Thursday, April 2, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 246

यूपीएससी – प्रेरणा देती हैं इन मेधावी युवाओं की कहानियाँ

नयी दिल्ली। सफलता के लिए एक कीमत अदा करनी होती है। संघर्ष करना होता है। कुर्बानियां देनी होती हैं। देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा संघ लोक सेवा आयोग ने इस परीक्षा का अंतिम परिणाम जारी किया। इस रिजल्ट में देश के वैसे इलाकों से भी युवा पास हुए हैं जिनको अपने जीवन में कई झंझावातों का सामना करना पड़ा। कोई मजदूर का बेटा है तो किसी के घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह इस परीक्षा की तैयारी कर सके। लेकिन कहते हैं न सोना तपकर ही ‘कुंदन’ बनता है। तो इस परीक्षा में भी ऐसे कई कुंदन निकले हैं जिन्होंने मुसीबतों का सामना करके, छोटे शहरों के होकर भी बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

कर्ज लेकर परिवार का गुजारा, अब आईएएस
बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले विशाल कुमार को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 484वां स्थान मिला है। विशाल के पिता मजदूरी किया करते थे। बाद में उनके पिता का साया भी सिर से उठ गया। ऐसे में मां ने परिवार का पेट पालने के लिए कर्ज लिया और अपने बेटे की पढ़ाई को जारी रखा। शुरू से ही विशाल काफी तेज तर्रार छात्र रहे हैं। उन्होंने 10वीं में अपने जिले में पहला स्थान हासिल किया था। मां ने अपने बेटे को आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। विशाल ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर आईआईटी जैसे परीक्षा में भी सफलता हासिल की और IIT कानपुर से केमिकल इंजीनयरिंग में ग्रेजुएशन किया। उन्होंने देश की इस सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा की जमकर तैयारी की और इसमें सफलता का परचम लहरा दिया।

लेखपाल की नौकरी, 1 साल की छुट्टी..केदार की सफलता की कहानी 
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर सदर तहसील में तैनात लेखपाल केदारनाथ शुक्ल ने आईएएस बनने की कहानी किसी सपने के जैसा है। नौकरी करते हुए केदारनाथ को तैयारी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। लेकिन केदारनाथ ने मन में ठान लिया था तो ऊपर वाले ने भी उनकी मदद की। केदारनाथ के आईएएस बनने का सपना साकार करने के लिए जिले के आईएएस अधिकारी कुलदीप मीना और सुमित महाजन ने प्रेरित किया। यही नहीं, केदारनाथ के वरिष्ठों ने उन्हें तैयारी करने के लिए एक साल की छुट्टी तक दे दी। आपने मां-बाप के एकलौते बेटे केदारनाथ ने यूपीएससी में 465वीं रैंक हासिल की है। लेखपाल पद का निर्वहन करते हुए केदारनाथ शुक्ल के बारे में आईएएस व जॉइंट मैजिस्ट्रेट कुलदीप मीना व सुमित महाजन को पता चला तो उन्होंने केदारनाथ से बात की, उन्हें प्रेरित किया और तैयारी के लिए एक साल की छुट्टी दिलाई। अधिकारियों का बल मिला तो केदारनाथ ने जुनून के साथ तैयारी शुरू कर दी। मेहनत रंग लाई और केदारनाथ ने आखिरकार संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

अंशु प्रिया, असफलता से सफलता की कहानी
बिहार के मुंगेर की रहने वाली अंशु प्रिया पेशे से चिकित्सक हैं। लेकिन अब उनका नया पेशा लोक सेवक का होगा। यूपीएससी परीक्षा में उन्हें 16वीं रैंक मिली है। हालांकि, अंशु के लिए ये सब इतना आसान नहीं था। डॉक्टर की नौकरी छोड़कर यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करने वाली अंशु को शुरुआत के दो प्रयास में असफल रही थीं। लेकिन उन्होंने इससे बिना घबराए तीसरी बार प्रयास किया और इस बार उन्होंने इस परीक्षा में सफलता हासिल कर ली। अंशु के पिता शिक्षक हैं जबकि मां गृहिणी हैं। अंशु ने अपनी सफलता से साबित किया कि अगर लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखें तो कुछ भी असंभव नहीं है।

एमपी के कृष्णपाल की कहानी
मध्य प्रदेश के कृष्णपाल राजपूत के आईएएस बनने की कहानी आपको प्रेरित करेगी। वकील पिता और आंगनवाड़ी सहायिका के बेटे कृष्णपाल शुरू से ही प्रतिभावान रहे हैं। निवाड़ी जिले के ओरछा के रहने वाले कृष्णपाल ने अपना लक्ष्य पाने के लिए चार साल तक तपस्या की और अपने पहले ही प्रयास में 329वीं रैंक हासिल कर ली। पिता रामकुमार ने बताया कि उनके बेटे ने छोटी उम्र में ही प्रशासनिक सेवा में जाने का लक्ष्य बना लिया था। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद से वे अपनी कॉलेज की पढृाई के साथ सिविल सर्विसेज परीक्षा से संबंधित जानकारियां जुटाने लगे थे। इसीलिए वे परिवार की सुख-सुविधा को छोड़ ग्वालियर गए थे।

15 साल तक ‘संन्यास’, तब आईएएस परीक्षा में सफलता
बिहार के नवादा जिले के रोह प्रखंड के रहने वाले आलोक रंजन ने यूपीएससी परीक्षा में 346वीं रैंक पाई है। आलोक की इस परीक्षा को पास करने की यात्रा काफी मुश्किलों वाली रही है। आलोक 15 साल तक घर नहीं गए थे। उनकी जिद थी कि जबतक वह आईएएस नहीं बनेंगे घर नहीं आएंगे। आलोक के पिता नरेश यादव और मां सुशीला देवी शिक्षक हैं। आलोक ने 2007 में मैट्रिक नवादा के जीवनदीप पब्लिक स्कूल से किया था। उसके बाद वह कोटा चले गए थे, जहां से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय नई दिल्ली से स्नातक किया। आलोक ने 2015 में यूपीएससी की तैयारी शुरू की थी। कड़ी मेहनत के बाद सातवें प्रयास में आलोक को सफलता मिली

दिल्ली की आयुषी, ‘बंद’ आंखों से सफलता
सफलता के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत होना जरूरी होता है। दिल्ली की आयुषी शर्मा इसका जीता जागता उदाहरण हैं। यूपीएससी की परीक्षा में 48वां रैंक हासिल करने वाली आयुषी 100 प्रतिशत दृष्टिहीन हैं। लेकिन उनकी सफलता में ये मुश्किल बाधा नहीं बन सकी और उन्होंने मेहनत के जरिए देश की इस सबसे प्रतिष्ठित सेवा में सफलता हासिल की। अपने चौथे प्रयास में सफल होने वाली आयुषी अपने स्कूल में हमेशा से टॉपर रही हैं। वह मुबारकपुर स्थित स्कूल में इतिहास की लेक्चरर रही हैं। वह अपनी तैयारी के लिए रात में कम सोती थीं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

भवानीपुर कॉलेज में नारी प्रोडक्शन द्वारा शास्त्रीय नृत्य कार्यशाला 

कोलकाता ।  भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज में शास्त्रीय नृत्य कार्यशाला आयोजन किया गया जिसमें ‘वर्तमान में समाज और स्त्री की अस्मिता ‘विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। 8 एवं 9 जून को आयोजित कार्यशाला में सत्रह छात्राओं को प्रशिक्षण दिया गया। भरतनाट्यम के गुरु पद्मश्री चित्रा विश्वेश्वरन और डॉ पद्मा सुब्रमण्यम की शिष्या अनुसुइया घोष बनर्जी के निर्देशन में छात्राओं ने स्त्री की अस्मिता को एक नए रूप में नृत्य के द्वारा अपनी आवाज को अभिव्यक्ति और भाव से पूर्ण प्रस्तुति को रूप दिया। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को हमेशा ही अत्याचार सहना पड़ा है। आज तक समाज में उसकी आवाज़ को दबाया गया है। अब स्त्री अपनी अस्मिता को पहचानने लगी है और अब वह अपनी आवाज को बुलंद करती है। वह स्वयं प्रश्न उठाती है और समाज की आवाज बनती है। स्त्री का मानना है कि उसकी लड़ाई वह स्वयं लड़ेगी और समाज के अत्याचारों से लड़ते हुए उसे अपना स्थान बनाना होगा।
नृत्य में भरतनाट्यम, ओडिसी और कत्थक तीनों शास्त्रीय नृत्य के संयोजन को इस नृत्य में आकार दिया गया । इस कार्यशाला में विद्यार्थियों की सहनिदेशक नृत्यांगना संचयिता मुंशी साहा रहीं जिनकी गुरु प्रसिद्ध कोरियोग्राफर अनुसुइया घोष बनर्जी हैं।चेन्नई के गुरुकुल से जुड़ी नृत्य गुरु अनुसुइया दिल्ली, गाजियाबाद में खेतान पब्लिक स्कूल में परफार्मिंग आर्ट की कल्चरल हेड हैं और उन्हें आर्ट इनटिग्रिशन और सी लर्निंग से जुड़े कार्यक्रम में महारत हासिल है।
इस कार्यशाला का आयोजन किया कोआर्डिनेटर प्रोफ़ेसर मीनाक्षी चतुर्वेदी ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

साहित्य कुंभ छंदशाला के रचनाकारों द्वारा पर्यावरण दिवस पर काव्य पाठ 

कोलकाता । साहित्य कुंभ छंदशाला के रचनाकारों द्वारा ऑनलाइन काव्य पाठ का आयोजन किया गया। आ.धर्मपाल धर्म नीमराना की अध्यक्षता में दिनांक पांच मई को हुआ जिसमें तेरह रचनाकारों ने पर्यावरण विश्व दिवस के अवसर पर मिलीजुली रचनाओं की प्रस्तुति दी। पर्यावरण सहित कई विषयों पर रचनाएँ पढी़ गईं। कार्यक्रम का संचालन हिम्मत चौरडिया ने एवं सरस्वती वंदना इन्दु चांडक द्वारा की गई साथ ही तकनीक व्यवस्था का कार्य किया । आ.धर्मपाल ने गजल ‘धड़कनें दिल की छिपाकर देख लो’,व हास्य रचना ‘चोरी करने के लिए घुसा एक घर’, कल्पना सेठिया दिल्ली ने ‘अनिवार्य वही अब मेरे लिए जो जीवन सार्थक बनाता है’ कविता, सुशीला चनानी ने रास लीला रचाते वे दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए, प्रकृति के अवदान व गीत मेघा बरसो-2 गीत,शशि कंकानी ने ‘उत्थान हो या पतन विचलित ना होना’, इन्दु चांडक ने ‘कोई गीत गायें, चलो गुनगुनाएँ, दिशायें सुरों से सजायें ‘मधुर प्रस्तुति दी गई। मीना दूगड़ ने ‘एक और भौतिकता का विकास दूसरी तरफ मानवता का संहार’, कुसुम अग्रवाल दिल्ली द्वारा ‘निरर्थक बातों में जीवन गुजर न जाये प्रेरक रचना पढ़ी गई। प्रभा जी लोढ़ा मुम्बई ने ‘फिर से मैं उडा़न भरूँगी , आसमान से ऊँची होगी उडा़न’ पढ़ी गई ।सरोज दूगड़ आसाम ने ‘राजस्थानी नर हीरों की कहाँ होती चमक पुरानी’ ओज पूर्ण काव्य पाठ किया गया। मंजू शर्मा ने ‘मैं चैतन्य हूँ-ऐसा जानती हूँ लेकिन समझती नही हूँ मैं,शायद अभी मोह में हूँ-अध्यात्म से परिपूर्ण कविता , उषा सराफ ने ‘प्रेम तो ढ़ाई आखर का /पर सितम कितना ढहाता है’ कविता सुनाई। हिम्मत चोरडि़या ने मारवाड़ी भाषा में आज वास्तविकता पर चोट करती कविता ‘मिलावट की तो बात छोड़ नकली पर असली रो लेबल लग जावे’ सुनाई । अंत में, सुशीला चनानी ने सभी रचनाकारों को धन्यवाद दिया ।

गुरुओं को स्मरण करना परम्परा से जुड़ना है – डॉ. किरण सिपानी

कोलकाता । ‘प्रो. कल्याणमल लोढ़ा ने बंगाल जैसे अहिन्दीभाषी प्रदेश में हिन्दी भाषा, साहित्य, अध्ययन एवं शिक्षण की मजबूत नींव तैयार की। उनका अध्ययन व्यापक एवम् अध्यापन कौशल विशिष्ठ था।’ सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय एवं श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय द्वारा प्रो. कल्याणमल लोढ़ा जन्मशती समारोह के अर्न्तगत आयोजित एक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आचार्य जगदीश चन्द्र बोस कॉलेज की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. किरण सिपानी ने यह बात कही। ‘प्रो. कल्याणमल लोढ़ा – संस्मरणों में’ विषयक संगोष्ठी में अपने गुरु प्रो. कल्याणमल लोढ़ा से जुड़ी स्मृतियों को अभिव्यक्त करते हुए डॉ. किरण सिपानी ने कहा कि अपने गुरुओं को स्मरण करना अपनी परम्परा से जुड़ना है। उनकी स्मृतियों से रस लेकर हम नयी पीढ़ी को तैयार करते हैं। प्रो. कल्याणमल लोढ़ा को याद करते हुए काजी नजरुल इस्लाम महाविद्यालय, वर्द्धमान के पूर्व आचार्य डॉ. संतराम ने कहा कि लोढ़ा जी का व्यक्तित्व सभी को प्रभावित करता था। और जीवन में परिवर्तन लाता था। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या डॉ. सत्या उपाध्याय ने लोढ़ा जी की शिक्षण शैली की सराहना की और कहा कि उनकी स्मृति में और अधिक आयोजन एवं शोध कार्य होने चाहिए जिससे नयी पीढ़ी उनको और अधिक जान सके। यह हम सबका दायित्व है। उमेशचन्द्र कॉलेज के पूर्व प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रो. कल्याणमल लोढ़ा की हिन्दी साहित्य के प्रति निष्ठा और उनकी साधना अनुकरणीय है।

वे हिन्दी को अपना कार्यक्षेत्र नहीं बल्कि मिशन मानते थे। भवानीपुर गुजराती एजुकेशन सोसायटी की प्राध्यापिका डॉ. वसुंधरा मिश्र ने कहा कि लोढ़ा जी के साथ काम करना बहुत कुछ सिखाने वाला था। वे अभिभावक की तरह नयी पीढ़ी को आगे ले जाते थे। स्वागत भाषण देते हुए श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के अध्यक्ष डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि लोढ़ा जी ने महानगर की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों को नेतृत्व प्रदान कर हिंदी भाषी समाज को नई दिशा एवं दृष्टि दी थी। हिंदी के सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए वे सदैव तत्पर रहे। कार्यक्रम का आरम्भ तारा दूगड़ द्वारा सरस्वती वन्दना के गायन से हुआ। संचालन सुरेन्द्रनाथ सान्ध्य कॉलेज की प्राध्यापिका दिव्या प्रसाद ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया।

इस अवसर पर जालान पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास, छपते–छपते के संपादक एवं ताजा टीवी के निदेशक श्री विश्वंभर नेवर, अनुराधा जालान, दूरदर्शन में कोलकाता जोन के अपर महानिदेशक श्री सुधांशु रंजन, प्रो. विमलेश्वर द्विवेदी, भागीरथ चांडक, अरुण प्रकाश मल्लावत, डॉ शुभ्रा उपाध्याय, डॉ कमलेश जैन, योगेश उपाध्याय, संजय बिन्नानी, डॉ. ऋषिकेश राय, निर्भय देवयांश, अनिल ओझा ‘नीरद’, रामपुकार सिंह, श्यामा सिंह, रामेश्वरनाथ मिश्र ‘अनुरोध’, डॉ.बृजेश सिंह, दीक्षा गुप्ता, परमजीत पंडित आदि सहित कोलकाता महानगर के साहित्यकार, पत्रकार उपस्थित थे। कार्यक्रम को सफल बनाने में पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, विवेक तिवारी, राहुल उपाध्याय, संदीप, उत्तम, राहुल, दिव्या गुप्ता, मनीषा गुप्ता समेत कई अन्य लोगों का योगदान रहा।

पर्यावरण रहा, धरती रही…तब ही हम भी रह सकेंगे

जून का महीना हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा हमारे लिए कितनी आवश्यक है। हम एक बार ही सचेत होते हैं, पौधे लगाते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और अगले दिन के बाद यह चिन्ता 365 दिन के लिए आराम करने चली जाती है। यह सही है कि हर बात के अच्छे और बुरे..दोनों ही पक्ष होते हैं पर खुद से एक सवाल तो बनता है कि हमारे पूर्वजों ने जो हरी – भरी धरती दी…विकास के नाम पर हमने उसकी दुर्दशा तो कर दी मगर हम आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? सोचने में अजीब लगता है मगर यह एक गम्भीर सवाल है जिसका हल किसी सेमिनार में नहीं होने वाला, इसका समाधान तो तब ही निकलेगा जब हम अपनी आदतों में पर्यावरण रक्षा को शामिल करेंगे। अब कई ऐसी चीजें आ गयी हैं जो इस दिशा में मदद कर सकती हैं। जब भी सुविधाओं की बात हो..एक बार सोचिएगा..क्या इनके बगैर जीना इतना कठिन है? क्या जब फ्रिज या एसी नहीं था तो हम जीते नहीं थे? दरअसल कहीं न कहीं ..हमने लक्जरी को जरूरत मान लिया है…लक्जरी बुरी बात नहीं लेकिन अगर यह प्राकृतिक उपादानों को लेकर हो तो सोने में सुहागा हो सकता है। हर घर में एक बालकनी हो, जहाँ ढेर सारे पौधे हों…बहुत से पौधे ऐसे भी होते हैं जिनको बहुत देखभाल की जरूरत भी नहीं पड़ती। अगर हर कमरे की खिड़की में एक पौधा भी हो तो जरा सोचिए हम कितनी हरियाली अपने घर ले आए हैं। मिट्टी के क्षरण को रोकने की जरूरत है। वाहन चलें तो बायोडीजल इस्तेमाल हो…बिजली की जरूरत सौर ऊर्जा से पूरी हो…मिट्टी के दो बर्तन लेकर बड़े बर्तन में रेत भरकर उसमें छोटा पात्र रखकर सब्जियाँ और फल रखी जा सकती हैं..बस बीच – बीच में पानी के छींटे मारते रहिए और यह फ्रिज की जरूरत को एक हद तक कम कर देगा। घड़े का पानी पीजिए और यह आपका गला सुरक्षित रखेगा…ऐसी कई छोटी – छोटी बातें हैं जिनका ध्यान रखकर हम पर्यावरण के साथ अपना रिश्ता मजबूत कर सकते हैं। यह रिश्ता बहुत जरूरी है…सिर्फ धरती के लिए ही नहीं…हमारे लिए भी क्योंकि पर्यावरण रहा, धरती रही…तब ही हम भी रह सकेंगे।

कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र का सहयोग चाहती है राज्य सरकार

कोलकाता । मर्चेन्ट्स चेम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा हाल ही में एग्रीकल्चर कनक्लेव 2022 का आयोजन किया गया। कनक्लेव का उद्घाटन राज्य के कृषि मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कृषकों के लिए राज्य द्वारा संचालित गतिविधियों की चर्चा की एवं कृषकों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाने की बात कही। उन्होंने कहा कि कृषकों के स्थायी विकास के लिए निजी क्षेत्रों को भी आगे आना चाहिए। तटीय इलाकों में राज्य सरकार ने 6 प्रकार के बीज विकसित किये हैं, साथ ही टिश्यू कल्चर एवं कृषि क्षेत्र में नयी तकनीक लाने पर जोर दे रही है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में उच्च एवं अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। कृषि क्षेत्र में फसलों की विविधता के सिए 16 जिलों की पहचान की गयी है। राज्य के कृषि विपणन मंत्री विप्लव मित्रा ने कहा कि राज्य सरकार घर – घर तक ताजा सब्जियाँ पहुँचाने का काम सुफल बांग्ला के तहत कर रही है। इस परियोजना के तहत 63 मोबाइल वैन, 3 हब, 500 रिटेल आउटलेट सारे राज्य में स्थापित किये गये हैं। राज्य सरकार ने ई परमिट प्रणाली भी आरम्भ की है। अब तक ई -नाम पोर्टल पर 18 बाजारों का उद्घाटन हो चुका है। कृषि निर्यात क्षेत्र का उद्देश्य कृषकों की आय को दुगना करना है। राजारहाट में ऑरगेनिक हाट, पश्चिम मिदनापुर के एगरा स्थित पानीपारुल में ग्रीन चिली हाट, आसनसोल में टर्मिनल मार्केट योजना की जानकारी भी उन्होंने दी। स्वागत भाषण में एमसीसीआई के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ललित बेरीवाला राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना की। उद्घाटन सत्र को नाबार्ड पश्चिम बंगाल के महाप्रबंधक कमलेश कुमार, कृषि रसायन एक्सपोर्ट के प्रबन्ध निदेशक अतुल चूड़ीवाल ने भी सम्बोधित किया। धन्यवाद एमसीसीआई के कृषि एवं हॉर्टिकल्चर मामलों के चेयरमैन सुरेश अग्रवाल ने दिया।

कोटाक इन्वेस्टमेंट का कोटाक चेरी बाजार में

कोलकाता । कोटक महिंद्रा बैंक की सहायक कंपनी कोटक इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स लिमिटेड ने ‘कोटक चेरी’ – ए क्यूरेटेड टेक लेड इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म की घोषणा की। कोटक चेरी को अनुभवी निवेश प्रबंधकों द्वारा समर्थित एक मजबूत डिजिटल ऐप के माध्यम से उपयोगकर्ताओं को समग्र निवेश समाधान प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। कोटक चेरी स्टॉक, बॉन्ड, म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट और नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस) से लेकर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) जैसे प्रगतिशील निवेश के अवसरों के लिए निवेश समाधान प्रदान करता है।
कोटक चेरी के सीईओ डिजाइनेट श्रीकांत सुब्रमणियन ने कहा, “ हमारा मानना ​​है कि निवेश के मामले में गहन डोमेन अनुभव मायने रखता है। यह वन स्टॉप प्लेटफॉर्म है जो लोगों को विशेषज्ञों की तरह निवेश करने में मदद करेगा। चेरी के पास जल्द ही पूर्ण ओपन आर्किटेक्चर होगा, जहां ऐप उपयोगकर्ता जल्द ही अपनी पसंद के प्रदाताओं के साथ अपने बैंकिंग और ब्रोकिंग संबंधों को बनाए रखने में सक्षम होंगे, जबकि अभी भी हमारे डोमेन अनुभव और क्यूरेटेड सेवाओं की पूरी शक्ति से लाभान्वित होंगे।
कोटक चेरी एक ‘डू इट योरसेल्फ’ निष्पादन प्लेटफॉर्म के रूप में सक्षम है। आगे बढ़ते हुए, कोटक चेरी की उच्च प्रदर्शन वाली टीम ग्राहकों को स्टॉक बास्केट, रोबो एडवाइजरी, जीवन, चिकित्सा, सामान्य बीमा जैसे वित्तीय जीवन-स्तरीय समाधान भी प्रदान करेगी और अंतर्राष्ट्रीय निवेश को सक्षम करेगी। कोटक चेरी की तकनीक चपलता और सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित है, जो पैमाने और लचीलापन के लिए बनाई गई है।

एमसीसीआई ने आयोजित किया पूँजी बाजार के महत्व पर विशेष ई -सत्र

कोलकाता । मर्चेंट्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने सेबी के पूर्णकालिक सदस्य अनंत बरुआ के साथ लघु और मध्यम उद्यमों और स्टार्ट-अप के वित्तपोषण में पूंजी बाजार के महत्व पर एक विशेष ई-सत्र की मेजबानी की।
चर्चा एमएसएमई और स्टार्टअप को स्थिरता के लिए औपचारिक वित्तीय सहायता की आवश्यकता के आसपास केंद्रित थी। सेबी के पूर्णकालिक सदस्य अनंत बरुआ ने कहा कि एमएसएमई खंड में नए युग की कंपनियों के लिए धन जुटाने के लिए वेंचर डेट एक अच्छा वित्तीय उपकरण है, जो इक्विटी को कम करने के लिए तैयार नहीं है। उद्यम ऋण का दोहन करने के लिए, एसएमई को उद्यम पूंजी समर्थित कंपनियों की आवश्यकता है और 111 कंपनियों ने पिछले साल उद्यम ऋण के माध्यम से धन जुटाया।
उन्होंने आगे उल्लेख किया कि 10,000 करोड़ रुपये के कोष के साथ केंद्र के फंड ऑफ फंड्स और एसएमई को फंड करने के लिए आत्मनिर्भर भारत फंड को भी डिजाइन किया गया है। हालांकि फंड ऑफ फंड एमएसएमई को सीधे पूंजी नहीं देगा, यह ए और बी वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) की श्रेणियों में धन का संचार करेगा जो एसएमई को इक्विटी प्रदान करेगा।
उन्होंने बताया कि सेबी के इश्यू ऑफ कैपिटल एंड डिस्क्लोजर रेगुलेशन ने एसएमई को सीधे जोखिम पूंजी जुटाने और असंगठित से संगठित खिलाड़ियों में बदलने का प्रावधान प्रदान किया।
उन्होंने आगे कहा कि 10 करोड़ रुपये से कम और 25 करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाले एसएमई केवल अपने नकद उपार्जन और निवल मूल्य के सकारात्मक होने के साथ ही धन जुटा सकते हैं। सेबी ने लिस्टिंग फीस में भी 25 फीसदी की कटौती की है। 19 एसएमई फंड थे जिन्होंने 1629 करोड़ रुपये का निवेश किया है। बरुआ ने कहा कि कॉरपोरेट गवर्नेंस की प्रयोज्यता में भी छूट दी गई है और अब तक 8000 कंपनियां एसएमई एक्सचेंज में सूचीबद्ध हो चुकी हैं। हालांकि कोविड की अवधि के दौरान लिस्टिंग में गिरावट आई थी, 33 कंपनियों को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया और 413 करोड़ रुपये जुटाए और 31 कंपनियों को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया और 2021-2022 में 503.37 करोड़ रुपये जुटाए गए।
बरुआ ने बताया कि मई 2020 में मदर फंड एंड डॉटर फंड के फॉर्मेट में इक्विटी डालने के लिए फंड ऑफ फंड्स की स्थापना की गई थी। एनएसआईसी वेंचर कैपिटल फंड छोटी कंपनियों में निवेश के लिए फंड ऑफ फंड के रूप में कार्य करता है। एसबीआई कैपिटल मार्केट्स फंड का मैनेजर है। आत्मनिर्भर भारत। फंड ने करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटाए हैं। एमएसएमई पर एमसीसीआई काउंसिल के चेयरमैन संजीव कुमार कोठारी ने अपने स्वागत भाषण में अपनी चिंता व्यक्त की कि उच्च लेनदेन लागत और कम मार्जिन, उद्यमों द्वारा उत्पाद नवाचार की कमी और वित्तीय संस्थानों की जोखिम कम लेने की मानसिकता के कारण एमएसएमई को समय पर और पर्याप्त ऋण नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि मध्यम, लघु और स्टार्टअप फर्म आमतौर पर बड़ी फर्मों की तुलना में अधिक अपारदर्शी होती हैं क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से कम उपलब्ध जानकारी प्रदान करती हैं। नतीजतन, किसी भी वित्तीय संस्थान के लिए साख का आकलन करना मुश्किल हो जाता है जो उधार को हतोत्साहित कर सकता है और ऋणदाता सूचना की कमी को संपार्श्विक की उच्च आवश्यकता के साथ प्रतिस्थापित कर सकते हैं, श्री कोठारी ने कहा। पूंजी बाजार पर एमसीसीआई परिषद के सह-अध्यक्ष रवि जैन द्वारा प्रस्तावित धन्यवाद प्रस्ताव के साथ सत्र का समापन हुआ।

 

वैली ऑफ फ्लावर्स – फूलों की घाटियों में आपका स्वागत

फूल संभवतः सौंदर्य के सबसे पुराने प्रतीक हैं। सभ्यता के किसी प्राचीन आंगन में जंगल और झाड़ियों के बीच उगे हुए फूल ही होंगे जो इंसान को उस ख़ासे मुश्किल वक़्त में राहत देते होंगे। फूलों से ही पहली बार उसने रंगों को पहचाना होगा। ख़ुशबू को जाना होगा। पहली बार सौंदर्य का अहसास किया होगा। फूलों की अपनी दुनिया है। वो याद दिलाते हैं कि पर्यावरण के असंतुलन से लगातार धुआंती, काली पड़ती, गरम होती इस दुनिया में फूलों को बचाए रखना जरूरी है। उत्तराखंड की फूलों की घाटी अद्भुत, रंगबिरंगी सैंकड़ों प्रजातियों के फूलों का एक अलग संसार है। उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली में मौजूद यूनेस्को की विश्व धरोहर रंग बदलने वाली फूलों की घाटी को हर साल आवाजाही के लिए 1 जून को आम पर्यटकों के लिए खोल दिया जाता है। पर्यटकों 31 अक्तूबर तक फूलों की घाटी में बिखरे पड़े सौंदर्य का आनंद उठा सकते हैं।

उत्तराखंड में पवित्र हेमकुंड साहब मार्ग पर फूलों की घाटी को उसकी प्राकृतिक खूबसूरती और जैविक विविधता के कारण 2005 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया था। 87.5 वर्ग किमी में फैली फूलों की ये घाटी न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। फूलों की घाटी में दुनियाभर में पाए जाने वाले फूलों की 500 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। हर साल देश विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। यह घाटी आज भी शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी सम्मिलित रूप से विश्व धरोहर स्थल घोषित हैं।

 पर्वतारोही फ्रेंक स्मिथ ने की थी खोज

फूलों की घाटी को खोजने का श्रेय फ्रैंक स्मिथ को जाता है। जब वह 1931 में कामेट पर्वत के अभियान से लौट रहे थे तब रास्ता भटकने के बाद 16700 फीट ऊंचे दर्रे को पार कर भ्यूंडार घाटी में पहुंचे। यहां मौजूद असंख्य प्रजातियों के फूलों की सुंदरता को देखकर वो आश्चर्यचकित हो गये। फूलों की घाटी का आकर्षण इतना गहरा था कि वो फ्रैंक स्मिथ को 1937 में दोबारा यहाँ खींच लाया। इस बार उन्होंने यहाँ के फूलों पर गहन अध्ययन व शोध किया और 300 से अधिक फूलों की प्रजातियों के बारे में जानकारी एकत्रित की। अपने इस संपूर्ण अध्य्यन को फ्रैंक स्मिथ नें  1938 में ”वैली ऑफ फ्लावर” नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद दुनिया ने पहली बार फूलों की इस घाटी के बारे में जाना।उसके बाद से आज तक इस घाटी के फूलों का आकर्षण हर किसी को अपनी ओर खींचता है। कहा जाता है कि फ्रैंक स्मिथ यहां से कई किस्म के बीज अपने देश ले गये थे।

 मार्गेट लैगी की कब्र

1938 में विश्व के मानचित्र पर फूलों की घाटी के छा जाने के बाद 1939 में क्यू बोटेनिकल गार्डन लन्दन की ओर  से जाॅन मार्गरेट लैगी, 54 वर्ष की उम्र में फूलों का अध्यन करने के लिए आई थी। अध्य्यन के दौरान दुर्भाग्यवश फूलों को चुनते हुए 4 जुलाई 1939 को पहाड़ी की एक ढाल से गिरने से उनकी मौत हो गई।जॉन मार्गेट लैगी की याद में यहाँ पर एक स्मारक बनाया गया है। यहां आने वाले पर्यटक लैगी के स्मारक पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें याद करते है।

पांच सौ प्रजाति से अधिक फूल

फूलों की घाटी में पांच सौ प्रजाति के फूल अलग-अलग समय पर खिलते हैं। यहां जैव विविधता का खजाना है। यहां पर उगने वाले फूलों में पोटोटिला, प्राइमिला, एनिमोन, एरिसीमा, एमोनाइटम, ब्लू पॉपी, मार्स मेरी गोल्ड, ब्रह्म कमल, फैन कमल जैसे कई फूल यहाँ खिले रहते हैं। घाटी मे दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु, वनस्पति, जड़ी बूटियों का संसार बसता है।

 हर 15 दिन में रंग बदलती है ये घाटी

फूलों की घाटी की खास बात यह है कि हर 15 दिन में यहां अलग-अलग प्रजाति के रंगबिरंगे फूल खिलने से घाटी का रंग भी बदलता रहता है। यह ऐसा सम्मोहन है, जिसमें हर कोई कैद होना चाहता है।

– कैसे पहुंचे और कब आएं  फूलों की घाटी

फूलों की घाटी पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से गोविंदघाट तक पहुंचा जा सकता है। यहां से 14 किमी. की दूरी पर घांघरिया है। समुद्र तल से यहां की  ऊंचाई 3050 मीटर है। यहां लक्ष्मण गंगा पुलिया से बायीं तरफ तीन किमी की दूरी पर फूलों की घाटी है। वैसे तो घाटी पर्यटकों के लिए पहली जून को खुल जाती है लेकिन जुलाई  प्रथम सप्ताह से अक्तूबर तृतीय सप्ताह तक यहां फूलों की छटा सबसे खूबसूरत होती है। यहाँ विभिन्न प्रकार की तितलियां भी पाई जाती हैं। इस घाटी में कस्तूरी मृग, मोनाल, हिमालय का काला भालू, गुलदार, हिम तेंदुआ भी दिखता है।

नयी फिल्म – पंकज त्रिपाठी ‘शेरदिल’ का ट्रेलर जारी

पंकज त्रिपाठी बहुत ही वास्तविक सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। हर संवेदना को पकड़ने में उनको महारत है और सच्ची घटनाओं से प्रेरित उनकी नयी फिल्म ‘शेरदिल’ 24 जून को प्रदर्शित होने जा रही है। टी-सीरीज़ और रिलायंस एंटरटेनमेंट ने मैच कट प्रोडक्शंस के साथ, अपनी फिल्म ‘शेरदिल: द पीलीभीत सागा’ का ट्रेलर जारी किया गया है जो डराती भी है और हँसाता भी है।

श्रीजीत मुखर्जी की फिल्म शहरों के बदलते रहन सहन, मानव और पशुओं के भी संघर्ष और गरीबी के बारे में एक अनोखी कहानी पेश करती है जो एक जंगल के किनारे बसे एक गांव में एक विचित्र प्रथा की ओर ले जाती है। ट्रेलर में पंकज त्रिपाठी द्वारा निभाई गई गंगाराम की कहानी को चित्रित करती है, जो एक पुरानी प्रथा का पालन करने और घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए एपनी ज़िदगी को दांव पर लगा देता है। पंकज त्रिपाठी का किरदार, एक ऐसा फैसला करता है, जिसमें  सरकार द्वारा बाघ के हमले के शिकार के परिवार को दिए गए पैसे से लाभान्वित हो सके।