Sunday, November 1, 2026
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डिजिटल धोखाधड़ी में बैंक चूके तो करनी होगी नुकसान की भरपाई : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली । डिजिटल गिरफ्तारी के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी के पीड़ितों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए बैंकों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। इस बीच, व्हाट्सएप ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने अब तक 9,400 संदिग्ध खातों को प्रतिबंधित किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केवाईसी संशोधन निर्देशों की जांच करने की बात कही है। ये निर्देश 31 दिसंबर तक लागू किए जाने हैं। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी होने पर बैंकों का ग्राहकों के प्रति कर्तव्य है। उन्हें असामान्य लेनदेन के बारे में पड़ोसी पुलिस थानों को तुरंत सूचित करना चाहिए। यह कदम डिजिटल धोखाधड़ी से निपटने और पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बैंकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। धोखाधड़ी के मामलों में उनकी निष्क्रियता स्वीकार्य नहीं होगी। यह सुनिश्चित करना बैंकों की प्राथमिकता होनी चाहिए कि उनके ग्राहक सुरक्षित रहें। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि बैंकों द्वारा उचित सावधानी बरतने में विफलता के कारण किसी ग्राहक को डिजिटल धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है, तो वित्तीय संस्थानों को पीड़ित के नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एक स्वतः संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वित्तीय संस्थानों का यह प्राथमिक वैधानिक कर्तव्य है कि वे अपने ग्राहकों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करें। इस दौरान एमिकस क्यूरी, सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनई ने कोर्ट को बताया कि लगातार कोशिशों के बावजूद स्कैम जारी हैं। उन्होंने हाल की एक घटना का जिक्र किया जिसमें एक महिला को 2.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पीठ ने बैंकों के लिए अनिवार्य निवारक उपायों पर जोर देते हुए कहा कि खाताधारक के स्थापित ट्रांजैक्शन पैटर्न से विचलन करने वाले किसी भी अस्वाभाविक लेन-देन को तुरंत अस्थायी रूप से निलंबित किया जाना चाहिए। संदिग्ध गतिविधियों की स्वचालित रिपोर्टिंग और लेन-देन की प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए भौतिक सत्यापन लागू किया जाए। ‘डिजिटल अरेस्ट’ के संदिग्ध शिकार बने ग्राहकों से जुड़े अस्वाभाविक लेन-देन के बारे में नजदीकी पुलिस स्टेशनों को तुरंत सचेत करना बैंकों की जिम्मेदारी होगी।

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