Friday, April 3, 2026
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‘राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी साहित्य’ पर संगोष्ठी

खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज और भारतीय भाषा परिषद का साझा आयोजन
कोलकाता । आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर हिंदी विभाग, खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज और भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्त्वाधान में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी साहित्य’ विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर कॉलेज के प्रिंसिपल सुबीर कुमार दत्त ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास हमें प्रेरित करता है।भारतेन्दु और जयशंकर प्रसाद सहित हिंदी के दर्जनों लेखकों का उन्होंने जिक्र किया। परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास हमारे लिए जानने और जीने का आधार है।उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि हमें साहित्य और इतिहास के बीच जीवन के सच को तलाशने की जरूरत है।विषय का प्रवर्तन करते हुए परिषद के निदेशक व प्रख्यात आलोचक डॉ शंभुनाथ ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन हमारे आत्मपहचान की पहल है। हमें भारतेन्दु, प्रेमचंद और गांधी के संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन को समझने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री, किसान,दलित और सामाजिक न्याय को हाशिये से केंद्र में लाए बिना आजादी का अमृत महोत्सव की बात बेमानी है। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ वसुंधरा मिश्रा ने किया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ हितेंद्र पटेल ने कहा कि आजादी की शुरूआत 1857 के पहले ही हो गयी थी और आज भी आजादी की लड़ाई जारी है। हालांकि आज आजादी का स्वरूप बदल गया है। विद्यासागर विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ संजय जायसवाल ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन का उभार 1857 से प्रारंभ होता। यह आंदोलन भारत के उपनिवेश से राष्ट्र बनने की प्रक्रिया है। जहां राजनीतिक क्रांति के साथ सामाजिक क्रांति की जरूरत को समझा गया है। दार्जिलिंग गवर्मेंट कॉलेज की सहायक प्रोफेसर डॉ श्रद्धांजलि सिंह ने कहा कि दुनिया की आधी आबादी को अधिकार मिले बिना राष्ट्रीय आंदोलन की परियोजना पूरी नहीं हो सकती। राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने भी राष्ट्र मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति का पथ प्रशस्त किया। इस सत्र का संचालन मधु सिंह ने किया। दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ सत्या उपाध्याय ने कहा कि हमें राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए विविध आंदोलनों और सुधारों को समझने की जरूरत है। कल्याणी विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग की प्रोफेसर डॉ विभा कुमारी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य पर राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। प्रसिद्ध समीक्षक और अनुवादक मृत्युंजय श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन को तीन भागों में बांटते हुए आजादी, भाषा और परिवार के टूटने के स्तर पर चर्चा की। कोचबिहार पंचानन विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर डॉ रीता चौधरी ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन को सिर्फ आजादी से जोड़कर देखने के बजाय हमें समाज के सभी वर्गों के विकास और स्वतंत्रता से जोड़ना चाहिए। इस सत्र का सफल संचालन राहुल गौंड़ ने किया। इस अवसर पर आदित्य कुमार गिरि,अमृता कौर, लिली शाह,डॉ विक्रम साव ने शोध पत्र का वाचन किया। धन्यवाद ज्ञापन खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने दिया।

उत्तराखंड के पर्य़टन मंत्री ने किया दुबई के अरेबियन ट्रैवल मार्केट का दौरा

कोलकाता । उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज सऊदी अरब के दुबई में आयोजित अरबियन ट्रैवल मार्ट में शामिल हुए। उन्होंने इस मेले में भारत के पर्यटन पवेलियन, उत्तराखंड पर्यटन पवेलियन, उत्तर प्रदेश पर्यटन पवेलियन और मध्य प्रदेश पर्यटन पवेलियन का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर अपने वक्तव्य में उन्होंने उत्तराखंड को रोमांचक पर्यटन का केन्द्र बताया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में निवेश की अपार सम्भावनाएं हैं। यह राज्य गंगा, यमुना और सरयू जैसी नदियों का उद्गम है और बदरीनाथ एवं केदारनाथ जैसे तीर्थस्थल भी यहाँ हैं। इस अवसर पर पर्यटन मंत्राल के अतिरिक्त महानिदेशक रुपिंदर बरार, दुबई में भारच के कौंसुलेट जनरल डॉ. अमन पुरी, मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के मुख्य सचिव एवं मध्य प्रदेश पर्यटन परिषद के प्रबन्ध निदेशक शिव शेखर शुक्ल, उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के अतिरिक्त निदेशक विवेक सिंह चौहान और नैनीताल जिला पर्यटन के अधिकारी बृजेन्द्र पांडेय भी उपस्थित थे। तीन दिवसीय अरेबियन ट्रैवल मार्ट 9 से 12 मई तक आयोजित हुआ जबकि वर्चुअल इवेन्ट 17 -18 मई को आयोजित हो रहा है।

बीएचएस का वार्षिक समारोह सम्पन्न

कोलकाता । बिड़ला हाई स्कूल का वार्षिक समारोह हाल ही में आयोजित हुआ। इस साल के समारोह की थीम टाइमलेस टुट – ए जर्नी बैक इन टाइम थी। कार्यक्रम का संचालन ग्यारहवीं कक्षा के अमन गुप्ता एवं रोहिताश्व दास ने किया। इस थीम से सम्बन्धित नाटक का मंचन भी तिया गया। वार्षिक रिपोर्ट स्कूल की प्रिंसिपल लवलीन सैगल ने प्रस्तुत की और विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त स्कूल की उपलब्धियों को सामने रखा।

बिड़ला हाई स्कूल में रवीन्द्र जयन्ती पर आयोजित हुए कई कार्यक्रम

कोविड वॉरियर का आईआईएचएम पुरस्कार पल्लवी भंसाली एवं जोसेफ ऑरोकियास्वामी को प्राप्त हुआ। इस साल 7 शिक्षक सेवानिवृत हुए। स्कूल की अल्यूमनी ने जरूरतमंद बच्चों तक 20 हजार आहार उपलब्ध करवाने की पहल की है। विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी पुरस्कृत किये गये। इस साल स्टूडेंट ऑफ द इयर पुरस्कार आरम्भ किया गया। समारोह का समापन राष्ट्रगान से हुआ।

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया मदर्स डे

कोलकाता । सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की प्राथमिक विभाग की छात्राओं ने मदर्स डे उत्साह के साथ मनाया। छात्राओं ने अपनी मांओं के लिए अपना प्यार जाहिर किया। उन्होंने माँ के लिए गीत गाये, कार्ड बनाये, धन्यवाद कहते हुए पोस्टर बनाये। अपनी माँ की तस्वीर लिए उनके लिए दोहे पढ़े। जुम्बा सेशन में भी बच्चियों का उत्साह दिखा। थीम आधारित प्रस्तुति, कहानियों, नाटकों, वीडियो क्लिपिंग्स के माध्यम से माँओं का महत्व समझाया गया।

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया पृथ्वी दिवस


कोलकाता । सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में पृथ्वी दिवस मनाया गया। पर्यावरण से सम्बन्धित मुद्दों के प्रति जागरुकता लाने का प्रयास किया गया। प्राथमिक विभाग की छात्राओं ने इस अवसर पर विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। छात्राओं को ग्रीन वॉरियर बनने के लिए प्रेरित किया गया। नर्सरी और किंडरगार्टेन की छात्राओं ने स्कूल परिसर में पौधों को पानी दिया और अपनी उंगलियों के निशान से धरती माता की सुन्दर तस्वीरें बनायीं। पाँचवीं कक्षा की छात्राओं ने पावर प्वाइंट के जरिए जल संरक्षण के महत्व को समझाते हुए जल की बर्बादी को रोकने को लेकर चार्ट बनाया। पहली और दूसरी कक्षा की छात्राओं ने मिट्टी से अपने तरीके से हरी – भरी धरती को प्रदर्शित किया। तीसरी कक्षा की छात्राओं ने इन्डोर प्लांट्स की देखभाल की, चौथी कक्षा की छात्राओं ने पोस्टर बनाये। छात्राओं को प्राकृतिक तत्वों के संरक्षण के बारे में समझाने के लिए वीडियो दिखाया गया।

बंगाल में पुनरूत्थान विषय पर बीबीए विभाग द्वारा संगोष्ठी

कोलकाता ।  भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के व्यवसाय प्रशासन विभाग ने गत 7 मई 2022 की सुबह ‘बंगाल के पुनरुत्थान’ पर एक संगोष्ठी ‘कैलिडोस्कोप’ का आयोजन किया। दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।सेमिनार विद्यार्थियों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और आधुनिक शिक्षा की दिशा में एक अभिनव कदम है। यह न केवल नई चीजें सीखने के लिए बल्कि नए विचारों और सूचनाओं को साझा करने के लिए विशेष महत्व रखता है साथ ही पीढ़ी के अंतर को पाटने और वर्तमान पीढ़ी के विद्यार्थियों को ज्ञान की उचित दिशा देता है। साथ ही ज्ञान अवसर, उपलब्धि, सफलता और धन के द्वार खोलता है
इस अवसर पर निर्देशक देवेश शर्मा और अदिबा खान ने चयन दासानी और ज़राफशान सुल्ताना के साथ पैनलिस्टों का परिचय कराया। पैनलिस्टों को उनकी उपस्थिति के लिए सम्मानित किया गया।
पांच प्रमुख वक्ता पैनलिस्टों ने ‘बंगाल के पुनरुत्थान’ पर अपने महत्वपूर्ण विचारों को व्यक्त किया और वे बंगाल के भविष्य को कैसे देखते हैं? इस पर बात की। भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के महानिदेशक कार्यक्रम के मॉडरेटर प्रोफेसर डॉ सुमन कुमार मुखर्जी ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के फेलो हैं, यूएसएईपी (यूएसएआईडी के तहत) के पर्यावरण फेलो हैं, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में 2014 में मदर टेरेसा पुरस्कार जीता और इंडो ब्रिटिश स्कॉलर्स एसोसिएशन के सदस्य हैं।
संगोष्ठी ‘बंगाल के पुनरुत्थान’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी के साथ आरंभ हुई। उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि कैसे एक प्रिज्म एक बहुरूपदर्शक से अलग है। उन्होंने एमएसएमई क्षेत्र जैसे अपनी ताकत बताते हुए पश्चिम बंगाल के भविष्य पर चर्चा की। फिर उन्होंने भारी उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया जिनमें सुधार की आवश्यकता है। इसके अलावा, उन्होंने चर्चा की कि कैसे बंगाल राजनीतिक और आर्थिक रूप से सांस्कृतिक रूप से बदल रहा था और मैकेंज़ी मॉडल की रणनीतियों का पालन कर रहा था।
अंबुजा निवेटिया समूह के अध्यक्ष ॉहर्षवर्धन नेवटिया सर्वप्रथम अपनी बात कही और बंगाल के पुनरूत्थान विषय पर अपनी राय रखी। आशावादी रूप से यह कहकर शुरुआत की कि यदि हम दशकों पहले बंगाल की स्थिति को देखें, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में क्या हुआ है और स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन यह बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांँचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है। हमें अपनी ताकत, रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि कोलकाता को भारत की रचनात्मक बौद्धिक अर्थव्यवस्था के रूप में आसानी से प्रस्तुत किया जा सकता है।

अत्री भट्टाचार्य, आईएएस और पश्चिम बंगाल सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को बारे में बात की जो बहुत ही रोचक रूप से प्रस्तुत किया जिसमें काफी विनोदी तत्व रहे। उन्होंने बंगाल के एचडीआई सूचकांक के शीर्ष छह में नहीं होने, नीली और नारंगी अर्थव्यवस्था और बंगाल ने मोड़ को कैसे पार किया, जैसी जानकारी साझा की। उन्होंने कहा, ‘संस्कृति आर्थिक विकास का वाहक है।’

उन्होंने सकारात्मकता का उल्लेख किया कि आय की असमानता में कमी आई है और सरकार को बुनियादी ढांचे और शासन पर ध्यान देना चाहिए। पश्चिम बंगाल में कुशल शैक्षणिक संस्थान हैं, घनी आबादी है, उपजाऊ कृषि भूमि है, एक बड़ा बाजार है और इन कारकों पर एक उचित ध्यान बंगाल को सकारात्मक दिशा में ले जा सकता है।
कलकत्ता चैंबर ऑफ कॉमर्स की अध्यक्ष शैलजा मेहता ने अपनी बात यह कहकर आरंभ की कि बंगाल में इसके लिए बहुत कुछ है और हमें अपनी मूल प्रतिभा पर ध्यान केंद्रित कर हम अपने कार्यों को क्रियान्वित कर बंगाल को वापस दे सकते हैं।
भारतीय विद्या भवन, कलकत्ता केंद्र के अध्यक्ष डॉ जी. डी गौतम, आईएएस (सेवानिवृत्त) ने अपने जीवन के कुछ उदाहरण साझा किए, उन्होंने देखा कि भारतीय लोगों से हमेशा बुद्धिमान होने की उम्मीद की जाती है। इन चर्चाओं के माध्यम से, उन्होंने लोगों को यह एहसास दिलाया कि हमें संसाधनों के मूल्य को कम नहीं आंकना चाहिए और अगर हम अपनी ताकत का विपणन करते हैं, तो यह अंततः विकास की ओर ले जाएगा।

असम सरकार के सलाहकार डॉ शिलादित्य चटर्जी, आईएएस (सेवानिवृत्त), ने आर्थिक पुनरुद्धार: संभावनाओं और संभावनाओं पर अपने शोध पर चर्चा की। उन्होंने अपनी विस्तृत प्रस्तुति के साथ इस विषय पर प्रकाश डाला, जिसकी शुरुआत इस बात से हुई कि कैसे बंगाल में औसत राज्य जीडीपी विकास दर और उच्च गरीबी दर में तुलनात्मक गिरावट आई है, जिसमें सुधार हुआ है। बंगाल के विभाजन से शुरू होकर, तुलनात्मक रूप से खराब मानव विकास, कृषि विकास के लिए एक सार्वजनिक ऋण की अधिकता और खराब औद्योगिक संबंध, उन्होंने उन कारकों पर चर्चा की, जिनमें सुधार की गुंजाइश है।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के छात्र मामलों के प्रो डीन दिलीप शाह ने इस विषय पर विचार रखे और  बंगाल को विकसित करने के प्रयासों में भागीदारी का आह्वान किया। भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के समन्वयक डॉ त्रिदीब सेनगुप्ता ने सभी गणमान्य व्यक्तियों को उनकी विशिष्ट उपस्थिति के लिए धन्यवाद दिया। प्रो. कौशिक बनर्जी ने संगोष्ठी के आयोजन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इवेंट मैनेजमेंट टीचर – कोऑर्डिनेटर और इवेंट मैनेजमेंट टीम के साथ इवेंट ऑर्गनाइजर्स का सक्रिय योगदान रहा। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

काश! जली हुई पार्वती का त्वचा प्रत्यारोपण करा पाते

डॉ. वसुंधरा मिश्र

शहर से दूर नई कॉलोनी में बैंक के मैनेजर अवधेश सिंह ने जमीन लेकर घर बनवाया जो हमारे घर से चार कदम बाद ही था। उनके तीन लड़के और तीन ही लडकियां थीं। हमलोग दो बहनें और एक भाई थे। कॉलोनी में अभी घर बन ही रहे थे।कुल मिलाकर रहने वाले चार – पांच ही परिवार थे। बच्चों में हम लोगों में अधिक अंतर न था कोई दो तीन साल छोटे- बड़े। वे दिन बहुत सुंदर थे। कोई चिंता नहीं थी। हमलोग साथ में खेलते – कूदते कब बड़े हो गए, पता नहीं चला।अवधेश सिंह की एक बीच वाली लड़की पार्वती पढ़ने में पीछे ही रह गई लेकिन दूसरी दोनों बहनों में सबसे सुंदर थी। बड़ी बहन अनिता का विवाह हो गया अब पार्वती के विवाह की बात उठने लगी और वह भी एक सुंदर और पैसे वाले पति के सपने देखने लगी। उसकी मां ने उसके लिए दहेज भी अच्छा खासा इकट्ठा कर दिया था। हम लोगों के लिए तो बहुत खुशी की बात थी। उसका पति भी बैंक में ही नौकरी करता था। पार्वती अपने पति पर जान छिड़कती थी। लड़का होने के बाद जब पहली बार अपने मायके आई तो वह कुछ उदास सी लगी। उसके आने के बाद उसके पति ने उसे फोन तक नहीं किया। दो महीने, फिर चार महीने, दिन बीत रहे थे। एक दिन उसका पति आया और अपने बेटे को लेकर चला गया। पार्वती कहती थी कि पति अपनी बड़ी भाभी का ही अधिक सुनता है। वह अपने आपको कोसती रहती। पति उसे पसंद नहीं करता था। बेटा भी उससे दूर हो गया। पार्वती धीरे-धीरे मानसिक अवसाद से ग्रस्त होती चली गई। मेरी बड़ी बहन कविता से हर बात शेयर करती। पार्वती सीधी-सादी और सरल लड़की थी। चालाकी तो जानती ही नहीं थी। अचानक एक दिन नहाने के लिए बाथरूम में गई और पानी की जगह किरासन तेल से नहा लेती है और फिर माचिस की तीली। धू धू कर पार्वती जलने लगी। उसकी मां धुंआ देख चिल्लाने लगी। दोपहर के समय उस समय कोई पुरुष या बड़ा कोई न था।किस्मत से उस काले दिन मेरी बड़ी बहन कविता थी। मेरी मां ने उसे भेजा कि देख कर आओ क्या हो गया?
कविता ने देखा पार्वती काली हो गई है और उसके बाल और छाती कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। केवल आंखों से देख रही थी। किसी तरह आनन- फानन में कविता ने हिम्मत कर उसकी मां को साथ लेकर उसे अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि बहुत अधिक जल गई है। बचने का चांस नहीं है।
किसी ने इस अनहोनी के बारे में नहीं सोचा था। पुलिस ने उसका बयान लिया। उसका पति भी आया। बचाने की कोशिश की लेकिन पार्वती नहीं बची।
आज से 25-30 साल पहले तो त्वचा प्रत्यारोपण के बारे में जानकारी ही नहीं थी। बहुत जला हो तो फर्स्ट डिग्री बर्न कहलाता है । सेकेंड और थर्ड डिग्री तक जला हो तो अस्पताल ले जाना जरूरी होता है है। घाव अगर 3 इंच से बड़ा हो तो इसे डॉक्टर ही बता सकेगा। समान्य घाव भरने में तीन से छ दिन लगते हैं। जेनोड्राफ्ट यानि सुअर की त्वचा या बायोसिंथेटिक स्किन कृत्रिम त्वचा मंहगी होने के कारण बहुत कम उपयोग में लाते हैं।
जेनोग्राफ्ट सिर्फ मानव ही दान में दे सकता है। ये जानकारी किसे रहती है? हमारे देश में जनसाधारण बहुत सी बातें जानते ही नहीं हैं क्योंकि स्वास्थ्य, शिक्षा और नेत्र दान, अंग दान आदि के विषयों में जागरूकता कम है। महिलाओं को अभी तक अपने अधिकारों का ही ज्ञान नहीं है। भारत के शहर, गांव और कस्बों और कबीलों की संस्कृति और सोच में लाख हाथ का अंतर है।
वैसे तो भारत में त्वचा प्रत्यारोपण के प्रयोग की बात प्राचीन काल में सुश्रुत संहिता में 3000 ईसा पूर्व नाक को ठीक करने की कला राइनोप्लासटिक प्रचलित थी। विश्व युद्ध में अंग- भंग के कारण प्लास्टिक सर्जरी की बहुत सी चुनौतियां थीं।
त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है जो भीतर के अंगों का आवरण है। स्पर्श की संवेदना से युक्त है। पार्वती की सुंदरता और संवेदनशीलता की जब याद आती है तो उसका बेवस चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमने लगता है। आज तक न जाने कितनी ही पार्वती जली हैं या अधजली घूम रही हैं या फिर चोटें लगी होगीं। मन की वेदना भरे न भरे, तन को तो दूसरे की त्वचा काआवरण दिया जा सकता है, यह भी आज के युग में बहुत बड़ी बात है।
आज त्वचा दान देकर समाज के कल्याण के लिए बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। व्यक्ति के मरने के छः घंटे बाद भीतरी त्वचा निकाली जा सकती है। 0.3 मिमि मोटाई के साथ जांघ, पैर और पीठ से एपीडर्मी और डर्मी (त्वचा की पर्तें) के कुछ हिस्से को निकाला जाता है। मृत व्यक्ति के चेहरे, छाती या शरीर के ऊपरी हिस्सों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है। मृत व्यक्ति के पास डोनर कार्ड न होने के बावजूद परिजन ही त्वचा दान करने का निर्णय लेते हैं। एड्स, एच. आई वी, हेपटाइटिस, टी.बी, स्किन कैंसर आदि से पीड़ित व्यक्ति दान नहीं कर सकते।
आज सुंदरता के लिए प्लास्टिक सर्जरी बहुत होने लगी है। मुबंई के सायन अस्पताल में सन् 2000 में शल्यक्रिया की विभागाध्यक्ष डॉ माधुरी गोरे ने स्किन बैंक खोला जो सच में चुनौतीपूर्ण था।
आज भी कोई अंगदान या शरीर दान देने में उत्सुकता नहीं दिखाता है जबकि किसी को किडनी, लीवर आदि की आवश्यकता पड़ती रहती है जो जीवित व्यक्ति दान देते हैं। त्वचा दान बहुत ही सरलता से दिया जा सकता है क्योंकि यह मरने के बाद दिया जाता है।किसी न किसी दुर्घटना में सत्तर प्रतिशत महिलाएं जलती हैं और एक्सीडेंट में कितने ही लोगों का अंग- भंग हो जाता है। यदि दान करने की इच्छा बने तो रुपया पैसा तो लोग बहुत करते हैं लेकिन अपने पास इतना है जिससे हम किसी की मदद कर सकते हैं। ऊतक दान प्रपत्र फार्म भरना पड़ता है जो टीएच ओए के अनुसार दिल्ली में स्थित राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण की वेबसाइट पर भरना पड़ता है।
काश! मरने के बाद हम अपनी त्वचा दान देकर न जाने कितनी ही पार्वतियों को बचा पाते। उनकी आंखों की चमक लौटा पाते।

(त्वचा प्रत्यारोपण के प्रति जागरूकता हेतु लेख)

विश्व परिवार दिवस पर विशेष कविता – परिवार

-बब्बन

जहाँ नहीं होता है कोई ईगो,
या औपचारिकता से सरोकार।
एक दूजे की सलामती के लिए,
होती रहती है छोटी मोटी तकरार।
जहाँ कभी अपनों के लिए,
अनिवार्य नहीं कोई आभार।
पत्नी की मुस्कुराहट पर,
पति हो जाए निसार,
अक्सर झेलता रहे निरीह बन,
पत्नी के प्रवचनों का गुब्बार।
फिर भी हर गतिविधियों में हो,
अपनापन का दीदार।
किसी को बहन से झिड़की,
तो किसी को भाई से दुलार।
कभी पिता के कंधों से चाँद देखना,
तो कभी माँ के गोद पर जमाना अधिकार।
कभी दादी की कहानी व दीदा,
तो कभी दादा की डाँट फटकार।
कभी नानी के तोहफे की बखान,
कभी बुआ के पकवानों की बहार।
माँ पर कब्जा जमाने के लिए,
बना देना तकिए की दीवार।
एक छू कर देखे, दूसरा थर्मामीटर लगावे,
तीसरा दवा खिलावे, होने पर बुखार।
एक दूजे के लिए कष्ट झेलकर भी,
नहीं जताता कोई उपकार।
आखिर में गिला शिकवा भूलकर,
हँसी ठिठोली में होता उपसंहार।
भारतीय परिवेश में इसी संस्था को,
आप कहते हैं आदर्श परिवार।

उत्तराखंड में चारधाम तीर्थयात्रियों के लिए अनिवार्य हुआ पंजीकरण

हेल्थ एडवाइजरी के पालन का दिया गया निर्देश

कोलकाता । उत्तराखंड सरकार ने देश भर से चारधाम यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों को यात्रा आरंभ करने से पूर्व अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन करने की सलाह दी है। सचिव पर्यटन दिलीप जावलकर ने बताया कि चार धाम आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा सुखद एवं सुरक्षित हो सके इसके लिए विभिन्न धामों की वहन क्षमता के अनुरूप रजिस्ट्रेशन की सीमा तय की गयी है। अत: तीर्थयात्री रजिस्ट्रेशन की उपलब्धता की जांच करने के बाद ही यात्रा आरंभ करें। इसके साथ ही सभी यात्रियों को चार धाम यात्रा हेतु प्रस्थान के पूर्व हेल्थ एडवाइजरी का अध्ययन एवं अनुपालन करने की हिदायत दी गई है। पर्यटन विभाग ने प्रदेश में तीर्थयात्रियों के रजिस्ट्रेशन की एक निश्चित सीमा निर्धारित की है। बिना रजिस्ट्रेशन कराये उत्तराखंड पहुंचने वाले यात्रियों को रजिस्ट्रेशन उपलब्ध ना होने की दशा में ऋषिकेश से आगे जाने की इजाजत नहीं होगी। विभाग ने यह भी कहा है कि तीर्थयात्री रजिस्ट्रेशन कराने के बाद नियत तारीख पर ही यात्रा आरंभ करने के लिए उत्तराखंड पहुंचे। साथ ही रहने के लिए होटल आदि की बुकिंग भी रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ही करें। सचिव पर्यटन श्री दिलीप जावलकर ने कहा है कि जिन तिथियों में निर्धारित सीमा तक रजिस्ट्रेशन हो चुका है उनके लिए कोशिश कर रहे तीर्थयात्रियों को अगली उपलब्ध तिथियों पर रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजीकरण करते समय श्रद्धालु उपलब्धता की जांच करने के बाद ही अपना टूर प्लान करें। यात्रा के लिए पंजीकरण registrationandtouristcare.uk.gov.in पर कराया जा सकता है। ज्ञात हो कि स्थानीय पुलिस एवं प्रशासन द्वारा बिना रजिस्ट्रेशन के पर्यटकों को चार धाम यात्रा पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है विभाग का कहना है कि चारधाम की यात्रा पर आने से पूर्व तीर्थयात्रियों को अपने स्वास्थ्य की पूर्ण जांच करानी चाहिए ताकि उन्हें ऊंचे हिमालय क्षेत्र की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से किसी तरह की परेशानी न उठानी पड़े। चारधाम यात्रा में समस्त तीर्थ स्थल उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। इनकी ऊंचाई समुद्र तल से 2700 मीटर से भी अधिक है। इन स्थानों पर तीर्थयात्री अत्यधिक ठंड, कम आद्रता, अत्यधिक अल्ट्रा वॉयलेट रेडिएशन, कम हवा का दबाव और कम ऑक्सीजन की मात्रा से प्रभावित हो सकते हैं। तीर्थयात्रियों की सुगम एवं सुरक्षित यात्रा हेतु स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्वास्थ्य संबंधी एडवाइजरी जारी की गई है। यह उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (यूटीडीबी) के फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, यूट्यूब, लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया अकाउंट सहित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट uttarakhandtourism.gov.in पर भी उपलब्ध है। विभाग ने यात्रियों को यात्रा शुरु करने से पहले हेल्थ एडवाइजरी पढ़ने की सलाह दी है।

नहीं रहे प्रख्यात संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा

मुम्बई ।  भारत के मशहूर संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा का गत मंगलवार को निधन हो गया। 84 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई में अंतिम सांस ली है। इस खबर ने संगीत के चाहने वालों को झकझोर कर रख दिया है। बताया जा रहा है कि शिवकुमार शर्मा का निधन दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई। वह पिछले 6 महीने से किडनी संबंधी समस्याओं से पीड़ित थे और डायलिसिस पर थे।

वाद्य यंत्र संतूर को विश्व विख्यात बनाने में इन्होने अहम योगदान दिया। संतूर वाद्य यंत्र कभी जम्मू-कश्मीर का एक अल्पज्ञात वाद्य था, लेकिन पंडित शर्मा के योगदान के संतूर को एक शास्त्रीय संगीत वाद्य यंत्रदर्जा दिया और इसे अन्य पारंपरिक और प्रसिद्ध वाद्ययंत्रों जैसे सितार और सरोद के साथ ऊंचाई पर पहुंचा दिया। पंडित शिवकुमार शर्मा ने सिलसिला, लम्हे और चांदनी जैसी फिल्मों के लिए बांसुरीवादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ संगीत तैयार किया।

 पंडित शिवकुमार शर्मा पिछले सात दशकों से देश में संतूर के पर्याय बने हुए थे। उनका जन्म जम्मू में गायक पंडित उमा दत्त शर्मा के घर हुआ था। इनके पिता ने इन्हें तबला और गायन की शिक्षा तब से आरंभ कर दी थी, जब ये मात्र पांच वर्ष के थे। इनके पिता ने संतूर वाद्य पर अत्यधिक शोध किया और यह दृढ़ निश्चय किया कि शिवकुमार प्रथम भारतीय बनें जो भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजायें। तब इन्होंने 13 वर्ष की आयु से ही संतूर बजाना आरंभ किया और आगे चलकर इनके पिता का स्वप्न पूरा हुआ। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम बंबई में 1955 में किया था। उनका जन्म 13 जनवरी 1938 को जम्मू में हुआ था।

आजादी के बाद पहली बार असम के चाय बागानों में खुला पहला स्कूल

97 स्कूलों में शुरू हुई पढ़ाई
गुवाहाटी । असम सरकार की घोषणा के बाद मंगलवार को चाय बागानों का पहला हाई स्कूल खुला। भारत की आजादी के 75 सालों में यह पहला ऐसा मौका रहा जब असम के चाय बागानों को पहला स्कूल मिला । इसे असम सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला माना जा रहा है। राज्य सरकार के मुताबिक, बागानों में कुल 119 स्कूल खुलेंगे, जिसमें 97 हाई स्कूल 10 मई को अपना पहला शैक्षणिक सत्र शुरू कर चुके हैं।
बाकी 22 स्कूल का निर्माण अलग-अलग चरणों में किया जा रहा है। उम्मीद है कि अगले साल 2023 तक इन स्कूलों में भी पढ़ाई शुरू हो जाएगी।
200 चाय बागानों में 119 स्कूल खोलने का प्रस्ताव
2017-18 के राज्य बजट में असम सरकार ने 200 चाय बागानों में 119 हाई स्कूल खोलने का प्रस्ताव रखा था। एक न्यूज वेबसाइट के अनुसार, साल 2020 में असम सरकार ने स्कूलों के लिए प्राइमरी डेवलपमेंट फंड की स्थापना की थी। इसके लिए पीडब्ल्यूडी को स्कूलों के निर्माण के लिए कुल 142.50 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। इसमें प्रत्येक स्कूलों को 1.19 करोड़ रुपये का काम सौंपा गया था।
बागानों में काम करने वाले 80% बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित
प्लांटेशन लेबर एक्ट-1951 के अनुसार, चाय बागानों के प्रबन्धन की यह जिम्मेदारी है कि वह 6 से 12 साल की उम्र के बच्चों को लोअर प्राइमरी एजुकेशन (कक्षा 1-5 तक) दी जाए, लेकिन मैनेजमेंट का इस पर काफी ढ़ीला रवैया है। असम स्टेट चाइल्ड राइट प्रोटेक्शन सिस्टम ( एएसपीसीआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा के अधिकार से वंचित हो रहे कम से कम 80% बच्चों से अवैध तरीके से चाय बागानों में काम कराए जा रहे हैं।
असम सरकार की हर विधानसभा क्षेत्र में स्कूल खोलने की योजना
पिछले महीने मुख्यमंत्री ने कहा था कि सरकार स्कूलों के छात्रों को मिड डे मिल के अलावा सुबह का नाश्ता उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार चाय बागान के क्षेत्रों में 81 मॉडल हाई स्कूल स्थापित करने जा रही है और इन्हें हायर सेकेंडरी लेवल तक अपग्रेड किया जाएगा। सरमा ने कहा था कि राज्य सरकार इसे देश के बाकी हिस्सों के लिए एक सफल मॉडल के रूप में विकसित करना चाहती है। सीएम के मुताबिक, सरकार प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में एक मॉडल स्कूल स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है।