आज से 150 साल पहले एक लड़की तालाब में कूद गई थी। 3 दिन बाद जब बाहर निकली तो…
तिरुवन्नामलाई जिले के चेन्नसमुद्रम में आयी अम्माल और गोपाल पिल्लै के घर अरुलमोज़ि नाम की एक बालिका जन्मी। बचपन से ही वह सामान्य लड़कियों जैसी नहीं थी। उसका मन खेल-कूद में नहीं लगता था। वह पूजा पाठ और एकांत में नमः शिवाय” का जप करती रहती थी। उसके घर से धूप, अगरबत्ती की दिव्य सुगंध आती रहती थी।
उसकी माता को चिंता होने लगी कि इतनी छोटी उम्र में यह क्या करती रहती है। उन्होंने ने सोचा कि शादी हो जाएगी तो घर गृहस्ती में मन लग जायेगा।
एक दिन घर में उसे देखने के लिए कुछ लोग आने वाले थे। जब अरुलमोज़ि को यह पता चला, तो वह बहुत परेशान हो गई। वह “शिवाय नमः” का जाप करती हुई घर से निकल पड़ी और गोमुट्टिकुलम नामक तालाब के पासजाकर अरुणाचलेश्वर से प्रार्थना करते हुए उसमें कूद गई।
लोगों ने उसे बहुत खोजा, पर वह नहीं मिली। माँ का रो-रो के बुरा हाल था। गाँव वाले समझाते – अब मिलनी मुश्किल है बाई”।
तीसरे दिन अचानक जल में हलचल हुई और अरुलमोज़ि जीवित बाहर निकल आई। वह ऐसे प्रकट हुई जैसे कोई दिव्य फूल खिला हो। उसने तालाब से मिट्टी निकाली और भक्तों में बाँट दी, जो अरुणाचलेश्वर के प्रसाद में परिवर्तित हो गई।
तालाब से बाहर निकल कर उसने बताया की स्वयं भोलेनाथ ने उसे योग की दीक्षा दी है अब तो सिद्ध योगिनी बन गयी है। उसी समय से उसका नाम अम्मणी अम्माल हुआ।
इसके बाद अम्मणी अम्माल तिरुवन्नामलाई चली गईं। वहाँ उन्होंने अरुणाचलेश्वर के दर्शन किए और यह संकल्प लिया कि भक्तों की सेवा करना ही भोलेनाथ की सच्ची सेवा है। जो भी भक्त गिरिवलम करने आते वो उनकी सेवा करने लगी।
कुछ समय बाद एक दिन भगवान भोलेनाथ उसके सपने में आएं और आदेश दिया की तिरुवन्नामलाई मंदिर का अधूरा उत्तर गोपुरम बनवाना ही उसका जीवन का उद्देश्य है।
अम्मणी अम्माल ने इस कार्य को अपना प्राण मान लिया और कार्य में जुट गयी। बहुत सारे व्यापारियों ने उनकी मदद की। इस प्रकार गोपुरम का निर्माण पाँच तल तक पहुँच गया।
फिर पैसे ख़त्म हो गए। अम्मणी अम्माल धन की सहायता के लिए मैसूर महाराजा के पास गईं। द्वारपाल ने उन्हें भीतर जाने से रोका, पर उन्होंने अपनी लघिमा सिद्धि से राजमहल के भीतर प्रवेश कर लिया।
राजा ने जब देखा कि वही स्त्री बाहर भी बैठी है और भीतर भी खड़ी है, तो वह उनकी सिद्धि से डर गया। महाराजा ने उनका सम्मान किया और बहुत धन देकर विदा किया। उस धन से छठा और सातवाँ तल बन गया।
फिर धन की कमी हुई तो अम्मणी अम्माल तपश्या में बैठ गईं। भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि जहाँ धन की आवश्यकता हो, वहाँ विभूति देना, वह धन में बदल जाएगी। अम्मणी अम्माल ने वैसा ही किया और अंततः उत्तर गोपुरम तेरह कलशों सहित पूर्ण हो गया। उन्होंने स्वयं उसके कुम्भाभिषेक में भी भाग लिया।
आज भी यह गोपुरम “अम्मणी अम्माल गोपुरम” के नाम से प्रसिद्ध है।
अम्मणी अम्माल ने अपनी योगशक्ति से बहुत सारे लोगों के रोग दूर किए। 50 वर्ष की आयु में थाईपूसम के दिन वे शिव में लीन हो गईं। उनकी जीव समाधि तिरुवन्नामलाई गिरिवलम मार्ग पर ईशान्य लिंग के सामने स्थित है।
आज भी भक्त उनकी समाधि पर जाकर विभूति प्रसाद लेते हैं और विश्वास करते हैं कि अम्मणी अम्माल सूक्ष्म रूप से उनकी प्रार्थना सुनकर मार्गदर्शन करती हैं।
अंग्रेजी शासन के काल में, जब स्त्रियों को आध्यात्मिक स्वतंत्रता कम प्राप्त थी, तब अम्मणी अम्माल ने अकेले अपने वैराग्य, तप, शिवभक्ति और अद्भुत सिद्धि के बल पर तिरुवन्नामलाई का विशाल उत्तर गोपुरम बनवाया। इसलिए वे आज भी एक महान महिला सिद्ध, शिवभक्त और अरुणाचल की दिव्य सेविका के रूप में पूजनीय हैं।




