Friday, March 13, 2026
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जड़ता को खत्म कीजिए…पत्ते उखाड़ने से कुछ नहीं होगा

इन दिनों देश में बहुत हलचल है, चिन्ता है, आक्रोश है। सोशल मीडिया से लेकर अखबार के पन्ने और टीवी का परदा इन दिनों गुस्से से भरा नजर आ रहा है। निर्भया के बाद अब हैदराबाद में पशु चिकित्सक के साथ हुई बर्बरता से पूरा देश गुस्से में है। सब दोषियों को सजा देने की माँग कर रहे हैं। निश्चित रूप से सजा तो मिलनी ही चाहिए मगर क्या यह मौका नहींं है कि हम अपने अन्दर भी झाँककर देखें कि हम कहाँ पर खड़े हैं? आखिर यह मानसिकता आती कहाँ से है..आखिर स्त्री को महज शिकार मान लेने की भावना पनपती कहाँ से है? जरा सोचिए और गौर से देखिए कि आखिर गलती कहाँ पर रह गयी…स्त्री जब परदे से बाहर निकल रही है और पुरुष वर्चस्व के सामने खड़ी हो रही है तो वह उसकी सत्ता को चुनौती भी दे रही है और यही तो गवारा नहीं है हमारे आदिम समाज को। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लड़कों को हिंसक बनाता कौन है…कौन उनसे उनकी मनुष्यता छीन रहा है…हमने जिम्मेदारियों के लिए लड़कियों को हमेशा से तैयार किया है। हर क्षण लड़कियों को याद दिलाते रहे हैं कि वह जिस घर में जन्मी है…वह उसका नहीं, उसके भाइयों का है और जिस घर में वह जाने वाली है…वह भी उसका नहीं होता…आप सहने और रहने की जो शिक्षा बेटियों को दी…वह बेटों को कभी दी ही नहीं…मेहमानों के आने पर नाश्ता बेटा भी ला सकता है. यह ख्याल आपके दिमाग में कभी आया ही नहीं। बेटियों को याद दिलाते रहे हैं कि उनको भाई का तो कभी पति का तो कभी बेटे का ख्याल रखना है मगर भाइयों को या पतियों को या बेटों को तो बताया ही नहीं कि इस घर पर उनकी बहनों, पत्नियों और बेटियों का अधिकार है…घर में वर्चस्व आपने हमेशा अपने बेटों का रखा और रहने दिया तो वे सन्तुलन और समानता कहाँ से सीखते? आपने हमेशा से जो सवाल बेटियों से किये, वह कभी बेटों से किये ही नहीं तो वे खुद को कहाँ से जवाबदेह बनाते? इस देश में बेेटों की माँ होना प्रिविलेज की तरह लिया जाता है और औरतें भी इसका लाभ उठाना चाहती हैं क्योंकि बेटों की माँ की तरह सम्मान पाना उनको अच्छा लगता है….आज जब पढ़ी – लिखी औरतें भी इस मानसिकता में जी रही हैं तो दोष किसको  दिया जाए..? आपने पराधीनता स्वीकार की और अब पराधीन होना आपको अच्छा लगने लगा है..बहुओं को अब भी बेटों की जीवन संगिनी नहीं बल्कि केयर टेकर बनाकर ला रही हैं आप तो भला किसका हो रहा है…जब तक मानसिकता नहीं बदली जाती और बेटों की परवरिश को संवेदनशीलता से जोड़ा नहीं जाता…तब तक तो यह सिर्फ पत्ते उखाड़ने जैसा है…जड़ उखाड़नी है तो पहले अन्दर से अपनी जड़ता को खत्म कीजिए…पत्ते उखाड़ने से कुछ नहीं होगा।

 

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