Saturday, March 21, 2026
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मजदूर और प्रेम

आनंद श्रीवास्तव

मेरे फटे हुए हाथों में क्या तुम अपनी कोमल हथेली देकर आनंदित हो पाओगी?
क्या मेरे पसीने से लथपथ बदन से सटकर बैठना तुम्हें मंजूर होगा?
क्या मेरे जिस्म से आती गंध को बर्दाश्त कर पाओगी?
क्या मेरे फटे पुराने कपड़ों के साथ तुम्हें सहजता महसूस होगी?
मैं नहीं दे सकता तुम्हें
पांच सितारा होटल में कैंडल लाइट डिनर
मैं नहीं दिखा सकता किसी एरिस्टोक्रेट मॉल के मल्टीप्लेक्स में तुम्हें सिनेमा
मैं नहीं घुमा सकता समुंद्र के किनारे का रिजॉर्ट
मैं नहीं दे सकता आई फोन या कोई कीमती तोहफ़ा तुम्हें
बस दे सकता हूं सोने से भी शुद्ध और खरा प्यार तुम्हें
एक सुरक्षित हाथों का एहसास तुम्हें
मैंने ही रचा है ये पांच सितारा होटल
ये मॉल, ये मल्टीप्लेक्स
मैंने ही बनाया है
समुंद्र के किनारे का रिजॉर्ट
मेरे पास उपभोग के लिए कुछ भी नहीं
सिर्फ़ ये दोनों हाथ हैं
जो रच सकता है सारे कायनात की कारीगरी को ।
जो रच सकता है सृष्टि के हर आयाम को।
जो रच सकता है धरती के श्रृंगार को ।
मैं अपना हाथ तुम्हें देना चाहता हूं
अगर तुम करो स्वीकार तो
मैं तुम्हारे लिए
सपनों और उम्मीदों की आगाज़ रच सकता हूं।
तुम्हें बेपनाह प्यार कर सकता हूं।।।।।।

मशहूर पाकिस्तानी लेखक तारेक फतह का 73 साल की उम्र में निधन

ओटावा । मशहूर पाकिस्तानी पत्रकार और लेखक तारेक फतह का 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें कैंसर हो गया था और लंबे समय से बीमार थे। उनकी बेटी नताशा फतह ने उनके निधन की पुष्टि की है। इससे पहले शुक्रवार को उनके निधन की अफवाह सामने आई थी, जिसके बाद लोगों ने श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया था। देखते ही देखते ट्विटर पर तारेक फतह ट्रेंड करने लगा था। तारेक फतह से सीधे तौर पर जुड़े लोगों ने इसका खंडन किया था। हालांकि इस बार उनके निधन की पुष्टि सीधे तौर पर उनकी बेटी ने की है।तारेक फतह की बेटी ने अपने पिता के निधन पर ट्वीट किया, ‘पंजाब का शेर। भारत का बेटा। कनाडा का प्रेमी। सच बोलने वाला। न्याय के लिए लड़ने वाला। शोषितों और वंचितों की आवाज तारेक फतह ने अपनी मुहिम आगे बढ़ा दी है। उनकी क्रांति उन सभी के साथ जारी रहेगी जो उन्हें जानते और प्यार करते थे। क्या आप इसमें जुड़ेंगे?’ पाकिस्तानी पत्रकार आरजू काजमी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी है।
पाकिस्तान में हुआ था जन्म
तारेक फतह का जन्म 20 नवंबर 1949 में पाकिस्तान के कराची में हुआ था। 1987 में वह कनाडा चले गए। उन्हें अपनी रिपोर्टिंग के लिए कई तरह के पुरस्कार भी मिल चुके हैं। कनाडा समेत दुनिया की कई प्रमुख पत्रिकाओं और अखबारों में उनके लेख छपते रहे हैं। भले ही उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ हो, लेकिन वह पाकिस्तान की कमियों को उजागर करने में पीछे नहीं रहते थे। सेना और कट्टरपंथियों के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल रखा था, जिसके कारण उनकी सोशल मीडिया पर लाखो फॉलोअर्स थे। 1970 में उन्होंने कराची सन के लिए एक रिपोर्टर के रूप में काम शुरू किया। 1977 में तारेक फतह पर देशद्रोह का आरोप लगा था। जिया-उल हक शासन ने उन्हें पत्रकारिता करने से रोक दिया था। उन्हे अरबी भाषा भी आती थी, और वह कुछ दिन सऊदी अरब में भी रहे।

फटे-पुराने कपड़ों को इको-फ्रेंडली बैग में बदली रही हैं 93 साल की दादी, 35,000 मुफ्त बांटे

नयी दिल्‍ली । बीते कई सालों से मधुकांता भट्ट फटे-पुराने कपड़ों को इको-फ्रेंडली बैग में बदल रही हैं। इसका मकसद प्‍लास्टिक बैग का विकल्‍प देना है। इससे इन फटे-पुराने कपड़ों का भी इस्‍तेमाल हो जाता है। मधुकांता की उम्र 93 साल हो चुकी है। उन्‍हें सिलाई करना बहुत पसंद है। वह अब तक 35,000 से ज्‍यादा कपड़ों के बैग मुफ्ट बांट चुकी हैं। 2015 से एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उन्‍होंने बैग न सिला हो। सुबह नहाकर पूजा और फिर ब्रेकफास्‍ट करने के बाद वह सीधे अपनी सिलाई मशीन पर बैठ जाती हैं। वह चाहती हैं कि धरती से प्‍लास्टिक का बोझ जितना कम हो सकता है हो। मधुकांता कहती हैं कि वह खाली नहीं बैठ सकती हैं।
शादी के बाद आ गई थीं हैदराबाद
मधुकांता का जन्‍म गुजरात के जामनगर में एक छोटे से गांव में 1930 में हुआ था। गांव में लड़कियों को स्‍कूल नहीं भेजा जाता था। लिहाजा, उन्‍हें भी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली। 18 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। शादी के बाद वह पति के साथ हैदराबाद आकर रहने लगीं। उन्‍हें सिर्फ गुजराती ही बोलनी आती थी। ऐसे में उनका फोकस सिर्फ बच्‍चों पर हो गया। मधुकांता के चार बेटियां और एक बेटा है। उन्‍होंने बच्‍चों को पढ़ाने-लिखाने में कसर नहीं छोड़ी। सिलाई के प्रति उनका रुझान काफी पहले से था। लेकिन, उन्‍हें कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं मिली।
1955 में जोड़-बटोरकर खरीदी स‍िलाई मशीन
बच्‍चे स्‍कूल जाने लगे तो मधुकांता के बचपन की ख्‍वाहिशें हिलोरे मारने लगीं। 1955 में उन्‍होंने बचत करके सिलाई मशीन ली। तब इसकी कीमत 200 रुपये थी। जोड़-बटोरकर मशीन तो वह ले आईं लेकिन लंबी ट्रेनिंग लेने का उनके पास पैसा नहीं था। लिहाजा, उन्‍होंने एक महीने का कोर्स किया। इसमें मशीन रिपेयर करने और इसके कामकाज का तरीका सिखाया जाता था। सिलाई, कटाई और डिजाइनिंग उन्‍होंने दूसरों को देख-देखकर सीख लिया।
35,000 से ज्‍यादा बैग मुफ्त बांट चुकी हैं
कुछ ही महीनों में मधुकांता मशीन चलाने में बिल्‍कुल ट्रेंड हो गईं। फिर वह अपने और बच्‍चों के कपड़े सिलने लगीं। पड़ोसियों के ब्‍लाउज और पेटिकोट भी वह सिल दिया करती थीं। उनके बेटे नरेश कुमार भट्ट बताते हैं कि मधुकांता आसपास के दर्जियों और फर्नीचर बनाने वालों से कतरन और फटे-पुराने कपड़े जुटाती हैं। फिर इन कपड़ों से बैग बना देती हैं। वह अब तक 35,000 से ज्‍यादा बैग बना चुकी हैं। इन्‍हें मधुकांता ने निःशुल्क बांटा है। मधुकांता कहती हैं कि वह खाली नहीं बैठ सकती हैं। खाली बैठना उन्‍हें सबसे ज्‍यादा परेशान करता है।

रतन टाटा को ऑस्ट्रेलिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान

नयी दिल्ली । भारतीय उद्योगपति रतन टाटा ने एक बार फिर से वैश्विक मंच पर भारत का मान बढ़ाया है। रतन टाटा को ऑस्ट्रेलिया ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया है। ऑस्ट्रेलिया के राजदूत बैरी ओ फैरेल ने ट्विटर पर रतन टाटा के साथ तस्वीरें शेयर करते हुए इसकी जानकारी दी है। टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा को सर्वोच्च सम्मान देते हुए ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें उद्योग जगत और परोपकार जगत का दिग्गज बताया है। उन्होंने सम्मान लेते हुए रतन टाटा के संग फोटो शेयर की है। तस्वीरों में रतन टाटा के साथ टाटा संग के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन भी नजर आए।
रतन टाटा को सम्मान
ऑस्ट्रेलिया ने रतन टाटा को कारोबार जगत में उनके काम और उनकी परोपकारिता के लिए ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया के सम्मान से सम्मानित किया गया है। रतन टाटा ने केवल भारत के लोगों पर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया के लोगों पर अपनी छाप छोड़ दी है। बिजनस जगत में उनके योगदान ने ऑस्ट्रेलिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। ऑस्ट्रेलिया के राजदूत बैरी ओ फैरेल ने उनके बारे में ट्वीट पर लिखा कि रतन टाटा ने केवल भारत के कारोबार और परोपकार के दिग्गज नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपने योगदान से ऑस्ट्रेलिया पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। उन्होंने भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए लंबे वक्त तक काम किया है। उन्होंने बिना रुके लंबे वक्त तक भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच कारोबारी संबंधों को मजबूत करने के लिए काम किया है। उनके अहम योगदान को देखते हुए ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया ( सम्मान से सम्मानित किया गया। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों के अपलोड होते ही वो वायरल हो गया। लोग रतन टाटा की तारीफों के पुल बांध रहे हैं।

चांदनी बनी वॉयस ऑफ स्लम, बदल रही है बस्ती के बच्चों का जीवन

नयी दिल्ली । झुग्‍गी-झोपड़ी के बच्‍चे चांदनी को ‘चांदनी दी’ के नाम से जानते हैं। वह आज ‘वॉयस ऑफ स्‍लम’ की संस्‍थापक हैं। 2016 में 18 साल की उम्र में उन्‍होंने इस संस्‍था की शुरुआत की थी। यह एनजीओ झुग्‍गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्‍चों की शिक्षा के लिए काम करता है। चांदनी इन बच्‍चों के दर्द को दूसरों की तुलना में कहीं ज्‍यादा महसूस कर सकती हैं। वजह है कि चांदनी ने कभी खुद यह जिंदगी जी है। उनका ताल्‍लुक सड़क पर तमाशा दिखाने वाले परिवार से था। छह साल की उम्र में पिता के साथ वह गांव-गांव शहर-शहर यह काम करती थीं। किसी तरह पेट पल जाता था। दुख का पहाड़ तब टूटा जब अचानक चांदनी के सिर से पिता का साया उठ गया। तब वह 10 साल की भी नहीं थीं। उनके दो और छोटे भाई-बहन थे। पिता के गम में मां का हाल बुरा हो गया था। परिवार का पेट पालने की जिम्‍मेदारी चांदनी पर आ गई थी। उन्‍होंने कूड़ा बीनना शुरू कर दिया। फूल और भुट्टे बेचे। उन्‍होंने वह समय देखा है जब उनसे लोगों ने ‘ऐ लड़की!’ ‘ओ!’ ‘कितने पैसे लेगी तू मेरे साथ चलने के…’ यहां तक कहा। लेकिन, चांदनी इन सबको सहकर आगे बढ़ती गईं और कारवां बनता गया। आज अपनी संस्‍था के जरिये वह न केवल सैकड़ों बच्‍चों को पढ़ा रही हैं, बल्कि उनकी सशक्‍त आवाज भी हैं।
बहुत छोटी उम्र से चांदनी झुग्‍ग‍ी-बस्तियों में रहने वाले बच्‍चों के लिए काम कर रही हैं। 10 साल की उम्र में वह ‘बढ़ते कदम’ नाम के संगठन से जुड़ गई थीं। यह संगठन गरीब बच्‍चों की शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य की बुनियादी जरूरतें पूरी करता है। चांदनी के कड़वे अनुभव उन्‍हें इस संस्‍था के पास तक लेकर गए। चांदनी का जन्‍म 1997 में हुआ था। पिता सड़क पर तमाशा दिखाया करते थे। छह साल की उम्र में वह भी पिता के काम का हिस्‍सा बनी गई थीं। लेकिन, अचानक एक दिन पिता नहीं रहे। घर पर चूल्‍हा जलना बंद हो गया। करीब एक साल तक परिवार ने भरपेट खाना नहीं खाया। परिवार का पेट पालने के लिए चांदनी मां के साथ कूड़ा बीनने लगीं। घर में उनके दो और छोटे भाई-बहन भी थे।
सुबह तड़के कूड़ा बीनने न‍िकल पड़ती थीं
चांदनी सुबह तीन बजे तड़के सड़क पर कूड़ा बीनने निकलती थीं। वह ऐसा बिल्‍कुल करना नहीं चाहती थीं। लेकिन, परिवार चलाने के लिए यह जरूरी था। फिर कूड़ा बीनना छोड़ उन्‍होंने फूल बेचना शुरू किया। लोग बहुत गंदी तरीके से बात करते थे। इसी दौरान उन्‍होंने ध्‍यान दिया कि कुछ लोग सड़कों पर बच्‍चों को पढ़ाने के लिए आते हैं। वह वहां जाकर पढ़ने लगीं। उन्‍हें एहसास था कि बस यही एक चीज है जिससे जिंदगी को बदला जा सकता है। फूल बेचने का काम बंद करके उन्‍होंने भुट्टे बेचने का काम शुरू कर दिया। भुट्टा खरीदने के लिए उन्‍हें नोएडा से दिल्‍ली जाना पड़ता था। वह करीब 50 किलो भुट्टा लेकर आती थीं। इसके लिए उन्‍हें सुबह 4 बजे मंडी पहुंचना पड़ता था। कारण य‍ह था कि समय बढ़ने के साथ मंडी में भाव बढ़ते जाते थे। गाड़ी भी नहीं मिलती थी। इसी तरह एक भयावह हादसे के कारण वह कई दिनों तक घर से नहीं निकली ।
झुग्‍गी में रहने वाले बच्‍चों की बन गईं आवाज
चांदनी ने सोचा इस तरह से तो काम नहीं चलेगा। वह घर में बंद रहकर कैसे रह सकती हैं। उनका घर कैसे चलेगा। और लोग भी तो काम करते हैं। उन्‍हें क्‍या-क्‍या नहीं सहना पड़ता होगा। बाल अधिकार के बारे में उन्‍होंने और जानकारी हासिल की। जब चांदनी 18 साल की हुईं तो देव प्रताप सिंह के साथ ‘वॉयस ऑफ स्‍लम’ की शुरुआत की। 2016 में शुरू हुआ यह एनजीओ झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्‍चों के लिए काम करता है। यह उन्‍हें अपनी बात कहने के लिए मंच भी मुहैया करता है। ‘बालकनामा’ के जरिये भी चांदनी इन गरीब बच्‍चों की बातों को सामने लाती हैं। ‘बालकनामा’ दिल्‍ली से प्रकाशित होने वाला अखबार है जो सड़क पर रहने वाले बच्‍चे निकालते हैं। इसमें उस तरह के सभी विषय उठाए जाते हैं जिनसे सड़क पर रहने वाले बच्‍चों की जिंदगी पर असर पड़ता है। चांदनी ने इस अखबार में रिपोर्टर से सम्पादक तक का सफर तय किया है।

भारतीय मुद्रा में व्यापार करने वाला 19वाँ देश बना बांग्लादेश

ढाका । दुनिया में आज हर तरह का कारोबार डॉलर के जरिए होता है। लेकिन कई देश हैं जो डॉलर से छुटकारा चाहते हैं। बांग्लादेश और भारत के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। इसके जरिए अब बांग्लादेश भारत से अपना व्यापार रुपये में करेगा। बांग्लादेश 19वां देश बन गया है जो भारत के साथ डॉलर की जगह भारतीय मुद्रा में व्यापार करेगा। दोनों देश डॉलर को छोड़ने और अपने लेनदेन को आसान बनाने के लिए स्थानीय मुद्रा के इस्तेमाल की बातचीत महीनों से कर रहे थे।
भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार शुरु करने के लिए बांग्लादेश के दो बैंक सोनाली बैंक और ईस्टर्न बैंक लिमिटेड ( ईबीएल) दो भारतीय बैंकों एसबीआई और आईसीआईसीआई बैंक में अपने वोस्ट्रो खाते खोलेंगे। दोनों भारतीय बैंक भी बांग्लादेश के इन बैंकों में अपने खाते खोलेंगे। बिनी किसी तीसरी मुद्रा के दोनों देश टका और रुपया में अपना व्यापार करेंगे। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक सोनाली बैंक लिमिटेड के सीईओ और एमडी मोहम्मद अफजल करीम ने कहा, ‘इस तरह के व्यापार से दोनों देशों का डॉलर पर दबाव कम होगा। दोनों देशों को इससे फायदा होगा।’
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव होगा कम
भारतीय रिजर्व बैंक और एसबीआई का एक प्रतिनिधिमंडल बांग्लादेश की राजधानी पहुंचा था। यहां रुपया और टका में व्यापार करने पर चर्चा हुई थी। 11 अप्रैल को आरबीआई और एसबीआई के भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने ईबीएल और सोनाली बैंक के एमडी से मुलाकात की। बांग्लादेश बैंक के कार्यकारी निदेशक मेजबुल हक ने कहा कि उनके देश के व्यवसायों ने भारत के साथ रुपये-टका में व्यापार का स्वागत किया है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा।
इन देशों से भी होता है रुपए में व्यापार
रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में भारत से बांग्लादेश का आयात करीब 13.69 अरब डॉलर था जिसमें से 2 अरब डॉलर का कारोबार भारतीय रुपये में होगा और बाकी का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाएगा। ईबीएल के एमडी ने कहा, ‘दोनों देशों के केंद्रीय बैंक से मंजूरी के बाद हम ग्राहकों को सूचित करेंगे कि भारत के साथ आयात और निर्यात सीधे रुपये में हो सकता है। जो भी व्यापारी रुपए में कारोबार करना चाहेंगे उन्हें लेटर ऑफ क्रेडिट दिया जाएगा। इससे व्यापारियों को फायदा पहुंचेगा।’ रूस, सिंगापुर, श्रीलंका, बोत्सवाना, फिजी, जर्मनी, गुयाना, इजरायल, केन्या, मलेशिया, मॉरीशस, म्यांमार, न्यूजीलैंड, ओमान, सेशेल्स, तंजानिया, युगांडा और यूनाइटेड किंगडम वह देश हैं, जिनके साथ भी रुपए में व्यापार होता है।

ब्रिटेन में भारतीय महिला का संबलपुरी साड़ी में मैराथन

 4 घंटे 50 मिनट में 42 किमी तक लगाई दौड़

लंदन । उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड के मैनचेस्टर शहर में उत्तर-पूर्व भारत की पारंपरिक संबलपुरी साड़ी पहनकर मैराथन में दौड़ती हुई ओडिशा की एक महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। मधुस्मिता जेना (41) ने रविवार को अपनी चटख रंग की साड़ी और स्नीकर्स में चार घंटे और 50 मिनट में 42 किमी से अधिक की दूरी तय की। उनके इस कारनामे के बाद से सोशल मीडिया पर उनकी इस उपलब्धि के चर्चे हो रहे हैं।
ब्रिटिश प्रवासी संगठन फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल (एफआईएसआई) ने एक ट्वीट में कहा, “ब्रिटेन के मैनचेस्टर में रहने वाली एक भारतीय मधुस्मिता जेना ने एक सुंदर संबलपुरी साड़ी में आराम से मैनचेस्टर मैराथन 2023 में हिस्सा लिया। अपनी भारतीय विरासत को गर्व से प्रदर्शित करते हुए, वह सर्वोत्कृष्ट भारतीय पोशाक पर एक आकर्षक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करती हैं।” जल्द ही उनकी इस उपलब्धि की कई और लोगों ने भी सराहना की। हालांकि, कुछ लोगों ने उनके परिधान की व्यावहारिकता पर हैरानी जताई।

छात्राओं के चेहरे पर मुस्कान ला रहे हैं बिहार के ‘पैडमैन’ गौरव राय

सिवान । बिहार के ‘पैडमैन’ हालांकि आर्थिक रूप से उतने कमजोर नहीं हैं। इनके सामने बच्चियों को समझाने का झंझट नहीं है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिहार के ‘पैडमैन’ की। जो इन दिनों हजारों छात्राओं के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम कर रहे हैं। कहते हैं कि समाज के लिए कुछ करने की चाहत तो सभी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण हैं जिले के भगवानपुर हाट प्रखंड के सुघड़ी निवासी गौरव राय। इन्होंने खुद की पहल से भगवानपुर हाट प्रखंड के तीन हाई स्कूलों में मंगलवार को सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन लगाई।
गौरव राय ने माघर उच्च विद्यालय, माघर, इंद्र सिंह उच्च विद्यालय सह इंटर कॉलेज, हिलसड़ और एसएसए उच्च विद्यालय सह इंटर कॉलेज भगवानपुर हाट में वेंडिंग मशीन लगवाया। पटना से अपनी कार से इन मशीनों को लेकर गौरव राय एक- एक कर तीनों हाई स्कूलों में पहुंचे। इस दौरान उन्होंने खुद से स्कूल में सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन को लगाया। साथ ही शिक्षक और छात्राओं को इसके उपयोग की ट्रेनिंग भी दी। गौरव राय के इस पहल को देख शिक्षकों और छात्राओं ने खूब सराहा।
110 स्कूलों में लगा चुके हैं वेंडिंग मशीन
पटना में एक निजी कंपनी में सीनियर जेनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत गौरव सिन्हा सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते हैं। उन्होंने बताया कि प्रति महीने खुद की सैलरी से बचत कर वे सेनेटरी नेपकिन वेंडिंग मशीन और साइकिल खरीदते हैं। इस काम में बाद में मित्रों का भी सहयोग मिलने लगा। ऐसे में अब तक बिहार के 110 हाई स्कूलों में सेनेटरी नेपकिन वेंडिंग मशीन लगा चूके हैं। साथ ही 157 जरूरतमंद बच्चों को साइकिल भी दे चूके हैं।
कोरोना काल में बने ऑक्सीजन मैन
गौरव राय की पहचाना बिहार में ऑक्सीजन मैन के नाम से भी है। कोरोना के समय पटना में जरूरतमंदों को ऑक्सीजन सिलिंडर उपलब्ध करा कर गौरव सिन्हा ने कई लोगों की जिंदगी बचाई थी। जिसकी वजह से इन्हें ऑक्सीजन मैन के तौर पर बिहार में पहचान मिली। दरअसल कोरोना पॉजिटिव होने के बाद पीएमसीएच में उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिली। जिसके बाद उन्होंने खुद सिलिंडर खरीद लिया। और जब ठीक हो गए तो लोगों को सिलिंडर उपलब्ध कराने लगे। जिसमें लोगों ने भी उनका खूब साथ दिया।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

अमित शाह ने किया विश्व का पहला नैनो डीएपी (तरल) उर्वरक राष्ट्र को समर्पित

• माननीय गृह और सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने इफको मुख्यालय, नयी दिल्ली में इफको द्वारा विकसित इफको नैनो डीएपी (तरल) उर्वरक राष्ट्र को समर्पित किया।
• एफसीओ के तहत अधिसूचित इफको नैनो डीएपी (तरल) शीघ्र ही किसानों के लिए उपलब्ध होगा।
• यह उर्वरक पौधे की उत्पादकता बढ़ाने में कारगर है। इसे आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर कृषि के ध्येय के अनुरूप विकसित किया गया है।
• यह परंपरागत यूरिया से सस्ता है। (डीएपी की एक बोरी की कीमत रु. 1350/- है जबकि नैनो डीएपी (तरल) के एक बोतल की कीमत मात्र रु. 600/- है।
• इसका प्रयोग जैविक रूप से सुरक्षित है तथा इसका उद्देश्य मृदा, जल और वायु प्रदूषण को कम करना है।
• इससे डीएपी के आयात पर निर्भरता कम होगी।
• इससे परिवहन और भंडारण की लागत में कमी आएगी।

कोलकाता । कृषि उत्पादकता तथा किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से माननीय केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री  अमित शाह ने आज विश्व के पहले नैनो डीएपी (तरल) उर्वरक का लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री के सहकार से समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। माननीय मंत्री जी ने इफको सदन में आयोजित एक समारोह में नैनो डीएपी (तरल) राष्ट्र को समर्पित किया, जिसे भारत व विदेश में करोड़ों किसानों और सदस्य सहकारी समितियों ने ऑनलाइन देखा।
इफको ने नैनो डीएपी के उत्पादन के लिए गुजरात में कलोल, कांडला और उड़ीसा में पारादीप में विनिर्माण इकाइयों की स्थापना की है। कलोल संयंत्र में उत्पादन पहले ही शुरू हो चुका है। इस वर्ष नैनो डीएपी के 5 करोड़ बोतलों का उत्पादन किया जाएगा जो 25 लाख टन डीएपी के बराबर होगा। आशा है कि वित्त वर्ष 2025-26 तक इफको के तीनों नैनो डीएपी संयंत्रों से नैनो डीएपी की 18 करोड़ बोतलों का उत्पादन किया जाएगा।
नैनो डीएपी (तरल) नाइट्रोजन और फास्फोरस का उत्तम स्रोत है, जो पौधों में इन पोषक तत्वों की कमी को दूर करता है। उर्वरक क्षेत्र की विश्व की सबसे बड़ी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) द्वारा विकसित तरल उर्वरक नैनो डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत 2 मार्च, 2023 को अधिसूचित किया गया है। इफको को भारत में नैनो डीएपी (तरल) के उत्पादन की अनुमति देने के लिए राजपत्र अधिसूचना जारी की गई थी। यह जैविक रूप से सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ही अवशेष मुक्त हरित कृषि के लिए उपयुक्त है।
इस अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, ने कहा , “सफल सहकारी समितियां अपने ढांचे से बाहर निकलते हुए अनुसंधान और नए नए क्षेत्रों में पदार्पण कर रही हैं । इस दृष्टि से इफको आज सभी सहकारी समितियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना है। इफको के द्वारा नैनो डीएपी (तरल) का लॉन्च फ़र्टिलाइज़र के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। करोड़ों केमिकल फर्टिलाइजर युक्त भूमि भारतीयों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बनी हुई है। आज लॉन्च हुए नैनो डीएपी (तरल) न केवल भूमि के संरक्षण में बड़ा योगदान देगा अपितु पौधे पर छिड़काव के माध्यम से उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों को बढ़ाएगा ।“ “देश में कुल फर्टिलाइजर का उत्पादन 384 लाख मीट्रिक टन हुआ है। इसमें सहकारी समितियों ने 132 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन किया है। और इस 132 लाख मैट्रिक टन फ़र्टिलाइज़र में से अकेले इफको ने 90 लाख मीट्रिक टन फर्टिलाइजर का उत्पादन किया है। भारत की आत्मनिर्भरता में इफको, कृभको जैसी हमारी सहकारी समितियों का बहुत बड़ा योगदान है”  शाह ने कहा। इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने के अनुरूप किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें बेहतर भविष्य प्रदान करने के उद्देश्य से नैनो डीएपी (तरल) को विकसित किया गया है।
इफको के प्रबंध निदेशक डॉ. उदय शंकर अवस्थी ने कहा कि नैनो डीएपी (तरल) फसल में पोषक तत्वों की गुणवत्ता और उत्पादकता को बढ़ाने में बहुत प्रभावी पाया गया है। नैनो डीएपी (तरल) पर्यावरण हितैषी उत्पाद है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग में काफी कमी आएगी। उन्होंने बताया कि इफको किसानों की बेहतरी के लिए अत्याधुनिक नवीन कृषि तकनीकों और नवाचारों के प्रयोग पर लगातार काम कर रहा है।

बांग्ला नववर्ष पर राज्यपाल ने किया शांति एवं सद्भाव का आह्वान

कोलकाता । बंगाली नववर्ष के अवसर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी. वी. आनंदबोस ने शांति और सद्भाव का आह्वान करते हुए गत 15 अप्रैल को एनसीसी पीस वॉक साइकिल वारियर्स और हेरिटेज वॉक को झंडी दिखाकर रवाना किया। राजभवन के उत्तरी गेट के सामने झंडी दिखाकर रवाना किया गया। शुभ नववर्ष पर राजभवन के इस गेट को खोल दिया गया। बांग्ला नव वर्ष पर आम लोगों के दर्शन के लिए द्वार खोले गए । “बंगाल में इस दौरान नई सुबह के रूप में आनंद उत्सव मनाता है जो ‘नबो बोरशो’ कहलाता है । युवा शक्ति प्रकाशमय हो और युवा उस शांति को देखेंगे,
समाज में सद्भाव स्थापित हो, बंगाल फिर से अपना गौरव हासिल करेगा ”, गवर्नर सीवी आनंद बोस ने अपने वक्तव्य में कहा और विश्वास जताया कि युवाओं को सशक्त बनाने से ही राष्ट्र सशक्त होगा। पूरे पश्चिम बंगाल से कई रक्षा कर्मियों के साथ एनसीसी कैडेटों ने भाग लिया था जिसमें भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के एनसीसी बैच भी शामिल रहा।
भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के एनसीसी कैडटों ने राज्यपाल के साथ एक संक्षिप्त बातचीत भी की जिसमें उन्होंने सभी को अत्यधिक प्रेरित किया। सूचना अरित्रिका दूबे ने दी ।यह जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।