ये है जगन्नाथ मंदिर में 56 भोग बनाने वाले 500 रसोइयों की रसोई के रहस्य

ओडिशा के पुरी में हर साल होने वाली भगवान जगन्नाथ की यात्रा अपना का अपना महत्व है। इस बार यह यात्रा 25 जून रविवार के दिन है।

जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस विशाल रसोई में भगवान को चढ़ाने वाले महाप्रसाद तैयार करने के लिए लगभग 500 रसोइए तथा उनके 300 सहयोगी काम करते हैं।

मान्यता है कि इस रसोई में जो भी भोग बनाया जाता है, उसका निर्माण माता लक्ष्मी की देखरेख में ही होता है। यह रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। यह मंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है।

यहां बनाया जाने वाला हर पकवान हिंदू धर्म पुस्तकों के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही बनाया जाता है। भोग पूरी तरह शाकाहारी होता है। उसमें किसी भी रूप में प्याज व लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता।

भोग मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया जाता है। यहां रसोई के पास ही दो कुएं हैं जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। केवल इनसे निकले पानी से ही भोग का निर्माण किया जाता है। इस रसोई में 56 प्रकार के भोगों का निर्माण किया जाता है।

रसोई में पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं।

मंदिर में भोग पकाने के लिए 7 मिट्टी के बर्तन एक दूसरे पर रखे जाते हैं और लकड़ी पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर रखे बर्तन की भोग सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद भोग तैयार होता जाता है।

विश्वनाथ मंदिर के पांच सीढ़ियां चढ़ने पर आता है आनंदबाजार। यह वही जगह है जहां महाप्रसाद मिलता है। कहते हैं इस महाप्रसाद की देख-रेख स्वयं माता लक्ष्मी करती हैं।

जगन्नाथ मंदिर की चार खास बातें

  1. जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई 65 मीटर यानी 214 फीट और 8 इंच है। मंदिर के चारों दिशाओं में बड़े-बड़े द्वार हैं। मान्यता है कि इसकी परिक्रमा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  2. अरुणस्तंभ से 22 सीढ़ियां चढ़ने पर ऊपर की ओर विश्वनाथ मंदिर है। मान्यता है कि विश्वनाथ के दर्शन के बाद ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए जाते हैं तभी पुण्य प्राप्त होता है।
  3. पांच मीटर लंबी और एक मीटर चौड़ी वेदी पर भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलराम की लकड़ी की मूर्तियां हैं, जिनकी पूजा होती है।
  4. मान्यता है कि रथ यात्रा के माध्यम से भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी गुंदेचा के यहां जाते हैं और पूरे नौ दिन वहां रहते हैं।

 

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