Thursday, April 9, 2026
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कामधेनु समूह की गतिविधियों ने पकड़ी रफ्तार, उत्पादन में तेजी

कोलकाता : टीएमटी बार बनाने वाले कामधेनु समूह की गतिविधियों ने रफ्तार पकड़ ली है और उत्पादन सामान्य हो चला है। उत्पादन इकाईयों के रूप में कामधेनु समूह के 75 फ्रेंचाइजी मॉडल हैं। महामारी के कारोबार प्रभावित हुआ मगर मई 2020 में अनलॉक के पहले चरण में कम्पनी ने 50 प्रतिशत उत्पादन क्षमता वापस पा ली। अगस्त में क्षमता 80 प्रतिशत हो गयी। कामधेनु समूह के सीएमडी सतीश कुमार अग्रवाल ने अब उत्पादन क्षमता शत -प्रतिशत होने की जानकारी दी और कहा कि स्टील बाजार सुधर रहा है। कम्पनी विस्तार की योजना भी बना रही है।

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सच्चे सिपाही और समय से आगे रहे महाराज कामेश्वर सिंह

भारत की आजादी में उनका योगदान इतना अधिक माना जाता है कि उस जमाने के तमाम बड़े नेता और स्वतंत्रता सेनानियों को उन्होंने किसी न किसी रूप में सहायता देने की कोशिश की थी। देश के लिए संघर्ष करने वालों में जिन हस्तियों को दरभंगा महाराज की मदद मिली उनमें डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे नाम भी शामिल हैं। उन्हें महाराजा की उपाधि जरूर मिली थी, लेकिन वह किसी रियासत के राजा नहीं थे। बल्कि, वह भारत के सबसे बड़े जमींदार थे। वह अपने जमाने के एक बड़े उद्योगपति भी थे और जिस बिहार में आज भी उद्योग नहीं हैं, वह अंग्रेजों के जमाने में 14 औद्योगिक यूनिट के मालिक थे। दरभंगा राज में आज से 7-8 दशक पहले भी चीनी, जूट, कॉटन, लौह एवं इस्पात, एविएशन और प्रिंट मीडिया जैसे उद्योग मौजूद थे और हजारों लोगों के रोजगार का जरिया थे।

ब्रिटिश सरकार भी सम्मान करती थी

दरभंगा राज के राजा महाराजाधिराज सर रामेश्वर सिंह गौतम के पुत्र थें। इनका जन्म 28 नवंबर 1907 को हुआ था। वह तीन जुलाई 1929 को अपने पिता की मृत्यु के बाद दरभंगा राज के उत्तराधिकारी घोषित हुए थे। इन्होंने 1930-31 में आयोजित पहले दौर की टेबल कांफ्रेंस के पहले दौर के लिए लंदन का दौरा किया था। वे वर्ष 1933-1946 तक, 1947-1952 तक भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे। भारत की स्वतंत्रता के बाद, इन्हें झारखंड पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1952-1958 संसद सदस्य (राज्य सभा) के रूप में चुना गया था और 1960 में फिर से निर्वाचित हुए और 1962 में अपनी मृत्यु तक राज्य सभा के सदस्य रहे।

समृद्धि और शक्ति दोनों के लिए जाने जाते हैं

भारत में सबसे बेहतरीन जवाहरातों का संग्रह हैदराबाद के निजाम के पास था तथा उनके बाद दूसरा स्थान बड़ौदा के गायकवाड़ को दिया जाता है पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस प्रकार के विश्वस्तरीय जवाहरातों का संग्रह करने वालों में तीसरा स्थान रखते थे भारत के सबसे बड़े , धनी और प्रभावशाली ज़मींदारी एस्टेट दरभंगा राज के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह | सन १९५० से १९६० के दशक के सबसे अमीर और शक्तिशाली व्यक्तियों में उनका शुमार होता था| कामेश्वर सिंह को अनमोल जवाहरातों को संग्रह करने का बड़ा शौक था | सन १९४७ में लगाए गए एक अनुमान के अनुसार उस वक्त भारत में लगभग १५० विश्वस्तर के अनमोल रत्न एवं जवाहरातों का संग्रह था।

महाराजा कामेश्वर सिंह जनता की भलाई के लिए कई कदम उठाते थे| वे नयी विचारधारा के थे| वे उस जमाने के मशहूर व्यवसायी भी थे| वो 14 व्यवसायों के मालिक थे| चीनी उद्द्योग, कोयला, सूती कपड़ा, जुट, लोहा एवं इस्पात, पेपर, प्रिंट मीडिया, बिजली और रेलवे तक के कारखाने चलाते थे| एयरलाइन की कम्पनी ‘दरभंगा एयरलाइन’ इन्हीं की कम्पनी थी, ‘ द इंडियन नेशन’और आर्यावर्त इन्हीं के मीडिया हाउस से निकलती थे।| इस प्रकार उन्होंने जनता को सिर्फ किसानी/ खेती के लिए नहीं बल्कि अन्य उद्द्योगों में भी रोजगार देने की कोशिश की थी तथा उन्हें जागरूक किया था| हालाँकि यह उनके पिताजी द्वारा स्थापित व्यवसाय था, जिसे उन्होंने काफी आगे बढ़ाया|

भारत का पहला भूकम्परोधी भवन नरगौना पैलेस इन्होंने ही बनवाया

तिरहुत सरकार महाराजा कामेश्‍वर सिंह की कंपनी वाल्‍डफोड न केवल भारत में रॉल्‍स की वितरक थी, बल्कि उनके पास रॉल्‍स की एक से एक गाडियाँ थी। बेंटली ने सौ साल से अधिक पुराने अपने इतिहास में केवल तीन स्‍पोर्टस कार बनायी, जिनमें से दो भारत के लोगों ने खरीदा। तीन में से एक कार दरभंगा की सडकों पर चलती थी। 1951 में जब भारत के राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद दरभंगा आये थे तो उनके काफिले में 34 रॉल्‍स गाडियां शामिल थी, जो उस वक्‍त का सबसे समृद्ध निजी काफिला माना गया था।

महाराजा ने अपने लक्ष्मीश्वर विलास पैलेस जैसे भव्य भवन को प्राच्य विद्या के प्रचार-प्रसार के लिए 1961 में दान दे दिया था। एक ही राज परिवार के मदद से एक ही कैंपस में दो विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। दरभंगा बस स्टैंड के समीप स्थित दरभंगा राज का किला , सामने वाली सड़क से गुजरने वालों का ध्यान बरबस ही खीच लेता हैं । दरभंगा के महाराज का यह किला उत्तर बिहार के दुर्लभ और आकर्षक इमारतों में से एक है । भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने 1977-78 में इस किले का सर्वेक्षण भी कराया था , तब इसकी ऐतिहासिक महत्वता को स्वीकार करते हुए किले की तुलना दिल्ली के लाल किले से की थी । ये जो राज का किला है, दिल्ली के लाल किले से कम नहीं है। फर्क बस यह है कि लाल किले का रख-रखाब किया जाता है और राज किले का नहीं।

यहाँ गाँधी जी ठहरे थे, बाद में इसे संग्रहालय बना दिया गया

दरभंगा के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1907-62) वो पहले भारतीय थे, जिन्होंने उस समय की जानी-मानी मूर्तिकार क्लेयर शेरिडेन से महात्मा गांधी की एक अर्ध-प्रतिमा बनवाई थी। शेरिडेन पूर्व ब्रिटिश पीएम विंस्टन चर्चिल की भतीजी थीं। एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक बाद में वह प्रतिमा तत्कालीन गवर्नमेंट हाउस यानि आज के राष्ट्रपति भवन में प्रदर्शित करने के लिए उस समय के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को सौंप दी गई। 1940 में लॉर्ड लिनलिथगो को लिखी एक चिट्ठी में खुद महात्मा गांधी ने यह बात बताई थी। बाद में 1947 में बापू जब बिहार के दौरे पर गए तो एक इंटरव्यू में उन्होंने महाराजा कामेश्वर सिंह की खूब सराहना करते हुए उन्हें एक बेहद ही अच्छा इंसान और उन्हें अपने पुत्र के समान बताया था।

दरअसल, महात्मा गांधी की अगुवाई वाले स्वतंत्रता आंदोलन और बाद के वर्षों में भी देश के लिए दरभंगा के महाराजा के योगदानों की काफी सराहना होती है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने एयरफोर्स को तीन फाइटर विमान दान में दिए थे। एक और मौके पर उन्होंने त्योहार मनाने के लिए सेना के हर एक जवान को 5,000 रुपये बतौर उपहार में दिए थे। आर्मी के मेडिकल कोर को उस जमाने में उन्होंने 50 एंबुलेंस दान में दिए थे। दरंभगा महाराज के जीवन से जुड़ी कई अहम जानकारियां ‘करेज एंड बेनेवॉलेंस: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह’ नाम की किताब में मिलती है। इस किताब में महाराजा के संबंध में कई अहम बातें मौजूद हैं।


देश के कई यूनिवर्सिटी को दिए थे दान
दरभंगा महाराज की जमींदारी 2,500 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा दायरे में फैली थी, जिसमें बिहार और बंगाल के 18 सर्किल और 4,495 गांव आते थे। उन्होंने अपनी जमींदारी के संचालन के लिए 7,500 से ज्यादा अधिकारियों की तैनाती कर रखी थी। सिर्फ राजनीति, उद्योग और समाजसेवा में ही उनका योगदान नहीं था। उन्होंने शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा देने के लिए भी दिल खोलकर दान दिए थे। कलकत्ता यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बीएचयू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी और बिहार यूनिवर्सिटी सबको उन्होंने दाम में मोटी रकम दी थी। जबकि पार्टी के तौर पर कांग्रेस को तो उन्होंने हमेशा ही दान दिया था और गरीब तबकों और सामाजिक संगठनों को भी बढ़-चढ़ कर सहयोग किया।

(स्त्रोत साभार – विकिपीडिया, लोकल मीडिया कनेक्ट, वन इंडिया)

1857 में वीर कुँवर सिंह के सहयोगी रही, आज भुला दीहल गइली धरमन बाई

आरा शहर में होली मिलन समारोह में बाबू कुँवर सिंह आईल रहले . धरमन बाई आ करमन बाई दुनो बहिन के मुजरा शुरू भईल . मुजरा के भाव रहे बीर कुँवर सिंह जी रउआ एइजा बइठल बानी . ई अंगरेज पूरा देश पर अतियाचार करत बाड़ स . रउआ कइसे देखि सकेनी . रऊआ चाहबि तबे इन्हनि के सात समन्दर पार भगावल जा सकेला . उठीं जागीं अउरी इन्हनि के भगावे खातिर ततपर हो जाईं . कुछ त गीत के भाव उत्तेजित करे वाला रहे अउरी कुछ धरमन व करमन बाई लोग के सुर के कमाल रहे कि बाबू कुँवर सिंह भावावेश में आ गईले . भावावेश में आई के ऊ धरमन बाई के हाथ पकड़ि लिहले . अब धरमन बाई बाबू साहेब के गोड़ पर गिर गईली . आज तकले केहू हमार हाथ न पकडले रहे . रउआ हाथ धयिनी त जिनिगी भर के साथ दिहिं . कुँवर सिंह आवाक ! लगले आपन ज्यादा उमिर के दुहाई देबे . कहलनि कि तहरा के बहुत जवान आदमी मिल जइहें . हम त पाकल आम ठहरनि ना जाने कब चू जाइबि . धरमन बाई ना मनलि . जे हाथ पकड़ले बा , उहे हमार मरद होइ . हम मुसलमान हईं ,ये से रउआ बहाना बनावत बानी .ओइजा मौजूद सब लोग धरमन बाई के बात के समर्थन कईल . अब बाबू कुँवर सिंह उहवाँ से लालअबीर लेकर धरमन बाई के माँग भरि दिहले . उपहार में आपन एगो कटार देई के कहले ,

” एकरा के सम्भाल के रखिह . एकरा में आगि बा .”

धरमन की नृत्यशाला आज भी है

कहल जाला कि बाबू कुँवर सिंह से उनुका दुई गो लइका भइले स .ई प्रमाणिक जानकारी नइखे . धरमन बाई पर इतिहास मौन बा .टुकड़ा टुकड़ा में जवन जानकारी मिलल बा – ऊ पर्याप्त नइखे . बाकि ई निर्विवाद सच बा कि धरमन बाई के बाबू कुँवर सिंह दिल – ओ – जान से चाहत रहले . ऊ धरमन बाई खाति अपना गाँव जगदीश पुर में धरमन मस्जिद , आरा शहर में धरमन चौक व उनका बहिन के खाति करमन टोला बसवले . बाबू कुँवर सिंह के पूरा परिवार उनका के मानत रहल हा . ऐक बेरी कुँवर सिंह आ उनकरा भाई अमर सिंह में मनमुटाव हो गईल रहे त धरमन बाई उ दुनो जाना के बीच में सेतु बन सुलहा करवली .

जब अंग्रेजन से लड़ाई लागल त धरमन बाई एकदम परछाईं के तरह से बाबू कुँवर के साथे लागि गईली . आपन धन दौलत सब बाबू वीर कुँवर सिंह के दान कई दिहली . जब रीवाँ से कालपी आवत रहे लो त रास्ता में अंग्रेजी सेना से भिड़ंत हो गईल . धरमन बाई सेना के सगंठन आपन हाथ में ले लिहली अउर खुद तोप सेना के संचालन करे लगलि . इनकरा अदम्य साहस के आगे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ गईल आ उहंवा से अंग्रेजी सेना भाग गईल . लेकिन ए दौरान धरमन बाई भी बहुत बुरी तरह से घायल हो गईली . बाबू कुँवर सिंह उनकर सिर अपना गोदी में रखि लिहले . खून जियादा बहि गईल रहे . धरमन बाई बाबू कुँवर सिंह के कटार वापस कई दिहली आ कहलि –

” देखि लीं , सवाच लीं ! एमे अबो आगि बा .”

अतना कहला के बाद उनकर प्राण पखेरू उड़ गईल .

(साभार – आखर का फेसबुक पेज)

माध्यमिक शिक्षक ओ शिक्षाकर्मी समिति का राज्य सम्मेलन

कोलकाता : माध्यमिक शिक्षक ओ शिक्षाकर्मी समिति का राज्य सम्मेलन गत 29 दिसम्बर को चेतना गर्ल्स हाई स्कूल के सभागार में आयोजित हुआ। इस शिक्षक संगठन के सम्मेलन में अगले साल के लिए योजनाएं बनायी गयीं तथा राज्य सरकार के समक्ष कई माँगें भी रखी गयीं। इन माँगों में वंचित शिक्षकों को टीजीटी स्केल प्रदान करने की माँग शामिल है। इसके साथ ही आवेदन के आधार पर शिक्षक स्थानान्तरण, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों समेत अन्य कर्मियों को सम्मानजनक वेतन देने, मदरसे में शिक्षक – शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति से सम्बन्धित अड़चनों को दूर करने, संथाली माध्यम के स्कूलों की बुनियादी संरचना का निर्माण तथा स्कूलों और मदरसों में डाटा इन्ट्री ऑपरेटर. झाड़ूदार, रात्रि सुरक्षाकर्मी की नियुक्ति की माँग शामिल है। संगठन ने पैरा, वोकेशनल, आई सी टी ई और पार्टटाइम शिक्षक व शिक्षाकर्मियों के स्थायीकरण और न्यूनतम मूल वेतनमान प्रदान करने की माँग की है। सम्मेलन में गौतम महन्ती को सभापति और विश्वजीत मित्र को दोबारा महासचिव चुना गया। यह जानकारी संगठन के कार्यकारी सचिव परिमल हाँसदा ने दी।

सृजनात्मक उत्सव है ‘हिंदी मेला’

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आयोजित 26वें हिंदी मेले के पांचवें दिन वाद-विवाद, भाव नृत्य और कोलकाता काव्य उत्सव का आयोजन किया गया। कोलकाता काव्य उत्सव में देश-विदेश से प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। पहले सत्र में वरिष्ठ कवि अरुण कमल, डॉ. शंभुनाथ, विनोद प्रकाश गुप्त, मंजू श्रीवास्तव, आशुतोष, राज्यवर्धन, मॉरीशस से सुरीति रघुनंदन, अभिज्ञात, निर्मला तोदी, सेराज खान बातिश, गुजरात से प्रमोद तिवारी और राहुल शर्मा ने अपनी कविता पाठ किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए अरुण कमल ने कहा कि उन्होंने नौ महीने बाद किसी कवि गोष्ठी में हिस्सा लिया। हिंदी मेला ने बहुतों को सृजन पटल पर मिला दिया।आज के कवि प्रतिरोध और लोकधर्मिता के भाव से भरे हैं। दूसरे सत्र में प्रियंकर पालीवाल, मृत्युंजय, अनुज लुगुन, केन्या से मनीषा कंठालिया, राजेश मिश्र, आनंद गुप्ता, कलावती कुमारी, नीलम प्रसाद, इबरार खान और मधु सिंह ने काव्य-पाठ किया। अध्यक्षता करते हुए कवि विनोद प्रकाश गुप्त ने कहा कि कवियों की नई पीढ़ी संभावनाओं से भरी है।तीसरे सत्र में वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल, बसंत त्रिपाठी, कालीप्रसाद जायसवाल नीतू सिंह भदौरिया, मनीषा गुप्ता, मुकेश मंडल, नागेंद्र पंडित, पंकज सिंह, कनाडा से सिद्धार्थ वत्स, पूजा सिंह, सूर्यदेव रॉय, राजेश सिंह और निखिता पांडेय ने काव्य पाठ किया। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए अष्टभुजा शुक्ल जी ने कहा कि हिंदी मेला का यह आयोजन हिंदी कविता के लिए सृजनात्मक मिलनोत्सव है।काव्य उत्सव का सफल संचालन आनंद गुप्ता, राहुल शर्मा और राहुल गौड़ ने किया।
वाद-विवाद प्रतियोगिता दो वर्गों में आयोजित हुई। ‘अ’ वर्ग के निर्णायक के रूप में शुभ्रा उपाध्याय एवं कलावती कुमारी उपस्थित थीं। शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि वाद-विवाद का यह प्रयास क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। सभी बच्चों ने अच्छे तरीके से अपनी बातों को रखा। भारतीय दर्शन आनंदवाद का दर्शन है। हम सब आशान्वित है, यही हमारा पाथेय है। कलावती कुमारी ने कहा कि बच्चों ने बहुत तार्किकता से उत्तर दिया, जो काफी प्रशंसनीय है। आपदा और अवसर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो सदा हमारे साथ चलते रहते हैं। भाव नृत्य प्रतियोगिता में बतौर निर्णायक प्रो. तृषा बनर्जी और चंद्रिमा मंडल उपस्थित थीं। इस प्रतियोगिता का सफल संचालन पूजा दुबे ने तथा धन्यवाद ज्ञापन रूपेश यादव ने दिया।

चौथे दिन काव्यसंगीत, लोकगीत, आशु भाषण और हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता ‘क’ वर्ग का आयोजन किया गया। इसमें कोलकाता समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और अपने मधुर गीत व संगीत से हमें मंत्रमुग्ध किया। काव्य संगीत और लोकगीत प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में रश्मि सिंह पांडेय और डॉ. राजेश मिश्र उपस्थित थे। डॉ राजेश मिश्र ने काव्य संगीत के विषय में कहा- “कविता को संगीत के साथ जोड़ने का हिंदी मेले का यह प्रयास सराहनीय है।” रश्मि सिंह पांडेय ने कहा- “गीत-संगीत हमारे जीवन को उल्लास से भर देते हैं। काव्य, लोक और संगीत का संबंध बहुत गहरा और पुराना है।” इस प्रतियोगिता का सफल संचालन सूर्य देव राय, रूपेश कुमार यादव और धन्यवाद ज्ञापन अर्चना पांडेय ने दिया। आशु भाषण प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में पूजा पाठक, आसनसोल गर्ल्स कॉलेज और अरुण कुमार उपस्थित थे और इस प्रतियोगिता का सफल संचालन नागेंद्र पंडित ने किया। आज चित्रांकन और कविता पोस्टर का परिणाम घोषित किया गया। चित्रांकन ‘शिशु’ वर्ग का शिखर सम्मान आर्यमन भट्टाचार्या, हराप्रसाद प्राइमरी इंस्टिट्यूशन, प्रथम स्थान रेवन्त मित्तल, लक्ष्मीपत सिंघानिया एकेडमी, द्वितीय स्थान प्रिया ओराओन, डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल, रांची, तृतीय स्थान ऋषिका खेमका, महादेवी बिरला शिशु विहार और प्रथम विशेष देबानशू सरकार, द्वितीय विशेष तुषार कांति, तृतीय विशेष अरनवी शर्मा, चतुर्थ विशेष चहल गौतम, पंचम विशेष प्रांगशु घोष और षष्ठ विशेष काशिका कुमारी को मिला तथा ‘क’ वर्ग का शिखर सम्मान आयुष कुमार शाह, सेंट ल्यूक डे स्कूल, प्रथम स्थान बिभूति मल्लिक, ओडिशा आदर्श विद्यालय, ओडिशा, द्वितीय स्थान काजल निषाद, खड़गपुर, तृतीय स्थान प्रार्थना साव, भोलानंदा नेशनल अकाडमी और प्रथम विशेष समीत सागर, द्वितीय विशेष अरितरा साहा, तृतीय विशेष सुनीता चौरसिया, चतुर्थ विशेष लावण्या साव, पंचम विशेष संयुक्त रूप से आफताब आलम और एना, षष्ठ विशेष आयुषी आर्या और सप्तम विशेष आंकाक्षा गुप्ता को मिला। कविता पोस्टर प्रतियोगिता का शिखर सम्मान सौमाभा सेन, विश्वभारती विश्वविद्यालय, प्रथम स्थान विश्वजीत राउत, काँचरापाड़ा कॉलेज, द्वितीय स्थान कंचन कुमारी, राजा नरेंद्रलाल खां वीमेंस कॉलेज और तृतीय स्थान प्रियंका गौंड़, इग्नू को मिला। हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता में विशेषज्ञ के रूप में डॉ. प्रमोद कुमार प्रसाद, प्रो. विद्यासागर विश्वविद्यालय, मिदनापुर, सिद्धार्थ वत्स, टोरेंटो, कनाडा और विकास साव, राज्यभाषा अधिकारी उपस्थित थे। इस वर्ग का सफल संचालन पंकज सिंह ने और धन्यवाद ज्ञापन विकास जायसवाल ने दिया। मल्टीमीडिया कविता पाठ प्रतियोगिता के परिणाम की घोषणा हुई। इसका शिखर सम्मान संयुक्त रूप से श्रुति प्रसाद, सेंट ल्युक्स डे स्कूल और निशा गहलोत, विवेकानंद कॉलेज, दिल्ली, प्रथम स्थान सूर्यदेव राय, इग्नू, द्वितीय स्थान अंशिका राय, केशवपुरम, दिल्ली, तृतीय स्थान देवांश भट्टर, लक्ष्मीपत सिंघानिया हाई स्कूल, कोलकाता और विशेष पुरस्कार खुशी, मॉडर्न चाइल्ड पब्लिक स्कूल, दिल्ली और मधु सिंह, विद्यासागर विश्वविद्यालय को विशेष प्रस्तुति के लिए पुरस्कार मिला। मल्टीमीडिया कविता पाठ की निर्णायिका इतु सिंह थीं।

26वें हिंदी मेले के तीसरे दिन चित्रांकन, कविता पोस्टर और हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। चित्रांकन प्रतियोगिता 2 वर्गों में (शिशु और अ) आयोजित की गई। । कविता पोस्टर प्रतियोगिता के अंतर्गत देश के अलग-अलग राज्यों से जुड़े प्रतिभागियों ने निर्धारित विषय ‘कोरोना और मानव जीवन’ पर भावनात्मक एवं सुंदर चित्र बनाएं । इस वर्ग का सफल संचालन बीरू सिंह, ममता साव और धन्यवाद ज्ञापन सुमन शर्मा ने दिया। चित्रांकन और कविता पोस्टर प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में सुलोचना सारश्वत और नागेश शर्मा उपस्थित थे। संस्था के अध्यक्ष डॉ. शम्भुनाथ ने प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा- “हिंदी मेला देश के विभिन्न राज्यों की प्रतिभाओं एवं संस्कृति को जोड़ने वाली पुल है।नई पीढ़ी का यह उत्साह और सांस्कृतिक प्रेम बहुत महत्वपूर्ण है। संस्था के संयुक्त महासचिव संजय जायसवाल ने कहा- “हिंदी मेला सांस्कृतिक कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं को प्रतियोगिता के माध्यम से जोड़ता है। चित्रांकन प्रतियोगिता एवं कविता पोस्टर प्रतियोगिता में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिभागियों ने यह प्रमाणित कर दिया हैं कि कोई भी आपदा कला और सांस्कृतिक प्रयासों को नहीं रोक सकती।” संयोजक इबरार खान ने कहा कि यह मेला बच्चों और नौजवानों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ता है।संयोजिका मधु सिंह ने कहा कि इन प्रतियोगिताओं के जरिए प्रतिभागी एक संवेदनशील समाज और परिवेश को निर्मित करते हैं। कार्यक्रम का सफल संचालन नैना प्रसाद,अनूप यादव,अलका साव हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता में विशेषज्ञ के रूप में डॉ. हंसा दीप (कनाडा), अनिता राय (शिक्षिका, कोलकाता), इतु सिंह (सहायक प्राध्यापिका, खिदिरपुर कॉलेज) और श्रीकांत द्विवेदी (सहायक प्राध्यापक,विद्यासागर विश्वविद्यालय) उपस्थित थे।

कभी क्रांतिकारियों का गढ़ था, अब खंडहर है ‘जनता के राजा’ का महल

वेलिंग्टन स्क्वायर….जब यह जगह याद आती है तो याद आते हैं हर साल सर्दियों में आने वाले तिब्बत, हिमाचल के वह चेहरे जो ऊनी कपड़ों का व्यवसाय करने के लिए कुछ महीने यहीं रह जाते हैं। ये जो उद्यान है..वहाँ होती है दुर्गापूजा…और विरोध – प्रदर्शन करने वालों के लिए तो यह अति प्रिय जगह है मगर ठीक इसके पीछे…..है एक जर्जर प्रासाद..जो कभी अपनी भव्यता पर गर्व करता होगा…आज अपनी आँखों में आँसू लिये अतीत को याद करता है…प्रासाद के भीतर पत्ते…हैं..सूखा कुआँ है…है तो बहुत कुछ मगर इस प्रासाद रूपी जर्जर इमारत को सम्भालने वाला होकर भी नहीं है…
यह जर्जर विशाल इमारत कभी क्रांतिकारियों की शरण स्थली थी और इसके संस्थापक थे राजा सुबोध मलिक या सुबोध चन्द्र बसु मलिक। इसी मकान में आते थे अरविन्द घोष। कई दिनों तक यहाँ रहे भी। कहने को तो हेरिटेज है मगर आसपास अतिक्रमण देखकर इस बात पर विश्वास करना कठिन है। लाल रंग की इस इमारत की दीवारें अब मटमैली हो चली हैं।

प्रवेश द्वार के भीतर जाते ही यह दिखता है

घर 1883-84 में बनाया गया था। यह अब एक मान्यता प्राप्त विरासत भवन है। सुबोध चंद्र मल्लिक के चचेरे भाई घर में एक भागीदार थे और उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय को अपना हिस्सा दान कर दिया था मगर एक कार्यवाहक ने दावा किया कि यह हिस्सा उसका था। मामला आज नहीं सुलझा, कलकत्ता विश्वविद्यालय को घर का कब्जा नहीं मिला। वृक्षों के जाल से ढकी इस इमारत के बीच दरवाजा खोलकर हम अन्दर गये तब भी यही कहा गया कि बगैर अनुमति के प्रवेश नहीं मिल सकता। किसी तरह हम अन्दर गये तो अन्दर जो दिखा, वह धरोहरों से प्रेम करने वाले किसी भी व्यक्ति का दिल दुखाने वाला ही दृश्य था। घर को लेकर मामला अभी तक चल रहा है और मामला जब तक नहीं सुलझता, तब तक कलकत्ता विश्वविद्यालय चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। जो निशानियाँ है,.एक – एक करके टूट रही हैं, खत्म हो रही हैं। अलबत्ता सामने संगमरमर की यह शिला बताती है कि यहाँ अरविंद आया करते थे और यहाँ एक लम्बा समय उन्होंने गुजारा। आस – पास के लोगों के लिए यह भवन किसी राजा का ही है, राजबाड़ी है मगर वह राजा कौन था, यह बहुत कम लोग बताते हैं…राजा किवदंती जो होता है मगर वे यह नहीं जानते कि सुबोध चन्द्र बसु मलिक को राजा की उपाधि किसी सरकार से नहीं मिली बल्कि जनता ने उनको यह उपाधि दी।

यह प्लाक साक्षी है इतिहास का

सुबोध चन्द्र मलिक का जन्म कोलकाता के पटलडांगा में प्रबोध चन्द्र बसु मलिक के घर हुआ था।। सेंट जेवियर्स कॉलेज और प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की और इसके बाद कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में 1900 में फाइन आर्ट्स की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद इंग्लैंड से भारत लौटे और स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ गये। तब वेलिंग्टन में स्थित उनका यह आलीशान घर क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा बन गया। मलिक बंगाल के उन दिग्गजों में शामिल रहे जिसने 1906 में नेशनल काउंसिल फॉर एडुकेशन की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। इस काउंसिल का उद्देश्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपरक शिक्षा का प्रसार करना था। मलिक ने बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना के लिए 1 लाख रुपये दिये और इस दान के कारण जनता ने उनको राजा की उपाधि दी। नेशनल काउंसिल ऑफ एडुकेशन यानी बांग्ला में जातीय शिक्षा परिषद 15 अगस्त 1906 को 191/1 बऊबाजार स्ट्रीट से शुरू हुआ था। यही वह भवन है जहाँ से बंग भंग आन्दोलन को दिशा मिली। वे कांग्रेस के उग्र दल से जुड़े थे।

कभी ऐसा रहा था यह भवन

जादवपुर विश्वविद्यालय का इतिहास बताता है कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना स्वदेशी आन्दोलन से किस प्रकार जुड़ी है। 1905-06 का दौर था और ब्रिटिश आधिपत्य चुनौती दी जाने लगी थी। शिक्षा प्रतिरोध का माध्यम बन रही थी और राष्ट्रवाद से जुड़ रही थी और एन सी ई या जातीय शिक्षा परिषद का उद्भव इसी भावना का प्रतिफलन था।
इसका प्राथमिक उद्देश्य विशेष रूप से राष्ट्रीय नियंत्रण में राष्ट्रीय तर्ज पर शिक्षा – साहित्यिक, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रदान करना था। शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भरता प्राप्त करना। एनसीई की नींव का विभूतियों ने डाली थी। विद्वानों के साथ-साथ आर्थिक सहयोग देने वाले भी थे। इन लोगों में शामिल थे राजा सुबोध चंद्र मल्लिक, गौरीपुर के ब्रजेंद्र किशोर रायचौधरी और सर रास बिहारी घोष (एनसीई के पहले अध्यक्ष), कवि रवींद्रनाथ टैगोर और श्री अरबिंदो घोष (पहले प्रिंसिपल)। 1 जून 1906 को परिषद पंजीकृत हुई। 1910 में बंगाल में तकनीकी शिक्षा के प्रचार के लिए सोसाइटी, बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट (जो बाद में कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, बंगाल बन गयी) को एनसीई में समाहित कर दिया गया। इसके बाद एनसीई ने बंगाल के इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी कॉलेज की देखरेख की, जो 1940 तक एक विश्वविद्यालय के रूप में काम कर रहा था। आजादी के बाद, पश्चिम बंगाल सरकार, सरकार की सहमति से। भारत के, 24 दिसंबर 1955 को जादवपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए आवश्यक कानून बनाया। विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह आज भी इसी दिन होता है।

राजा सुबोध चन्द्र बसु मलिक

बंगाल विभाजन या स्वदेशी आंदोलन के खिलाफ आंदोलन इसी घर से निर्देशित किया गया था । रवीन्द्रनाथ टैगोर, बाल गंगाधर तिलक, बड़ौदा के गैकवार, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, प्रिंस काउंट ओकुमा (जापान), गोखले, आगा खान, डब्लू. सी, बोनर्जी, चित्तरंजन दास, शरत चन्द्र बोस, साखराम गणेश देस्कर, ए. रसूल, ज्योतिरीन्द्र नाथ टैगोर, पशुपति नाथ बसु (बागबाजार), सतीश चंद्र सिन्हा (पाइकपाड़ा) और कई अन्य । कई मौकों पर रवीन्द्रनाथ ने अपनी कविताएं सुनाईं और पार्टियों में अपना गीत गाया था । उन्होंने इस घर में राष्ट्रगान भी गाया । अपनी राजनीतिक गतिविधियों के कारण सुबोध बाबू ब्रिटिश शासन के आँख की किरकिरी थे 1908 में अलीपुर बम कांड में इनको निर्वासित किया गया। आज सुबोध बाबू का घर जहाँ है, वेलिंग्टन का वह इलाका अब राजा सुबोध मलिक स्क्वायर के नाम से जाना जाता है। सुबोध चन्द्र मलिक अरविंद घोष के सहयोगी थे और क्रांतिकारियों की योजनाएं इसी घर में बनती थीं। अक्टूबर 1908 को सुबोध चन्द्र मलिक को वाराणसी में गिरफ्तार किया गया और 14 माह का निर्वासन उनको मिला। पहले उनको बरेली जेल और उसके बाद अल्मोड़ा जेल भेज दिया गया। उनके रिहा होने के बाद 1910 में अरविंद घोष 12 वेलिंग्टन स्क्वायर स्थित इसी घर में उनसे अंतिम बार मिले। इसके बाद अरविन्द घोष पॉन्डिचेरी चले गये जबकि सुबोध चन्द्र मलिक दार्जिलिंग चले गये और यहीं पर 41 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हुआ।

क्या हमारे महापुरुषों की धरोहर के साथ यह होना चाहिए?

बताया जाता है कि अंग्रेजी के यू आकार में निर्मित इस भवन में बाग थे, फव्वारा था और यह विदेशी स्थापत्य को ध्यान में रखकर बनाया गया था। एक बांग्ला समाचार पत्र के हवाले से पता चला कि भवन की अर्न्त सज्जा में यूरोपीय चित्रकला का उपयोग किया गया था। नृत्य के लिए अलग स्थान था, पुस्तकालय, डाइनिंग रूम और बिलियर्ड खेलने के लिए जगह थी और था एक खिड़की दरजा…बताया जाता है कि नवविहाहिता इसी दरवाजे से घर में आया करती थीं।
इस समय तो यह घर मुकदमेबाजी का शिकार है और दिन – प्रतिदिन और जर्जर होता जा रहा है। देखभाल का जिम्मा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पास है मगर बताते हैं कि जब तक मामला खत्म नहीं होता, तब तक कोई कुछ भी नहीं कर सकता। आनन्द बाजार पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार निगम के रिकॉर्ड में घर के मालिक के रूप में एच सी मलिक का नाम है। इस बारे में बसु मलिक परिवार के वर्तमान वंशधर कुणाल बसु मलिक का कहना था कि एच सी मलिक के निधन के बाद यह सम्पत्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय के पास चली गयी और सारी जिम्मेदारी अब सीयू की ही है मगर किसी प्रकार की सक्रियता फिलहाल नहीं दिखायी दे रही।

न जाने क्य़ों, जब इस तरह के धरोहरों को सम्भालने की बात आती है तो हर तरफ खामोशी ही मिलती है। जब आप सर्दियों में अपने लिए राजा सुबोध चन्द्र मलिक के नाम पर स्थित उद्यान के बाहर बाजार से कपड़े खरीदते हैं तो शायद एक बार फिर आपको एहसास भी न हो कि यहीं इसी उद्यान के पीछे वह विशाल राजप्रासाद है जो इस उद्यान की नींव है। जनता हर चीज के लिए आवाज उठाती है तो अपनी धरोहरों के लिए वह आवाज क्यों नहीं उठाती..जबकि वह उस आजाद हवा की नींव हैं, जिसमें हम सांस ले रहे हैं।
आप खुद सोचिए कि जिन क्रांतिकारियों ने अपना जीवन दाँव पर लगाकर, अपने सारे सुख त्याग कर हमें यह स्वतन्त्र भारत दिया, क्या वह इस तरह के व्यवहार के हकदार हैं और क्या इन धरोंहरो से जुड़े मामलों को लेकर टाल मटोल या मामले को उलझाना सही है? यह सही है कि हर चीज अस्थायी है मगर इतिहास के पन्नों में जो लिखा जाता है, वह इतिहास ही होता है और इतिहास जवाब आज की पीढ़ी से ही माँगेगा।
स्त्रोत साभार – विकिपीडिया.
आनन्द बाजार पत्रिका,
बांग्ला वर्ल्ड वाइड
सेव ए हिस्टॉरिकल मॉन्यूमेंट – द हाउस ऑफ राजा सुबोध मलिक का फेसबुक पेज

जादवपुर विश्वविद्यालय की वेबसाइट

याद किये गये श्रीराम तिवारी

कोलकाता : सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के पूर्व पुस्तकाध्यक्ष स्व०श्रीराम तिवारी की तृतीय पुण्य तिथि जालान पुस्तकालय कक्ष में आत्मीयजनों के बीच मनाई गई। पुस्तकालय के उपाध्यक्ष डाॅ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, मंत्री दुर्गा व्यास , कार्यकारिणी समिति के सक्रिय सदस्य महावीर बजाज ने उनके सामाजिक, मानवीय पक्षों के साथ साथ, सादगी, सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठा, मिलनसारिता, व्यवस्थापटुता, शिक्षा अनुराग, अनुशासनप्रियता तथा पुस्तकालय के प्रति संबद्धता की प्रसंशा करते हुए आभासी (वर्चुअल) माध्यम से अपने संस्मरण सुनाए। इस अवसर पर महावीर बजाज के साथ सर्वश्री श्रीमोहन तिवारी, लक्ष्मी जयसवाल, विजय तिवारी, पं. पुरुषोत्तम शर्मा , अमित शर्मा, दिनेश शर्मा, शांतनु मुखर्जी एवं पुस्‍तकालय में पठन-पाठन करने वाले अन्य विद्यार्थियों ने भी उनको श्रृद्धा सुमन अर्पित किए ।

हिंदी मेले में हुई कविताओं की भावपूर्ण आवृत्ति

कोलकाता: कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन’ द्वारा आयोजित 26वें हिंदी मेले के दूसरे दिन काव्य आवृत्ति प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों तथा सिंगापुर से जुड़े विद्यार्थियों ने हिंदी कवियों की कविताओं की भावपूर्ण आवृत्ति की। प्रतियोगिता तीन वर्गों (शिशु, अ तथा क) में आयोजित हुई। ‘शिशु’ वर्ग का शिखर सम्मान श्रेया पांडेय, अग्रसेन बालिका शिक्षा सदन, प्रथम स्थान अशिन्या अजय मिश्रा, मनोविकास इंग्लिश मीडियम स्कूल, गोवा, द्वितीय स्थान तेजस कुमार झा, बिरला हाई स्कूल, तृतीय स्थान संयुक्त रूप से ध्रुविका सोनछात्रा, दिल्ली पब्लिक स्कूल, न्यूटाउन और युक्ता कानन चल माहातो,दिल्ली पब्लिक स्कूल, कलिंगा, प्रथम विशेष पुरस्कार प्रियांशी पांडेय, द्वितीय विशेष पुरस्कार प्रिया पांडेय, तृतीय विशेष पुरस्कार सेजल अग्रवाल, चतुर्थ विशेष पुरस्कार अनाया मिश्रा तथा सोनल साव, स्नेहा सिंह, संवेदना मंडल, अरमान आनंद, अर्चित डोकानिया और अदिति तिवारी को सांत्वना पुरस्कार मिला। ‘अ’ वर्ग का शिखर सम्मान नम्रता श्री, डी. वी. एम. एस. इंग्लिश स्कूल, जमशेदपुर, प्रथम स्थान अश्विका सिंह, श्री शिक्षायतन स्कूल, द्वितीय स्थान सचिन ढोकानिया, लक्ष्मीपत सिंघानिया एकेडमी, तृतीय स्थान संजना जायसवाल, गुरुकुल ग्लोबल स्कूल तथा प्रथम विशेष छवि, द्वितीय विशेष रौनक पांडेय, तृतीय विशेष शिवांगी जायसवाल तथा शौर्यन सवरन, श्वेता ध्यानी, गुरुमंत सिंह, श्रुति प्रसाद, धृति दूबे, स्वेता सिंह, साक्षी सिंह, अनुप्रिया सुहानी को सांत्वना पुरस्कार मिला। ‘क’ वर्ग का शिखर सम्मान अदिति ए संजय, लोरेटो डे स्कूल, प्रथम स्थान बिघ्नेषा विगल, द्वितीय स्थान पार्वती साव, कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रीति साव, कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रथम विशेष ओमप्रकाश प्रसाद, द्वितीय विशेष प्राची, तृतीय विशेष संयुक्त रूप से हर्ष उर्मलिया और नयना प्रसाद तथा आयुषी साव, संजना साव, दीपा गुप्ता और सिमरन सिंह को सांत्वना पुरस्कार मिला। शिशु वर्ग के निर्णायक के रूप में दिल्ली से ममता रजनीश और कोलकाता से कविता अरोड़ा उपस्थित थीं ।कार्यक्रम का संचालन ज्योति अग्रवाल, मनीषा गुप्ता तथा धन्यवाद ज्ञापन बलवंत यादव ने दिया। वर्ग ‘अ’ के निर्णायक के रूप में कोलकाता से उमा झुनझुनवाला तथा दिल्ली से सारिका घुलियानी उपस्थित थीं। संचालन प्रीति सिंह और राजेश सिंह ने किया। उमा झुनझुनवाला ने मेले के विषय में कहा- “पिछले 26 वर्षों से हिंदी मेला नई पीढ़ी की रचनात्मकता को मांजने का काम कर रहा है।” वर्ग ‘क’ के निर्णायक प्रियंकर पालीवाल ने कविता के विषय में कहा- “हमारे हृदय पर जो दुनियादारी की परत जम जाती है, उसे साफ करने का कार्य कविता करती है और यह हमारे हृदय के आयतन का विस्तार करती है। जहाँ आज हम स्मृतियों को खोते जा रहें हैं, वहाँ इन कविताओं का पाठ स्मृतियों को बनाये रखती है।” नरिंदर कौर गांधी ने कहा कि हिंदी मेला का यह आयोजन नई पीढ़ी को साहित्य और कलाओं से जोड़ने का काम कर रहा है। संचालन बीना मिश्रा एवं पूजा सिंह ने किया।

लेखिका मधु कांकरिया ने किया उद्घाटन

भारतीय भाषा परिषद में कोरोना के अनुशासन का पालन करते हुए सात दिवसीय हिंदी मेला का उद्घाटन प्रसिद्ध  कथाकार मधु कांकरिया ने किया। उनका कहना था कि हिंदी मेला इस बार ऑनलाइन सुविधाओं के कारण राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक हुआ है। यह हम सब के लिए गौरव की बात है। युवा और विद्यार्थी ही आनेवाले दिनों में सांस्कृतिक प्रदूषण से बचकर मानवता और साहित्य का काम करेंगे। भाषाविद डॉ. अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि संकट के दौर में भी शिशुओं से लेकर नौजवान हिंदी मेला में भाग ले रहे हैं। यह परंपरा और नवीनता का समय है। टिप्पणीकार और रंगकर्मी मृत्युंजय ने कहा कि हिंदी मेला ने पिछले 26 सालों में हिंदी के सांस्कृतिक समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह इसके कर्मठ और दक्ष सांस्कृतिक कर्मियों की महानता का सुफल है।
उद्घाटन समारोह में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शंभुनाथ ने कहा कि हिंदी मेला देशभर के साहित्यकारों और युवाओं-विद्यार्थियों का सांस्कृतिक संगम है। आज युवाओं को कबीर-मीरा- तुलसी से लेकर प्रेमचंद-निराला-नागार्जुन तक हिंदी साहित्य की परंपरा से प्रेरणा लेने की जरूरत है। हिंदी मेला सामाजिक विभाजन और विद्वेष की जगह मानवीय प्रेम का संदेश देता है। प्रेमचंद के इन शब्दों से प्रेरणा लेने की जरूरत है कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली नहीं, आगे मशाल दिखाने वाली सचाई है। इसका लक्ष्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य थाती हिंदी साहित्य के उच्च मूल्यों का प्रचार है। नाट्यकर्मी सुशील कान्ति ने कहा कि इस बार हिंदी मेले में परंपरागत नाटक की जगज लघुफिल्म निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

 

ताज बेगम : हौं तो तुरकानी हिन्दुआनी ह्वै रहूँगी मैं” 

प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 10

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों अपनी पिछली बतकही में मैंने एक सवाल उठाया था कि हमारा समाज उन महिलाओं को उनका प्राप्य देना, आखिर कब सीखेगा जो इस घर, परिवार, समाज पर अपने आपको पूरी तरह से वार देती हैं और बदले में उन्हें धन्यवाद देना तो दूर, हम उन्हें याद तक नहीं रखते। महिलाएँ साहित्य, समाज, राजनीति या संस्कृति किसी भी क्षेत्र की क्यों ना हो उनके अवदानों को अपेक्षाकृत उचित स्थान और सम्मान कम ही मिलता है। तो इन भूली बिसरी सखियों की याद जनमानस में पुनः ताजा करने का काम भी तो हमें और आपको मिलजुलकर ही करना होगा। हमारी बात कहने के लिए कोई दूसरा आगे आएगा, इसकी प्रतीक्षा करने की जगह  हमें अपना इतिहास स्वयं लिखने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। डा. सुमन राजे जैसी लेखिकाओं ने इस मुहिम की शुरुआत कर दी है और इस महत्वपूर्ण सिलसिले को हमें जारी रखना है। अपनी विरासत भी संभालनी है, वर्तमान भी संवारना है और भविष्य भी लिखना है। 

सखियों, पहले मैं बात करना चाहती हूँ, साहित्यिक क्षेत्र की अपनी विरासत की। साहित्यिक क्षेत्र की न जाने कितनी भूली बिसरी रचनाकार हैं जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उन्हें ससम्मान साहित्येतिहास में स्थान देना आवश्यक है। सन 1900. में “भारती” पत्रिका में रवींद्रनाथ ठाकुर का “काव्येर उपेक्षिता” नामक निबंध छपा था जिसने न केवल बांग्ला साहित्य जगत में हलचल मचाई थी बल्कि उसे पढ़कर और प्रेरित हो कर मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों ने भी अपने काव्य ग्रंथों में उर्मिला, यशोधरा जैसी उन उपेक्षिता नायिकाओं को वह स्थान दिलाया जिससे वे अब तक वे वंचित थीं। नायिकाओं को तो अपना प्राप्य मिला लेकिन साहित्याकाश की बहुत सी लेखिकाओं को वह समादर नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। समय की धूल ने उन्हें इस तरह ढका कि इतिहास की गलियों में उनकी पहचान गुम सी गई। ऐसी ही तमाम भूली- बिसरी लेखिकाओं के रचनात्मक अवदान को आप सखियों के समक्ष उद्घाटित करते हुए मैं उनके प्रति हुए अन्याय को रंच मात्र ही सही कम करना चाहती हूँ। इस कड़ी में पहला नाम है, मध्यकालीन कवयित्री “ताज बेगम” का जिनका समय ईसा सन 1644  माना जाता है। उनक बारे में प्रचलित तमाम कहानियों में से एक में उन्हें सम्राट अकबर की पत्नी बताया गया है और एक दूसरी कहानी के अनुसार वह सम्राट औरंगजेब की भतीजी थीं। उन्होंने और‌ औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसा ने कृष्णभक्ति की दीक्षा ली थी। वे दोनों ही कविताएँ लिखा करती थीं। ताज बेगम को अपनी  मुगलिया पृष्ठभूमि के कारण, कृष्ण के प्रति अपने प्रेम और समर्पण के लिए तत्कालीन कटृटरपंथियों की आलोचनाओं और भर्त्सनाओं का सामना करना पड़ा लेकिन वह अपने रास्ते से डिगी नहीं और डंके की चोट पर कहा-

“नन्द जू को प्यारा जिन कंस को पछारा,

वह वृन्दावनवारा कृष्ण साहेब हमारा है॥”

कहा जाता है कि इनकी कृष्ण भक्ति और प्रेम में पगी कविताओं के कारण मुगलिया सल्तनत में हलचल भी मच गई थी और संभवतः यही कारण रहा होगा कि उनकी कविताओं पर विस्मृति की चादर डाल दी गई होगी। मीराबाई की तरह ही उन्होंने भी कृष्ण प्रेम के लिए सामाजिक मान्यताओं और बेड़ियों की भी परवाह नहीं की और व्यक्तिगत मान सम्मान को परे रखकर, कृष्ण की भक्ति में स्वयं को लीन करते हुए अपने दिल की कहानी सारे जहान को बेझिझक सुनाई-

“सुनो दिल जानी मेरे दिल की कहानी तुम,

दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूँगी मैं।”

आश्चर्य इस बात का है कि आधुनिक हिंदी साहित्य के जिस पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने रसखान और रहीम जैसे कृष्ण भक्त कवियों की  कविताओं पर रीझकर बड़े गर्व से कहा था-“इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिंदू वारिए”, उनकी दृष्टि से ताज बेगम की कविताएँ कैसे ओझल हो गईं। संभवतः इस उपेक्षा के मूल में सत्ता थी, वह चाहे राजसत्ता हो या पुरूष सत्ता। रसखान की तरह ही ताज की कविता में भी ब्रज वीथिकाओं और कालिंदी कूल का सजीव अंकन हुआ है-

“कालिंदी के तीर नीर-निकट कदंब कुंज, 

मन कछु इच्छा कीनी सेज सरोजन की। 

अंतर के यामी, कामी, कँवल के दल लेके, 

रची सेज तहाँ शोभा कहा कहौ तिनकी।”

 सखियों, यह कमाल इतिहास लेखक का होता है जो कुछ बातों को छिपाने और कुछ को दिखाने की कला में माहिर होते हैं तभी तो बहुत से इतिहास ग्रंथों में ताज बेगम का नामोल्लेख तक नहीं है। उनके बहुत से पद संभवतः इधर- उधर बिखर गये होंगे तभी तो कविता कोश में उनके मात्र तीन ही पद संकलित हैं। लेकिन उन तीन पदों से ही उनकी भक्ति की उत्कटता भी प्रकट होती है और  कविता की उत्कृष्टता भी। डा. सुमन राजे अपनी किताब “इतिहास में स्त्री” में मीराबाई के साथ उनकी तुलना करती हुईं उनकी काव्यानुभूतियों को रेखांकित करती हैं- “मीरा के तेवर तो अलग हैं ही लेकिन ताज में भी अनुभूति की गहराई तथा समर्पण की भावना अनूठी थी।” हालांकि मीराबाई की तरह उन्होंने अपने कुल और रानीत्व की प्रतिष्ठा का त्याग नहीं किया था लेकिन इससे उनकी चुनौतियों को कम करके नहीं आंका जा सकता। मीराबाई ने गृहत्याग किया या करने को विवश की गईं तो उनके साथ उनकी कविताओं की अनुगूंज भी जन- जन तक पहुँची। लेकिन ताज ने तो जल में रहकर मगर से बैर ठाना। मुगल सल्तनत में रहते हुए, उसकी धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए सरेआम अपनी भावनाओं का ऐलान किया –

“देव पूजा ठानी हौं निवाज हूँ भुलानी तजे,

कलमा कुरान सारे गुनन गहूँगी मैं॥

श्यामला सलोना सिरताज सिर कुल्ले दिये,

तेरे नेह दाग में निदाग ह्वै दहूँगी मैं।

नन्द के कुमार कुरवान ताणी सूरत पै,

हौं तो तुरकानी हिन्दुआनी ह्वै रहूँगी मैं॥”। 

सखियों, यह माना जाता है कि ताज बेगम विट्ठलदास जी की सेविका बन गईं थीं और उनके पद पुष्टिमार्गीय  कृष्ण मंदिरों में गाये भी जाते थे। प्रेम दीवानी ताज की जब मृत्यु हुई तो उनकी समाधि ब्रजभूमि की रमन रेती से तकरीबन दो किलोमीटर दूर बनाई गई। वह समाधि आज भी वहीं है जहाँ यह महान कवयित्री चिर विश्राम में लीन हैं। उनकी रचनाशीलता को सादर नमन करते हुए, आज आप से विदा लेती हूँ, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।

 

 

विनीत अग्रवाल बने एसोचेम के नये अध्यक्ष

कोलकाता : लॉजिस्टिक्स मेजर ट्रान्सपोर्ट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (टीसीआईएल) द एसोसिएटेड चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचेम) के नये अध्यक्ष बने हैं। उन्होंने हीरानंदानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज के सह संस्थापक तथा प्रबन्ध निदेशक डॉ. निरंजन हीरानंदानी की जगह ली है जिन्होंने इस शताब्दी वर्ष में अपना कार्यकाल पूरा किया है। विनीत अग्रवाल ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महामारी के बाद का समय चुनौतियों का समय है और वे उद्योग जगत, सरकार, अकादमिक जगत, नागरिक समाज तथा एसोचेम के कर्मचारियों के साथ मिलकर नये अवसर बनाने के लिए काम करेंगे। अग्रवाल ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन (एआईएमए) की यंग लीडर्स काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
दूसरी तरफ रि न्यू पावर के सीएमडी सुमन्त सिन्हा एसोचेम के नये सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बने हैं। एसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा कि इन दोनों नये पदाधिकारों के मार्गदर्शन में एसोचेम और आगे बढ़ेगा।

मायरे टेक्नीमॉन्ट ने भारत में बढ़ाया कारोबार
कोलकाता : मायरे टेक्नीमॉन्ट एसपीए ने भारत में अपना कारोबार बढ़ा रही है। भारत में अपनी इकाई टेक्नीमॉन्ट प्राइवेट लिमिटेड के जरिए आईओसीएल से कम्पनी ने हाथ मिलाया है और यह अनुबन्ध 255 मिलियन अमरीकी डॉलर का होगा। परियोजना इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, निर्माण और कमिशनिंग गतिविधियों के क्षेत्र में केन्द्रित होगी। एक्रेलिक एसिड का निर्माण पूरा होने पर इसकी सालाना क्षमता 90 हजार टन होगी जबकि नई ब्यूटाइल एक्रिलेट यूनिट में प्रति वर्ष 150,000 टन की क्षमता होगी। मैकेनिकल पूर्णता के लिए समय अनुसूची 26 महीने है। मायरे टेक्नीमॉन्ट ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पायरोबर्टो फोल्गिएरो, ने कहा, “भारत में हरित रसायन विज्ञान और परिपत्र अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण का समर्थन करने के लिए आईओसीएल के साथ समझौता ज्ञापन की हाल ही में घोषणा के बाद, हम इस तरह के एक प्रमुख ग्राहक के लिए एक रणनीतिक संबंध को मजबूत करते हैं पेट्रोकेमिकल व्यवसाय में भी । पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बढ़ती मांग की बदौलत हमारी प्रौद्योगिकी-संचालित रणनीति ने हमें एक बार फिर से एक ऐसे बाजार में अवसरों का निवेश करने का मौका दिया है। अंत में, “भारत देश मूल्य” को अधिकतम करने के उद्देश्य से भारत सरकार की रणनीतिक दृष्टि के साथ, हमारी भारतीय इकाई बड़ी जटिल परियोजनाओं के प्रबंधन में अपनी मजबूत क्षमताओं की पुष्टि करते हुए कार्य को जिम्मेदारी के एक बिंदु के रूप में निष्पादित करेगी।