कोलकाता । मॉरीशस के सातवें राष्ट्रपति पृथ्वीराजसिंह रूपन अपनी पत्नी के साथ तीन दिवसीय दौरे पर कोलकाता पहुँचे हैं । वे कोलकाता में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल दक्षिणेश्वर मंदिर और बेलूर मठ पहुँचे। उन्होंने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के श्रमिक स्मारक का भी दौरा किया ।
इस दौरान डॉ. स्वपन दासगुप्ता (इंडिया फाउंडेशन की गवर्निंग काउंसिल और खोला हवा के अध्यक्ष), सुशील मोदी (बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम और गवर्निंग काउंसिल, इंडिया फाउंडेशन के सदस्य), महामहिम पृथ्वीराजसिंह रूपन जीसीएसके (मॉरीशस के राष्ट्रपति) के स्वागत समारोह और रात्रिभोज की मेजबानी की। इस मौके पर राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस (पश्चिम बंगाल के राज्यपाल) और राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह भी मौजूद रहे ।
मॉरीशस के राष्ट्रपति पृथ्वीराजसिंह रूपन मॉरीशस गणराज्य के राज्य प्रमुख हैं। यह देश एक संसदीय गणतंत्र है। जिसके वर्तमान कार्यालय धारक पृथ्वीराजसिंह रूपन हैं। उन्होंने 2 दिसंबर 2019 को पदभार ग्रहण किया। डॉ. स्वपन दासगुप्ता (गवर्निंग काउंसिल, इंडिया फाउंडेशन और खोला हवा के अध्यक्ष) ने कहा, भारतीयों में से एक के वंशज का स्वागत करना मेरा सौभाग्य है, जिनकी मातृभूमि कोलकाता है।
पृथ्वीराजसिंह रूपन एक अधिवक्ता हैं, जो पहली बार 2000 में नेशनल असेंबली के लिए चुने गए थे। वह कला संस्कृति, सामाजिक एकीकरण और क्षेत्रीय प्रशासन मंत्री भी रहे हैं। 1968 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से मॉरीशस अफ्रीका में सबसे स्थिर लोकतंत्रों में से एक है।
मॉरीशस के राष्ट्रपति पृथ्वीराजसिंह रूपन पहुँचे दक्षिणेश्वर एवं बेलूर मठ
माताओं से प्रेम करना अच्छी बात है मगर उनकी जवाबदेही भी तय हो
जीवन में क्या सब कुछ पूरी तरह सकारात्मक हो सकता है…क्या कोई भी चीज परफेक्ट हो सकती है ? हमारी समझ से कोई भी चीज, कोई भी रिश्ता परफेक्ट नहीं होता…अच्छे और बुरे पक्ष हर बात के होते हैं मगर हम अपनी संवेदना को चोट नहीं पहुँचाना चाहते इसलिए बुरे पक्ष को नकारात्मक कहकर हवा में उड़ा देना चाहते हैं । मई और जून का महीना पाश्चात्य कैलेंडर के अनुसार माता और पिता को समर्पित है..एक दिन इनके नाम ही होता है । सन्दूकों से पुरानी तस्वीरें निकलती हैं और स्टेटस पर सज जाती हैं, व्यवहार में भले ही आचरण अलग हो । बाजार का जादू ऐसा है कि हर कोई इस रिश्ते पर जमकर खर्च करना चाहता है..आज इस तरह के दिवस फैशन स्टेटमेंट की तरह हैं और एक जैसी नीरस चर्चा हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन गयी है ।
कहा गया है कि माता कुमाता नहीं हो सकती मगर गहराई में जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि सन्तान मोह विशेषकर पुत्र मोह की आड़ में माताएं खेल खेलती हैं । पुराने जमाने में जब रनिवास और हरम हुआ करते थे, बहुपत्नीवाद था तो अपने बच्चों को सिंहासन पर बैठाने के लिए दूसरी रानी के बच्चों की हत्या से भी उनको हिचक नहीं होती थी…रामायण में भी भरत के लिए कैकयी ने राम का वनवास माँगा था । माँ की ममता ठीक है मगर ममता की पराकाष्ठा क्या किसी और के अधिकारों पर चलकर सन्तान की इच्छा पूर्ति करना भर है । शादी के पहले बेटों के लिए बेटियों को दबाना, देवरानियों और जेठानियों से लेकर ननद के बच्चों को दबाना, अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिए तंज कसना यह महिलाओं की आदत है । बच्चा किसी से लड़कर आए, किसी को पीटकर आए, चोरी करके आए या लड़की छेड़कर आए..माताएं उनकी गलतियों को नजरअन्दाज ही नहीं करती बल्कि कवर अप करने के लिए खड़ी हो जाती हैं । क्या यही ममता है..जो माताएं अपने बच्चों की गलतियों को छुपाती हैं, वह आगे चलकर अपराधी ही बनते हैं…किसी और को पीटने वाले बच्चों का गुस्सा जब नियंत्रित नहीं किया जाता तो वह हिंसक ही बनता है और फिर उसे अपनी ताकत का ऐसा नशा हो जाता है कि वह हर किसी से मारपीट करता है, छोटे या बड़े भाई -बहनों को मारता है, फिर पत्नी और बच्चों को मारता है और एक दिन हत्यारा भी बन जाता है तो यह गलती किसकी है कि उस बच्चे को पहली बार ही नियंत्रित नहीं किया गया..निश्चित रूप से वह अधिकतर मामलों में कोई स्त्री ही होती है । जब लड़की किसी लड़की का पीछा करते हैं…उनको घूरते हैं, छेड़ते हैं तो वह भी एक दिन में नहीं होता, ऐसे लड़कों पर नजर रखने वाला, उनको समझाने वाला कोई नहीं होता…जिस अनुशासन से लड़कियों को पराया धन कहकर आत्मनिर्भर बनाया जाता है, लड़कों की परवरिश में वह अनुशासन नहीं होता । लज्जा लड़कियों का गहना है तो क्या लड़कों को बेशर्म होना चाहिए ?
मेरे मित्र अक्सर कहते हैं कि मैं नकारात्मक होकर सोचती हूँ मगर मैं वही सोचती हूँ जो मुझे दिखता है । जिस मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव के साथ लड़कियाँ बड़ी होती हैं…लाख दबावों के बाद भी लड़कों पर वह दबाव नहीं होता । लड़कों की समस्याएं होती हैं, वे सैंडविच भी बनते हैं मगर उनको दुलार भी खूब मिलता है । उनको धमकियाँ नहीं मिलतीं कि सास – ससुर क्या कहेंगे या करेंगे..माँ और पत्नी की लड़ाई में अधमरे होते भी हैं तो अन्ततः केन्द्र में वही रहते हैं और जो होता है, उनकी भलाई के लिए होता है । भावनात्मक ब्लैकमेलिंग का खेल माताएं ही अधिक खेलती हैं…और तंज भी उनके तैयार रहते हैं । बहनों को कई तरीके पराया बताया जाता है …यहीं राज है ..ससुराल जाओगी तो पता चलेगा…बैग उठाकर चल देती हो…हम तो यहाँ नौकर बैठे हैं ।
घी मत खाओ, तुम्हारे भाई के लिए रखा है…कमजोर हो गया है …बहनों को भाई का अटेंडेंट माताएं ही बनाती हैं…घर में भोजन से लेकर कमरे और मानसिक और आर्थिक स्तर पर अपनी ही बेटियों के साथ भेदभाव माताएं ही करती हैं…आखिर मातृत्व के नाम पर किस तरह की माताओं को सेलिब्रेट किया जा रहा है ?
क्या यह सही समय नहीं है कि माताओं की जवाबदेही तय की जाए क्योंकि सन्तान को तो अन्ततः देश का नागरिक ही बनना है । कहाँ से आते हैं ऐसे अपराधी जो सीरियल किलर बनते हैं, ठग बनते हैं…हत्यारे बनते हैं…यह एक दिन में तो होता नहीं है…क्या बचपन से ही इनको रोका जाता तो यह अपराधी बनते?
माताओं से प्रेम करना, उनकी सराहना करना, ऐसी माताओं को पूजना..जो बच्चों के जीवन संघर्ष में साथ खड़ी रहती हैं…सही है मगर क्या हम उन माताओं की भी इज्जत करें जो सन्तान मोह के कारण किसी और बच्चे का भोजन छीन लें…किसी और का जीवन नष्ट कर दें..?
अतिरेक को पीछे छोड़कर यह तय करना जरूरी है कि सम्बन्धों के किस रूप को हम प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि सम्बन्ध किसी भी रूप में आगे चलकर समाज और देश के विकास को प्रभावित करते हैं और इसलिए किसी भी सम्बन्ध को मानवता और समानता के आधार पर आगे जाना होगा ।
नयी तकनीक से अपोलो हॉस्पिटल ने बचाई मरीज की जान
कोलकाता । आए दिन लोग हृदय संबंधी विभिन्न प्रकार के रोगों की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में हृदय संबंधी रोगों का समय पर इलाज ना करवाना जोखिम भरा होता है। इसी कड़ी में अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई ने हृदय रोग से पीड़ित एक मरीज की जान बचाई है। दरअसल 64 वर्षीय एक महिला रोगी को एट्रियल फिब्रिलेशन की समस्या थी। बता दें कि एट्रियल फिब्रिलेशन को आमतौर पर अनियमित दिल की धड़कन के रूप में जाना जाता है जो रक्त के थक्के, स्ट्रोक, हार्ट फेलियर और अन्य हृदय जटिलताओं को जन्म दे सकता है। सामान्य रूप में यह जीवन के लिए कोई खतरा नहीं है। लेकिन ध्यान ना देने या वक़्त पर उपचार न लेने से जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में हॉस्पिटल में मरीज को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए क्रायो बैलून एब्लेशन तकनीक का उपयोग किया और मरीज की जान बचाई। खास बात यह है कि अस्पताल ने चेन्नई में पहली बार इस तकनीक का उपयोग किया। अपोलो मेन हॉस्पिटल्स के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ ए.एम. कार्तिगेसन क्रायो बैलून एब्लेशन तकनीक का उपयोग ट्रायल के तौर पर 15 रोगियों पर कर चुके हैं। एट्रियल फिब्रिलेशन (एएफ) एक सामान्य हृदय ताल विकार है जो 90 लाख से अधिक भारतीयों को प्रभावित करता है, जिससे स्ट्रोक, दिल की विफलता और मृत्यु का खतरा बढ़जाता है। क्रायो बैलून एब्लेशन टेक्नोलॉजी के कार्यों के बारे में बताते हुए डॉ कार्तिगेसन ने कहा, क्रायो बैलून एब्लेशन एकनई इंटरवेंशनल प्रक्रिया है जो दिल की लय को नियंत्रित करने के लिए नियोजित कीजाती है। डॉक्टर कार्तिगेसन ने कहा कि दशकों से अपोलो हॉस्पिटल्स लोगों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए नई जीवन रक्षक सेवाएं और प्रक्रियाएं ला रहा है। यह नयी प्रक्रिया उस प्रतिबद्धता का ही एक रूप है ।
सीयू : “हिंदी और भारतीय साहित्य” विषय पर ‘एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी’
कोलकाता । ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और कोल इंडिया लिमिटेड के संयुक्त तत्वावधान में गत 9 मई को रवीन्द्र जयंती पर राजाबाजार साइंस कॉलेज के मेघनाद साहा सभागार में “हिंदी और भारतीय साहित्य” विषय पर ‘एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी । संगोष्ठी में देश के कई अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों से आमंत्रित विद्वानों ने विचार रखे ।
कार्यक्रम के उदघाटन सत्र में कोल इंडिया लिमिटेड के निदेशक विनय रंजन, प्रोफेसर सुरेंद्रनाथ सांध्य कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राध्यापक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी , कोल इंडिया के कार्यकारी निदेशक अजय चौधरी, राजभाषा विभाग के सहायक निदेशक निर्मल कुमार दूबे, कोल इंडिया के उप प्रबंधक राजेश कुमार साव एवं उप प्रबंधक प्रियांशु प्रकाश, अनुवादक संदीप सोनी सहित कई अतिथि उपस्थित थे । वक्ताओं ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के साहित्यिक योगदानों पर चर्चा करते हुए फ़िजी, मॉरिशस, त्रिनिदाद आदि देशों में हिन्दी के उपयोग पर चर्चा की। कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन विभागाध्यक्ष डॉ. रामप्रवेश रजक ने किया। इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रो.कुमुद शर्मा, कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रो. राजश्री शुक्ला, उत्तर बंग विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रोफेसर मनीषा झा, पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रोफेसर अरुण होता मंच पर उपस्थित थे। वहीं कार्यक्रम की समन्वयक और कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने कहा कि भारतीय साहित्य को हम एक भाषा का साहित्य नहीं मान सकते, भारत की समस्त भाषाओं का साहित्य ‘भारतीय साहित्य’ है। उन्होंने विदेशी साहित्य के विभिन्न रूपों की चर्चा करते हुए भारतीय साहित्य की सृजनात्मक कल्पनाओं को बचाए रखने के लिए हिंदी को बचाए रखने को प्रेरित किया। उन्होंने स्वीकारा कि भारतीय साहित्य की पहचान भाषिक नहीं बल्कि भारत के सभी भाषाओं के विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है।
प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि “भारतीय भाषाएँ रुप दृष्टि से अलग हो सकती है लेकिन संरचनात्मक दृष्टि से वें एक ही हैं। इसके निर्माण में वेदों,उपनिषदों और पुराणों का महत्वपूर्ण योगदान हैं। साहित्य के मूल में किसान हैं, गांधी जी को हम स्वाधीनता का नायक मानते हैं लेकिन गांधी जी ने वास्तविक नायक किसानों को बताया हैं। उन्होंने कहा कि हमारे तमाम भारतीय रचनाकारों के बीच एक सांस्कृतिक साझेदारी है।” प्रो. मनीषा झा ने हिन्दी और वर्तमान विमर्शों के अखिल भारतीय स्वरूप पर चर्चा की और ‘प्रकृति विमर्श’ की बात सामने रखी। उन्होंने कहा कि “पर्यावरण भी साहित्य का हिस्सा है। पर्यावरण की मुक्ति सभी साहित्यों का एक प्रमुख अंश है। मनुष्य का जीवन पर्यावरण को छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता इसलिए पर्यावरण के प्रति सच्ची संवेदना जरूरी है।” प्रोफेसर अरुण होता ने कहा कि “वर्तमान समय में जहाँ अलगाव की बात हो रही है वहाँ भारतीय साहित्य की बात अत्यंत जरूरी है। भारतीय साहित्य कहने का अधिकार उस साहित्य को है जिसमें भारत के जीवन मूल्यों एवं संस्कृति की चर्चा हो।” डॉ. नगेन्द्र की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “भारतीय साहित्य हिमालय से भी ऊँचा और प्रशांत महासागर से भी गहरा है।”
कार्यक्रम के दूसरे सत्र का संचालन प्रो. राजश्री शुक्ला ने किया। इस सत्र में मंच पर वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. सुधीर प्रताप सिंह और पूर्व प्रो. डॉ. आनन्द कुमार सिंह उपस्थित थें। डॉ.आनन्द कुमार सिंह ने कहा कि “विश्व साहित्य और भारतीय साहित्य की सांस्कृतिक रचनाओं में कोई अंतर नहीं, अन्तर समाधान प्रक्रिया में हैं। उन्होंने जॉन कीट्स और शैली की रचनाओं से लिए गए उद्धरणों द्वारा अपने पक्ष को स्थापित किया, साथ ही उन्होंने मायावाद, अवतारवाद आदि मतों पर भी चर्चा की। वहीं डॉ. सुधीर प्रताप सिंह ने भारत की सांस्कृतिक चेतना को भारतीय साहित्य का दर्पण मानते हुए कहा कि “भारतीय जीवन दर्शन में ही सम्पूर्ण चर-चराचर जगत की सम्पूर्णता है।”
कार्यक्रम के अंतिम सत्र (तृतीय सत्र) का संचालन विजय कुमार साव ने किया। इस सत्र में त्रिपुरा विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रोफेसर डॉ. विनोद कुमार मिश्र , विद्यासागर विश्वविद्यालय के प्रो. डॉक्टर संजय जायसवाल और स्कॉटिश चर्च कॉलेज की प्राध्यापिका डॉ. गीता दूबे उपस्थित थीं।
डॉ. विनोद कुमार मिश्र ने असमिया स्त्री विमर्श, बहु पत्नी विवाह, भारतीय भाषा का महत्व एवं पुरानी और नयी पीढ़ी के बीच के संघर्षों के आधार पर अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने हिन्दी को भारतीय साहित्य के बीच एक सेतु के रूप में स्वीकार किया। डॉ संजय जायसवाल ने भारतीय साहित्य को देखने की दृष्टि, भारतीय संस्कृति के मूल चरित्र, वर्तमान में भारतीय साहित्य के समक्ष वैश्विक चुनौतियों, भारतीय साहित्य की अवधारणा आदि विषयों पर विचार रखे तथा अनुवाद का महत्व समझाया । डॉ. गीता दूबे ने कहा कि निराला और टैगोर हिन्दी और बांग्ला साहित्य को पढ़ने के दो सूत्र हैं। उन्होंने विमर्शों की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए आत्मकथाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को सबके समक्ष रखा। आत्मकथाओं को उन्होंने अपने समय का इतिहास कहा और माना कि इसमें कहानी स्व जीवन की ना होकर पूरे समाज की होती है, इस क्रम में उन्होंने ‘वे नायाब औरतें’, ‘एक अनपढ़ कहानी’ आदि आत्मकथाओं पर चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य के संपूर्ण विवेचन के लिए ऐसी कई संगोष्ठियों की आवश्यकता है। कार्यक्रम का आरम्भ सरस्वती वन्दना से हुआ । धन्यवाद ज्ञापन देते हुए डॉ. रामप्रवेश रजक ने कोल इंडिया लिमिटेड के राजेश कुमार साव, उप प्रबंधक (राजभाषा) और प्रियांशु प्रकाश (उप प्रबंधक) का आभार व्यक्त किया । कार्यक्रम के आयोजन में संकल्प हिन्दी साहित्य सभा और वाद- विवाद समिति से जुड़े द्वितीय और चतुर्थ सत्र के विद्यार्थियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में कलकत्ता विश्वविद्यालय के साथ-साथ राज्य के कई अन्य शैक्षणिक संस्थानों से भी विद्यार्थी जुड़े। साथ ही सोशल मीडिया पर कार्यक्रम का लाइव प्रसारण भी किया गया।
भारतीय इतिहास का गौरव संरक्षित करने वाली ये माताएं
भारतीय इतिहास बलिदान और त्याग की गाथाओं से भरा पड़ा है। राष्ट्रहित के लिए ऐसी कितनी ही माताएं थी जिन्होंने जगत जननी ,हम सभी की माता, भारत माता के लिए अपने वंशजों की बलिदानी दे दी। साथ ही ऐसी भी माताएं रही जिन्होंने उस समय की विषम परिस्थितियों में अपनी परवरिश और उच्च स्तर की संस्कारवान नैतिक और मौलिक शिक्षा से सिंह के समान वीर वंशज दिए जिन्होंने अपनी विजयी पताकाओं से सम्पूर्ण भारत में परचम लहरा दिया और उनका स्मरण करके आज भी गर्व से मस्तक ऊंचा हो जाता है और स्वाभिमान से रीढ़ की हड्डी सीधी हो जाती है।
भारतीय परम्परा में ऐसा है माता का महत्व
क्रिकेटर शुभमन गिल ने दी भारतीय स्पाइडर-मैन पवित्र प्रभाकर को अपनी आवाज!
कोलकाता । सन 2021 में ‘स्पाइडर-मैन: नो वे होम’ की भारी सफलता के बाद, प्रशंसक स्पाइडर-मैन यूनिवर्स में वापसी के लिए उत्साहित हैं। यह मौका भारत के लिए और भी खास है क्योंकि हमारे अपने भारतीय स्पाइडर-मैन पवित्र प्रभाकर इसके द्वारा बड़े पर्दे पर डेब्यू कर रहे हैं।
इस फिल्म के हिंदी और पंजाबी वर्जन में क्रिकेटर शुभमन गिल की आवाज होगी, जो पवित्र के किरदार को भारतीय दर्शकों के लिए और भी खास बना देगी। गिल अपने बल्लेबाजी कौशल के साथ क्रिकेट प्रशंसकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं, और ‘स्पाइडर-मैन: अक्रॉस द स्पाइडर-वर्स’ में पवित्र प्रभाकर के रूप में वह अब पूरे भारत के क्रिकेट प्रशंसकों का दिल जीतने के लिए तैयार हैं। स्पाइडर-मैन को अपना चहेता सुपरहीरो बताने वाले शुभमन गिल ने स्पाइडर-मैन की दुनिया में बड़ी एंट्री ली है। वह किसी भी फिल्म के लिए अपनी आवाज देने वाले पहले स्पोर्ट्स पर्सनालिटी हैं, और वह भी हॉलीवुड की सबसे बड़ी फ्रेंचाइजी में से एक के लिए।
भारतीय स्पाइडर-मैन, पवित्र प्रभाकर को अपनी आवाज देने के बारे में बताते हुए, शुभमन कहते हैं, “मैं स्पाइडर-मैन को देखते हुए बड़ा हुआ हूं, और वह निश्चय ही अधिक सबसे ज्यादा रिलेटेबल सुपरहीरो में से एक है। चूंकि इस फिल्म से स्क्रीन पर भारतीय स्पाइडर-मैन की शुरुआत हो रही है, हमारे अपने भारतीय स्पाइडर-मैन पवित्र प्रभाकर की, हिंदी और पंजाबी भाषाओं में आवाज़ बनना मेरे लिए एक शानदार अनुभव था। मैं पहले से ही खुद को सुपर ह्यूमन महसूस कर रहा हूं। मुझे इस फिल्म की रिलीज का बेसब्री से इंतजार है।”
हल्दीघाटी लिखकर महाराणा प्रताप की गाथा जन -जन तक पहुँचाने वाले श्याम नारायण पांडेय
वाराणसी । अपने हर काव्य में वीरता का सजीव चित्रण करने वाले कवि श्याम नारायण पाण्डेय ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी अपने उपाख्यानों से लोगों में अप्रतिम जोश का संचार किया था…
स्वातंत्र्य पूर्व भारत के वीर रस के सुविख्यात कवि श्याम नारायण पाण्डेय एक अप्रतिम कवि होने के साथ-साथ अपनी परम ओजस्वी वाणी के द्वारा वीर रस के अन्यतम प्रस्तोता भी थे। यह उनकी वाणी का ही प्रभाव था कि उनको सुनने वाला श्रोता, किसी चलचित्र को देखता हुआ सा मंत्रमुग्ध हो जाया करता था- ‘वैरी दल को ललकार गिरी, वह नागिन सी फुफकार गिरी। था शोर मौत से बचो-बचो, तलवार गिरी तलवार गिरी।।’
कवि श्यामनारायण पाण्डेय का जन्म सन् 1907 में डुमरांव गांव, मऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। गांव में ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने काशी आ कर संस्कृत का अध्ययन किया और यहीं रहते हुए काशी विद्यापीठ से हिंदी में साहित्याचार्य किया। सन् 1991 में 84 वर्ष की अवस्था में वह कैवल्यधामवासी हुए।
कवि श्यामनारायण पाण्डेय वस्तुत: हमारे धरोहर कवियों की पंक्ति में अग्रगण्य थे जिनकी वाणी में उनके संस्मरणों को उनकी मृत्यु के पूर्व आकाशवाणी गोरखपुर ने सहेजकर रख लिया था।
कहते हैं कि देश के लिए गौरव भावना बीजरूप में बालमन में यदि विकसित की जाती है तो उसका प्रभाव अचूक होता है। यही कारण था कि प्रचंड ओज के कवि श्यामनारायण पाण्डेय जितने लोकप्रिय देश के लिए मर मिटने की भावना से लबरेज आजादी के मस्तानों के बीच में रहे, आगे चलकर वह- उतने ही मान्य उन नन्हें-मुन्हें बच्चों के बीच भी हुए जो अपनी पाठ्य पुस्तकों की ‘चेतक और महाराणा प्रताप की सचित्र कविताओं’ का पाठ पूरे जोशो-उमंग के साथ छोटे-छोटे तिरंगों को हाथ में लिए गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस के अवसरों पर विशेष रूप से किया करते रहे।
जन्मभूमि के स्वातंत्र्य के प्रति तड़प और उसके प्रति गौरव भावना का ज्वाजल्यमान दृष्टांत हल्दीघाटी के उपाख्यानों में हम एक-एक कर पाते हैं। राणा प्रताप के स्वाभिमान का ओजस्वीपूर्ण वर्णन असंख्य लोगों को उनका मुरीद बनाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन का वह युग, एक ऐसा युग था जब देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिंदी कविता का विषय बनाकर कवि अपने दोहरे दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। वह एक ओर तो राष्ट्र के प्रति अपने स्वधर्म का निर्वाह राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी कविता का विषय बना कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर वह राष्ट्रव्यापी स्वातंत्र्य चेतना को युवाओं की धड़कनों में अपनी कलम के द्वारा अनवरत उद्दीप्त कर रहे थे। स्वाभाविक था कि उर्वर प्रज्ञा भूमि के चलते कवि ने तत्युगीन समस्याओं को अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ ऐतिहासिक सांचे में रखकर समूचे युग के सामने एक दृष्टान्त रखा। इसके पीछे जो महनीय उद्देश्य कार्य कर रहा था वह यही था कि राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातंत्र्य चेतना का विकास होता रहे और यही कारण था उनके हर काव्य, महाकाव्य में क्रांति कामना चरितार्थ हुई है।
श्यामनारायण पाण्डेय ने बहुत सी उत्कृष्ट काव्यसर्जनाएं की हैं। ‘हल्दीघाटी’, ‘जौहर’, ‘तुमुल’, ‘रूपान्तर’, ‘आरती’, ‘जय हनुमान’, ‘परशुराम’, ‘जय पराजय’, ‘गोरा-वध’ इत्यादि जिनमें प्रमुख हैं। इनमें ‘हल्दीघाटी’ सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। राजस्थान की ऐतिहासिक रणभूमि ‘हल्दीघाटी’ जो अकबर और महाराणा के युद्ध की साक्षी थी। कहते हैं की हल्दीघाटी की मिट्टी जो कि हल्दी की तरह पीली थी, भीषण युद्ध के कारण रक्त निमज्जित होकर लाल हो गई। उसी को आधार बनाकर लिखा गया था ‘हल्दीघाटी’ महाकाव्य उस समय के सर्वश्रेष्ठ सम्मान ‘देव पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया था। हल्दीघाटी महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए प्रसिद्ध ऐतिहासिक युद्ध पर निबद्ध किया गया है। प्रताप के ऐतिहासिक त्याग, आत्म बलिदान, शौर्य, स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता एवं जातीय गौरव के उद्बोधन ‘हल्दीघाटी’ में उस दौर की आजादी के दीवाने युवाओं के बीच खासी लोकप्रियता अर्जित की। सन् 1939 का समय, वह समय था जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपनी परिपक्वता की ओर बढ़ रहा था। ऐसे समय में ‘हल्दीघाटी’ ने युवाओं के उबाल खाते रुधिर में एक पवित्र आहुति का कार्य किया और ‘हल्दीघाटी’ तत्कालीन विद्यार्थियों और स्वतंत्रता के पुजारियों का कंठमाल बन गई।
‘जौहर’ में चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का हृदयहारी आख्यान है। रानी पद्मिनी जो न सिर्फ राजपूती स्वाभिमान का अपितु भारतीय नारी के उस गौरव का प्रतीक हैं जो अपने सतीत्व और सम्मान के स्वातंत्र्य की रक्षा हेतु हंसते-हंसते जौहर की ज्वाला में कूदकर प्राणों को स्वाहा कर देती है। आजादी के उसी युग में यह उस अप्रतिम भाव का द्योतक नहीं तो और क्या है, कि जब स्वातंत्रता की अभीप्सा लिए तरुण दीवाने किसी भी प्रकार के बलिदान यहां तक कि आत्माहुति देने में भी पीछे नहीं हटते थे।
श्यामनारायण पाण्डेय जी की कृतियों की विशेष बात यह है कि यदि वह पौराणिक आख्यान को भी अपने काव्य का आधार बनाते हैं तो भी उसकी विषयवस्तु के चुनाव में वह ओज तथा वीर रस को ही प्रमुखता देते हैं। वह वीरता जो उस युग की पहचान थी। वह ओजस्विता जो पराधीन भारत में भी स्वाभिमान और राष्ट्रगौरव के भाव से भारतीय जन-मन को ओत-प्रोत रखा करती थी। यहां ‘तुमुल’ और ‘परशुराम’ का उल्लेख समीचीन होगा। जब तुमुल के अंतर्गत दो पराक्रमी और विलक्षण व्यक्तित्व के धनी युवाओं लक्ष्मण और मेघनाद के बीच धर्मयुद्ध हुआ तो वस्तुत: उसके माध्यम से भारतीय संस्कृति और समाज के उद्दात्त प्रतिमानों को उपस्थापित किया गया है। वहीं परशुराम विष्णु के ही रौद्र अवतारस्वरूप धर्मसंस्थापनार्थ की भावभूमि पर रचे-बसे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो अपनी प्रतिबद्धताओं के पालनार्थ कुछ भी कर सकते हैं-‘
आखों से बहती अग्निसरित्,
मुख तेज वर्तुलाकार हार।
जिह्वा पर बुदबुद शिवस्तोत्र,
रुधिरेच्छु भयंकर परशुधार।।’
स्वाभाविक था कि उस युग का जनमानस अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण के सहज भाव से आप्लावित होता। ‘जय हनुमान’ भी उसी प्रतिकार का प्रतीक है जो उस दौरान गांधी जी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद ‘करेंगे या मरेंगे’ के रूप में कोटि-कोटि आवाज बनकर उद्घोषित हो उठा-
‘ज्वलल्लाट पर प्रचण्ड तेज वर्तमान था,
प्रचण्ड मानभंगजन्य क्रोध वर्धमान था।
ज्वलंत पुच्छबाहु व्योम में उछालते हुए,
अराति पर असह्य अग्निदृष्टि डालते हुए।
उठे कि दिग्दिगंत में अवण्र्य ज्योति छा गई,
कपीश के शरीर में प्रभा स्वयं समा गई।।
पाण्डेयजी के काव्य में भाव और अलंकारों का हम अद्भुत सम्मिश्रण पाते हैं। वह अपने समय में कवि सम्मेलनों के शीर्षस्थ कवि थे। कहा जाता है कि उनके शौर्यपूर्ण काव्य को उन्हीं की ओजस्वी वाणी में सुनने की इच्छा लिए श्रोतागण मीलों-मील पैदल चलकर पहुंचा करते थे। कवि पाण्डेयजी के व्यक्तित्व का एक पक्ष यह भी था कि वे बहुत स्पष्टवक्ता थे। कविधर्म के विशेष गुणों से अलंकृत होने के बावजूद चारणधर्मिता या चाटुकारिता को उन्होंने स्वयं से कोसों दूर रखा था। आज आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए कवि श्यामनारायण पाण्डेय जैसे दुर्धर्ष कवि योद्धा का पावन स्मरण अनिवार्य प्रतीत होता है।
(साभार – दैनिक जागरण पर प्रकाशित डॉ. श्रुति मिश्रा का आलेख)
बायो फ्लॉक विधि से किया मछली पालन, कमाए लाखों
बगैर तालाब के होता है मछली पालन
चाईबासा । झारखंड राज्य का पश्चिम सिंहभूम जिला वन, पर्यावरण, खनिज संपदा से भरापूरा हैं। फिर भी युवा वर्ग का पलायन करना एक विकट समस्या है। प्रायः देखा जाता है, कि शिक्षित बेरोजगार युवक-युवती जिला छोड़कर किसी और राज्य में रोजगार के लिए पलायन कर जाते हैं। बेरोजगारों के लिए सरकार की ओर से अनेकों योजनाएं चलाई जाती है, परंतु जमीन की कमी और पैसों की कमी होने के कारण लोग अपना रोजगार नहीं ले पा रहे हैं। इसी को देखते हुए बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन करना रोजगार का एक अच्छा जरिया माना जाने लगा है। बायोफ्लॉक तकनीक से कम भूमि, कम लागत, कम जल से भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसलिए आज के दौर में बायोफ्लॉक तकनीक का प्रयोग तेजी से किया जा रहा है।
नौकरी छूटने के बाद मछली पालन, अब 5 लाख की आमदनी
पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर के रहने वाले बालवीर सेन पहले किसी कंपनी में राज्य के बाहर काम करते थे। परंतु नौकरी चले जाने के बाद रोजगार की तलाश में जिला मत्स्य कार्यालय पहुंचे। वहां उन्हें चल रही योजनाओं के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई। जिसमें उन्होंने बायोफ्लॉक तकनीक पर विशेष रुचि दिखाई। फिर उन्हें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की मदद से मछली पालन की शुरुआत की। अभी वे कवई, कोमोनकार और अमुरकार मछलियों का कारोबार कर रहे हैं। वर्तमान में वे सलाना 04 से 05 लाख का आमदनी कमा रहे हैं।
कोरोना काल में स्थिति दयनीय हुई, अब 6 क्विंटल मछली उत्पादन
चाईबासा सदर निवासी राजकुमार मुंडा एक शिक्षित कृषक हैं। काफी समय से ये खेती कर रहे हैं, परंतु उम्मीद के अनुसार मुनाफा नहीं मिला। ज्यादातर उन्हें घाटा का सामना करना पड़ा है। जिसके कारण कोरोना काल में पूरे पूरे परिवार की दयनीय स्थिति हो गई। जिसके बाद उन्होंने जिला मत्स्य कार्यालय से संपर्क किया। उन्हें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा के तहत बायोफ्लॉक तकनीक का लाभ दिया गया। इस तकनीक से उन्होंने कोमोनकार, मोनोसेल्स, तेलपिया और देसी मांगुर जैसे प्रजाति का पालन किया। प्रत्येक टैंक से वे 05 से 06 क्विंटल मछली का उत्पादन करते है। इससे उनके जीवनशैली में काफी सुधार आया हैं। क्योंकि इससे ज्यादा मुनाफा कमा रहे है। उन्होंने बताया कि आज वह अच्छी आमदनी के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा मुहैया करा रहे हैं और अच्छी जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
खेती-किसानी के साथ मछली पालन से आमदनी में बढ़ोतरी हुई
हाटगम्हरिया प्रखंड के सिलदौरी गांव निवासी ज्योति बिरुवा भी कम मेहनत और कम लागत से ज्यादा मुनाफा कमाकर सुकून की जिंदगी जीना चाहते थे। इसी क्रम में रोजगार की खोज में उन्हे जिला मत्स्य कार्यालय की ओर से बायोफ्लॉक तकनीक योजना अपनाने का सुझाव दिया गया। इस योजना को अपनाकर ज्योति बिरूवा अब एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं और अपने बाकी के समय में अन्य कार्य भी कर रहे हैं।
जमीन की कमी और जल स्तर नीचे जाने के कारण बायोफ्लॉक तकनीक कारगर
मछली पालन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण लोगों के पास अब पर्याप्त जमीन नहीं है, जिससे वे तालाब बनवा कर मछली पालन कर सके। साथ ही साथ वर्षा भी दिनों-दिन कम होने के कारण भूमिगत जल का स्तर भी नीचे जा रहा है। ऐसे में बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन करना भविष्य में रोजगार के एक अच्छा स्रोत साबित होगा।
केरल के त्रिशूर में पुरोहित बनकर इतिहास रच रही हैं माँ – बेटी की जोड़ी
त्रिशूर । केरल में 24 वर्षीय ज्योत्सना पद्मनाभन और उनकी मां अर्चना कुमारी पुरोहिताई अनुष्ठान में सदियों पुरानी पुरुष वर्चस्व की दीवारें तोड़कर खामोशी के साथ एक नया इतिहास रच रही हैं। दोनों महिलाएं केरल के त्रिशूर जिले में एक मंदिर में कुछ वक्त से पुरोहित की भूमिकाएं निभा रही हैं। दोनों पड़ोसी मंदिरों व अन्य स्थलों पर तांत्रिक अनुष्ठान कर रही हैं जिसे आम तौर पर पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र माना जाता है।
हालांकि, 47 वर्षीय अर्चना और उनकी बेटी अपनी पुरोहिताई को लैंगिक समानता की कोई पहल या समाज में व्याप्त लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने की कोई कोशिश करार नहीं देती। कट्टूर के थरनेल्लूर थेक्किनियेदातु माना के एक ब्राह्मण परिवार से आने वाली ज्योत्सना और अर्चना ने एक सुर में कहा कि वे समाज में कुछ साबित करने के लिए नहीं बल्कि अपनी भक्ति के कारण पुरोहिताई करने लगीं।
सात साल की उम्र से सीखा तंत्र
वेदांत और साहित्य में पोस्ट ग्रैजुएट कर चुकीं ज्योत्सना ने कहा कि उन्होंने सात साल की उम्र से ही तंत्र सीखना और उससे पहले से ही पुरोहित की भूमिका निभाने का सपना देखना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा, ‘मैं अपने पिता पद्मनाभन नम्बूदरिपाद को पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान करते हुए देखकर बड़ी हुई हूं। इसलिए इसे सीखने का सपना मेरे दिमाग में तब से ही पनपना शुरू हो गया था जब मैं बहुत छोटी थी।’
ज्योत्सना ने कहा, ‘जब मैंने अपने पिता से अपनी ख्वाहिश जाहिर की तो उन्होंने विरोध नहीं किया। उन्होंने पूरा सहयोग किया।’ उन्होंने कहा कि किसी भी प्राचीन ग्रंथ या परंपरा में महिलाओं को तांत्रिक अनुष्ठान करने व मंत्र पढ़ने से नहीं रोका गया है। ज्योत्सना ने अपने परिवार के पैतृक मंदिर पैनकन्निकावु श्री कृष्ण मंदिर में देवी भद्रकाली की तांत्रिक अनुष्ठान से प्रतिस्थापना की थी। इस मंदिर के मुख्य पुजारी उनके पिता हैं।
वेदांत और साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट
वह मंदिर में पुरोहित की भूमिका निभा रही हैं और वहां रोज पूजा-पाठ करती हैं। वह पिछले कई वर्षों से दूसरे मंदिरों में भी पूजा-पाठ कर रही हैं। जब बेटी ने पूजा-पाठ करना और तांत्रिक अनुष्ठान सीखना शुरू किया तो अभी तक घरेलू कामकाज करने वाली उनकी मां अर्चना कुमारी भी इसमें अपनी बेटी के साथ जुड़ गईं। माहवारी के दौरान दोनों मां बेटी पुरोहिताई और पूजा पाठ से दूर रहती हैं। ज्योत्सना ने कांची और मद्रास यूनिवर्सिटी से वेदांत व साहित्य में पोस्ट ग्रैजुएट की डबल डिग्री हासिल की है।






