Wednesday, April 8, 2026
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वर्ष 2021-22 में सामाजिक क्षेत्र पर व्यय 71.61 लाख करोड़ रुपये रहाः समीक्षा

नयी दिल्ली । केंद्र एवं राज्य सरकारों का सामाजिक सेवा क्षेत्र पर सम्मिलित व्यय वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान 71.61 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वर्ष 2020-21 में 65.24 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से 9.8 प्रतिशत अधिक है।
गत सोमवार को संसद में पेश वर्ष 2021-22 की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में सामाजिक सेवाओं पर सरकारों का व्यय बढ़ा है। सामाजिक सेवाओं के तहत शिक्षा, खेल, कला एवं संस्कृति, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, परिवार कल्याण, जलापूर्ति एवं स्वच्छता, आवास, शहरी विकास, श्रम एवं श्रमिक कल्याण, सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण, पोषण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों का कल्याण और प्राकृतिक आपदाओं में दी जाने वाली राहत आती है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वर्ष 2021-22 में केंद्र एवं राज्य सरकारों का सामाजिक सेवाओं पर व्यय 71.61 लाख करोड़ रुपये रहने का बजट अनुमान है। इसमें शिक्षा क्षेत्र पर सर्वाधिक 6.97 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए जबकि स्वास्थ्य पर 4.72 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए।
वहीं वित्त वर्ष 2020-21 में सामाजिक सेवा क्षेत्र पर सरकारी व्यय 65.24 लाख करोड़ रुपये रहा था। इसमें शिक्षा क्षेत्र पर 6.21 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र पर 3.50 लाख करोड़ रुपये व्यय किए गए थे।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, ‘‘महामारी ने कमोबेश सभी सामाजिक सेवाओं को प्रभावित किया है, फिर भी स्वास्थ्य क्षेत्र पर इसकी सर्वाधिक मार पड़ी। स्वास्थ्य क्षेत्र पर व्यय महामारी से पहले के वर्ष 2019-20 में 2.73 लाख करोड़ रुपये रहा था, लेकिन वर्ष 2021-22 में इसके 4.72 लाख करोड़ रुपये रहने का बजट अनुमान है। इस तरह इस मद में खर्च करीब 73 फीसदी तक बढ़ गया है। वहीं शिक्षा क्षेत्र पर व्यय इसी अवधि में करीब 20 प्रतिशत बढ़ा है।’’
समीक्षा के मुताबिक, महामारी के दौरान बार-बार लगाए गए लॉकडाउन एवं बंदिशों का शिक्षा क्षेत्र पर पड़े वास्तविक प्रभाव का आकलन कर पाना मुश्किल है क्योंकि इस बारे में समग्र आधिकारिक आंकड़े 2019-20 के ही उपलब्ध हैं। इससे यह नहीं पता चल पाता है कि कोविड-19 की पाबंदियों ने शिक्षा से जुड़े रुझानों पर किस तरह असर डाला है।
महामारी की पहली लहर में बच्चों एवं युवाओं को संक्रमण से बचाने के लिए सभी स्कूलों एवं कॉलेज को बंद कर दिया गया था। बाद में बंदिशें थोड़ी कम हो गईं लेकिन अब भी शिक्षा की निरंतरता एक चुनौती बनी हुई है।

उन्नति बनीं ओड़िशा ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के महिला एकल की विजेता

सुपर 100 जीतने वाली सबसे युवा भारतीय बनीं

कटक । किशोरी उन्नति हुड्डा ने स्मित तोश्नीवाल को सीधे गेम में हराकर 75 हजार डॉलर इनामी ओड़िशा ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट में महिला एकल का खिताब जीता। वह सुपर 100 टूर्नामेंट जीतने वाली सबसे युवा भारतीय बन गयी है।
चौदह वर्षीय उन्नति ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन करके खिताब अपने नाम किया। उन्होंने फाइनल में 21-18, 21-11 से जीत दर्ज की।
इस बीच मिश्रित युगल फाइनल में भारत के एमआर अर्जुन और त्रीसा जॉली को सचिन डायस और थिलिनी हेंडादाहेवा की श्रीलंकाई जोड़ी से 36 मिनट तक चले मैच में 16-21, 20-22 से हार का सामना करना पड़ा।
सेमीफाइनल में इंडियन ओपन की फाइनलिस्ट मालविका बंसोड़ को हराकर उलटफेर करने वाली उन्नति ने तोश्नीवाल के खिलाफ केवल 35 मिनट में जीत दर्ज की। तोश्नीवाल ने भी सेमीफाइनल में अश्मिता चालिहा को 21-19, 10-21, 21-17 से उलटफेर का शिकार बनाकर फाइनल में प्रवेश किया था। उन्नति ने पहले गेम में वापसी करके जीत दर्ज की लेकिन दूसरे गेम में उन्होंने अच्छी लय बनाये रखी। उनके आक्रामक रवैये के सामने तोश्नीवाल की एक नहीं चली।

भारती एयरटेल में एक अरब डॉलर का निवेश करेगी गूगल

नयी दिल्ली । इंटरनेट के क्षेत्र की प्रमुख कंपनी गूगल दूरसंचार कंपनी भारती एयरटेल में एक अरब डॉलर का निवेश करेगी।
इसमें इक्विटी निवेश के साथ-साथ संभावित वाणिज्यिक समझौतों के लिए एक कोष शामिल है, जिसके तहत समझौतों को अगले पांच वर्षों के दौरान पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों पर मंजूरी दी जाएगी।
गूगल यह निवेश गूगल फॉर इंडिया डिजिटाइजेशन फंड के हिस्से के तौर पर कर रही है। एयरटेल ने एक बयान में कहा, ‘‘इसमें, 70 करोड़ डॉलर का इक्विटी निवेश भारती एयरटेल में 734 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर किया जाएगा।’’ इसमें बताया गया कि कुल निवेश में से 30 करोड़ डॉलर की राशि वाणिज्यिक समझौतों के क्रियान्वयन के लिए होगी।

महान हॉकी खिलाड़ी चरणजीत सिंह का निधन

नयी दिल्ली । भारत की 1964 तोक्यो ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हॉकी टीम के कप्तान रहे चरणजीत सिंह का हिमाचल प्रदेश के ऊना में उनके घर पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया । वह लंबे समय से उम्र से जुड़ी बीमारियों से भी जूझ रहे थे ।
चरणजीत अगले महीने अपना 91वां जन्मदिन मनाने वाले थे । उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी है । पांच साल पहले भी चरणजीत को स्ट्रोक हुआ था और तब से वह लकवाग्रस्त थे ।
उनके बेटे वी पी सिंह ने बताया ,‘‘ पांच साल पहले स्ट्रोक के बाद से वह लकवाग्रस्त थे । वह छड़ी से चलते थे लेकिन पिछले दो महीने से उनकी हालत और खराब हो गई ।’’


ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता टीम की कप्तानी के साथ वह 1960 रोम ओलंपिक की रजत पदक विजेता टीम में भी थे । इसके अलावा वह 1962 एशियाई खेलों की रजत पदक विजेता टीम के भी सदस्य थे ।
सिंह ने कहा ,‘‘ मेरी बहन के दिल्ली से आने के बाद उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा ।’’ चरणजीत की पत्नी का 12 वर्ष पहले निधन हो गया था । उनका बड़ा बेटा कनाडा में डॉक्टर है और छोटा बेटा उनके साथ था । उनकी बेटी विवाह के बाद से दिल्ली में रहती है ।

86 फीसदी भारतीय चाहते हैं, भारत में मतदान अनिवार्य हो : सर्वेक्षण

नयी दिल्ली । भारत में 86 फीसदी लोग चाहते हैं कि मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए। 25 जनवरी को 12वें राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर जारी एक नये सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है।
‘पब्लिक ऐप’ की ओर से देशभर में चार लाख से अधिक लोगों पर की गई रायशुमारी में 81 फीसदी प्रतिभागियों ने मौजूदा मतदान प्रणाली पर भरोसा जताया। इनमें 60 फीसदी प्रतिभागियों की उम्र 30 साल से कम थी।
भारत में 2011 से चुनाव आयोग के स्थापना दिवस को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका मकसद नए और युवा मतदाताओं के पंजीकरण को बढ़ावा देना है। चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी।
सर्वेक्षण में कहा गया है, ‘‘नागरिक कर्तव्य के रूप में मतदान नागरिकों द्वारा सामाजिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह पूछे जाने पर कि क्या देश में मतदान को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, 86 प्रतिशत प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की। 81 फीसदी प्रतिभागियों ने मौजूदा मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी बताया।’’
सर्वेक्षण मतदाताओं का रुख तय करने वाले अहम कारकों पर भी रोशनी डालता है। इससे पता चलता है कि वोटिंग के समय 34 फीसदी मतदाता पिछले कार्यकाल में उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर गौर फरमाते हैं। वहीं, 31 प्रतिशत वोटर चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों का तुलनात्मक अध्ययन कर फैसला लेते हैं।
सर्वेक्षण में यह भी देखा गया कि 4.96 प्रतिभागियों के लिए उम्मीदवारों की लोकप्रियता सबसे ज्यादा मायने रखती है। वहीं, 11.92 वोटर इस बात को ज्यादा अहमियत देते हैं कि प्रत्याशी किस पार्टी से ताल्लुक रखता है।
मतदान के लिए न जाने के सवाल पर 30.04 प्रतिभागियों ने कहा कि शहर से बाहर होना इसकी मुख्य वजह थी। हालांकि, सर्वेक्षण में शामिल 56.3 फीसदी प्रतिभागियों ने दावा किया कि उन्होंने मतदान का एक भी मौका नहीं गंवाया है। वहीं, 79.5 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि उन्होंने जीवन में कम से कम एक बार मतदान जरूर किया है।
सर्वेक्षण के मुताबिक 5.22 फीसदी प्रतिभागियों ने चुनाव की जानकारी न होने तो 7.19 प्रतिशत ने किसी भी दल का समर्थन न करने के चलते मतदान के लिए न जाने की बात कही। वहीं, 1.27 फीसदी प्रतिभागियों ने जवाब में ‘आलस्य/कोई फर्क नहीं पड़ता’ का विकल्प चुना।

गरीब छात्राओं की पढ़ाई के लिए अपने खर्च से शिक्षकों ने चलायी ‘मोर नोनी’ योजना

 हर साल 3,700 से ज्यादा बेटियों को फाय़
दुर्ग । बिहार के गणितज्ञ आनंद कुमार की सुपर 30 की कहानी से तो सभी परिचित होंगे, लेकिन दुर्ग जिले में सुपर 30 की कुछ अलग ही कहानी है। यहां ऐसे कई प्रोफेसर हैं जो प्रदेश में एक मिसाल बने हैं। कोरोनाकाल में आर्थिक तंगी की वजह से कई बेटियों की पढ़ाई छूट गई थी। ऐसे बच्चियों की पढ़ाई का सारा जिम्मा वहां के प्रोफेसर उठा रहे हैं ताकि उनकी पढ़ाई जारी रहे। यहां के शासकीय वामन राव पाटणकर गर्ल्स कॉलेज में 30 टीचर्स मिलकर हर साल सुपर 30 छात्राओं की टीम तैयार करते हैं। इन शिक्षक -शिक्षिकाओं ने खुद साल 2020 में कॉलेज की छात्राओं के लिए ‘मोर नोनी’ योजना चलाई।
हर साल 3700 से ज्यादा बेटियों की होती है मदद
दुर्ग जिला मुख्यालय में संचालित शासकीय वामन राव पाटणकर गर्ल्स कॉलेज में हर साल 3700 से ज्यादा बेटियां अपना नाम दर्ज कराती हैं। इनमें शहर ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब घरों की बच्चियां आती हैं। महाविद्यालय में कई छात्राएं ऐसी भी हैं जो आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पढ़ाई नहीं कर पाती। कई फीस न दे पाने के कारण कॉलेज के सेकेंड ईयर तक भी नहीं पहुंच पाती और बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। कॉलेज के 30 प्रोफेसर ने मिलकर ऐसी एक-एक बेटी को अपनी बेटी की तरह पढ़ाने का बीड़ा उठाया है।
कोरोनाकाल के दौरान काफी बच्चियों ने छोड़ी पढ़ाई
गर्ल्स कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुशील चन्द्र तिवारी ने बताया कोरोना संक्रमण काल के दौरान जब लोगों के रोजगार के साधन बंद हो गए। पूरे देश में लॉक डाउन लगा। उस समय कई बच्चियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी। यह देखकर कॉलेज के प्रोफेसर काफी चिंतित हुए। उन्होंने एक बैठक बुलाई और मंथन किया आखिर इतनी अधिक संख्या में बेटियां कॉलेज क्यों छोड़ रही हैं। उसमें निष्कर्ष सामने आया कि सामान्य वर्ग की बेटियां जो महाविद्यालय की फीस और अन्य खर्च नहीं उठा पा रही हैं, कॉलेज छोड़ने को मजबूर हो रही हैं। उनके अभिभावक उन्हें कॉलेज नहीं भेज रहे हैं। बस फिर क्या था प्रोफेसर ने तत्काल निर्णय लिया कि अब कोई भी बेटी शिक्षा से दूर नहीं होगी। उन्हें शिक्षित करने के लिए प्रोफेसर खुद एक योजना चलाएंगे।
सामान्य वर्ग की बच्चियों के लिए अधिक चुनौती
आर्थिक कारणों से पढ़ाई छोड़ने वाली बच्चियों में अधिकतर सामान्य वर्ग से होती हैं। इन बेटियों के लिए कॉलेज तक पहुंचना इसलिए मुश्किल होता है, क्योंकि उनके लिए ऐसी कोई छात्रवृत्ति योजना नहीं होती जिसका उन्हें फायदा मिल सके। ऐसी स्थिति में उनके सामने बीच में ही पढ़ाई छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता है।
‘मोर नोनी’ योजना चलाकर उठाते हैं पढ़ाई का पूरा खर्च
प्रिंसिपल डॉ. सुशील चन्द्र तिवारी ने बताया कि महाविद्यालय के 30 प्रोफेसर ने मिलकर ऐसी जरूरतमंद बेटियों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी ली है। सभी ने मिलकर महाविद्यालय स्तर पर एक योजना चलाई। इसका नाम रखा ‘मोर नोनी’ योजना ‘मोर नोनी’ का मतलब ‘मेरी बेटी’ है। मोर नोनी योजना के तहत हर प्रोफेसर कम से कम दो बेटियों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं। इतना ही नहीं अब इस योजना में प्रोफेसर के बच्चे भी सहयोग करने लगे हैं। कई ऐसे प्रोफेसर हैं जिनके बच्चे एक साथ 10-10, 20-20 बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं। उनकी फीस भर रहे हैं।
एक बेटी पर एक साल में 3 हजार का खर्च
कॉलेज की प्रोफेसर ऋचा ठाकुर ने बताया कि जब भी महाविद्यालय में ऐसी जरूरतमंद छात्राओं के बारे में पता चलता है तो उनका ग्रुप उन बेटियों को बुलाकर उनसे संपर्क करता है। उनके परिजनों से बात करता है। जब परिजन उनकी पढ़ाई न बंद कराने के लिए राजी हो जाते हैं तो जो भी प्रोफेसर या सहायक प्राध्यापक बेटी की जिम्मेदारी लेता है वह उस बच्ची की फीस से लेकर स्टेशनरी तक की व्यवस्था कर देता है। एक बच्ची की पढ़ाई में साल भर में फीस सहित लगभग 3-4 हजार खर्च आता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

देसी ऑपरेटिंग सिस्टम लाने की तैयारी में सरकार

नयी दिल्ली। भारत में अब तक एंड्रॉयड और आईओएस प्लेटफॉर्म वाले स्मार्टफोन का इस्तेमाल किया जाता है स्मार्टफोन काफी लोकप्रिय हैं और लाखों में इनकी बिक्री होती है। हालांकि अब जल्दी ही भारतीयों को एक नए ऑपरेटिंग सिस्टम का तोहफा मिल सकता है। दरअसल यह नया ऑपरेटिंग सिस्टम पूरी तरह से भारत में बनाया जाएगा जो एंड्रॉयड और आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम को कड़ी टक्कर देगा। इस ऑपरेटिंग सिस्टम से लैस स्मार्टफोंस भी बेहद ही खास होंगे और इनमें फीचर्स की भरमार होगी जिससे यूजर्स को एक धमाकेदार स्मार्टफोन चलाने का एक्सपीरियंस मिलेगा। भारत सरकार इस ऑपरेटिंग सिस्टम को तैयार करने की योजना पर काम कर रही है जिससे इसे जल्द से जल्द लांच किया जा सके।
आपको बता दें कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत राज्यमंत्री राजीव चंद्रशेखर ने हाल ही में यह खुलासा किया है कि सरकार नए ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम कर रही है जो ऐसा इकोसिस्टम बनाने में मददगार साबित होगा जो शिक्षा और स्टार्टअप के क्षेत्र में काफी मददगार साबित हो सकता है।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मेड इन इंडिया ऑपरेटिंग सिस्टम आईओएस को टक्कर देगा जिस पर एप्पल के आईफोन काम करते हैं। आईफोन दुनिया के सबसे लोकप्रिय स्मार्टफोन से और इनका इस्तेमाल ज्यादातर यूजर्स करते हैं। भारत में भी यह एक ट्रेंडिंग स्मार्टफोन है जिनका मुकाबला एंड्रॉयड स्मार्टफोन से होता है। आपको बता दें कि एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित स्मार्टफोन आईफोन की तुलना में काफी सस्ते होते हैं और इनमें ज्यादा फीचर्स मिलते हैं इसके बावजूद आईओएस का क्रेज लगातार बढ़ता जा रहा है जिसे देखते हुए अब भारत सरकार एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार कर रही है जो इन दोनों ही तकनीकों को कड़ी टक्कर देगा और एक नया मुकाम हासिल कर सकता है।
यह ऑपरेटिंग सिस्टम कब तक भारत में दस्तक देगा इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं है लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि सरकार इसे जल्द से जल्द भारत में लॉन्च करने की तैयारी में है।

3 बजे उठकर योग, उबला खाना, ये हैं 126 साल के पद्मश्री शिवानंद बाबा

नयी दिल्ली। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची में एक नाम वाराणसी के शिवानंद बाबा का भी है। शिवानंद बाबा के बारे में दावा किया जाता है कि उनकी उम्र 126 साल है। वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं। बाबा शिवानंद के बारे मेंं कहा जाता है कि वह चमक-दमक की दुनिया से दूर रहना चाहते हैं।
योग साधक बाबा शिवानंद, वैसे तो अपने जीवन के बारे में कोई चर्चा नहीं करते हैं लेकिन उनके पुराने साक्षात्कारों से कुछ जानकारी निकलकर जरूर सामने आई है। 8 अगस्त 1896 को जन्मे शिवानंद को योग और धर्म में काफी जानकारी प्राप्त है। उनकी दिनचर्चा के बारे में कहा जाता है कि बाबा शिवानंद रोज सुबह 3 बजे उठ जाते हैं। इसके बाद एक घंटा योग करते हैं, भगवद् गीता और मां चंडी के श्लोकों का पाठ करते हैं। बाबा शिवानंद केवल उबला हुआ भोजन करते हैं। वह कम नमक वाला खाना खाते हैं। इस उम्र में भी बाबा शिवानंद काफी स्वस्थ हैं।
बाबा शिवानंद के योगाभ्यास की ज्यादा चर्चा तब हुई थी, जब एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी ने ट्विटर पर उनका वीडियो शेयर किया था और उनकी सेहत के बारे में सभी को बताया था। इसी से प्रेरणा से लेकर एक्ट्रेस ने योग करना शुरू किया और खुद को फिट रखने के लिए खानपान में भी बदलाव किया।
बाबा की इस बेहद ज्यादा उम्र का प्रमाण भी उनके पास है। अपनी उम्र को लेकर वह अक्सर चर्चाओं में रहते हैं। उनके आधार कार्ड व पासपोर्ट पर उनकी जन्मतिथि 8 अगस्त 1896 दर्ज है। इस लिहाज से वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग शख्स कहे जा सकते हैं लेकिन गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यह रिकॉर्ड जापान के चित्तेसु वतनबे के नाम दर्ज है।
पद्म सम्मान मिलने की खबर के बाद से वह काफी प्रसन्न हैं। उन्होंने इसके लिए सरकार का आभार व्यक्त किया है। शिवानंद को काशी से बहुत लगाव है। वह कहते हैं कि यह तपोभूमि है और पवित्र भूमि है। यहां पर महादेव शंकर विराजते हैं, इसलिए यहां पर उनको काफी अच्छा लगता है। 1979 से बाबा शिवानंद काशी में रहते हैं।

कोरोना में बंद हुआ स्कूल तो शिक्षिका ने बनायी बैलगाड़ी पर मोबाइल लाइब्रेरी

बैतूल । कोरोना महामारी के चलते स्कूल बंद चल रहे हैं। बच्चे स्कूल नहीं आ पा रहे हैं, इसलिए उनको सरकारी किताबें मिलनी भी बंद हो गईं थीं। ऐसे में मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की एक शिक्षिका कमला दवन्डे ने देश के नौनिहालों तक किताबें पहुंचानें के लिए जुगाड़ लाइब्रेरी तैयार कर दी। उन्होंने गांव में ही बैलगाड़ी की व्यवस्था की। उसमें किताबें सजाकर उसे लाइब्रेरी की तरह बना डाला। अब यह बैलगाड़ी लाइब्रेरी घर-घर जाकर किताबें बांट रही है। बैलगाड़ी में टंगी किताबें और पीछे-पीछे चलते बच्चे। ये तस्वीर बैतूल के भैंसदेही विकासखंड के झल्लार संकुल की है। रामजी ढाना के प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका कमला दवन्डे का पढ़ाई को लेकर यह आइडिया सराहा जा रहा है। यह ‘बैलगाड़ी लाइब्रेरी’ ने बच्चों तक न सिर्फ किताबें पहुंचाईं, उनकी घर बैठे पढ़ाई में मदद भी की।

हमारा घर, हमारा विद्यालय
शिक्षिका की ये लाइब्रेरी थी तो दो दिन के लिए , लेकिन इसने बच्चों और उनके अभिभावकों में उत्साह जगाया। बच्चों में बांटने के लिए यह किताबें पिछले शनिवार ही स्कूलों को बच्चों में वितरण के लिए मिली है। रामजी ढाना में 87 बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चों तक एक साथ किताबें पहुंचाने कैसे होता। इसके लिए स्कूल के पास न तो कोई वाहन है न प्यून। टीचर कमला के मुताबिक स्कूल में दो शिक्षक हैं। वे अकेली ड्यूटी पर हैं, जबकि दूसरी कोरोना संक्रमण के चलते छुट्टी पर है। ऐसे में इतनी किताबें कैसे ढोई जातीं। तब उन्होंने स्कूल के पड़ोस से 50 रुपए रोज के किराये पर बैलगाड़ी लेकर इसे लाइब्रेरी की शक्ल देकर दो दिनों तक इसे चलाकर किताबें बांटीं।

थाली की ताल पर मोहल्ला क्लास
शिक्षिका की बैलगाड़ी लाइब्रेरी के अलावा उनकी मोहल्ला क्लास भी खास है। गांव में अलग अलग घरों में यह मोहल्ला क्लास लगती है। इसका आगाज बड़े अनोखे ढंग से होता है। जिस पालक के घर बच्चों की क्लास लगती है। वह घर की थाली और चम्मच को बजाता है। इस ताल के साथ मोहल्ला क्लास की शुरुआत होती है। इसमें कमला बच्चों को पढ़ाई करवाती हैं। कमला ने बताया कि वे हर दिन 5 या 6 मोहल्ला क्लास लगाती हैं। इसमें कक्षा एक से पांच के बच्चों को पढ़ाया जाता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

 

घर में जब आएं अनजाने लोग, रखें ध्यान

ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड बीते कुछ सालों से जोरों पर है, जिसे कोविड के कारण और बढ़ावा मिला है। ज्यादातर मध्यमवर्गीय घरों में भी राशन तक की भी ऑनलाइन खरीदारी होने लगी है। इस सुविधा से जिंदगी आसान तो हुई है, लेकिन महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं। इसकी वजह ये है कि समय-समय पर सामान देने आए व्यक्ति के हाथों असामाजिक गतिविधियों की खबरें सामने आई हैं। फैमिली काउंसलर शिवानी मिसरी साधू बता रही हैं, महिलाएं घर पर रहते हुए क्या सावधानी बरतें।
जब आप घर पर अकेली हों और डिलीवरी बॉय आए तो क्या करें?
दरवाजा खोलने के पहले जान लें कौन है – एंट्रेंस गेट पर अगर दो दरवाजे हैं, जिनमें से एक जाली है, तो जाली वाले दरवाजे को खोलने से पहले देख लें । अगर पेमेंट पहले ही कर दी गई है, तो डिलीवरी बॉय को सामान दरवाजे पर छोड़ जाने को कहें।
पार्सल लेने के लिए फोन लेकर जाएं – घर पर अकेले रहने के दौरान अगर आप कोई पार्सल रिसीव करने जा रही हैं, तो अपना फोन साथ लेकर जाएं। इसके अलावा कोशिश करें कि पार्सल लेने के दौरान आप घर के किसी सदस्य से दो मिनट के लिए कॉल पर जुड़ी रहें। जब तक डिलीवरी बॉय औपचारिकता पूरी कर रहा हो, तब तक फोन पर ऐसी बातें करें ‘अच्छा आ गए, नीचे हो, गाड़ी पार्क कर रहे हो, ठीक है आओ।’
ऐसा बर्ताव करें, जैसे घर के अंदर कोई है – जब भी पार्सल लेने बाहर आएं, सामने वाले को इस बात का एहसास करवाएं, जैसे घर के अंदर घर का कोई पुरुष सदस्य मौजूद है। दरवाजा खोलते हुए नाम लेकर पुकारें, ‘गैस बंद कर दो, नल बंद करना’ जैसी बातें कहकर सामान देने आए व्यक्ति को यह एहसास करवाए कि घर पर पुरुष मौजूद है।
घर पर कोई महिला है तो उसे बुला लें – जब दरवाजा खोलने जाएं और सामने एक अंजान शख्स खड़ा मिले, तो घर पर मौजूद महिला (मां, दीदी या भाभी) को आवाज देकर बुला लें। इससे व्यक्ति को यह मालूम रहेगा कि महिला घर पर अकेली नहीं है। वह कोई गलती नहीं करेगा।
सतर्क होकर फोन पर बात करें – किसी से फोन पर बात कर रही हों और तभी सामान देने वाला आ जाए, तो बात करते वक्त सावधानी बरतें। घर पर क्या है, कौन है और कौन नहीं, या अपनी कोई भी पर्सनल बात करने से बचें।
घर पर बच्चा अकेला है और तब पार्सल पहुंचे तो इन बातों का रखें ध्यान
आसपास जिन पर विश्वास करती हैं, उन्हें बता दें कि बच्चा अकेला है और कोई सामान देने आएगा।
बच्चे को समझा दें कि दरवाजे पर कोई आए तो, बिना पहचाने दरवाजा न खोलें।
हो सके तो बच्चे को डिलीवरी के चक्कर में न उलझा कर पड़ोसी को पार्सल ले लेने को कहें।
बच्चे को अगर नीचे डिलीवरी बॉय से सामान लेने भेज रही हैं, तो बॉलकनी से बच्चे पर नजर बनाए रहें।
घर में बच्चा अकेला है और सामान ले रहा है, तो उसे बताएं कि डिलीवरी बॉय से सामान बाहर रखकर जानें को कहे।

(साभार – दैनिक भास्कर)