“19वीं सदी का औपनिवेशिक भारत: नवजागरण और जाति प्रश्न” पुस्तक पर परिचर्चा

 साहित्यिकी द्वारा किया गया आयोजन
कोलकाता ।  “साहित्यिकी”की फ़रवरी महीने की  मासिक गोष्ठी में डॉ रूपा गुप्ता की शोधपरक पुस्तक ‘19वीं सदी का औपनिवेशिक भारत: नवजागरण और जाति प्रश्न ’ पर आयोजित परिचर्चा में पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए लेखिका ने कहा कि हालाँकि 19वीं सदी आधुनिक मूल्यबोध के विकास की सदी रही, लेकिन संस्कृतिकरण के नाम पर जातिप्रथा को मज़बूत करने की राजनीति में मनुष्यता बोध के पीछे छूट जाने से आधुनिकता खंडित हुई। जाति समाज को बाँटती ही नहीं है, प्रेमविहीन भी बनाती है और प्रेमविहीन समाज कुंठित समाज होता है।डॉ. रूपा ने बताया कि उक्त पुस्तक उनके 11 वर्ष की कठिन साधना का प्रतिफल है जिसमें उन्होंने हिंदी नवजागरण को भारतीय नवजागरण से जोड़ने तथा जाति के बदलते स्वरूप को  तथ्यों की रोशनी में आज के संदर्भ से जोड़ने का चुनौतीपूर्ण प्रयास किया है।
डॉ. पूनम दीक्षित ने डॉ. रूपा गुप्ता की कृति को प्रासंगिक बताया और कहा कि शोधार्थी एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्रों को इस पुस्तक से  बहुत मदद मिलेगी और पुस्तक के कलेवर पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि यह हमें सोचने, जानने और समझने के लिए झकझोरती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पुस्तक के चुनिंदा विषयों पर  कार्यशाला, विमर्श रखे जा सकते हैं। यह सत्यान्वेषण की दृष्टि देती हैं।
विख्यात साहित्यकार डॉ.  तनुजा मजूमदार ने डॉ. रूपा गुप्ता की कृति  के विस्तृत फलक पर बात करते हुए कहा कि यह पुस्तक अंतर्विषयक  साहित्य का उत्कृष्ट नमूना है जिसमें इतिहास,समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं अनेक प्राचीन पुस्तकों तथा ग्रंथों की  सम्यक चर्चा हुई है। उन्होंने बताया कि इस  पुस्तक के शीर्षक में  चार आयाम  हैं-19 वीं सदी, औपनिवेशिक भारत, नवजागरण एवं जातीय प्रश्न। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, वाणिज्यवाद,   तथा बाज़ारवाद की कड़ियों को जोड़ती है तथा उनका सटीक विश्लेषण करती है। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार ने वृहद अनुसंधान के पश्चात अपने हर तथ्य को प्रमाणित करने के लिए आंकड़े दिए हैं जो कि औपनिवेशिक भारत को समझने के लिए बहुत आवश्यक है और जिसे समझाने में वे सर्वथा सफल हुई हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षा  डॉ. राजश्री शुक्ला ने महत्वपूर्ण, गंभीर परिचर्चा की केंद्र डॉ रूपा गुप्ता को उनकी इस अमूल्य रचना के लिये साधुवाद किया। सदस्य वक्ता डॉ.पूनम दीक्षित एवं  अतिथि वक्ता प्रोफ़ेसर तनुजा मजूमदार  को उनके विद्वतापूर्ण, सारगर्भित तथा विस्तृत विवेचन के लिए आभार प्रकट किया।
आरंभ में साहित्यिकी की सचिव डॉ. मंजुरानी गुप्ता ने साहित्यिकी का संक्षिप्त परिचय देते हुए उपस्थित सुधीजनों का स्वागत किया। कार्यक्रम में विशिष्ट रूप से उपस्थित प्रो. शंभुनाथ साव, प्रो. हितेंद्र पटेल, राज मिठौलिया, प्रेम कपूर, प्रदीप  जीवराजका, सुनीता गुप्ता, साहित्यिकी की अध्यक्ष विद्या भंडारी एवं सदस्याओं और अच्छी ख़ासी संख्या में उपस्थित शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं को कार्यक्रम की संचालिका रेवा जाजोदिया ने हार्दिक धन्यवाद दिया। रिपोर्ट प्रस्तुति कविता कोठारी की रही।  कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

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