Tuesday, March 24, 2026
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करोड़ों का पैकेज छोड़कर विनीता ने बनायी शुगर कॉस्मेटिक्स

नयी दिल्‍ली । उद्यमी विनीता सिंह अपने शो ‘शार्क टैंक’ के कारण हर घर में जानी जा रही हैं । शुगर कॉस्मेटिक्स की मुखिया विनीता आईआईटी और आईआईएम से पढ़ी हैं। सिर्फ 23 साल की उम्र में उन्‍हें इनवेस्‍टमेंट बैंक में 1 करोड़ रुपये की नौकरी मिल रही थी लेकिन, उन्‍होंने इसे ठुकराकर अपना कारोबार करने का फैसला किया। कारोबार की राह पर चलने का उनका सफर बेहद मुश्किल था। विनीता के सामने भी वे तमाम समस्‍याएं आईं जो किसी उद्यमी के सामने आती हैं। लेकिन, वह हर मुश्किल को पार करती गयीं । आज उनकी कंपनी का कारोबार 500 करोड़ रुपये से ज्‍यादा का है। करीब 10 सालों में उन्‍होंने कामयाबी का यह सफर तय किया है। उन्‍हें आज मामूली कारोबार को ब्रांड बना देने का हर गुर पता है। हालांकि, ये हुनर उन्‍होंने बहुत ठोकरें खाने के बाद सीखा है।
विनीता एक मां हैं। पत्‍नी हैं। बेटी हैं। महिला उद्यमी हैं। एथलीट हैं। शार्क हैं। मेंटर हैं। उनके व्‍यक्तित्‍व के कई पहलू हैं। इन सभी पहलुओं को वह खुलकर जीती हैं। बचपन से वह पढ़ाई-लिखाई में बेहद अच्‍छी थीं। उनका जन्‍म 1983 में गुजरात के आणंद जिले में हुआ। मां पीएचडी। पिता एम्‍स में बायोफिजिस्‍ट। शुरुआती पढ़ाई दिल्‍ली पब्लिक स्‍कूल आरके पुरम से हुई। 2005 में विनीता ने आईआईटी-मद्रास से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की। फिर 2007 में आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए पूरा किया। 2006 में उन्‍होंने ड्यूश बैंक में समर इनटर्नशिप की। पढ़ाई के बाद उन्‍हें 1 करोड़ रुपये की नौकरी मिल रही थी। लेकिन, उन्होंने इसे ठुकरा दिया। नौकरी के बजाय वह अपना लॉन्‍जरी व्यवसाय शुरू करना चाहती थीं। हालांकि, जरूरी फंड न जुटा पाने के कारण महिलाओं के लिए कंज्‍यूमर ब्रांड शुरू करने की इनकी इच्‍छा परवान नहीं चढ़ सकी। यह उनके रास्‍ते में सबसे पहली असफलता थी ।
2007 में शुरू क‍िया पहला स्‍टार्टअप
विनीता को तब यह भी एहसास हुआ था कि कहीं उन्‍होंने नौकरी का प्रस्ताव छोड़कर गलती तो नहीं कर दी। 2007 में उन्‍होंने अपना पहला स्‍टार्ट-अप क्‍वेटजल शुरू किया। यह वेंचर रिक्रूटर्स को बैकग्राउंड वेरिफिकेशन उपलब्‍ध कराने के आइड‍िया पर आधारि‍त था। व‍िनीता बताती हैं क‍ि उन्‍होंने तय कर ल‍िया था क‍ि वह निवेशकों से पैसा नहीं लेंगी। अलबत्ता, अपने पास उपलब्‍ध संसाधनों से कारोबार खड़ा करेंगी। उन्‍होंने 5 साल तक इसी सोच के साथ यह सर्विस ब‍िजनस क‍िया। वह एक करोड़ रुपये की तनख्वाह छोड़कर 10 हजार रुपये की तनख्वाह से काम चला रही थीं । हालांक‍ि, यह आइडिया भी सफल साबित नहीं हुआ। उनके ल‍िए यह काफी मुश्‍क‍िल समय था। 2011 में विनीता की कौशिक मुखर्जी से शादी हो गई। आईआईएम-अहमदाबाद में पढ़ाई के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी।
तीसरे वेंचर से म‍िली असली सफलता
2012 में विनीता ने अपना दूसरा स्‍टार्टअप फैब-बैग शुरू किया। यह सब्‍सक्रिप्‍शन प्‍लेटफॉर्म था जो महिलाओं को ब्‍यूटी प्रोडक्‍ट्स की मंथली डिलीवरी करता था। लेकिन, असली सफलता उन्‍हें मिली शुगर कॉस्‍मेटिक्‍स के साथ। 2015 में सुनीता ने अपने पति के साथ मिलकर इसकी नींव रखी थी। यह कंपनी कॉस्‍मेटिक और पर्सनल केयर प्रोडक्‍ट्स की बिक्री करती है। इसकी प्राइवेट इक्विटी फर्म एल कैटरटन के साथ 5 करोड़ डॉलर की डील हुई। सितंबर 2022 में बॉलीवुड स्‍टार रणवीर सिंह ने कंपनी में निवेश किया। हालांकि, इस रकम का खुलासा नहीं किया गया।
कई मैराथन में ले चुकी हैं ह‍िस्‍सा
विनीता अपनी फिटनेस का भी बहुत ख्‍याल रखती हैं। वह 20 मैराथन और अल्‍ट्रामैराथन में हिस्‍सा ले चुकी हैं। उन्‍होंने 12 हाफ-मैराथन में भाग लिया है। विनीता ने ऑस्‍ट्र‍िया में आयरनमैन ट्रायथलॉन पूरा किया था। 2018 की मुंबई मैराथन में उन्‍होंने 6 महीने की गर्भावस्था में कुल 21 किमी की दौड़ लगाई थी।

 

झारखंड के रेलवे स्टेशन को चमकाने वाली ‘सोहराई’ ने बदली जयश्री की तकदीर

रांची । झारखंड की सोहराई कला 10 हजार साल पुरानी है। रांची की जयश्री इंदवार इस प्राचीन लोक कला को फिर से राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाने में जुटी हैं। खास बात यह है कि जयश्री इंदवार इस काम को अकेले न करके महिलाओं को एक समूह से जोड़कर कर रही हैं। जयश्री के ऐसा करने से महिलाएं झारखंड समेत देश के कई राज्यों में सोहराई कला को जीवंत तो बना ही रहे हैं। ऐसा करके वे खुद भी आत्मनिर्भरता की राह पर चल रही हैं।
पक्के मकान बनने से सोहराई कला का महत्व हुआ कम
बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में सोहराई कला के समक्ष कई चुनौतियां आने लगी। मिट्टी के घरों की जगह पक्के मकानों ने अपना आकार ले लिया। इन वजहों से भित्ति चित्र यानी सोहराई पेंटिंग को इन अट्टालिकाओं में जगह नहीं मिल पा रही। इस लोक कला को बढ़ावा देने के लिए जयश्री ने वर्ष 2005 में प्रयास शुरू किया। शुरुआती दिनों में जयश्री के साथ महिलाओं का इतना बड़ा समूह नहीं था। वे पहले कपड़ों पर सोहराई पेंटिंग करती थी लेकिन लोगों की रूचि नहीं होने के कारण जयश्री ने कुछ नया करने का सोचा और दीवारों को ही अपनी कला प्रदर्शनी का जरिया बनाना शुरू कर दिया। इस काम में जब जयश्री को सफलता मिलने लगी तब उन्होंने महिलाओं की एक टीम बनाई जिसे ‘स्तंभ’ ट्रस्ट का नाम दिया। इस ट्रस्ट के माध्यम से आज सैकड़ों महिलाएं जयश्री इंदवार के साथ में काम कर रही हैं। सोहराई कला को पहचान दिला रही हैं और आर्थिक रूप से मजबूत भी बन रही है।
रांची रेलवे स्टेशन को सजाने और संवारने का काम
जयश्री इंदवार और इनकी टीम की ओर से बनाई गई पेंटिंग ने झारखंड में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। रांची रेलवे स्टेशन को जयश्री और उनकी टीम ने हाल ही में सोहराई पेंटिंग से सजाने और संवारने का काम किया है। इसके अलावा हटिया रेलवे स्टेशन और गोमो स्टेशन समेत कई सरकारी भवन, पर्यटन स्थल और अन्य कई जगहों पर यदि आपको सोहराई पेंटिंग दिख रही हो तो मान लीजिए की इनमें से अधिक से अधिक चित्रकारी रांची की जयश्री इंदवार और उनकी स्तंभ ट्रस्ट की ओर से महिलाओं ने ही किया है।
कई जिलों की महिलाओं को लोक कला में प्रशिक्षण
जयश्री इंदवार समय-समय पर पेंटिंग एग्जिबिशन, वर्कशॉप और विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं के माध्यम से भी इस कला को आगे बढ़ाने के लिए दिन रात प्रयास करती रहती हैं। झारखंड के कई जिले जैसे रांची, गुमला और लोहरदगा समेत अन्य इलाकों की सैकड़ों महिलाओं और युवतियों को जयश्री ने पहले प्रशिक्षित करने का काम किया और उसके बाद उन्हें इस कला से जोड़ा है। हाथों में हुनर आ जाने से आज कई महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन गई हैं। सोहराई पेंटिंग की अच्छी डिमांड होने की वजह से अब इन्हें रोजगार के लिए भटकने की भी जरूरत नहीं पड़ रही है।
राज्यपाल और कई हस्तियों ने किया सम्मानित
एक कलाकार की कला तब और अधिक निखरती है जब समाज उसे सराहने का काम करता है। झारखंड के लुप्त हो रही चित्रकला को अपने जुनून के बल पर फिर से एक मुकाम पर ले जाने वाली जयश्री इंदवार को कई जगहों पर सम्मानित भी किया गया। जयश्री इंदवार के काम को तब और अधिक पहचान मिली जब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने उन्हें सम्मानित किया था। राज्य के तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू, रमेश बैस, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और ट्राईबल एसोसिएशन समेत कई जानी-मानी हस्तियों और संस्थाओं ने अलग-अलग मौकों पर जयश्री इंदवार को सम्मानित किया।
सोहराई कला के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश
सोहराई कला को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही जयश्री इंदवार की पहचान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सरोकारों से भी जयश्री इंदवार पूरी तरह से जुड़ी हुई रहती हैं। बात नारी सशक्तीकरण की हो या फिर पर्यावरण संरक्षण की। इन जैसे तमाम मुद्दों पर जयश्री इंदवार काम करने के लिए पहली कतार में खड़ी रहती हैं। बात यदि घर की की जाए तो उनके इस काम में उनके पति संजय और बच्चों का भी पूरा प्रोत्साहन रहता हैं।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

रेल की पटरियों के नीचे क्यों बिछे होते हैं पत्थर? जानिए क्या हैं इस गिट्टी के फायदे

नयी दिल्ली । भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। हर रोज लाखों लोग भारतीय रेल से यात्रा करते हैं। इस समय वंदे भारत, वंदे मेट्रो और रैपिडएक्स (Rapidx) ट्रेनों के कारण भारतीय रेलवे सुर्खियों में है। भारतीय रेलवे से जुड़े कई रोचक फैक्ट्स हैं। रेल से यात्रा करते समय आपके मन में भी कई सारे सवाल आते होंगे। जैसे- रेलवे ट्रैक पर गिट्टियां क्यों बिछी होती हैं। जंक्शन, टर्मिनस और सेंट्रल का क्या मतलब है। रिजर्वेशन में सीटों का आवंटन किस तरह से होता है, इनमें से एक सवाल का जवाब आज हम आपको देने वाले हैं। हम बताएंगे कि रेलवे ट्रैक पर गिट्टी क्यों बिछी होती है। आइए जानते हैं।
इस तरह तैयार होता है रेलवे ट्रैक
ट्रेन की पटरी के नीचे कंक्रीट के बने प्लेट होते हैं। इन्हें स्लीपर कहा जाता है। इन स्लीपर के नीचे गिट्टी बिछी होती है। इसे बलास्ट कहा जाता है। इसके नीचे अलग अलग तरह की दो लेयर में मिट्टी डली होती है। इन सबके नीचे साधारण जमीन होती है। रेलवे ट्रैक साधारण जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर होते हैं। पटरी के नीचे कंक्रीट के बने स्लीपर, फिर पत्थर और इसके नीचे मिट्टी डली होती है। इस तरह एक रेलवे ट्रैक बनता है।
ट्रेन के वजन को संभालते हैं पत्थर
रेलवे पटरी के नीचे बिछी गिट्टी खास तरह की होती है। ये नुकीले पत्थर होते हैं। अगर इनकी जगह गोल पत्थरों का उपयोग किया जाए, तो वे एक दूसरे से फिसलने लगेंगे और पटरी अपनी जगह से हट जाएगी। ये नुकीले होने के कारण एक दूसरे में मजबूत पकड़ बना लेते हैं। जब ट्रेन पटरी से गुजरती है, तो ये पत्थर आसानी से ट्रेन के वजन को संभाल लेते हैं। ट्रेन का वजन करीब 10 लाख किलो तक होता है। इस वजन को केवल पटरी नहीं संभाल सकती। ट्रेन के वजन को संभालने के लिए लोहे की पटरियों के साथ ही कंक्रीट के बने स्लीपर और गिट्टी मदद करती हैं। सबसे अधिक वजन इस गिट्टी पर ही होता है।
कंपन सहकर करते हैं सुरक्षा
रेलवे ट्रैक पर ट्रेन काफी स्‍पीड से दौड़ती है। इससे कंपन्न पैदा होता है। इस कारण पटरियों के फैलने की संभावना बढ़ जाती है। कंपन्न कम करने के लिए और पटरियों को फैलने से बचाने के लिए ट्रैक पर पत्थर बिछाए जाते हैं। पटरी पर बिछे पत्थर कंक्रीट के बने स्लीपर को एक जगह स्थिर रहने में मदद करते हैं। यह गिट्टी नहीं होगी तो कंक्रीट से बने स्लीपर मजबूती से अपनी जगह पर बने नहीं रह पाएंगे।
पटरियों पर नहीं भरता पानी
रेलवे ट्रैक पर बिछी गिट्टी के कई सारे फायदे हैं। बरसात के समय पानी जब ट्रैक पर गिरता है, तो वह गिट्टियों से होते हुए जमीन में चला जाता है। इससे रेलवे ट्रैक पर जलभराव नहीं हो पाता है।
बिना गिट्टी के होगा यह नुकसान
अगर रेलवे ट्रैक पर गिट्टी नहीं बिछाई गई, तो वहां घास और पौधे उग आएंगे। इससे रेलवे ट्रैक पर ट्रेन चलाने में दिक्कत हो सकती है। रेलव ट्रैक पर बिछी गिट्टी इससे बचाती है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

नहीं रहे मुहम्मद अली से दो-दो हाथ करने वाले कौर सिंह

चंडीगढ़ । पूर्व एशियाई मुक्केबाजी चैंपियन कौर सिंह का हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक अस्पताल में गुरुवार को निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे और कई स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज करा रहे थे। भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वह पंजाब के संगरूर जिले में अपने पैतृक गांव खनाल खुर्द में रह रहे थे। जो लोग कौर सिंह के बारे में नहीं जानते हैं, बता दें कि वह लीजेंड मुहम्मद अली से एक प्रदर्शनी मैच में भिड़े थे।
कौर सिंह ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 6 स्वर्ण पदक जीते थे जिसमें 1982 एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक शामिल था। उनके यादगार मैचों में से एक मुकाबला मुक्केबाजी लीजेंड मुहम्मद अली के साथ चार राउंड का प्रदर्शनी मैच था जो 27 जनवरी 1980 को दिल्ली में लड़ा गया था। सिंह ने नयी दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों में हैवीवेट वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था।
इस महीने पंजाब सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में चार महान खिलाड़ियों की जीवन गाथा प्रकाशित करने की योजना की घोषणा की थी जिसमें कौर सिंह एक थे। तीन अन्य खिलाड़ी हॉकी ओलम्पियन बलबीर सिंह सीनियर, महान एथलीट मिल्खा सिंह और भारत के पहले अर्जुन अवॉर्डी और ओलिंपियन एथलीट गुरबचन सिंह रंधावा हैं। उन्हें नौंवीं और दसवीं कक्षा की शारीरिक शिक्षा की किताबों में शामिल किया गया है।
वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने शोक व्यक्त करते हुए कहा, ‘कौर सिंह का निधन देश के लिए एक बड़ा नुकसान है। मैंने सम्बंधित अधिकारियों को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव लाने के निर्देश दिए हैं। हम उनके परिवार को हरसंभव मदद करेंगे।’ उनकी उपलब्धियों के लिए कौर सिंह को 1982 में अर्जुन पुरस्कार, 1983 में पद्मश्री और 1988 में विशिष्ट सेवा पदक प्रदान किया गया था।

गोबर, मिट्टी, प्‍लास्टिक बोतलों से इन लड़कियों ने बना डाला एयरकंडीशंड घर!

नयी दिल्‍ली । दो सहेलियों ने गोबर, मिट्टी और प्‍लास्टिक की बोतलों से इको-फ्रेंडली घर बनाया है। भीषण गर्मी में भी यह अपने आप ठंडा बना रहता है। इसमें कूलर, पंखे और एयरकंडीशनर की जरूरत नहीं पड़ती है। उन्‍हें एक स्‍कूल से इस तरह का घर बनाने का आइडिया आया था। इस स्‍कूल में प्‍लास्टिक की बोतलों का इस्‍तेमाल बच्‍चों के बैठने की कुर्सियों में किया गया था। इसके बाद उन्‍होंने हॉस्‍टल, कूड़ाघर, ग्रॉसरी शॉप, सड़क जहां से भी हुआ प्‍लास्टिक की बोतलों को बटोरना शुरू कर दिया। एक समय लोगों ने उन्‍हें भंगड़ वाली तक कहकर चिढ़ाना शुरू कर दिया था। लेकिन, इन दोनों को पता था कि वे क्‍या कर रही हैं। उन्होंने किसी भी बात को नहीं सुना और अपना काम जारी रखा। सीमेंट से बनने वाले मकानों की तुलना में यह आधी कीमत में बन जाता है।
इन दोनों सहेलियों का नाम नमिता कपाले और कल्‍याणी भ्राम्‍बे है। ये औरंगाबाद की रहने वाली हैं। इन्‍होंने अलग तरह का घर बनाया है। यह इको-फ्रेंडली है। इसे बनाने में 16,000 प्‍लास्टिक की बोतलें, गोबर और मिट्टी का इस्‍तेमाल हुआ है। पूरा घर बनाने में 12-13 टन प्‍लास्टिक लगी है। नमिता और कल्‍याणी को 2021 में इस तरह का घर बनाने की धुन सवार हुई थी। उन्‍होंने गुवाहाटी में एक स्‍कूल देखा था। यह स्‍कूल प्‍लास्टिक की बोतलों से बच्‍चों के बैठने की कुर्सियां बना रहा था। इसके बाद दोनों ने सड़कों, कूड़ेवालों, होटलों और ग्रॉसरी शॉप्‍स से प्‍लास्टिक की बोतलों को जुटाना शुरू किया। जब लोगों ने उन्‍हें ऐसा करते देखा तो दोनों को भंगड़ वालियां कहने लगे। लेकिन, जब उनका काम सामने आया तो लोगों के सुर बदल गए। वही लोग नमिता और कल्‍याणी की तारीफ के पुल बांधने लगे।
नमिता और कल्‍याणी ने जिन प्‍लास्टिक बोतलों को जुटाया था, उन्‍हें प्‍लास्टिक के बैगों में ठूंस दिया गया था। फिर अतिरिक्‍त हवा निकालकर बोतलों की पैकिंग कर दी जाती थी। प्‍लास्टिक बोतलों से बनी ईंट को एक के ऊपर एक लगाया गया। फिर मिट्टी और गोबर से दीवारों को प्‍लास्टर किया गया। छत को बांस और लकड़ी से तैयार किया गया।
घर बनाने में लगा डाली अपनी पूरी बचत
दोनों सहेलियों ने अपने इको-फ्रेंडली घर को ‘वावर’ नाम दिया है। इसका मतलब होता है खेत या खुली जगह जहां लोग आ जा सकते हैं। नमिता और कल्‍याणी के घर में दो चौकोर कमरे हैं। ये आंशिक तौर पर खुले हुए हैं। एक गोल झोपड़ी है। गर्मियों में इस घर में किसी एसी की जरूरत नहीं पड़ती है न सर्दियों में हीटर की। नमिता और कल्‍याणी का दावा है कि सीमेंट की तुलना में मिट्टी, गोबर और प्‍लास्टिक से बने इस घर को बनाने की लागत आधी आती है। नमिता और कल्‍याणी का यह घर दौलताबाद के पास सांबाजी में बना है। दोनों ने अपनी 7 लाख रुपये की सेविंग से इसे बनाया। इसमें परिवार वालों ने भी कुछ मदद की।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

आगरे का किला, अंग्रेजों ने मलबा डालकर किया था निर्माण, वहां निकलीं सीढ़ियां-दरवाजा

आगरा । आगरा किला के रहस्यों पर से एक बार फिर पर्दा उठा है। मुगल सल्तनत की बुलंदी की गवाही देते आगरा किला के अमर सिंह गेट पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को काम के दौरान प्राचीन दरवाजा और सीढ़ियां मिली हैं। दरवाजे से होकर यह सीढ़ियां आगरा किला की प्राचीर पर पहुंचती हैं। यह निर्माण मुगल काल का है।
ब्रिटिश काल में यहां मलबा भरकर उसके ऊपर निर्माण कर दिया गया था। एएसआइ इसे मूल स्वरूप में सहेज रहा है। आगरा किला में पर्यटकों को अमर सिंह गेट से प्रवेश मिलता है। अमर सिंह गेट के अंदर की तरफ बाईं व दाईं तरफ ब्रिटिश काल में मलबा डालकर भर्त करा दी गई थी। आठ से नौ फीट ऊंचाई तक मलबा भर दिया गया था। उसके ऊपर पत्थर का फर्श कर गार्डन बना दिया गया था।
पत्थरों को हटाने के बाद मलबा निकाला
एएसआइ ने तीन वर्ष पूर्व बाईं तरफ के मलबे को हटाकर वहां के फर्श का स्तर रास्ते के बराबर किया था। गेट के दाईं तरफ के भाग को रास्ते के बराबर में करने को कुछ दिन पूर्व काम शुरू किया गया। पत्थरों को हटाने के बाद जब मलबा हटाया गया तो किले की दीवार में बना हुआ दरवाजा नजर आया। दरवाजे में अंदर की तरफ जब मलबा हटाना शुरू किया गया तो वहां सीढ़ियां मिलीं। किले की दीवार में बनी हुई सीढ़ियां, ऊपर की ओर जाता है।
लाल बालुई पत्थर लगाया जा रहा
एएसआइ ने जीने के ऊपर दीवार पर लगे पत्थरों को हटाकर इस रास्ते को पूरा खोल दिया है। यहां अब फर्श पर रेड सैंड स्टोन यानी लाल बलुई पत्थर लगाया जा रहा है। अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. राजकुमार पटेल ने बताया कि आगरा किला में विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग समय पर निर्माण किए गए हैं। अमर सिंह गेट के बराबर में मलबा हटाने पर मिले मुगलकालीन दरवाजे व जीने को मूल स्वरूप में सहेजा जाएगा।
लाखौरी ईंटों से चिनाई
दरवाजे के पास ब्रिटिश काल की भी सीढ़ियां मिलीं दरवाजे के पास किले की दीवार से लगी सीढ़ियां भी मलबे के नीचे दबी हुई मिली हैं। इसमें नीचे के भाग में मलबा भरा हुआ है और उसके ऊपर लाखौरी ईंटों की चिनाई है। दीवार के कुछ भाग में चूने का प्लास्टर भी है, लेकिन इस प्लास्टर में समौसम मिला हुआ है। ब्रिटिश काल में चूने में समौसम मिलाया जाता था, जिससे इसे निर्माण को ब्रिटिश काल में हुआ माना जा रहा है।
1999 में मिले थे तोप-गोले
एएसआइ को वर्ष 1999 में आगरा किला की खाई में दिल्ली गेट के समीप की गई सफाई में ब्रिटिशकालीन तीन तोपें मलबे में दबी मिली थीं। दिसंबर, 2020 में आगरा किला के दीवान-ए-आम परिसर में नीम का पेड़ गिर गया था। खोखले पेड़ की जड़ों में लोहे के बने दो भारी-भरकम गोले मिले थे। एक गोला लगभग 50 किग्रा का था।
सीढ़ियां में अंदर की तरफ हो रहा है चूने का प्लास्टर
सीढ़ी में अंदर की तरफ चूने के प्लास्टर का काम हो रहा है। इस तरह का प्लास्टर मुगल काल में किया जाता था। यह दरवाजा और सीढ़ी मुगल काल में ही बनाई गई थीं।

एसी मैकेनिक के बेटे ने ठुकराया 6 लाख का ऑफर, सीईटी में बटोरे 99.78 पर्सेन्टाइल

अहमदाबाद । भारतीय प्रबंधन संस्थानों में प्रवेश के लिए ली जाने वाली परीक्षा केट में 99.78 पर्सेंटाइल के साथ टॉपर्स में शामिल रजीन मंसूरी ने 6 लाख रुपये की नौकरी का ऑफर ठुकरा दिया। अहमदाबाद के एसी मैकेनिक के बेटे रजीन मंसूरी को इंजीनियरिंग की पढाई के बाद 6 लाख रुपये का सालाना पैकेज मिला था। पहली बार में केट परीक्षा में 96.20 फीसदी अंक के साथ आईआईएम उदयपुर में प्रवेश मिल रहा था, लेकिन उसने फिर से खुद को आजमाया और अब वह हार्वर्ड, स्‍टेनफोर्ड की तरह नामी संसथान आईआईएम कोलकाता में प्रवेश पाने में सफल रहा।
लक्ष्य पर रहे ध्यान
मन में दृढ़ता और एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्‍य को पाने का प्रयास करते रहें तो कुछ भी असंभव नहीं है। अहमदाबाद के एयर कंडीशनर मैकेनिक इरफान मंसूरी के बेटे रजीन ने कॉमन एंट्रेंस एक्‍जाम केट में 99.78 पर्सेंटाइल हासिल कर खुद को साबित कर दिखाया है।
2021 में हुई केट परीक्षा में उसने 96.20 पर्सेंटाइल हासिल किए लेकिन उसने अपने पसंद के प्रबंधन संस्‍थान में प्रवेश लेने के लिए एक बार फिर मेहतन का रास्‍ता अपनाया। इस बार उसे आईआईएम बेंगलुरु व आईआईएम कोलकाता में प्रवेश के ऑफर मिला और उसने कोलकाता को चुना।
रजीन को आईआईएम अहमदाबाद में प्रवेश नहीं मिलने का मलाल अभी भी है। उसे आशा थी कि आईआईएम अहमदाबाद में एडमिशन मिल जाता तो अपने परिवार के करीब रहता। आईआईएम-सी में प्रबंधन से जुड़ी जानकारी सीखने के लिए उसने बेंगलुरु को छोड़कर कोलकाता संस्‍थान को चुना।
आईआईएम कोलकाता संस्‍थान की फीस 27 लाख रुपये है लेकिन वह स्‍कॉलरशिप को भविष्‍य के लिए सुरक्षित रख शिक्षा लोन के जरिए अपनी पढ़ाई करना चाहता है। रजीन ने बताया कि शेठ सी एन विध्‍यालय से स्‍कूली पढाई के बाद उसने अहमदाबाद विश्‍वविध्‍यालय से मई 2022 में ही इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की।
सालाना 6 लाख रुपये की नौकरी मिल रही थी लेकिन उसने प्रबंधन संस्‍थान में पढ़ने का मन बनाया। वह बताता है कि पिता की मासिक आय 25 हजार रुपये है। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्‍छी नहीं है। उसका परिवार अहमदाबाद के पालड़ी इलाके में रहता है।

बंद होने वाला है विंडोज 10! अब नहीं मिलेंगे सॉफ्टवेयर अपडेट

नयी दिल्ली । टेक दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट अपने पॉपुलर विंडोज 10 ऑपरेटिंग सिस्टम को बंद करने वाला है। कंपनी ने एक ब्लॉग पोस्ट में इसकी घोषणा कर दी है। कंपनी ने कहा कि वह विंडोज 10 के लिए प्रमुख सॉफ्टवेयर अपडेट जारी नहीं करेगा और विंडोज 10 22H2 ही आखिरी अपडेट होगा, जिसे हाल ही में जारी किया गया था।
2025 तक बंद हो सकता है विंडोज
कंपनी ने कहा कि विंडोज 10 22H2 (Windows 10 22H2) इसका आखिरी ऑपरेटिंग सिस्टम अपडेट होगा। कंपनी अब इसके लिए कोई भी बड़ा अपडेट रोलआउट नहीं करेगी। लेकिन 14 अक्टूबर 2025 तक विंडोज 10 डिवाइस के लिए सिक्योरिटी अपडेट यानी सेफ्टी और बग फिक्स अपडेट मिलते रहेंगे। कंपनी ने कहा कि मौजूदा लॉन्ग-टर्म सर्विसिंग चैनल, या एलटीएससी, रिलीज अभी भी सपोर्ट डेट तक अपडेट प्राप्त करेंगे।
विंडोज 11 पर कर सकेंगे अपग्रेड
कोई नया विंडोज 10 फीचर अपडेट नहीं आने के साथ माइक्रोसॉफ्ट आपको विंडोज 11 में अपग्रेड करने की सिफारिश कर रहा है। लेकिन आप सपोर्ट डेट के बाद भी विंडोज 10 का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन उस समय के बाद अतिरिक्त सुरक्षा अपडेट मिलना भी बंद हो जाएंगे। ऐसे में आपका सिस्टम असुरक्षित हो जाएगा यानी विंडोज 11 में अपग्रेड करना ही सही विकल्प होगा। बता दें कि माइक्रोसॉफ्ट ने अक्टूबर 2021 में अपने लेटेस्ट ऑपरेटिंग सिस्टम Windows 11 को रोल आउट करना शुरू किया और मई 2022 में इसे सभी सपोर्टेड डिवाइस के लिए जारी कर दिया था। विंडोज 11 को कई नए फीचर्स और कस्टमाइजेशन के साथ पेश किया गया था।
विंडोज 11 के फीचर्स
विंडोज 11 के साथ डिजाइन, इंटरफेस और स्टार्ट मेन्यू को लेकर बड़े बदलाव किए गए हैं। विंडोज स्टार्ट साउंड में भी आपको बदलाव देखने को मिलेगा। विंडोज 11 के साथ वेलकम स्क्रीन के साथ Hi Cortana को हटा दिया गया है और लाइव टाइटल भी आपको नए विंडोज में देखने को नहीं मिलेगा।
ऐसे करें विंडोज 11 डाउनलोड
माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 10 वाले यूजर्स को Windows 11 का अपडेट जारी कर दिया है, जिसे आप सिस्टम अपडेट में जाकर चेक कर सकते हैं। नए विंडोज के साथ आप माइक्रोसॉफ्ट पीसी हेल्थ एप भी डाउनलोड कर सकते हैं। सिस्टम अपडेट में आपको Download Now का एक बटन दिखेगा जिस पर क्लिक करके बताए गए स्टेप को फॉलो करते हुए आप अपने कंप्यूटर में Windows 11 डाउनलोड कर सकेंगे।

रख हौसला

आनंद श्रीवास्तव

रख हौसला
कि कोई तेरे लिए नहीं आएगा
ये जिंदगी है इसे सिर्फ तू ही अपने शर्तों पर जी पाएगा।
कितने भरोसे टूटे होंगे और हर बार तू टूट कर फिर जुटा होगा।
तोड़ने -जोड़ने की प्रक्रिया
उम्र भर चलेगी
तय तुझे करना है कि तू अपने सच के साथ कैसे आगे बढ़ेगा
धुंध में डूबी उन धूमिल सपनों की पहचान
जिसे कदम-कदम पर उपेक्षा की अग्निपरीक्षा देनी पड़ी,
हर नागवार उठती ऊंगली को झेलनी पड़ी
उन सब से इतर तेरा फैंटेसी वर्ल्ड है
जो तेरे सपनों को उड़ान देने के लिए
तुम्हें बुला रहा है
पंखों में आगाज़ लिए तू उड़
तिनको से साम्राज्य तुझे रचना होगा
सम्मान और स्वाभिमान के बीच
प्रेम की सीधी राह
तुझे चुनना होगा
रख हौसला कि साथ तेरे कोई नहीं
पर तेरा तू है
इसे तूझे चुनना होगा।
इसे तूझे चुनना होगा।।।

रानी बिड़ला गर्ल्स काॅलेज में संगोष्ठी

कोलकाता । रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से ‘भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा ‘ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत आंतरिक गुणवत्ता मूल्यांकन प्रकोष्ठ की समन्वयक प्रो. समर्पिता घोष राय के स्वागत वक्तव्य से हुई। इस अवसर पर उन्होंने हिंदी भाषा के महत्व के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए  कहा कि आज भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारे लिए हिंदी भाषा की जानकारी जरूरी है। बतौर वक्ता खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज की डॉ शुभ्रा उपाध्याय  ने अपने व्याख्यान में भाषा की उत्पत्ति, भाषा की विशेषता एवं परिवर्तनशीलता आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा किया।
उन्होंने कहा कि भाषा विज्ञान के अध्ययन के बिना हम भाषा की संरचना और अनुशासन को नहीं समझ सकते हैं।इस अवसर पर कॉलेज के विद्यार्थियों की उपस्थिति और भागीदारी अच्छी रही।
कार्यक्रम का सफल संचालन चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा पूजाश्री  दूबे ने किया। इस संगोष्ठी को सफल बनाने में विभाग की प्रो. विजया सिंह, सहायक प्रोफेसर प्रो.मंटू दास एवं हिंदी विभाग की छात्राओं की विशेष भूमिका रही। धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. पुष्पा तिवारी ने दिया।