कोलकाता । सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्तवावधान में शनिवार को पंडित विद्यानिवास मिश्र की जन्मशती के अवसर पर पुस्तकालय सभागार में “विद्यानिवास मिश्र के लेखन में संस्कृति विमर्श” विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र भारतीय संस्कृति के सशक्त वाहक थे। उन्होंने कहा कि विद्यानिवास मिश्र के पारिवारिक परिवेश में गहरी आस्तिकता और सांस्कृतिक चेतना थी, जिसका प्रभाव उनके संपूर्ण वाङ्मय में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने संस्कृति को मानव-चित्त का संस्कार बताते हुए स्पष्ट किया संस्कृति को जीने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। सत्य एक है देखने के चश्मे अनेक हैं। चिंतन परंपरा को जड़ रूप में न लेकर विकल्पों के रूप में लेना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व, कृतित्व पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
बीज वक्ता विद्यासागर कॉलेज फॉर वुमन, कोलकाता के प्राध्यापक डॉ. अभिजीत सिंह ने कहा कि आज के समय में संस्कृति में बढ़ती रिक्तता के बीच पंडित विद्यानिवास मिश्र का चिंतन अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि विद्यानिवास मिश्र व्यक्ति, वस्तु और व्यवहार के परिष्कार को संस्कृति मानते थे। उनके अनुसार संस्कृति कोई स्थिर या संग्रहणीय वस्तु नहीं, बल्कि सतत गतिशील और व्यवहार में जीने वाली प्रक्रिया है। भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीय दृष्टि का विकास आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विद्यानिवास मिश्र की रचनाओं के शीर्षकों में उनकी सांस्कृतिक संवेदना और भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।
स्वागत भाषण देते हुए डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र का चिंतन लोक और शास्त्र, भारत और भारतीयता तथा परंपरा और आधुनिकता के समन्वय पर आधारित था। उनके ललित निबंधों में भारतीय संस्कृति की अविरल धारा प्रवाहित है।
सरस्वती वन्दना डॉ. शिप्रा मिश्रा ने तथा संचालन दिव्या प्रसाद ने किया। पुस्तकालय अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि पुस्तकालय में ऐसे मनीषियों के कार्यक्रम निरंतर होते रहने चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ी लाभान्वित हो सके। संस्था की मंत्री दुर्गा व्यास के धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, शिक्षाविद्, पत्रकार एवं शोधार्थी उपस्थित थे । कार्यक्रम को सफल बनाने में पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, भगीरथ सारस्वत, लक्ष्मी जायसवाल एवं अन्य की सराहनीय भूमिका रही।




