Sunday, March 29, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 209

दादा द्वारका प्रसाद मिश्र की किताबों से प्रेरित वेबसीरीज निर्देशित करेंगे सुधीर मिश्रा

70 और 80 के दशक पर आधारित होगी सीरीज
मुम्बई। बॉलीवुड के जाने-माने निर्देशक सुधीर मिश्रा अपने दादा, स्वतंत्रता सेनानी द्वारका प्रसाद मिश्र की लिखी किताबों से प्रेरित वेबसीरीज का निर्देशन करेंगे। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे द्वारका प्रसाद मिश्रा ने लिविंग ए एरा: इंडियाज, मार्च टू फ्रीडम, द नेहरू एप्रोच: फ्रॉम डेमोक्रेसी टू मोनोक्रेसी, द पोस्ट नेहरू एरा, लंका की खोज जैसी किताबें लिखी हैं। सुधीर मिश्रा इन किताबों से प्रेरित वेबसीरीज का निर्देशन करेंगे।
सुधीर मिश्रा ने कहा कि यह सीरीज 70 और 80 के दशक पर आधारित है। मेरे दादा डीपी मिश्रा ने कई किताबें लिखी हैं। उन्होंने मेरी मां को भी कई किताबें दी थीं, क्योंकि मैं एक फिल्म निर्माता हूं, और उन्हें लगता था, कि मैं इन किताबों के साथ कुछ कर सकता हूं। मैं उनकी किताबों को फिर से पढ़ रहा हूं। मैं उनकी बातों को लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं।

नौकरी छोड़ दी, पीएफ ट्रांसफर नहीं किया तो ध्यान दें

नयी दिल्ली । अगर आप रिटायर हो गए हैं या नौकरी छोड़ दी है, तो तीन साल के अंदर पीएफ खाते से पैसा निकाल लें। ऐसा नहीं करने पर आपका पीएफ खाता इनएक्टिव हो सकता है। एक मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने कुछ इसी तरह का फैसला दिया है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसले में कहा है कि रिटायर होने वाला या विदेश में स्थायी रूप से बस जाने वाला कर्मचारी तीन साल तक अपने पीएफ अकाउंट से पैसा नहीं निकालता, तो खाता निष्क्रिय हो जाएगा। साथ ही कर्मचारी के खाते में इस पीरियड का ब्याज भी नहीं दिया जाएगा। दरअसल, एक शख्स ने कोर्ट से गुजारिश की थी कि उसे 2017 से 2021 तक का पीएफ का ब्याज दिलवाया जाए। इस पर कोर्ट ने मांग नामंजूर करते हुए कहा कि शख्स 2006 में रिटायर हो गया था। उसने रिटायरमेंट के 3 साल के अंदर विड्रॉल के लिए अप्लाई नहीं किया। ऐसे में उसे 2017 से 2021 तक का ब्याज नहीं दिया जा सकता।
रिटायरमेंट या विदेश में स्थायी रूप से बस जाने या कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में इस तरह के मामले सामने आते हैं। जब पीएफ खाते में तीन साल तक कोई योगदान नहीं किया जाए, तो उसे एक निष्क्रिय खाता माना जाता है। इस समय कर्मचारी की 58 वर्ष की आयु तक ब्याज दिया जाता है। आप इस आयु तक पहुंच जाएंगे, तो खाता निष्क्रिय हो जाएगा।निष्क्रिय खाते से इस तरह निकालें रकम
ईपीएफओ मेंबर अपने पीएफ खाते को दोबारा एक्टिव भी करवा सकते हैं। इसके लिए आपको ईपीएफओ के ऑफिस में आवेदन देना होगा। निष्क्रिय पीएफ खातों से संबंधित क्लेम को निपटाने के लिए उस क्लेम को कर्मचारी के नियोक्ता द्वारा सर्टिफाइड किया जाना जरूरी होता है। अगर कंपनी बंद हो चुकी है और क्लेम सर्टिफाइड करने के लिए कोई नहीं है, तो ऐसे क्लेम को बैंक केवाईसी दस्तावेजों के आधार पर सर्टिफाई करते हैं। केवाईसी दस्तावेजों में आपको आधार कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट, पैन कार्ड, राशन कार्ड, ईएसआई आइडेंटिटी कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस की जरूरत पड़ सकती है। अगर पीएफ खाते में 50 हजार रुपये से अधिक की रकम है, तो यह पैसा असिस्टेंट प्रोविडेंट फंड कमिश्नर की मंजूरी के बाद निकलता है। 25 हजार रुपए से अधिक और 50 हजार रुपए से कम रकम होने पर अकाउंट ऑफिसर की मंजूरी लेनी होती है। वहीं, पीएफ की रकम 25 हजार रुपए से कम है, तो निकासी के लिए डीलिंग असिस्टेंट मंजूरी दे सकते हैं।
मान लीजिए किसी कर्मचारी ने 5 साल से कम नौकरी की है और पीएफ राशि 50,000 रुपये से अधिक है। ऐसे में पीएफ से पैसा निकालने पर ब्याज की राशि से 10 फीसदी टीडीएस की कटौती होगी। मान लीजिए किसी कर्मचारी ने 5 साल लगातार नौकरी की है, तो ईपीएफ में योगदान नहीं करने की तारीख से लेकर निकासी के समय तक के लिए आप ब्याज पाने के योग्य होंगे। हालांकि, इस ब्याज पर टैक्स देना होगा। यहां आपकी नौकरी के दौरान की ब्याज आय टैक्स फ्री रहती है।

56 धोती, पैरों से खून… जब हजारीबाग जेल से भाग निकले थे जयप्रकाश

नयी दिल्‍ली । संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश का पूरा जीवन संघर्ष करते हुए बीता। धीरे-धीरे वह जेपी के नाम से मशहूर हो गए। आपातकाल के दौरान उनके नेतृत्‍व में जेपी आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार की चूलें हिला दी थीं। इस आंदोलन ने राजनीति की तस्‍वीर बदल दी थी। इसने इंदिरा से पीएम की कुर्सी छीन ली थी। इसके पहले जेपी भारत छोड़ो आंदोलन और सर्वोदय आंदोलन का हिस्‍सा रह चुके थे। इस स्‍वतंत्रता सेनानी से जुड़ा एक और बहुत दिलचस्‍प किस्‍सा है। यह आजादी से पहले का है। तब जयप्रकाश हजारीबाग जेल से भाग निकले थे। इसमें वह अकेले नहीं थे। वह अपने पांच साथियों के साथ जेल से फरार हुए थे। आजादी के इन मतवालों के जज्‍बे के सामने जेल की 17 फीट ऊंची दीवार भी बौनी पड़ गई थी। जेल से निकल भागने के लिए इन क्रांतिकारियों ने 56 धोतियों का इस्‍तेमाल किया था। इसने अंग्रेजी हुकूमत के मुंह पर कालिख पोत दी थी। तस्‍वीर में दिख रही यह वही ऐतिहासिक जेल है। 2001 में इस जेल का नाम जेपी पर कर दिया गया था।
वो साल 1942 था। दिन था 9 नवंबर। सब कुछ रोजमर्रा की तरह था। लेकिन, दिन ढलने के साथ कुछ बड़ा घटने वाला था। रात होते ही जयप्रकाश अपने पांच साथियों के साथ जेल से फरार हो गए थे। जेल की 17 फीट ऊंची दीवार फांदकर वो सभी बाहर निकल आए थे। इसमें उन्‍होंने 56 धोतियों का इस्‍तेमाल किया था। जेपी के साथ फरार होने वालों में रामानंद मिश्र, शालीग्राम सिंह, सूरज नारायण सिंह, योगेंद्र शुक्ला और गुलाब चंद गुप्‍ता शामिल थे। तब जेल में बंद क्रांतिकारियों ने जमकर दिवाली का जश्‍न मनाया था।
देखते ही गोली मारने के थे आदेश
दरअसल, 9 अगस्‍त 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। इसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। 91 हजार से ज्‍यादा लोगों को जेल में डाल दिया गया था। पुलिस फायरिंग में हजार से ज्‍यादा लोगों की जान गई थी। यही वह समय था जब जयप्रकाश हजारीबाग सेंट्रल जेल से भाग निकले थे।
जेल से फरार इन 6 क्रांतिकारियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 10 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया गया था। जंगलों में आजादी के इन 6 सिपाहियों को तलाशने के लिए ब्रितानी सैनिकों की दो कंपनियां लगाई गई थीं। जरूरत पड़ने पर देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया था। तब हजारीबाग जिला कमिश्‍नर केवीएस रमण की नींद उड़ गई थी। उनके आदमियों ने इन छह को ढूढने की पूरी कोशिश की। लेकिन, यह नाकाम साबित हुई।
तब 40 साल के थे जेपी
जब जेपी जेल से फरार हुए थे तब उनकी उम्र 40 साल थी। फरार होने की योजना तो अक्‍टूबर में ही थी। लेकिन, किन्‍हीं कारणों से इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। शुरुआत में जेपी समेत 10 लोगों का जेल से भागने का प्‍लान था। हालांकि, बाद में यह तय हुआ कि 6 लोग बाहर जाएंगे। बाकी के 4 गार्डों का ध्‍यान भटकाने का काम करेंगे। फरार होने वाले 6 क्रांतिकारियों में सबसे फुर्तीले योगेंद्र शुक्‍ला थे। वह तेजी से दीवारों पर चढ़-उतर लेते थे।
उसी दिन दिवाली थी। जेल में ढेरों दिये जल र‍हे थे। हिंदू वॉर्डनों को दिवाली की छुट्टी मनाने के लिए ड्यूटी से छुट्टी मिली थी। पूरे जेल में त्‍योहारी माहौल था। रात 10 बजे 6 लोग जेल के आंगन में पहुंचे। यह समय इसलिए चुना गया था क्‍योंकि वॉर्डन रात का भोजन करने के बाद अक्‍सर सिगरेट या पान खाने के लिए जाते थे। डिनर टेबल दीवार के पास रखी गई थी। शुक्‍ला घुटनों पर झुककर टेबल के ऊपर बैठ गए थे। एक दल वॉर्डनों पर नजर रख रहा था। इसके बाद सूरज नारायण सिंह के पेट के चारों ओर धोती लपेटी गई। गुलाब चंद, शुक्‍ला की पीठ पर चढ़े और सूरज गुलाब के कंधों पर चढ़कर दीवार पर चढ़ गए। चंद मिनटों में देखते ही देखते सभी क्रांतिकारी जेल के बाहर थे।
इस कवायद में जेपी के पैर में चोट आ गई थी। वह चलने में लाचार हो गए थे। साथ‍ियों ने उनके कटे पांव पर धोती बांध दी थी। वह फूल गया था और उसमें से तेजी से खूब बह रहा था। जब साथियों ने देखा कि उनके लिए चलना नामुमकिन है तो उन्‍होंने जेपी को कंधों पर बैठा लिया था। 30 नवंबर की रात को पूरा दल हजारीबाग क्रॉस करके गया गया जिले पहुंच गया था। वे सभी एक पत्‍थर के पास सोए थे। इसे आज जेपी रॉक के नाम से जाना जाता है। वहां से भागकर सभी एक गांव पहुंचे थे। यहां उन्‍होंने जेपी के दोस्‍तों के यहां शरण ली थी। 9 घंटे तक हजारीबाग जेल से उनके फरार होने की भनक तक नहीं लगी थी। यह संयोग ही था कि उस समय जेल सुप्रिंटेंडेंट टी नाथ 7 नवंबर से तीन हफ्तों के लिए छुट्टी पर थे। 9 नवंबर को उनका रिप्‍लेसमेंट पहुंचा था।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

413 करोड़ रुपये में नीलाम हुआ दुर्लभ गुलाबी हीरा

हांगकांग में एक अति दुर्लभ खूबसूरत गुलाबी हीरा 413 करोड़ रुपये में नीलाम हुआ है। हीरे के लिए जो बोली लगाई गई वह इसके अनुमान से दोगुना है। यह किसी नीलामी में प्रति कैरेट हीरे के लिए लगी बोली के मामले में विश्‍व रिकॉर्ड है। इस हीरे का नाम विलिम्‍सन पिंक स्‍टार है और यह 11.15 कैरेट का है। इसका नाम क्‍वीन एलिजाबेथ को शादी के गिफ्ट के रूप में दिए गए हीरे के नाम पर ही इसका नाम रखा गया है।
इस हीरे को हांगकांग में सूदबे ने एक अज्ञात खरीदार को बेचा है। लंदन के एक जूलरी शॉप के एमडी तोबिआस कोरमिंड ने बताया कि इस हीरे का संबंध दिवंगत रानी एलिजाबेथ से होने की वजह से इसको इतने ज्‍यादा पैसे मिले। उन्‍होंने कहा, ‘यह बहुत ही हैरान करने वाला परिणाम है।’ कोरमिंड ने कहा कि जब आप क्‍वीन एलिजाबेथ से इसका रिश्‍ता जोड़ते हैं तो इस दाम बढ़ जाता है और ऊपर से यह बहुत ही दुर्लभ है। उन्‍होंने बताया कि पिछले 10 साल में दुनिया के सबसे अच्‍छी क्‍वालिटी के हीरों के दाम दोगुना हो गए हैं।
तंजानिया की मवादुई खान में म‍िला यह हीरा
तकिये के आकार के इस हीरे का नाम दो अन्‍य विशाल पिंक डायमंड के नाम पर रख गया है। इसमें पहला हीरा 59.60 कैरेट का है जिसे पिंक स्‍टार डायमंड कहा जाता है। इस हीरे को साल 2017 में 71 मिलियन डॉलर में नीलाम किया गया था। वहीं दूसरा हीरा विलिम्‍सन है जो 23.60 कैरेट का है। इस हीरे को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ को कनाडा के भूगर्भशास्‍त्री जॉन विलिम्‍सन ने साल 1947 में गिफ्ट किया था। यह महारानी के पसंदीदा हीरों में शामिल था। उन्‍होंने इस हीरे को कई मौकों पर पहना था।
विलिम्‍सन हीरे का स्‍वामित्‍व तंजानिया के मवादुई खान के पास था जहां इस विलिम्‍सन और पिंक स्‍टार डायमंड को खुदाई में निकाला गया था। सूदबे के एक एशिया के अधिकारी वेनहाओ यू ने कहा, ‘गुलाबी हीरे की कोई भी खोज अपने आप में दुर्लभ होती है।’ पिंक डायमंड रंगीन हीरों में खासतौर पर बहुत खास होते हैं। यह कोई भी अभी पता नहीं लगा पाया है कि इनका रंग गुलाबी कैसे हो जाता है। इसका रंग ही इस हीरे को बहुत ही खास बनाता है।

नए श्रम कानून पर 31 से अधिक राज्य एवं केन्द्रशासित राज्य सहमत

एक साल नौकरी पर ग्रेच्युटी, 15 मिनट बढ़े तो ओवरटाइम
नयी दिल्ली । देश में जल्द लागू होने वाले श्रम कानून में संगठित और गैर संगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। ये कामगारों के लिए फायदेमंद साबित होंगे। कानून लागू होने पर एक साल काम करने पर ही कर्मचारी ग्रेच्युटी का हकदार होगा। अभी ग्रेच्युटी के लिए कम से कम 5 साल की नौकरी जरूरी है। तय समय से 15 मिनट भी ज्यादा काम लेने पर कर्मचारियों को ओवरटाइम मिलेगा। श्रम मंत्रालय के मुताबिक, 31 से ज्यादा राज्यों ने इसे स्वीकार लिया है। नए प्रावधान जल्द लागू किए जाएंगे।
नए नियम के तहत अब हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकेगा। इम्प्लोयर और इम्प्लोई की सहमति से कर्मचारी हफ्ते में 48 घंटे का काम चार दिन में भी पूरा कर सकेगा। बाकी दिन वह छुट्टी मना सकेगा। नए कर्मचारियों को लंबी छुट्टी लेने के लिए अब 180 दिन काम करना होगा। अभी 240 दिन तक काम करने के बाद ही लंबी छुट्टी का हक मिलता था।
कर्मचारी की मूल तनख्वाह हर माह की सीटीसी से 50 प्रतिशत या अधिक होगी
महिला कर्मचारियों की सहमति के बिना उन पर रात की पाली में काम का दबाव नहीं डाला जा सकेगा। नए नियम लागू होने के बाद कर्मचारी के हाथ में सैलरी तो कम आएगी, लेकिन प्रॉविडेंट फंड और ग्रेच्युटी ज्यादा मिलेगी। कर्मचारी की बेसिक सैलरी हर माह की CTC से 50% या अधिक होगी। नए कानून पर इंडियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस का कहना है कि नए कानून से श्रमिकों का बड़ा वर्ग कानून के दायरे से बाहर हो जाएगा। पहले जिस संस्थान में 20 लोग काम करते थे, उन्हें भी संरक्षण था। अब यह संख्या 50 करने का प्रावधान है।
ट्रिब्यूनल के फैसले तक हड़ताल नहीं
यदि किसी मुद्दे पर यूनियन और नियोक्ता के बीच बातचीत फेल हो जाती है तो जानकारी सरकार को दी जाएगी। इसके बाद मामला ट्रिब्यूनल भेज दिया जाएगा। जब तक वहां अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक कर्मचारियों को हड़ताल की इजाजत नहीं होगी। हड़ताल अवैध मानी जाएगी। यही नहीं, सामूहिक छुट्टी को भी हड़ताल की श्रेणी में रखा गया है।
कुछ बिंदुओं पर आपत्ति, चर्चा जारी
नए लेबर कोड (श्रम कानून) को सैद्धांतिक तौर पर 31 से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों ने स्वीकार कर लिया है। ज्यादातर ने नियम भी बना लिए हैं। सूत्रों की माने तो कुछ राज्यों ने कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताई है। इसके लिए बातचीत जारी है। नया लेबर कोड कब से लागू होगा, इसकी तारीख तो तय नहीं है, लेकिन मंत्रालय का कहना है जल्द लागू किया जाएगा।

कम डिटर्जेंट में वॉशिंग मशीन में चमकाएं कपड़े

कपड़े धोना पहले जितना मुश्किल काम नहीं रहा। कपड़े धोने के लिए आजकल ज्‍यादातर लोगों के पास वाशिंग मशीन होती है जिससे ये काम बस कुछ ही समय में आसानी से हो जाता है लेकिन बाजार में ऐसी कई ऑटोमेटिक मशीनें हैं। वॉशिंग मशीन चाहे ऑटोमैट‍िक हो या सेमी-ऑटो, इनके इस्तेमाल करने के कुछ नियम होते हैं । इनका ध्यान नहीं रखने पर कई बार वॉशिंग मशीन में कपड़े फट जाते हैं और कई अच्छे कपड़ो की रंगत भी गायब हो जाती है। सही जानकारी नहीं होने की वजह से हमें लगता है कि वॉशिंग मशीन में कपड़े अच्‍छे साफ नहीं होते हैं। यहां दिए गए कुछ आसान टिप्स की मदद से आप कपड़ों को अच्छे से साफ कर लेंगे –
1. कपड़े धोने से पहले उनको अलग-अलग श्रेणियों में बांट लें। ज्यादा गंदे कपड़ों को अगल कर लें और कम गंदे कपड़ों को अलग कर लें।
2. इसी तरह नए कपड़ों को अलग रखें और पुराने कपड़ों को अलग कर लें। इनमें कुछ भारी कपड़े होते हैं उनको अलग रख लें और हल्के कपड़ों को अलग कर लें।
3. कभी भी कपड़ों में सीधा सर्फ नहीं डालना चाहिए। पहले मशीन में पानी और सर्फ डालकर थोड़ी देर छोड़ दें फिर उसमें कपड़े डालें। कपड़े धोते समय ध्‍यान रखें कि कपड़ों की ज‍िप और हुक बंद हो।
4. कपड़े धोते वक्त पानी और ड‍िटर्जेंट पाउडर की मात्रा का ख्याल रखें। कम पानी में ज्यादा ड‍िटर्जेंट पाउडर से कपड़े खराब हो जाते हैं।
5. ड्रायर का इस्तेमाल हमें कम से कम करना चाहिए और कोशिश करें कि कपड़ों को धूप में ही सुखाएं. इससे कपड़े चमकदार बने रहते हैं।
6. वॉशिंग मशीन में नए कपड़े डालते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि कहीं वो रंग तो नहीं छोड़ रहा है। अगर कोई कपड़ा रंग छोड़ रहा है तो उसे वॉशिंग मशीन में नहीं डालना चाहिए।

एलेस बियालियात्स्की एवं सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज को शांति का नोबेल

2022 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा नार्वे नोबेल कमेटी की प्रमुख बेरिट रीज एंडर्सन ने ओस्लो में की। इस साल शांति का नोबेल पुरस्कार बेलारूस के मानवाधिकार कार्यकर्ता एलेस बियालियात्स्की के साथ-साथ रूसी मानवाधिकार संगठन मेमोरियल और यूक्रेन के मानवाधिकार संगठन सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज को दिया गया। नोबेल प्राइज की ओर से कहा गया, ‘नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अपने देश में नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने कई वर्षों तक नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और बढ़ावा देने के लिए सत्ता की आलोचना की है। उन्होंने युद्ध अपराधों, मानवाधिकारों के हनन और सत्ता के दुरुपयोग का दस्तावेजीकरण करने के लिए एक उत्कृष्ट प्रयास किया है। इसके साथ ही वे शांति और लोकतंत्र के लिए नागरिक समाज के महत्व को प्रदर्शित करते हैं’। एलेस बियालियात्स्की को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की वजह रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान बेलारूस, यूक्रेन और रूस से पुरस्कार विजेताओं के होने से एक स्पष्ट संदेश जाता है. समिति की ओर से कहा गया कि, “नार्वे की नोबेल समिति पड़ोसी देश बेलारूस, रूस और यूक्रेन में मानवाधिकार , लोकतंत्र और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के तीन उत्कृष्ट चैंपियनों को सम्मानित करना चाहती है.” वेबसाइट के अनुसार, “एलेस बियालियात्स्की 1980 के दशक के मध्य में बेलारूस में उभरे लोकतंत्र आंदोलन की शुरुआत करने वाले लोगों में शामिल थे. 1991 से पहले, जब पूर्व सोवियत संघ (Soviet Union) का पतन हुआ और स्वतंत्र देशों का उदय हुआ, मध्य एशिया और यूरोप के साथ कई देशों ने स्वतंत्रता-समर्थक आंदोलनों को देखे हैं। 1996 में राष्ट्रपति को तानाशाही शक्तियां देने वाले विवादास्पद संवैधानिक संशोधनों के जवाब में वियास्ना (स्प्रिंग) संगठन की स्थापना का श्रेय भी एलेस बियालियात्स्की को दिया जाता है।

‘मुक्तांचल’ पत्रिका के 35वें अंक का लोकार्पण

हावड़ा । विद्यार्थी मंच द्वारा गत 7 अक्टूबर को ‘मुक्तांचल’ पत्रिका के 35वे अंक के लोकार्पण के उपलक्ष्य में हिन्दी साहित्य में निराला के योगदान पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसका मुख्य विषय निराला की लंबी कविता *’राम की शक्ति पूजा’* थी। कार्यक्रम के आरंभ में हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक शेखर जोशी के निधन पर एक मिनट का मौन धारण किया गया। इसके पश्चात सुषमा कुमारी ने सरस्वती वंदना का पाठ कर विधिवत रूप से कार्यक्रम का आरंभ किया। कार्यक्रम में उपस्थित प्रिया श्रीवास्तव, सरिता खोवाला, स्वराज पांडे, रवींद्र श्रीवास्तव, रिया मिश्रा, युवराज राय द्वारा निराला की कविताओं का पाठ प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित राम नारायण झा, ‘शब्दकार’ के संस्थापक प्रदीप धानुक, प्रिंस कुमार ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ प्रस्तुत किया। विवेक कुमार लाल ने *’राम की शक्ति पूजा’* का भावपूर्ण पाठ प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। अपने संबोधन में उन्होंने यह भी बताया कि *’मुक्तांचल’* पत्रिका के इस 35वें अंक के आवरण पृष्ठ पर बना चित्र पत्रिका की संपादक मीरा सिन्हा के द्वारा बनाया गया है। वह एक सफल शिक्षिका, समृद्ध लेखिका के साथ- साथ एक कुशल चित्रकार भी हैं। युवा कवयित्री श्रद्धा गुप्ता ने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से निराला के जीवनी को प्रस्तुत किया। सभी ने उनके इस प्रयास की सराहना की।
कार्यक्रम में उपस्थित सुरेन्द्र नाथ इवनिंग कॉलेज की युवा प्रवक्ता दिव्या प्रसाद ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य एक सुखद पहल है। किताबें खामोश रहकर हमें बोलना सिखाती हैं, पढ़ना सिखाती हैं और भीड़ में हमारा हाथ थाम हमें चलना सिखाती हैं। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. विनय मिश्र ने अपने वक्तव्य में निराला के साहित्य सृजन में उनकी पत्नी मनोहरा देवी के योगदानों को रखा। निराला के विभिन्न रचनाओं पर बात करते हुए उन्होंने निराला की बात रखी – ‘जो योग्य होगा वह जीतेगा’। कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. ऋषिकेश राय ने अपने वक्तव्य में छायावाद एवं निराला तथा अन्य छायावादी कवियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कवि अपनी कविताओं में जितनी बार मरता है कविता उतनी ज्यादा निखरती है और निराला अपनी कविताओं में बार-बार मरते रहे हैं। इसके साथ उन्होंने ‘राम की शक्ति पूजा’ के प्राम्भिक अंश का पाठ प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन श्रीप्रकाश गुप्ता ने किया। पत्रिका की संपादक मीरा सिन्हा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन कर कार्यक्रम को विराम दिया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में बलराम साव, सुशील पांडेय आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई।

शुभजिता दीपोत्सव 2022 : गोकुलश्री के बकलावा बॉक्स, केसर खजूर एवं पटाखा बॉक्स की माँग बढ़ी

कोलकाता । महानगर के अग्रणी मिष्ठान एवं नमकीन प्रतिष्ठान ने दिवाली पर केन्द्रित थीम और डिजाइन के साथ मिठाइयों को नये अन्दाज में पेश किया है। आकर्षक और थीम आधारित भव्य पैकेजिंग में उपलब्ध यह मिठाइयाँ पसन्द भी खूब की जा रही हैं। पिछले 30 वर्ष से व्यवसाय में सक्रिय गोकुल श्री आज एक प्रतिष्ठित ब्रांड है। गोकुल श्री स्वीट एंड स्नैक्स के श्री लक्ष्मीकांत बालासरिया ने बताया कि इस बार दिवाली पर गोकुल श्री ने कुछ खास मिठाइयाँ पेश की हैं। जगदीश चंद्र बोस रोड स्थित गोकुल श्री के शो रूम से ग्राहक केसर मिठाइयाँ, नमकीन, सूखे मेवे से लेकर चॉकलेट एवं आयातित फल (इम्पोर्टेड फ्रूट्स) खरीद सकते हैं। मिठाइयों को चांदी एवं सुनहरे वर्क से सजाया गया है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी गोकुल श्री की मिठाइयाँ काफी अच्छी हैं। इस बार बकलावा प्लैटर पेश किया गया है जो तुर्की की मिठाई है।

यह पटाखा नहीं, मिठाई है

लक्ष्मीकांत ने कहा चॉकलेट फ्लेवर की मिठाइयाँ लोग परन्द कर रहे हैं और गोकुल श्री का प्रयास रहता है कि ग्राहकों को उच्च गुणवत्ता वाली मिठाइयाँ उपलब्ध करवायी जाये और उनके लिए वह पैसा वसूल हो। दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए बालासरिया ने कहा कि इस साल की दिवाली में हमारे ग्राहक बकलवा बॉक्स, केसर खजूर और पटाखा बॉक्स समेत कई नए बॉक्स देखने वाले हैं। पटाखा स्वीट बॉक्स के लोग दीवाने हैं। गोकुल श्री मिठाइयों में नवीनता के लिए जाना जाता है और यह हमेशा रहेगा ।

‘हिंदी नाटक और रंगमंच चुनौतियाँ एवं संभावनाएं’ दो दिवसीय राष्ट्रीय रंग संगोष्ठी

कोलकाता । पश्चिम बंगाल हिंदी अकादमी सूचना एवं संस्कृति विभाग, पश्चिम बंग सरकार द्वारा आयोजित द्वितीय दो दिवसीय राष्ट्रीय रंग संगोष्ठी का आयोजन रवींद्र सदन के बंगला अकादमी में आयोजित की गयी। चार सत्रों में विभाजित संगोष्ठी का विषय “हिंदी नाटक और रंगमंच चुनौतियाँ एवं संभावनाएं ” था। इस कार्यक्रम का उद्घाटन रंग निर्देशिका और अभिनेत्री अनुभा फतेहपुरिया ने किया। विशिष्ठ अतिथि के रुप में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक व अभिनेता प्रेम मोदी ने सिनेमा और रंगमंच पर अपनी बात रखते हुए कहा, ‘थियेटर ही अच्छे कलाकार को बनाता है अच्छे कलाकार की जन्मभूमि थियेटर ही है। संगोष्ठी में बीज वक्तव्य सुमन कुमार ने दिया। उन्होने कहा, ‘बहुत कुछ है बोने के लिए धरती पर क्या बोना है, यह हमें ही देखना है। अगर प्रेम बोयेंगे तो प्रेम और घृणा बोयेंगे तो घृणा ही मिलेगी। हमें कल्पनाओं में देखा हुआ बड़ा सपना हमें ,यथार्थ में बदलने की कोशिश करनी चहिए। हमारे समाज में रंगमंच का होना बहुत जरूरी है । वक्ता के रुप में कोलकाता से डॉ. अरुण होता ने कहा कि भाषा कभी भी हमारे सामने रुकावट बन कर नहीं आती विरोध करना हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है हमारी रचना में प्रतिरोध का होना अनिवार्य है वरना हमारे लेखन का कोई उद्देश्य नहीं रह जाता।रंगकर्मी एवं लिटिल थेस्पियन की निदेशक अभिनेत्री उमा झुनझुनवाला ने कहा कि कलाकार ,निर्देशक, नाट्यकर्ता और रंगमंच से जुड़ी हर एक चीज की जानकारी होनी चाहिए। नाटक में जितनी जरूरत अभिनेता ,निर्देशक ,मंच, लाइट और बाकी सब चीजों की होती है,उतनी ही जरूरत दर्शकों की भी होती है। प्रथम सत्र का सफल संचालन डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने किया ।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. प्रताप सहगल ने की। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. गीता दूबे ने नाटक के अनुवाद पर अपनी बात रखते हुए कहा कि अनुवाद की समीक्षा करना कठिन है अनुवाद करना ऐसा होता है जैसे इतर एक शीशी से दूसरे शीशी में करने पर भी उसकी सुगंध पहले वाली शीशी में रह जाती है। जितेंद्र पात्र ने प्रकाशन पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नाटक का रूपांतरण हर बार अलग-अलग तरीके से होता रहा है लेकिन इसे कहीं ना कहीं से व्यापारिक क्षेत्र की दृष्टि से भी देखा जा सकता है। इस सत्र के अध्यक्ष प्रताप सहगल ने अनुवाद रूपांतरण प्रकाशक और मौलिक नाटकों पर बात करते हुए कहा कि काव्य ही काव्य का मूल है जो मंच पर नाटक करते हैं और जो पाठकों है उनके अंदर भी गतिशीलता होनी चाहिए। रस की अवधारणा भरत मुनि में थी। धीरे-धीरे रस की अवधारणा खत्म होने के कगार पर है पर पाठक अभी भी पढ़ते समय रस खोजते हैं। नाटक की पहली शर्त यह होनी चाहिए कि कि जब एक अभिनेता मंच पर जाए तो वह भावनाओं से परिपूर्ण होकर जाए ना कि अपने अंदर अहिंसा लेकर जाए। दूसरे सत्र का संचालन प्रो. अल्पना नायक ने किया।

तीसरे सत्र की अध्यक्षता महेश जायसवाल ने की। वक्ता राजेश कुमार ने नुक्कड़ नाटकों पर बात करते हुए कहा कि व्यक्तिगत शैली की तरह नुक्कड़ नाटक होना चाहिए। डॉ प्रज्ञा ने नुक्कड़ नाटक की राजनीतिक और सामाजिक चेतना पर अपनी बात रखी तथा। इस सत्र के अध्यक्ष  महेश जायसवाल ने कहा कि नाटक साहित्य का एक मुख्य अंग है और हम साहित्य से अलग नाटक को नहीं देख सकते है। तीसरे सत्र का संचालन इतु सिंह ने किया। अंत में इस तीनों सत्र का धन्यवाद ज्ञापन पश्चिम बंगाल हिंदी अकादमी, कला विभाग की संयोजिका उमा झुनझुनवाला ने किया।

चतुर्थ सत्र में ‘ शोधर्थियों द्वारा रंगमंच पर शोध – पत्र का पाठ ‘ विषय के अंतर्गत पार्वती कुमारी शॉ ने ‘ अज़हर आलम के मौलिक नाटकों का विश्लेषण ‘पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया और सुलगते चिनार, नमक की गुड़िया, रूहें और चाक की समीक्षा पेश की । शोधार्थी सोनम सिंह ने अपने शोध पत्र ‘ भीष्म साहनी के नाटक पर में रंगमंचीयता ‘ पर बात रखी और ,माधवी ,हनुस, मुआविजा और कबिरा खड़ा बाजार में नाटकों के संबंध पर विचार रखे। इसी क्रम में आगे डॉ इबरार खान अपने शोध पत्र ‘समकालीन हिंदी उर्दू नाटकों में स्थित भ्रष्टाचार और बेरोजगारी ‘ को प्रस्तुत किया। उन्होंने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से जुड़ी रचना सीढ़ियां ,ताजमहल का उद्घाटन, कानून के ताज़िर , मुआव़जे, जैसे रचनाओं पर अपनी बात रखी। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए रंगकर्मी जितेंद्र सिंह ने कहा कि शोध आगे की और पीछे की इतिहास को एकत्र करता है। संचालन मधु सिंह ने किया।
पंचम सत्र में ‘ आधुनिक रंगमंच के विकास में स्त्रियों का अवदान ‘ विषय के संबंध में संगम पांडेय ने कहा कि नाट्य शास्त्र के परिमार्जन से लेकर आज के आधुनिक रंगमंच में चाहे वह लेखन के क्षेत्र में हो, अभिनय के क्षेत्र में हो या फिर किसी नाट्य संस्था के विकास में स्त्रियों ने आगे बढ़कर काम किया है। प्रवीण शेखर ने कहा कि नाट्य लेखन के क्षेत्र में स्त्रियों ने मौलिक नाटक से लेकर अनुदित और रूपांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है- जैसे मन्नू भंडारी, मीरा कांत ,उमा झुनझुनवाला, गुंजन अज़हर , वहीं नाटकों की समीक्षा के क्षेत्र में गिरीश रस्तोगी की मुख्य भूमिका के संबंध में अपना वक्तव्य रखें। अध्यक्षता करते हुए डॉ. सत्या उपाध्याय ने कहा कि आधुनिक रंगमंच के विकास में स्त्रियों ने व्यक्तिगत तौर पर रंगमंच के विकास में लगी हुई हैं। पश्चिम बंगाल में ही प्रतिभा अग्रवाल, उषा गांगुली, चेतना जलान, उमा झुनझुनवाला, कल्पना झा ,अनुभवा फतेपुरिया जैसे रंगकर्मी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संचालन करते हुए वसुंधरा मिश्रा ने कहा कि बंगाल की धरती में रंगकर्म को समृद्ध करने में स्त्रियों ने अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है।
षष्ट सत्र में भारतीय ‘ आधुनिक हिंदी रंगमंच के पड़ाव और चुनौतियाँ ‘ विषय के संबंध में जे पी सिंह ने कहा कि भारतेंदु युग ,प्रसाद युग और प्रसादोत्तर युग के बाद आधुनिक हिंदी रंगमंच को हम किस नाम से पुकारे, यह प्रश्न अब तक बना है यही भारतीय हिंदी रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती है। वहीं डॉ मृत्युंजय प्रभाकर ने कहा कि भारतीय हिंदी रंगमंच के पड़ाव का विकास तब होगा, जब रंगमंच से कमाने वाले रंगमंच के लिए ख़र्च करेंगे। अध्यक्षता करते हुए प्रताप जायसवाल ने कहा कि नाटक करना आज स्वयं में एक चुनौती है,सच की जुबान है नाटक ,नाटक का मंचित होकर अर्थ का विस्तार होते जाना रंगमंच का एक पड़ाव है। भारतीय रंगमंच में भाषा कभी भी बाध्यता नहीं बनी । दर्शकों का विस्तार को बढ़ाना सबसे बड़ी माँग है आज के रंगमंच की । इस सत्र का संचालन डॉ सुफिया यास्मीन ने किया। अंत में उमा झुनझुनवाला ने कोलकाता के सभी कॉलेज के प्रोफ़ेसरों के प्रति आभार व्यक्त किया और विद्यार्थियों को प्रेरित किया।