कोलकाता । जाने-माने चित्रकार वसीम कपूर (71) का सोमवार को कोलकाता स्थित उनके निवास स्थल में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सोमवार सुबह उन्हें अचानक ब्रेन स्ट्रोक हुआ। अस्पताल ले जाने से पहले ही उनका निधन हो गया। उन्होंने आगे बताया कि वसीम कपूर को कोई बीमारी नहीं थी हालांकि कोरोना के कारण उन्होंने बाहर निकलना बंद कर दिया था। वसीम कपूर ने बालीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन, बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु समेत कई हस्तियों की तस्वीरें उकेरी थीं। बंगाल विधानसभा में उनके द्वारा तैयार किया गया ज्योति बसु का तैल चित्र लगा हुआ है। वसीम कपूर का जन्म 1951 में लखनऊ में हुआ था लेकिन पढ़ाई के सिलसिले में वे कोलकाता आ गए थे। इसके बाद उन्होंने इसी शहर को अपनी कर्मभूमि भी बना लिया। कोलकाता की चित्रकारी जगत में वे चिर-परिचित नाम थे। वसीम कपूर ‘आवाज’ नामक संगठन के राज्य अध्यक्ष भी थे।
प्रख्यात कार्टूनिस्ट पद्मश्री नारायण देवनाथ का निधन
कोलकाता । कार्टूनिस्ट और बंगाली कॉमिक किरदार ‘ बंतुल द ग्रेट’ , ‘ हांडा-भोंदा’ और ‘नोंते फोंते’ के रचयिता नारायण देबनाथ का गत मंगलवार की सुबह कोलकाता के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। अस्पताल के सूत्रों ने यह जानकारी दी। देबनाथ को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था और वह 97 साल के थे। उन्हें 24 दिसंबर को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था और वह जीवनरक्षक प्रणाली (वेंटिलेटर) पर थे. सीएम ममता बनर्जी ने उनके निधन पर शोक जताया। देवनाथ की कामिक्स स्ट्रिप्स को बंगाल में बच्चों के बीच एक पंथ का दर्जा प्राप्त है। बंगाली कामिक्स के इलस्ट्रेटर और ‘हांडा भोंडा’, ‘बातूल द ग्रेट’ तथा ‘नोनते फोनते’ के रचयिता देवनाथ को 2013 में पश्चिम बंगाल सरकार के सर्वोच्च सम्मान बंग भूषण से भी सम्मानित किया गया था। शारीरिक अस्वस्थता के कारण देवनाथ पिछले दिनों पद्मश्री पुरस्कार लेने भी दिल्ली में राष्ट्रपति भवन नहीं जा सके थे। इसके बाद बीते 13 जनवरी को ही बंगाल सरकार में मंत्री अरूप राय और राज्य के गृह सचिव बीपी गोपालिका ने अस्पताल जाकर उन्हें पद्मश्री पुरस्कार भेंट कर सम्मानित किया था। देवनाथ को बीते 24 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शरीर में कमजोरी समेत उनका हीमोग्लोबिन कम था। साथ ही वह उम्रजनित समेत अन्य बीमारियों से जूझ रहे थे।
खाने के पैकेट बनाने में इस्तेमाल होगा री-साइकिल्ड प्लास्टिक
एफएसएएआई ने जारी किया आदेश
नयी दिल्ली । फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने प्लास्टिक कचरे को दूर करने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है। इस निर्णय से न सिर्फ प्लास्टिक वेस्ट को कम किया जा सकेगा बल्कि संभव है आने वाले दिनों में प्लास्टिक पैक्ड खाद्य पदार्थ की कीमतों में भी कुछ कमी आए। हालांकि इस पर अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई आकलन नहीं हुआ कि इस फैसले से कीमतों पर कितना असर पड़ सकता है।
एफएसएएआई ने एक आदेश में कहा है कि प्लास्टिक बोतल में इस्तेमाल होने वाले पेय या खाद्य पदार्थों की बोतलों को री-साइिकल करके दोबारा से खाद्य पदार्थों को पैक करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। शीतल पेय की बोतल, पानी की बोतल, दूध की बोतल सहित कई अन्य खाद्य पदार्थों की बोतलों को इस्तेमाल के बाद री-साइिकल किया जा सकेगा।
खुले में फेंक दी जाती हैं प्लास्टिक की बोतलें
अब भी कुछ बोतलों को री-साइिकल किया जाता था, लेकिन खाद्य पदार्थ में इसका इस्तेमाल नहीं होता था, इसकी वजह से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक बोतल खुले में फेंक दी जाती थी, जिसकी वजह से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था। प्लास्टिक बोतलों में केमिकल्स या अन्य ऐसे पदार्थ होते हैं जो खतरनाक हैं उसे री-साइकिल करके खाद्य-पदार्थों को पैक्ड करने में इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी। वैज्ञानिक आधार पर भी यह देखा गया है कि पीईटी (पॉलीएथिलीन टेरिफ्थेलैट यानी प्लास्टिक बोतल) में कोई हानिकारक रसायन नहीं पाया गया है।
खाद्य पदार्थों में 40 प्रतिशत सिंगल यूज प्लास्टिक
एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण सिंघल ने बताया कि देश में जो खाद्य पदार्थ मिल रहे हैं उसमें 40 फीसदी से ज्यादा सिंगल यूज प्लास्टिक है। प्लास्टिक बोतल को री-साइकिल करने से प्रदूषण को भी नियंत्रित करने में कुछ हद तक मदद मिलेगी। प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2018 के तहत सिंगल यूज प्लास्टिक को री-साइकिल करने पर रोक लगा दी गई थी। इसकी वजह से खाद्य-पदार्थों के पैकेट में उस प्लास्टिक का दुबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता था। अब रूल्स में बदलाव कर दिए गए हैं।
जापान के मंदिर से मिले कलश में थीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां?
क्यों नहीं हुआ डीएनए टेस्ट, परिजन उठा रहे सवाल
कोलकाता: जापान की राजधानी टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा जापानी भाषा में लिखे गए एक पत्र के अनुवाद से पता चला है कि मंदिर ने भारतीय अधिकारियों को उन अस्थियों की डीएनए जांच की अनुमति दी थी जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बताई जाती हैं। पत्र का नया अनुवाद उस दावे को खारिज करता है कि मंदिर इस मामले में मौन रहा, जिससे न्यायमूर्ति एमके मुखर्जी आयोग की जांच के बाद उसके इस निष्कर्ष पर संदेह पैदा कर दिया है कि ये अस्थियां नेताजी की नहीं थीं।
भारत सरकार को 2005 में टोक्यो के मुख्य पुजारी के जापानी भाषा में लिखे गए पत्र के नए अनुवाद से खुलासा हुआ है कि न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग को इन अस्थियों की डीएनए जांच की अनुमति मिली थी। पत्र लिखने वाले रेनकोजी मंदिर के मुख्य पुजारी पर अस्थि कलश के संरक्षण की जिम्मेदारी है। ऐसा माना जाता है कि इस कलश में बोस की अस्थियां हैं।
आयोग के अनुसार अस्थियां नेताजी की नहीं थीं
कोई कारण बताए बिना पत्र के इस हिस्से का अनुवाद नहीं किया गया था और बोस के लापता होने पर न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट के साथ साक्ष्य के तौर पर एक अंग्रेजी संस्करण संलग्न किया गया था, जिसमें लिखा था, ‘मंदिर अधिकारियों के मौन रहने के कारण… आयोग (डीएनए जांच के मुद्दे पर) आगे नहीं बढ़ सका।’ आयोग ने बाद में इसका उपयोग यह निष्कर्ष निकालने के लिए किया कि ये अस्थियां नेताजी की नहीं थीं, जिससे इन अटकलों को बल मिलता है कि वह विमान हादसे में बच गए थे और संन्यासी बन गए या रूस की किसी जेल में उन्हें कैदी के रूप में रखा गया। महान स्वतंत्रता सेनानी के भाई शरत बोस की पोती माधुरी बोस ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में विसंगतियां पाए जाने और न्यायमूर्ति मुखर्जी की जांच रिपोर्ट के आधिकारिक अंग्रेजी संस्करण से जापानी भाषा में लिखे पत्र के कई पैराग्राफ का मिलान नहीं होने के बाद हमने हाल में इसका फिर से इसका नया अनुवाद शुरू किया।’
जापानी भाषा के एक विशेषज्ञ के नये अनुवाद से पता चलता है कि पत्र के छोड़े गए अंश में 427 वर्ष पुराने बौद्ध मंदिर ‘रेनकोजी मंदिर’ के मुख्य पुजारी निचिको मोचिजुकी ने लिखा था, ‘मैं जांच में अपना सहयोग देने के लिए सहमत हूँ। पिछले साल (2004) में (जापान में नियुक्त भारतीय राजदूत) (एम.एल.) त्रिपाठी के साथ बैठक में इसी पर सहमति बनी थी।’ पीटीआई-भाषा द्वारा इस अनुवाद को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सका है।
डीएनए जांच क्यों नहीं की गई?
राष्ट्रमंडल सचिवालय और संयुक्त राष्ट्र में काम कर चुकीं माधुरी ने बोस बंधुओं पर किताबें भी लिखी हैं। उन्होंने कहा, ‘हमें समझ नहीं आ रहा कि इस अनुमति को पहले सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया या डीएनए जांच क्यों नहीं की गई।’ मुखर्जी आयोग ने 2006 में संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला था कि आजाद हिंद फौज में नेताजी के करीबी विश्वासपात्रों सहित चश्मदीदों के बयान के उलट नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी और यह भी कहा गया था कि जापान के मंदिर में मिली अस्थियां नेताजी की नहीं हैं। आजाद हिंद फौज के कर्नल हबीब-उर-रहमान सहित चश्मदीदों ने कहा था कि नेताजी की मृत्यु अगस्त 1945 में ताइपे में एक विमान दुर्घटना में हुई थी।
ऐसा अवधारणाएं रही हैं कि दुर्घटना में वह बच गए थे या वह उस विमान में सवार थे ही नहीं, जो दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। यह भी एक परिकल्पना है कि वह एक साधु बन गए या रूस के किसी जेल में बंद थे। इस रिपोर्ट के परिणामस्वरूप इन्हीं अवधारणाओं को बल मिला। हाल में एक फिल्म भी आई थी, जिसमें यह दिखाया गया था कि संभवत: वह गुमनामी बाबा थे, जबकि कई समाचारों से संकेत मिलता है कि हो सकता है कि उन्हें साइबेरिया में रूसी नेता जोसेफ स्टालिन ने कैद करवाया हो।
‘जापान का मंदिर डीएनए जांच चाहता था’
माधुरी बोस ने कहा, ‘हमें मुखर्जी आयोग पर बहुत विश्वास था और हमें आशा की एक किरण नजर आई थी कि नेताजी के लापता होने के बारे में सच्चाई अंतिम रिपोर्ट के साथ सामने आएगी… हालांकि रिपोर्ट में कई स्पष्ट विसंगतियों ने हमें इसपर फिर से गौर करन के लिए मजबूर किया।’ उन्होंने कहा कि हमने पाया कि जापान का मंदिर डीएनए जांच चाहता था और हमने (भारत ने) कभी (जाँच) नहीं की। मुख्य पुजारी के पत्र के जिस हिस्से को आधिकारिक अनुवाद से हटा दिया गया था, उसमें यह भी लिखा है कि जापानियों के युद्ध हारने के बाद अमेरिका-ब्रिटेन के कब्जे के दौरान परिस्थितियां गंभीर थीं, फिर भी मंदिर के अधिकारियों ने नेताजी की अस्थियों को संरक्षित करने का जोखिम भरा कार्य किया, जिसकी एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल और जापान के विदेश मंत्री ने मांग की थी। इस प्रतिनिधिमंडल में ”कर्नल रमन (हबीब-उर-रहमान), श्री (एसए) अय्यर और श्रीमती (सती) सहाय’ शामिल थे।
पत्र में आगे कहा गया है कि इसलिए, मेरा दृढ़ विश्वास है कि ये वही अवशेष हैं। निस्संदेह सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां। मोचिजुकी ने यह भी कहा कि उनके दिवंगत पिता, तत्कालीन मुख्य पुजारी (अस्थि कलश को) अपने पास लेकर सोते थे ताकि कोई उससे छेड़छाड़ नहीं कर सके या उसे नुकसान नहीं पहुंचा सके।
नेताजी की बेटी अनिता फाफ, एक प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी और नेताजी के बड़े भाई के बेटे द्वारका नाथ बोस एवं उनके एक अन्य भतीजे अर्धेंदु बोस सहित बोस परिवार के तीन सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अक्टूबर 2016 और दिसंबर 2019 में पत्र लिखकर उन्हें रेनकोजी से प्राप्त अस्थियों की डीएनए जांच कराने का आदेश देने का अनुरोध किया था। हालांकि, माधुरी बोस ने कहा कि परिवार को इसकी डीएनए जांच के लिए” अब तक कोई जवाब नहीं मिला, जिससे कि नेताजी के गुम होने या इन अस्थियों का रहस्य सुलझ सके।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
भारत जैन महामंडल लेडीज विंग का ‘आजादी का अमृत महोत्सव’
वर्चुअल हुआ आयोजन
कोलकाता । भारत जैन महामडल लेडीज विंग कोलकाता ने नेताजी जयंती पर जूम आजादी के 75 वर्ष पर मनाया जा रहा आजादी का अमृत महोत्सव जूम पर मनाया। आजादी के अमृत महोत्सव का अर्थ आजादी की ऊर्जा का अमृत है। यानी स्वतंत्रता सेनानियों की स्वाधीनता का अमृत। आजादी का अमृत महोत्सव मतलब नए विचारों का अमृत। नए संकल्पों का अमृत और आत्मनिर्भरता का अमृत है।
मुख्य अतिथि थीं डाॅ. वसुधरा मिश्र। भारत जैन महामंडल के सचिव उतमसा शाह , विधा शाह (पूर्व सचिव, अखिल भारतीय तेरापंथ) भी उपसस्थित थे। गायन प्रतियोगिता स्वराजलि मे प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली नैना सेठिया, राजीव अग्रवाल (सचिव.अग्र युवा संगठन) सामाजिक कार्यकर्ता, बबिता गुनेजा, संघीय भजन गायिका और भारत जैन महामंडल लेडीज विंग, कोलकाता की बहनें कंचन बैद, मंजू छाजेड, कांता चोरड़िया, नेहा रामपुरिया, शशि सेठिया, विनिता दूगड़, सुमन अगरवाल, मीना दूगड आदि ने समां बांधा। गीत, कविताएं, गाने आजादी के जोशीले और अद्भुत थे। कार्यक्रम की शुरुआत भारत जैन महामडल की बहन ज्योति खेतान के पति दीपक खेतान को श्रद्धांजलि देकर की गई। भारत जैन महामडल लेडिज विंग कोलकाता की चेयरपर्सन सरोज भंसाली ने दीपक जी के बारे मे जानकारी दी। कार्यक्रम का कुशलतापूर्वक संचालन वाइस चेयरपर्सन अंजू सेठिया ने किया।
सैयद मोदी इंटरनेशनल : पीवी सिंधु ने जीता महिला एकल का खिताब
फाइनल में मालविका बंसोड़ को हराया
नयी दिल्ली । भारत की स्टार शटलर और दो बार की ओलंपिक चैंपियन पीवी सिंधु ने सैयद मोदी इंटरनेशनल बैडमिंटन टूर्नामेंट में महिला एकल का खिताब जीत लिया है। उन्होंने फाइनल में भारत की ही युवा शटलर मालविका बंसोड़ को हराया।
गत रविवार को लखनऊ में खेले गए फाइनल में सिंधु ने मालविको को लगातार गेमों में 21-13, 21-16 से हराया। यह शीर्ष वरीयता प्राप्त सिंधु का दूसरा सैयद मोदी बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड टूर सुपर 300 इवेंट खिताब है। इससे पहले उन्होंने यह टाइटल 2017 में जीता था। फाइनल मुकाबला 35 मिनट तक चला।
साइना तीन बार जीत चुकी हैं खिताब
सैयद मोदी इंटरनेशनल में महिला एकल में सबसे ज्यादा बार खिताब जीतने का रिकॉर्ड साइना नेहवाल के नाम है। साइना ने 2009, 2014 और 2015 में खिताब जीता था। वहीं, पुरुषों में चेतन आनंद (2009), पारुपल्ली कश्यप (2015), किदांबी श्रीकांत (2016) और समीर वर्मा (2017, 2018) एकल का खिताब जीत चुके हैं।
मिक्स्ड डबल्स में जीते ईशान और तनीषा
वहीं, मिक्स्ड डबल्स में भारत के ईशान भटनागर और तनीषा क्रास्तो की जोड़ी ने खिताब अपने नाम किया। फाइनल में उन्होंने टी हेमा नागेंद्र और श्रीवेद्य की जोड़ी को 21-16, 21-12 से हराया। यह मुकाबला 29 मिनट तक चला।
पुरुष एकल का फाइनल मुकाबला नहीं हो सका
इससे पहले पुरुष एकल का मुकाबला कोरोना की वजह से नहीं हो सका। फाइनल से पहले एक खिलाड़ी कोरोना संक्रमित मिला था। इसके बाद आयोजकों ने इस मैच को नहीं कराया। विजेता की घोषणा बिना मैच के ही होगी। पुरुष एकल के फाइनल में फ्रांस के ही दो खिलाड़ी अर्नोड मर्केल और लुकस क्लेयरबॉट आमने-सामने थे।
न्यूजीलैंड में बढ़ा कोरोना तो पीएम ने रद्द कर दी अपनी शादी
कहा – ‘मैं बाकी लोगों से अलग नहीं’,
वेलिंगटन : न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न को गत रविवार को अपनी शादी रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह फैसला उन्होंने देश में ओमीक्रोन वेरिएंट की नई लहर के बाद कोविड प्रतिबंधों को और ज्यादा सख्त करने के चलते लिया है। अर्डर्न ने नए प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए पुष्टि की- ‘मेरी शादी फिलहाल नहीं होगी’। न्यूजीलैंड में अब किसी भी समारोह में सिर्फ 100 लोगों को शामिल होने की अनुमति होगी जिन्हें पूरी तरह से वैक्सीन लग चुकी है।
शादी रद्द होने को लेकर अर्डर्न ने कहा कि महामारी के चलते इस तरह का अनुभव करने वाले न्यूजीलैंडवासियों में मैं भी शामिल हो गई हूं। इन हालात में फंसने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए मुझे खेद है। न्यूजीलैंड के एक परिवार में ओमीक्रोन के नौ मामले सामने आए हैं, जो शादी में शामिल होने के लिए शहरों के बीच यात्रा कर रहे थे। परिवार ने जिस विमान से यात्रा की उसकी एक अटेंडेंट भी संक्रमित पाई गई थी जिसके चलते न्यूजीलैंड को गत रविवार मध्यरात्रि से अपनी ‘रेड सेटिंग’ प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
ओमीक्रोन डेल्टा की तुलना में ज्यादा कहीं ज्यादा संक्रामक है लेकिन लोगों के गंभीर रूप से बीमार होने की संभावना कम जताई जा रही है। भीड़ की संख्या को सीमित करने के अलावा, सार्वजनिक परिवहन और दुकानों में अब मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। अर्डर्न और उनके साथी क्लार्क गेफोर्ड ने अपनी शादी की तारीख की घोषणा नहीं की थी। लेकिन माना जा रहा था कि यह अगले कुछ हफ्तों में हो सकती थीं।
‘यही जिंदगी है’
नए प्रतिबंध कम से कम अगले महीने के अंत तक बने रहेंगे। जब अर्डर्न से पूछा गया कि ऐसे प्रतिबंध लगाकर उन्हें कैसा लगा जिसके चलते उनकी खुद की शादी कैंसिल हो गई, उन्होंने कहा, ‘यही जिंदगी है।’ उन्होंने कहा, ‘मैं न्यूजीलैंड के हजारों अन्य लोगों से अलग नहीं हूं, जिन्होंने महामारी के चलते बहुत अधिक विनाशकारी प्रभावों को झेला है। महामारी शुरू होने के बाद न्यूजीलैंड में 15,104 कोविड मामले और 52 मौतें दर्ज की गई हैं।
दिन में भी ख्वाब

जब भी बंद करती हूँ आँखों को
ख्वाब चोरी हो जाते हैं
खुली आँखें सपने देख नहीं पातीं
मस्तिष्क मन पर हावी रहता है
चाँद सितारों सी इस झिलमिलाती दुनिया में
मैं भी भावों की नाव पर सवार
ख्वाबों के विशाल कैनवास पर
बड़े-बड़े लक्ष्यों को भेदती रही
कुछ अंधेरे में चल गए
कुछ तो पहुंँचे ही नहीं
ठंडे बस्ते में पड़े रहे
सब कहते हैं
आदमी का काम है ख्वाब देखना
पूरा करना भगवान का
बैठे – बैठे ख्वाबों का पहाड़ बनाया
पुल भी बनाए
कई टूटे, कई पर पानी फिरे
सोचा कुछ, होता कुछ
कभी शेख चिल्ली की कहानी लगती
कुछ करना है तो ख्वाब चुनना
वहाँ भी पुलाव पकाते रहे
एक ख्वाहिश पे दम टूटा
एक पे मन टूटा
हौसला मत हार मेरे प्यारे
नहीं तो कहर टूट पड़ेगा
चुनौतियों का सामना करना है
बहुत हाथ पैर मारे
कान पकड़ उठक बैठक भी किए
एक पैर पर खड़े भी रहे
ख्वाब कब कोई और चुरा कर ले गया
हम भी अडे़ रहे
हमारा ख्वाब हमारा है
पूरी लगन से एकचित्त हो लगे रहे
कई सालों का अनुभव काम आया
मेहनत और अक्ल दोनों पक्षों का हाथ रहा
ख्वाब में सबसे जुड़े रहे
हम जब सबके साथ मिले
सोच के पंखों से उड़ने लगे
अब दिन में भी ख्वाबों के ख्याल में रहते हैं
अपना देश बस अपना ही होता है

देश की ओर आँखें दिखाने वालों की आँखें निकाल ही लेना
ओ मेरे युवा साथी! अपना देश बस अपना ही होता है
परायों के गलत इरादों को लहूलुहान कर देना ही अच्छा होता है
हर घर बंगाल का करता नमन महानायक वीर सुभाष को
कुछ कर गुजरने की इच्छा ही देती जन्म कई सुभाषों को
आजादी की लौ जब – जब जलती तन – मन सुलग – सुलग जाता है
अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को माथे पर सदा लगाना
वीर शहीदों की शहादत पर उनको शीश नवाना
अपना देश अपना होता है
प्रकृति भी अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ती
तो मनुष्य क्यों हुआ प्रकृति से दूर
घर की संपत्ति के लिए हम भाई भाई से लड़ते
माता-पिता घर परिवार से लड़ जाते
सुरक्षा कर हम रक्षक बन घर की सुरक्षा करते रहते
कभी कम तो कभी ज्यादा सब कुछ सहते रहते
भारत का हर कोना भी अपनी ही संपत्ति का हिस्सा है
इसे संभालना और देखना अपने ही कर्तव्यों का विस्तार है
बूंद बूंद सागर बन जाता है मिलकर हाथ बढ़ाने से
मुट्ठी में भी आसमान भर आता है
आओ हम सभी संकल्प लें मिलकर, देश की रंगत को कभी न फीका होने देगें
कुछ भी हो जाए तिरंगे की शान को हर पल हर क्षण विकास की ओर ले जाएंगें।
देसी -विदेशी जोड़ों के लिए पसंदीदा विवाह स्थल बना ‘त्रियुगीनारायण’ मंदिर
त्रियुगीनारायण मंदिर में ही हुआ था शिव पार्वती का विवाह
आजकल देश-विदेश में शादियों का डेस्टिनेशन वेडिंग का नया ट्रेंड चल चुका है। समय और लाइफस्टाइल बदलने के साथ अधिकांश कपल डेस्टिनेशन वेडिंग की ओर रुख कर रहे हैं। डेस्टिनेशन वेडिंग में युगल अपनी मर्जी से किसी खास जगह की चुनाव करके अपने वहां अपने अनुसार शादी के बंधन में बंधते हैं। वैडिंग डेस्टिनेशन के लिए देश के साथ विदेशी जोड़ों की ‘शिव व पार्वती’ त्रियुगीनारायण मंदिर पहली पसंद बन रहा है।
क्या आप जानते हैं कि इसी पृथ्वी पर विद्यमान है वह जगह जहां साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर ही वह पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है। इस मंदिर के अंदर सदियों से अग्नि जल रही है। शिव-पार्वती जी ने इसी पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया था। यह स्थान रुद्रप्रयाग जिले का एक भाग है त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में ही कहा जाता है कि यह भगवान शिवजी और माता पार्वती का शुभ विवाह स्थल है। मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि कई युगों से जल रही है इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युर्गों से जल रही है।
त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिवपार्वती के विवाह में विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था। जब कि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित बने थे। उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रह्म शिला कहा जाता है जोकि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है।
विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं जिन्हें रुद्रकुंड, विष्णुकुंड और ब्रह्माकुंड कहते हैं। इन तीनों कुंड में जल सरस्वती कुंड से आता है। सरस्वती कुंड का निर्माण विष्णु की नासिका से हुआ था और विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं जिन्हें रुद्रकुंड, विष्णुकुंड और ब्रह्माकुंड कहते हैं और ऐसी मान्यता है कि इन कुंड में स्नान से संतान हीनता से मुक्ति मिल जाती है।
तीन युगों से जल रही है ज्वाला
तीन युगों से जल रही है ज्वाला कहा जाता है कि भारत में मौजूद इस मंदिर में यह ज्वाला तीन युगों से जल रही है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में जल रही अग्नि को साक्षी मानकर भगवान शिव और पार्वती ने विवाह किया था और तब से यह अग्नि इस मंदिर में प्रज्जवलित हो रही है। त्रियुगी नारायण मंदिर में मौजूद अखंड धुनी के चारों ओर भगवान शवि ने पार्वती के संग फेरे लिए थे। आज भी इस कुंड में अग्नि को जीवित है। जो भी श्रद्धालु इस पवित्र स्थान की यात्रा करते हैं वे यहां प्रज्वलित अखंड ज्योति की भभूत अपने साथ ले जाते हैं ताकि उनका वैवाहिक जीवन शिव और पार्वती के आशीष से हमेशा मंगलमय बना रहे। वेदों में उल्लेख है कि यह त्रियुगीनारायण मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है। जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापर युग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था।
पौराणिक कथा के अनुसार इंद्रासन पाने के लिए राजा बलि को सौ यज्ञ करने थे, इनमें से बलि 99 यज्ञ पूरे कर चुके थे तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर रोक दिया जिससे कि बलिका यज्ञ भंग हो गया। यहां विष्णु भगवान वामन देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
रुद्रप्रयाग जिले में स्थित शिव और पार्वती का विवाह स्थल त्रियुगीनारायण मंदिर वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में काफी लोकप्रिय हो रहा है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग यहां आकर शादियां कर रहे हैं। बीते एक साल के आंकड़ों पर नजर डाले तो करीब सैकड़ों देशी-विदेशी जोड़े मंदिर में विवाह के बंधन में बंधे। हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड आदिकाल से पवित्र रहा है। देश व दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, पर्यटक और मुसाफिर शांति और अध्यात्म के लिए इस सुरम्य प्रदेश के मंदिरों व तीर्थस्थानों पर आते रहे हैं। इन पवित्र स्थानों के प्रति लोगों की भक्ति और विश्वास इतने प्रगाढ़ हैं कि जन्म से लेकर मृत्यु तक तमाम धार्मिक संस्कारों/क्रियाओं के लिए वे उत्तराखंड की धरती पर आते रहते हैं इन अनुष्ठानों में एक और चीज जुड़ गई है और वह है बर्फ से ढके हिमालय के पर्वतों की पृष्ठभूमि में मंदिर के प्रांगण में विवाह की रस्में।
पर्यटन सचिव, दिलीप जावलकर का कहना है कि त्रियुगीनारायण मंदिर प्रदेश के अहम धार्मिक स्थलों में से एक है। यह दर्शाता है कि उत्तराखंड पर भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों का ही आशीर्वाद है। यहां आकर विवाह करने की युवा दंपतियों में बढ़ती दिलचस्पी से साबित होता है कि हमारी नई पीढ़ी पुरातन परम्पराओं में विश्वास रखती है।
त्रियुगीनारायण मंदिर जिसे त्रिजुगी नारायण भी कहते हैं। मंदिर तक रुद्रप्रयाग जिले के सोनप्रयाग से सड़क मार्ग से 12 किलोमीटर का सफर तय करके पहुंचा जा सकता है। 1980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह प्रकृति मनोहर मंदिर गढ़वाल मंडल के बर्फ से ढके पर्वतों का भव्य मंजर पेश करता है। यहां पहुंचने के लिए एक ट्रैक भी है। सोनप्रयाग से 5 किलोमीटर लंबे गुट्टूर केदारनाथ पथ पर घने जंगलों के बीच से होते हुए यहां पहुंचा जा सकता है। केदारनाथ मंदिर से त्रियुगीनारायण तक की ट्रैकिंग दूरी 25 किलोमीटर है।
देखने में त्रियुगी नारायण की बनावट केदारनाथ मंदिर की संरचना जैसे लगती है। मंदिर के भीतर भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ-साथ माता लक्ष्मी व सरस्वती की प्रतिमा भी सुशोभित हैं। मंदिर के समक्ष मौजूद ब्रह्मशिला विवाह के सटीक स्थल की पहचान है। इस मंदिर के भीतर भगवान विष्णु की चांदी की बनी मूर्ति है। उनके साथ में भगवान बद्रीनारायण, माता सीता – भगवान रामचंद्र और कुबेर की भी मूर्तियां स्थित हैं। इस मंदिर परिसर में चार पवित्र कुंड भी हैं- रुद्र कुंड स्नान के लिए, विष्णु कुंड प्रक्षालन हेतु, ब्रह्म कुंड आचमन के लिए और सरस्वती कुंड तर्पण के लिए। मान्यता है कि जो दंपति यहां विवाह संपन्न करते हैं उनका बंधन सात जन्मों के लिए जुड़ जाता है।
देहरादून निवासी सौरभ गुसाईं भी यहां विवाह करने की ख्वाहिश रखते हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक सुदंरता से हमेशा मंत्रमुग्ध हुए हैं। हमने त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में बहुत सुना है और हमारा विश्वास है कि इस दिव्य स्थल पर नए जीवन की शुरुआत करना हमारे लिए बहुत ही कल्याणकारी सिद्ध होगा।’’




