Sunday, March 22, 2026
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रख्माबाई : स्त्री अधिकार और कानून

वरिष्ठ इतिहासकार सुधीर चन्द्र की पुस्तक ‘‘रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून’’ गुलाम भारत के समय की एक ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण है। यह बालविवाह जैसी सामाजिक कुरितियों के खिलाफ एक स्त्री के विद्रोह की कहानी है। सन् 1984 में रख्माबाई नामक स्त्री ने अपने पति के साथ रहने से इसलिए इन्कार कर दिया था, क्योंकि जिस समय उनकी शादी हुई उस समय वो अपरिपक्व थीं, जिसे वह विवाह नहीं मानती थी।“रख्माबाई में एक साथ लक्षित ‘विद्रोह’ और ‘समर्पण’ में कानून, जनमानस और सामाजिक बदलाव के बीच सतत चलता कार्य-कारण सम्बंध देखा जा सकता है।’’

रख्माबाई के खिलाफ दादाजी के मुकदमे में स्त्रियों की स्थिति को लेकर एक पूर्वग्रह छिपा हुआ था। इसकी क्रूरता सुनवाई के दौरान कभी-कभार ही उभरकर सामने आई। लेकिन जब आई तो दिखा गई कि एक व्यक्ति के रूप में स्त्राी का अपना कोई स्वतंत्रा अस्तित्व नहीं था। ऐसे ही एक अवसर पर, रख्माबाई पर दादाजी के अधिकार का दावा करते हुए वीकाजी ने कहा, ‘पत्नी अपने पति का एक अंग होती है, इसलिए उसे उसके साथ ही रहना चाहिए।’ यह उस तरह की बात थी जिसका मजाक उड़ाकर बेली यूरोपीय श्रेष्ठता से जुड़ा अपना दम्भ जता सकते थे। उन्होंने कहा, ‘आप इस नियम को भावनगर के ठाकुर पर कैसे लागू करेंगे, जिन्होंने राजपूतों की परम्परा के अनुसार एक ही दिन में चार स्त्रिायों के साथ विवाह किया?’ वीकाजी ने बेधड़क जवाब दिया, ‘तो फिर ठाकुर की अस्मिता को चार हिस्सों में विभाजित माना जाएगा।’ हिन्दू कानून की इस व्याख्या पर अदालत में जो अट्टहास हुआ उसे समझा जा सकता है। लेकिन बेली जैसों के इस विश्वास को समझना मुश्किल है कि औरतों के प्रति उनका नज़रिया उस नज़रिए से बेहतर था जिसको लेकर यह अट्टहास हुआ था। ग्रेटना ग्रीन विवाहों की तरह उन्हें यह भी याद होना चाहिए था कि ‘सबसम्पशन’ (सन्निवेश) अंग्रेजी पारिवारिक जीवन की धुरी हुआ करता था। बेली भूल गए थे कि सन्निवेश के इसी सिद्धान्त का एक अवशेष अंग्रेजी कानून की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता के रूप में अब भी मौजूद था। इस सिद्धान्त के अनुसार, पत्नी इस सीमा तक अपने पति का अभिन्न अंग थी कि उसे अपने पति के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा करने का भी अधिकार नहीं था। µइसी पुस्तक से

रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून

लेखक- सुधीर चन्द्र

अाईएसबीएन-978-81-267-2337-9

पेज-223

मूल्य- 400

प्रकाशन-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

(साभार – राजकमल प्रकाशन)

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