कोलकाता : पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन पश्चिम बंगाल में कोल्ड स्टोरेज की 56 वीं वार्षिक आम बैठक हावड़ा में हुई। इस वार्षिक आम बैठक का उद्घाटन मुख्य अतिथि राज्य के कृषि विपणन मंत्री तपन दासगुप्ता ने किया। पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के अध्यक्ष तरुण कांति घोष कोल्ड स्टोरेज क्षेत्र की समस्याओं और माँगों को रखा। उन्होंने कहा कि आलू की खेती जोरों पर है और कोल्ड स्टोरेजों की बड़ी भूमिका है मगर कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू के स्टॉक की गलत जानकारी और बिक्री में कमी चिन्ता का विषय है। उन्होंने अधिकारियों से आलू का सन्तुलित मात्रा में खेती के अतिरिक्त उत्पादन, खपत और संरक्षण पर ध्यान देने पर जोर दिया। उन्होंने चालू सीजन में 110 लाख आलू की पैदावार, पश्चिम बंगाल में 65 लाख टन आलू के खपत का अनुमान जाहिर किया। उन्होंने इस बाबत पूरे भारत से आँकड़े संग्रहित करने पर भी जोर दिया। इस मौके पर पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष राजेश कुमार बंसल तथा पूर्व अध्यक्ष पतित पावन दे भी उपस्थित थे। गौरतलब है कि वर्तमान में राज्य में 90% से अधिक कोल्ड स्टोरेज इस एसोसिएशन के सदस्य हैं और यह राज्य में ऐसी इकाइयों का सबसे बड़ा और एकमात्र मान्यता प्राप्त निकाय है।
कोटक ने जारी की एनईटीसी फास्टैग सुविधा
कोलकाता : कोटक महिंद्रा बैंक (कोटक) ने सभी के लिए कोटक एनईटीसी फास्ट टैग शुरू किया है। यह सम्पर्क को सस्ता और सुविधाजनक बनायेगा। इस योजना के तहत सभी कार्डधारक यात्रियों को भी टोल भुगतान पर 500 रुपये तक का कैशबैक ऑफर दिया जा रहा है। कोटक ने इस कार्ड पर इन्श्यूएंस फी में भी छूट देने की घोषणा की है। यह सुविधा चयनित स्थानों पर 31 मार्च तक दी जायेगी। अगर आप कोटक महिन्द्रा के ग्राहक नहीं हैं और आपके पास यह कार्ड है, तो आपको भी यह सुविधा मिलेगी। यात्री आसानी से विभिन्न तरीकों से कोटक एनईटीसी फास्टैग के लिए आवेदन कर सकते हैं। वे www.kotak.com/fastag पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। किसी भी कोटक शाखा में जाकर रेडी टू गो किट प्राप्त करें या फिर 5676788 पर एसएमएस केटीएजी; या बैंक के ग्राहक संपर्क केंद्र के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।
आम्रपाली : बुद्ध ने जिनके कारण स्त्रियों के लिए खोले संघ के दरवाजे
ऐ सखी सुन 16
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, यह आम धारणा है कि खूबसूरती बहुत बड़ी नियामत होती है। खासकर एक औरत के लिए खूबसूरती एक ऐसा उपहार माना जाता है जो उसके सफल और सुखी जीवन के लिए आवश्यक होता है। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता कभी कभार यह खूबसूरती एक अभिशाप भी बन जाती है और उसका दुष्परिणाम औरत को ताउम्र झेलना पड़ता है। इतिहास ऐसी कई कहानियों का गवाह है जिसमें खूबसूरत औरत के लिए खून की नदियां तक बह गयीं और कई मर्तबा औरत की जिंदगी उसकी खूबसूरती के कारण तबाह भी हो गई।

ऐसी ही एक खूबसूरत स्त्री थी आम्रपाली, जिसकी कहानी ने इतिहास में अपनी एक खास जगह बनाई है। आम्रपाली का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक ऐसी खूबसूरत स्त्री जिसे पाने के लिए उस युग में हर पुरुष लालायित था। आम्रपाली, अंबापाली या अम्बपालिका के नाम से ख्यात इस कुशल गायिका और नृत्यांगना का जन्म लगभग 600-500 ईसा पूर्व लिच्छवी गणराज्य वैशाली के वृज्जिसंघ में हुआ था। एक अज्ञात कुल शीला बालिका जो आम के पेड़ के नीचे पड़ी हुई मिली और इसी कारण उसका नाम पड़ा, आम्रपाली। उसका पालन पोषण राज्य के एक परिवार ने किया। आम्रपाली जब युवा हुई तो उसकी सुंदरता के चर्चे राज्य भर में फैल गये और हर शक्तिशाली सामंत, व्यापारी या अधिकारी उसे अपनी पत्नी बनाने के लिए लालायित हो गया। आम्रपाली के पालक माता-पिता समझ गये थे कि आम्रपाली का विवाह जिस किसी से भी हुआ तो बाकी के लोग क्रोधित हो जाएंगे और वैशाली में खून की नदियां बहने लगेंगी।। यह समस्या इतनी बड़ी और गंभीर थी कि इसके निदान के लिए वैशाली गणराज्य की संसद सभा बुलाई गई। वैशाली राज्य की एकता और शांति के लिए सब लोगों ने मिलकर सर्वसम्मति से यह तय किया कि आम्रपाली को नगरवधू बना दिया जाए। उसे फैसला सुनाया गया-“सब्बेसु हेतु” अर्थात सबकी हो जाओ और संसद के निर्णय को स्वीकार करने के अलावा आम्रपाली के सामने कोई और रास्ता नहीं था। अनिंद्य सौन्दर्य की स्वामिनी आम्रपाली किसी एक की नहीं बल्कि सामाजिक संपत्ति बन कर रह गई। यह बात और है कि उसने सौन्दर्य से सत्ता तक की यात्रा बखूबी तय की उसका कृपा कटाक्ष पाने के लिए बड़े -बड़े सामंत और अधिकारी आतुर रहते थे। अजातशत्रु उसका प्रेमी था। कुछ अन्य ग्रंथों के अनुसार अजातशत्रु के पिता बिम्बिसार को भी उसका प्रेमी माना जाता है जिससे आम्रपाली को एक पुत्र भी था।

बुद्ध वैशाली आने पर आम्रपाली के अनुरोध पर उसके आम्रवन में ठहरते थे। कालांतर में आम्रपाली ने बुद्ध के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म अपना लिया और भिक्षुणी बन गई। हालांकि धम्मसंघ में पहले भिक्षुणियों को स्थान नहीं मिलता था, यहां तक कि यशोधरा को भी बुद्ध ने भिक्षुणी बनने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन आम्रपाली ने अपनी भक्ति, श्रद्धा और वैराग्य से बुद्ध को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने संघ के दरवाजे नारियों के लिए भी खोल दिए। बुद्ध स्वयं आदर से आम्रपाली को “आर्या अम्मा” कहकर संबोधित किया करते थे।
जनपद कल्याणी से बौद्ध भिक्षुणी तक की यात्रा करनेवाली आम्रपाली को केन्द्र में रख कर, भारतीय साहित्य में बहुत सी रचनाएं लिखी गई है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री कृत “वैशाली की नगर वधू” तो अत्यंत चर्चित उपन्यास है। कवयित्री अनामिका ने भी इन पर कविता भी लिखी है। यह बात कम ही लोगों को मालूम है कि लिच्छवी राजनर्तकी आम्रपाली स्वयं एक कवयित्री थीं। “थेरीगाथा” में बहुत सी बौद्ध भिक्षुणियों की कविताएं संकलित हैं।
इनमें आम्रपाली की कविताओं को का स्थान अन्यतम माना जाता है। अपने ऐश्र्वर्य पूर्ण जीवन से विरक्त होकर रूपगर्विता नर्तकी जब भिक्षुणी बनकर जीवन के यथार्थ को को समझती है तो अपने जीवनानुभवों को वैराग्यसिक्त कविता में पिरोती है। उसमें उसका जीवन दर्शन ही नहीं उसके जीवन का यथार्थ भी प्रतिभासित होता है। कवि ध्रुव गुप्त ने मूल पाली में रचित और अंग्रेजी में उपलब्ध इस कविता को हिंदी में अनूदित किया है-

“कभी काले हुआ करते थे मेरे बाल
मधुमक्खियों के छत्ते जैसे
घने और घुंघराले
सुगंधित फूलों से भरी टोकरी की तरह
सोने के पिन से सजे और अलंकृत
उम्र के साथ इससे पशुओं के फर-सी
बासी गंध आ रही है।
एक कलाकार की कलाकृति जैसी
मेरी मोटी, घुमावदार और रसीली गर्दन
उम्र के साथ ढल चुकी है नीचे
मेरी दीप्तिमान, गहरी, भावपूर्ण आंखें
खो चुकी हैं अपनी चमक
पतली पर्वत-चोटी की तरह मेरी नाक
एक सूखी लंबी मिर्च जैसी है.अब
अद्वितीय थे कभी जो मेरे कान
उम्र के साथ सिलवटें लिए
नीचे ढल चुके हैं
मेरे श्वेत और चमकते दांत
पीले पड़कर टूट रहे हैं
मेरे उन्नत कुशाग्र स्तन हो चले हैं
किसी खाली पुराने झोले की तरह
लुंज-पुंज
गहरे घने जंगल में
कोयल की कूक की तरह
मेरी मीठी आवाज में
उम्र के साथ दरारें पड़ चुकी हैं
झुर्रियों से भरी मेरी काया
अब कमनीय नहीं रही
देह की सच्चाई बदल चुकी है
मायावी वस्तुओं के इस ढेर को
एक दिन तो भरभरा कर गिरना ही था
मुझे तलाश है उसकी
जो क्षणभंगुरता से परे है
मुझे उस सत्य तक ले चलो, तथागत !
सखियों, आम्रपाली ने तो अपने असाधारण व्यक्तित्व के बलबूते तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए भी इतिहास में अपनी जगह बना ली लेकिन उनका जीवन बताता है कि हमारे समाज में स्त्री कहीं और कभी सुरक्षित नहीं है। कभी वह पांच पतियों के बीच बांटी जाती रही तो कभी नगरवधू बनने को विवश होती रही है। स्त्री की नियति में सबसे बड़ी भूमिका समाज की होती है और आज भी यह स्थिति कमोबेश बनी हुई है। आइए सखियों, हम दृढ़ निश्चय करें कि इस नियति को बदलने की पुरजोर कोशिश करेंगे।
बड़ाबाजार : आत्मनिर्भर भारत का पहला पाठ हैं महात्मा गाँधी रोड पर बसी स्वदेशी खादी दुकानें
अगर कारोबार की बात चले तो बड़ाबाजार एक ऐसी जगह है जहाँ सब आते हैं और यहीं पर है महात्मा गाँधी रोड जिसे कभी हैरिसन रोड कहा जाता था। आज इस जगह को हम शोर – गुल, भीड़ के लिए जानते हैं पर क्या आप जानते हैं कि बड़ाबाजार का यह इलाका कभी स्वदेशी आन्दोलन का गढ़ रहा। यहीं वह जगह है जहाँ विदेशी वस्त्रों की होली जलायी गयी और यहीं से गाँधी जी के चरखे को बल मिला। बड़ाबाजार के कई व्यवसायी स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े थे, गाँधी के अनुयायी थे और उनके ही कहने पर खादी के प्रसार में उन्होंने अपना योगदान दिया।

आज भी बड़ाबाजार में खादी की ऐसी कई दुकानें हैं जो इस खादी आन्दोलन और स्वदेशी की साक्षी हैं, जिनका एक बड़ा इतिहास है। चाहे व 1942 में स्थापित सस्ता खादी भंडार हो या 1940 में स्थापित जनता खादी भंडार या फिर 1929 में स्थापित शुद्ध खादी भंडार, जिसका उद्धघाटन महात्मा गाँधी ने किया था। स्वदेशी की इसी भावना का प्रसार गोविन्द भवन भी करता आ रहा है। बड़ाबाजार के महात्मा गाँधी रोड आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को जीवन्त करती आ रही इतिहास की वही स्वदेशी धारा है जिसने चरखे को और तेज किया और आज भी रोजगार की धारा प्रवाहित कर रही है। हम यहाँ मुख्य रूप से ऐसी ही दो दुकानों तक आपको ले जा रहे हैं…जिन्हें आपने देखा तो है पर शायद इस तरीके से इनके बारे में सोचा न हो कि यह अनमोल विरासत बड़ाबाजार की पहचान को कैसे राष्ट्रीय बना रही है –

बात करते हैं गोविन्द भवन की जो 151, महात्मा गाँधी रोड पर है और 1928 में 1860 के सोसायटीज एक्ट के तहत इसे पंजीकृत किया गया था।
फिलहाल यह 1960 के वेस्ट बंगाल सोसायटीज एक्ट के तहत पश्चिम बंगाल सरकार के अधीन है। इसके विभाग हैं, गीता प्रेस, गीता भवन, वैदिक स्कूल, सेवा दल और औषधालय इत्यादि।
गोविन्द भवन से ही गीता प्रेस का संचालन होता है। इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य स्वदेशी के साथ ही आम जनता में सनातन धर्म और हिन्दू धर्म का प्रसार करना है।
गीता प्रेस को हम गीता, रामायण, उपनिषद, पुराण के अतिरिक्त विभिन्न संतों से जुड़े साहित्य, चरित्र निर्माण के लिए उपयोगी पुस्तकों तथा पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए जानते हैं जो बहुत अधिक सस्ती कीमतों पर उपलब्ध करवाया जाता है। गोविन्द भवन की स्थापना सेठ जयदयाल गोयन्दका तथा भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा की गयी थी।
सेठ जयदयाल गोयन्दका व्यापार कार्य से कोलकाता जाते थे और वहाँ जाने पर सत्संग करवाते थे। सेठजी और सत्संग जीवन-पर्यन्त एक-दूसरेके पर्याय रहे। सेठजीको या सत्संगियों को जब भी समय मिलता सत्संग शुरू हो जाता। कई बार कोलकातासे सत्संग प्रेमी रात्रि में खड़गपुर आ जाते तथा सेठजी चक्रधरपुरसे खड़गपुर आ जाते जो कि दोनों नगरोंके मध्यमें पड़ता था। वहाँ स्टेशन के पास रातभर सत्संग होता, प्रात: सब अपने-अपने स्थानको लौट जाते। सत्संगके लिये आजकल की तरह न तो मंच बनता था न प्रचार होता था। कोलकाता में दुकान की गद्दियों पर ही सत्संग होने लगता। सत्संगी भाइयों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी।

दुकान की गद्दियों में स्थान सीमित था। बड़े स्थान की खोज प्रारम्भ हुई। पहले तो कोलकाता के ईडन गार्डेन के पीछे किले के समीप वाला स्थल चुना गया लेकिन वहाँ सत्संग ठीक से नहीं हो पाता था। पुन: सन् 1920 के आसपास कोलकाता की बाँसतल्ला गली में बिड़ला परिवार का एक गोदाम किराये पर मिल गया और उसे ही गोविन्द भवन (भगवान् का घर) का नाम दिया गया।
वर्तमान में महात्मा गाँधी रोड पर वही भव्य भवन ‘गोविन्द-भवन’ के नाम से है जहाँ पर नित्य भजन-कीर्तन चलता है तथा समय-समय पर सन्त-महात्माओं द्वारा प्रवचनकी व्यवस्था होती है। हिन्दू धर्म की शिक्षा के प्रचार कार्य में गोविन्द भवन मुख्य रूप से सस्ती धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन के लिए जाना जाता है पर इसकी पहचान इतनी भर नहीं है।
यहाँ पर गीता कमेटी है जो गीता को लेकर कई कार्यक्रम आयोजित करती है, परम सेवा समिति है और गोविन्द भवन में आपको गंगा जल भी मिल जायेगा। यहाँ आयुर्वेदिक दवाओं से लेकर कपड़े, चादर, तौलिये, चूड़ियाँ, साबुन से लेकर घी तक सब कुछ मिल जायेगा। अगर गौर से देखा जाये तो मॉल संस्कृति जिस तरह से ‘एक छत के नीचे सब कुछ उपलब्ध होने’ की जो बात करती है, वह दशकों पहले गोविन्द भवन बहुत पहले कर चुका है।
मॉल संस्कृति को अभी भी नकारात्मक भाव से ही लिया जाता है मगर सकारात्मक होकर सोचा जाये तो गोविन्द भवन को ही इस शहर और सम्भवतः देश का पहला मॉल माना जाना चाहिए। एक ऐसी जगह जो आम जनता के लिए है…जहाँ जाने से पहले आपको यह नहीं सोचना पड़ता कि आप किस क्लास से हैं…या आपका बजट कितना है और सबसे अच्छी बात यह कि यहाँ सामान ही नहीं बल्कि वह किताबें भी मिलती हैं जो हमारे दिमाग की खुराक हैं जो सीधे हमारी संस्कृति से जोड़ती हैं।

हनुमान प्रसाद पोद्दार सिर्फ एक व्यवसायी ही नहीं थे बल्कि एक साहित्यकार और स्वाधाीनता सेनानी भी थे…मगर यह सोचने वाली बात है कि क्या हमने उनको समुचित सम्मान दिया? जिस पुरस्कार और सम्मान को पाने के लिए लोग अपनी विचारधारा को ताक पर रख देते हैं…वे सभी सम्मान उनको कभी नहीं लुभा सके तो ऐसे लोग हमारी पाठ्यपुस्तकों में क्यों नहीं हैं…यह भी सवाल बनता है। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने आजीवन कल्याण पत्रिका का सम्पादन किया। गोविन्द भवन कार्यालय के मैनेजर आनन्द लडिया ने बताया कि सस्ती किताबों को बेचने के कारण जो घाटा होता था, उसी को पूरा करने के लिए गोविन्द भवन कार्यालय में ये अन्य सभी विभाग खोले गये और यह सब भी स्वदेशी हैं और जब बात गुणवत्ता की हो तो गोविन्द भवन एक विश्वसनीय नाम है। पुस्तकों की थोक व फुटकर बिक्री के साथ ही साथ हस्तनिर्मित वस्त्र, काँचकी चूडियाँ, आयुर्वेदिक ओषधियाँ आदिकी बिक्री उचित मूल्य पर होती है। गीता प्रेस और हनुमान प्रसाद पोद्दार, दोनों पर ही अलग से चर्चा करने और बात करने की जरूरत है…तो फिलहाल हम महात्मा गाँधी रोड की स्वदेशी विरासत की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आपका परिचय एक ऐसी दुकान से करवाते हैं जो अपने आप में संस्थान है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जहाँ प्रभात सिनेमाघर है, कभी वहाँ मैदान हुआ करता था और यहीं पर विदेशी वस्त्रों की होली भी जलायी गयी थी मगर आज जब हम बड़ाबाजार की बात करते हैं तो यह इतिहास कहीं से भी नजर नहीं आता और न ही नजर आने दिया जाता है। स्वदेशी के प्रसार और गाँधी जी के सपने को पूरा करने में व्यवसायी वर्ग का बड़ा योगदान है जिसे नजरअन्दाज किया गया है। उदाहरण के लिए घनश्याम दास बिड़ला गाँधी से कितने प्रभावित थे, ये हम सब जानते हैं, ये कितने बड़े व्यवसायी थे, य़ह भी सबको पता है पर क्या आप जानते हैं कि महात्मा गाँधी के कहने पर इन्होंने इसी बड़ाबाजार में खादी की एक दुकान भी खोली थी जिसका उद्घाटन घनश्याम दास बिड़ला के आग्रह पर खुद महात्मा गाँधी ने 1929 में किया था।

दुकान में अन्दर जाते ही आपको महात्मा गाँधी की तस्वीर मिलेगी। तब घनश्याम दास बिड़ला ने तब उस समय के कुछ और स्वाधीनता सेनानियों के साथ यह दुकान खोली थी। शुद्ध खादी भंडार के सचिव पंकज कुमार नेवटिया के अनुसार इनके पिता राधा किशन नेवटिया भी स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े थे और विदेशी वस्त्र आन्दोलन की होली जलाने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। कई स्वाधीनता सेनानियों पर राधा किशन नेवटिया ने ‘बड़ाबाजार के कार्यकर्ता’ के नाम से किताब लिखी है।नेवटिया बताते हैं कि खादी को पहले खद्दर समझ कर लोग कतराते थे पर खादी ने खुद को विकसित किया और आज खादी सबकी पसन्द बन चुकी है। सरकार ने भी खादी को प्रोत्साहन दिया है, प्रचार में सहयोग दिया है।
नदिया के कृष्णनगर स्टेशन से 8 किमी दूर चित्रशाली में इन्होंने स्कूल बनवाया। 1986 में गाँव की महिलाओं के लिए 100 चरखे के साथ निर्माण इकाई शुरू की। अब खादी क्लस्टर बनाया गया है जिसमें 200 चरखे हैं। यहाँ रेडिमेड कपड़े बनेंगे और फिलहाल इस परियोजना का 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। इस तरह शुद्ध खादी भंडार जैसी कई दुकानों के जरिए बड़ाबाजार का इतिहास न सिर्फ विदेशी वस्त्रों के त्याग का इतिहास है बल्कि यह स्वदेशी के निर्माण का गढ़ भी है। विडम्बना देखिए कि इस इतिहास पर उपेक्षा की ऐसी धूल चढ़ी है कि आज महात्मा गाँधी रोड को जल जमाव और जाम के कारण जाना जाता है…जरूरत है कि अब इस धूल को साफ करके हकीकत को सामने लाया जाये औऱ यही हमारी कोशिश है।
आइरिस होम फ्रेगरेंस अब कोलकाता के एक्रोपोलिस मॉल में
कोलकाता : भारत का शीर्ष लाइफस्टाइल स्पैटाएल फ्रेगरेंस ब्रांड आइरिस होम फ्रेगरेंस अब कोलकाता के एक्रोपोलिस मॉल में उपलब्ध होगा। आइरिस रिपल फ्रेगरेंस का ब्रांड है। रिपल फ्रेगरेंस एन आर ग्रुप का ब्रांड है जो अगरबत्ती से लेकर एयरोस्पेस के क्षेत्र में सक्रिय है। एन आर ग्रुप विश्व के सबसे बड़े अगरबत्ती ब्रांड साइकिल प्योर अगरबत्ती के लिए जाना जाता है। अपने नयेपन, उन्नत डिलिवरी प्रणाली के कारण आइरिस भारत के घरेलू फ्रेगरेंस बाजार में शीर्ष स्थान रखता है। इसके साथ ही इसके खास फ्रेगरेंस फ्रेंच लैवेंडर, कोरल ब्लू. एपल, सिनामन जैसे कई खास ब्रांड काफी लोकप्रिय हैं ।
आइरिस भारत के सभी बड़े होम इम्प्रूवमेंट और लाइफस्टाइल चेन में मौजूद है, जैसे – एट द रेट होम. होम टाउन, शॉपर्स स्टॉप, लाइफस्टाइल इत्यादि। यह हाइपरमार्केट चेन्स जैसे – स्पेन्सर्स और मेट्रो में भी उपलब्ध है। आइरिस के 6 निजी बुटिक, आइरिस अरोमा बुटिक के नाम से है। भारत के प्रख्यात होटल और कॉरपोरेट वातावरण को खूबसूरत बनाने और उपहार के लिए आइरिस को अपनाते हैं।
अपना विस्तार करते हुए आइरिस जाने – माने मॉल्स में कियोस्क प्रारूप में भी कदम रख रहा है। यह बंगलुरू के बाहर पहला प्रयोग है। कियोस्क एक्रोपोलिस मॉल के प्रथम तल पर जहाँ रीड डिफ्यूजर्स, फ्रेगरेंस वैपोराइजर्स, फ्रेगरेंस शैसे, उपहार, पोत्तोपुरी, अरोमेटिक मोमबत्तियाँ, अल्ट्रा सॉनिक मिस्टर्स और लक्जरी साबुन भी शामिल हैं। कियोस्क का उद्घाटन रिपल फ्रेगरेंस के चीफ बिजनेस क्रिएटक अनिक बनर्जी ने किया।
वर्धा विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र में एमए में प्रवेश का अवसर
कोलकाता: केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले शिक्षण संस्थान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के साल्ट लेक, सेक्टर-3 स्थित क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में एम.ए. हिंदी साहित्य में रिक्त सीटों पर प्रवेश के लिए एक अवसर और दिया जा रहा है। विद्यार्थियों के आवेदनों की संख्या को देखते हुए कुल सीट बढ़ाकर अब 30 (अनारक्षित-12, ईडब्ल्यूएस-03, ओबीसी-08, एससी-05, एसटी-02) कर दी गई है। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 05 फरवरी 2021 है। चयनित विद्यार्थियों के नामों की सूचना और ऑनलाइन शुल्क जमा करके नामांकन संबंधी प्रक्रिया 10 फरवरी तक पूरी कर ली जाएगी। विशेष जानकारी के लिए विश्वविद्यालय के वेबसाइट www.hindivishwa.org का अवलोकन किया जा सकता है तथा केंद्र के फोन नंबर : 033-46039985 पर भी संपर्क किया जा सकता है।
जानिए इस बार के पेपरलेस बजट की खास बातें
2021-22 के बजट में आम लोगों के लिए कुछ भी खास नहीं है। इनकम टैक्स या बचत के नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। किसान आंदोलन को देखते हुए खेती के लिए बड़ी घोषणाओं की उम्मीद थी, लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। बजट पर राजनीति का असर दिखता है। इस साल असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में चुनाव होने हैं, उनके लिए अलग घोषणाएं की गई हैं। चुनावी राज्य पुद्दुचेरी के लिए बजट में कुछ भी नहीं है। आइए 2021 के बजट को 21 बिन्दुओं में समझते हैं….
- बजट में न तो पुराने टैक्स ढांचे में कुछ बदला है, न नए में। बस 75 साल से ज्यादा के बुजुर्गों को कुछ राहत मिली है। अगर उनकी कमाई सिर्फ पेंशन और ब्याज से हो रही है, तो उन्हें इनकम टैक्स रिटर्न नहीं भरना होगा।
- कुछ ऑटो पार्ट्स पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाकर 15% की गई है। इससे गाड़ियां महंगी हो सकती हैं। पेट्रोल पर 2.5 रुपए और डीजल पर 4 रुपए प्रति लीटर एग्री सेस लगा है। सोना-चांदी पर भी 2.5% एग्री सेस लगाया गया है, हालांकि इस पर इंपोर्ट ड्यूटी 12.5% से घटाकर 7.5% कर दी गई है। इंपोर्टेड सेब, काबुली चना, मटर और मसूर पर भी सेस लगा है। हालांकि बजट में कहा गया है कि इन पर सेस से खरीदारों पर अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ेगा।
- कोरोना को देखते हुए हेल्थकेयर के लिए 2.23 लाख करोड़ दिए गए हैं। यह पिछले साल से 137% ज्यादा है। हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने के लिए आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना लाई गई है। इस पर 6 साल में 64,180 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। निमोनिया की निमोकॉक्कल वैक्सीन पूरे देश में बच्चों को दी जाएगी। इससे 50 हजार बच्चों की हर साल जान बचाई जा सकेगी।
- देशभर में कोरोना वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का फंड रखा गया है। देश में 75 हजार नेशनल हेल्थ सेंटर बनेंगे। 602 जिलों में क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल शुरू किए जाएंगे।
- किफायती घरों के लिए होम लोन के ब्याज पर 1.5 लाख रुपए की एक्स्ट्रा छूट और एक साल के लिए बढ़ा दी गई है। यह पहले से मिल रही 2 लाख रुपए की छूट के अलावा है। इसे 2019 में लागू किया गया था। पिछले साल भी इसे एक साल के लिए बढ़ाया गया था। डेवलपर्स को किफायती घरों के प्रॉफिट पर मिलने वाली टैक्स छूट भी एक साल के लिए बढ़ाई गई है।
- नौकरी ढूंढ़ने वाले युवाओं के लिए बजट में कोई अलग घोषणा नहीं है। हालांकि नए प्रोजेक्ट पर सरकारी खर्च 4.39 लाख करोड़ से 34.5% बढ़ाकर 5.54 लाख करोड़ रुपए किया गया है, इससे नए रोजगार निकलेंगे। कई हाइवे प्रोजेक्ट की भी घोषणा की गई है, यहां भी लोगों को काम मिलेगा।
- उच्च शिक्षा आयोग का गठन होगा। 15 हजार स्कूलों को आदर्श स्कूल बनाया जाएएगा। 100 से ज्यादा सैनिक स्कूल खोले जाएंगे। लेह में सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनेगी। आदिवासी इलाकों में 750 एकलव्य स्कूल खुलेंगे। इसके लिए 38 करोड़ रुपए खर्च होंगे। शिक्षा का कुल बजट 85,089 करोड़ से बढ़ाकर 93,224 करोड़ रुपया किया गया है।
- उज्जवला स्कीम के तहत और एक करोड़ घरों में रसोई गैस सिलिंडर का कनेक्शन दिया जाएगा। यह कनेक्शन महिलाओं के नाम पर ही होता है।
- शहरी जल जीवन मिशन के लिए 2.87 लाख करोड़ रुपए रखे गए हैं। हालांकि ये अगले 5 साल में खर्च होंगे। इस मिशन का मकसद सभी 4,378 शहरी निकायों में घर-घर तक नल के जरिए पानी पहुंचाना है। इससे 2.86 करोड़ घरों में नल लगेगा। कचरा प्रबंधन के लिए भी 1.78 लाख करोड़ दिए गए हैं, जो 5 साल में खर्च होंगे। अगले 3 साल में 100 जिलों में पाइपलाइन से गैस की सप्लाई होगी। 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले 42 शहरों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 2,217 करोड़ रुपए दिए गए हैं।
- एक देश-एक राशन कार्ड को 32 राज्यों में लागू किया गया है। 86% लोगों को इसमें कवर किया जा चुका है। गांवों में इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए 40 हजार करोड़ रुपए दिए गए हैं।
- 2021-22 में खेती के लिए 16.5 लाख करोड़ का कर्ज दिया जाएगा। मौजूदा साल में यह 15 लाख करोड़ था। ऑपरेशन ग्रीन स्कीम में जल्द खराब होने वाली 22 फसलें शामिल की जाएंगी। कोच्चि, चेन्नई, विशाखापट्टनम, पारादीप और पेटुआघाट जैसे शहरों में 5 बड़े फिशिंग हार्बर बनेंगे।
- चुनावी राज्यों में पुद्दुचेरी को छोड़कर बाकी सबके लिए अलग घोषणाएं की गई हैं। लेकिन तरजीह दक्षिण के राज्यों को दी गई है। तमिलनाडु में 1.03 लाख करोड़ रुपए की लागत से 3,500 किलोमीटर लंबा हाईवे बनेगा। केरल में 1,100 किमी नेशनल हाईवे के लिए 65,000 करोड़ दिए गए हैं। असम में 1,300 किलोमीटर हाईवे के लिए 34,000 करोड़ का प्रोविजन किया गया है। सबसे ज्यादा चर्चा वाले राज्य पश्चिम बंगाल के लिए 25,000 करोड़ रुपए की लागत से 675 किलोमीटर हाईवे बनाने का प्रोविजन है। असम और पश्चिम बंगाल के टी-वर्कर्स के लिए 1,000 करोड़ रुपए दिए गए हैं।
- 1.10 लाख करोड़ रुपए रेलवे को दिए गए हैं। इसमें 1.07 लाख करोड़ रुपए नए प्रोजेक्ट के लिए हैं। जून 2022 तक ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर तैयार हो जाएगा। दिसंबर 2023 तक सभी ब्रॉड गेज लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन किया जाएगा।
- छोटी कंपनी की परिभाषा बदलेगी। अभी तक 50 लाख रुपए तक निवेश और दो करोड़ रुपए तक सालाना टर्नओवर वाली कंपनी छोटी कहलाती थी। अब 2 करोड़ तक निवेश, और 20 करोड़ तक टर्नओवर वाली कंपनी छोटी कंपनी होगी। छोटी कंपनियों को कर्ज पर ब्याज आदि में जो छूट मिलती है, वह इन्हें मिल सकेगी।
- पुराने वाहनों के लिए नई स्क्रैप पॉलिसी आएगी। इसके तहत 15 साल पुराने कमर्शियल और 20 साल पुराने निजी वाहनों का फिटनेस टेस्ट होगा। पीएलआई स्कीम के लिए 5 साल में 1.97 लाख करोड़ रुपए दिए जाएंगे। मोबाइल फोन में इस्तेमाल होने वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड समेत कई पार्ट्स पर अभी तक कस्टम ड्यूटी नहीं लगती थी। इन पर 2.5% ड्यूटी लगाई गई है। फ्रिज और एसी के कंप्रेसर पर भी ड्यूटी 12.5% से बढ़ाकर 15% की गई है। इससे देश में इनकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।
- रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए और इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाए जाएंगे। नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन स्कीम में 565 नए प्रोजेक्ट जोड़े गए हैं। इस स्कीम में अब 7,400 प्रोजेक्ट हो गए हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर की फाइनेंसिंग के लिए डेवलपमेंट फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन बनेगा। इसकी पूंजी 20,000 करोड़ रुपए होगी। यह 5 लाख करोड़ रुपए तक के कर्ज दे सकेगा।
- परिवहन मंत्रालय के लिए 1.08 लाख करोड़ रुपए रखे गए हैं। पब्लिक बस सुविधा पर 18 हजार करोड़ और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर 11 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे।
- रक्षा क्षेत्र का बजट 1% भी नहीं बढ़ा है। इसे 3.43 लाख करोड़ से बढ़ाकर सिर्फ 3.47 लाख करोड़ किया गया है।
- बीमा में एफडीआई की सीमा 49% से बढ़ाकर 74% की गई है। 2021-22 में दो सरकारी बैंकों और एक बीमा कंपनी का निजीकरण किया जाएगा। हालांकि वित्त मंत्री ने इनके नाम नहीं बताए। अगले साल एलआईसी का भी आईपीओ लाया जाएगा। विनिवेश के लिए 1.75 लाख करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा गया है।
- ये पहला मौका है जब बजट दस्तावेज नहीं छपे। कोरोना की वजह से इस साल बजट की सॉफ्ट कॉपी ही साझा की गई है। बजट के लिए यूनियन बजट नाम का मोबाइल ऐप लॉन्च किया गया है। इस ऐप पर बजट से जुड़े दस्तावेज मौजूद रहेंगे।
- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार 1 घंटे 50 मिनट का बजट भाषण दिया। ये निर्मला सीतारमण का अब तक का सबसे छोटा बजट भाषण था। पिछले साल उन्होंने 2 घंटे 41 मिनट का भाषण दिया था। उससे पहले जुलाई 2019 में उनका भाषण 2 घंटे 5 मिनट लंबा था। (साभार – दैनिक भास्कर)
कोलकाता में शुरू हुआ नौका पुस्तकालय
कोलकाता : कोलकाता में अब बीच नदी में पुस्तक पढ़ने का आनंद लिया जा सकेगा। पश्चिम बंगाल राज्य परिवहन निगम ने विदेशों की तर्ज पर हुगली नदी में लाइब्रेरी ऑन बोट का शुभारंभ किया है। इससे पहले ट्राम में भी लाइब्रेरी की शुरुआत की जा चुकी है। पश्चिम बंगाल राज्य परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक राजनवीर सिंह ने कहा-‘हमें पूरा विश्वास है कि पुस्तकप्रेमी इसे बेहद पसंद करेंगे। परिवहन निगम के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि लाइब्रेरी ऑन बोट न सिर्फ छात्र-छात्राओं बल्कि कोलकाता आने वाले सैलानियों को भी अपनी तरफ आकर्षित करेगी। नीले व सफेद रंग में रंगे नौका में विभिन्न तरह की पुस्तकों का विपुल संग्रह है। बांग्ला व अंग्रेजी साहित्य की पुस्तकों की अधिकता है। बोट की आंतरिक सज्जा बाल साहित्य की थीम पर आधारित है। बोट पर समय-समय पर रवींद्र संगीत भी बजाया जाएगा। खाने-पीने की भी समुचित व्यवस्था है। ऑनलाइन किताबें पढ़ने भी व्यवस्था की गयी है। 18 वर्ष तक की उम्र वालों के लिए नौका पर सवार होकर पुस्तकें पढऩे का किराया 50 रुपये व 18 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए 100 रुपये रखा गया है। शैक्षणिक भ्रमण के लिए पूरी नौका को भी किराए पर लिया जा सकता है, जिसके लिए 4,000 रुपये का भुगतान करना होगा। मिलेनियम पार्क से बोट दिन में तीन बार छूटेगी। पहली बोट सुबह 11 बजे रवाना होगी। दूसरी दोपहर 1.15 बजे और तीसरी व आखिरी बोट अपरान्ह 3.30 बजे रवाना होगी। मांग के मुताबिक भविष्य में बोट की संख्या बढ़ाई जाएगी। ऐसे समय जब कोरोना के कारण कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन नहीं हो पा रहा है। राज्य सरकार की इस पहल ने कोलकाता के पुस्तक प्रेमियों के उदास चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरी है।
कहानी आयकर की : 1860 में आया था पहला आयकर कानून
पहले सालाना छूट की सीमा 200 रुपये थी, अभी 2.5 लाख
असहयोग आंदोलन के समय 1922 में अंग्रेज नया आयकर कानून लेकर आए
देश में पहला आयकर कानून 160 साल पहले आया था। 1860 में अंग्रेज अफसर जेम्स विल्सन ने पहला बजट पेश किया था। इसी में आयकर कानून जोड़ा गया था। देश के पहले बजट में 200 रुपये तक की सालाना कमाई वालों को आयकर में छूट दी गयी थी। अभी छूट की ये सीमा 2.5 लाख रुपये है। देश में 1961 का आयकर कानून लागू है। इसमें समय-समय पर संशोधन होते रहते हैं।
1860 में 200 रुपये से ज्यादा की कमाई पर कर लगता था
देश के पहले बजट में 200 रुपए से 500 रुपये तक की सालाना आय वालों पर आयकर का प्रावधान था। सालाना 200 रुपये से ज्यादा कमाने वालों पर 2% और 500 रुपये से ज्यादा कमाने वालों पर 4% टैक्स लगाने का प्रावधान किया गया था। आयकर कानून में सेना, नौसेना और पुलिस कर्मचारियों को छूट दी गयी थी। हालांकि, उस समय ज्यादातर कर्मचारी अंग्रेज ही थे। सेना के कैप्टन का सालाना वेतन 4,980 रुपए और नौसेना के लेफ्टिनेंट का सालाना वेतन 2,100 रुपये था। हालांकि, आयकर के कानून का उस समय कड़ा विरोध हुआ था। उस समय के मद्रास प्रांत के गवर्नर सर चार्ल्स टेवेलियन ने भी विरोध किया था। विल्सन का ये कानून ब्रिटेन के इनकम टैक्स कानून की तरह ही था। ब्रिटेन में 1798 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट ने भी सेना का खर्च निकालने के लिए इनकम टैक्स कानून बनाया था।

1858 में भारत में ब्रिटिश सरकार का राज शुरू हो गया
1857 में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। इससे देशभर में आंदोलन छिड़ गया। इससे निपटने के लिए अंग्रेजों ने अपनी सेना के खर्च में बेहिसाब बढ़ोतरी कर दी। 1856-57 में अंग्रेजों ने सेना पर 1 करोड़ 14 लाख पाउंड खर्च किए थे। यह खर्च 1857-58 में बढ़ाकर 2 करोड़ 10 लाख पाउंड तक कर दिया गया। उस जमाने में 1 पाउंड 10 रुपये के बराबर हुआ करता था। एक नवंबर 1858 में ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि अब भारत में ब्रिटिश सरकार की ही हुकूमत होगी। इसी दौरान ‘द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858’ आया। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक भारत के सभी आर्थिक मामलों का नियंत्रण भारत के पहले मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) चार्ल्स वुड के हाथों में आ गया।
1857 की क्रांति में अंग्रेजों को नुकसान हुआ, तो इनकम टैक्स लगाया
1857 की क्रांति की वजह से 1859 में इंग्लैंड का कर्ज 8 करोड़ 10 लाख पाउंड पहुंच गया। इस समस्या से निपटने के लिए ब्रिटेन ने नवंबर 1859 में जेम्स विल्सन को भारत भेजा। विल्सन ब्रिटेन के चार्टर्ड स्टैंडर्ड बैंक के संस्थापक और अर्थशास्त्री थे। उन्हें भारत में वायसराय लॉर्ड कैनिंग की काउंसिल में फाइनेंस मेंबर (वित्त मंत्री) बना दिया गया। विल्सन ने 18 फरवरी 1860 को भारत का पहला बजट पेश किया। पहले ही बजट में पहली बार तीन टैक्स का प्रस्ताव दिया गया। पहला- इनकम टैक्स, दूसरा- लाइसेंस टैक्स और तीसरा- तंबाकू टैक्स। इन तीनों टैक्सों की घोषणा करते समय विल्सन ने मनुस्मृति का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका ये कदम ‘इंडियन’ नहीं बल्कि ‘भारतीय’ ही है।
द इकोनॉमिस्ट मैग्जीन के फाउंडर थे जेम्स विल्सन
जेम्स विल्सन का जन्म 3 जून 1805 को स्कॉटलैंड में रॉकशायर परगने के होइक गांव में हुआ था। अपने माता-पिता की 15 संतानों में जेम्स चौथे थे। जेम्स का जन्म गरीबी में बीता। इसके बाद जेम्स और उसके छोटे भाई विलियम ने हैट बनाने का बिजनेस शुरू किया जो शुरुआत में सफल रहा। बाद में दोनों भाइयों ने लंदन में काम शुरू किया, लेकिन ज्यादा समय तक नहीं चल सका और कंपनी बंद करनी पड़ी। इसके बाद जेम्स ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ मैग्जीन शुरू की और इसके संपादक-लेखक बन गए। 1844 में जेम्स ने अपनी सारी कमाई द इकोनॉमिस्ट में लगा दी। ‘द इकोनॉमिस्ट’ आज भी दुनिया की सबसे लोकप्रिय पत्रिकाओं में गिनी जाती है। भारत आने के आठ महीने बाद यानी जुलाई 1860 में जेम्स बीमार हो गए। बीमारी की वजह से 11 अगस्त 1860 को उनका निधन हो गया।
1922 में नया आयकर कानून आया, इसके बाद ही आयकर विभाग बना
असहयोग आंदोलन के समय 1922 में भारत में नया आयकर कानून आया। इसी समय आयकर विभाग के विकास की कहानी भी शुरू हुई। नए कानून में आयकर अधिकारियों को अलग-अलग नाम दिए गए। 1946 में पहली बार परीक्षा के जरिए आयकर अधिकारियों की सीधी भर्ती हुई। इसी परीक्षा को ही 1953 में ‘इंडियन रेवेन्यू सर्विस’ यानी ‘IRS’ नाम दिया गया। 1963 तक आयकर विभाग के पास संपत्ति कर, सामान्य कर, प्रवर्तन निदेशालय जैसे प्रशासनिक काम थे। इसलिए 1963 में राजस्व अधिनियम केंद्रीय बोर्ड कानून आया, जिसके तहत केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) का गठन किया गया। 1970 तक टैक्स की बकाया राशि वसूल करने का अधिकार विभाग के राज्य प्राधिकारियों के पास था। लेकिन, 1972 में टैक्स वसूली के लिए नई विंग बनाई गई और कमिश्नर नियुक्त किए गए। इनकम टैक्स कानून में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं।
नयी दिल्ली में खुला गारबेज कैफे, 1 किलो प्लास्टिक कचरे में मिल रहा है मुफ्त खाना
नयी दिल्ली : दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने दिल्ली को हरा-भरा बनाने के लिए एक नई शुरुआत की है। यहां 23 जनवरी को नजफगढ़ जोन में गारबेज कैफे खोला गया है। इस रेस्तरां में प्लास्टिक कचरा देने पर मुफ्त में खाना दिया जाता है। इस वेंचर के तहत कोई भी व्यक्ति 1 किलो प्लास्टिक वेस्ट जैसे खाली पानी की बोतल, कोल्ड ड्रिंक की बोतल, प्लास्टिक कैन आदि देकर गारबेज कैफे में मुफ्त खाना खा सकता है। इसी तरह के अन्य गारबेज कैफे दिल्ली के साउथ, सेंट्रल और वेस्ट जोन में भी शुरू किए गए हैं। डिफेंस कॉलोनी में नाथू स्वीट्स के पास भी महापौर अनामिका ने गारबेज कैफे खोला है। उन्होंने बताया कि यहां चलाए जा रहे स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत गारबेज कैफे का आइडिया आया। दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने साउथ जोन में 12 कैफे, सेंट्रल जोन में 10 और वेस्ट जोन में 1 कैफे को लॉन्च किया है। नजफगढ़ जाेन के डिप्टी कमिश्नर राधा कृष्ण के अनुसार, ”इससे न सिर्फ शहर को साफ-सुधरा बनाने में मदद मिलेगी बल्कि जरूरतमंद लोगों को गारबेज लाने के बदले मुफ्त में खाना भी मिल सकेगा। इस पहल का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे के प्रति लोगों को जागरूक करना है”।




