नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए रेगुलेशन पर फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अगर हमने इस मामले में दखल नहीं दिया, तो समाज में विभाजन होगा। इसके नतीजे खतरनाक होंगे। कोर्ट ने यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यूजीसी रेगुलेशन में जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, उनसे यह लगता है कि इस रेगुलेशन का दुरुपयोग किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक देश के रूप में हमने 75 साल बाद जातिविहीन समाज बनने की दिशा में जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम वापस उधर ही लौट रहे हैं। क्या हम एक प्रतिगामी समाज बनते जा रहे हैं। उच्चतम न्यायालय में राहुल दीवान और वकील विनीत जिंदल के अलावा भी कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं। विनीत जिंदल की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण है, उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले हैं। याचिका में उच्चतम न्यायालय से मांग की गई है कि यूजीसी रेगुलेशंस 2026 की नियमावली 3(सी) को लागू करने पर रोक लगाई जाए। 2026 के नियमों के अंतर्गत बनाई गई व्यवस्था सभी जाति के व्यक्तियों के लिए लागू हो। याचिका में कहा गया है कि इन नियमों की आड़ लेकर सामान्य वर्ग से आने वाले छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ झूठी और दुर्भाग्यपूर्ण शिकायत भी हो सकती है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसदों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ‘एक्स’ पर लिखा, “यूजीसी पर गाली देने वाले सभी ज्ञानी, पिछले 2 दिनों से संसद जा रहा हूं। किसी राजनीतिक दल के किसी सदस्य ने इस पर चर्चा तक करना मुनासिब नहीं समझा? उल्टा जिस सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में ईडब्ल्यूएस को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर गरीब की सुध ली, उसी को गाली।” चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। चीफ जस्टिस ने कहा कि रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्दों से यह संकेत मिलता है कि इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि अदालत समाज में एक निष्पक्ष और समावेशी माहौल बनाने पर विचार कर रही है।





