Saturday, March 14, 2026
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रेलवे खिड़की से मिलने वाले तत्काल टिकटों के लिए लागू करेगा ओटीपी प्रणाली

नयी दिल्ली। भारतीय रेल ने यात्रियों की सुविधा और पारदर्शिता को और मजबूत करने के उद्देश्य से खिड़की से मिलने वाले तत्काल टिकटों के लिए ओटीपी आधारित टिकटिंग प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया है। यह नई व्यवस्था अगले कुछ दिनों में देशभर के सभी आरक्षण काउंटरों पर लागू कर दी जाएगी। रेल मंत्रालय के अनुसार यह कदम तत्काल सुविधा के दुरुपयोग पर प्रभावी रूप से रोक लगाने और वास्तविक यात्रियों को अधिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए उठाया जा रहा है। रेलवे ने जुलाई 2025 में ऑनलाइन तात्काल टिकटों के लिए आधार-आधारित प्रमाणीकरण शुरू किया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में सामान्य आरक्षण के प्रथम दिन ऑनलाइन टिकट बुकिंग पर ओटीपी आधारित प्रणाली लागू की गई। इन दोनों पहल को यात्रियों ने व्यापक रूप से स्वीकार किया, जिससे टिकटिंग प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी। इसी क्रम में, 17 नवम्बर 2025 को रेलवे ने आरक्षण काउंटरों पर तात्काल टिकटों के लिए ओटीपी आधारित प्रणाली का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। वर्तमान में यह सुविधा 52 ट्रेनों तक विस्तारित की जा चुकी है। इस व्यवस्था के तहत, तात्काल टिकट बुक कराते समय यात्री के द्वारा फॉर्म में दिए गए मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी भेजा जाता है। ओटीपी सत्यापन के बाद ही टिकट जारी किया जाता है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों में इस ओटीपी आधारित तात्काल आरक्षण प्रणाली को सभी शेष ट्रेनों में लागू कर दिया जाएगा। इससे टिकटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता, सुरक्षा और यात्रियों की सुविधा में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

हाईकोर्ट ने बहाल की रद्द की गयी 32 हजार प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति रद्द होने के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने बुधवार को जस्टिस (सेवानिवृत्त) अभिजीत गांगुली के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य के प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त 32 हजार शिक्षकों की नौकरी रद्द कर दी गई थी।
जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस ऋतब्रत कुमार मित्रा की डिवीजन बेंच ने दोपहर में फैसला सुनाते हुए कहा कि नौ साल सेवा देने के बाद यदि इन शिक्षकों को हटाया जाता है तो इसका गंभीर प्रभाव उनके परिवारों पर पड़ेगा। साल 2014 में आयोजित टीईटी के आधार पर कुल 42,500 प्राथमिक शिक्षक नियुक्त किए गए थे। साल 2023 में जस्टिस अभिजीत गांगुली ने इनमें से 32 हजार नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। आरोप था कि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। साथ ही, उन्होंने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर नई भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था।
इसके खिलाफ राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में अपील की, जहां जस्टिस सुब्रत तालुकदार और जस्टिस सुप्रतीम भट्टाचार्य की बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और सरकार को छह माह का समय दिया। बाद में मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा, जहां से इसे अंतिम सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय भेजा गया। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले आया यह फैसला तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि शिक्षा विभाग से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप लंबे समय से पार्टी को घेरे हुए थे। वहीं, विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जस्टिस गांगुली ने “सही काम किया था।” उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के शासन में किसी भी सरकारी नौकरी की परीक्षा पारदर्शी तरीके से नहीं हुई। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ छिटपुट गलतियों और अपराधों को पूरी शिक्षा व्यवस्था की विफलता की तरह पेश किया जा रहा है। राज्य सरकार पारदर्शी तरीके से भर्ती कर रही है। जहां गलतियां हुई हैं, उन्हें सुधारा जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि योग्य उम्मीदवारों को जल्द से जल्द नौकरी मिले। उन्होंने विपक्ष पर राजनीतिक लाभ के लिए मामले को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि इसमें भाजपा, सीपीएम और कांग्रेस के एक वर्ग की मिलीभगत है। उल्लेखनीय है कि, इस वर्ष मार्च में उच्चतम न्यायालय ने राज्य के कक्षा 9 से 12 तक के 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। इसके बाद से शिक्षा विभाग से जुड़ी नियुक्तियों पर कानूनी और राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता गया।
उच्च न्यायालय के ताजा आदेश से फिलहाल प्राथमिक स्तर की भर्ती विवाद में बड़ी राहत मिली है।

केंद्र की ओबीसी सूची से हटाई गईं बंगाल की मुस्लिम समुदाय की 35 जातियां

कोलकाता। केंद्र की पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग (एनसीबीसी) द्वारा पश्चिम बंगाल की मुस्लिम समुदाय की 35 जातियों को केंद्रीय ओबीसी सूची से हटाने के फैसले पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। भाजपा ने बुधवार को कहा कि यह कदम साबित करता है कि राज्य में ममता बनर्जी सरकार ने वर्षों तक तुष्टिकरण की राजनीति की है, जिससे वास्तविक रूप से पिछड़े हिन्दू वर्ग अपने उचित अधिकारों से वंचित रहे। यह जानकारी समाज कल्याण एवं अधिकारिता मंत्रालय के राज्य मंत्री बी. एल. वर्मा ने संसद में एक असितारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में दी है। यह प्रश्न नदिया जिले के रानाघाट से भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने पूछा था। मंत्री के उत्तर में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल राज्य के लिए केंद्रीय ओबीसी सूची से 35 जातियों को बाहर करने की सलाह पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग ने 03.01.2025 को दी थी। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख और पश्चिम बंगाल के केन्द्रीय पर्यवेक्षक अमित मालवीय ने कहा कि धार्मिक समुदायों को ओबीसी समूहों में शामिल कर वोट बैंक मजबूत करने की राजनीति वर्षों से चलती रही है, जिसका खामियाज़ा वास्तविक रूप से पिछड़े हिन्दू समुदायों को भुगतना पड़ा। मालवीय ने कहा कि मोदी सरकार तुष्टिकरण आधारित विकृतियों को सुधार रही है और यह सुनिश्चित कर रही है कि सामाजिक न्याय केवल वास्तविक पिछड़ेपन के आधार पर मिले, न कि वोट बैंक की राजनीति के आधार पर। ममता बनर्जी की राजनीति अब पुरानी पड़ चुकी है। इधर, पश्चिम बंगाल ओबीसी सूची के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी थी और साफ कहा था कि जब तक मामला शीर्ष अदालत में लंबित है, तब तक कलकत्ता हाई कोर्ट इस पर कोई और कार्यवाही नहीं करेगा। इस वर्ष 17 जून को हाई कोर्ट की खंड पीठ ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार को नई ओबीसी सूची की अंतिम अधिसूचना 31 जुलाई तक प्रकाशित नहीं करने का निर्देश दिया था।

शिमला में तीन दोस्तों ने पहाड़ काटकर बनाया खेल मैदान

– अब क्रिकेट स्टेडियम की तैयारी

शिमला । हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में वर्षों से युवाओं को अच्छी क्रिकेट सुविधाओं का इंतजार था, लेकिन इस कमी ने तीन युवाओं बिनू दीवान, अजय और अभय को ऐसा प्रेरित किया कि उन्होंने असंभव दिखने वाले सपने को हकीकत में बदल दिया। कसुम्पटी विधानसभा क्षेत्र के पड़ेची गांव में 5,400 फीट की ऊंचाई पर बन रहा यह शानदार क्रिकेट स्टेडियम अपने आप में मिसाल है। प्राकृतिक खूबसूरती के बीच खड़ा यह मैदान आधुनिक सुविधाओं से लैस है और गुणवत्ता में किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम से कम नहीं माना जा रहा। तीनों युवा शिमला के रहने वाले हैं और व्यवसायी हैं। तीनों का अपना-अपना अलग निजी व्यवसाय है। पहाड़ की कटिंग सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य करीब पांच-छह साल पहले शुरू हुई इस पहल को मुकाम तक पहुंचाना आसान नहीं था। इन्होंने पहले पहाड़ीनुमा निजी भूमि को खरीदा था। बिनू दीवान ने बताया कि 45 डिग्री से अधिक ढलान वाले पहाड़ को काटकर उसे खेल मैदान का आकार देना सबसे कठिन काम था। करीब 70 हजार टिप्पर मलबा पहाड़ से निकाला गया। जब काम शुरू हुआ, तब वहां मशीनरी ले जाने तक की सुविधा नहीं थी। तीनों युवाओं ने सबसे पहले सड़क बनाई, फिर लगभग 150 मीटर लंबी और 20 से 40 मीटर ऊंची मजबूत रिटेनिंग वॉल खड़ी की। इन दीवारों ने मैदान को सुरक्षित आधार दिया। लगभग 90 बीघा क्षेत्र में बने इस मैदान को समतल करते हुए 91 मीटर चौड़ा और 120 मीटर लंबा ग्रीन आउटफील्ड तैयार किया गया। चारों ओर बिछी सघन हरी घास और पूरी तरह लेवल मैदान इसे खेलने योग्य बनाते हैं। स्टेडियम का करीब 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और क्रिकेटर्स यहां अभ्यास भी शुरू कर चुके हैं।

सरकारी परियोजना अटकी, युवाओं ने कर दिखाया कमाल – यह भी खास है कि जहां शिमला के कटासनी में सरकार 15 साल में भी इंडोर स्टेडियम पूरा नहीं कर सकी, वहीं तीन युवाओं ने बिना सरकारी बजट और निजी संसाधनों से सिर्फ चार साल में पहाड़ काटकर आधुनिक सुविधाओं वाला मैदान तैयार कर दिया। यही कारण है कि अब शिमला, सिरमौर, किन्नौर, सोलन, मंडी और बिलासपुर के युवा इस मैदान को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण मंच मान रहे हैं। धर्मशाला भले एक अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम हो, लेकिन हर युवा वहां नहीं पहुंच पाता। ऐसे में पड़ेची स्टेडियम पहाड़ी खिलाड़ियों के लिए उम्मीद की नई किरण साबित हो रहा है। अप्रैल 2026 में पड़ेची मैदान में होगा प्रो-एचपीसीएल क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक बड़ा मौका तब आएगा जब हिमाचल प्रीमियर क्रिकेट लीग प्रो-एचपीसीएल का चौथा सीजन अप्रैल 2026 में इसी मैदान पर आयोजित होगा।

इससे पहले तीनों सीजन शिमला में मैदान न होने के कारण चंडीगढ़ में कराने पड़े थे। अब अपने मैदान में पहली बार इतने बड़े आयोजन का रोमांच देखने को मिलेगा। युवाओं के लिए बनेगा क्रिकेट स्कूल बिनू दीवान का अगला लक्ष्य इस मैदान में प्रोफेशनल क्रिकेट स्कूल शुरू करना है, ताकि पहाड़ी युवा खेल प्रशिक्षण लेकर बड़े स्तर पर अपनी पहचान बना सकें। उनका कहना है कि वे युवाओं को नशे और मोबाइल की लत से बाहर लाकर खेल के मैदान में लाना चाहते थे और यही सोच उन्हें इस मिशन तक लाई। पड़ेची स्टेडियम तक पहुंचना भी अब आसान हो गया है। शिमला से मेहली-अश्वनी खड्ड मार्ग से यह दूरी लगभग 11 किलोमीटर है, जबकि चायल रोड मार्ग से लगभग 35 किलोमीटर पड़ती है।

बंगाल में भी महंगी हुई शराब

-सरकार को चार हजार करोड़ की अतिरिक्त आय की उम्मीद

कोलकाता। राज्य सरकार की पूर्व घोषणा के अनुसार एक दिसंबर से पश्चिम बंगाल में शराब की कीमतों में बढ़ोतरी लागू हो गई है। नए नियम के तहत राज्य में नया आबकारी शुल्क प्रभावी हो गया है। पश्चिम बंगाल के आबकारी विभाग ने स्पष्ट किया है कि बीयर को छोड़कर देशी व विदेशी सभी तरह की शराब पर अतिरिक्त टैक्स लगाया गया है। आबकारी विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, नई नीति में 750 मिलीलीटर विदेशी शराब की बोतलें 30–40 रुपये तक महंगी हो गई हैं। वहीं 180 मिलीलीटर पैक पर 10 रुपये की वृद्धि की गई है। देशी शराब खरीदने पर भी उपभोक्ताओं को लगभग 10 रुपये अतिरिक्त चुकाने होंगे। विभाग ने शराब विक्रेताओं को पहले ही निर्देश दिया था कि उनके पास मौजूद पुराने स्टॉक को 30 नवंबर तक पुरानी कीमतों में बेच देना होगा। एक दिसंबर से पुराने स्टॉक समेत नया माल भी नई कीमतों पर ही बेचा जाएगा। इसके लिए प्रत्येक बोतल पर नई कीमत का स्टिकर लगाना अनिवार्य है।पुरानी कीमत पर शराब बेचते पकड़े जाने पर विक्रेता के खिलाफ जुर्माना, यहां तक कि लाइसेंस रद्द करने तक की सख्त कार्रवाई की जा सकती है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले चुनावों से पहले राज्य की राजस्व-आय बढ़ाने के उद्देश्य से ममता बनर्जी सरकार ने यह कदम उठाया है। प्रशासनिक अधिकारियों के एक वर्ग का कहना है कि इस बढ़ोतरी से 2025–26 वित्त वर्ष में करीब चार हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त राजस्व आय होने की संभावना है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि बढ़े हुए राजस्व का उपयोग सरकार विकास योजनाओं में आवंटित कर सकती है। अगले साल चुनाव से पहले राज्य सरकार का अंतरिम बजट पेश होना है, जिसमें इस अतिरिक्त आय को विकास परियोजनाओं में खर्च करने की घोषणा की जा सकती है। यही वजह बताई जा रही है कि राज्य में शराब के दामों में वृद्धि की गई है।

सावधान ! नाबालिगों में भी मिले एचआईवी के वायरस

– मालदह जिले में तीन हजार से अधिक मरीज
-पश्चिम मेदिनीपुर में सात महीनों में एचआईवी के सौ से अधिक मरीज मिले
मालदह। मालदह जिले में एचआईवी पॉजिटिव और एड्स से पीड़ित लोगों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में जिले में तीन हजार 100 संक्रमित मरीज दर्ज किए गए हैं। इनमें 300 नाबालिग शामिल हैं, जिनकी उम्र 15 वर्ष से कम है। जिले के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सुदीप्त भादुड़ी ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, मालदह के कई गांवों में काला ज्वर से कई लोगों की मौत हुई है। इनमें से बड़ी संख्या में मरीज एचआईवी पॉजिटिव पाए गए। यही नहीं, टीबी से पीड़ित कई मरीजों में भी एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई है। टीबी से होने वाली मौतें अब भी जिले में जारी हैं, जिससे विभाग की चिंता और भी बढ़ गयी है। सोमवार को जिले के स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि एचआईवी रोकथाम के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। इसके लिए चिकित्सकों की विशेष टीम बनाई गई है। गर्भवती महिलाओं में एचआईवी संक्रमण की पहचान होने पर उनके लिए विशेष देखभाल और निगरानी की व्यवस्था की जाएगी। बच्चों के लिए भी अलग उपचार योजना तैयार की गई है ताकि संक्रमण आगे न फैले। इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि संवेदनशील क्षेत्रों में सख्त निगरानी बढ़ाई जा रही है। संक्रमण रोकथाम को ध्यान में रखते हुए लगातार मॉनीटरिंग की जा रही है। मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि लोगों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। इसके लिए जिला प्रशासन, नगर पालिका और पंचायतों के साथ मिलकर जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक टैब्लो भी तैयार किया गया है, जो विभिन्न क्षेत्रों में घूमकर लोगों को जानकारी दे रहा है। अंत में अधिकारी ने कहा कि हमारा लक्ष्य केवल मरीजों को उपचार देना नहीं, बल्कि आने वाले समय में एक एड्स-मुक्त समाज का निर्माण करना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात महीनों में केवल पश्चिम मेदिनीपुर जिले में ही एचआईवी संक्रमण के सौ से अधिक मामले सामने आए हैं। घाटाल, खडग़पुर और मेदिनीपुर सदर क्षेत्रों में इस बीमारी का प्रभाव अधिक देखा जा रहा है। जिला स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि गर्भवती महिलाओं में भी संक्रमण की दर चिंताजनक है। भले ही पिछले वर्षों की तुलना में मामलों की संख्या कुछ कम हुई है, फिर भी स्थिति को गंभीर माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच कुल 32 हजार 453 लोगों की जांच की गई। इनमें से 106 लोगों में एचआईवी संक्रमण पाया गया। अधिकांश संक्रमित मरीज वर्तमान में उपचाराधीन हैं। इसी अवधि में चार हजार 720 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, जिनमें 13 महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव पाई गईं, जबकि छह महिलाएं सिफिलिस से संक्रमित मिलीं। वित्त वर्ष 2024–25 में डेबरा में 16, घाटाल में 24, खडग़पुर में 28 और मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज में 73 संक्रमित मरीज मिले थे। वहीं इस वर्ष अक्टूबर तक ये संख्या घटकर डेबरा में पांच, घाटाल में 18, खडग़पुर में 15 और मेदिनीपुर में 35 रह गई है। जिला मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी सौम्यशंकर सारंगी ने बताया कि चिन्हित लगभग सभी एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों को उपचार के दायरे में लाया गया है और उनका नियमित इलाज चल रहा है। उनके अनुसार, वर्षभर जागरूकता अभियान और विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से संक्रमण रोकने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस प्रयास में ‘संपूर्णा’, ‘स्पर्श’ और ‘अग्रगामी महिला एवं बाल कल्याण समिति’ जैसी कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी आगे आई हैं। ये संगठन स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर विभिन्न क्षेत्रों में शिविर लगाकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं।

15 भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर 58,000 करोड़ की देनदारी

-विजय माल्या और नीरव मोदी का भी नाम
नयी दिल्ली । केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोमवार को लोकसभा को सूचित किया कि 31 अक्टूबर, 2025 तक भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (एफईओए) के तहत कुल 15 व्यक्तियों को भगोड़ा आर्थिक अपराधी ( एफईओ) घोषित किया गया है। यह जानकारी संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा सदस्य और दौसा से कांग्रेस सांसद मुरारी लाल मीणा द्वारा उठाए गए एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में साझा की गई। मीणा ने लोकसभा में वित्त मंत्री से पूछा कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 के तहत आज तक कितने व्यक्तियों को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया गया है, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर किए गए वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित मामलों में; इन घोषित भगोड़े आर्थिक अपराधियों द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को हुई कुल वित्तीय हानि (रुपये में) का विवरण, नाम-वार और बैंक-वार; निपटान में शामिल व्यक्तियों का नाम और संख्या, संबंधित बैंकों के नाम, निपटाई गई राशि और दी गई छूट। चौधरी ने कहा कि इन 15 अपराधियों में से नौ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ बड़े पैमाने पर की गई वित्तीय धोखाधड़ी में शामिल हैं। इस सूची में विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि इन 15 भगोड़े आर्थिक अपराधियों (एफईओ) ने सामूहिक रूप से 31 अक्टूबर, 2025 तक बैंकों को 26,645 करोड़ रुपये का मूल वित्तीय नुकसान पहुँचाया है। इसके अलावा, इन ऋणों पर एनपीए बनने की तिथि से 31 अक्टूबर, 2025 तक अर्जित ब्याज 31,437 करोड़ रुपये है। चौधरी ने सदन को बताया कि 31 अक्टूबर, 2025 तक इन अपराधियों से 19,187 करोड़ रुपये वसूल किए जा चुके हैं। घोषित भगोड़े आर्थिक अपराधियों के नाम हैं: विजय माल्या, नीरव मोदी, नितिन जे संदेसरा, चेतन जे संदेसरा, दीप्ति सी संदेसरा, सुदर्शन वेंकटरमन, रामानुजम शेषरत्नम, पुष्पेश कुमार बैद और हितेश कुमार नरेंद्रभाई पटेल। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार ऐसी कोई नीति बना रही है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसे अपराधियों को भविष्य में कानूनी प्रतिबंधों या निगरानी सूची के माध्यम से देश छोड़ने से रोका जा सके, पंकज चौधरी ने कहा कि वर्तमान में ऐसी कोई नीति तैयार नहीं की जा रही है।

अब स्मार्ट फोन में संचार साथी’ ऐप अनिवार्य

नयी दिल्ली । दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने भारत में स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अपने सभी नए मोबाइल फोनों में सरकार द्वारा विकसित साइबर सुरक्षा ऐप ‘संचार साथी’ को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करें। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उपयोगकर्ता इस ऐप को अपने फोन से डिलीट नहीं कर पाएंगे। सरकार का कहना है कि यह कदम उपभोक्ताओं को ऑनलाइन धोखाधड़ी, फर्जी कॉल-मैसेज और मोबाइल चोरी जैसी बढ़ती घटनाओं से बचाने के बड़े अभियान का हिस्सा है। निर्देश के तहत कंपनियों को तीन महीने के भीतर इसे लागू करना होगा। इसका सीधा प्रभाव एप्पल, सैमसंग, शाओमी, ओप्पो, वीवो जैसे प्रमुख स्मार्टफोन निर्माताओं पर पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों ने इस निर्देश पर तत्काल टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कई निर्माता इस कदम पर आपत्ति जता सकते हैं। अब तक ‘संचार साथी’ एक वैकल्पिक ऐप था, जिसे उपयोगकर्ता एप्पल या गूगल ऐप स्टोर से अपनी इच्छा से डाउनलोड करते थे। लेकिन नए निर्देश के बाद यह ऐप हर नए फोने में पहले से मौजूद होगा और पुराने फोनों में सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से जोड़ा जाएगा। यह ऐप इस साल जनवरी में लॉन्च किया गया था और अगस्त तक इसके 50 लाख से अधिक डाउनलोड दर्ज किए जा चुके हैं। सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ऐप की मदद से अब तक 37 लाख से अधिक चोरी या गुम मोबाइल फोन ब्लॉक किए गए हैं और लगभग 23 लाख फोन ट्रैक कर लिए गए हैं। ऐप फोन के IMEI यानी 15 अंकों के विशिष्ट पहचान नंबर के माध्यम से चोरी हुए डिवाइस को ब्लॉक करने और खोजने में मदद करता है। इसके अलावा, यह फर्जी कॉल, एसएमएस और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म पर आए संदिग्ध संदेशों की शिकायत दर्ज करने की सुविधा भी देता है। मोदी सरकार का तर्क है कि बढ़ते साइबर फ्रॉड, फर्जी कॉल सेंटर, और मोबाइल चोरी के नेटवर्क पर रोक लगाने के लिए यह कदम जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अनिवार्य प्री-इंस्टॉल ऐप उपभोक्ताओं की निजी पसंद और गोपनीयता पर असर डालेगा। देखा जाए तो सरकार द्वारा ‘संचार साथी’ जैसे उपयोगी और जनहितकारी ऐप को बढ़ावा देना निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है, खासकर ऐसे समय में जब साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। चोरी हुआ मोबाइल तुरंत ब्लॉक करना, फर्जी कॉल और संदेशों की रिपोर्टिंग—ये सभी सुविधाएँ वास्तव में नागरिकों की सुरक्षा मजबूत करती हैं। लेकिन दूसरी ओर, ऐप को अनिवार्य बनाना और उसे हटाने का विकल्प न देना, उपभोक्ता की स्वतंत्रता और डिजिटल गोपनीयता को लेकर चिंताएँ भी पैदा करता है। किसी भी सरकारी ऐप को फोन में स्थायी रूप से इंस्टॉल रखने का निर्देश तकनीकी कंपनियों और नागरिक अधिकार समूहों के बीच स्वाभाविक रूप से बहस छेड़ेगा। टेक उद्योग का तर्क होगा कि यह उपयोगकर्ता अनुभव और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है, जबकि गोपनीयता विशेषज्ञ यह सवाल उठाएँगे कि क्या सिम-बाइंडिंग और अनिवार्य ऐप जैसी नीतियाँ निगरानी के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

बीरभूम जिले में बनेंगे चार नए दमकल केंद्र

बीरभूम। जिले में अग्निशमन सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए राज्य सरकार चार नए दमकल केंद्र स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से काम कर रही है। जिला परिषद और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, लाभपुर, नलहाटी, मुरारई और तारापीठ में नए अग्निशमन केंद्र निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जिला परिषद ने जानकारी दी कि नलहाटी दमकल केंद्र के लिए निविदा जारी कर दी गई है। इसके अलावा, लाभपुर दमकल केंद्र के लिए राज्य सरकार की ओर से निर्माण कार्य का औपचारिक निर्देश भी जारी कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि इन केंद्रों के बन जाने के बाद दमकल कर्मियों को घटनास्थल पर पहुंचने में कम समय लगेगा, जिससे आगजनी से होने वाले नुकसान की संभावना कम हो जाएगी। वर्तमान में जिले में पांच स्थायी दमकल केंद्र मौजूद हैं। तीन महकमा शहरों के साथ-साथ सांतलिया और दुबराजपुर में भी स्थायी केंद्र संचालित हैं। इसके अतिरिक्त, तारापीठ में एक अस्थायी दमकल केंद्र कार्यरत है। प्रशासन का मानना है कि नए केंद्र शुरू होने के बाद जिले की अग्निशमन व्यवस्था और अधिक प्रभावी हो जाएगी। राज्य सरकार ने 14 नवंबर को लाभपुर दमकल केंद्र के निर्माण के लिए आधिकारिक कार्यादेश जारी किया है। यह केंद्र लाभपुर के बकुल क्षेत्र में बनाया जाएगा। जानकारी के अनुसार, इस भवन का निर्माण दो चरणों में होगा। पहले चरण में लगभग 3 करोड़ 60 लाख रुपये की लागत से दो मंज़िला भवन बनाया जाएगा और तुरंत ही उसे चालू कर दिया जाएगा। बाद में इसे चार मंज़िला भवन के रूप में विस्तारित किया जाएगा। लाभपुर, नानूर, मयूरेश्वर–1, मयूरेश्वर–2, पूर्व बर्दवान का खेतुग्राम–1 और 2, तथा मुर्शिदाबाद के बड़ज्ञा और भरतपुर समेत कुल आठ ब्लॉक इस लाभपुर दमकल केंद्र के अधीन आएंगे। लाभपुर के विधायक अभिजीत सिंह ने बताया कि चार मंज़िला भवन की मंज़ूरी पहले ही मिल चुकी है और उन्होंने जिला शासक के साथ निर्माण स्थल का निरीक्षण भी कर लिया है। नलहाटी में भी एक नया दमकल केंद्र बनाया जाएगा, जिसके लिए निविदा प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। यह केंद्र राष्ट्रीय राजमार्ग के पास स्थित सीएडीसी मोड़ पर स्थापित किया जाएगा। मुरारई विधानसभा क्षेत्र के पाइकर में भी दमकल केंद्र निर्माण की तैयारी जारी है। सिंचाई विभाग के अधीन रही जमीन अब दमकल विभाग को हस्तांतरित कर दी गई है और वहाँ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जा रही है। तारापीठ में भी स्थायी दमकल केंद्र के लिए भूमि चिह्नित कर ली गई है। वहाँ भी अब भवन के नक्शे और डीपीआर तैयार होने की प्रक्रिया चल रही है। जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार सुबह बताया कि इन चार नए दमकल केंद्रों के चालू हो जाने के बाद जिले में आग की घटनाओं पर नियंत्रण पाने में काफी आसानी होगी।

परिवार, समाज और देश और तेजपत्ता सा जीवन

गोरखपुर में मां के शव को अंतिम संस्कार के लिए चार दिन फ्रिज में रखने की बात कहने वाले बेटों को समाज में बहुत अपमान झेलना पड़ा। जब बेटों को पछतावा हुआ, तो उन्होंने पिता से माफी मांगी और पिता भुआल ने उन्हें माफ कर दिया। अब पंडित की सलाह पर परिवार ने मां का आटे का पुतला बनाकर उसका दाह संस्कार करने की सलाह दी। दरअसल, बुजुर्ग दंपती भुआल मद्धेशिया और शोभा देवी वृद्धाश्रम में रहते थे। बुजुर्ग भुआल मद्धेशिया(68) 17 महीने से पत्नी शोभा (65) के साथ जौनपुर में एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। बीते 19 नवंबर को शोभा का निधन हो गया था। जिसके बाद वृद्धाश्रम संचालक रवि कुमार चौबे ने भुआल के छोट बेटे अज्जू को फोन किया। अज्जू ने बताया कि घर में बड़े भाई संजय के बेटे की शादी है। इसलिए उन्होंने इस समय दाह संस्कार के लिए मना कर दिया है और कहा कि शव को फ्रिज में रखवा दो, शादी के बाद आकर दाह संस्कार करवाएंगे। इसके बाद भुआल को करमैनी घाट पर पत्नी का शव दफनाना पड़ा। इस बात से बेटों की बहुत बदनामी हुई और उन्हें अपमान झेलना पड़ा। बेटों ने पंचायत में पिता से माफी मांगी और पिता ने उन्हें माफ भी कर दिया। शुक्र है कि दौर सोशल मीडिया का है।
तेजपत्ता देखा है आपने ? कोई भी सब्जी हो, दाल हो, पकवान हो, छौंक लगाने के लिए तेजपत्ता हम डालते हैं। यह तेजपत्ता अपनी खुशबू और गुणों से हर व्यंजन का स्वाद बढ़ा देता है और इस प्रक्रिया में वह अपना अस्तित्व भूल जाता है, रूप खत्म हो जाता है इसका। पकवान बनता है और लाजवाब बनता है और जब थाली में पकवान आता है तो सबसे पहले तेजपत्ता ही फेंका जाता है। वह किसी काम का नहीं रहा, कड़वा हो चुका है, उसे निगला नहीं जा सकता और अंत में फेंक दिया जाता है। आज परिवार, समाज और कॉरपोरेट लोग तेजपत्ते की तरह होते हैं। माता -पिता, भाई-बहन तेजपत्ता हैं।
परिवार की बात करें तो यह स्थिति माता-पिता और भाई -बहनों के सामने आती है और कॉरपोरेट दुनिया में उन कर्मचारियों के साथ जो अपनी निजी जिंदगी भूलकर अपनी सारी जिंदगी स्वाहा कर देते हैं और नयेपन के नाम पर अपने कर्मचारियों की जिंदगी की खुशियां वसूलने वाली कम्पनी उनको बाहर का रास्ता दिखा देती है।
परिवार में किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे माता -पिता के साथ भाई -बहनों का भी योगदान रहता है। चाचा-चाची, बुआ-फूफा जैसे कई रिश्तों का योगदान रहता है मगर जैसे -जैसे समय बीतता है, ये सारे रिश्ते अप्रासंगिक हो जाते हैं। जब कोई लड़की घर में कदम रखती है तो सबसे पहले घर का कोई जेठ, देवर या ननद एक अनजान लड़की के लिए अपना कमरा छोड़ते हैं मगर उनका यह त्याग कोई त्याग नहीं बल्कि उनका फर्ज मान लिया जाता है। माता – पिता बहू के लिए अपने जीवन भर की कमाई दांव पर लगाकर गहने बनवाते हैं। जिस लड़के की पढ़ाई और भविष्य के लिए कर्जा लिया, एक दिन वह लड़का भी वह इस अनजान लड़की को दे आते हैं मगर समाज में यह भी त्याग नहीं फर्ज समझा जाता है। वहीं लड़कियों के मामले में यह माता-पिता का फर्ज नहीं त्याग समझा जाता है। त्याग और फर्ज के बीच गजब का असंतुलन है और कितना एकतरफा है। अधिकतर लड़कियां ससुराल में रहने नहीं आतीं, वह अपना साम्राज्य बनाने आती हैं और उनके निशाने पर वह सारे रिश्ते रहते हैं जिनका सहारा लेकर वह उसने घर में कदम रखा। लड़के की दुनिया लड़की और फिर अपने बच्चों में सिमट जाती है और ठगे से रह जाते हैं, वह तमाम रिश्ते जिनके सहारे वह वर्तमान की बुलंदियों पर पहुंचा है। अपने अनुभव से कहूँ तो ऐसी भी स्थिति आती है कि घर के फैसलों में नौकरों की राय ली जाती है, ससुराल की राय ली जाती है मगर अपने भाई -बहनों की राय लेना व्यक्ति को रास नहीं आता। ऐसे लोगों को अपनी पत्नी हमेशा बिचारी नजर आती है और बच्चे हमेशा प्रताड़ित दिखते हैं। भाई की शादी हो तो देवरानी के रूप में सहेली भी मिल जाती हैं और दो परायी औरतें उस घर पर अपना कब्जा जमाती हैं जो उन लोगों ने बनाया ही नहीं है। इन औरतों को एक वृद्धा की तपस्या पर हक जताना है, एक बुजुर्ग के उस घर में हिस्सा लेना है जिसे बनाने में उसके पति का कोई योगदान तक नहीं रहता है। यह पारिवारिक विषमता कहीं नहीं दिखती। यह साम्राज्यवाद नहीं नजर आता। उनको नहीं दिखती, वह पीड़ा जिससे वह सारे रिश्ते जूझ रहे हैं। यह कैसा समाजवाद है जो साथ रहकर चलना नहीं सिखाता। यह कैसी समानता है जो किसी और की मेहनत को लूटकर महल खड़े करते हैं। भारतीय कानून में दहेज के मामलों में देवर व ननद को आसानी से टारगेट किया जाता है मगर कोई भी धारा देवर और नदद के पक्ष में खड़ी नजर नहीं आती। भाभियों को 16 -18 साल की ननद भी बोझ दिखती है जिसे वे घर के काम सिखाकर बस विदा कर देना चाहती हैं जिससे उनकी संतानों का रास्ता साफ हो। क्या कोई धारा है जो भाइयों और भौजाइयों के जहरीले वाणी बाणों से छोटे या बड़े भाई बहनों को बचा सके ? बॉडी शेमिंग, अपने ही घर में अछूत बना देना, पति को उसके माता-पिता व भाई-बहनों से दूर करना, भड़काना किसी की जिंदगी बरबाद कर देता है मगर भारतीय संविधान की कोई धारा इनको नहीं बचाती। लड़कियों का मायका छुड़वा देने वाली, बहनों को घर में अछूत बना देने वाली और अपने बच्चों की नजर में बुआ -चाचा जैसे तमाम रिश्तों को जहर बना देने का काम कोई और नहीं बल्कि घर की तथाकथित लक्ष्मियां ही करती आ रही हैं। ससुराल में मायका बसा देने वाली औरतें अपनी गृहस्थी में अपने सास-ससुर का हस्तक्षेप नहीं चाहतीं और उनको वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देती हैं। क्यों कोई समाज और कानून इन सारे रिश्तों की रक्षा नहीं करता और नहीं करता तो पारिवारिक व्यवस्था की रक्षा कैसे होगी? आखिर शादी के बाद ऐसा क्या हो जाता है इंसान अपने पार्टनर का गुलाम बन जाता है। जिन लोगों की मदद से उसने सफलता प्राप्त की, वह अब उनके लिए तेजपत्ता हैं। अलग होने वाले लोग और वधुएं कभी अपनी गलती नहीं देखते। बहनें आती हैं तो उनके आने से ज्यादा शगुन की चिंता रहती है। दिखावा बढ़ गया, प्यार सतह पर चला गया और आप इसे परफेक्शन कहते हैं। बुआ जितनी पुरानी होगी, घर उससे उतना ही दूर होता जाएगा…यह कौन सी व्यवस्था है? रोज रात को नाना-नानी, मौसा-मौसी, मामा-मामी और भाई -बहनों को फोन करना याद रहता है मगर रूठे भाई -बहनों से दो बातें करना याद नहीं रहता और आप चले हैं कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था को बचाना है। घर के छोटे- छोटे बच्चे अपने व्यवहार से जब हर चीज पर हक जताते हुए खुद को थोड़ा अधिक अधिक सर्वश्रेष्ठ और बड़ों को थोड़ा और पराया बताने की कोशिश करते हैं तब उनकी असुरक्षा देखकर हंसी नहीं आती। तरस आता है उन लोगों पर जिन्होंने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया।
मध्य प्रदेश सरकार में आईएएस अधिकारी संतोष कुमार वर्मा द्वारा बीते दिनों ब्राह्मणों की बेटियों को लेकर विवादास्पद बयान देने के चलते, उनके खिलाफ राज्य शासन ने नोटिस जारी की है। बता दें कि “एक परिवार में एक व्यक्ति को आरक्षण तब तक मिलता रहना चाहिए, जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में न दे, या उससे संबंध न बन जाए।”
समाज में जो वर्ग विक्टिम कार्ड खेलता है, वह उतना ही बड़ा शोषक होता है और यह बात मैं आरक्षण के सन्दर्भ में कह रही हूँ तो समझ नहीं आता कि ब्राह्मण और सामान्य श्रेणी के लोग निशाने पर क्यों हैं जबकि आज उनके हिस्से की नौकरियां कोटाधारी खा रहे हैं। एक को 70 प्रतिशत पाने पर भी दाखिला और नौकरी नहीं मिलती और एक आप हैं कि 45 प्रतिशत पाकर भी उच्चासन पर आसीन हैं। 75 साल से ज्यादा लंबा वक्त बीत गया, बता दीजिए कि किस दलित ने कहा कि उसकी तीन पीढ़ियां पढ़ गयीं और अब वह किसी जरूरतमंद को अपने हिस्से का आरक्षण देने जा रहा है। अधिकार मिल जाने से योग्यता और मेधा नहीं मिल जाती। जो मेधावी है, वह कहीं भी हों, अपना मार्ग बना लेते हैं। हर घर में बाल्मीकि रामायण मिलती है, उसे किसी ब्राह्मण ने नहीं लिखा….बाल्मिकि मेधा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कबीर, रैदास, रसखान ये सब किसी अगड़ी जाति से नहीं आते। भीमराव आंबडवेकर के नाम में अंबेडकर जुड़ने का किस्‍सा स्‍कूल के ही दिनों का है. बाबा साहब पढ़ने-लिखने में काफी तेज थे। इसी खूबी के कारण स्‍कूल के एक शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर उनसे खास स्‍नेह करते थे। कृष्णा महादेव आंबेडकर एक ब्राह्मण थे। खास स्‍नेह के कारण शिक्षक कृष्‍णा महादेव ने भीमराव के नाम में अंबेडकर सरनेम जोड़ दिया। इस तरह बाबा साहब का नाम हो गया भीमराव अंबेडकर। इसके बाद से ही इन्‍हें अंबेडकर उपनाम से पुकारा जाने लगा। हम आपको बताते हैं उस महाराजा के बारे में, जिसने युवा अंबेडकर की मदद की। ये मदद उन्हें तीन साल तक दी गई। पढाई पूरी करने के बाद जब अंबेडकर वहां से लौटे तो महाराजा से मिले. इसके बाद लंबे समय तक वो उनसे जुड़े रहे। वैसे ये तो तय है कि अगर महाराजा सायाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने उनकी मदद नहीं की होती तो शायद अंबेडकर के लिए वहां तक पहुंचना मुश्किल होता, जहां पर वो थे। इन महाराजा का नाम तो आपको ऊपर की पंक्तियों में बताया जा चुका है। वो उस समय भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में एक बडौदा के शासक थे। उन्होंने अपने शासन के दौरान सामाजिक सुधार से लेकर जात-पांत खत्म करने और शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े काम किए। बेनगुल नरसिम्हा राव (बी एन. राव) का जन्म 26 फ़रवरी 1887, मंगलौर में हुआ। इन्होंने केनरा हाई विद्यालय (1901), ट्रिनिटी कॉलेज, और मद्रास विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। बेनगुल नरसिम्हा राव (बी एन. राव) अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय मेंन्यायाधीश थे, इससे पहले वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। इन्होंने भारतीय संविधान निर्माण में सहलाकर के रूप में भूमिका अदा की थी, तथा भारतीय संविधान निमार्ण के समय संवैधानिक सलाहकार थे। इन्होंने भारतीय संविधान का प्रथम प्रारूप इनके द्वारा तैयार किया था। भारतीय संविधान का मूल प्रारूप बी. एन. राव ने तैयार किया था, इसके अलावा संविधान निर्माण के लिए सारी सामग्री राव ने ही उपलब्ध करवाई थी। संविधान निर्मात्री सभा ने डॉ भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में जिस प्रारूप की जांच की उसे बी एन. राव ने ही तैयार किया था। जब संविधान अंगीकार किया उस वक्त सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बी एन राव को उनके योगदान के लिए धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, डॉ. अंबेडकर ने अपनी पहली पत्नी रमाबाई की मृत्यु के बाद, 15 अप्रैल 1948 को दूसरी शादी की। यह शादी उन्होंने डॉ. सविता कबीर से की जो एक पढ़ी-लिखी, पेशे से डॉक्टर और ब्राह्मण परिवार से थीं। इस शादी को लेकर उनके अपने परिवार और कुछ साथियों ने नाराज़गी जताई, क्योंकि वह एक अलग जाति की थीं। अम्बेडकर संविधान निर्माताओं में से एक थे,एकमात्र नहीं थे। बी.एन. राव और महाराजा सायाजीराव गायकवाड़ तृतीय अम्बेडकर के जीवन में तेजपत्ता बने। आज आरक्षण की आग में सामान्य वर्ग तेजपत्ता है जो कर तो देता है मगर उसके हिस्से की सब्जी आज तक दूसरे खा रहे हैं।