोड़ने में हिन्दी कविता एक महत्वपूर्ण प्रयोग कर रही है। सिनेमा के सितारों से हिन्दी की कवितायें पढ़वाना और आम जनता तक पहुँचाना एक बड़ा बदलाव है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके साथ ही तकनीक और साहित्य को जोड़ना भी जरूरी है। अनिमेष जोशी सुनो कहानी यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। अगर युवाओं की बात की जाये तो बोल पोएट्री सोशल मीडिया पर ऐसे मसलों को उठा रहा है, जिन पर बात करनी जरूरी है। धीरज पांडेय, विहान गोयल और उनकी टीम की जुगलबंदी वो काम कर रही है, जो बड़े – बड़े साहित्यकार नहीं कर पा रहे हैं और वह है युवा पीढ़ी को जोड़ना। आप मान लीजिए कि आप पर्वत पर बैठकर साहित्य को लोकप्रिय नहीं बना सकते। अगर शाहरुख खान जयशंकर प्रसाद को पढ़ते हैं या सनी लियोनी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ती हैं तो इससे कविता अपवित्र नहीं होगी बल्कि साहित्य की ताकत सामने आयेगी। मसला संवाद का भी है और यह भी सच है कि इसके लिए कोशिश नहीं की जाती। हाल ही में जब दिल्ली पुस्तक मेला आयोजित हुआ तो उसकी हलचल से पूरा सोशल मीडिया पटा पड़ा था। प्रचार करने के लिए मानों प्रकाशकों ने एक दूसरे से प्रतियोगिता लगा रखी थी। बड़े लेखकों से लेकर नवोदित साहित्यकार और युवाओं को दिल्ली पुस्तक मेले में देखा गया। आप ये माहौल अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले में देख सकते हैं मगर बांग्ला और अँग्रेजी प्रकाशकों के स्टॉल पर। हम हर साल रोना रोते हैं कि हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है…मीडिया में खबरें भी नयी पुस्तकों और पाठकों की कमी तक सीमित रहती हैं मगर इसके कारणों पर कभी हमारा ध्यान नहीं गया।

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर जब दिल्ली पुस्तक मेले की हलचल देखी तो ऐसा लगा कि हमें यह माहौल कोलकाता में नहीं दिखता। यह सही है बंगाल एक अहिन्दीभाषी राज्य है और यह भी सही है कि हिन्दी के पाठकों में जानकारी का अभाव है या साहित्य को लेकर उनमें उत्साह की कमी है मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने किताबों के प्रति प्यार जगाने और लोगों तक ले जाने की कोशिश की? क्या यह सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार अपनी गुटबाजी और घेरे में इस कदर घिरे हैं कि पाठकों तक पहुँचने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया? कहीं ये तो सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार खुद को इस कदर ऊँचाई तक ले आये हैं कि नीचे झुककर देखना उनको अपनी तौहीन लगती है? इस अभिजात्यता के चक्कर में हिन्दी ने कई साहित्यकारों के साथ आम पाठकों को भी खुद से दूर किया है। जहाँ तक प्रकाशकों का प्रश्‍न है तो साहित्य सेवा के साथ व्यवसाय और लाभ – हानि का गणित उनके लिए मायने रखता है। इस बार जब हम 2018 के कोलकाता पुस्तक मेले में गये तो हिन्दी के एक बड़े प्रकाशन समूह ने इसे हमारी बातचीत में स्वीकार किया और हमें यह फर्क इस बार भी दिखायी पड़ा। अगर आप शहरों के अनुसार पाठक के साथ बर्ताव बदलते रहेंगे तो इसमें क्षति आपकी ही होगी क्योंकि आजकल तो जमाना भी ऑनलाइन का ही है। हिन्दी के स्टॉलों पर पाठक थे मगर प्रकाशकों की ओर से किसी प्रकार की हलचल नहीं थी और हलचल होती भी है तो यह मात्र पुस्तक लोकार्पण तक ही सीमित रहती है। सवाल यह है कि कोलकाता पुस्तक मेले में स्टॉलों पर सन्नाटा आखिर हिन्दी की नियति क्यों है और यह कब तक ऐसा रहेगा? आप पाठकों को किताबें खरीदते देख सकते हैं। दिल्ली में राजकमल प्रकाशन ने पाठकों को लुभाने के लिए एक अभिनव प्रयोग किया था। किताबों की कुछ पँक्तियाँ पाठकों से पढ़वाकर उसे सोशल मीडिया पर डाला जाता रहा मगर लेख लिखे जाने तक कोलकाता पुस्तक मेले में इस समूह के स्टॉल पर यह प्रयोग हमें नहीं दिखा। तमाम असुविधाओं के बावजूद सिर्फ पाठकों पर ठीकरा फोड़ देना हमारी समझ में अपनी गलतियों से भागना और मुँह छुपाना है क्योंकि आपकी उपेक्षा और उदासीनता के बावजूद ये हिन्दी का पाठक ही है जिसके कारण आपका लेखकीय व्यक्तित्व सुरक्षित है और किताबें बिक रही हैं और खासकर तब जब कि आपकी ओर से युवा पाठकों को लुभाने, उस तक पहुँचने और साथ लाने की पुरजोर कोशिश नहीं की गयी। वो भी तब जब कि आप अपनी बहसों और एक दूसरे की आलोचना में उलझे रहें और बंगाल में तो अहिन्दीभाषी भी हिन्दी पढ़ते हैं और अनूदित किताबें पढ़ते हैं, इसलिए जरूरी है समय के साथ प्रचार के तरीकों को उन्नत करने के साथ मुखर होकर पाठकों से जुड़ें वरना आपको कोई अधिकार नहीं रहेगा कि आप अपनी नाकामी के लिए आम पाठकों को दोषी समझें।

राजकमल प्रकाशन समूह के निदेशक (विपणन एवं कॉपीराइट) अलिंद्य माहेश्‍वरी का कहना है कि हम साल भर देश में 60 अलग – अलग मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेते हैं। हर जगह समान रूप से ध्यान दे पाना और प्रचार कर पाना सम्भव नहीं हो पाता। कोलकाता पुस्तक मेले में तो हिन्दी स्टॉलों को कोने पर ही रख दिया जाता है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वैसे हम सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं और कोशिश करें कि पाठकों से सम्पर्क करने के तरीके हम इस पुस्तक मेले में भी लायें। आनन्द प्रकाशन के निदेशक दिनेश त्रिपाठी मानते हैं कि पाठकों की कमी नहीं है। पाठक आते हैं और किताबें भी बिकती हैं। कई किताबों के तो दो – तीन संस्करण भी निकल चुके हैं। हम सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार करते हैं। हाँ, यह सही है कि पाठकों तक पहुँचने के लिए हमें और भी तरीके अपनाने होंगे।

प्रो.रंजना शर्मा कहती हैं कि यह सही है कि बांग्ला और अँग्रेजी के प्रकाशक प्रचार के मामले में हिन्दी से कहीं आगे हैं। वे नये – नये तरीके अपनाते हैं और इसका नतीजा आप इन स्टॉलों पर हो रही पाठकों की बढ़ती तादाद के रूप में देख सकते हैं। पाठक कम नहीं हैं मगर प्रचार में कमी है, इस बात को स्वीकार करना होगा। मौन रहकर आप जनता तक नहीं पहुँच सकते। सस्ती किताबें उपलब्ध करवाना एक तरीका है और 50 रुपये में किताबें उपलब्ध करवाकर साहित्य भंडार यही काम कर रहा है। सिर्फ पुस्तक मेला ही नहीं बल्कि आम जीवन में भी लेखकों और प्रकाशकों को युवा पीढ़ी और आम पाठकों के पास जाना होगा। ऐसी गतिविधियाँ लानी होंगी जिससे जनता उनको अपना समझे…वे शिक्षण संस्थानों से जुड़ें, बाजारों से जुड़े, घरों से जुड़ें और ये समझायें कि साहित्य जनता की अपनी धरोहर है, साहित्य व कला जगत की मिल्कियत नहीं।

(अपराजिता फीचर डेस्क)