Friday, April 10, 2026
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स्कूल खुलने के पहले बीएचएस में ओरिएंटेशन सत्र

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में स्कूल खुलने के पहले ग्यारहवीं – बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए ओरिएंटेशन सत्र आयोजित किया गया। 13 नवम्बर को आयोजित इस सत्र में विद्यार्थियों ने अभिभावकों के साथ भाग लिया। प्रिंसिपल लवलीन सैगल ने कोरोना के बाद स्कूल खुलने से सम्बन्धित सभी सुरक्षा नियमों और उठाये गये कदमों से अवगत करवाया। प्रत्येक कक्षा को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक कक्षा से 50 प्रतिशत विद्यार्थी रोज स्कूल आएंगे जबकि शेष विद्यार्थी ऑनलाइन माध्यम से कक्षा से जुड़ सकेंगे। उन्होंने बताया कि स्कूल में सभी ने कोविड -19 टीके की दोनों खुराक ले ली है और सामाजिक दूरी के नियमों का पालन होगा। विद्यार्थियों को दरवाजे के सामने भीड़ इकट्ठा करने से मना किया गया है। मास्क के बगैर प्रवेश की अनुमति नहीं है। आगन्तुकों और अभिभावकों को स्कूल में प्रवेश के पहले समय लेना होगा। सर्दी या बुखार होने पर विद्यार्थियों को स्कूल नहीं आना होगा । अगर वे स्कूल आते भी हैं तो अभिभावकों के आने तक उनको आइसोलेशन रूम में रहना होगा। विद्यार्थी बतायी गयी जगह पर ही बैठेंगे। इस तरह के कई अन्य नियमो की जानकारी भी स्कूल की प्रिंसिपल ने दी।

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया बाल दिवस

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में प्राथमिक कक्षा की छात्राओं ने वर्चुअल माध्यम पर बाल दिवस मनाया। इस दौरान नर्सरी से तीसरी कक्षा तक की छात्राओं की कक्षाएं स्थगित थीं जबकि चौथी और पाँचवीं कक्षा की छात्राओं ने चौथे पीरियड के बाद समारोह में भाग लिया। समारोह के लिए प्रत्येक कक्षा के लिए जूम पर 45 मिनट का समय दिया गया था। शिक्षक – शिक्षिकाओं ने एक दूसरे के साथ गतिविधियाँ तैयार कीं। कार्यक्रम की शुरुआत पंडित जवाहर लाल नेहरू पर आधारित पावर प्वाइंट प्रस्तुति के साथ हुई जिसमें बच्चों के साथ उनके अनोखे रिश्ते को दर्शाया गया। नर्सरी की कक्षाओं में शिक्षिकाओं ने बच्चों के लिए गीत प्रस्तुत किया। ‘चिकेन लिटिल’ नामक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। किंडर गार्टेन में राइम अन्ताक्षरी, पहली और दूसरी कक्षा में राइम पैरोडी अंग्रेजी और हिन्दी में हुई। तीसरी कक्षा में जागृत चौधरी नामक अभिभावक ने कठपुतलियों की मदद से कहानी सुनाई। चौथी और पाँचवीं कक्षा की छात्राओं को चार्ली चैप्लिन और लॉरेन हार्डी के वीडियो दिखाये गये। छात्राओं ने इस पूरे कार्यक्रम का आनन्द उठाया।

हेरिटेज लॉ कॉलेज में मनाया गया संविधान दिवस

कोलकाता : हेरिटेज लॉ कॉलेज में हाल ही में संविधान दिवस मनाया गया। इस अवसर पर कॉलेज के निदेशक प्रो. एस. एस. चटर्जी ने संविधान के महत्व पर वक्तव्य दिया। कॉलेज ने 26/11 को हुए मुम्बई हमले में आतंकियों से लड़ने वाले शहीदों को भी याद किया। हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के सीईओ पी. के. अग्रवाल ने कहा कि संविधान दिवस हमारे देश में महत्वपूर्ण दिन है और विद्यार्थियों में संविधान के मूल्यों को प्रसारित करना काफी महत्व रखता है।

भूली-बिसरी यादें–4

डॉ. एस. आनन्द

90 के दशक में जब मैंने सन्मार्ग ज्वाइन किया तो सबसे पहले मेरा परिचय आदरणीय उदयराज सिंह से हुआ। आप प्रतापगढ़ जिले के एक संभ्रांत परिवार के सहज, सरल, मृदुल स्वभाव के भलेमानस थे। वाणिज्य पेज का संपादन और वाणिज्यिक समाचार आप ही लिखते थे। टीडी कालेज, जौनपुर से स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद ठाकुर साहब , सभी इसी नाम से उन्हें बुलाया करते थे। लोकमान्य हिन्दी दैनिक बंद होने के बाद ठाकुर साहब ने सन्मार्ग ज्वाइन किया और अपनी सेवानिवृत्ति तक काम किया। रमाकांत उपाध्याय और ठाकुर साहब में गहरी छनती थी। जब कभी इनकी रात में छन जाती तो यह समझना मुश्किल हो जाता कि कौन किसको कितना मानता है। कभी उपाध्याय जी मूड में होते तो ठाकुर साहब को अपने चेंबर में बुलाते। दो पैग दोनों जब गले के नीचे उतार लेते तो फिर शुरू होता शेरों-शायरी का दौर। बाहर निकलते ही ठाकुर साहब फरमाते-
ठिकाने से रख दो तुम ये जाम-मीना
कभी फिर पीयेंगे-पिलायेंगे हम-तुम।
यह शेर सुनने के बाद हम सभी समझ जाते कि आज माहौल खुशनुमा रहेगा। उपाध्याय जी मुंह में पान घुलाते आते और ठाकुर साहब के पीछे खड़े होकर कहते- उदयराज जी, श्मशान तक तुम्हारे साथ मैं ही रहूंगा और ठाकुर साहब कहते – मैं आपको मोक्ष दिलाने के बाद ही दुनिया छोड़ूंगा मगर उपाध्याय जी ने ही पहले साथ छोड़ा और उसके एक साल बाद अपने गांव में ठाकुर साहब ने अंतिम सांस ली। इतिहास से एम.ए.करने वाले ठाकुर साहब गणित के बहुत अच्छे जानकार थे। चुटकी बजाकर कोई भी सवाल हल कर देते थे। गुप्ता जी उन्हें बजट विशेषज्ञ कहते थे। कुर्ता धोती और चप्पल पहनने वाले सीधे सरल ठाकुर साहब की मुझ पर विशेष कृपा थी कारण कि वे मेरे डैड के साथ लोकमान्य में काम कर चुके थे और उनके गीतों के फैन थे।
एक वाकया याद आ रहा है। एक प्रेस कांफ्रेंस ग्रैंड होटल में थी। ठाकुर साहब को उसमें जाना था और वे गये भी मगर बहुत जल्दी वापस आ गये। पूछने पर उन्होंने बताया कि धोती-कुर्ता और चप्पल वालों की नो एण्ट्री। क्या जमाना आ गया? अब पत्रकारों का भी ड्रेसकोड पूंजीपति निर्धारित करेंगे। मोतीलाल चौधरी ने कहा-आप अपना आईकार्ड क्यों नहीं दिखा दिये? ठाकुर साहब ने कहा- किसको? उस सिक्योरिटी गार्ड को? यह मैं नहीं कर सकता। समाचार आ जायेगा तो लिख दूंगा वरन्……। यह थी ठाकुर साहब की खुद्दारी। मै भी तो यही कहूंगा-
आंधी आती है तो पेड़ उचर जाता है
पतझड़ आता है तो फूल बिखर जाता है
किन्तु आदमी इन सबसे वजनी है
वह हर एक मुसीबत से गुजर जाता है।
सन्मार्ग का प्रवाह तेज गति से बढ़ रहा था। विज्ञापन और प्रसार संख्या में द्रुत गति से इजाफा हो रहा था। इससे गुप्ता जी भी प्रसन्न थे और वे अपनी प्रसन्नता का इजहार भी विज्ञापन विभाग में आकर करते भी थे। वे बराबर यही कहते कि यह मेरी कामयाबी नहीं है। इसके आप सभी सही मायने में हकदार हो। यह जो भी हो रहा है वह आप सभी की मेहनत, ईमानदारी और कर्मनिष्ठा का ही फल है। हर साल आम बजट पेश होने के दिन गुप्ता जी अपने संपादकीय सहयोगियों के साथ उनकी ही कुर्सी पर बैठकर बजट सुनते थे। उस दिन वह कर्मचारियों को मिठाई भी खिलाते थे और खुद भी खाते थे। वह कहते भी थे-
कर्मभूमि है निखिल महीतल
जब तक नर की काया
तब तक उसके उस्र उस्र में
है कर्तव्य समाया।
(क्रमशः)

रूहानी प्रेम की ह्दयस्पर्शी गाथा : पूर्णमिदम 

प्रो. गीता दूबे

प्रेम कहानियाँ हमारे समाज में ही नहीं साहित्य में भी बहुतेरी मिलती हैं। कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो अपने मुकाम अर्थात ब्याह की वेदी तक पहुँचती हैं तो कुछ बीच में ही दम तोड़ देती हैं। अगर हम ध्यान दें तो जितनी भी लोकप्रिय प्रेम कहानियाँ हैं, वे सभी असफल या नकाम प्रेम की कहानियाँ हैं। सफल प्रेम की कहानियाँ तो ब्याह की वेदी से गृहस्थ जीवन तक पहुँचते ही पुरानी भी पड़ जाती हैं और लोकमत को माने तो असफल भी हो जाती हैं। इन कहानियों के अलावा कुछ और कहानियाँ भी होती हैं जिनमें प्रेम का सत्व आजीवन बना रहता है, भले ही विवाह के मंत्र नहीं पढ़े जाते लेकिन एक दूसरे के प्रति समर्पित प्रेमी द्वय इसी दुनिया में अलग- अलग या कई मर्तबा एक ही छत के नीचे, एक साथ रहते हुए भी शारीरिक संबंधों से परे रहते हैं। यह आदर्शवादी अवधारणा हमें जैनेन्द्र के उपन्यास “परख” में दिखाई देती है जहाँ कट्टो और सत्यधन एक दूसरे के साथ आत्मिक बंधन में बंधकर समाज सेवा के लिए निकल पड़ते हैं। भारतवर्ष में जब भी प्रेम की बात चलती है , आत्मिक या रूहानी प्रेम को ऊँचा दर्जा दिया जाता है। इसी कारण हमारे पारंपरिक समाज में एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण को बसाए प्रेमी युगल नदी की दो धराओं की दूर दूर या एक तरह से साथ- साथ तो चलते हैं लेकिन आपस में मिलते नहीं हैं और ऐसे प्रेम को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि इक्कीसवीं सदी में न तो ऐसे प्रेमी मिलते हैं ना ही ऐसी कहानियाँ। आज का मूल्यबोध बिल्कुल अलग किस्म का है जिसमें इस तरह के समर्पण और एकनिष्ठता को बेवकूफी तक कह दिया जाता है। इसके बावजूद उन तमाम प्रेम कथाओं को संभवतः आज का युवा वर्ग उसी चाव के साथ पढ़ता/ सुनता होग जिनके किस्से अब भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों या अमिट अक्षरों में दर्ज हैं।

लगातार बिकाऊ और निर्लज्ज दिखावों के बीच कैद होते इस नये जमाने के प्रेम के बीच लेखिका सरोज कौशिक एक बार फिर एक रूहानी प्रेम कहानी लेकर आधुनिक पाठकों के बीच आती हैं जिसे पढ़ते हुए हमें न जाने कितनी अमर प्रेम कहानियाँ बरबस याद आ जाती हैं, वह चाहे भारत की हवाओं में बिखरी हजारों प्रेम कहानियाँ हों या साहित्य की काल्पनिक दुनिया की कहानियाँ अर्थात लहनासिंह -सूबेदारनी, सुधा- चंदन या फिर कट्टो सत्यधन की कथा हो। आलोच्य उपन्यास में आदर्श और समर्पण की परतों में लिपटी ऋचा और वीरेश्वर की भावपूर्ण कथा पिरोई गई है। एक दूसरे को समझने वाले तथा सख्य और स्नेह के बंधन में बंधे, बचपन के साथी बिछड़ने के बाद एक ऐसे मोड़ पर मिलते हैं जहाँ ऋचा का तथाकथित सतीत्व मैला हो चुका था। वह उस मठ की भ्रष्ट दुनिया से निकल भागती है और अपने बचपन की सहेली टुकटुकी और उसके सखा वासु के साथ कोलकाता चली जाती है, जहाँ उसके दामन को दागदार ही नहीं किया गया था, उसकी कोख में एक अनचाहा भ्रूण भी रोप दिया गया था। हालांकि वीरेश्वर हर हाल में उसके साथ चलने को तैयार था लेकिन ऋचा के आत्मसम्मान को यह स्वीकार नहीं था। और उसके बाद की कथा आविवाहित ऋचा द्वारा प्रज्ञा को जन्म देने और एक अकेली माँ के उस संघर्ष की कथा है जहाँ कदम- कदम पर समाज प्रश्नचिह्न की तरह उसके सामने खड़ा ही नहीं होता बल्कि ताने कसने से भी नहीं चूकता। स्कूल में प्रवेश भी तब मिलता है जब बच्चे के पास पिता का नाम हो। होंगी बहुत सी सिने ताराकाए जिन्होंने अपने दम पर “सिंगल मदर” बनने का जोखिम उठाया होगा। साधारण स्त्री के लिए तो यह स्थिति कितनी यंत्रणादायक हो सकती है, ऋचा की कथा उसकी ओर संकेत भर करती है क्योंकि ऋचा भले ही अविवाहित या अकेली माँ थी लेकिन उसके साथ ढाल की तरह मौजूद रहता था, वीरेश्वर, जो पिता के खाने में अपना नाम लिखवाकर ऋचा की मुश्किलों को थोड़ा सा ही सही कम जरूर करता है। वह प्रज्ञा अर्थात पैगी का जैविक पिता भले ही नहीं था लेकिन सही अर्थों में उसका ‘बाबुम’ बनकर समाज के सामने एक अप्रतिम उदाहरण जरूर रखता है। शायद इसीलिए इस उपन्यास का परिवेश भी वायवीय लगता है और इसके पात्र भी अतिमानव क्योंकि आज के स्वार्थी और आत्मकेंद्रित समाज में ऐसे पात्र सहजता से दिखाई नहीं देते और शायद इसीलिए “पूर्णमिदम” के पन्नों से गुजरते हुए इन पात्रों के प्रति मन में श्रद्धामिश्रित आश्चर्य अवश्य जन्म लेता है। लेकिन एक सवाल भी जन्म लेता है कि आखिरकार सरोज कौशिक वीरेंद्र और ऋचा का मिलन क्यों नहीं करवातीं। क्या इसलिए कि तब इनकी दैवीय आभा मद्धिम पड़ जाती। आखिर शरीर से इतना परहेज क्यों, वह भी एक सच्चाई है जिसे नकारना संभव नहीं। इस प्रश्न का एक उत्तर यह हो सकता है कि संभवतः यह उपन्यास निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा को अभिव्यक्ति देने के लिए लिखा गया था, तभी तो ऋचा के इस संकल्प के बावजूद कि वह और वीरेश्वर मिलकर प्रज्ञा का वैवाहिक अनुष्ठान संपन्न करेंगे, ऋचा की मृत्यु के साथ उपन्यास समाप्त हो जाता है। निश्चित तौर पर यह कथा आत्मिक भी है और आध्यात्मिक भी और इसीलिए इस कथा के मुख्य पात्र सांसारिकता के रेशों की बजाय आदर्श की मिट्टी से गढ़े गये हैं। न ऋचा साधारण स्त्री है और न वीरेश्वर, तभी तो ऋचा की जीवन यात्रा प्रेक्षा से आरंभ होकर तितिक्षा से गुजरते हुए मुमुक्षा तक पहुँचकर समाप्त होती है। एक अचल साधिका की भांति ऋचा जीवन की चुनौतियों को तटस्थ भाव से स्वीकारती हुई अपनी तपश्चर्या को जारी ही नहीं रखती बल्कि जीवन का उद्देश्य भी ढ़ूंढ़ लेती है। आम लोगों की आलोचनाओं और कुत्सापूर्ण मन्तव्यों को साहस के साथ दरकिनार करती हुई सार्थक और प्रेरक साहित्य की रचना में लगी रहती है, जिससे समाज के बिखराव को समेटा जा सके, उसे सही दिशा दिखाई जा सके। और इस आध्यात्मिक यात्रा में उसका सखा वीरेश्वर हर कदम पर एक सच्चे साथी और सहायक की तरह साथ खड़ा होता है। संभवतः इसीलिए यहाँ शरीर को दूर रखा गया है क्योंकि साधक शरीर की जरूरतों, उसकी बंदिशों से ऊपर उठकर ही मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। वस्तुतः ऋचा और वीरेश्वर साधारण नायक नायिका नहीं बल्कि पौराणिक कथाओं के किसी शापग्रस्त यक्ष युगल या देव युगल की तरह वर्णित किए गए हैं जो अपनी शापमुक्ति की प्रतीक्षा में जीवन को एक साधक की तरह साध रहे थे। ऋचा रचनात्मकता और लोकप्रियता के शिखर पर आसीन हो, बेटी को संस्कारित कर, इस साधना को पूरा भी करती है तथा जीवन से मुक्ति पाकर लेखिका के बयान के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति भी करती है और वीरेश्वर उस साधना की पूर्णता या मोक्ष की अवस्था तक पहुँचने तक प्रतीक्षा करता है। दोनों के इस अलौकिक स्वरूप और आत्मिक बंधन को लेखिका भी उभारना चाहती हैं -” ऋचा ऋचा थी- अतुलनीय, अनिंद्य, उसका ह्दय एक छलछलाता हुआ प्रवाह था- प्रेम और निष्ठा के पारदर्शी जल से लबालब। उसकी आत्मा जैसी सहजता, वैसी पवित्रता को आजीवन बनाए रखना सरल नहीं। न वैसा आवेग, न वैसी अकुंठ तत्परता और न दूसरों के प्रति ऐसा निसंकोच स्वीकार, जीवन जीते हुए अक्षुण्ण रखना संभव है। जीवन की यात्रा में अक्सर मन और जीवन के पैर मैले हो जाते हैं..” (पृ.07) लेकिन ऋचा मैली नहीं होती वह स्वचछता और शालीनता की जीवंत प्रतीक बनती है और उसका प्राण सखा है, वीरेश्वर जिससे वह अपना हर क्षण बाँट सकती है।

प्रेम की और बहुत सी कहानियाँ भी इस उपन्यास में संचित हैं। एक तो टुकटुकी का निस्वार्थ प्रेम है जिसके कारण वह न केवल समर्पित भाव से हर कदम पर ऋचा का साथ देती है बल्कि प्रज्ञा का पालन- पोषण भी करती है। प्रेम की एक कथा टुकटुकी और वासु की है जहाँ विश्वास की डोर टूटती है तो सब कुछ बिखर जाता है। हाँ, यह डोर पुन: जुड़ती है और टुकटुकी को अपना मनमीत अर्थात मनेर मानुष शंकर के रूप में मिल ही जाता है। एक प्रेम गौरा का भी है, पहले वीरेश्वर के प्रति और फिर वहाँ से विमुख होकर उसके मन या आकर्षण की डोर जुड़ती है, राशिद के साथ। राशिद जो बंधनों से घबराता है लेकिन इति जैसी न जाने कितनी तितलियों की मदभरे आकर्षक नयनों की कैद में रहना पसंद करता है। उसे प्रेम की कैद तो मंजूर है लेकिन विवाह की बेड़ियाँ अखरती हैं। यह बात और है कि गौरा के धैर्य और समर्पण की डोर में बंधकर या इति की प्रेम को सामाजिक मान्यता देने की मांग से तंग आकर, वह घर वापस लौट आता है। ऋचा की समझाइश के कारण पारंपरिक भारतीय पत्नी की तरह गौरा भी अकुंठ भाव से उसे स्वीकार कर लेती है। कोख में पल रही संतान अर्थात मिन्नी के संतुलित विकास के लिए यह आवश्यक भी था। 

एक कथा प्रज्ञा और अपूर्व की भी है जो अपने पालकों का आशीष लेकर जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं। प्रज्ञा की पहचान को लेकर संवेदनशील कलाकार अपूर्व के मन में न कोई संदेहजनक प्रश्न है ना ही लज्जाजनित जड़ता। बल्कि वह गौरवमयी माता के रूप में ऋचा को अपने कैनवास पर उकेरता है।

इति एक स्वंतत्र विचारों वाली नारी के रूप में चित्रित है जो जीवन के बंधनों को अस्वीकार करती हुई हर क्षण को जीना चाहती है, वह सामाजिक दृष्टि से उचित है या अनुचित, इसकी उसे परवाह नहीं। लेखिका न तो उसकी आलोचना करती हैं न प्रशंसा बल्कि तटस्थता से उसके व्यक्तित्व को स्वाभाविक रूप से उकेरती हैं। हाँ, वह विभा जैसी स्त्रियों की आलोचना जरूर करती हैं जो स्त्री विमर्श का झंडा थामकर अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए अन्य स्त्रियों का शोषण करती हैं और पुरूषों का भी। स्त्रियों का आदान- प्रदान कर वह अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाती हैं तो पुरूषों की प्रतिभा का दोहन कर अपनी रचनाकार की छवि को चमकाती हैं।

चूंकि ऋचा अपनी सृजनशीलता के बलबूते साहित्य जगत में न केवल पैठ बनाती है बल्कि अपनी रचनाओं से सबको चमत्कृत भी कर देती है इसीलिए साहित्य जगत के जमावड़ों और वहाँ चलने वाली साहित्यिक, गैर- साहित्यिक बहस -मुबाहिसों के कई रोचक प्रसंग उपन्यास में चित्रित हुए है। बहुत से प्रतिष्ठित साहित्यकारों के चेहरे अनायास पहचान में आ जाते हैं वह चाहे देश के हों या शहर के। साहित्य चर्चा के साथ- साथ देश और समाज के विभिन्न मुद्दों पर  चर्चा भी बेहद स्वाभाविक तौर पर हुई है। मुद्दा स्त्री विमर्श का हो या उसके तहत लेखिकाओं का अपने पुरूष साथियों के चरित्र की बखिया उधेड़ने का, ऋचा को माध्यम बनाकर सरोज कौशिक बेबाकी से इन विषयों पर अपने विचार रखती हैं। इसी तरह धर्म, साम्प्रदायिकता, नक्सलवाद जैसे विषयों पर भी कभी खुलकर तो कभी संकतों में बात करने से सरोज जी को परहेज़ नहीं है। ऋचा द्वारा लंदन प्रवास के दौरान वीरू को लिखे पत्रों में भी जीवन के बहुत से गूढ़ विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई है। ये पत्र उपन्यास की कथा को थोड़ा बोझिल करते हुए उसके प्रवाह को रुद्ध अवश्य करते हैं लेकिन ऋचा का ही नहीं लेखिका का भी बौद्धिक विमर्श और चिंतन बेहद सुंदर और सधी हुई भाषा में इनमें से झांकता है। ये पत्र और उनसे झांकता चिंतन इस उपन्यास को वैशिष्ट्य प्रदान करता है। धर्म, वेद, काल, मन, साधना आदि विषयों पर किया गया चिंतन उल्लेखनीय है। धर्म को व्याख्यायित करती हुई ऋचा लिखती है -“धर्म को बोझ मत समझो। धर्म बंधन नहीं वह तो मुक्ति की राह दिखाता है। हर क्षण प्रसन्न रखता है। प्रसन्न रहना बंदगी है। स्वर्ग, नरक के चक्कर में न पड़ें। सब कुछ यहीं है।” सीधे- सादे ढंग से जीवन का निचोड़ इसमें मिलता है जिससे साधारण पाठक सहज ही सहमत हो जाता है। इन पत्रों की  मुहावरेदार भाषा का  एक नमूना देखिए- “खुशियाँ मेहमान हो गई हैं और उलझने कियायेदार।” (पृ. 119) 

उपन्यास की पृष्ठभूमि चूंकि बंगाल की है और लेखिका राजस्थानी, अतः दोनों ही भाषाओं अर्थात राजस्थानी और बांग्ला का प्रयोग उपन्यास में हुआ है, हां बांग्ला का प्रयोग अधिक हुआ है क्योंकि टुकटुकी जैसे पात्र बांग्लाभाषी हैं। बहुत से संवाद बांग्ला में ही हैं जिससे उपन्यास की स्थानीयता तो बनी रहती है और विश्वसनीयता भी लेकिन जो पाठक बांग्ला भाषा, साहित्य, इसकी कविताओं और गीतों से परिचित नहीं हैं उनके लिए ये स्थल उतने बोधगम्य नहीं हो पाते। लेखिका को उन वाक्यों के हिंदी अनुवादों को भी शामिल करना चाहिए था। यह पाठकीय आग्रह कोई नया नहीं है, कृष्णा सोबती और रेणु की रचनाओं के संदर्भ में भी ये सवाल उठते रहे हैं। इन सवालों के बावजूद उपन्यास प्रबुद्ध पाठकों को अपने आकर्षक में बांध ही लेता है लेकिन साधारण पाठक जिनका बौद्धिक, सामाजिक या आध्यात्मिक बहस से कोई लेना देना नहीं है और जो मात्र समय काटने या मन बहलाने के लिए उपन्यासों की दुनिया में आता है, उसे जरूर इस उपन्यास मे कोई खास रस नहीं मिलेगा। लेकिन सह्दय पाठक निस्संदेह इससे लाभान्वित भी होंगे, रससिक्त और अनुप्राणित भी।  

पूर्णमिदम् (उपन्यास), सरोज कौशिक, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण : 2019, मूल्य : 295/-

गीता दूबे, पूजा अपार्टमेंट, फ्लैट नं ए 3, द्वितीय तल, 58 ए/1 प्रिंस गुलाम हुसैन शाह रोड, यादवपुर, कोलकाता-700032, मोबाइल- 9883224359, मेल – [email protected]

 

बिहार की सबसे कम उम्र की मुखिया बनी 21 साल की अनुष्का

20 साल तक दादा रहे थे मुखिया, अब 21 साल की पोती को पंचायत की कमान
पटना :बिहार में अनुष्का सबसे कम उम्र में मुखिया बनी हैं। राज्य में पंचायत चुनाव का 7वां चरण समाप्त हो गया है। पंचायत चुनाव में आधी आबादी को इस बार काफी जगह मिली है। अब तक परिणामों में बिहार की सबसे कम उम्र की मुखिया भी महिला ही चुनी गई हैं। शिवहर जिले की कुशहर पंचायत में 21 साल की अनुष्का मुखिया बनी हैं। अनुष्का के दादा भी 20 साल तक मुखिया रहे थे।

287 मतों से जीती
कुशहर गांव की रहने वाली अनुष्का ने बेंगलुरु के प्रतिष्ठित संस्थान से BA की डिग्री हासिल की है। पढ़ाई के बाद वह गांव लौटी। यहां पंचायत चुनाव के दौरान प्रत्याशी के रूप में मैदान में कूदी। जीत हुई तो चर्चा पूरे इलाके में होने लगी। अनुष्का ने रीता देवी को 287 मतों से शिकस्त दी है। अनुष्का के पिता सुनील कुमार सिंह 2011 से 2016 तक जिला पार्षद रहे। जबकि, दादा राजमंगल सिंह 1978 से 2001 तक पंचायत में बतौर मुखिया के रूप में प्रतिनिधित्व किया था।

पंचायत में मेडिकल कॉलेज बनाने का लक्ष्य
स्थानीय लोगों की मानें तो अनुष्का के दादा के प्रतिनिधित्व का फल है, जो पोती अनुष्का को मिली है। दादा राजमंगल सिंह ने इस पंचायत में काफी काम किया गया है। पंचायत में हाई स्कूल भी बनवाया था। अनुष्का ने कहा, ‘अपने दादा के सपनों को साकार करेगी। दादा का सपना था की इस पंचायत में मेडिकल कॉलेज बने, जिसके लिए परिवार ने जमीन भी दिया है। मेरा पहला लक्ष्य यही है कि इसके अलावा पंचायत को डिजिटल और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना।’

जनता का भरोसा टूटने नहीं देंगे
अनुष्का को समाजसेवा की भावना घर से ही जगी है। दादा से लेकर पिता तक प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। इसी वजह से अनुष्का चुनाव मैदान में उतरी और जीत भी दर्ज की। जीत के बाद बधाइयों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। अनुष्का ने कहा, ‘यह जीत कुशहर पंचायत की जनता की जीत है। बड़ी जिम्मेदारी दी है। अब वह पंचायत का हर स्तर पर विकास करेगी। चुनाव प्रचार के दौरान जनता ने उन्हें मुखिया बनाने का आश्‍वासन दिया था। जीत भी दिला दी है। अब उनके भरोसे लायक काम करना है।’

माधवी गोगटे का 58 साल की उम्र में निधन

 टीवी शो अनुपमा में निभाया था मां का किरदार
मुम्बई : टीवी के लोकप्रिय शो ‘अनुपमा’ की अभिनेत्री माधवी गोगटे का 58 साल की उम्र में कोरोना से निधन हो गया। माधवी कुछ दिन पहले कोरोना पॉजिटिव हो गई थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक माधवी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और वो इस इलाज से ठीक भी हो रही थीं। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और रविवार (21 नवंबर) को दोपहर में उनका निधन हो गया। माधवी गोगटे शो लीड किरदार अनुपमा यानी रूपाली गांगुली की मां का किरदार निभा रही थीं।
सह अभिनेत्री रूपाली गांगुली ने सोशल मीडिया पर माधवी की मुस्कुराती हुई फोटो शेयर की। उन्होंने लिखा, “बहुत कुछ अनकहा रह गया..सद्गति माधवी जी।”अभिनेत्री नीलू कोहली ने भी माधवी की फोटो शेयर करते हुए एक इमोशनल पोस्ट किया, कि तुमने हमें छोड़ दिया है। मेरा दिल टूट गया माधवी..आप तो बहुत यंग “माधवी गोगटे मेरी प्यारी दोस्त नहीं…मुझे विश्वास नहीं हो रहा है थे… काश मैंने वो फोन उठाया होता और तुमसे बात की होती, जब आपने मेरे मैसेज का जवाब नहीं दिया था। मैं बस अब पछता सकती हूं।”अशोक सराफ के साथ मराठी फिल्म ‘घनचक्कर’ से सफलता का स्वाद मिला था। वो कई हिंदी टीवी शोज में भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने हाल ही में सीरियल ‘तुजा मजा जामते’ के साथ मराठी टीवी शो में डेब्यू किया था। माधवी ने ‘कोई अपना सा’, ‘ऐसा कभी सोचा ना था’, ‘कहीं तो होगा’ और ‘अनुपमा’ जैसे कई टीवी सीरियल्स में बेहतरीन काम किया है।

 

छपरा की बेटी, साइकिल से भारत घूमीं:173 दिनों में 12,500 किमी चली

बेटी बचाने का दिया संदेश, अब एवरेस्ट फतह करना चाहती है

छपरा : सविता महतो ने साइकिल से पूरे देश की यात्रा करके कीर्तिमान बनाया है। छपरा की इस बेटी ने एक 173 दिनों में 29 राज्यों का साइकिल से भ्रमण कर उन्होंने बेटी बचाने का संदेश दिया है। यह यात्रा उन्होंने पिछले वर्ष की है। अब वह माउंट एवरेस्ट को 2022 में फतह करना चाहती है, लेकिन इसमें उन्हें आर्थिक परेशानी हो रही है। सविता ने कला संस्कृति मंत्री आलोक रंजन से मदद मांगी है। मंत्री ने मदद का भरोसा दिया है। पानापुर के चौहान महतो की पुत्री सविता ने जम्मू कश्मीर से यात्रा की शुरुआत की। इसके बाद दक्षिण केरल, तमिलनाडु पहुंची। फिर उत्तर पूर्वी राज्यों में गई। अंत में सिक्किम होते हुए 18 जुलाई 2017 को पटना पहुंची। रास्ते में सभी जगहों पर एक-एक दिन बिताया। इस अवधि में उसने 12 हजार 500 किलोमीटर से अधिक का सफर साइकिल पर तय किया। सविता ने बताया, ‘जिस रास्ते से गुजरती, वहां लोगों को बेटी बचाने और बेटी पढ़ाने का संदेश देती रहीं। हमारे कामों को देखकर लोग काफी कायल हुए और हमारा स्वागत भी किया। अभियान में ग्रुप कमांडर ब्रिग्रेडियर रणविजय सिंह से बड़ी सहायता मिली। उन्होंने आगे बढ़ने को प्रेरित किया।’

तत्कालीन मंत्री कर चुके हैं सम्मानित
सविता ने बताया, साइकिल यात्रा के दौरान लोग यह जानकर आश्चर्य चकित हो जाते थे कि मैं बिहार से हूं। मुझे इस बात का गर्व है कि बिहार की हूं।’ बदा दें, उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार के कला संस्कृति एवं युवा विभाग से सम्मानित हो चुकी है।

सविता के पिता मछली बेच कर चलाते हैं परिवार
चौहान महतो और क्रांति देवी की पुत्री सविता अपने परिवार के साथ कोलकाता में रहती है। पिता तारकेश्वर में मछली बेच कर परिवार चलाते हैं, लेकिन सविता ने गरीबी के बीच रहकर भी बड़ा सपना देखा और उसे पूरा करने का साहस भी दिखाया। साइकिल यात्रा के दौरान स्कूल प्रबंधन भी उसकी मदद करता है। सविता हिमालय के संतोपथ पर्वत पर जमीन से साढ़े सात हजार मीटर ऊंचाई पर तिरंगा फहरा चुकी है।

महिला प्रधान बनी वैक्सीनेशन दूत, टीकाकरण अभियान को दी रफ्तार

मेरठ : महिला प्रधान सेबी के मजबूत इरादों की वजह से मेरठ से सटे दौराला ब्लॉक के बंशीपुरा गांव का हर नागरिक आज कोरोना से चिंतामुक्त हो गया है। हिंदू, मुस्लिम मिश्रित आबादी वाले इस गांव में हर आदमी वैक्सीन की पहली खुराक ले चुका है। गांव में दूसरे डोज की तैयारी चल रही है। यह सब गांव की प्रधान सेबी की मेहनत की वजह से मुमकिन हो पाया है। उन्होंने वैक्सीन के खिलाफ लोगों के मन में चल रही भ्रांतियों को तोड़ा। इसके लिए लोगों से काफी ताने भी सहे। लेकिन अंत तक हार नहीं मानीं। सेबी कहती हैं कि गांव वालों को समझाना बहुत मुश्किल है। पहले मैंने औरतों और युवाओं को वैक्सीन के लिए मनाया। गांव के हर घर की कुंडी पता नहीं कितनी दफा खटखटाई है।वह कहती हैं कि कई लोगों ने तो छत से मुझे आता देखकर दरवाजे खोलना ही बंद कर दिया था। लेकिन, मैंने भी ठान लिया था कि गांव के हर आदमी को वैक्सीन लगवाऊंगी। इसलिए सुबह जल्दी उठकर, कभी देर रात, कभी मिठाई के बहाने घरों में जाकर लोगों को मनाया। लोग कहते अगर हमने वैक्सीन लगवाई तो हमारी नसबंदी हो जाएगी। कुछ कहते हम मर जाएंगे, औरतें कहती हमारे बच्चे नहीं होंगे। गांव में डॉक्टर को बुलाकर ऐलान कराया कि वैक्सीन से ऐसा कुछ नहीं होगा। मिन्नतें कर लोगों को मनाया। आज गांव में हर आदमी टीके की पहली डोज लगवा चुका है, दूसरी डोज की तैयारी है। प्रधान को कोसने वाले लोग आज अपनी बहू, महिला प्रधान का शुक्रिया अदा करते हैं।

अपने गांव को कोरोना से बचाने के लिए सेबी ने लंबी लड़ाई लड़ी है। सेबी कहती हैं कि पहले मैंने औरतों और युवाओं को वैक्सीन के लिए मनाया। गांव के हर घर की कुंडी पता नहीं कितनी दफा खटखटाई है। लोगों की गलत बातें, ताने भी सुने, सहे हैं। औरतें कहतीं तुम क्यों हमारे पीछे पड़ी हो, हमें नही लगवाना जे टीका, तुम ही लगवा लो। सेबी कहती है औरतों को तो मैं खुद समझा लेती, कई आदमियों को भी समझाया कि वैक्सीन लगवाएं, बीमारी से बचाएगी। पूरा गांव सुरक्षित रहेगा। लेकिन, कई ऐसे लोग भी हैं जो बात नहीं मानते थे। मैं गांव की बहू हूँ, पद में बड़े आदमियों से पर्दा भी रखना पड़ता है। जहां ऐसा था वहां पति, भाई, देवर को भेजा। घर के आदमी उन पुरुषों के बीच बार-बार गए। सुबह 6 बजे से जाकर उन्हें उठाया और वैक्सीन के लिए लाए। कुछ लोगों से मनमुटाव भी हुआ मगर अपने गांव को बचाने के लिए मैं भी डटी रही। सेबी की रिश्ते की सास जाहिदा कहती हैं हमारे घर मा आज तक कोई औरत घर से बाहर न निकली। मैं भी सादी होकर आई थी तो घर में भीतर रहती, गांव की सारी औरतें पर्दे में रहे हैं। लेकिन जब से म्हारी बहू सेबी पिरधान बनी है वो ही बाहर जाती है। बीमारी में म्हारी बहू ने मुझे भी सुई लगवाई, औरतों को हाथ पकड़-पकड़ कर ले गई सुई लगवाने। जे मे सब सही रहें। जे ई बहू है जो बाहर निकले है। गाँव में अब तक 5 से 6 टीकाकरण शिविर लग चुके हैं। सेबी कहती हैं पहली डोज के वक्त शुरू के 2 शिविर बिल्कुल खाली रहे। डॉक्टर आते सारा दिन लोगों का इंतजार करते हम भी बैठे रहते मगर कोई वैक्सीन लगवाने नहीं आया। डॉक्टर और एएनएम ने घरों, पंचायत में जाकर लोगों को समझाया कि वैक्सीन लगवाएं। आज दूसरी डोज के लिए जो कैंप लग रहा है उसमें लोग खुद आकर वैक्सीन लगवा रहे हैं। सेबी मुस्लिम आबादी के उस गांव को वैक्सीन लगवाने में सफल रहीं जिसके सामने स्वास्थ्य विभाग ने भी हथियार डाल दिए। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में शुरू से वैक्सीनेशन कम रहा। अफवाहों से घिरे लोगों ने वैक्सीन लगवाने से इंकार कर दिया। प्रशासन ने मुनादी कराई, धर्मगुरुओं की मदद से जागरुकता फैलाई, मस्जिदों से ऐलान कराए कि लोग वैक्सीन लगवाएं। पुलिस, प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी खुद ई रिक्शे में बैठकर गलियों में घूमे, लोगों को वैक्सीन लगवाने को कहा। डीएम, सीएमओ, एसएसपी ने मुस्लिम इलाकों में जाकर लोगों से कहा वैक्सीन लगवाएं। लेकिन सेबी ने अपने गांव की पूरी हिंदू और मुस्लिम आबादी को वैक्सीन लगवा दी। वंशीपुरा के बाद सहरसा में वैक्सीनेशन करा रही हैं। वंशीपुरा गांव को कोरोना की पहली और दूसरी लहर छू भी नहीं सकी। ग्राम प्रधान के प्रयासों से गांव कोरोना से दूर रहा। सेबी कहती हैं दूसरी लहर में जब गांवों में कोरोना खूब फैला तो मैंने अपने गांव में रोजाना सैनिटाइज कराया, सफाई कराई, गांव की सीमा को बैरिकेड कर दिया ताकि न कोई बाहर जा सके, न बाहरी आदमी अंदर आए इसलिए हमारे गांव में न किसी को कोरोना हुआ न किसी की कोरोना से मौत हुई। वंशीपुरा गांव मेरठ जिले का पहला 100% वैक्सीन लगाने वाला गांव बन चुका है। डीएम के. बालाजी और सीएमओ ने ग्राम प्रधान और चिकित्सकों की टीम को सम्मानित किया। गांव में 18 से 93 साल के हर व्यक्ति को वैक्सीन की पहली डोज लग चुकी है। टीके की दूसरी डोज भी रोजाना कैंप लगाकर लगवाई जा रही है। 517 लोगों ने यहां वैक्सीनेशन कराया है। एएनएम अलका और आंगनबाड़ी में काम करने वाली कविता, बबली ने भी इसमें मदद की है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

पुरुष प्रधान घाटों की दबंग दुनिया में 6 नावों की मालकिन हैं धनावती देवी

वाराणसी : बनारस के क्षमेश्वर घाट पर बाकी घाटों से ज्यादा चहल पहल है। यहां आंवला नवमी की पूजा चल रही है। महिलाओं का एक छोटा सा समूह है जो पूजा के बाद प्रसाद लेने-देने में व्यस्त है। इसी पूजा स्थान पर लाल साड़ी, हरी चूड़ियां और बड़ी सी लाल बिंदी लगाए धनावती देवी प्रमुख पुजारिन की भूमिका में हैं। आने जाने वालों को बुला-बुलाकर प्रसाद दे रही हैं। पानी पिला रही हैं। जो दुल्हन उनके पास हैं उन्हें प्रसाद घर ले जाने की सलाह दे रही हैं। धनावती की ये अगुआई सिर्फ पूजा में ही नहीं बल्कि क्षमेश्वर घाट पर शायद पहली ऐसी महिला है जिसके पास 6 नाव हैं और वे उनकी मालकिन हैं। बड़ी ही चंचलता और दबंगई से धनावती घाट पर अपनी पैठ बनाने की कहानी भास्कर वुमन से साझा करती हैं।
पुरुषों के घाट में पैठ बनाना मुश्किल था
नाविक समुदाय से आने वाली धनावती बताती हैं, ‘घाट दबंगों की जगह है। अगर आप छीना-झपटी और अपनी बात को पुरजोर तरीके से रखना नहीं जानतीं तो यहां ठहरना मुश्किल है। नाव का व्यवसाय पूरी तरह से पुरुषों की सत्ता है और उनकी सत्ता में कोई सेंध लगाए उन्हें मंजूर नहीं, लेकिन मैंने भी हार नहीं मानी और घाट पर अपनी जगह बनाई। शादी के एक साल के भीतर-भीतर मैं घाट पर आकर बैठ गई। अभी तक तो मैंने ससुराल का रस लेना शुरू ही किया था। हाथों की मेहंदी छूटी ही थी कि मुझसे मेरे पति की परेशानी देखी नहीं गई। वे घर में कमाने वाले अकेले पुरुष थे।
पति को मुझे देखकर दया आती। घर में ससुर, पति और मैं… बस हमारी इतनी ही दुनिया थी। मेरी सास नहीं थीं। उनकी मेहनत देखकर मुझे खुद में मलाल होता कि मैं घर में बैठी हूं और पति इतनी मेहनत कर रहे हैं। मैं यह भी देख रही थी कि घाट पर इनके (पति) साथ बहुत राजनीति होती क्योंकि ये नाव चलाने वाले अकेले होते तो इनकी सवारियां दूसरे नाविक ले लेते। फिर पति स्वभाव में भोले रहे। ज्यादा चालूपंती नहीं है। इसलिए उनके इस स्वभाव का सभी लोग फायदा उठाते। ये सारी स्थितियां देखकर मैंने घाट पर आने की सोची। घाट का पहला दिन मुझे अच्छे से याद है। यहां मेरा स्वागत फूलों से नहीं गालियों से और थप्पड़ों से हुआ।
घाट पर आने पर मुझे झापड़ और गालियां दी गईं
दूर के रिश्ते में लगने वाले जेठ ने मुझे घाट पर आने पर बहुत गालियां दीं। मैं भी तब 18 साल की थी और नई-नई शादी हुई थी तब उन्हें ज्यादा कुछ कह नहीं सकती थी, लेकिन एक दिन हद हो गई। उन्होंने अपनी पत्नी से जाकर मेरी शिकायत की और उनकी पत्नी ने आकर मुझ पर हाथ उठा दिया। मुझे बेशर्म कहा जाने लगा। बस तभी से मैंने भी शर्म-लिहाज का घूंघट उतारकर रख दिया और बराबर की मारपीट की। पहली बार घाट के सभी पुरुषों ने मेरी ‘मुंह दिखाई’ की। मेरे एक कंधे पर मेरा एक साल का बेटा था, लेकिन उस महिला से मार नहीं खाई। उस दिन आरपार की लड़ाई हुई। घाट पर या तो मैं रहती या वे लोग, ये तय कर लिया। पुलिस आई, मामला सलट गया। एक वो दिन था और एक आज का दिन तब से लेकर आज तक किसी ने मुझसे उल्टे मुंह बात नहीं की। अब हम पति-पत्नी आराम से अपना काम करने लगे। पति एक नाव लेकर जाते तब तक मैं दूसरी नाव में दूसरे मल्लाह को बुलाकर बाकी सवारियां बैठा देती। इस तरह हमारी आमदनी बढ़ी।
बचपन से बिंदास और निडर थी
ऐसा नहीं है कि ससुराल में आकर अचानक से मुझमें दबंगई आ गई। मैं बचपन से बिंदास और निडर थी। मेरा जन्म सोनभद्र में हुआ। घर में एक भाई और तीन बहनों में मैं दूसरे नंबर पर, लेकिन सबसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार में ही थी। मुझे लड़कियों की तरह नखरे दिखाना या कमसिन कली बनना बिल्कुल पसंद नहीं रहा। पिता जी मिठाई का काम करते थे और मां घाट पर नाव का ठेका लेतीं। पिता जी गुजर गए और मां बूढ़ी हो गईं। घर की आर्थिक हालत और बिगड़ने लगी। मैं पांचवीं तक ही पढ़ पाई। मेरे ही सिर पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गई। मां की जगह मैंने घाट पर जाना शुरू कर दिया। कभी-कभी कम पैसे मिलते तो कभी कमाई होती ही नहीं। ऐसे में बड़ी मुश्किलों से पेट पालना पड़ा। घाट पर भी पुरुषों की दबंगई रहती। एक बार ठाकुर-बामन से मैं झगड़ गई क्योंकि मेरी मजदूरी नहीं दे रहे थे। जब मुझे मेरे पैसे नहीं मिले तो मैं भी उन पुरुषों से डरी या घबराई नहीं। जितनी तेज आवाज में वो बोल रहे थे उतनी तेजी से मैं भी बोली। वो घबरा गए और मेरे पैसे मुझे दे दिए। इसके बाद से मुझे जैसे आदमी मिले मैंने उनके साथ वैसी ही बात की।
अब हूँ 6 नावों की मालकिन
मायके में बेशक कष्ट झेले लेकिन ससुराल में पति ने मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी कीं। पहले थोड़ा मिला बाद में भगवान ने जरूरत से ज्यादा दिया। चार लड़के हुए। चारों को पढ़ाया। पति आज भी नाव का ही कारोबार करते हैं। नाविक हैं। पति बहुत अच्छे हैं। 18 साल की उम्र से नाव संभाल रही हूं। आज उम्र 60 है। आज 6 नावों की मालकिन हूं। इनमें से कुछ मोटर वाली हैं और कुछ चप्पू से चलने वाली। बहुएं हैं, पोतियां हैं, पोते हैं। सभी अपने काम में बेहतर तरीके से कर रहे हैं। चार बेटों में से दो बेटे अब इस दुनिया में नहीं रहे। बच्चे पढ़ाई लिखाई में व्यस्त हो गए। एक बेटे ने एमए तक की पढ़ाई की। बेटों के बाद भी नाव का काम मैंने ही संभाला।
खुद की कमाई से बनाया घर
नाव के कारोबार में आमदनी का कोई हिसाब नहीं है। कभी अच्छी कमाई तो कभी कुछ भी नहीं। आज सात पोतियां हैं और आगे उन्हें पढ़ाना है। दो मंजिला घर नाव के काम से और गंगा माई की कृपा से बना पाई हूं। मेरी आदत नहीं है हाथ फैलाने की। मैं दूसरों को देना पसंद करती हूं।
पुरुषों से घबराएं नहीं
पुरुषों से भरे घाटों पर अपनी स्थायी पैठ बना इतना आसान नहीं था। अब लगता है कि महिलाओं को अपने पुरुष की तरह कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। किसी पुरुष से उन्हें घबराना नहीं चाहिए। घाट को हरा-भरा और साफ रखना मुझे पसंद है। यही वजह है कि स्वच्छता प्रहरी से सम्मानित किया गया। क्षमेश्वर घाट की अध्यक्ष भी हूं।
(साभार – दैनिक भास्कर)