ग्लोबल टीचर अवॉर्ड 2023 में बंगाल के दीप नारायण नायक नामांकित

बर्दवान /कोलकाता । पश्चिम बंगाल के प्राथमिक स्कूल के शिक्षक दीप नारायण नायक और आंध्र प्रदेश से अंग्रेजी के शिक्षक हरि कृष्ण पतचारू के नाम को ‘वैश्विक शिक्षक पुरस्कार 2023’ के लिए शीर्ष 50 लोगों की सूची में शामिल किये गए हैं। दीप नारायण नायक पश्चिम बंगाल एक सरकारी शिक्षक हैं। पश्चिम बर्दवान जिले के जामुड़िया गांव में तिलका माझी आदिबाशी फ्री प्राइमरी स्कूल में वह पढ़ाते हैं। उन्हें ‘रास्तार मास्टर’ के नाम से जाना जाता है। रास्तार मास्टर का मतलब है सड़कों का शिक्षक। इस 34 वर्षीय शिक्षक ने इलाके के बच्चों को शिक्षित करने के लिए कड़ी मेहनत की । कोरोना लॉकडाउन में जब दो साल तक बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, ऑनलाइन लाइन क्लासेस लगीं तो यहां के बच्चों की पढ़ाई छूट गई। आदिवासी गांव में ऑनलाइन पढ़ाई के लिए बच्चों के पास मोबाइल नहीं था। आखिर दीप नारायण ने पहल की और महामारी लॉकडाउन के दौरान बच्चों को पढ़ाने के लिए गांव के घरों की दीवारों पर ब्लैकबोर्ड बना डाले । सड़कों को क्लासरूम में बदल दिया । देश भर के स्कूलों के बंद होने के बाद 45 दिनों बाद मई 2020 में नायक ने नीले आसमान के नीचे गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 6 बच्चों के साथ शुरू हुई क्लास में छात्र बढ़ते गए । अब पश्चिम बर्दवान 14 सड़क अध्ययन केंद्रों में 2,000 छात्र पढ़ रहे हैं। दीप नारायण ने बताया कि 2018 में राज्य सरकार ने उन्हें तिलका माजी आदिवासी फ्री प्राइमरी में शिक्षक नियुक्त किया था। तब से ही उन्होंने बच्चों को फ्री ट्यूशन देना शुरू कर दिया था। हालांकि, मार्च 2020 में स्कूलों के बंद होने के बाद, उन्होंने महसूस किया कि उनके अधिकांश छात्र डिजिटल उपकरणों का खर्च वहन नहीं कर सकते थे और इसलिए दिन गांव में घूमते हुए या मवेशियों को चराते हुए बिताते थे। उन्होंने बच्चों का भविष्य बचाने के लिए सड़क पर क्लासेस शुरू करने का फैसला लिया । दीप नारायण ने पेड़ों के नीचे और सड़क के कोनों पर अनौपचारिक कक्षाएं आयोजित करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई, उन्होंने गांव के घरों की मिट्टी की दीवारों को ब्लैकबोर्ड के रूप में उपयोग करने का फैसला किया और किताबें और मध्याह्न भोजन प्रदान करना शुरू कर दिया । उनकी पहल में उनकी पत्नी झूमा पात्रा ने भी साथ दिया। झूमा पश्चिम बर्धमान के रानीगंज गर्ल्स कॉलेज में बांग्ला की प्रोफेसर हैं। दीप की पहल में कुछ और लोग जुड़े और उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया । दीप नारायण कहते हैं कि महामारी के दौरान भी उन्हें बिना काम किए सरकार से मासिक वेतन मिल रहा था लेकिन उन्हें बच्चों की फिक्र थी । मन बच्चों को लेकर अशांत था। जिन बच्चों को स्कूल में पढ़ाकर और ट्यूशन देकर उन्होंने शिक्षित किया, वह लॉकडाउन में सब भूल सकते थे। बच्चे पूरा दिन मवेशियों को चराते और गांव में घूमते फिरते थे। इसलिए उन्होंने बच्चों को सड़क पर ही पढ़ाने की ठानी। दीप नारायण नायक ने इस पहल को और विस्तारित किया और पश्चिम बर्धमान के 14 गांवों में अपने शिक्षण मॉडल को सफलतापूर्वक लागू करन रहे हैं। वह बांकुड़ा, पुरुलिया और मिदनापुर जिलों में भी इस तरह के केंद्र शुरू करने का विचार कर रहे हैं।

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