Monday, April 20, 2026
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मधु सिंह की पाँच कविताएँ

मधु सिंह

तुम ले चलो मुझे

तुम ले चलोगे न मुझे
दुनिया की भीड़ से छिपाकर
वहां,
जहां पत्तियों के बीच से
सूरज की किरणें झांकती हो
दुनिया को छूकर महसूस करने के लिए

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां बारिश की बूंद पड़ते ही
मिट्टी की सौंधी खुशबू से
खिल जाता हो
किसानों का रोम- रोम

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां सांझ के ढलते ही
सब लौटते हैं
जिंदगी की दौड़ से थककर
चांद को तकिया बना
एक शिशु सी मुस्कान लिए
सपनों से लिपटने

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां नक्षत्रों और सौर मंडल से
दिखती है एक तैरती पृथ्वी
जहां बसता है
लोगों के बीच
प्रेम का गुरुत्वाकर्षण

तुम ले चलोगे न मुझे
वहां
जहां हवा की सरसराहट
कानों को छू
कह जाती हो एक प्रेम कथा

तुम ले चलो न मुझे
भौरों की दुनिया में
जहां तितलियों के स्पर्श से
खिल जाती हो
कलियां

मुझे ऐसी लोककथाओं की
यात्रा पर ले चलो
जहां संवाद के बाद
एक गहरी चुप्पी हो
और सिर्फ तुम रहो
और मैं रहूं….

 

स्त्री का आदिम इतिहास

इन दिनों
कुछ अजीब स्थिति है मेरी
जीवन की कड़ी परीक्षा की तैयारी
मैं करती हूं स्टडी रूम में नहीं

बल्कि रसोईघर में

हिंदी साहित्य का इतिहास लेकर
घुसती हूं मैं रसोईघर में
सबसे पहले गैस जला
चढ़ाती हूं कढ़ाई में आदिकाल को

फिर भक्तिकाल को
धीरे-धीरे पकाते हुए

मैं पहुंच जाती हूं
सुंगधित रीतिकाल में
और
मसालों को भांजते भांजते
तैयार हो जाता है
पूरा आधुनिक काल

और फिर चारों को
डाइनिंग टेबल पर सजाकर
परोसती हूं सबके सामने
साहित्य का पाकशास्त्र

जिसे चखकर सब करते हैं बहस
मसलन आलोचना की चीरफाड़
और
मैं घिर जाती हूं
कहानी, कविता,उपन्यास
निबंध,
संस्मरणों और आत्मकथाओं के जाल में

और
इस तरह मेरे जीवन की इतिहास गाथा में
रोज जुड़ने लगते हैं ऐसे नये अनुभव
और तैयार हो जाता है

मेरे जीवन के साहित्य का सबसे आदिम इतिहास

3.

 

 

चुप्पी

वो चुप थी
खुद के विरुद्ध
होने वाली साजिशों के खिलाफ

वह सह रही थी सब
चुपचाप
ताकि बचा सके
अपने सुनहरे सपनों को
जिसे वह हर पल जीती थी

उसे नहीं पता था
यह सपना सिर्फ उसका था
साथ रह रहे पुरुष का नहीं
पति वो जरूर है
पर सिर्फ नाम का

वह पुरुष
बार-बार उसकी चमड़ी से
उधेड़ लेना चाहता है
उसके पंख को
ताकि वो उड़ न सके
सपनों की ऊंची उड़ान

वह पुरुष चाहता है
सदा बनी रहे वह दासी
और वह उस पर करे वार
पल-प्रतिपल

वह पुरुष
एक स्त्री के दर्द को भी
कहता है बहाना
और खुद के
दर्द का
पीटता है ढोल

ऐसे ही होते हैं कुछ मर्द
जो अक्सर भरी सभाओं में
उठाते हैं आवाज
महिला सशक्तिकरण का
और फिर
शाम ढलते
करते हैं महिला पर
अपनी शक्ति का प्रयोग

जब कुछ स्त्रियां
उठाना चाहती हैं आवाज
अन्याय के खिलाफ
और उन अपनों के खिलाफ
जिन्होंने बिछा रखा है जाल
लेकिन अक्सर ये स्त्रियां
झूठे आश्वासनों में
उलझ
भूल जाती हैं
परिवार के अपमान के डर से उठाना आवाज

और वे फिर सहने लगती हैं
रोज नया ताना
स्री होने का ताना ….

4.

 

एनीमिया

बूंद बूंद
कतरा कतरा
कुछ रक्त जैसा
बहता हुआ
वह द्रव पदार्थ
पाइप के जरिए
जा रहा था
मांस हाड़ की बनी
उस देह में
जिसमें बसती है
एक बेटी
एक बहन
एक पत्नी
एक मां
और एक औरत
उस देह में
बसता है दर्द भी
जिसे वह सबसे छुपाए
करती है दिनभर का काम

उस औरत के दर्द में छिपा है
एनीमिया
थाइराइड
कैल्शियम की कमी
और न जाने क्या क्या

खामोशी से वह सहती है सब
इसलिए
दुनिया कहती है
ये तो आम बात है
औरतों में
दर्द और शर्म तो
औरत का गहना होता है
जिसे जिदंगी भर
ऐसे ही
पहने रखना है

खोखले रिश्तों को
दिल से निभा रही है वह
सब के होते हुए भी
वह नहीं है
किसी की
वह बस है
उस दर्द की
और दर्द उसका
जो रहते है साथ-साथ
वैसे ही जैसे स्लाइन की चढ़ती
आखिरी बोतल
और अस्पताल में लेटी हर एक औरत
जो ग्रस्त है
एनीमिया से और
अपनों से
जो उनकी नहीं
उनके काम का डंका बजाते हैं..

 

5.
नाखून
उस शख्स के पास बैठते ही
खुद को समेट लिया
 उसने अपनी सीमाओं में
लगातार टकटकी लगाए वह देख रही थी
उसकी ओर बढ़ते पैने नाखूनों को
और हाथों को
जो बार-बार उसके शरीर को छू लेने की कोशिश में
बढाए जा रहे थे
खुद को वो और कितना सिमटती खुद में ही
अंदर से आ रही आवाजों को
वो कर देना चाहती थी शब्दों में बयां
लेकिन ये शब्द औरों के लिए
बस रोजाना उनके साथ
गुजरने वाले शब्द ही तो थे
 काश वो उस आवाज को
बना लेती हथियार
अपने संकोच के खोल से निकल
काट देती
उसकी ओर बढ़ने वाले नाखूनों को
ताकि खुद को दे सके निर्भय विस्तार…
शुभजिता

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