Wednesday, April 8, 2026
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फैशन डिजाइनर सत्य पॉल का निधन

कोयंबटूर : भारतीय साड़ी को नई पहचान देने वाले प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर सत्य पाल का निधन हो गया है। उनके पुत्र पुनीत नंदा ने यह जानकारी दी। वह 79 वर्ष के थे। पॉल को दिसंबर में मस्तिष्काघात हुआ था। उन्होंने गत बुधवार को सद्गगुरु के ईशा योग सेंटर में अंतिम सांस ली।
नंदा ने फेसबुक पर लिखा, “उन्हें दो दिसंबर को मस्तिष्काघात हुआ था और अस्पताल में उनके स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार हो रहा था, उनकी अंतिम इच्छा थी कि जो चीजें उनके शरीर में चुभाई गई हैं या उनके शरीर की निगरानी के लिये लगाई गई हैं उन्हें हटा दिया जाए जिससे वह उड़ सकें।” उन्होंने आगे लिखा, “अंतत: हमें चिकित्सकों से उन्हें वापस ईशा योग सेंटर ले जाने की इजाजत मिली जहां वह 2015 से रह रहे थे। उनकी इच्छा के मुताबिक, वह गुरु के आशीर्वाद से शांतचित्त से परलोक सिधार गए।”
नंदा ने कहा कि परिवार में यद्यपि पिता को खोने का दुख है लेकिन इस बात को लेकर शांति है कि वह अपनी जिंदगी अच्छे से जीकर पीछे एक भरा-पूरा परिवार छोड़कर गए हैं। पॉल ने 60 के दशक में खुदरा क्षेत्र में अपने सफर की शुरुआत की और बाद में यूरोप और अमेरिका में भारतीय हथकरघा उत्पादों के निर्यात का काम बढ़ाया। उन्होंने 1980 में भारत में पहला ‘साड़ी बुटीक’, लाअफेयर शुरू किया और फिर अपने बेटे के साथ मिलकर 1986 में अपना फैशन ब्रांड शुरू किया।

 

बाँस हस्तशिल्प के जरिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं जीतन देवी

रांची :  रांची के पास दाहू गांव में जीतन देवी बांस से कई आकर्षक वस्तुएं बनाती हैं। उन्होंने अन्य महिला कारीगरों को भी ये काम करने की प्रेरणा दी है। इस गांव में लोगों को रोजगार के नए अवसर देने में जीतन देवी का अहम योगदान है। फिलहाल वे झारखंड सरकार से नई मशीनों की मांग कर रही हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट्स बना सकें। जीतन के साथ लगभग 30 महिलाएं काम कर रही हैं। वे अन्य गांवों में जाकर भी महिलाओं को बांस से अलग-अलग चीजें बनाना सिखाती हैं।
जीतन देवी मानती हैं कि बांस से बने उत्पाद ही उनकी परंपरा रहे हैं। उन्होंने बताया कि महामारी के बीच भी हमारे उत्पादों को छठ पूजा और शादियों में बेचा गया। हम इन चीजों को बाजार में बेचने के लिए अपने उत्पादों का स्टॉक बनाए रखते हैं।
जीतन देवी ने बताया कि लॉकडाउन में और उसके बाद भी बांस से बने उत्पादों की मांग कम हो गई थी। ऐसे वक्त में उन्होंने अन्य महिलाओं के साथ मिलकर उन्होंने राज्य आजीविका संवर्धन सोसायटी के तहत ट्रेनिंग भी ली है। जीतन देवी ने ओडिशा में रहते हुए सात साल तक बांस से प्रोडक्ट बनाने का काम सीखा। उन्हें इस ट्रेनिंग के दौरान रोज 10 रुपये मिलते थे। खुद सीखने के बाद अब वे अपने पति के साथ अलग-अलग जगह पर जाकर लोगों को बांस से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देती हैं।

वक्त के साथ बदलने में यकीन रखती हैं 100 साल की आजी

सोशल मीडिया पर ऐसी कई कहानी वायरल होती हैं जो लोगों को जिंदगी के मायने सिखा जाती हैं। 100 साल की एक उम्रदराज महिला की कहानी इन दिनों फेसबुक पेज ‘ह्यूमंस ऑफ बॉम्बे’ पर वायरल हो रही है। इस महिला को उनके पोता-पोती आजी कहते हैं। आजी का जन्म 1920 में हुआ था। वे महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहीं तो हिटलर के जमाने को भी करीब से देखा। लोगों को सुनाने के लिए उनके पास कई सच्ची कहानियां हैं। अपने अनुभव के आधार पर वे जिंदगी को भरपूर जीना चाहती हैं।
आजी मानती हैं कि समय के साथ हम सबको बदलना चाहिए। उन्होंने नई पीढ़ी को देखकर खुद को बदला। आज वे पिज्जा जैसे जंक फूड भी घर के लोगों के साथ बैठकर मजे से खाती हैं। आजी ने बताया – ”मेरे साथ वाली महिलाएं मुझे हद से ज्यादा फॉरवर्ड मानती हैं। वे कहती हैं मैं अपने बच्चों को बिगाड़ रही हूं। लेकिन मैं इस बात में यकीन करती हूं कि वक्त के साथ हम सबको बदलना चाहिए। इसलिए जब मेरे बच्चे बड़े हुए तो मैं भी उनके साथ बड़ी होती गई और मैंने वक्त के साथ खुद को भी बदला। हालांकि मेरे पति के साथ मैं कभी डिनर के लिए घर से बाहर नहीं गई। लेकिन मैं उनसे भी जिद करती थी कि वे मुझे और बच्चों को बर्गर और पिज्जा खिलाने ले जाएं। आखिर ऐसा कौन है जो पिज्जा खाने से मना कर सकता है”।
आजी की वजह से घर के अन्य लोगों द्वारा विरोध करने के बाद भी उनके बेटे की अंतरजातीय शादी संभव हो पाई। आजी कहती हैं – ”मेरी सोच बहुत सिंपल है बेटा। जियाे और जीने दो। मेरी इसी सोच की वजह से आज भी मेरे 5 बच्चे और 10 पोता-पोती उनके हर सेलिब्रेशन में मुझे साथ रखते हैं”।

 

देश में पहली बार मालगाड़ी की पायलट से लेकर गार्ड तक सभी महिलाएं

महाराष्ट्र से गुजरात का सफर 6 घंटे में पूरा किया
भारतीय रेलवे के इतिहास में महिलाओं ने नया रिकॉर्ड कायम किया। रेलवे में पहली बार मालगाड़ी को चलाने वाली पायलट से लेकर गार्ड तक सभी महिलाएं थीं। यह मालगाड़ी महाराष्ट्र के पालघर जिले के वसई रोड़ स्टेशन से माल लेकर गुजरात के वडोदरा पहुंची। इसकी कमान महिलाओं के हाथों में थी। इसकी लोको पायलट कुमकुम एस डोंगरे ( उम्र 34 साल), सहायक लोको पायलट उदिता वर्मा (उम्र 28 साल) और गुड्स गार्ड आकांक्षा रे ( उम्र 29 साल) थीं। इस ट्रेन में पायलट से लेकर गार्ड तक सभी महिलाएं थीं। 43 बंद वैगनों में 3,686 टन का माल लेकर यह मालगाड़ी मंगलवार सुबह 11:30 बजे वसई रोड़ से रवाना हुई और 6 घंटे के बाद वडोदरा पहुंची। महिला पायलटों ने इसे करीब 60 किमी प्रति घंटे की औसत गति से चलाया। पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक आलोक कंसल ने बुधवार काे कहा, “पश्चिम रेलवे ने एक और परंपरा को तोड़ा है, जो इतिहास में दर्ज हाे गया। महिलाओं ने एक शानदार उदाहरण पेश किया है कि कोई भी काम उनकी क्षमता से बाहर नहीं है।’ कुछ साल पहले पश्चिम रेलवे ने पहली मोटरवुमेन प्रीति कुमारी को उपनगरीय ट्रेन चलाने की कमान सौंपी थी।

इटालियन मधुमक्खियों का शहद बेचकर सफल हो गये नीलेश

राजकोट :  राजकोट के रहने वाले नीलेश गोहिल ने एग्रोनॉमी में ग्रेजुएशन करने के बाद नीलेश ने मधुमक्खी पालन करने का फैसला किया। उन्होंने इटेलियन मधुमक्खियों की 50 पेटियों से शहद बनाने की शुरुआत की। इस शहद की इतनी माँग बढ़ी कि एक साल के अंदर ही वे 200 पेटियों से ज्यादा का उत्पादन करने लगे। वे एक साल में ही सात लाख रुपये से ज्यादा की कमाई कर चुके हैं।
23 साल के नीलेश बताते हैं कि उन्होंने इस प्रोफेशन के लिए छह महीने का प्रशिक्षण लिया। 2019 में मधुमक्खी पालन शुरू किया। पहले सोशल मीडिया के जरिए बिजनेस किया। जब लोगों को इसके बारे में पता चला तो माँग बढ़ गयी। आज नीलेश 1800 किलो शहद का प्रोडक्शन करते हैं और इसकी थोक में आपूर्ति करते हैं।
नीलेश का कहना है कि उन्होंने इटालियन मधुमक्खियों को इसलिए चुना, क्योंकि इनसे शहद का उत्पादन ज्यादा होता है। अभी वे हर महीने 150 किलो शहद का उत्पादन कर लेते हैं। इनसे छह प्रकार का (अजमो, वरियाली, बोर, क्रिस्टल, मल्टी और रायडो) शहद का उत्पादन होता है। वे अब देसी शहद के लिए देसी मधुमक्खियों के पालन की कोशिश में लगे हैं।
नीलेश बताते हैं, ‘मधुमक्खियों की खेती के लिए लगातार मूवमेंट जरूरी होता है। इसके लिए मुझे उन इलाकों में जाना पड़ता है, जहां बड़े पैमाने पर फूलों का उत्पादन होता है। मैं गुजरात में जामनगर, कच्छ, सुरेंद्रनगर, मोरबी और जूनागढ़ की यात्रा करता रहता हूं। यहां अलग-अलग तरह के फूलों के खेत हैं, जिनसे अलग-अलग फ्लेवर का शहद मिल जाता है। रायडो शहद (सरसों के फूल का शहद) के लिए मुझे राजस्थान जाना पड़ता है। क्योंकि, राजस्थान के उदयपुर, जयपुर और कोटा के आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर सरसों की खेती होती है।’
सबसे पहले मधुमक्खियां फूलों का रस चूसती हैं। इसके बाद वे वैक्स की बनी पेटी में मलत्याग करती हैं और यही मल शहद के रूप में परिवर्तित होता है। शुरुआत में इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, लेकिन रात में मधुमक्खियां अपने पंख की मदद से शहद से पानी अलग कर देती हैं।
शहद निर्माण की यह प्रक्रिया लगातार 7-8 दिनों तक चलती है। इस तरह के शहद को कच्चा शहद कहा जाता है। इसके बाद शहद को पकाने के लिए रखा जाता है। करीब 12 से 15 दिनों में शहद पक कर तैयार हो जाता है, जिसे पेटी से निकाल लिया जाता है। इस शहद का सीधे उपयोग किया जा सकता है।
इसके लिए खुली जगह की जरूरत होती है, जहां मधुमक्खियों के पालन के लिए पेटियां रखी जा सकें।
लकड़ी के बने बक्से और मुंह की सेफ्टी के लिए जाली।
मधुमक्खियों की उन्नत किस्म।
हाथों के लिए दस्ताने और धुंआदानी।
अगर आप 200 से 300 पेटियां मधुमक्खियां पालते हैं तो आपको 4 से 5 हजार स्क्वायर फीट जमीन चाहिए। मधुमक्खी की चार प्रजातियों में से इटालियन मक्खी सबसे अच्छी मानी जाती है। यह शांत स्वभाव की होती है और छत्ता छोड़कर कम भागती है।
मुनाफा कैसे कमाएं
पाँच बॉक्स के लिए करीब 20 हजार रु खर्च होंगे। बाद में इनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। एक महीने में एक पेटी से चार किलो तक शहद मिल सकती है, जिसे आराम से बाजार में सौ रुपए किलो तक बेचा जा सकता है। पेटियों की संख्या बढ़ाकर एक महीने में एक लाख रुपए तक की कमाई की जा सकती है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

 

ब्रिटेन ले लौटा दम्पति यूट्यूब पर गाय-भैंस का वीडियो अपलोड कर कमा रहा लाखों

रामदे और भारती किसी वीडियो में गाय-भैंस को चारा खिलाते दिखते हैं तो किसी में चूल्हे पर खाना बना रहे होते हैं। किसी वीडियो में खेत में काम करते नजर आते हैं, तो किसी में माता-पिता के साथ बात करते हुए दिखते हैं। इनके वीडियो न स्क्रिप्टेड होते हैं और न ही उसमें बहुत एडिटिंग की जाती है, लेकिन फिर भी ये यूट्यूब पर खूब देखे जाते हैं। महीने का साढ़े चार से पांच लाख रुपए सिर्फ यूट्यूब से कमा रहे हैं। कहते हैं कि यूट्यूब के लिए वीडियो तो शौक से बनाते हैं, मुख्य काम तो खेतीबाड़ी है। रामदे और भारती दोनों ही ब्रिटेन में रहते थे। रामदे की बहन UK में रहती हैं। उन्हीं के साथ वो 2006 से 2008 तक रहे फिर वापस लौट आए। शादी के बाद 2010 में फिर ब्रिटेन चले गए। वहां नौकरी करने लगे। भारती को पढ़ाई करनी थी तो वो वहीं से हॉस्पिटल मैनेजमेंट में ग्रैजुएशन करने लगीं। जिंदगी सैटल हो गई थी। भारती की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी, उन्हें भी नौकरी मिल गई थी। लेकिन रामदे के मन में गांव में रह रहे अपने माता-पिता की चिंता थी। कहते हैं, ‘मैं इकलौती संतान हूं इसलिए 2016 में सब छोड़कर गांव लौट आया।’
घर में बाप-दादा सब खेती ही करते आए हैं, इसलिए रामदे भी खेती करने लगे। इसके साथ ही उन्होंने पशुपालन भी शुरू कर दिया। सात भैंसे खरीद लीं। दो घोड़ी भी उनके पास हैं। एक डॉगी भी है। मैंने उनसे पूछा कि आपका यूट्यूब का कारवां कैसे शुरू हुआ? तो इस पर बोले, ‘सर, हमने यूट्यूब से पैसे कमाने की नहीं सोची थी। हम तो मोबाइल से अपनी डेली लाइफ के वीडियो शूट करके अपलोड कर देते थे ताकि वो यूट्यूब पर सेव हो जाएं और हम जब चाहें, उन्हें देख सकें।’ बोले, ‘मेमोरीज को बनाए रखने के लिए वीडियो अपलोड करना शुरू कर दिया था। इसलिए न ही कभी कोई स्क्रिप्टिंग की और न ही कोई एडिटिंग करवाई।’
इन्हीं में से एक भैंस वाला वीडियो अचानक यूट्यूब पर वायरल हो गया। एक दिन में ही करीब साढ़े तीन लाख व्यूज आए। कहते हैं, ‘वीडियो वायरल होने के बाद हमने गूगल पर यूट्यूब वीडियो के बारे में और सर्च किया। देखा कि कैसे मॉनेटाइजेशन होता है। वीडियो अपलोड करने की पॉलिसी क्या है। वीडियो कैसे बन रहे हैं। यह सब पता करके मॉनेटाइजेशन के लिए अप्लाई कर दिया। 6 महीने बाद हमारा चैनल मॉनेटाइज हो गया। फिर हर रोज एक-एक वीडियो अपलोड करने लगे। वीडियो का मकसद गांव की लाइफ स्टाइल लोगों को दिखाना था।’
रामदे के मुताबिक, ‘मैं और पत्नी देश-दुनिया घूमे हैं। हम ये जानते थे कि हमारी गांव में जो लाइफ स्टाइल है, वो यूनीक है और शहर वालों के लिए नई है। इसलिए हम नेचुरल वीडियो ही अपलोड करते थे। जैसे खेत में साथ में खाना खाते हुए, पैरेंट्स के साथ वक्त बिताते हुए, खेती-बाड़ी करते हुए, घोड़ों के साथ खेलते हुए, ट्रैक्टर चलाते हुए, आरती करते हुए। बिना किसी पेड प्रमोशन के लोग इन वीडियो को देखने लगे तो सब्सक्राइबर बढ़ते चले गए। अब तीन चैनल हैं। एक चैनल बेटे के नाम से बनाया है, जिसमें उससे जुड़ी एक्टिविटी वाले वीडियो अपलोड करते हैं। एक चैनल सिर्फ गुजरातियों के लिए है और तीसरा चैनल हिंदी भाषा में है, जो मुख्य चैनल है।’
यूट्यूब से महीने का कितना कमा लेते हैं? इस सवाल पर बोले, ‘कमाई का खुलासा नहीं करना चाहता, लेकिन फिर भी साढ़े चार-पांच लाख रुपए महीना हो जाता है। हमारा मुख्य काम तो खेतीबाड़ी है। यूट्यूब पर तो हम सिर्फ एक वीडियो रोज अपलोड कर देते हैं। जैसी जिंदगी जी रहे हैं, उसे ही शूट करके वीडियो बना लेते हैं। अब कई तरह के कैमरे भी ले लिए हैं। रोज महज एक से दो घंटे यूट्यूब पर देते हैं।’
यूट्यूब पर सब्सक्राइबर कैसे बढ़ाए जा सकते हैं? इस पर कहने लगे कि जो भी वीडियो अपलोड कर रहे हो, उसे डेली अपलोड करो। व्यूज नहीं आ रहे तो निराश मत हो। कंटेंट ओरिजनल है तो वायरल जरूर होता है। एक-दो वीडियो वायरल होने के बाद बाकी वीडियोज में भी व्यूज आना शुरू हो जाते हैं। रामदे के मुख्य चैनल पर अभी 7 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं। हर रोज करीब हजार सब्सक्राइबर उनके चैनल से जुड़ रहे हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

 

बर्फीले इलाकों में तैनात जवानों को मिलेगा हिमतापक हीटिंग डिवाइस

लद्दाख : चीन से तनाव के बीच सियाचिन और लद्दाख जैसे बर्फीले इलाकों में तैनात जवानों को अब ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ेगा। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) ने जवानों के लिए हिमतापक हीटिंग डिवाइस तैयार की है। ये ऐसी डिवाइस है, जिसके जरिए सेना का बंकर माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी गर्म रहेगा। सेना ने ऐसे 420 करोड़ उपकरणों का ऑर्डर भी डीआरडीओ को दे दिया है। जल्द ही इसे बर्फीले इलाकों में आईटीबीपी और सेना की पोस्ट पर लगाया जाएगा।
यह हीटिंग डिवाइस बैक ब्लास्ट के दौरान निकलने वाली जहरीली गैस कार्बन डाई ऑक्साइड से भी जवानों को बचाएगी। इस जहरीली गैस से जवानों की मौत भी हो जाती है। जब कोई सैनिक लॉन्चर को कंधे या जमीन पर रखकर रॉकेट छोड़ता है तो उसके पीछे से जहरीली गैस निकलती है। उस एरिया को ही बैक ब्लास्ट एरिया कहते हैं। हिमतापक इस गैस को ऑब्जर्व कर लेगी।
हिमतापक की खासियत
उपकरण सौर उर्जा , बिजली और केरोसिन तीनों से चल सकती है।
इससे 20 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के बंकर व टेंट को गर्म रखा जा सकता है।
चार्जर कंट्रोलर वोल्टेज को कंट्रोल करने के साथ पंखे को भी चलाता है।
पंखा गर्म हवा बंकर व टेंट में फैलाता है।
उपकरण से नीली रोशनी निकलती है, जो ऑक्सीजन स्तर कम नहीं होने देगी।
बंकर में मौजूद सैनिकों को सांस लेने में भी परेशानी नहीं होगी।
आग लगने का खतरा भी नहीं रहेगा।
ठंड से लगने वाली चोट ठीक करेगी क्रीम
डीआरडीओ ने ‘एलोकल क्रीम’ भी तैयार की है। ये फ्रॉस्ट बाइट (शीत दंश) और ठंड से सैनिकों को लगने वाली चोटों को सही करने में मददगार साबित होगी। भारतीय सेना ने 3.5 लाख क्रीम का ऑर्डर दिया है। वैज्ञानिक डॉ. राजीव ने कहा कि ये क्रीम ईस्टर्न लद्दाख और सियाचिन बॉर्डर पर तैनात जवानों के लिए भेजी जाएगी।
पानी के लिए स्नो मेल्टर तैयार किया
डीआरडीओ के वैज्ञानिक सतीश चौहान ने बताया कि उन्होंने स्नो मेल्टर तैयार किया है। इसके जरिए लद्दाख और सियाचिन बॉर्डर पर तैनात जवानों के लिए पीने का पानी मिल सकेगा। ये हर घंटे बर्फ को पिघलाकर 5 से 7 लीटर पीने लायक पानी जवानों को मुहै.या करवा सकता है।

16 जनवरी से शुरू होने जा रहा है कोरोना टीकाकरण अभियान

नयी दिल्ली : 16 जनवरी से टीकाकरण अभियान की शुरुआत की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 महामारी की ताजा स्थिति और सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों तक कोरोना वैक्सीन पहुंचाने की तैयारियों की समीक्षा की है। हालांकि, पीएम के ही लोकसभा क्षेत्र में ड्राइ रन के दौरान एक तस्वीर सामने आई जो चिंता में डालने वाली है। वहां नकली कोविड वैक्सीन को साइकिल से ढोया गया था। वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के साथ गत गुरुवार को हुई बैठक में राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों ने अपने-अपने राज्य में अभियान को सफल बनाने को लेकर अलग-अलग तरह की चुनौतियों का जिक्र किया था। आइए जानते हैं कि देश में टीकाकरण अभियान की राह में कौन-कौन सी चुनौतियां सामने आ सकती हैं…

पहले चरण में भारत के 30 करोड़ लोगों को जुलाई 2021 तक कोरोना का टीका लगाने का लक्ष्य रखा गया है। स्वास्थ्यकर्मियों, अग्रिम मोर्चों पर तैनात कर्मियों, 50 वर्ष से अधिक की उम्र के बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से पीड़तों को पहले चरण में ही टीका लगाने का लक्ष्य निर्धारित है। अभी एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड का ही सबसे ज्यादा उपयोग होगा। इसे चार हफ्तों के अंतराल पर दो डोज दिए जाएंगे। यानी, पहले चरण में 60 करोड़ डोज वैक्सीन की जरूरत होगी। भारत में कोवीशील्ड की निर्माता कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) ने कहा है कि उसने 5 से 7 करोड़ डोज स्टोर कर रखा है जबकि अन्य देशों को निर्यात के लिए जुलाई महीने तक 50 करोड़ डोज तैयार करने की योजना है।सीरम इंस्टिट्यू के सीईओ अदार पूनावाला ने पहले ही आशंका जताई थी कि जून 2021 तक टीके की कमी हो सकती है। हालांकि, बाकी कंपनियों की वैक्सीन को नियमन मंजूरी मिलने पर पर्याप्त संख्या में टीके उपलब्ध हो जाएंगे। ब्रिटेन ने इसी समस्या से निपटने के लिए दो-दो डोज का साइकल पूरा करने के बजाय ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को एक-एक डोज देने का फैसला किया। यूके अथॉरिटीज ने कहा कि कोवीशील्ड का दूसरा डोज अगर 12 हफ्ते बाद दिया जाए तो वह और ज्यादा असरदायी होता है। वहां किसी और वैक्सीन का पहला डोज दिए जाने का भी गाइडलाइंस जारी कर दिया गया है, हालांकि इस फैसले पर काफी विवाद छिड़ गया है।
फाइजर की वैक्सीन (Pfizer Vaccine) की तरह कोवैक्सीन को स्टोर करने के लिए बहुत ज्यादा ठंड की जरूरत तो नहीं है, लेकिन सामान्य फ्रीज की दरकार तो होगी ही। यानी, वैक्सीन स्टोरेज के लिए कोल्ड स्टोरेज की सुविधा चाहिए होगी। भारत बायोटेक की कोवैक्सीन और एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड को कम-से-कम एक हफ्ते तक रूम टेंपरेचर पर स्टोर करने की जरूरत है। लेकिन पता चला है कि देश के कुल 29 हजार कोल्ड चेन पॉइंट्स का 52 प्रतिशत और 40 प्रतिशत उपकरण सिर्फ छह राज्यों तक सीमित हैं। ये राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश हैं। इन राज्यों में कुल 15,072 कोल्ड चेन पॉइंट्स हैं और यहां देश की देश की एक तिहाई आबादी रहती है। वैसे केंद्र सरकार ने कहा है कि अतिरिक्त कोल्ड चेन इक्विपमेंट की व्यवस्था की जा रही है।केंद्र सरकार ने पिछले महीने जारी वैक्सिनेशन गाइडलाइंस में कहा था कि सिर्फ पहले से पंजीकृत लाभुक ही कोविड वैक्सीन लगवाने के हकदार होंगे। गाइडलाइंस में साफ कहा गया है कि टीकाकरण केंद्रों पर रजिस्ट्रेशन की सुविधा नहीं होगी। प्री-रजिस्ट्रेशन के लिए संबंधित संस्थान अपने-अपने स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन स्टाफ डेटा अपलोड करेंगे, साथ ही चुनाव पहचान पत्र भी स्कैन कर अपलोड करना होगा ताकि बुजुर्गों की पहचान हो सके। खबरें आ रही हैं कि केंद्र सरकार संभवतः कैंप लगाकर रजिस्ट्रेशन का काम आासन कर सकती है। हालांकि, टेक्स्ट मेसेज और इलेक्ट्रॉनिक नोटिफिकेशंस की दरकार को कारण यह प्रक्रिया बाधित हो सकती है क्योंकि हर व्यक्ति के पास मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन नहीं है। इस कारण यह दूसरा डोज देने तक लाभुकों पर नजर बनाए रखने की भी बड़ी चुनौती हो सकती है। ड्राइ रन में दूरदराज के इलाकों की अपनी-अपनी समस्याएं भी सामने आई थीं। वहां मोबाइल ऐप ठीक से काम नहीं कर रहा था। खुद से रजिस्ट्रेशन करने के लिए कोविन (Co-Win) ऐप अब तक जारी नहीं हुआ है, लेकिन कई फर्जी ऐप जरूर आ गए।वैज्ञानिक कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए टीका लगाने को सर्वोत्तम जरिया मानते हैं, लेकिन देश का एक बड़ा वर्ग टीके को संदेह की नजर से देखता है। सोशल मीडिया पर भी वैक्सीन को लेकर कई तरह की अफवाहें उड़ाई जा रही हैं। ऊपर से कुछ नेताओं की बेतुकी बयानबाजियां भी आग में घी डालने की काम कर रही हैं। वहीं, एक खास संप्रदाय के गिने-चुने धर्मगुरुओं ने टीके में शामिल तत्वों को लेकर संदेह जताया और अपने संप्रदाय के लोगों से टीका नहीं लगवाने की अपील की। कुछ लोगों को यह भी लगता है कि कोविड के खिलाफ टीकाकरण के बहाने जनसंख्या नियंत्रण की चाल न चल दी जाए। कई लोग वैक्सीन को कोरोना वायरस से भी ज्यादा घातक बता रहे हैं। कहा जा रहा है कि इसके भयानक साइड इफेक्ट सामने आ रहे हैं। यानी, भारत में लोगों को टीका लगवाने को राजी करना भी अपने-आप में बड़ी चुनौती है।

सिग्नल ने व्हाट्सऐप को छोड़ा पीछे, बना भारत का मुफ्त शीर्ष ऐप

नयी दिल्ली : कुछ दिनों पहले तक भारत में मैसेजिंग ऐप सिग्नल इस्तेमाल करने वाले काफी कम यूजर्स हुआ करते थे। लेकिन व्हाट्सऐप की नयी निजता नीति यानि प्राइवेसी पॉलिसी के आने से सिग्नल मैसेजिंग ऐप को जमकर डाउनलोड किया जा रहा है। ऐसे में सिग्नल ऐप ऐपल ऐप स्टोर पर व्हाट्सऐप को पीछे छोड़कर टॉप फ्री ऐप बन गया है। सिग्नल ऐप ने भारत, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, फिनलैंड, हांगकांग और स्विट्जरलैंड में व्हाट्सऐप को पीछे छोड़ शीर्ष स्थान हासिल कर लिया है। इसके अलावा, जर्मनी और हंगरी में Signal गूगल प्ले स्टोर में भी टॉप फ्री ऐप्स बन गया है। एक वक्त तो आलम यह था कि ऐप डाउनलोडिंग में भारी भीड़ के चलते सिग्नल ऐप के ओटीपी वेरिफिकेशन में देरी हो रही थी। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में सेंसर टॉवर के डेटा के हवाले से लिखा गया है कि सिग्नल ऐप को पिछले दो दिन में एंड्राइड और iOS डिवाइसेज में 100,000 से भी ज्यादा लोगों ने डाउनलोड किया है. साथ ही 2021 के पहले हफ्ते में व्हाट्सऐप के नए इंस्टॉलेशन में 11 प्रतिशत की गिरावट आई है। सिग्नल ऐप यूजर्स को मैसेज भेजने, ऑडियो और विडियो कॉल्स करने, फोटोज, विडियोज और लिंक शेयर करने की सहूलियत देता है। ऐप का दावा है कि उसकी तरफ से यूजर डेटा का ना के बराबर इस्तेमाल किया जाता है। यह यूजर्स के असुरक्षित बैकअप को क्लाउड पर भी नहीं भेजता और यह एनक्रिप्टेड डाटाबेस को आपके फोन में ही सिक्योर रखता है। साथ ही ऐप की सिक्योरिटी को अपने हिसाब से तय करने का विकल्प दिया गया है। सिग्नल दिसंबर 2020 में ग्रुप विडियो कॉलिंग का ऑप्शन भी लेकर आया है। टेस्ला कंपनी के सीईओ एलन मास्ट के एक टवीट् ने सिग्नल ऐप की लोकप्रियता को अचानक बढ़ा दिया। मस्क ने ट्वीट किया कि वो सिग्नल ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके बाद से सिग्नल ऐप की डाउनलोडिंग की रफ्तार अचानक बढ़ गई। उन्होंने ट्वीटर पर लिखा कि ‘यूज सिग्नल. मस्क के इस ट्वीट को ट्विटर के सीईओ जैक डॉर्सी ने भी रीट्वीट किया था।

 

अद्भुत थी संन्यासी विवेकानंद और राजा अजीत सिंह की मित्रता

देशी रियासतों के विलीनीकरण से पूर्व राजस्थान के शेखावाटी अंचल में स्थित खेतड़ी एक छोटी किन्तु सुविकसित रियासत थी, जहां के सभी राजा साहित्य एवं कला पारखी व संस्कृति के प्रति आस्थावान थे। वे शिक्षा के विकास व विभिन्न क्षेत्रों को प्रकाशमान करने की दिशा में सदैव सचेष्ट रहते थे। खेतड़ी सदैव से ही महान विभूतियों की कार्यस्थली के रूप में जानी जाती रही है। चारों तरफ फैले खेतड़ी के यश की चर्चा सुनकर ही विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजऩवी ने अपने भारत पर किए गए सत्रह आक्रमणों में से एक आक्रमण खेतड़ी पर भी किया था, मगर उसके उपरान्त भी खेतड़ी की शान में कोई कमी नहीं आयी थी।

खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह एक धार्मिक व आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे। राजा अजीतसिंह ने माऊन्ट आबू में एक नया महल खरीदा था जिसे उन्होंने खेतड़ी महल नाम दिया था। गर्मी में राजा उसी महल में ठहरे हुये थे उसी दौरान 4 जून 1891 को उनकी युवा संन्यासी विवेकानन्द से पहली बार मुलाकात हुई। इस मुलाकात से अजीतसिंह उस युवा संन्यासी से इतने प्रभावित हुए कि राजा ने उस युवा संन्यासी को अपना गुरु बना लिया तथा अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया जिसे स्वामीजी ठुकरा नहीं सके। इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त 1891 को प्रथम बार खेतड़ी आये। खेतड़ी में स्वामीजी 27 अक्टूबर 1891 तक रहे।

खेतड़ी नरेश अजीत सिंह

यह स्वामी विवेकानन्द जी की प्रथम खेतड़ी यात्रा थी तथा किसी एक स्थान पर स्वामीजी का सबसे बड़ा ठहराव था।खेतड़ी प्रवास के दौरान स्वामीजी नित्यप्रति राजा अजीतसिंह जी से आध्यात्मिकता पर चर्चा करते थे। स्वामीजी ने राजा अजीतसिंह को उदार व विशाल बनने के लिए आधुनिक विज्ञान के महत्व को समझाया। खेतड़ी में ही स्वामी विवेकानन्द ने राजपण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का ‘अष्टाध्यायी’ व पातंजलि का ‘महाभाष्याधायी’ का अध्ययन किया। स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में उन्हें मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया था।

अमेरिका जाने से पूर्व राजा अजीतसिंह के निमंत्रण पर 21 अप्रैल, 1893 को स्वामीजी दूसरी बार खेतड़ी पहुंचे। स्वामी जी ने इस दौरान 10 मई 1893 तक खेतड़ी में प्रवास किया। यह स्वामी जी की दूसरी खेतड़ी यात्रा थी। इसी दौरान एक दिन नरेश अजीत सिंह व स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी राज्य की नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उसमें भाग नहीं लेना चाहते थे, वे उठकर जाने लगे तो नर्तकियों के दल की नायिका मैनाबाई ने स्वामी जी से आग्रह किया कि स्वामीजी आप भी विराजें, मैं यहां भजन सुनाउंगी इस पर स्वामीजी बैठ गये। नर्तकी मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन सुनाया –

प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो ।
समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो ॥
एक लोहा पूजा में राखत एक घर बधिक परो ।
पारस गुण अवगुण नहिं चितवत कंचन करत खरो ॥

भजन सुनकर स्वामीजी की आंखों में पश्चाताप मिश्रित आंसुओं की धारा बह निकली और उन्होंने उस पतिता नारी को ‘ज्ञानदायिनी मां’ कहकर सम्बोधित किया तथा कहा कि आपने आज मेरी आंखें खोल दी हैं। इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी संन्यासोन्मुखी हुए ओर जीवन पर्यन्त सद्भााव से जुड़े रहने का व्रत धारण किया। 10 मई 1893 को स्वामीजी ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में खेतड़ी से अमेरिका जाने को प्रस्थान किया। महाराजा अजीतसिंह के आर्थिक सहयोग से ही स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में शामिल हुए और वेदान्त की पताका फहराकर भारत को विश्व धर्मगुरु का सम्मान दिलाया। अमेरिका जाते वक्त खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह ने अपने मुंशी जगमोहन लाल व अन्य सहायक कर्मचारियों को बम्बई तक स्वामी जी की यात्रा की तैयारियों व व्यवस्था करने के लिये स्वामी जी के साथ भेजा। स्वामी जी ने जहाज का साधारण दर्जे का टिकट खरीदा था जिसे राजा ने वापस करवाकर उच्च दर्जे का टिकट दिलवाया। अमेरिका में स्वामी जी का धन खो गया। इस बात का पता जब अजीतसिंह जी को लगा तो उन्होंने टेलीग्राफ से वहीं तत्काल 150 डालर भिजवाये।

इस बात का पता बहुत कम लोगों को है कि स्वामीजी का सर्वजन विदित ‘स्वामी विवेकानन्द’ नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था। इससे पूर्व स्वामीजी का अपना नाम विविदिषानन्द था। शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीतसिंह ने स्वामीजी से कहा कि आपका नाम बड़ा कठिन है तथा टीकाकार की सहायता के बिना उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है तथा नाम का उच्चारण भी सही नहीं है। और अब तो विविदिषाकाल यानि जानने की इच्छा भी समाप्त हो चुकी है। उसी दिन राजा अजीतसिंह ने उनके सिर पर साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया। आज भी लोक उन्हें राजा अजीतसिंह द्वारा प्रदत्त स्वामी विवेकानन्द नाम से ही जानते हैं। शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर 1897 कोखेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आये। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किये व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिेक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया।

स्वामी विवेकानंद की माता भुवनेश्वरी देवी

सर्वधर्म सम्मेलन से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद जब खेतड़ी आए तो राजा अजीतसिंह ने उनके स्वागत में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक पूरे खेतड़ी शहर में जलवाए थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर जगमगा उठा था। 20 दिसम्बर 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया। शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था। उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द जी ने खेतड़ी में सार्वजनिक रूप से भाषण दिया जिसे सुनने हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े। उस भाषण को सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीतसिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुये। 21 दिसम्बर 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गये, यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी प्रवास था।स्वामी विवेकानन्द जी ने एक स्थान पर स्वयं स्वीकार किया था कि यदि खेतड़ी के राजा अजीतसिंह जी से उनकी भेंट नही हुयी होती तो भारत की उन्नति के लिये उनके द्वारा जो थोड़ा बहुत प्रयास किया गया, उसे वे कभी नहीं कर पाते। स्वामी जी राजा अजीतसिंह को समय-समय पर पत्र लिखकर जनहित कार्य जारी रखने की प्रेरण देते रहते थे। स्वामी विवेकानन्द जी ने जहां राजा अजीतसिंह को खगोल विज्ञान की शिक्षा दी थी वहीं उन्होंने खेतड़ी के संस्कृत विद्यालय में अष्ठाध्यायी ग्रंथों का अध्ययन भी किया था। स्वामी विवेकानन्द जी के कहने पर ही राजा अजीतसिंह ने खेतड़ी में शिक्षा के प्रसार के लिये जयसिंह स्कूल की स्थापना की थी।
कहते हैं कि स्वामीजी के आशीर्वचन से ही राजा अजीतसिंह को पुत्र प्राप्ति हुई थी। राजा अजीतसिंह और स्वामी विवेकानन्द के अटूट सम्बन्धों की अनेक कथाएं आज भी खेतड़ी के लोगों की जुबान पर सहज ही सुनने को मिल जाती हैं। स्वामीजी का मानना था कि यदि राजा अजीतसिंह नहीं मिलते तो उनका शिकागो जाना संभव नहीं होता। स्वामी जी ने माना था कि राजा अजीतसिंह ही उनके जीवन में एकमात्र मित्र थे। स्वामी जी के आग्रह पर राजा अजीतसिंह ने स्वामी की माता भुवनेश्वरी देवी को 1891 से सहयोग के लिये 100 रूपये प्रतिमाह भिजवाना प्रारम्भ करवाया था जो अजीतसिंह जी की मृत्यु तक जारी रहा। स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 में व मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुयी थी। इसी तरह राजा अजीतसिंह जी का जन्म 10 अक्टूबर 1861 में व मृत्यु 18 जनवरी 1901 को हुयी थी। दोनों का निधन 39 वर्ष की उम्र में हो गया था व दोनों के जन्म व मृत्यु के समय में भी ज्यादा अन्तर नहीं था।

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन नामक सेवा भावी संगठन की स्थापना की, जिसकी राजस्थान में सर्वप्रथम शाखा खेतड़ी में 1958 को राजा अजीतसिंह के पौत्र बहादुर सरदार सिंह द्वारा खेतड़ी प्रवास के दौरान स्वामी जी के ठहरने के स्थान स्वामी विवेकानन्द स्मृति भवन में प्रारम्भ करवायी गयी। मिशन द्वारा खेतड़ी में गरीब तथा पिछड़े बालक-बालिकाओं के लिए श्री शारदा शिशु विहार नाम से एक बालवाड़ी, सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय एवं एक मातृ सदन तथा शिशु कल्याण केन्द्र भी चलाया जा रहा है। खेतड़ी चौराहे पर तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. भैरोंसिंह शेखावत ने 1996 में स्वामी विवेकानन्दजी की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया था। जिससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलती रहेगी। 2013 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने अपनी खेतड़ी यात्रा के दौरान वहां के रामकृष्ण मिशन में जाकर स्वामी जी को श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

(साभार – प्रभासाक्षी तथा डेली हंट)