Friday, July 31, 2026
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अर्चना संस्था द्वारा पावस ऋतु पर काव्य गोष्ठी 

कोलकाता । मानसूनी माहौल में कवियों के शब्दों की बौछारें मन को भिगोने लगते हैं। अर्चना संस्था के सदस्यों ने ऑनलाइन माध्यम जूम मीटिंग को चुना और रचनाकारों ने रचनाएं  प्रस्तुत की । चिराग चतुर्वेदी, मृदुला कोठारी, सुशीला चनानी, प्रसन्न चोपड़ा, बनेचन्द मालू, शशि कंकानी, संगीता चौधरी, सुशीला सुराना, मीना दूगड़, इंदू चांडक,हिम्मत चौरड़िया प्रज्ञा, डॉ वसुंधरा मिश्र आदि कवि रचनाकारों और श्रोता सदस्याओं की उपस्थिति रही।
अर्चना संस्था की गोष्ठी में बनेचन्द मालू ने समाज के बदलते स्वरूप का वर्णन किया और मनुष्यता के लिए छोटी-छोटी क्षणिकाओं से नसीहत दी – उनकी कविताएँ – बस्तियाँ हैं बस रही,/ पर आदमी उजड़ रहा,/आस्थाएँ धँस रही,/और मूल से उखड़ रहा। / …….कोई भी नसीहत /दरवाजे पर दस्तक की तरह, नरम लहजे में ही /अच्छी लगती है/ और ज्यादा असर करती है। क्योंकि / दस्तक का मकसद/दरवाज़ा खुलवाना होता है,/तोड़ना नहीं। – कैसा सर्प दंश, /यह है रावण का अंश। /एक सच्चा बखान है, /पंचतत्व में भी रावण विद्यमान है।
संगीता चौधरी ने माँ के निश्छल प्रेम और त्याग की बहुत सुन्दर प्रस्तुति देते हुए सुनाया – मां तुम कितना झूठ बोलती हो /तुम स्वयं तो अपने लिए /सुकुन के दो पल टटोलती हो/मां तुम कितना झूठ बोलती हो।
सुशीला चनानी ने वर्षा पर दोहे सुनाए जिसमें बचपन की शरारतें और पानी में छ्प छ्प करते बच्चे बारीश का आनंद है/रिमझिम बूंदें बरसाती मनभावन दे ताल /ओले चुनते हाथ से ,बचपन का वह रंग /छप छप करके छेड़ते ,बरखा का वह नीर और आज हमारी पहचान कागजों पर हो गई है चाहे डेथ सर्टिफिकेट ही क्यों न हो वे कहती हैं -सच कागज पर चाहिये !
आजकल जबानी तकरीर का कोई मोल नहीं,/जो कागज पर लिखा गया वही सही !
चिराग चतुर्वेदी ने गोष्ठी का शुभारंभ शिव के आह्वान से किया और देश के लिए शिव से दानवी शक्तियों के नाश करने की कामना की जिसमें वे कहते हैं – भगवान शिव जी की उपासना में/हे रामेश्वर करुणावतार/वंदित अभिनंदित निराकार /देश की दानवी प्रवृत्तियों का करो विनाश,/मिटे संत्रास,/फैले दिव्य प्रकाश।।
नदी और नारी उठाती रही हैं भार ।/रूकना नहीं,थकना नहीं चलता चला चल ।-शशि कंकानी ने अपनी रचनाओं से समाज और व्यक्ति को चलते रहने का संदेश दिया।
सप्त रंगों के पहने परिधान /जब तुम धरा पर उतरती हो किसी नवोढ़ा दुल्हन सी हमें लगती हो। / बूंद को धरती पर उगाता तू ही /बूंद को धरती पर उतार कर/धान रूप में सुखाता भी तू ही, गीत- बादल म्हारी और आज्या थोड़ी छांटलड्या बरसाज्या/चकमक चूरमो खिचड़लै थी गोठ करास्यां रे****मृदुला कोठारी के राजस्थानी भाषा में पिकनिक की परंपरा जिसे गोठ कहा जाता है उसका चित्रण किया और अन्य कविताएं भी सुनाई ।
कुण्डलिया छंद-1.कुदरत रखे सहेज कर, एक अनूठी चीज2.लगा इमोजी मत दिखा,अपना झूठा प्यार।
गीत-सागर जिसके पाँव पखारे, सुरपति करे बखान।
गूँज उठे धरती पर फिर से,जय-जय हिन्दुस्तान।।हिम्मत चौरड़िया प्रज्ञा ने देशभक्ति पर अपनी रचना सुनाकर अपने देश की प्रशंसा की है। कुंडलियां में इमोजी का प्रयोग कर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया।
मैं गरीबी और अभाव लिखती हूं ।/फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के घाव लिखती हूं महलों की चमकने कभी आकर्षित नहीं किया।/ मैं भूखी आंखों के अनगिनत ख्वाब लिखती हूं ।–प्रसन्न चोपड़ा ने इन कविताओं में एक कवि विलासिता में जीवन नहीं यापन करता बल्कि समाज की सच्चाई बयान करता है ।
वसुंधरा मिश्र की ‘मैं औरत हूँ’ कविता की पंक्तियाँ हाँ! मैं औरत हूँ /वह भी औरत तुम भी /औरत! औरत! औरत! पसंद की गई जिसमें स्त्री के अस्तित्व को स्त्री ही पहचानती है और अपनी संस्कृति का भी संरक्षण करती है।दूसरी रचना महादेवी वर्मा की पावस ऋतु पर सुनाई। जिसमें पावस ऋतु पाहुन बन कर पलकों पर उतर आता है और हम तृप्ति का अनुभव करते हैं।
इंदू चांडक ने दोहे भूल गए कर्तव्य सब,माँग रहे अधिकार।
कैसे समझेंगे भला, क्या होता व्यवहार।।/मिले धरोहर रूप में, जो हमको संस्कार।/उनके ही अनुरूप हम करते जग व्यवहार।।/और गीत-काळी काळी बादली लोरां लेती आई रे /समदरियै मैं जी घबरावै,आभै मैं उड़ छाई रे। राजस्थानी गीत काली काली बदली और दोहे सुनाए जिनमें पावस ऋतु का सौन्दर्य और संदेश दिया। विविध रसों का संगम है पाकशाला /आरोग्य से परिपूर्ण है हर मसाला /स्वाद जो रसना से उतर दिलों दिमाग पर छाए /ऐसा रसोईघर है हर स्वाद की प्रयोगशाला.और बच्चों की किलकारी मानो एक फुलवारी-मीना दूगड़ ने अपनी रचनाएं सुनाई जिसमें पूरी पाकशाला और बच्चों का चित्रात्मक वर्णन किया।
सुशीला सुराना ने अपनी सशक्त रचना – आहट विध्वंस की सुनो, /जब भी हो सचेतन, साहस के बिगुल फूँक दो। /.. अनहद तक गूँजे सिंहनाद, /हमें हिंद पर नाज़, हमें हिंद पर नाज़ रहे। /व्योम, धरा, ये दिशा-दिगंत, /पावन भूमि अभिमान रहे। /पावन भूमि अभिमान रहे। और मैंने ‘शंकर को साधा है, /विष पीता हूँ हर बार सखे। सुनाई ।
डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि इंदू चांडक के संयोजन और संचालन ने सभी रचनाकारों में अपनी संचालन कला से प्राणों में नई ऊर्जा का संचार किया और धन्यवाद दिया मृदुला कोठारी ने।

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