Friday, April 10, 2026
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कम कमाई वालों का सहारा म्यूचुअल फंड, 70% निवेशकों की वार्षिक आय 5 लाख से कम

मुम्बई : कम कमाई करने वालों के लिए म्यूचुअल फंड इस समय देश में सबसे पसंदीदा निवेश का साधन बना है। यह बात खुद वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में कही है। उनके मुताबिक, म्यूचुअल फंड में 70% निवेशक वे हैं, जिनकी सालाना कमाई 1 लाख से 5 लाख रुपये के बीच है।

एयूएम में ज्यादा हिस्सेदारी 1 से 5 करोड़ वालों की
हालांकि असेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) के लिहाज से सबसे ज्यादा हिस्सेदारी सालाना 1 करोड़ से 5 करोड़ रुपये कमाने वालों की है पर वैयक्तिक निवेशकों की संख्या के लिहाज से 1 से 5 लाख रुपये वालों की हिस्सेदारी ज्यादा है। एयूएम का मतलब निवेशकों का जितना पैसा म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री या कंपनियों के पास होता है। देश में कुल 1.82 करोड़ म्यूचुअल फंड निवेशक हैं।

5 लाख से कम कमाई वालों की हिस्सेदारी एयूएम में 29%
उन्होंने बताया कि फंड इंडस्ट्री के एयूएम में 5 लाख रुपये से कम कमाई करने वाले निवेशक एयूएम में 29% हिस्सेदारी रखते हैं। सेबी के आंकड़ों के हवाले से वित्त राज्यमंत्री ने बताया कि एक लाख रुपये से कम कमाई करने वाले यूनीक इन्वेस्टर्स की संख्या 16 लाख 33 हजार 909 है। इनकी हिस्सेदारी इंडिविजुअल निवेशकों में 8.80% है। जबकि फंड हाउसों के पास इनका कुल निवेश 1.44 लाख करोड़ रुपये है। यानी फंड इंडस्ट्री के पास जितना निवेश है, उसका 4.50% हिस्सा इन निवेशकों का है।

निवेशकों की संख्या 1.13 करोड़
एक से पांच लाख रुपए सालाना कमाने वाले निवेशकों की संख्या 1 करोड़ 13 लाख 66 हजार 741 है। कुल इंडिविजुअल निवेशकों की संख्या की तुलना में इनकी हिस्सेदारी 61.21% है। जबकि इनका AUM 7 लाख 71 हजार 650 करोड़ रुपए है। फंड इंडस्ट्री के कुल AUM में इनकी हिस्सेदारी 24.04% है। चौंकाने वाली बात है कि जो लोग ज्यादा कमाते हैं वे फंड में निवेश नहीं करते हैँ।

5 करोड़ कमाने वाले केवल 245 निवेशक
उदाहरण के तौर पर 5 करोड़ रुपए सालाना कमाने वाले केवल 245 लोग ऐसे हैं जो म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। इन्होंने कुल 408 करोड़ रुपये का निवेश किया है। 5 से 10 लाख रुपये जो लोग सालाना कमाते हैं, ऐसे निवेशकों की संख्या 35.81 लाख है। इंडिविजुअल निवेशकों में इनकी हिस्सेदारी 19.28% है। इनका निवेश 5.98 लाख करोड़ रुपये है और इनकी हिस्सेदारी एयूएम में 18.64% है।

10-25 लाख कमाई वालों की संख्या 14.31 लाख
10 से 25 लाख रुपये जो लोग साल में कमाते हैं, ऐसे निवेशकों की संख्या 14.31 लाख है। इनका कुल निवेश 3.61 लाख करोड़ रुपए है। इंडिविजुअल निवेशकों की संख्या में इनकी हिस्सेदारी 7.71% है जबकि कुल एयूएम में इनका हिस्सा 11.27% है। 25 लाख से एक करोड़ रुपए कमाई करने वाले 4.22 लाख लोग म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। इनकी हिस्सेदारी 2.27% है और इनका कुल निवेश 3.40 लाख करोड़ रुपए है। कुल निवेश में इनकी हिस्सेदारी 10.61% है। 1 से 5 करोड़ रुपए सालाना करने वाले निवेशकों की संख्या 1.35 लाख है। इंडिविजुअ निवेशकों की संख्या में ये एक पर्सेंट से भी कम हैं। हालांकि इनका AUM सबसे ज्यादा 9.93 लाख करोड़ रुपए है। एयूएम में इनकी हिस्सेदारी करीबन 31% है।

बी-30 शहरों से बढ़ रहा है निवेश
मंत्री ने बताया कि बी-30 यानी टॉप 30 शहरों के बाद के जो शहर हैं, वहां से 2020-21 में 6.46 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया है। 2019-20 में यह 3.48 लाख करोड़ रुपये था। यानी इसमें 86% की बढ़त आई है। छोटे शहरों में सिस्टैमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) में तेजी से बढ़त हो रही है। उन्होंने कहा कि सेबी ने ढेर सारी पहल निवेशकों को जागरुक करने के लिए की है।

फंड इंडस्ट्री के पास 36 लाख करोड से ज्यादा का फंड

देश की म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का एयूएम इस समय 36 लाख करोड़ रुपये के पार है। इसमें सबसे ज्यादा निवेश करीबन 6 लाख करोड़ रुपये एसबीआई म्यूचुअल फंड के पास है। देश में कुल पांच बड़े फंड हाउसों में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल (4.47 लाख करोड़ रुपये), HDFC म्यूचुअल फंड (4.38 लाख करोड़ रुपये) हैं। बिड़ला म्यूचुअल फंड और कोटक म्यूचुअल फंड भी टॉप 5 में हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

75 लाख कामगारों में हैं अधिकांश महिलाएं, सर्वे के बाद वेतन, पीएफ और छुट्टी पर निर्णय

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार घरेलू सहायकों के आंकड़े जुटाने के लिए पहली बार पूरे देश में सर्वे करा रही है। श्रम मंत्रालय सर्वे के जरिए घरेलू सहायकों की स्थिति, वेतन के तरीकों से लेकर उनके रहन-सहन आदि का पता करेगा। ई-श्रम पोर्टल के मुताबिक, 8.56 करोड़ रजिस्टर्ड असंगठित श्रमिकों में 8.8 फीसदी (75.33 लाख) घरेलू सहायक हैं, जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। 22 नवंबर से शुरू हुए सर्वे में सभी तरह की घरेलू सेवाओं जैसे रसोइया, ड्राइवर, घर की देखभाल, ट्यूशन शिक्षक (बच्चों के लिए) और चौकीदार आदि को शामिल किया जाएगा। यह सर्वे देश के सभी राज्यों के 700 से ज्यादा जिलों में किया जाएगा। सर्वे के तहत राज्यों और केंद्र के स्तर पर घरेलू सहायकों की संख्या का पता लगाना है। इसके अलावा जिन घरों में वह काम करते हैं, वहां रहते हैं या बाहर रहते हैं। काम करने वालों में कितने संगठित रोजगार के तहत आते हैं, कितने असंगठित क्षेत्र में रोजगार कर रहे हैं।

मिल सकता है पीएफ, काम के घंटे-छुट्टी होगी तय!
सर्वे के बाद घरेलू सहायकों की स्थिति का पता लगने के बाद उनके लिए कई अहम योजनाएं बन सकती हैं। इसके तहत लेबर कोड के आधार पर श्रमिकों के काम के घंटे, न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी, पीएफ खाते जैसे कई अहम सुविधाएं शुरू हो सकती हैं। फिलहाल मेट्रो सिटी और कस्बों में घरेलू सहायकों के लिए न्यूनतम मजदूरी का प्रावाधान नहीं है।

दक्षिण भारत के राज्यों में मिलती हैं कई सुविधाएं
सेल्फ एम्प्लॉइड वुमन एसोसिएशन के एक सर्वे के अनुसार पिछले एक दशक में भारत में घरेलू सहायकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इसके मुताबिक देश भर में लगभग 26 लाख महिला घरेलू सहायिकाएँ हैं। इतनी बड़ी कामगार आबादी को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। घरेलू सहायकों के लिए कोई भी सरकारी योजना नहीं है। हालांकि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में इनके लिए कई बड़े एसोसिएशन हैं जो इनके अधिकारों के लिए काम करते हैं। दिल्ली में घरेलू सहायकों के लिए कोई न्यूनतम मजदूरी तय नहीं है, जैसा कि केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में है। सर्वे में यह भी पता लगाना है कि कामगारों में कितने प्रवासी हैं और कितने गैर-प्रवासी हैं। इसके अलावा उनका वेतन क्या है। उन्हें वेतन किस तरह मिलता है। उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है, उसके आंकड़े एकत्र करने हैं।

कई तरह के भेदभाव की शिकार होती हैं घरेलू सहायिकाएँ
नेशनल डोमेस्टिक वर्कर्स मूवमेंट की को-ऑर्डिनेटर सुनीता विश्वास बताती हैं कि घरेलू सहायिकाओं के साथ गाली-गलौज, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण, चोरी का आरोप, घर के अंदर शौचालय आदि का प्रयोग न करने, इनके साथ छुआछूत करना, खाने-पीने के लिए अलग बर्तन देने जैसी चीजें सामने आती हैं। हमारे देश में घरेलू सहायकों ​​​​​​​ को आमतौर पर नौकर और नौकरानी कहा जाता है।

केंद्र ने कानून तय किए, राज्यों ने नहीं किए लागू
पटियाला हाउस कोर्ट के वकील महमूद आलम का कहना है कि डोमेस्टिक वर्कर्स एक्ट, 2008, यह कानून पहले से देश में लागू है लेकिन कुछ व्यवहारिक दिक्कतों के चलते इसमें बाधाएं आती हैं। यह कानून पूरी तरह से राज्यों पर निर्भर है और इस पर केंद्र की अधिसूचना अभी तक लटकी है। इस कानून के तहत सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी, स्टेट एडवाइजरी कमेटी और डिस्ट्रिक्टर बोर्ड को नियम लागू करने का अधिकार दिया गया है। इस कानून के मुताबिक, 18 साल से 60 साल तक के घरेलू सहायक को 12 महीने में 90 दिन तक लगातार काम कर लेने पर उसका रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। इस कानून में वेतन सहित अवकाश, रजिस्टर्ड नौकर के लिए पेंशन, मैटरनिटी लीव जैसी सुविधाओं का प्रावधान है। साथ ही, साल में 15 दिन की छुट्टी भी देने का नियम है। कामगारों का शोषण या उत्पीड़न होने पर जुर्माना सहित कारावास की सजा का नियम है। नियम को लागू कराने के लिए डिस्ट्रिक्ट बोर्ड बनाने का नियम है जो कानून को लागू कराएगा और घरेलू कामगारों से जुड़ी शिकायतों का निपटारा करेगा।

सरकार ने बनाए हैं पेंशन के नियम
प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के तहत सरकार ने असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के लिए हर महीने 3000 रुपये की पेंशन देने का प्रावधान किया है। इस पेंशन योजना में कामगार को 100 रुपये प्रति माह का योगदान करना होगा वहीं इतना योगदान केन्द्र सरकार करेगी। इस योजना का लाभ उन लोगों को मिलेगा जिनका वेतन 15000 रुपये से कम है। इस योजना के तहत ड्राइवर, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन और घरेलू नौकरानी आदि को भी पेंशन मिल सकेगी। असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे व्यक्ति को 60 साल के बाद इस योजना के तहत पेंशन मिलेगी। इसके तहत असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ कामगारों को रिटायरमेंट के बाद एक न्यूनतम पेंशन की गारंटी दी जाएगी। सरकार इस योजना को लागू करने के लिए काम कर रही है। इस योजना को बैंक से लिंक किया जाएगा, जिसमें इंश्योरेंस प्रीमियम की तरह एक सुनिश्चित समय पर हर साल अपने पेंशन के पैसे जमा करने होंगे जिसका फायदा घरेलू सहायकों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलेगा।

मारुति इको में अब दो एयरबैग्स भी मिलेंगे, 8000 रुपये कीमत बढ़ी

नयी दिल्ली : मारुति सुजुकी ने अपनी सबसे किफायती 7-सीटर कार ईको वैन कीमत में इजाफा किया है। कंपनी ने ईको में एयरबैग लगाए हैं। जिसके बाद इसके सभी नॉन-कार्गो वैरिएंट्स के कीमत 8,000 रुपये बढ़ा दी गई है। मारुति सुजुकी ईको 3 कार्गो वैरिएंट्स के साथ चार पैसेंजर और एक एम्बुलेंस वैरिएंट में आती है। मारुति सुजुकी की इस वैन की कीमत 4.3 लाख रुपये से शुरू होकर 7.29 लाख रुपये तक जाती है। इससे पहले कंपनी ने सितंबर में सेलेरियो को छोड़कर अपनी सभी कारों की कीमतों में 1.9 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की थी।

अब ज्यादा सुरक्षित होगी ईको
मारुति की कार ईको पेट्रोल और सीएनजी फ्यूल इंजन में आती है। इसमें 1196cc 5 एमटी G12B BS6 इंजन दिया है। पेट्रोल इंजन में 16.11 किलोमीटर प्रति लीटर और CNG में 20.88 किलोमीटर प्रति किलोग्राम की माइलेज मिलती है। इसकी लंबाई 3.675 मीटर, चौड़ाई 1.475 मीटर और ऊंचाई 1.825 मीटर है। इसमें रिवर्स पार्किंग सेंसर, चाइल्ड लॉक फॉर डोर्स, सीट बेल्ट रिमाइंडर जैसे फीचर्स मिलते हैं। अब इस कार में सेफ्टी के लिए डुअल एयरबैग भी मिलेंगे। इसमें 5 से 7 सीटों के ऑप्शन मिलता है।

नए नियम के चलते बढ़ाई गई कीमत
सरकार ने मार्च 2021 से सभी कारों के लिए पैसेंजर साइड एयरबैग जरूरी कर दिए थे, जिसके बाद सभी नई कारों को 1 अप्रैल, 2021 से इस नियम का पालन करना था। बिक्री के लिए उपलब्ध मौजूदा मॉडल्स को 31 अगस्त, 2021 तक इस ऑर्डर को पूरा करना था। पिछले कुछ समय में कारों में जरूरी सेफ्टी फीचर्स की लिस्ट में डुअल एयरबैग्स, एबीएस, रियर पार्किंग सेंसर्स, सीटबेल्ट रिमाइंडर्स और हाई-स्पीड अलर्ट सिस्टम को जोड़ा गया है, जिससे कीमत में इजाफा हो रहा है।

घरेलू औरतों को आमदनी का जरिया देकर मीशो ने लिखी सफलता की कहानी

विदित आत्रे और संजीव बरनवाल आईआईटी दिल्ली के सहपाठी हैं। 2015 में विदित इनमोबी कंपनी में और संजीव सोनी कंपनी में नौकरी करते थे, जब उन्होंने कुछ अपना शुरू करने का फैसला किया। जून 2015 में दोनों ने इस्तीफा देकर फाशनियर (Fashnear) ऐप बनाया। इस ऐप के जरिए लोग स्थानीय बाजारों के किसी स्टोर से कोई भी प्रोडक्ट खरीद सकते थे। तमाम कोशिशों के बाद भी किसी ने इनके ऐप का इस्तेमाल नहीं किया।

मीशो यानी मेरी शॉप का शॉर्ट फार्म

मार्केट रिसर्च के दौरान इन्हें एक रोचक बात पता चली। कई महिलाएं वॉट्सऐप के जरिए अपना खुद का फैशन ब्रांड चला रही हैं। इनमें ज्यादातर ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने शादी या बच्चा होने के बाद नौकरी छोड़ दी थी, लेकिन उनका फैशन सेंस अच्छा था। इनके रास्ते में पूंजी एक बड़ा रोड़ा थी। वो होलसेल मार्केट में जाकर प्रोडक्ट खरीदना चाहती थीं और उन्हें रीसेल करना चाहती थीं, लेकिन जब परिवार से पूंजी के लिए पूछतीं तो इनकार ही मिलता। विदित और संजीव ने नोटिस किया कि कई दुकानदार भी अपने कस्टमर को वॉट्सऐप ग्रुप में ऐड कर लेते हैं। कोई भी नया प्रोडक्ट आने पर वो   कस्टमर को भेजते हैं और वहीं से ऑर्डर मिल जाता है। उन्हें एहसास हुआ कि सोशल मीडिया पर भारत में 50 करोड़ लोग हैं। अगर इन्हें ई-कॉमर्स की तरफ मोड़ दिया जाए तो उनका काम बन सकता है। यहीं से फाशनियर को बदलकर मीशो उतारा गया। मीशो यानी मेरी शॉप।

खरीदारी के साथ मिला आमदनी का जरिया

मीशो के जरिए रीसेलर्स को कमाई का एक जरिया मिल गया जिसमें ज्यादातर महिलाएं थीं। ये एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया जिसमें प्रोडक्ट, लॉजिस्टिक सर्विस, पेमेंट इंटिग्रेशन और मार्केटिंग टूल सब एक जगह आसानी से मिलने लगे। मसलन कोई गृहिणी है। मीशो के प्रोडक्ट का कैटलॉग वो अपने कस्टमर्स को वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम पर आसानी से दिखा सकती है। वहां से ऑर्डर लेकर मीशो के थोक विक्रेता से ऑर्डर प्लेस कर सकती है। सामान सीधा कस्टमर के घर पहुंच जाएगा और बीच में गृहिणी 10-15% का कमीशन आसानी से हासिल कर सकती है। छोटे शहरों, कस्बों, छोड़े बिजनेस और गृहणियों के बीच ये कॉन्सेप्ट बेहद पॉपुलर हो रहा है।

बिजली की रफ्तार से बनी 35,000 करोड़ की कम्पनी

2016 में विदित और संजीव ने पहली बार 2 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई। इसके बाद अब तक 6 राउंड की फंडिंग में कुल करीब 8 हजार करोड़ की फंडिंग जुटाई है। लॉन्चिंग के महज 6 साल में ही मीशो की वैल्युएशन करीब 35 हजार करोड़ रुपये पहुंच गई है। मीशो ने 2020 में 315 करोड़ रुपये राजस्व जुटाये हैं।

तीन सोशल कॉमर्स कंपनियों से मीशो का मुकाबला

मीशो का मुकाबला इस वक्त तीन सोशल कॉमर्स कंपनियों से हैः- डील शेयर, ग्लो रोड और शॉप 101। इन तीनों ऐप्स का मॉडल मीशो जैसा ही है। तीनों ने अच्छी खासी फंडिंग जुटा ली है। अमेजन और ई-बे का भी भारत के रीसेल मार्केट में एक बड़ी हिस्सेदारी है। भारत के बढ़ते ई-कॉमर्स मार्केट में मीशो ने भले ही पिछले कुछ सालों में अच्छी विकास दर दर्ज की हो, लेकिन आने वाला वक्त बेहद चुनौती भरा है।

10 करोड़ लोगों को मीशो पर जोड़ने की चाहत

सोशल कॉमर्स के बाजार को लेकर शुरुआत में इन्वेस्टर्स आश्वस्त नहीं थे, लेकिन अब इस तरफ रुझान बढ़ रहा है। मीशो के फाउंडर विदित का कहना है कि वो अपने ऐप पर 10 करोड़ छोटे बिजनेस और एंटरप्रेन्योर को जोड़ना चाहते हैं। उदित का कहना है कि वॉट्सऐप हमारे लिए सिर्फ गो टु मार्केट स्ट्रैटजी थी। अब हम यूट्यूब और अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी काम कर रहे हैं। इसका असर भी देखने को मिल रहा है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

जगततारिणी ने भारत को बसाया मन में, पर्थ में खड़ा किया वृंदावन

वृन्दावन : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में ऑस्ट्रेलियाई महिला जगततारिणी का जिक्र किया। पीएम ने उनकी कृष्ण भक्ति के लिए बहुत सराहना की। जगततारिणी ने वृंदावन में काफी वक्त बिताया। पीएम ने वृंदावन की तारीफ करते हुए कहा, वृंदावन के बारे में कहा जाता है कि ये भगवान के प्रेम का प्रत्यक्ष स्वरूप है। हमारे संतों ने भी कहा है–यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा मति मोर। वृंदावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ और। आइए जानते हैं कि कौन हैं जगततारिणी ..
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट के लिए चर्चित पर्थ शहर में जगततारिणी ने सेक्रेड इंडिया गैलरी बनाई है जो बेहद मशहूर है। मेलबर्न में पैदा हुई जगततारिणी को इसकी प्रेरणा उन्हें तब मिली, जब वह भारत आईं और कृष्ण प्रेम में 13 साल वृंदावन में रहीं। जगततारिणी अपने देश लौटने के बाद भी वृंदावन को भूल नहीं पाईं। ऐसे में उन्होंने पर्थ में एक वृंदावन खड़ा कर दिया। यहां आने वाले लोगों को भारत के तीर्थ और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। वहां पर एक कलाकृति ऐसी भी है, जिसमें भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा रखा है। उन्हें लोग जगततारिणी माता भी कहते हैं।
थिएटर और आर्ट की खातिर घर से कदम निकले तो फिर थमे नहीं
जगततारिणी वैसे तो मेलबर्न में ही पली-बढ़ीं, मगर 21 साल की उम्र में वह थिएटर और आर्ट के अपने शौक की खातिर सिडनी चली गईं। यह उनका घर से बाहर पहला कदम था। इसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पूरी दुनिया होते हुए वह भारत आईं। उन्होंने 1970 में वृंदावन को अपना ठिकाना बना लिया। उन्हें यहां के लोग, परंपराएं, खानपान, कला ने इतना प्रभावित किया कि वह इसी में रम गईं। वह इस्कॉन संस्था से भी जुड़ गईं।
अपनी भक्ति और कामकाज से लोगों के दिलों में बनाई जगह
1980 के दशक में यह बेहद मुश्किल था कि कोई पश्चिमी देश की महिला वृंदावन की संस्कृति में अपनी पैठ बना सके, मगर उस दौर में भी जगततारिणी ने अपने कामकाज से लोगों के दिलों में जगह बना ली और सबका भरोसा जीता। उन्होंने वृंदावन आने वाले लोगों को वहां की संस्कृति के बारे में बताना शुरू किया और लोगों को इसकी महिमा के बारे में बड़े मन से बतातीं। उन्होंने देश के दूसरे धार्मिक स्थानों की भी यात्राएं कीं। 1996 में वह और उनका परिवार वापस ऑस्ट्रेलिया लौट गया। मगर, उन्होंने अपने देश पहुंचकर भी प्रेम भक्ति की अलख जगाए रखी।

जानें उन महिलाओं को जिन्होंने लड़ी बराबरी की लड़ाई

दुनिया में सबसे अधिक महिलाओं की आबादी वाला भारत दूसरा देश है
संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे, जिनमें से 15 महिलाएं थीं

भारत ने औपचारिक रूप से 26 नवंबर 1949 को ही संविधान को अपनाया था। हालांकि, इसे लागू 26 जनवरी, 1950 को किया गया था। देश के संविधान निर्माता डॉ. भीम राव अंबेडकर को सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि संविधान को मूल रूप देने वाली समिति के 389 सदस्यों में 15 महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने दुनिया के सबसे लंबे लिखित संविधान और समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। महिलाओं के हक में मजबूती से आवाज उठाई। जानें उन महिलाओं और उनके योगदान के बारे में…
सुचेता कृपलानी: पहली महिला मुख्यमंत्री
आजादी के मतवालों में सुचेता कृपलानी का नाम भी शामिल है। 25 जून, 1908 को हरियाणा के अंबाला में जन्मीं सुचेता को विशेष रूप से 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के लिए याद किया जाता है। आजादी के बाद वे सक्रिय राजनीति में आ गईं। पहले लोकसभा और फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीते। साल 1963 में प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। सुचेता कृपलानी आजाद भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं।

राजकुमारी अमृत कौर: एम्स बनवाने वाली स्वास्थ्य मंत्री
आजाद भारत की पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री और महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाली राजकुमारी अमृत कौर भी संविधान बनाने वाली सभा की सदस्य थीं। अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी, 1887 को मौजूदा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुआ था। वे ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई कर साल 1918 में स्वदेस लौटीं। स्वतंत्रा संग्राम में अहम योगदान देने वाली कौर ने महात्मा गांधी की सेक्रेटरी के तौर पर 16 साल तक काम किया। राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की नींव रखी। दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज बनवाया। इंडियन लेप्रसी एसोसिएशन, चाइल्ड वेलफेयर काउंसिल और इंटरनेशन रेडक्रास सोसायटी आदि संस्थाओं की भारत में शुरुआत करने के लिए भी कौर को याद किया जाता है।

विजय लक्ष्मी पंडित: यूएन जनरल असेंबली की पहली महिला अध्यक्ष
पं. जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित की बहन का जन्म 18 अगस्त, 1900 को प्रयागराज में हुआ था। उन्होंने आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया। साल 1932-1933, 1940 और 1942-1943 में जेल गईं। संविधान सभा की सदस्य के तौर पर औरतों की बराबरी से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखी और अपनी बातें मनवाई भीं। विजय के राजनीतिक सफर की शुरुआत इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव से हुई थी। आजादी के बाद वे रूस, अमेरिका और मैक्सिको में भारत की राजदूत रहीं। इसके बाद, साल 1953 में यूएन जनरल असेंबली की पहली महिला अध्यक्ष बनीं और आठवें सत्र की अध्यक्षता भी की।

अम्मू स्वामीनाथन: संविधान सभा में मद्रास की प्रतिनिधि
अम्मू स्वामीनाथन एक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थीं, जिनका जन्म 22 अप्रैल, 1894 में केरल के पालघाट में हुआ था। वे 13 भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनकी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई। 14 साल की उम्र में उनकी शादी उनसे 20 साल बड़े डॉ. सुब्रमा स्वामीनाथन से हुआ था। पति ने घर में ट्यूटर रखकर उन्हें पढ़ाया। उसके बाद वे अंग्रेजी बोलने लगीं और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगीं। कुछ वक्त बाद वे अम्मू आंदोलन में ​सक्रिय हुईं। साल 1946 में वे संविधान सभा में मद्रास की प्रतिनिधि थीं। 24 नवंबर, 1949 को डॉ. भीम राव अंबेडकर की ओर से तैयार किए संविधान प्रारुप पर चर्चा के दौरान अम्मू ने अपने भाषण में कहा था, ”भारत के बारे में दुनिया वालों का कहना है कि भारत ने महिलाओं को समान अधिकार नहीं दिए हैं, लेकिन अब हम कह सकते हैं कि हम भारतीयों ने जब अपने संविधान का निर्माण किया, तब हर नागरिक के साथ महिलाओं को भी समान अधिकार दिए हैं।”

सरोजिनी नायडू: पहली महिला राज्यपाल
देश की पहली महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू का जन्म 23 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में हुआ था। नायडू ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। सरोजिनी नायडू ने संविधान निर्माण में भी अहम योगदान दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाली थी।

कमला चौधरी: कहानियों में उठाई महिलाओं की आवाज
कमला चौधरी का जन्म 22 फरवरी, 1908 को लखनऊ के एक संपन्न परिवार में हुआ था। इसके बावजूद शिक्षा के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। कमला साल 1930 में गांधी से जुड़ी और नागरिक अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने सक्रियता से हिस्सा लिया। 50वें सत्र में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष थी। 1970 के दशक में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गई थी। कमला चौधरी लेखिका थीं, उन्होंने अपनी कहानियों के जरिये महिलाओं को समाज में आगे लाने का काम किया था।
बेगम एजाज रसूल: सभा की इकलौती मुस्लिम सदस्य
बेगम एजाज रसूल का जन्म 2 अप्रैल 1909 को पंजाब के संगरूर जिले के एक राजसी परिवार में हुआ था। उन्होंने जमींदार नवाब एजाज रसूल से शादी की थी। वह अपने पति के साथ अल्पसंख्यक समुदाय की महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञ बनकर उभरीं और मुस्लिम लीग की सदस्य भी थीं। बेगम एजाज संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम सदस्य थीं। साल 1950 में मुस्लिम लीग भंग होने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गईं। 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गईं।

लीला रॉय: हिंदू कोड बिल की पैरवी की
संविधान सभा की सदस्य लीला रॉय का जन्म असम के गोलपाड़ा जिले में 2 अक्तूबर, 1900 को हुआ था। साल 1923 में दीपाली संघ और स्कूलों की स्थापना कर देश भर से चर्चा बटोरी। साल 1937 में वह कांग्रेस में शामिल हो गईं। खास बात यह रही कि लीला को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बनाई महिला समिति में सदस्य बनाया गया था। 1946 में लीला रॉय संविधान सभा में शामिल हुईं और बहस में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने हिंदू कोड बिल के तहत महिलाओं को संपत्ति का अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे मामलों की पैरवी की थी।

हंसा मेहता: यूएन के यूनिवर्सल डिक्लेरेशन में करवाया संशोधन
संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली हंसा जीवराज मेहता का जन्म 3 जुलाई, 1887 को बड़ौदा में हुआ था। वह बड़ौदा के दीवान नंदशंकर मेहता की बेटी थीं। साल 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं। बाद में उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। हंसा को यूएन के यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट में ‘सभी पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं’ को संशोधित करवाकर ‘सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं’ करवाने के लिए भी जाना जाता है।

रेणुका रे: बंगाल में बनीं महिलाओं की आवाज
संविधान सभा की सदस्य रेणुका रे आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की सदस्य चारुलता मुखर्जी की बेटी थीं। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए की पढ़ाई पूरी की। साल 1934 में ऑल इंडिया वुमन्स कांग्रेस की कानूनी सचिव के रूप में उन्होंने ‘भारत में महिलाओं की कानूनी विकलांगता’ नामक एक दस्तावेज प्रस्तुत किया। रेणुका रे परिश्चम बंगाल विधानसभा की सदस्य और मंत्री रहीं। उन्होंने ही बंगाल में अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वयक परिषद का गठन किया था।

दुर्गाबाई देशमुख: कानूनी पहलुओं में दिया विशेष योगदान
12 साल की उम्र से ही असहयोग आंदोलन से जुड़ने वाली दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई, 1909 को आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में हुआ था। दुर्गाबाई ने देश को आजाद कराने के साथ ही समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भी लड़ाई लड़ी। दुर्गाबाई नमक सत्याग्रह का भी हिस्सा बनीं। वे वकील थीं। संविधान के कानूनी पहलुओं में उनका विशेष योगदान रहा। दक्षिणी भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बालिका हिंदी पाठशालाएं शुरू कीं। आंध्र महिला सभा की स्थापना की। आजादी के बाद दुर्गाबाई चुनकर संसद पहुंचीं।

दक्षिणानी वेलायुधन: सभी की सबसे युवा सदस्य और इकलौती दलित महिला
संविधान सभा की सबसे युवा सदस्य दक्षिणानी वेलायुधन का जन्म 4 जुलाई, 1912 में कोच्चि में हुआ था। वे संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला थीं। संविधान सभा की पहली बैठक में वेलायुधन ने कहा था, ‘संविधान का कार्य इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग भविष्य में किस तरह का जीवन जिएंगे। मैं आशा करती हूं कि समय के साथ ऐसा कोई समुदाय इस देश में न बचे जिसे अछूत कहकर बुलाया जाए।’

पूर्णिमा बनर्जी: उठाईं किसानों और ग्रामीणों की समस्याएं
संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली पूर्णिमा बनर्जी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी की सचिव थी। पूर्णिमा यूपी में महिलाओं के उस समूह में शामिल थीं, जो आजादी की लड़ाई में सबसे आगे थीं। उन्हें सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी के लिए गिरफ्तार किया गया था। वे किसान सभाओं, ट्रेड यूनियनों की व्यवस्था और ग्रामीणों की समस्या से जुड़े मुद्दे उठाती थीं।

एनी मस्कारीन: केरल की पहली महिला सांसद
संविधान सभा की सदस्य और स्वतंत्रता सेनानी एनी मस्कारीन का जन्म 6 जून, 1902 को ​केरल के तिरुवनंतपुरम के एक कैथोलिक परिवार में हुआ था। एनी त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल होने वाली पहली महिला थीं। राजनीतिज्ञ गति​विधियों के चलते उन्हें साल 1939 से 1947 के बीच कई बार जेल में डाला गया। साल 1951 के आम चुनावों में वे लोकसभा की सदस्य चुनी गईं। वह केरल की पहली महिला सांसद थीं।

मालती चौधरी: नमक सत्याग्रह ​में लिया हिस्सा
संविधान सभा की सदस्य मालती चौधरी का जन्म 26 जुलाई, 1904 को पूर्वी बंगाल में हुआ था, जो अब बांग्लादेश है। वे ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नाबकृष्ण चौधरी की पत्नी थीं। 16 साल की उम्र में मालती को शांति​ निकेतन भेजा गया, जहां उन्होंने विश्व भारती में दाखिला लिया। मालती ने नमक सत्याग्रह में भाग लिया।
(साभार – दैनिक भास्कर)

‘चंद्रकला’ छिरकैं रँग अंगन आपस माँहि करै चित चोरी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, हिंदी साहित्य के मध्ययुगीन इतिहास की बहुत सी स्त्री रचनाकारों की कथा मैंने आपको सुनाई है जिन्होंने अपने साहित्यिक अवदान से साहित्य को समृद्ध किया लेकिन उन्हें इतिहास में पर्याप्त समादर नहीं मिला। समय के साथ इनकी रचनाओं और परिचय को लोगों ने भुला दिया। वहीं कुछ रचनाकार ऐसी भी हैं जिन्होंने अपने समय में काफी नाम कमाया लेकिन बाद की पीढ़ी ने उनके अवदानों को याद नहीं रखा। ऐसी रचनाकारों के साहित्यिक अवदान के बारे में जानने और उसे साहित्य के पाठकों के समक्ष लाने का प्रयास अवश्य होना चाहिए।
साहित्य सृजन के क्षेत्र में राजघराने की स्त्रियों का अपना अलग स्थान है लेकिन उल्लेखनीय बात यह है कि मध्युगीन समाज में हाशिए पर पड़ी कुछ स्त्रियाँ भी सृजनरत थीं जो अपने काव्य -कौशल से चमत्कृत करती हैं। इन स्त्रियों में एक महत्वपूर्ण नाम है चंद्रकला बाई का जो दासी पुत्री थीं लेकिन उन्होंने अपनी रचनात्मकता के बलबूते साहित्य जगत में सम्मानजनक आसन अर्जित किया। वह समस्यापूर्ति में सिद्धहस्त थीं।
चंद्रकला बाई का जन्म बूँदी राज्य में हुआ था। वह बूँदी के कवि और दीवान कविराज राव गुलाब सिंह की दासी की बेटी थीं। उनके जन्म काल का ठीक- ठीक पता तो नहीं है लेकिन अनुमानतः उनका जन्म संवत् 1923 के लगभग हुआ था और मृत्यु संवत् 1960- 1965 के बीच हुई थी। गुलाब राव एक अच्छे कवि थे। उन्हीं की संगति में चंद्रकला बाई काव्य रचना की ओर प्रवृत्त हुईं और निरंतर अभ्यास से अच्छी कविता करने लगीं। उस दौर में समस्या पूर्ति का बहुत चलन था। चंद्रकला जी विभिन्न काव्य समाज या संगठनों की ओर से निकलने वाली काव्य समस्याओं की पूर्ति किया करती थीं। उनकी काव्य पूर्तियां उस समय की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं यथा- काशी- कविमण्डल, रसिक मित्र, काव्य -सुधार, कवि और चित्रकार आदि में प्रकाशित होती रहती थीं। उन्हें उस समय के बहुत से काव्य संस्थाओं द्वारा सम्मानित तथा उपाधियों से विभूषित भी किया गया था। अवध- प्रांत के सीतापुर जिले में अवस्थित बिस्वा गाँव के एक काव्य संगठन ने 30 जून 1838 ई. में उन्हें “वसुंधरा रत्न” की पदवी प्रदान की थी। वस्तुत: अपने समय में साहित्य पटल पर चंद्रकला बाई ने काफी प्रसिद्धि अर्जित की थी। उस समय के अन्यान्य ‌प्रतिष्ठित कवियों के साथ उनके संबंध काफी अच्छे थे तथा उनके साथ पत्र- व्यवहार भी था। पं. मंगलदीन उपाध्याय को लिखे पत्र में उन्होंने अपना परिचय देते हुए लिखा था-
“बरस पंच-दश की वय मेरी।
कवि गुलाब की हूँ मैं चेरी।
बालहिं तें कवि संगति पाई।
तातें तुक जोरन मोहिं आई।”
कहा जाता है कि प्रतापगढ़ के राजा प्रतापबहादुर सिंह के राजकवि पं बलदेव प्रसाद अवस्थी उर्फ द्विज बलदेव जो समस्या पूर्ति में अत्यंत दक्ष थे, की कविता से चंद्रकला जी बहुत प्रभावित हुईं थीं एवं उन्होंने कवि को कई पत्र भेजें और उनसे बूंदी आने का अनुरोध भी किया था। एक पत्र में तो उन्होंने एक कवित्त के माध्यम से अपने ह्रदय के भावों को अभिव्यक्त किया। वह कवित्त इस प्रकार है-
“दीन दयाल दया कै मिलो, दरसै बिनु बीतत है समय सोचन।
सुद्ध सतोगुण ही के सने ते, विशंकित सूल सनेह सकोचन।।
तोर दियो तरु धीर- कगार के, ह्वै सरिता मनो बारि विलोचन।
चंद्रकला के बने बलदेव जी, बावरे से महा लालची लोचन।।”
हालांकि चंद्रकला जी के अनुरोध का मान तो कवि ने नहीं रखा लेकिन उद्धृत कवित्त को पढ़कर वह अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने कुल बीस पृष्ठों की “चंद्रकला” नामक एक काव्य पुस्तिका की रचना की। यह पुस्तिका संवत 1953 में तैयार हुई। इस की विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक छंद में चंद्रकला शब्द का प्रयोग हुआ है। कहा जा सकता है कि यह एक कवि का दूसरे कवि के प्रति स्नेह- समर्पण है।
चंद्रकला जी ने प्रचुर मात्रा में काव्य रचना की है। उनकी मुख्य पुस्तकों के नाम हैं- करुणा -शतक, रामचरित्र, पदवी -प्रकाश, महोत्सव प्रकाश आदि। उनकी रचनाओं के संबंध में “स्त्री कवि कौमुदी में पं ज्योति प्रसाद मिश्र “निर्मल” लिखते हैं- “इनकी रचनाओं को यदि हम समालोचना की कसौटी पर कसते हैं तो ये इतनी खरी नहीं उतरतीं जितनी कि होनी चाहिएँ। तो भी रचना रुचिर और अच्छी जान पड़ती है। खासकर बिसवां की कवि-मण्डली ने इन्हें. उत्साह और बढ़ावा देकर इनके नाम का महत्व बढ़ा दिया था। हमारे पास इनके 1000 छंद विद्यमान हैं जो बहुत ही उत्तम और भाषा-भाव से परिपूर्ण हैं।”
जिस दौर में साहित्य -क्षेत्र में स्त्रियाँ कम ही दिखाई देती थीं, उस काल में चंद्रकला बाई जी की सृजनशीलता निस्संदेह सराहनीय है। अपने समय में उन्होंने साहित्य जगत में जो प्रसिद्धि अर्जित की थी इससे भी उनकी काव्य प्रतिभा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। उनके काव्य में राधा कृष्ण के रूप में नायक नायिका के प्रेम का सुंदर चित्रण हुआ है। ‌ हास- विलास, खुशी और उल्लास तथा संयोग श्रृंगार का अत्यंत मनभावन चित्रण चंद्रकला जी ने किया है। साथ ही वियोग की वेदना को भी मार्मिकता के साथ अंकित किया है। प्रस्तुत कवित्त में होली का ह्रदयग्राही वर्णन हुआ है।
“बाजत ताल मृदंग उमंग उमंग भरी सखियाँ रँग बोरी ।

साथ लिए पिचको कर मांहि फिरैं चहुँघा भरि केसर घोरी ।।

‘चंद्रकला’ छिरकैं रँग अंगन आपस माँहि करै चित चोरी ।

श्री वृषभानु महीपति-मंदिर लाल-लली मिलि खेलत होरी ।।”
नायक -नायिका के बीच की हँसी- ठिठोली और मान -अभिमान का वर्णन भी चंद्रकला बाई ने अत्यंत सरसता से किया है। अलंकारों के प्रयोग में भी वह सिद्धहस्त हैं। उनकी कविता को पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि भाव चित्रण में तो वह कुशल हैं ही, भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है। प्रस्तुत कवित्त में मानलीला का वर्णन करते हुए रूपक अलंकार के सहज प्रयोग से उन्होंने कवित्त को सरस बना दिया है जिसे पढ़ते ही होठों पर बरबस मुस्कान आ जाती है। रूठे हुए कृष्ण को उनके अपराध का दंड देने के लिए राधिका यौवन की फौज लेकर आक्रमण करने को तत्पर हैं। अब इस फौज के समक्ष कौन सा प्रेमी अपनी पराजय स्वीकार नहीं करेगा। कवित्त देखिए-
“ऐहौ ब्रजराज कत बैठे हौ निकुंज माँहि,

कीन्हौ तुम मान ताकी सुधि कछु पाई है ।

साते ब्रषभानुजा सिँगार साजि नीकि भाँति ,

सखियाँ सयानी संग लेय सुखदाई है ।।

चद्रकला लाल अवलोको और मारग की,

भारी भय दायिनी अपान भीर छाई है ।

रावरो गुमान अति बल अति भट मानि,

जोबन को फौज लैके मारिबे को धाई है ।। ”
वियोग शृंगार का एक पद देखिए जिसमें वियोगिनी राधिका के एकनिष्ठ प्रेम, व्याकुलता और अधीरता का वर्णन गहराई से हुआ है-

“ध्यान धरे तुम्हरो निसि बासर नाम तुम्हार रटै बिसरै ना ।

गावत है गुन प्रेम-पगो मन जोवत है छिन दीठि टरै ना ।

चन्द्रकला वृषभानु-सुता अति छीन भई तन देखि परै ना ।

वेगि चलो न बिलम्ब करौ अति ब्याकुल है वह धीर धरै ना।”
प्रकृति का भी अति सुंदर वर्णन कवयित्री ने किया है। संयोग और वियोग दोनों ही अवस्थाओं में प्रकृति का सहज स्वाभाविक सौंदर्य अलग- अलग प्रभाव डालता है। संयोग के समय जहाँ नायक -नायिका के उल्लास में प्रकृति भी उल्लसित और सुरभित जान पड़ती है वहीं वियोग के समय उसका सौंदर्य न केवल ह्दय को दग्ध करता है बल्कि वियोग को भी कई गुणा बढ़ा देता है। नायिका प्राकृतिक सौंदर्य को निरखते हुए नायक के वियोग का अनुभव गहराई से करती है। सुंदर, सुवासित और सजी हुई फुलवारी नायिका को वियोग के कारण यम की सवारी की तरह लगती है। रूपक अलंकार के कुशल प्रयोग ने कविता के सौन्दर्य में तो वृद्धि की ही है नायिका की व्याकुलता को भी तीव्रता से व्यंजित किया है।
” कुसुम समूह खिले विटप लतान माँहि,

सोई ताहि लागि रही भट बलवन्त की ।

पल्लव नवीन लिए कर बिन म्यान असि,

कोकिल अवाज ध्वनि दुंदुभी अनंत की ।।

‘चद्रकला’ चारों ओर भँवर नकीब फिरैं

आली देखइ देत ये दुहाई रति-कंत की ।

बिन घनश्याम मोहिं कदन करनवारी ,

जम की सवारी फुलवारी है बसन्त की ।।
चंद्रकला बाई की कविताओं का भावपक्ष और कलापक्ष दोनों ही समृद्ध है। पठनीयता की दृष्टि से भी इनका महत्व है। पाठकों के ह्दय को अपने कवित्तों से सहजता से प्रभावित करनेवाली चंद्रकला बाई का साहित्यिक अवदान अविस्मरणीय है।

भवानीपुर कॉलेज को उत्कृष्ट शिक्षा और कौशल उद्यम में ‘एडुमीट अवार्ड्स 2021’

कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज को उत्कृष्ट शिक्षा और कौशल उद्यम के क्षेत्र में एडुमीट अवार्ड्स 2021 प्रदान किया गया। एडुमीट अवार्ड्स 2021 शिक्षा प्रणाली में उन सभी परिवर्तनों और नवाचारों के विषय में है जो वर्तमान समय की मांग है। भवानीपुर कॉलेज में अॉन-लाइन और अॉफ आइन दोनों ही क्षेत्र में विद्यार्थियों को शिक्षा दी जा रही है।
हाईब्रिड कक्षाओं के माध्यम से कॉलेज के साढ़े दस हजार विद्यार्थियों को सभी विभागों बीकॉम, बीए, बीबीए और एमकॉम आदि विषयों पर फैकल्टी द्वारा शिक्षा दी जा रही है। कोरोना के नियमों का पालन करते हुए जो विद्यार्थी उपस्थित होते हैं वे फिजिकली कक्षा में शिक्षक और शिक्षिकाओं द्वारा पढ़ रहे हैं और उसी समय जो नहीं आ पाते हैं वे अॉन-लाइन अपने घर में पढ़ रहे हैं। अन्य कई प्रकार से सेमिनार, वर्कशॉप और अॉन-लाइन लेक्चर्स, प्लेसमेंट और स्कील एजूकेशन प्रदान की जाती है जिससे विद्यार्थियों का शिक्षा के प्रति रुझान बढ़े। एनसीसी एनएसएस टीम भी कई सामाजिक कार्यों के द्वारा विद्यार्थियों को एक नया आयाम दे रही है।
द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज को एडुमीट अवार्ड्स 2021 में उत्कृष्टता और कौशल उद्योग का पुरस्कार मिला। कॉलेज के द डीन ऑफ स्टूडेंट अफेयर्स प्रो दिलीप ने विद्यार्थियों की उपस्थिति में यह सम्मान प्रो के. के. अग्रवाल चेयरमेन नेशनल बोर्ड अॉफ एक्रेडिटेशन द्वारा प्राप्त किया जिसकी रिपोर्ट सिद्धि पंचोली ने प्रस्तुत की।इस अवसर पर एसोचैम हायर एजुकेशन कौन्सिल पूर्व के चेयरमैन मनोज जोशी ने स्वागत भाषण दिया। अन्य विशिष्ट अतिथियों में आलोक टिबरेवाल उपाध्यक्ष एसोचेम स्कूल एजुकेशन कौन्सिल पूर्व, तमाल मुखर्जी एसोचेम स्कूल एजुकेशन कौन्सिल पूर्व, प्रदीप अग्रवाल उपाध्यक्ष एसोचेम हायर एजुकेशन कौन्सिल पूर्व, डॉ मधु चित्कारा पूर्व चांसलर चित्कारा युनिवर्सिटी पंजाब और क्षेत्रीय वाइस को चेयर एसोचैम एडुकेशन कौन्सिल उत्तर और प्रो सुरंजन दास वाइसचांसलर जादवपुर युनिवर्सिटी ने शिक्षा विषयक वक्तव्य दिए। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

साहित्य अकादमी में मनायी गयी सत्यजीत राय जयन्ती

कोलकाता : साहित्य अकादमी ने फिल्मकार सत्यजीत राय की जयन्ती मनायी। इस अवसर पर अकादमी ने दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया जिसका उद्घाटन मशहूर फिल्मकार गौतम घोष ने किया। उन्होंने सत्यजीत राय के समय प्रबन्धन, अनुशासन, ज्ञान पाने की उत्कंठा समेत अन्य मुद्दों पर बात रखी। शिक्षाविद् प्रो. चिन्मय गुहा ने मूल वक्तव्य रखा और राय की फिल्मों के मानवीय पक्ष पर बात की। स्वागत भाषण अकादमी के सचिव के. श्रीनिवास राव ने दिया। प्रथम सत्र में देबाशीष देव, अभिजीत गुप्ता और अनिन्द्य सेनगुप्ता ने सत्यजीत राय की फिल्मों के कला पक्ष पर बात रखी। इस दो दिवसीय सेमिनार में असीम शेखर पाल, शिलादित्य सेन, पल्लव मुखोपाध्याय समेत कई अन्य विद्वानों ने विचार व्यक्त किये। अकादमिक सत्र का प्रारूप साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव देवेन्द्र कुमार देवेश और प्रोग्राम ऑफिसर मिहिर कुमार साहू ने तैयार किया।

बिड़ला हाई स्कूल में बाल दिवस समारोह

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में बाल दिवस समारोह डिजिटल माध्यम पर मनाया गया। स्कूल के फेसबुक पेज पर कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया गया। इस वर्ष कार्यक्रम की थीम ‘बैक टू स्कूल’ यानी ‘स्कूल में वापस’ थी। कार्यक्रम की शुरुआत सूर्य की वन्दना से हुई और प्रिंसिपल लवलीन सैगल ने सन्देश दिया। बीएचएस के शिक्षकों ने संगीत और नृत्य प्रस्तुत किया। शिक्षिका काकोली बनर्जी और शिक्षक आर. सेनगुप्ता ने सुमधुर संगीत गाये। इस मौके पर नाटक भी प्रस्तुत किया गया । विद्यार्थियों ने अपने शिक्षकों की सभी प्रस्तुतियों का आनन्द उठाया।