Friday, October 23, 2026
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निटको ने कई राज्यों में किया विस्तार, खोले 10 – 12 नये स्टोर

कोलकाता : टाइल निर्माण और सतह डिजाइन कम्पनी, कई राज्यों में अगले 2-3 महीनों में 10-12 नए स्टोर खोलने की योजना बना रही है। ये स्टोर चंडीगढ़, हरियाणा, केरल, कोलकाता, अमृतसर (पंजाब) और तमिलनाडु में खोले जाएंगे। नए स्टोरों में से, कम्पनी ने बड़े पैमाने पर तीन स्टोर खोलने की योजना बनाई है, जबकि शेष सभी मध्यम-से-मध्यम स्तर पर होंगे। मुम्बई मुख्यालय वाली इकाई ने पिछले कुछ वर्षों में लगभग 60 स्टोर खोले हैं। वर्तमान में, कम्पनी के पास देश में 120 सक्रिय फ्रेंचाइजी-संचालित स्टोर हैं।
निटको ( एनआईटीसीओ) ने कोरोनोवायरस महामारी के कारण देश भर में चल रहे तालाबंदी के मद्देनजर व्हाट्सएप पर ग्राहकों के लिए डिजिटल समाधान शुरू किया है। इस पहल के माध्यम से, ग्राहक केवल एक क्लिक में अपने घरों के आराम से अपने पसंदीदा टाइल्स और संगमरमर को ब्राउज़, चयन और ऑर्डर कर सकेंगे।

निटको लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक विवेक तलवार ने कहा, “निटको टाइल्स, मार्बल और मोज़ेक स्पेस में एक अच्छी तरह से स्थापित ब्रांड है। अगले कुछ महीनों में विभिन्न राज्यों में अधिक स्टोर खोलने से इन भूगर्भिक क्षेत्रों में हमारी उपस्थिति को और मजबूती मिलेगी। ये आगामी स्टोर ग्राहकों को सस्ती कीमत पर हमारी प्रकृति-प्रेरित टाइलों की एक किस्म के माध्यम से परिमार्जन करने में सक्षम बनाएंगे। जबकि अप्रैल में कोरोनोवायरस के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था निकट आ गई थी, पिछले कुछ महीनों में चीजें बेहतर दिखने लगी हैं। हम आशावादी बने हुए हैं कि रियल एस्टेट और अन्य निर्माण-संबंधी गतिविधियों में तेजी आने से टाइल्स और अन्य उत्पादों की मांग बढ़ेगी। ”
निटको न केवल भारत के लिए उत्पाद बनाती है, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, नेपाल, बहरीन, युगांडा सेशेल्स, बोत्सवाना, जाम्बिया, मालदीव, पोलैंड, कतर, केन्या, इथियोपिया, कुवैत, ताइवान जैसे 40 विभिन्न देशों को निर्यात करती है। तंजानिया, फिजी, आदि। कम्पनी ने सफलतापूर्वक अभिनव डिजिटल समाधान भी लॉन्च किए हैं जिसके माध्यम से ग्राहक व्हाट्सएप के माध्यम से अपने उत्पादों को खरीद सकते हैं।

 

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अमेरिकी युवा वैज्ञानिक प्रतियोगिता की विजेता बनी भारतीय मूल की अनिका

नयी दिल्ली : विज्ञान के माध्यम से किसी समस्या का समाधान निकालने की वास्तव में कोई उम्र नहीं होती। भारतीय मूल की अमेरिकी किशोरी अनिका चेब्रोलू ने अपने एक शोध से इसे सही साबित कर दिखाया है। केवल 14 वर्ष की उम्र में अपने शोध के लिए उन्हें 25 हजार डॉलर यानी करीब 18 लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्राप्त हुई है।
अनिका का यह शोध वैश्विक महामारी बन चुके कोविड-19 का संभावित इलाज तलाशने में उपयोगी हो सकता है। उल्लेखनीय है कि कोविड-19 का कारगर उपचार तलाशने में दुनियाभर के वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं। इस किशोरी के शोध में वैज्ञानिकों को संभावनाएं दिख रही हैं।
अनिका के परिवार की पृष्ठभूमि मूलतः आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले से जुड़ी है। 3एम यंग साइंटिस्ट चैलेंज नामक इस प्रतियोगिता में उन्होंने अपनी छाप ऐसे समय में छोड़ी है, जब दुनिया कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी से जूझ रही है।
इस प्रतियोगिता का आयोजन अमेरिका के मिनिसोटा में स्थित एक प्रमुख विनिर्माण कंपनी 3एम द्वारा किया जाता है। अनिका ने अंतिम चरण में नौ प्रतिद्वंद्वियों को मात देकर यह पुरस्कार हासिल किया है। इन पुरस्कारों की घोषणा करते हुए 3एम प्रतियोगिता की वेबसाइट www.youngscientistlab.com पर अनिका की उपलब्धि के बारे में जानकारी दी गयी है।
3एम यंग साइंटिस्ट चैलेंज प्रतियोगिता की विजेता अनिका चेब्रोलू कोविड-19 जैसी भयंकर महामारी सार्स-सीओवी-2 नामक वायरस के संक्रमण के चलते होती है। ऐसे में वायरस के प्रसार को निष्क्रिय करना बेहद आवश्यक है। अनिका ने इसके लिए एक मॉलिक्यूल यानी अणु की खोज की है।
बताया जाता है कि यह मॉलिक्यूल इन-सिलिको प्रक्रिया के जरिये वायरस को एक स्पाइक प्रोटीन में बांधकर उसे फैलने से रोक सकता है। अनिका ने वर्चुअल तरीके से इसे प्रस्तुत करके दिखाया है। अपनी इस सफलता पर खुशी व्यक्त करते हुए अनिका ने कहा कि ‘मैं अमेरिका के शीर्ष युवा वैज्ञानिकों की सूची में शामिल होकर खुश हूँ।”
अमेरिकी के टेक्सास में रहने वाली अनिका कुछ समय पहले एक किस्म के फ्लू की चपेट में आ गयी थीं और उससे उबरने के प्रयासों के बीच ही उन्हें इस दिशा में शोध करने की प्रेरणा मिली। हालांकि, शुरुआत में कोरोना कहीं उनके दिमाग में नहीं था। 3एम वेबसाइट पर इस स्पर्धा की सूचना मिलने पर उन्होंने इसमें शामिल होने का फैसला किया। अथक प्रयत्न और समर्पण से आखिरकार उनकी झोली में यह पुरस्कार आ गया। अनिका जीवन और समस्त ब्रह्मांड का आधार विज्ञान को मानती हैं, जिसे पूरी तरह समझने में सतत और अधिक प्रयास करने होंगे। भविष्य में अनिका एक मेडिकल शोधकर्ता और प्रोफेसर बनने का इरादा रखती हैं।

(इंडिया साइंस वायर)

अब बिना किसी पहचान पत्र के बदला जा सकेगा आधार कार्ड में पता

नयी दिल्ली :  देश में आधार कार्ड हमारे सबसे अहम दस्तावेजों में से एक है। बैंक खाते से लेकर गैस बुकिंग तक के ज्यादातर काम आधार कार्ड के बिना अटक जाते हैं। ऐसे में अगर आपने शहर अथवा मकान बदला है और आधार कार्ड पर वर्तमान पता अपडेट कराना चाहते हैं, तो अब परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। अब से बिना किसी दस्तावेज के ही आप अपने आधार कार्ड पर पता अपडेट करवा सकते हैं। आधार में घर का पता बदलवाने के लिए दूसरे दस्तावेजों की आवश्यकता होती है, जिसे दिखा कर ही आधार कार्ड पर अपना पता बदलवा सकते हैं। लेकिन अब आपको परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। अब आपके पास पासपोर्ट, बैंक स्टेटमेंट, बैंक पासबुक, बिजली बिल, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस राशन कार्ड और रूमरेंट एग्रीमेंट आदि कोई भी दस्तावेज नहीं है फिर भी आपके आधार कार्ड में पता बदल जाएगा।
बिना दस्तावेज के ऐसे पता बदला जाएगा 
अगर आधार कार्ड में पता बदलवाना है और दस्तावेज नही हैं, तो अपने इलाके के सांसद, विधायक अथवा पार्षद से अपने फोटो लगे पहचान पत्र पर अपनी मुहर लगवा लें। यानी कि प्रमाणित कर दें कि आप इसी पते पर रहते हैं, तो आपके आधार में घर का पता बदल दिया जाएगा। वहीं गांव में अगर गांव का मुखिया, सरपंच आदि इसी तरह प्रमाणित कर दे, तो पता बदल दिया जाएगा।
पता बदलने के लिए इस प्रक्रिया को अपनाएं
आधार कार्ड में पता बदलने के लिए आपके पास वो मोबाइल नंबर होना जरूरी है, जो आपके आधार कार्ड में अपडेट है। इस नम्बर पर आपको एक ओटीपी भेजा जाएगा और उस ओटीपी को डालने के बाद ही आप आधार में कोई बदलाव कर सकेंगे।
1: आधार कार्ड में पता बदलने के लिए आपको यूआईडीएआई (UIDAI) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाना होगा, जहां दिए गए ‘आधार कार्ड अपडेट ऑनलाइन’ पर क्लिक करें। इसके बाद पता अपडेट के लिए आपके सामने एक नई विंडो ओपन होगी, उसमें अपना आधार नंबर डालकर लॉग-इन करें।
2: आधार नंबर डालने के बाद आपके मोबाइल नम्बर पर एक ओटीपी आएगा, जिसे डालने के बाद पोर्टल ओपन होगा। पोर्टल लॉगइन होने के वहां एड्रेस विकल्प पर क्लिक करें। इसके बाद आधार अपडेट का फॉर्म ओपन होगा। इसमें मांगी गई जानकारियों को भरें।
3: फॉर्म में सभी जानकारियां भरने के बाद एक बार ठीक से चेक कर लें कि कहीं इनमें कोई गलती तो नहीं है और इसके बाद सबमिट अपडेट रिक्वेस्ट ( Submit Update Request) बटन पर क्लिक करते ही आपकी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
4: इसके बाद आपसे एड्रेस अपडेट करने के लिए कुछ दस्तावेज मांगे जाएंगे। यहाँ पर आप कोई भी आईडी अथवा सांसद, विधायक अथवा पार्षद की मुहर लगा हुआ प्रमाण पत्र  की स्कैन कॉपी अपलोड करे और सबमिट बटन पर क्लिक कर दें।
5: सभी चरण पूरे होने के बाद बीपीओ सर्विस प्रोवाइडर का ऑप्शन सिलेक्ट करें और वहां यस बटन पर क्लिक करने के बाद फाइनल सबमिट कर दें। इसके बाद आपके मोबाइल नंबर पर एक अपडेट रिक्वेस्ट नम्बर आएगा। अपने पास एकनॉलेजमेंट कॉपी डाउनलोड करके प्रिंट निकालकर रख लें।

सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के चेयरमैन ली कुन-ही का निधन

सियोल : सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स केचेयरमैन ली कुन-ही का निधन हो गया है। वह 78 वर्ष के थे। ली लंबे समय से बीमार थे। उन्हें सैमसंग को एक छोटी टेलीविजन कम्पनी से उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की दिग्गज ब्रांड बनाने का श्रेय जाता है।
सैमसंग की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ली का निधन गत रविवार को हुआ। उस समय उनके पुत्र ली जेई-योंग और परिवार के अन्य सदस्य उनके पास थे। ली को मई, 2014 में दिल का दौरा पड़ने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसके बाद से वह अस्पताल में ही थे। उनकी अनुपस्थिति में उनके पुत्र योंग ने दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी सैमसंग का कामकाज देखा।
कम्पनी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘‘सैमसंग में हम सभी ली को भूल नहीं पाएंगे। हमने उनके साथ जो यात्रा साझा की है, उसके लिए हम उनके आभारी हैं।’’
ली कुन-ही ने अपने पिता से कम्पनी का नियंत्रण अपने हाथ में लिया था। उनके 30 साल के नेतृत्व में सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स कम्पनी एक वैश्विक ब्रांड बनीं। साथ ही उनकी अगुवाई में सैमसंग सबसे बड़ा स्मार्टफोन, टीवी और मेमोरी चिप ब्रांड भी बनी। सैमसंग की मदद से दक्षिण कोरिया एशिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सका। सैमसंग समूह जहाज निर्माण, जीवन बीमा, निर्माण, होटल, मनोरंजन पार्क आदि क्षेत्रों में भी कार्यरत है।
फोर्ब्स के अनुसार जनवरी, 2017 में ली की संपत्तियां 16 अरब डॉलर थीं। उनका निधन ऐसे समय हुआ है जबकि सैमसंग को मुश्किलों से गुजरना पड़ रहा है। ली के अस्पताल में भर्ती होने के बाद सैमसंग के आकर्षक मोबाइल कारोबार को चीन और अन्य उभरते बाजारों की कम्पनियों से कड़ी चुनौती मिलने लगी।

भारत में साइबर सुरक्षा अब शीर्ष कॉरपोरेट प्राथमिकता: अध्ययन

बेंगलुरू : कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर ‘घर से काम’ में तेजी आयी है। हालांकि इसके साथ ही साइबर सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी काफी बढ़ गयी हैं। इसके चलते भारत में अब साइबर सुरक्षा सर्वोच्च कॉरपोरट प्राथमिकता बन गयी है। एक अध्ययन में यह कहा गया है। सिस्को के हालिया अध्ययन ‘फ्यूचर ऑफ सिक्योर रिमोट वर्क रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत के 73 प्रतिशत संगठनों को कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से साइबर हमलों अथवा चेतावनी में 25 प्रतिशत या इससे अधिक तेजी देखने को मिल रही है। इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि अधिकांश भारतीय कंपनियां कार्यबल को कार्यालय से इतर काम करने की सुविधा प्रदान करने के लिये तैयार नहीं थी।
सिस्को ने कहा कि करीब 65 प्रतिशत कंपनियों ने कोविड-19 के मद्देनजर घर से काम में सहजता के लिये साइबर सुरक्षा के उपायों को अपनाया है। यह अध्ययन दुनिया भर में सूचना प्रौद्योगिकी के संबंध में निर्णय लेने वाले तीन हजार से अधिक लोगों के सर्वेक्षण पर आधारित है। इनमें भारत समेत एशिया प्रशांत क्षेत्र के 13 बाजारों के 19 सौ से अधिक लोग शामिल हैं।

ये रही लोन मोराटोरियम की जानकारी

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने कर्जदारों को बड़ी राहत दी है। उसने बैंकों से कर्ज लेने वालों को एक तरह से दिवाली का उपहार तोहफा देते हुए 2 करोड़ रुपये तक के कर्ज पर ब्याज से राहत देने की घोषणा की। यह राहत सभी कर्जदारों को मिलेगी, चाहे उन्होंने किश्त भुगतान से छ: महीने की दी गयी छूट का लाभ उठाया हो या नहीं। शीर्ष अदालत ने 14 अक्टूबर को केंद्र को निर्देश दिया था कि वह कोविड-19 महामारी के मद्देनजर रिजर्व बैंक की किस्तों के भुगतान से छूट की योजना के तहत दो करोड़ रुपए तक के कर्ज पर ब्याज माफ करने के बारे में यथाशीघ्र निर्णय ले। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आम लोगों की दिवाली अब सरकार के हाथों में है।

क्या है लोन का मोराटोरियम पीरियड
लॉकडाउन की घोषणा के बाद 27 मार्च को रिजर्व बैंक ने बैंकों से कर्जधारकों को 3 महीने के लिए ईएमआई से राहत देंने को कहा था। पहले इसे 1 मार्च से 31 मई तक लागू किया गया था। बाद में इसे 31 अगस्त तक बढ़ा दिया गया।
सरकार पर पड़ेगा 6500 करोड़ का भार
वित्तीय सेवा विभाग ने उच्चतम न्यायालय के द्वारा ब्याज राहत योजना लागू करने का निर्देश दिए जाने के बाद इसके परिचालन के दिशानिर्देश जारी कर दिए। इस योजना के क्रियान्वयन से सरकारी खजाने पर 6,500 करोड़ रुपए का बोझ पड़ने का अनुमान है।
किसे मिलेगा फायदा
मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार कर्जदार विनिर्दिष्ट ऋण खातों पर एक मार्च से 31 अगस्त 2020 के लिए इस योजना (ब्याज राहत) का लाभ उठा सकते हैं। जिन कर्जदारों के ऋण खाते की मंजूर सीमा या कुल बकाया राशि 29 फरवरी तक 2 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, वे इस योजना का लाभ उठाने के पात्र होंगे।
कर्जदारों को लौटाना होगा पैसा
योजना के तहत, कर्ज देने वाले संस्थानों को योजना की अवधि के लिए पात्र कर्जदारों के संबंधित खातों में संचयी ब्याज व साधारण ब्याज के अंतर की राशि जमा करनी होगी। योजना में कहा गया है कि कर्जधारक ने रिजर्व बैंक के द्वारा 27 मार्च 2020 को घोषित किस्त भुगतान से छूट योजना का पूर्णत: या अंशत: लाभ का विकल्प चुना हो यह नहीं, उसे ब्याज राहत का पात्र माना जायेगा।
कर्ज राहत योजना का लाभ उन कर्जधारकों को भी मिलेगा जो नियमित किस्तों का भुगतान करते रहे। कर्ज देने वाले संस्थान दी गई छूट के तहत संबंधित राशि कर्जधारक के खाते में जमा करने के बाद केंद्र सरकार से उसके बराबर राशि पाने के लिए दावा करेंगे।
इन लोगों को नहीं मिलेगा फायदा
दिशा-निर्देशों में बताई गई पात्रता शर्तों के अनुसार, 29 फरवरी तक इन खातों का मानक होना अनिवार्य है। मानक खाता उन खाताओं को कहा जाता है, जिन्हें गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) नहीं घोषित किया गया हो।
इन ऋणों पर होगा फायदा
इस योजना के तहत होम लोन, एजुकेशन लोन, क्रेडिट कार्ड बिल, वाहन ऋण, एम एस एम ई ऋण , टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद ऋण और उपभोग ऋण के धारकों को लाभ मिलेगा।

अब बैटरी से मिलेगी बिजली, 20 साल तक नहीं होगी खराब

नयी दिल्ली : अब अस्पताल, घर, गाँव, सोसायटी, भवन आदि में बिजली के लिए जनरेटर का प्रयोग नहीं करना पड़ेगा। आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों की टीम ने पांच साल के शोध के बाद वेनेडियम रिडोक्स फ्लो बैटरी (वीआरएफबी) तैयार की है। यह बैटरी वेनेडियम इलेक्ट्रोलाइट नामक केमिकल से काम करती है और 20 साल तक खराब नहीं होगी। खास बात यह है कि इस बैटरी से किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होगा। आईआईटी दिल्ली के डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अनिल वर्मा के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर समेत अधिकतर शहरों के लोग इन दिनों प्रदूषण से परेशान हैं। बढ़ते प्रदूषण के कारण जनरेटर के प्रयोग पर भी रोक लगा दी जाती है। क्योंकि, जनरेटर चलाने के लिए डीजल का प्रयोग होता है और इससे ध्वनि और वायु प्रदूषण होता है। जनरेटर पर रोक लगने के चलते बिजली की कमी का भी सामना करना पड़ता है। इसी परेशानी को देखते हुए पांच साल पहले जनरेटर के बिना बिजली पाने का विकल्प तलाशने पर काम शुरू हुआ। डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से इस शोध के लिए फंड मिला था। आईआईटी दिल्ली ने शोध पूरा करने में मदद की। प्रो. वर्मा के मुताबिक, वीआरएफबी में वेनेडियम इलेक्ट्रोलाइट नामक केमिकल डाला जाता है। सोलर पावर के माध्यम से इसे चार्ज किया जाएगा। यह डीसी पावर बैटरी होगी। इसे डीसी से पावर इलेक्ट्रानिक सर्किट की मदद से एसी में तब्दील करके घरों, अस्पताल, गांव, भवन आदि में प्रयोग किया जा सकेगा। इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्ज करने में भी इसका प्रयोग संभव होगा। इस शोध के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है।
केमिकल कभी नहीं होता खराब या खत्म
प्रो. वर्मा ने बताया कि कार, स्कूटर, इनवर्टर में प्रयोग होने वाली बैटरी दो से तीन साल चलती है। बीआरएफबी की लाइफ 20 साल तक होगी। इसमें डाला जाने वाला वेनेडियम इलेक्ट्रोलाइट केमिकल कभी खराब नहीं होता है। 20 साल के बाद जब बैटरी की लाइफ खत्म हो जाएगी तो उस समय इस केमिकल का जो भी मार्केट रेट रहेगा, उसके आधार पर उपभोक्ता को दाम भी मिलेगा।

नागालैंड की आईपीएस अधिकारी चला रहीं हैं मुफ्त कोचिंग सेंटर, सिखा रहीं जैविक खेती

तुएनसांग : यह प्रेरक कहानी 2016 बैच की आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रीतपाल कौर बत्रा की है। यह कहानी खास इसलिए है क्योंकि यह पुलिस अधिकारी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच युवाओं के लिए जहाँ मुफ्त में कोचिंग चला रहीं हैं, वहीं कई लोगों को जैविक खेती के गुर भी सिखा रहीं हैं। डॉ. कौर की पहली पोस्टिंग सब-डिविज़नल पुलिस ऑफिसर (एसडीपीओ) के पद पर नागालैंड के सुदूरवर्ती जिला, तुएनसांग में हुई थी। वहाँ लोगों ने उनका काफी गर्मजोशी से स्वागत किया गया। स्थानीय लोगों से मिले इस आदर-सम्मान से वह काफी अभिभूत हुईं। इन दिनों वह नोक्लेक जिला के पुलिस अधीक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहीं हैं।
डॉ. कौर ने द बेटर इंडिया को बताया, “ यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता मन मोह लेती है इसके अलावा, जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक छुआ, वह यह थी कि जब मैं 2018 में वहाँ गई, तो मैंने देखा कि लोग कितने सच्चे और दयालु थे। मेरे बाहरी होने के बावजूद, उन्होंने मुझे अपने घर जैसा मान-सम्मान दिया। इससे मुझे अपने कर्तव्यों को एक नई ऊर्जा से पूरा करने की प्रेरणा मिली।”
डॉ. कौर को शिक्षण और खेती का शुरू से काफी शौक था, इसलिए उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मुफ्त कोचिंग शुरू कर दी। उन्होंने अपने पैसों से उनके लिए किताबें और अन्य अध्ययन सामग्री भी मुहैया कराई। इसके अलावा, उन्होंने नशीली दवाओं की जद में आ चुके लोगों का इलाज कर, उन्हें जैविक खेती भी सिखायी। इसके फलस्वरूप, मूल रूप से हरियाणा के यमुनानगर की रहने वाली डॉ. कौर को नागा हिल्स में रहने वाले लोग काफी मानने लगे, जहाँ नशीली दवाओं, एचआईवी-एड्स, लंबे समय से जारी विद्रोह का गहरा प्रभाव है।
तुएनसांग में अपनी पहली पोस्टिंग के दौरान उन्होंने न केवल अपराध को कम करने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया, बल्कि कई स्कूलों, चर्चों, छात्र संघों और संगठनों के साथ भी एक बेहतर समन्वय स्थापित किया। जो युवा छात्र, उनसे मिले थे, वह उनकी प्रतिभा की कायल हो गईं, और ऐसे छात्रों के लिए कुछ सार्थक करने का फैसला किया।
ओर्थनून किकॉन, अतिरिक्त सहायक आयुक्त (ई ए सी ), जिन्होंने डॉ. कौर को कोचिंग क्लास सेटअप करने में मदद की, कहते हैं, “तुएनसांग नागालैंड के पूर्वी छोर पर स्थित है। पहाड़ी इलाके की वजह से यह राज्य के बाकी जिला से काफी अलग है। यहाँ कई ऐसे छात्र थे, जिन्होंने ग्रेजुएशन कर लिया था, लेकिन उचित मार्गदर्शन के अभाव में सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल करने में असमर्थ थे। नागालैंड में, सरकार सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है। कई युवाओं के लिए, सरकारी नौकरी करना खुद को गरीबी के दल – दल से बाहर निकालने का एक रास्ता है, इससे वह खुद को नशे की चपेट में भी आने से रोकते हैं।”
शुरूआत में, डॉ. कौर ने ट्रायल के आधार पर सिविल सेवा परीक्षा के लिए कोचिंग देने का फैसला किया। स्थानीय प्रशासन ने सोशल मीडिया के जरिए इस पहल का प्रचार किया और उन्हें काफी अच्छी प्रतिक्रिया भी मिली। वहीं, पुलिस अधीक्षक, भारत मार्काड ने कोचिंग के लिए कार्यालय परिसर के कॉन्फ्रेंस हॉल के इस्तेमाल को मंजूरी देने के साथ ही, छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री खरीदने में भी मदद की।
डॉ. कौर ने इस कोचिंग की शुरूआत नौवीं कक्षा के 50 से अधिक छात्रों के साथ की। उन्होंने अपने पैसे से किताबों को हैदराबाद से मंगाया। उनकी इस पहल में ओरेंथून के अलावा, ईएसी के दो अन्य अधिकारियों, केविथिटो और मूसुनेप का भी साथ मिला। जिन्होंने छात्रों को नागालैंड लोक सेवा आयोग (एनपीएससी) की तैयारी कराने में मदद की।
डॉ. कौर का कहना है, “कुल मिलाकर, 53 छात्र थे, जिनमें से कुछ ने नागालैंड के सीएम छात्रवृत्ति परीक्षा में सफलता हासिल की है, जबकि कई लोगों ने राज्य सरकार की विभागीय परीक्षाओं को क्लियर किया है। जबकि, कई इस साल यूपीएससी की परीक्षा देंगे।”
उन्होंने नोक्लाक जिला के एसपी के रूप में कार्यभार संभालने के बाद भी इस पहल को जारी रखा। वह छात्रों को नि:शुल्क कोचिंग देने के अलावा, तुएनसांग जिला के कृषि विज्ञान केंद्र के साथ भी काम कर रही हैं, जिसके तहत वह किसानों को आधुनिक जैविक खेती तकनीक, फूड प्रोसेसिंग, आदि विषयों में भी प्रशिक्षण दे रही हैं।
एक और महत्वपूर्ण पहल के तहत, डॉ. कौर ने स्कूलों और कॉलेजों में नशीले पदार्थों के सेवन के खिलाफ भी अभियान चलाया और अपनी डॉक्टर की ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए कई युवाओं को इसकी चपेट से बाहर निकाला।
डॉ. कौर द्वारा किए गए एक और उल्लेखनीय कार्य के बारे में ऑर्थनून का कहना है, “नोक्लाक और तुएनसांग जैसे जिलों में, एचआईवी-एड्स के मामले और नशीली दवाओं का सेवन काफी व्यापक है। गत वर्ष अगस्त में, मुझे एचआईवी-एड्स के संक्रमण के साथ पैदा हुए 74 बच्चों की सूची मिली थी, इसमें अधिकांशतः अनाथ थे। जिला पुलिस के साथ काम करते हुए, हमने उनके देखभाल की व्यवस्था की। इन बच्चों के देखरेख की जिम्मेदारी डॉ. कौर ने अपने कंधों पर ली थी। यह केवल गिने-चुने कार्यों की झलक है, जो वह एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए निरंतर कर रही हैं।”
नोक्लाक भारत का सबसे छोटा और नागालैंड का 12वाँ जिला है और यहाँ के अधिकांश निवासी खिमनियुंगन जनजाति के हैं, जो नागालैंड की एक प्रमुख जनजाति है। तुएनसांग जिले की तरह, नोक्लाक में भी मूल-भूत सुविधाओं की भारी कमी है और यहाँ भी नशीली दवाओं का सेवन और एचआईवी-एड्स एक बड़ी समस्या है।
इसे लेकर डॉ. कौर कहती हैं, “एक पुलिस अधिकारी होने के नाते, हम कई जगह छापेमारी करते हैं, कई कानूनी प्रावधानों पर अमल करते हैं, लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते, मुझे लगा कि हमें इससे एक कदम और आगे जाना होगा। लोगों को नशा मुक्ति के लिए ओएसटी ट्रीटमेंट देना होगा और उनकी काउंसिलिंग करनी होगी। नोक्लाक में आने के बाद, मैंने फैसला किया कि मैं ऐसे लोगों को जीविका कौशल, खासकर खेती सिखाने की दिशा में काम करूँगी, ताकि ऐसे लोग नशे की चपेट से बाहर आ सकें।”
वह आगे कहती हैं, “कृषि विभाग की मदद से स्थानीय ओएसटी सेंटर, खिमनियुंगन बैपटिस्ट चर्च, और खियामिनुंगन ट्राइबल काउंसिल में नोक्लाक पुलिस ने सितंबर 2020 के अंत तक कई सेमिनारों का आयोजन किया। जिसके तहत, नशे की चपेट में आए 120 लोगों को मधुमक्खी पालन, जैविक खेती, और वर्मीकम्पोस्टिंग सीखा कर इलाज किया जा रहा है। यदि इनमें से 10 लोग भी खेती में अपना करियर आगे बढ़ाते हैं, तो यह हमारी एक बड़ी कामयाबी होगी।”
नागालैंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक रूपिन शर्मा कहते हैं, “डॉ. कौर जमीन से जुड़ी, मेहनती और संवेदनशील अधिकारी हैं। वह हमेशा ऊर्जावान और सकारात्मक रहतीं हैं, जिससे उन्हें लोगों से जुड़ने और समस्याओं को हल करने में मदद मिलती है। नागालैंड वासी अपनी समस्याओं को अपने तरीके से सुलझाने में यकीन रखते हैं और पुलिस और अदालतों का रुख नहीं करते हैं। इसका अर्थ है कि अधिकांश जिलों में पुलिस की भूमिका न के बराबर है। इसलिए, जब पुलिस विकसित होती है, तो उसे स्थानीय लोगों से जुड़ना चाहिए। नशे के खिलाफ पहल, छात्रों को कोचिंग की व्यवस्था और समुदाय की बेहतरी के अन्य कार्यों की वजह से डॉ. कौर ने जमीनी स्तर पर समुदायों के साथ एक बेहतर संबंध स्थापित किया है।”
एक अन्य अधिकारी, जो तुएनसांग में डॉ. कौर के साथ काम करते थे, नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, “नागालैंड के लोगों ने सिविल सेवा के कई अधिकारियों को देखा है। लेकिन, जो डॉ. कौर को सबसे खास बनाता है, वह यह है कि वह जिन उपायों को ढूढ़तीं हैं, उस पर विश्वास करती हैं और मजबूती से आगे बढ़ती हैं। शायद यही कारण है कि आज वह कई युवाओं के लिए प्रेरणस्त्रोत हैं।”
(मूल लेख- रिन्चेन नोरबू वांग्चुक)
साभार – द बेटर इंडिया

मिट्टी-गुड़ से अद्वितीय घर बनाते हैं यह आर्किटेक्ट, हजारों को दे चुके हैं प्रशिक्षण

आज देश के अधिकांश शहर तेजी से कंक्रीट के जंगल के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ती जा रही हैं, बल्कि वास्तुकला से संबंधित हमारी पहचान भी धूमिल होती जा रही है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि आज हमारे पाठ्यक्रमों में परंपरागत भारतीय वास्तुकला के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। इसी को देखते हुए तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में रहने वाले आर्किटेक्ट बिजू भास्कर और उनकी पत्नी सिंधू भास्कर ने 2009 में ‘थनल नैचुरल बिल्डिंग अवेयरनेस ग्रुप’ की स्थापना की, इसके तहत वह न सिर्फ प्राकृतिक तरीके से घर बनाते हैं, बल्कि इस व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए हजारों लोगों को प्रशिक्षित भी कर चुके हैं।
भास्कर ने पिछले एक दशक में 60 से अधिक वर्कशॉप किए हैं और जरूरतमंदों के लिए बिना किसी शुल्क के 10 से अधिक संरचनाओं का निर्माण किया है। उन्होंने अब तक जितने भी प्रोजेक्ट किए हैं, सभी के सभी बेहद खास हैं, क्योंकि भास्कर ने उन्हें सीमेंट के एक कतरे का भी इस्तेमाल करने के बजाय मिट्टी, गुड़, हल्दी, नीम, चूना, लकड़ी, पत्थर जैसे स्थानीय पदार्थों से आधुनिक सुविधाओं के अनुकूल बनाया है। उनके कुछ खास प्रोजेक्ट के बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं:
फार्मर्स हाउस – 2017
बिजू भास्कर ने इस घर को केरल के अट्टापारी के किसान जयन के लिए बनाया है। इसके बारे में वह कहते हैं, “जयन की जमीन मुख्य सड़क से काफी दूर है। इसलिए हम निर्माण सामग्रियों को बाहर से नहीं मंगा सकते थे। 1020 वर्ग फीट में बने इस घर को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस, पत्थर, मिट्टी से बनाया गया है। इसके लिए सिर्फ चूना, टेराकोटा टाइल्स को बाहर से मंगाया गया था।
केरल के अट्टापारी में बना जयन का घर
वह आगे बताते हैं, “इस घर में 2 बेडरूम, एक हॉल, किचन और बाथरूम है। इसकी छत दो लेयर में है। बीच वाली छत को बांस से और ऊपरी छत को पुराने टेराकोटा टाइल से बनाया गया है। वहीं, इसकी दीवारों को 6-6 इंच के दो भागों में बनाया गया है, और बीच में बांस दिए गए हैं, जिससे घर में गर्मी का कोई असर नहीं होता है। इसे बनाने में महज 4 लाख रुपए खर्च हुए, जिसे सीमेंट से बनाने में दोगुना खर्च होता।”
कम्युनिटी सीड बैंक – 2018
भास्कर बताते हैं, “इस कम्यूनिटी सीड बैंक को तमिलनाडु के करूर में बनाया गया है। इसे देशी किस्म के बीजों को संरक्षित के लिए बनाया गया है। यह 1400 वर्ग फीट के दायरे में है और इसे बनाने में 20 लाख रुपए खर्च हुए।” इस सामुदायिक केन्द्र की दीवारों को मिट्टी से बनाया गया है, जिसकी मोटाई 1.5 फीट है। इसकी पहली मंजिल को ताड़ के पेड़ों से, जबकि दूसरे छत को टेराकोटा टाइल से बनाया गया है।
तमिलनाडु के करूर में बना सीड बैंक
भास्कर बताते हैं, “यहाँ किसानों के बैठने, बीजों को तोलने और सूखाने के लिए तीन तरफ से बड़े-बड़े बरामदे हैं। किसान बीजों को आसानी से देख सकें, इसके लिए सामने एक कमरा बनाया गया है और बीजों को रोशनी से बचाने के लिए एक कमरा पीछे है। इसके स्तंभों को पत्थर से बनाया गया है, जबकि स्थानीय कारीगरों ने यहाँ काफी नक्काशी का भी काम किया है।”
प्रोजेक्ट अर्थ बैग – 2016
प्रोजेक्ट अर्थ बैग के तहत बिजू भास्कर ने खुद अपने ही घर को बनाया। इसकी खासियत यह है कि इसकी दीवारों को जूट के बोरों में मिट्टी भर कर बनाया गया है, जबकि इसकी छत को चूना और टेराकोटा टाइल को बनाया गया है। साथ ही, यहाँ एक जल संरक्षण प्रणाली को भी विकसित किया गया है।


जूट के बोरों से बना बिजू भास्कर का घर
इसके बारे में भास्कर कहते हैं, “इस घर को हमने 1000 जूट के बोरे में रेतीली मिट्टी भर कर बनाया है। मिट्टी में चूना, गन्ने का रस आदि मिलाया गया है। इसे बनाने में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं हुई। शुरूआत में इसकी छत को घास से बनाया गया था, लेकिन बाद में इसे चूना और टेराकोटा टाइल के साथ बनाया गया।”
घर को घुन से बचाने के लिए बैग पर नीम, हल्दी, आदि का छिड़काव किया गया है। एक और खास बात यह है कि घर के सूखने के बाद इसकी मिट्टी में नीम, हल्दी, कैक्टस और एलोवेरा मिलाकर पुताई की गई, ताकि इसे घुन से बचाया जा सके। इसके अलावा, इसकी छत को दो स्तरों में बनाया गया है – पहला चूने से, जबकि दूसरा – टैराकोटा टाइल से। जिसकी वजह से घर में तापमान काफी नियंत्रित रहता है। इस तरह 700 वर्ग फीट में बने इस घर को बनाने में महज 5.50 लाख रुपये खर्च हुए।
विलेज मड किचन – 2019
इसके तहत थनल कैंपस में आने वाले लोगों के लिए एक रसोई घर का निर्माण किया गया। इसमें आर्किटेक्टचर से संबंधित प्रयोग करने की भी जगह है। इस कड़ी में भास्कर कहते हैं, “2018 में हमारे यहाँ बाढ़ आई थी। इसलिए हमने 450 वर्ग फीट में इसकी संरचना को को बांस और सुरखी (जली मिट्टी) से इस तरीके से बनाया है कि भविष्य में बाढ़ आने पर भी सिर्फ मिट्टी ही बहेगी, ढांचा बचा रहेगा। इसमें खाना बनाने के दौरान धुएं से बचने के लिए एक चिमनी भी लगाया गया है, जिससे धुआँ सीधे बाहर निकल जाए। वहीं, हमने यहाँ एक मड ओवेन भी बनाया है, जिसमें रोटी बनाई जा सकती हैं।”
कैसे आया थनल को स्थापित करने का विचार
बिजू भास्कर बेंगलुरु, चेन्नई, कोच्चिन जैसे कई बड़े शहरों में रह चुके हैं। लेकिन, धीरे-धीरे उनका रुझान की वादियों में आकर बस गए। इसके बाद उन्होंने राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के गाँवों का दौरा कर भारतीय वास्तुकला के संबंध में जानकारियों को इकठ्ठा किया। इसके बाद, साल 2009 में उन्होंने भारतीय वास्तुकला पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए थनल, जिसका हिन्दी अर्थ है – परछाई, अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा, इसी क्रम में 15 साल पहले वह तिरुवन्नामलाई की स्थापना की। फिलहाल बिजू, थनल के तहत 2 दिनों से लेकर 2 वर्ष का पाठ्यक्रम चलाते हैं और उन्होंने अब तक 1000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण किया है। इसके साथ ही, उन्होंने अपने ज्ञान को अधिकतम लोगों तक पहुँचाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया है।
साभार – द बेटर इंडिया