Friday, October 2, 2026
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शास्त्री जी, जिनके कहने पर देश ने किया एक दिन का उपवास

60 साल पहले प्रधानमंत्री रहते ही लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई और ये हमारे देश का दुर्भाग्य था। उनके अचानक देहांत की खबर से सारा देश हिल गया था। अपनी साफ-सुथरी छवि और सादगी के लिए प्रसिद्ध शास्त्री करीब 18 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके नेतृत्व में भारत ने 1965 की जंग में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी। ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई थी। कई लोग जहां दावा करते हैं कि शास्‍त्री जी को जहर देकर मारा गया। तो, वहीं कुछ लोग कहते हैं उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। हालांकि उनकी मौत कैसे हुई, इस बारे में आज तक कुछ भी सटीक दावा नहीं किया जा सकता। शास्त्री की सादगी और ईमानदारी का हर कोई कायल रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तो उस समय देश में अनाज की भारी किल्लत हो गई थी। तब शास्त्री ने देशवासियों से अपील की थी कि हफ्ते में केवल एक दिन सभी लोग उपवास रखें। कहते हैं ना कि किसी नियम को अगर दूसरों पर लागू करना हो तो उसका प्रयोग पहले खुद पर करना होता है। शास्त्री जी ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने इस उपवास की शुरुआत अपने परिवार से ही की। सबसे पहले अपने पूरे परिवार को उन्होंने दिनभर भूखा रखा, इसके बाद पूरे देश से अपील की। इसका असर ये हुआ कि पूरे भारत में एक दिन का उपवास लोग रखने लगे।

साफ सुथरी छवि ने पीएम की कुर्सी तक पहुंचाया

लाल बहादुर शास्त्री की साफ सुथरी छवि ने ही उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। दरअसल, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद यह दुविधा थी कि किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए। तब एक नाम सभी के सामने था- लाल बहादुर शास्त्री का। 9 जून 1964 को वह देश के दूसरे प्रधानमंत्री बनें। केवल 18 महीने तक वो इस पद पर रहे।

जब शास्त्री ने दिया पाकिस्तान पर हमले का आदेश

जब पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर हमला किया तो उन्हें ये लग रहा था कि धोती-कुर्ता पहनने वाला छोटे कद का ये प्रधानमंत्री कमजोर है। लेकिन शास्त्री जी ने कड़ा रुख अपनाया और पाकिस्तान पर हमले का आदेश दे दिया। इस दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान थे। पाकिस्तान के इस युद्ध में भी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच अमेरिका ने हस्तक्षेप किया। 1966 में ताशकंद में युद्ध विराम के समझौते पर हस्ताक्षर हुआ लेकिन उसी रात शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

ताशकंद समझौते से नाराज थीं शास्त्री की पत्नी

ताशकंद समझौते के बाद शास्‍त्री दबाव में थे। जानकार बताते हैं कि पाकिस्‍तान को हाजी पीर और ठिथवाल वापस देने की वजह से देश में शास्त्री की आलोचना हो रही थी। तब सीनियर जर्नलिस्ट कुलदीप नैयर उनके मीडिया सलाहकार थे। नैयर ने ही शास्‍त्री के मौत की खबर उनके परिजनों को बताई थी। बीबीसी को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था कि हाजी पीर और ठिथवाल को पाकिस्‍तान को दिए जाने से शास्‍त्री की पत्‍नी खासी नाराज थीं। यहां तक उन्‍होंने शास्‍त्री से फोन पर बात करने से भी मना कर दिया था। इस बात से शास्‍त्री को बहुत चोट पहुंची थी। अगले दिन जब शास्‍त्री के मौत की खबर मिली तो पूरे देश के साथ वह भी हैरान रह गई थीं।

(साभार – इंडिया टीवी)

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