-उच्चतम न्यायालय जाएगा मुस्लिम पक्ष
– मुस्लिमों को एएसआई के नमाज के अधिकार के आदेश को किया खारिज
इंदौर, एजेंसी। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को अपना फैसला सुना दिया। उच्च न्यायालय ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि भोजशाला परिसर मंदिर ही है। मस्जिद पक्ष यदि सरकार को आवेदन देता है तो उसे अलग जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। एएसआई एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार और एएसआई यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा। 1958 एक्ट के तहत इस प्रॉपर्टी का पूरा मैनेजमेंट एएसआई के हाथ में ही रहेगा। पीठ ने कहा कि ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। भोजशाला मामले में हिंदू पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 7 अप्रैल, 2003 के एएसआई के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है। इसके अलावा, न्यायालय ने हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार प्रदान किया है और भोजशाला परिसर को राजा भोज की संपत्ति के रूप में मान्यता दी है। लंदन के एक संग्रहालय में रखी हमारी मूर्ति को वापस लाने की मांग के संबंध में न्यायालय ने सरकार को विचार करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि मुस्लिम पक्ष भी सरकार के समक्ष अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने सरकार से मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक भूमि आवंटित करने पर विचार करने को कहा है। न्यायालय ने हमें पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्रदान किया है और सरकार को स्थल के प्रबंधन की निगरानी करने का निर्देश दिया है। एएसआई का पिछला आदेश, जिसमें नमाज अदा करने का अधिकार दिया गया था, पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है, अब से वहां केवल हिंदू पूजा-अर्चना ही होगी। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ में छह अप्रैल से 12 मई 2026 तक नियमित सुनवाई हुई। इन 24 दिनों में कुल 43 घंटे चली सुनवाई के दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने अपने-अपने तर्क न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। इसके बाद 12 मई को न्यायालय ने सभी याचिकाओं में निर्णय सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। इस दौरान अंतरसिंह की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि दोनों पक्षों में सौहार्द बना रहे, इस तरह की व्यवस्था का आदेश दिया जाए। भोजशाला के फैसले पर धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा है कि उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान है। उनकी ओर से सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने तथ्य रखे थे। हम फैसले की समीक्षा करेंगे। इसके बाद हम उच्चतम न्यायालय जाएंगे।




