Friday, March 27, 2026
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डिजाइनर वंदना एन गुप्ता और पंकज कुमार ने उतारा वेडिंग और समर कलेक्शन

कोलकाता । हमारे देश भारतवर्ष में शादियों की परंपरा को हमेशा आनंददाई माना जाता है। अब बदलते जमाने में भारतीय शादियों में लेटेस्ट फैशन वाले पोशाक किसी फैशन वीक से कम नहीं होता है। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए डिजाइनर वंदना एन गुप्ता (महिलाओं के पोशाक) और पंकज कुमार (पुरुषों के पोशाक) के लेटेस्ट कलेक्शन के साथ कोलकाता के राजकुटीर में फैशन शो आयोजित करके अपने शानदार वेडिंग और समर कलेक्शन को प्रदर्शित किया। इस शो की खास बात यह थी कि इस शो में प्रदर्शित होनेवाले कपड़ों को कोई मॉडल नहीं बल्कि डिजाइनर के ग्राहक इन फैशन शो में लेटेस्ट कलेक्शन को प्रदर्शित कर रहे थे। फैशन शो के बाद डिजाइनर वंदना गुप्ता और डिजाइनर पंकज कुमार ने विभिन्न संस्कृति रिवाज के अलावा मेहंदी, संगीत, हल्दी और दुल्हन के लेटेस्ट कपड़ों के कलेक्शन को लॉन्च किया।

बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री भाग्यश्री ने शोस्टॉपर के तौर पर वेडिंग और समर कलेक्शन के ड्रेस में रैंप वॉक किया। वेडिंग एंड समर कलेक्शन वंदना एन गुप्ता, वंदना गुप्ता डिजाइनर कॉउचर और संस्कृति के मालिक पंकज कुमार द्वारा डिजाइन किया गया था। इस शो को क्यूरेट हाई होप्स के निदेशक सौरव हरियाणवी ने किया। इसमें ज्वैलरी पार्टनर – एसके हाउस ऑफ ज्वैलरी फैब्रिक पार्टनर – चंद्रिमा फैशन; ग्रूमिंग और मेकओवर पार्टनर वीएलसीसी थे।

मीडिया से बात करते हुए वंदना गुप्ता (डिज़ाइनर कॉउचर की मालिक) ने कहा, भारत में शादियों का रिश्ता काफी बड़ा महत्व रखता है। आज लोगों में शादी के पोशाक, सजावट, मेकअप के सामान के लिए उनकी जरूरतें और चलन बदल रहा है। पहले, शादियाँ एक ऐसा बंधन था जब लोग पारंपरिक शैलियों के लिए जाना पसंद करते थे, लेकिन अब उनमें से बहुत से लोग इंडो-वेस्टर्न डिज़ाइनों का चयन कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि यह शो शानदार स्टाइल इनपुट और आकर्षक गो-टू लुक देगा।

इस अवसर पर संस्कृति के मालिक पंकज कुमार ने कहा, भारतीय शादी का फैशन विश्व स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहा है। इसी कारण दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इसकी लोकप्रियता लगता बढ़ रही है। आज के शो में छायाचित्रों के साथ रंगों की एक जीवंत के अनंत ग्लैमर का एक विजयी सूत्र प्रस्तुत किया। जिसका भरपूर लुत्फ शो के दशकों ने भी लिया।

पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र जी का जाना सुसंस्कृत हिंदी के एक युग का अवसान है

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात आते ही आंँखों के समक्ष एक विशाल कैनवास उभर कर आता है, जहाँ उत्तर प्रदेश और बंगाल की समवेत छवि तो उभरती ही है साथ ही एक मेधावी छात्र, सुसंस्कृत पुत्र,पांडित्य के गुणों से भरपूर एक संवेदनशील और सजग चेहरा उपस्थित हो जाता है। साहित्य लेखक की कलम से निकले शब्दों का वह संदेश है जो व्यष्टिगत होकर समष्टिगत रूप ले लेता है। उसकी सृजनशीलता नये प्रतिमानों को स्थापित करने और नये युग के लिए नये आयाम रचता है।
2018 में भारत सरकार द्वारा हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र को ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मूर्ति देवी पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ, महात्मा गांधी सम्मान, विद्या निवास मिश्र सम्मान, साहित्य भूषण से सम्मानित डॉ. मिश्र का लेखन बलिया का मिजाज, पृष्ठभूमि, गांँवों के स्वाभिमान, मूल्यों और मानस को निकट से समझने वाला है।
हिंदी के शिक्षक, साहित्यकार और समीक्षक डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र का जन्म सन् 1936 को बलिहार, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ। निबंध, पत्रकारिता जीवनी संस्मरण संपादन अनुवाद आदि विविध विधाओं में लिखा।
हिंदी भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम साहित्य का वह स्वर्णाक्षर पृष्ठ है जिनके लिए शब्दकोश के सारे विशेषण भी कम है।संवेदनशील, मूल्य परक और सर्जनात्मक ऊँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरागत ‘मनीषा’ के संवाहक डॉ. मिश्र सबसे पहले एक बड़े इंसान हैं। कलकत्ता के बंगवासी कॉलेज में अध्यापक रहे उनके साहित्यिक अवदान की महत्ता और गुणवत्ता हिंदी शिक्षा जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। उम्र के अंतिम पड़ाव की अवस्था में भी साहित्य और समाज के लिए जो व्यक्ति सोचता है कि वह निश्चित ही अपनी माटी को प्रेम करने वाला है।
मैंने जब उनसे पूछा कि आपकी तबीयत कैसी है? तो कहने लगे ‘अब तो बूढ़ा हो गया हूँ।’ सच है कि शरीर से तो बुढ़ापा है लेकिन आंँखों की चमक अभी भी गंँवई खुश्बू से ओतप्रोत है। साहित्यकार की सृजनात्मक शक्ति जब तक सक्रिय है, वह युवा ऊर्जा से भरपूर है। तभी तो एक और नयी पुस्तक ‘सांँझ की जम्हाई और सर्जनशील उजास’ जिसका प्रकाशन लेखक के जन्मदिन के दिन (5,नवंबर, 2017) पर हुआ, मुझे देते हुए बहुत ही उत्साहित लगे। वही पान की लाली से लसित दोनों ओष्ठ और मुढ्ढे पर आराम से बैठ कर फोन की घंटी उठाना। कहीं कोई शिथिलता नहीं,लगा उस छोटे- से कमरे से पूरे देश का संबंध है, भारतीय संस्कृति की गूँज सुनाई पड़ रही थीं।
मैंने कहा कि कलकत्ता में तो कोई भी ऐसी साहित्यिक संस्था नहीं है जिसने आपको नहीं बुलाया होगा। ख़ास कर भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद, अपनी भाषा, कुमार सभा पुस्तकालय, मित्र परिषद्,बांधाघाट हनुमान पुस्तकालय, हिंदी बंग परिषद्, राम मंदिर आदि असंख्य गैर सरकारी संस्थाओं और सरकारी संस्थाओं के साथ- साथ सरकारी बैंकों में आपको बड़े ही सम्मान के साथ विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित करते रहे हैं।
मूर्ति देवी पुरस्कार से सम्मानित विद्या संस्कारी और विद्वता के पथ पर चलने वाले हिंदी जगत में आपकी परंपरा के विद्वानों में आपका विशिष्ट स्थान है।
केवल एक संस्था ‘साउथ बेलेघाटा वेलफेयर सोसायटी’ के संस्थापक अध्यक्ष रहे। जिस समय देश में बावरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी और उस समय बंगाल में हिंदू – मुस्लिम दोनों ही शरणार्थी बड़ी संख्या में बंगाल में शरण के लिए आए, उस दुख की घड़ी में डॉ मिश्र ने दोनों के लिए ही शिविर का आयोजन किया।’जनसत्ता’ ने ‘घायल संवेदना का दर्द’ शीर्षक से पूरे पृष्ठ का कवरेज दिया जिसे कवर करने के लिए ‘जनसत्ता’ की पूरी टीम आई थी जो बहुत बड़ी बात थी ।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि डॉ. मिश्र समाज और समाज की भाषा से सरोकार रखने वाले लेखक रहे हैं। वे रिक्शे वाले से लेकर भंगी और एक जून रोटी खाने वाले सभी से बात करते हैं, जाड़े में ठिठुरने वालों के लिए सोचते हैं। कोलकाता के धनाढ्य लोगों से कहकर उनके लिए कंबल आदि का इंतजाम भी करवाते हैं। साथ ही पढ़ने के लिए, नौकरी के लिए लोगों की यथासंभव मदद भी करते हैं। आज भी हनुमान पुस्तकालय की असंख्य मूल्यवान पुस्तकों के पुनरुद्धार लिए आपके मन को मैंने उद्वेलित होते हुए देखा। इस पुरानी संस्था को बचाने के लिए आपने तुलाराम जालान जी को भी पत्र लिखा था। शिक्षा और साहित्य को समृद्ध करने के साथ – साथ आप अपने जीवन में सदैव ईमानदारी और न्याय का ही पक्ष लेते रहे। आप किसी भी संस्था या संगठन के विचारों से प्रभावित नहीं रहे बल्कि जिस किसी भी मंच ने आपको आमंत्रित किया, वहाँ अपने विचारों और सिद्धातों पर ही अडिग रहे।
हिंदी की विशिष्ट संस्था भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से लेखक का जुड़ाव तब से था जब उसकी शुरुआत केमक स्ट्रीट में स्थित एक भाड़े के घर से हुई थी। सीताराम सेकसरिया जी ने अपने स्नेही विद्वान कृष्ण बिहारी मिश्र जी को बुलाया और परिषद् के साथ जुड़ने का वचन लिया। सीताराम सेकसरिया जी और भागीरथ कानोड़िया जी इस संस्थान के कर्णधार रहे और दोनों के ही भरोसे पर खरे उतरे डॉ मिश्र। लेखक के गुरु आचार्य डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी सीताराम सेकसरिया जी के प्रति आदर भाव रखते थे। भारतीय भाषा परिषद्(1975 में स्थापित) से लेखक का आदिकाल से नाता रहा और सभी प्रमुख साहित्यिक आयोजनों में बतौर विशिष्ट अतिथि या अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित भी होते रहे। बीच में संबंध टूटे भी लेकिन सीताराम सेकसरिया के ज्येष्ठ पुत्र अशोक सेकसरिया के कारण फिर जुड़े।यहाँ तक कि डॉ. मिश्र ने इसी संस्था के कर्मचारियों के साथ होने वाली अनीति और दुर्नीति के लिए आंदोलन में भी योगदान दिया। वे सहृदयता की मूर्ति हैं उन्होंने कर्मचारियों के हितों के पक्ष में फैसला करवाया। इसी तरह कहीं भी दुर्निती दिखाई पड़ने पर विरोध प्रकट करने में भी पीछे नहीं हटते।
मंच चाहे किसी भी विचारधारा का हो, जलेस या राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कोई भी संस्था यदि आमंत्रित करती है तो डॉ. मिश्र पूरी निष्ठा के साथ जाते हैं और अपनी बात रखते हैं। वे साहित्यकार के रूप में अपनी बात कहते हैं।
पत्रकारिता पर उनका शोध ग्रंथ ‘हिंदी पत्रकारिता:जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि’ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में इस पुस्तक का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में होता रहा है। इसके अतिरिक्त’ पत्रकारिता :इतिहास और प्रश्न ‘,’ गणेश शंकर विद्यार्थी’, ललित निबंध संग्रह ‘बेहया का जंगल’ , ‘मकान उठ रहे हैं’ , ‘आंगन की तलाश’ , ‘अराजक उल्लास’ , ‘नेह के नाते अनेक’ ,’ हिंदी साहित्य: बंगीय भूमिका’ आदि विशिष्ट पुस्तकें लेखक की हिंदी सेवा का प्रमाण है।
एक और कालजयी ग्रंथ ‘कल्पतरु की उत्सव लीला ‘की रचना लेखक की अमूल्य देन है जो समाज की नब्ज को समझते हुए साहित्य में एक नया अध्याय है। हिंदी साहित्य में रामकृष्ण परमहंस के विचारों और चिंतन की आवश्यकता को समय की मांग समझते हुए लेखक ने बंगाल में रहकर परमहंस पर लिखने का साहस किया। यह खतरा एक संवेदनशील और सजग साहित्यकार ही उठा सकता है। आधुनिकता की आंँधी में भारत की युवा पीढ़ी के समक्ष परमहंस के अध्यात्म को प्रतिष्ठित कर समाज को अपनी संस्कृति और अध्यात्म के संरक्षण के लिए संदेश दिया है। इसी ग्रंथ को भारतीय ज्ञानपीठ ने सर्वोच्च पुरस्कार ‘मूर्ति देवी’ से सम्मानित किया। पुरस्कार समारोह का आयोजन भारतीय भाषा परिषद् के सभागार में हुआ जो लेखक के चाहने वालों से भरा हुआ था।
हरिवंश जी (सांसद) प्रमुख संपादक प्रभात खबर ने अपने लेख में लिखा था , ‘डॉ. मिश्र से उनका परिचय उनके ललित निबंध संग्रह ‘बेहया का जंगल’ के माध्यम से हुआ जो सर्जनात्मक ऊंँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरा गत मनीषा की झलक है। हिंदी पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा, मूल्य, त्याग और तेज को सामने लाने का काम जिस तरह से कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने किया और कर रहे हैं, वैसा कोई दूसरा नाम हिंदी विद्वानों में दिखाई नहीं देता, पर उनके इस योगदान का महत्व तो बाद में जाना, समझा या आत्मसात कर पाया। ‘
हिंदी से संबंधित किसी भी विषय पर आपका वक्तव्य हिंदी के प्रकांड विद्वानों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, आचार्य चंद्र बलि पांडेय, डॉ. विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों के सूत्रों को जोड़ता हुआ लगता है। आचार्य डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य भला पीछे कैसे रह सकते हैं? डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ मूल्यों, आदर्शों और सत्यों पर टिका है, यही कारण है कि जब वे किसी संस्थान में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हैं तो उसमें लेखक का गंभीर अध्ययन , चिंतन झलकता है।
भारतीय संस्कृति संसद संस्था, कोलकाता ने’ कल्पतरु की उत्सव लीला’ ग्रंथ पर ‘मेरी सृष्टि मेरी दृष्टि’ कार्यक्रम का आयोजन किया जो उनकी रचनाशीलता और चिंतन पर आधारित था। लगभग दो घंटे तक आपका वक्तव्य लोग सुनते रहे। तन और मन से संवेदनशील लेखक का व्यक्तित्व एक अभिभावक जैसा है।उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान का हिंदी साहित्य जगत और समाज डॉ. मिश्र को अपने ही परिवार का समझता है और उनके पास उनके घर में मिल कर अपना सौभाग्य समझते हैं। एक बार कवि और लेखक अशोक वाजपेयी जी की पत्नी कोलकाता आईं और आपसे मिल कर गईं तो अपने छोटे घर के प्रति कहीं-न-कहीं आपको लगा कि उन्हें कष्ट होगा, परंतु यह लेखक का सदा से भ्रम रहा है कि मेरा छोटा कमरा कहीं किसी को परेशान न करे।परंतु आज जिन्होंने भी डॉ. मिश्र के साहित्यिक कृतित्व और व्यक्तित्व से सरोकार रखा है, उन्हें इस बात का पता है कि यह छोटा – सा कमरा उनके जीवन में क्या महत्व रखता है। यह लेखक के लिए विद्या मंदिर है, आपके गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी भी इस कमरे में रहे हैं, अज्ञेय जी, ब.व.कारंत आदि विद्वानों का आगमन होता रहा है।इस कमरे का वातावरण विशुद्ध साहित्यिक और अध्यात्म की सुरभि से सुरभित है। भारतीय मनीषा रचनाकारों को “कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू” मानती है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही है। रचनाकार ऋषि-मुनियों मुनियों की परंपरा का निर्वहन करने वाला स्वयंभू सदृश होता है।

साहित्य सेवी भाषाई संस्कारों से युक्त डॉ. मिश्र गुरु परंपरा को निभाने वाले अपने विद्या कर्म के लिए समर्पित हैं। एसी रूम में गांँव की सोंधी खुश्बू नहीं आती, महानगर में रहकर गांँव को सहेजने का दुष्कर कार्य बहुत कम लोग ही कर पाते हैं, डॉ मिश्र ने इसका पुरजोर प्रयास किया।

कोलकाता में भोजपुरी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में राजनेता और गायक मनोज तिवारी के आगमन पर आपकी उपस्थिति उस कार्यक्रम की शोभा बनी। मुझे स्मरण आता है राजस्थान ब्राह्मण संघ के कार्यक्रम’ परंपराओं में आस्था’ में डॉ. मिश्र मेरे कहने से आए थे और वह आशीर्वाद ही था।आपके कर – कमलों से लोकार्पण करवाने के लिए संस्था अपने को गौरवान्वित समझती है। ‘परंपराओं में आस्था’ पुस्तक मेरे और परम विदूषी दुर्गा व्यास के संपादन में लिखी गई थी, समाज का बड़ा कार्यक्रम था आपकी उपस्थिति मात्र से ही कोलकाता का हिंदी समाज स्वयं को भाग्यशाली मानता है।
यह भी सच्चाई है कि डॉ. मिश्र बड़े ही नाजुक प्रकृति के भी हैं, जब तक तबियत ठीक नहीं समझते, संस्था के आमंत्रण को स्वीकृति नहीं देते।
कोलकाता के हिंदी साहित्य जगत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रबुद्ध विद्वानों में आचार्य कल्याण मल लोढा और डॉ विष्णुकांत शास्त्री जैसे प्रकांड पंडितों का भरपूर हाथ रहा है, लेकिन डॉ. मिश्र एक कॉलेज में अध्यापन करते हुए भी साहित्य साधना में एक साधक की तरह रत रहे। साहित्यिक यात्राओं से भी कतराते रहे, कोलकाता के सेठ- साहूकारों से भी दूर रहे। यह अलग बात है कि आपकी विद्वता और ईमानदारी ने कोलकाता के गरीब से लेकर अमीर तक के लोगों के दिल जीते हैं। उसी का परिणाम है कि आपको सभी हिंदी संस्थाएँ आमंत्रित करने में अपना सौभाग्य समझती हैं। कोलकाता का हिंदी जगत डॉ. मिश्र के साहित्यिक व्यक्तित्व से लाभान्वित है। हिंदी के विद्यार्थियों को कभी भी हिंदी उच्च शिक्षा या पीएचडी में कोई असुविधा होती है तो वे सलाह लेते हैं, काम रुकता नहीं है।
भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता की हिंदी की एक और संस्था है जो भारतीय संस्कृति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने तथा साहित्य -संगीत – कला की त्रिवेणी को विकसित करने के लिए अनवरत सक्रिय कार्य कर रही है। इसका प्रमुख कारण है कि यहाँ विगत साठ वर्षों से मूर्धन्य साहित्यकारों, कला, संगीत और संस्कृति के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता रहा है। 8 मई, 1955 में इस संस्था की स्थापना स्वनामधन्य श्री माधोदासजी, श्री रामनिवास ढंढारिया, श्री हरि प्रसाद माहेश्वरी, श्री गोकुल दासजी जैसे महापुरुषों के सद्प्रयास से हुआ। बंगाल के विश्रुत विद्वान एवं मूर्धन्य इतिहास विद् डॉ. कालीदास जी नाग संस्था के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। देश के वरिष्ठ एवं विशिष्ट साहित्यकार, विचारक, समीक्षक, कवि सभी भारतीय संस्कृति संसद के आमंत्रण को सहर्ष एवं सोत्साह स्वीकार करते थे। डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने संसद के आमंत्रण पर लिखा था कि मेरी नई उपलब्धि का सम्मान जहाँ होना चाहिए था, वहाँ तो मुझे अँगूठा दिखाया जा रहा था और कलकत्ता में हिंदी की एक साहित्यिक संस्था मेरा सम्मान करना चाहती थी।धर्म तल्ला में स्थित यह संस्था काव्य – कथा – कला – संगीत-संस्कृति आदि के महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित करती रही है।
वर्तमान समय में इस संस्था का संरक्षण डॉ. विट्ठल दास मूँधड़ा जी कर रहे हैं। पं. जसराज जी और डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र जी का सम्मान एक साथ इसी संस्था ने किया।भारत का कोई भी ऐसा विद्वान नहीं है जिसे संसद ने आमंत्रित न किया हो। हिंदी के प्रचार – प्रसार के लिए संसद निरंतर कार्य शील है। डॉ. मिश्र कोलकाता के वरिष्ठ साहित्यकार हैं जिनका रचना – संसार बड़ा फलक लिए हुए है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र की हार्दिक इच्छा थी कि डॉ. मिश्र रामकृष्ण परमहंस पर कुछ लिखें। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने यह इच्छा उस समय व्यक्त की जब कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ वे माँ के दर्शन के लिए दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के उसी प्रांगण में थे, जहांँ माँ भवतारिणी का विशाल परिसर था। संभवतः डॉ. विद्यनिवास मिश्र माध्यम बने थे। डॉ. मिश्र ने बंगाल के परमहंस की बतकही शैली को बंगाल की संस्कृति के रंग में नहाये बलिया की माटी से बने अपनी बोली और भाषा को बचाने का भगीरथ प्रयास ‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ के बहाने किया जो आपके वृद्धावस्था की ऊर्जा का द्योतक है।
डॉ. मिश्र से मैंने कहा आपने जो लिखा वह अवकाश प्राप्ति के पश्चात लिखा, पहले लिखते तो आपकी पुस्तकों की संख्या बढ़ जाती। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि समझती हो न वसुंधरा, ठाकुर की कृपा हुई है उसी माँ ने आदेश दिया है, तभी लिखा गया। जो लिख गया उसी माँ की कृपा है …… वही लिखवाती है। एक जगह वे कहते हैं, ‘कोयल अपनी बोली नहीं भूलती चाहे वह महानगर में ही क्यों न रहती हो।’ मुझे लगता है कि डॉ. मिश्र की यही गंँवई संवेदना आधुनिक युग जीवन जीने वालों के लिए ऐसी सीख है जो हमें मनुष्य बनाने की ओर ले जाती है।पद्मश्री से सम्मानित डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र का साहित्य हिंदी भाषा की संवेदना के प्रति संकल्पबद्ध है और आने वाले युग में इसकी अनिवार्य भूमिका रहेगी।
7 मार्च 2023 में आपने भौतिक जगत् छोड़ दिया और एक नई अनजानी राह पर चल पड़े। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी आत्मा को शान्ति मिले। विनम्र श्रद्धांजलि।

अभिनेता – निर्देशक सतीश कौशिक का निधन

‘तेरे नाम’ जैसी सुपरहिट फिल्म का निर्देशन करने वाले अभिनेता-निर्देशक सतीश कौशिक का गत 9 मार्च को निधन हो गया है । वह 66 वर्ष के थे । कौशिक बॉलीवुड में कदम रखने से पहले एक रंगकर्मी थे । कथित तौर पर कौशिक को कार में यात्रा के दौरान हार्ट अटैक आया था जिसके बाद उन्हें फोर्टिस हॉस्पिटल ले जाया गया । जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया ।
एक एक्टर के रूप में, उन्हें मिस्टर इंडिया में “कैलेंडर” की भूमिका से की थी। दीवाना मस्ताना में पप्पू पेजर के रूप में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता था ।
उन्होंने 1990 में आई सुपरहिट फिल्म ‘राम लखन’ और 1997 में ‘साजन चले ससुराल’ में हास्य भूमिकाओं के लिए फिल्मफेयर अवार्ड जीता था। उन्होंने कुंदन शाह की कॉमेडी क्लासिक ‘जाने भी दो यारों’ (1983) के लिए डायलॉग भी लिखे थे । उन्होंने 2003 में आई रोमांटिक- ट्रेजडी फिल्म तेरे नाम का निर्देशन किया था । इसके अलावा उन्होंने ‘हम आपके दिल में रहते हैं’ फिल्म का भी निर्देशन किया था ।
सतीश का जन्म 13 अप्रैल 1956 को महेंद्रगढ़, हरियाणा में हुआ था । उन्होंने 1972 में किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली से स्नातक किया था । वह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पूर्व छात्र थे । उनके परिवार में उनकी पत्नी शशि और 11 वर्षीय बेटी वंशिका कौशिक हैं ।

उत्सव देता है संघर्ष की शक्ति-प्रतिभा सिंह

गीत-संगीत के साथ वीरांगना होली मिलन उत्सव सम्पन्न

कोलकाता ।अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउडेशन पश्चिम बंगाल की ओर से होली मिलन उत्सव लिलुआ के रॉयल अपार्टमेंट में गीत-संगीत के रंगारंग कार्यक्रम के साथ सम्पन्न हुआ। प्रतिभा सिंह, राकेश पांडेय, कुमार सुरजीत, काजल ने अपने गीतों से लोगों को झूमने-नाचने पर मबजूर कर दिया। भोजपुरी के पारम्परिक होली गीतों का लुत्फ लोगों ने भरपूर उठाया, वहीं फिल्मी गीतों ने भी मन मोहा। समारोह को सम्बोधित करते हुए वीरांगना की प्रदेश अध्यक्ष और विख्यात गायिका प्रतिभा सिंह ने कहा कि जीवन को हर हाल में उत्सवपूर्ण, संगीतमय और खुशहाल बनाये रखना जरूरी है। छोटी-मोटी खुशियां भी जीवन के बड़े संघर्ष से लड़ने की प्रेरणा देती हैं। वीरांगना की प्रदेश इकाई की महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह व सुमन सिंह, सचिव पूनम सिंह उपस्थित थीं। लिलुआ इकाई की पदाधिकारी लीला सिंह, नीतू सिंह, अनिता सिंह, सुमन सिंह, किरण सिंह, महानगर की महासचिव इंदु सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, पदाधिकारी सरोज सिंह, विद्या सिंह, सुमन सिंह, मीरा सिंह, बेबीश्री, बालीगंज की अध्यक्ष रीता सिंह, सोदपुर की अध्यक्ष सुनीता सिंह, महासचिव आशा सिंह, पदाधिकारी जयश्री सिंह, सुलेखा सिंह, कविता सिंह, मंजू सिंह, नारी शक्ति वीरांगना की पदाधिकारी अनीता साव आदि विशेष तौर पर उपस्थित थीं।

हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस में मनाया गया महिला दिवस

कोलकाता । हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस में हाल ही में महिला दिवस मनाया गया । इस अवसर पर इम्ब्रैस इक्वालिटी विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी । परिचर्चा में ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर पीटर कुक, कोलकाता सेंटर फॉर क्रिएटिविटी (केसीसी) की निदेशक एवं क्यूरेटर रीना दीवान, एल टी माइंड ट्री की एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट सोनाली भट्टाचार्य, फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड की चीफ (स्ट्रैटिजी एंड ऑपरेशन), मॉपल की निदेशक पायल चोपड़ा ने भाग लिया । परिचर्चा सत्र का संचालन द हेरिटेज अकादमी के मीडिया साइंस विभाग की डीन डॉ. मधुपा बक्सी ने किया । वक्ताओं ने विषय को ध्यान में रखते हुए महिलाओं की उपलब्धियों पर विचार रखे, असमानता के खिलाफ अभियान चलाने की बात की और असमानता को दूर करने पर जोर दिया । ऋचा सिंह देवगुप्त ने कहा कि जब आप बड़े उद्देश्य को लेकर काम कर रहे हैं तो चयन पर ध्यान दें और उसे प्राथमिकता बनाएं । इस अवसर पर द हेरिटेज स्कूल की प्रिंसिपल सीमा सप्रू भी उपस्थित थीं ।

नहीं रहे पद्मश्री डॉ, कृष्ण बिहारी मिश्र

कोलकाता । पद्मश्री से सम्मानित हिंदी के प्रख्यात साहित्यकारडा. कृष्ण बिहारी मिश्र का निधन हो गया है । वे 90 साल के थे । कृष्ण बिहारी मिश्र ने 6 और 7 मार्च की मध्य रात्रि करीब एक बजे अंतिम सांस ली । कृष्ण बिहारी मिश्र के निधन की जानकारी उनके पुत्र कमलेश मिश्र ने दी । पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे । कृष्ण बिहारी मिश्र के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है ।
बताया जाता है कि पद्मश्री से सम्मानित डा. कृष्ण बिहारी मिश्र पिछले करीब एक महीने से बीमार चल रहे थे । कृष्ण बिहारी मिश्र को बीमारी के कारण करीब एक महीने पहले उपचार के लिए कोलकाता के अस्पताल में भर्ती कराया गया था । कृष्ण बिहारी मिश्र को तबीयत में सुधार होने पर एक दिन पहले ही अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया था ।
अस्पताल से डिस्चार्ज किए जाने के बाद कृष्ण बिहारी मिश्र को परिजन घर लेकर चले आए थे । कृष्ण बिहारी मिश्र को जिस दिन परिजन अस्पताल से घर लेकर आए । उसी रात डा. मिश्र अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गए. वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले थे । उनका जन्म बलिया जिले के बलिहार गांव में हुआ था ।
पश्चिम बंगाल के हिंदी जगत के प्रमुख साहित्यकार कृष्ण बिहारी मिश्र को साहित्य में योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया था । कृष्ण बिहारी मिश्रा ने रामकृष्ण परमहंस के जीवन पर आत्मकथात्मक शैली में “कल्पतरु की उत्सवलीला” पुस्तक की रचना की थी । कृष्ण बिहारी मिश्र की गिनती हिंदी के अग्रणी ललित निबंधकार, हिन्दी पत्रकारिता के अन्वेषक के रूप में होती है ।

वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का निधन

नयी दिल्ली । वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि वो बाथरूम में फिसल गए। वैदिक हिंदी के काफी प्रसिद्ध पत्रकारों में से एक हैं। उन्होंने आतंकी हाफिज सईद का इंटरव्यू किया था, जो काफी चर्चा में रहा था। वैदिक वह एक राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र स्तंभकार थे। वो नियमित रूप से देशभर में चल रहे मुद्दों पर अपने विचार लिखते थे।
कई मीडिया संस्थानों में कर चुके काम
वेद प्रताप वैदिक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की हिंदी समाचार एजेंसी ‘भाषा’ के संस्थापक-संपादक के रूप में जुड़े हुए थे। इसके अलावा वे नवभारत टाइम्स में संपादक (विचार) थे। वैदिक भारतीय भाषा सम्मेलन के अंतिम अध्यक्ष भी रहे। उनका जन्म 30 दिसंबर 1944 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उन्होंने इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में जेएनयू से पीएचडी की। वैदिक को दर्शन और राजनीतिशास्त्र में दिलचस्पी थी। वे अक्सर इन मुद्दों पर अपने विचार रखते थे।
50 से ज्यादा देशों की यात्रा की
वेद प्रताप वैदिक न सिर्फ भारत के मुद्दों में दिलचस्पी रखते थे, बल्कि वो विदेशी राजनीति और कूटनीति के विषयों पर भी खूब लिखते थे। उन्होंने लगभग 50 देशों की यात्रा की। वो संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी, रूसी और अंग्रेजी के जानकार थे।
हाफिज सईद से मुलाकात रही चर्चा में
साल 2014 में वैदिक ने हाफिज सईद से मुलाकात की थी। उन्होंने सईद के इंटरव्यू को अपने वेबसाइट पर सार्वजनिक भी किया, जिस पर काफी विवाद छिड़ा था। भारत लौटने पर उन्होंने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान जाते हैं, तो वहां उनका जोरदार स्वागत नहीं होगा। इस मामले में उनके खिलाफ राजद्रोह का केस भी दर्ज हुआ था ।

देश की पहली महिला संगीतकार थीं नरगिस की मां जद्दनबाई

बनारस के कोठे से निकल इंडस्ट्री में बनाई थी पहचान

सिनेमा की दुनिया में डायरेक्शन से लेकर कैमरा और म्यूजिक के क्षेत्र में हमेशा से ही मर्दों का दबदबा रहा। 100 साल पहले जब सिनेमा की शुरुआत हुई तो उस समय तो महिलाओं को हीरोइन तक के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था। लेकिन जिस तरह दुर्गाबाई कामत ने भारतीय सिनेमा की पहली महिला हीरोइन बनकर उस बंदिश को तोड़ा, उसी तरह जद्दनबाई हुसैन ने भी हिंदी सिनेमा की पहली महिला म्यूजिक कंपोजर बनकर इतिहास रचा। वह और सरस्वती देवी म्यूजिक की दुनिया में साथ-साथ ही आईं।
कोठे पर जन्म, मां दिलीपा बाई रहीं तवायफ
जद्दनबाई हुसैन का जन्म इलाहाबाद के एक कोठे की मशहूर तवायफ दिलीपा बाई के घर हुआ था। चूंकि जद्दनबाई की परवरिश और लालन-पालन कोठे पर ही हुआ, इसलिए बचपन से उनमें ठुमरी से लेकर गानों तक के प्रति रुझान देखने को मिला। बचपन से ही गानों का रियाज किया। भगवान ने ऐसी आवाज दी थी कि जो भी सुनता जद्दनबाई की ओर खिंचा चला आता। बताया जाता है कि जद्दनबाई की आवाज सुनकर दो ब्राह्मण युवा उनसे शादी को तैयार हो गए थे और इस्लाम तक कबूल कर लिया था। कोठे पर ही जद्दनबाई की चर्चे दूर-दूर तक होने लगे थे। भले ही जद्दनबाई की परवरिश कोठे पर हुई, पर तब वहां सिर्फ ठुमरी और नाच-गाना होता था। जद्दनबाई भी उसमें लीन हो गई थीं। उन्हें गाना और नाचना मां दिलीपा बाई से विरासत में मिला था। मां की इसी विरासत को जद्दनबाई आगे बढ़ाने लगीं।

गाने को बुलाते थे राज्यों के शासक, खूब गाईं ठुमरी
बाद में जद्दनबाई ने सिंगर बनने का फैसला किया और वह कोठे की दुनिया से निकलकर पहले कोलकाता और फिर मुंबई आ गईं। यहां उन्होंने गाने के अलावा फिल्मों में एक्टिंग भी की और डायरेक्शन भी किया। जद्दनबाई ने मुंबई आने के बाद पहले श्रीमंत गणपत राव और फिर उस्ताद मोइनुद्दीन खान, उस्तार छद्दू खान साहेब और उस्ताद लाब खान साहेब से ट्रेनिंग ली। धीरे-धीरे जद्दनबाई अपनी मां से भी ज्यादा मशहूर हो गईं। अब तो उन्हें बीकानेर से लेकर कश्मीर, इंदौर, रामपुर और जोधपुर जैसे शहरों के शासक भी अपने राज्यों में गाने के लिए बुलाने लगे। उन्होंने कई रेडियो स्टेशनों में गजलें गाईं, जिनका जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। वो जद्दनबाई की आवाज के दीवाने हो जाते। जद्दनबाई ने कोलंबिया ग्रामोफोन कंपनी के साथ भी गजलें रिकॉर्ड कीं।
प्रोडक्शन कंपनी खोली, नरगिस को किया लॉन्च
साल 1933 में जद्दनबाई ने फिल्म ‘राजा गोपीचंद’ से एक्टिंग डेब्यू किया। इसके बाद उन्होंने एक पाकिस्तानी फिल्म में भी काम किया। कुछेक फिल्मों में एक्टिंग करने के बाद जद्दनबाई ने 1935 में अपना प्रोडक्शन हाउस खोला जिसका नाम ‘संगीत फिल्म्स’ रखा। इसके बैनर तले जद्दनबाई ने पहली फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ प्रोड्यूस की। जद्दनबाई ने इस फिल्म में न सिर्फ एक्टिंग की, बल्कि इसका म्यूजिक भी दिया। इस तरह जद्दनबाई भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार बन गईं।
इसलिए बंद हो गई प्रोडक्शन कंपनी
जद्दनबाई ने ‘तलाश-ए-हक’ से ही बेटी नरगिस को बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट लॉन्च किया। लेकिन 1940 तक आते-आते कई बड़े प्रोडक्शन हाउस की एंट्री हो चुकी थी। इस कारण बड़े स्तर पर फिल्मों का प्रोडक्शन शुरू हो गया। नौबत ऐसी आ गई कि जद्दनबाई की प्रोडक्शन कंपनी बंद हो गई और उन्होंने फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। 8 अप्रैल 1949 को जद्दनबाई का निधन हो गया।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

‘सहमति से साथ रहने’ और ‘सहमति से सम्बन्ध’ का अंतर समझना होगा – दिल्ली हाई कोर्ट

नयी दिल्ली । दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला की किसी पुरुष के साथ रहने की सहमति का इस्तेमाल यह अनुमान लगाने के लिए नहीं किया जा सकता है कि वह उसके साथ यौन संबंध बनाने के लिए सहमत हुई है। जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने कहा कि, ‘ अगर एक महिला किसी पुरुष के साथ रहने के लिए सहमति देती है, इसका मतलब ये नहीं है कि इस तथ्य को यौन संबंध बनाने का आधार बनाया जा सकता है। कोर्ट ने एक केस के संदर्भ में किसी महिला के किसी पुरुष के साथ रहने के लिए सहमति और यौन संबंध के लिए सहमति के बीच के अंतर को स्पष्ट करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि ‘मजबूरी’ के विपरीत शब्द ‘सहमति’ पर अधिक गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
क्या है मामला
अदालत ने आध्यात्मिक गुरु होने का ढोंग करके एक चेक नागरिक के साथ रेप करने के आरोपी शख्स को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। इस शख्स ने महिला के पति की मौत के बाद की औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए महिला को मदद का भरोसा दिया था। महिला इस शख्स के साथ रह रही थी। आरोप है कि इस शख्स ने 2019 में दिल्ली के एक हॉस्टल में पीड़िता का यौन शोषण किया और बाद में जनवरी व फरवरी 2020 में प्रयागराज और बिहार में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
इन धाराओं में दर्ज किया मुकदमा
एफआईआर पिछले साल मार्च में भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 354 और 376 के तहत दर्ज की गई थी और आरोप पत्र मई 2022 में दायर किया गया था। याचिकाकर्ता-आरोपी के वकील ने प्रस्तुत किया कि पीड़िता बालिग थी और उसके साथ किसी भी तरह के शारीरिक संबंध पूरी तरह सहमति से बनाए गए थे। यह तर्क दिया गया कि एफआईआर दिल्ली में हुई घटनाओं के बहुत बाद में दर्ज की गई थी और पीड़िता की ओर से न तो कोई शिकायत की गई और न ही किसी अन्य स्थान पर कोई एफआईआर दर्ज करवाने का प्रयास किया गया जहां उसका कथित रूप से यौन उत्पीड़न किया गया था।

एशिया की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर जिसने हर राइड के साथ रचा इतिहास!

नयी दिल्‍ली । सुरेखा यादव। एशिया की पहली मह‍िला लोको पायलट। उनके नाम अब एक और उपलब्धि जुड़ गई है। वह वंदे भारत एक्‍सप्रेस ट्रेन चलाने वाली पहली महिला ड्राइवर भी बन गई हैं। सोमवार को सोलापुर स्‍टेशन और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) के बीच उन्‍होंने इस सेमी-हाई स्‍पीड ट्रेन को दौड़ाया। सुरेखा यादव किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। उनकी गिनती उन चंद महिलाओं में है जिन्‍होंने पुरुषों के वर्चस्‍व वाले क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। वह लाखों-लाख लड़कियों को इंस्‍पायर करती हैं। 450 किमी की दूरी तय करने के बाद जब 13 मार्च को प्‍लेटफॉर्म नंबर 8 पर वह पहली बार वंदे भारत एक्‍सप्रेस लेकर पहुंचीं तो हर देशवासी का सीना फूल गया। अपनी हर राइड के साथ आज तक सुरेखा ने बेटियों की आस को पंख लगाए हैं। उन्‍हें उम्‍मीद दी है कि वे जो चाहें कर सकती हैं। 1988 में जिस दिन वह ट्रेन ड्राइवर बनीं, उसी दिन उन्‍होंने कई रवायतों को धराशायी कर दिया था। साधारण किसान की इस बेटी ने हमेशा माना कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए। जिस काम में हो उसे पूरी ईमानदारी और निष्‍ठा से करना चाहिए। रेलवे में अब तक का उनका सफर यादगार रहा है।
सुरेखा का जन्‍म महाराष्‍ट्र के सतारा में 2 सितंबर 1965 में हुआ था। सोनाबाई और रामचंद्र भोसले की पांच संतानों में सुरेखा सबसे बड़ी हैं। उनके पिता रामचंद्र अब दुनिया में नहीं हैं। वह किसान थे। सुरेखा की शुरुआती स्‍कूलिंग सेंट पॉल कॉन्‍वेंट हाईस्‍कूल से हुई। स्‍कूल की पढ़ाई खत्‍म करने के बाद उन्‍होंने वोकेशन ट्रेनिंग में एडमिशन लिया। सतारा जिले के कराड में ही उन्‍होंने गवर्नमेंट पॉलिटेक्‍न‍िक से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्‍लोमा किया। वह मैथ्‍स में बीएससी पूरी करके बीएड करने के बाद टीचर बनाना चाहती थीं। लेकिन, रेलवे में नौकरी के अवसर ने आगे की पढ़ाई पर ब्रेक लगा दिए।
सुरेखा से पहले ट्रेन ड्राइवर नहीं बनी थी कोई मह‍िला
1988 में सुरेखा सेंट्रल रेलवे से जुड़ गईं। उन्‍होंने कॅरियर की शुरुआत बतौर ट्रेनी असिस्‍टेंट ड्राइवर की। उनसे पहले कोई महिला ट्रेन ड्राइवर नहीं बनी थी। यहीं से सुरेखा ने इतिहास रचना शुरू कर दिया था। 1989 में वह रेगुलर असिस्‍टेंट ड्राइवर बन गईं। सबसे पहली लोकल गुड्स ट्रेन जो उन्‍होंने चलाई उसका नंबर एल-50 था। 1998 तक वह परिपक्‍व गुड्स ट्रेन ड्राइवर बन चुकी थीं। अप्रैल 2000 में सुरेखा ने सेंट्रल रेलवे के लिए पहली ‘लेडीज स्‍पेशल’ लोकल ट्रेन चलाई। तत्‍कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने चार मेट्रो शहरों में इनकी शुरुआत की थी।8 मार्च 2011 सुरेखा के करियर में सबसे यादगार लम्‍हों में से एक है। अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के दिन वह डेक्‍कन क्‍वीन चलाने वाली एश‍िया की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर बनी थीं। वह ट्रेन को पुणे से सीएसटी तक लेकर गई थीं। सेंट्रल रेलवे के मुख्‍यालय सीएसटी पहुंचने पर उनका स्‍वागत मुंबई की तत्‍कालीन मेयर श्रद्धा जाधव ने किया था। इसके पहले तक यही सुनने में आता था कि महिलाएं रेल नहीं चाहती हैं। 2018 में सुरेखा मुंबई से पुणे पैसेंजर ट्रेन लेकर गई थीं। यह उनके यादगार सफर में से एक है। इस दौरान उनकी ट्रेन मुश्किल मोड़ों से गुजरी थी। यह पूरा रूट भी बेहद मनोरम था। इस ट्रेन में पूरा स्‍टाफ महिलाओं का था। एक इंटरव्‍यू में सुरेखा ने कहा था कि उनके लिए सबसे गौरवपूर्ण पल वो था जब उन्‍होंने ड्राइवर के तौर पर पहली बार ट्रेन चलाई थी। उस दिन उन्‍हें महिला होने पर फख्र महसूस हुआ था।
कई पुरस्‍कारों से किया जा चुका है सम्‍मान‍ित
सुरेखा 1991 में ‘हम भी किसी से कम नहीं’ नाम के सीरियल में भी काम कर चुकी हैं। वुमेन ट्रेन ड्राइवर के तौर पर उनके खास रोल को कई संगठनों ने काफी सराहा था। 2021 में इंटरनेशनल वुमेंस डे के अवसर पर वह मुंबई से लखनऊ स्‍पेशल ट्रेन चलाकर ले गई थीं। इसमें भी पूरा महिला स्‍टाफ ही था।
13 मार्च को महज 6.35 घंटों में सुरेखा वंदे भारत ट्रेन को सोलापुर से मुंबई लेकर पहुंचीं। यह दूरी 455 किमी थी। रेलवे के इतिहास में किसी एक दिन में इतनी लंबी दूरी पर ट्रेन चलाने वाली वह पहली मह‍िला थीं। रेलवे में वह सबसे वरिष्‍ठ महिला ट्रेन ड्राइवर हैं। उनकी देखादेखी कई और महिलाएं भी लोको पायलट बनने की हिम्‍मत जुटा पाईं।
सुरेखा की शादी 1990 में शंकर यादव से हुई थी। शंकर महाराष्‍ट्र में पुलिस इंस्‍पेक्‍टर हैं। उनके दो बेटे हैं। अजिंक्‍य और अजितेश। सुरेखा को कई पुरस्‍कारों से नवाजा जा चुका है। इनमें आरडब्ल्यूसीसी बेस्‍ट वुमन अवार्ड (2013), वुमन अचीवर्स अवार्ड (2011), प्रेरणा पुरस्‍कार (2005) शामिल हैं। 2018 में तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सुरेखा को राष्‍ट्रपति भवन में प्रतिष्ठित ‘फर्स्‍ट लेडीज अवार्ड’ से सम्‍मानित किया था।