हावड़ा । महालया की सुबह रेडियो पर गूंजने वाली ‘महिषासुरमर्दिनी’ की अमर धुन के साथ ही वीरेंद्र कृष्ण भद्र की सशक्त वाणी और पंकज मल्लिक के संगीत निर्देशन की याद ताजा हो उठती है। हालांकि, इस कालजयी कार्यक्रम की रचना और परिकल्पना करने वाले बाणीकुमार की कहानी कुछ अलग है। जिस हावड़ा जिले में उनका जन्म हुआ, वहीं आज उनकी पहचान और स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही हैं। ‘महिषासुरमर्दिनी’ की प्रस्तुति और श्लोकपाठ के लिए वीरेंद्र कृष्ण भद्र तथा संगीत निर्देशन के लिए पंकज मल्लिक को व्यापक रूप से याद किया जाता है। लेकिन इस लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम के रचयिता बाणीकुमार अपने ही जिले में अपेक्षित सम्मान और पहचान से वंचित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा में अमिट छाप छोड़ने वाले इस साहित्यकार को उनकी जन्मभूमि पर भी वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वह हकदार हैं।
बाणीकुमार का वास्तविक नाम वैद्यनाथ भट्टाचार्य था। उनके पूर्वजों का घर हुगली जिले के आतपुर में था, जबकि उनका जन्म 23 नवंबर 1907 को हावड़ा के कानपुर गांव में अपने ननिहाल में हुआ था। इतिहासकार और संस्कृत के विद्वान पंडित विधुभूषण भट्टाचार्य तथा अपर्णा देवी की चार संतानों में वह सबसे बड़े थे। बाणीकुमार की शिक्षा-दीक्षा हावड़ा में हुई। उन्होंने हावड़ा जिला स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद तत्कालीन प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में हासिल की। उनके पिता और दादा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। लिहाजा, अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन करने के बावजूद संस्कृत के प्रति उनका गहरा लगाव बना रहा। संस्कृत के अध्ययन में उनकी विद्वत्ता के लिए उन्हें ‘काव्यसरस्वती’ की उपाधि भी मिली। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को निखारने में हावड़ा जिला स्कूल के शिक्षक करुणानिधान बंद्योपाध्याय की अहम भूमिका रही। उन्होंने बाणीकुमार को काव्य रचना के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर यही रचनात्मक प्रतिभा उनकी विशिष्ट पहचान बनी और उन्होंने ‘महिषासुरमर्दिनी’ जैसे कालजयी कार्यक्रम की रचना और परिकल्पना कर बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया।
बाणीकुमार ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा हावड़ा के कासुंदिया स्थित सुबल कोले लेन में बिताया था। कुछ वर्ष पहले खुरुट बारोवारी के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, महालया के अवसर पर प्रतिमा पर फूल-मालाएं चढ़ाई जाती हैं, लेकिन साल के बाकी दिनों में उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। यह स्थिति उस साहित्यकार की स्मृति के संरक्षण को लेकर सवाल खड़े करती है, जिसकी रचना हर वर्ष लाखों लोगों को महालया की सांस्कृतिक अनुभूति से जोड़ती है।
स्थानीय लोगों को इस बात का मलाल है कि ‘महिषासुरमर्दिनी’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम के रचयिता को उनके अपने जिले में भी उचित पहचान नहीं मिल पाई है। हावड़ा के अनेक लोग आज भी इस तथ्य से अनजान हैं कि बाणीकुमार का जन्म इसी जिले में हुआ था।
बंगाल की सांस्कृतिक चेतना में ‘महिषासुरमर्दिनी’ का स्थान आज भी बेहद खास है। ऐसे में इसके रचयिता बाणीकुमार की स्मृति को संरक्षित करना, उनकी साहित्यिक उपलब्धियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उनकी जन्मभूमि पर उन्हें उचित सम्मान दिलाना जरूरी है। महालया पर उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने तक सीमित रहने के बजाय उनकी विरासत को वर्षभर याद रखने की पहल ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।




