ये वक्त जा रहा है….सुरेंद्र प्रताप सिंह को याद करते हुए

सुधा अरोड़ा

वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा का हिन्दी साहित्य जगत का महत्वपूर्ण चेहरा हैं । इनका जन्म 1946  विभाजन पूर्व लाहौर में हुआ । कहानी, आलेख, स्तंभ-लेखन, रेडियो, दूरदर्शन, टी.वी. धारावाहिक, फ़िल्म पटकथा लेखन  द्वारा अपनी सृजनात्मकता का परिचय देते हुए , वे सदैव अपने सामाजिक सरोकारों को लेकर मुखर रही हैं । स्त्री विमर्श को नया आयाम देते हुए महिलाओं से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर वे लिखती हैं और सामाजिक तथा महिला संगठनों  के मंच से उन मुद्दों को अपनी आवाज़ भी देती हैं ।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह, हिन्दी पत्रकारिता को धार देने वाले सुरेन्द्र प्रताप सिंह, हिन्दी टीवी पत्रकारिता के प्रति युवाओं में आकर्षण लाने वाले सुरेन्द्र प्रताप सिंह.. पत्रकारिता का स्तम्भ हैं । उनको गये 26 साल हो गये । अपने चाहने वालों के एस. पी. आज भी हर पत्रकार के लिए आदर्श हैं…ये थी खबरें आज तक…ये पँक्तियाँ आज भी कानों में गूंजती हैं । आज 27 जून को पुण्यतिथि है और शुभजिता आभार व्यक्त करती है, वरिष्ठ कथाकार, साहित्यकार सुधा अरोड़ा जी का जिन्होंने यह महत्वपूर्ण आलेख हमें प्रकाशित करने का अवसर दिया… सुरेन्द्र प्रताप सिंह एवं सुधा अरोड़ा जी, दोनों ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहे हैं और यह संस्मरण एक थाती है पत्रकारों के लिए भी, पत्रकारिता जगत में प्रवेश के इच्छुक युवाओं के लिए भी । एक बार फिर लेखिका का आभार व्यक्त करते हुए आज सुरेन्द्र प्रताप सिंह की पुण्यतिथि पर यह आलेख श्रद्धांजलि स्वरूप आपके लिए….

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

सम्पादक, शुभजिता

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जिंदगी के मकसद को लेकर कृष्णचन्दर ने अपने आप से सवाल पूछा था- ‘अपनी जिंदगी में तुमने क्या किया ? किसी दोस्त को नेक सलाह दी ? किसी से सच्चे दिल से प्यार किया? जहॉं अंधेरा था, वहां रोशनी की किरण ले गए ? जितनी देर तक जिए, इस जीने का मतलब क्या था…..?’ इन सारे सवालों का उत्तर जिस शख़्स ने जिंदगी की
आखिरी सांस तक एक सकारात्मक ’हां’ में दिया, वह शख़्स था सुरेंद्र प्रताप सिंह ।

सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस पी सिंह ! इतनी कम उम्र की जिंदगी में उसके जीने का एक खास मकसद था। उस मकसद से दाएं-बाएं वह कभी नहीं चला। ’महानगर’ का स्तंभ ’आकलन’ हो या राजनेताओं से साक्षात्कार — अर्जुन के लक्ष्य की तरह वह मछली की आंख को ही निशाना बनाता रहा। वह जिसके न होने की खबर ’आज तक’ में आई सारी खबरों से ज्यादा दर्दनाक और भयावह खबर थी जिसे संजय पुगलिया ने भर्राए गले और सूनी आंखों से ’आज तक’ के करोड़ो दर्शकों तक पहुंचाया। इससे पहले तक कहीं यह उम्मीद बनी हुई थी कि अपने जीवट और इच्छा शक्ति के बूते पर वह यह लड़ाई भी जीत लेगा।

सुरेंद्र प्रताप को याद करते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय के मद्धिम सी रोशनी वाले अंधेरे गलियारे स्मृति में ताज़ा हो रहे हैं। अहिंदी भाषी प्रदेश का बेहद नामी हिंदी विभाग ! तीस (अब पचपन) साल पहले 1967 में जहां से मैंने एम.ए. किया ! मेरे अगले बैच 68 में शंभुनाथ और सुरेंद्र प्रताप थे। खादी के कुरते झोले, घिसी हुई पैंट के साथ हवाई चप्पल चटकाते हुए हिंदी विभाग के छात्र या तो छायावादी प्रेम कविताएं लिखते थे या राजनीति विभाग के मार्क्सवादी युवा नेता कमलेन्दु गांगुली के इर्द-गिर्द घूमते थे। सुरेंद्र प्रताप दूसरी श्रेणी में आते थे।
कलकत्ता वि.वि. के हिंदी विभाग की यह असाधारण खूबी थी कि वहां के छात्र बरसों बाद भी आपस में मिलते तो अंतरंगता की एक डोर जुड़ी हुई महसूस करते थे।

अच्छा लेखक -पत्रकार- कवि एक बहुत अच्छा और नेक इंसान भी हो, यह एक दुर्लभ कॉम्बीनेशन है। सुरेंद्र प्रताप एक सफल पत्रकार बने पर उसके साथ-साथ एक ईमानदार, साफ गो और संवेदनशील इंसान भी बने रहे। हालांकि उनकी ’लुक’ हमेशा एक अक्खड़ और फक्कड़ इंसान की थी जो अक्सर कम बोलता था पर साथ ही मुंहफट भी था और कई बार बड़ी चुभती हुई बात कहकर हर्ट भी कर देता था।

1983 या 84 की बात है — जब सुरेंद्र प्रताप अपने ‘रविवार‘ के सहयोगियों के बीच एस.पी. के नाम से जाने जाते थे। हमें बंबई से कलकत्ता गए साल भर भी नहीं हुआ था, एसपी ने कमलेश्वर की कथायात्रा को लेकर हुए एक विवाद पर ‘रविवार‘ की आमुख कथा के लिए बहुत सारी सामग्री जुटाई थी। उसे लेकर मैं जब एसपी से मिली तो बोले- ‘विश्वास नहीं होता, आप वही सुधा अरोड़ा हैं जो एम.ए. की कक्षा में बैठकर कहानियां लिखती थीं।‘ बात का व्यंग्य मेरी समझ में आ रहा था। मेरा लेखन कुछ सालों से बाधित था।
मैंने कहा – ‘घर में एक ही आदमी कहानियां लिख सकता है।‘
शिशिर गुप्ता (मोहनलाल गुप्त उर्फ भैयाजी बनारसी के छोटे पुत्र) ने मजाक किया- ‘कथाकार से शादी करने का यही हश्र होता है।’
एसपी ने ठहाका लगाया ‘इसीलिए मैंने शादी नहीं की।‘
मैंने अपनी पुरातनपंथी सोच के तहत कहा-‘आपको शादी कर लेनी चाहिए। होमफ्रंट अपने आप संभल जाएगा, आप सिर्फ ‘रविवार‘ संभालिए।‘
एसपी चश्मे के नीचे से झांकती शरारती आंखों से बोले – पर ‘घर’ चलाना तो पड़ेगा । शादी के बाद सारा स्ट्रगल धरा रह जाएगा। पत्रकार तो सारी जिंदगी स्ट्रगल करता है।‘

और सचमुच एसपी ने जिस समर्पित भाव से ‘रविवार‘ निकाला, उसने पत्रकारिता का रुख ही मोड़ दिया। उन दिनों ‘रेणु का भारत‘ से लेकर ‘रविवार‘ की अधिकांश आमुख कथाएं विस्फोटक होती थीं। एसपी ने राजनीति में लड़ाकू और खोजी पत्रकारिता का श्रीगणेश किया। हम लोगों को ‘रविवार‘ से अक्सर शिकायत रहती कि उसने अच्छा साहित्य छापने के बावजूद साहित्य को हाशिए पर डाल रखा है। लेकिन एसपी आश्वस्त थे कि हिंदी के पाठक की किस्सा-कहानी से ज्यादा दिलचस्पी राजनीति के गलियारों की सच्ची खबरों में है। ’रविवार‘ लोकप्रियता के चरम पर था तो एसपी ने उसे छोड़ा, फिर नभाटा से जुड़ गए, पर संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। न कभी समझौता किया, न दल बदला। राजनीति के गलियारे में घुसकर भी अपने लिए सुविधाएं नहीं जुटाई। शायद इसीलिए ‘आज तक‘ में उनकी सीधी-सादी, आम आदमी की भाषा ने करोड़ो हिंदी भाषियों को एक सूत्र में जोड़ दिया।

जिन दिनों जी टीवी की खबरों और दूरदर्शन के फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों में संचालक हिंदी की जगह एक नई ‘हिंग्रेजी‘ या ‘हिंग्लिश‘ बड़ी शान से इस्तेमाल कर रहे थे और हिंदी वाले लुटे-पिटे अपनी भाषा के अपमान पर सामूहिक विलाप कर रहे थे, ‘आज तक‘ ने बोलचाल की हिंदी भाषा का नया मुहावरा गढ़ा।
एस पी के उस खास अंदाज के मुरीद बच्चे भी थे । ‘आज तक‘ की खबरें खत्म होने के साथ-साथ हमारे बेहद प्रिय वरिष्ठ रचनाकार डॉ धर्मवीर भारती के नाती अंशुमान को वह जाना- पहचाना जुमला अपनी तोतली जबान से दोहराते कई बार मैंने सुना – ‘ये थीं खबरें आज तक, इंतजार कीजिए कलतक।‘

मौत ने एसपी के संघर्ष पर, समर्पित भाव से, डूबकर काम करने के उसके तौर-तरीकों पर पूर्ण विराम लगा दिया। खबरों को ढूंढने -संवारने – सजाने प्रस्तुत करने के उनके जुनून ने उन्हें अपनी ओर झांकने का शायद मौका ही नहीं दिया।

राहुल देव ने कहा -‘शिखर पर पहुंचा हर आदमी अकेला होता है।‘ उसके आसपास भीड़ होती है पर उसके काम का तनाव, उसके व्यक्तिगत दुख को बांटने वाले कम होते जाते हैं।
हर बार किसी परिचित, नजदीकी मित्र की मौत मुझे नए सिरे से जिंदगी की अहमियत का क्रूर अहसास दिला जाती है कि वह, जो उसके पास नहीं रही लेकिन हमारे पास है, इससे पहले कि उस अदृश्य ताकत के पंजे हमें दबोचें, हम इस चार दिन की छोटी-सी जिंदगी में कुछ अर्थपूर्ण कर जाएं न कि जोड़-तोड़, दांव-पेंच, छल-प्रपंच, अपने
लिए सीढ़ियां बनाने और दूसरों की जड़ें काटने में इसे गंवा बैठें।

एसपी ने ठीक ही कहा था-‘जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती ही रहती है।‘
चाहती हूं कि जिंदगी की तेज रफ्तार मौत के चिरंतन सत्य के न ढांपे और यह सबक देर तक हमारा साथ दे –

किसके लिए रुका है,
किसके लिए रुकेगा
करना है जो भी कर ले,
ये वक्त जा रहा है….. !!

(जनसत्ता : जुलाई 1997 को वामा स्तंभ में प्रकाशित)

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