–प्रमोद कुमार तिवारी
सुबह निकला,रोज की तरह,
आटो की लाइन में था,
मन में था,
रास्ता जाम न हो,
बंकिम सेतु से हावड़ा स्टेशन की तरफ़ जानेवाले मार्ग से,
जज साहब चले गये हों,
अन्यथा विलंब हो जायेगा,
समय से निकलकर भी,
आजकल ऐसे ही काफिले आये दिन निकलते हैं
और हम उन काफिलों के ओझल होने तक खड़े रहते हैं क़तार में,
बहुतों को राजा भी, हमने ही तो चुना है,
बनाते हैं अब ये हमारे लिए विधान,
तंद्रा टूटी जब सामने खड़ी अधेड़ ने अचानक कहा,
मास्टरमोशाय नमस्कार!
हमने भी कहा नमस्कार!
शिष्टतावश पूछ लिया
भालो आछेन तो
बोली …..
कि बोलबो आर गैसेर दाम साठ टाका बेडे गेलो,
कोनो प्रतिवाद नेई,
कहकर देखा था हमको, शायद उसको ये आशा थी, मैं कुछ बोलूं…..
मैं बस उसे देखता रहा, रिक्त अपनी आंखों से
मन में बस इतना था,
ये तो दिहाड़ी मजदूरी करती है
पर आटो का भाडा,गैस की कीमत, बराबर ही देती है
एकबार मन हुआ बोलूं, सरकार तो आपको भाता भी देती है
पर ठिठक गया उसकी बेबसी को देखकर,
इस पर व्यंग्य करना शोभा नहीं देता ।
मरे मज़दूरों के रक्त,मांस नोचने वाले काफिलों में जाते हैं
उनको न बोल पाया इसे क्यों बोलूं….
इसे तो बस अपने घर के चूल्हे पर खाना बनाने की चिंता है।
हां, गैस का पैसा इसे अडानी अंबानी सा ही देना है।
प्रधानाध्यापक
रिसड़ा विद्यापीठ




