जब हिंदी की वैश्विक यात्रा की बात होती है, तो पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी का नाम स्वाभाविक रूप से उन हस्तियों में लिया जाता है जो इसे सशक्त करने में लगे हैं। जापान जैसे गैर-हिंदी भाषी देश में हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को अकादमिक पहचान दिलाने वाले प्रोफेसर मिजोकामी भारत–जापान सांस्कृतिक संबंधों के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक माने जाते हैं। विश्व हिंदी दिवस पर उनकी उपस्थिति यह स्पष्ट संदेश देती है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सभ्यताओं को जोड़ने वाला एक सेतु है।
जापान से भारत तक एक अकादमिक यात्रा
1941 में जापान के कोबे शहर में जन्मे प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी को बचपन से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन और भाषाओं के प्रति गहरी रुचि रही। उन्होंने वर्ष 1965 में ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से भारतीय अध्ययन में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद भारत आकर भाषा अध्ययन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। कई भारतीय भाषाओं के विद्वान हैं पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामीकई भारतीय भाषाओं के विद्वान हैं पद्मश्री प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी।
1965 से 1968 के बीच उन्होंने इलाहाबाद में हिंदी और विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में बांग्ला भाषा का गहन अध्ययन किया। इसी दौरान भारतीय समाज की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से उनका गहरा आत्मिक जुड़ाव बना।
भारतीय भाषाओं के अंतरराष्ट्रीय विद्वान
प्रोफेसर मिजोकामी ने 1972 में दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त और समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित रहा, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष मान्यता मिली। वे हिंदी, पंजाबी, बांग्ला, उर्दू, गुजराती, मराठी, तमिल, कश्मीरी, सिंधी सहित कई भारतीय भाषाओं में दक्ष हैं। उन्हें पंजाबी भाषा पर शोध करने वाला पहला जापानी विद्वान माना जाता है। इसके अलावा वे अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं में भी पारंगत हैं।
ओसाका विश्वविद्यालय से वैश्विक मंच तक
दशकों तक ओसाका विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं के अध्यापन के बाद वर्ष 2007 से वे प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में सक्रिय हैं। उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में भी पंजाबी भाषा का अध्यापन किया, जिससे भारतीय भाषाओं की वैश्विक पहुंच और मजबूत हुई। उनकी प्रमुख पुस्तकों में इंट्रोडक्शनरी पंजाबी, पंजाबी रीडर, प्रैक्टिकल पंजाबी कन्वरशेसन और लैंग्वेज कॉन्टैक्ट इन पंजाब शामिल हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है।
अनुवाद के माध्यम से आध्यात्मिक संवाद
प्रोफेसर मिजोकामी ने गुरु नानक देव जी की पवित्र रचना जपजी साहिब का जापानी भाषा में अनुवाद कर सिख दर्शन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को जापान तक पहुंचाया। इसके अलावा उन्होंने द सिक्ख्स : देयर रिलिजियस बीलीफ्स एंड प्रैक्टिसेज जैसी महत्वपूर्ण कृतियों का भी जापानी अनुवाद किया। उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से उन्होंने केवल शब्दों नहीं बल्कि भारत की आत्मा को जाना है। भारतीय भाषाओं और संस्कृति के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित सिविल इन्वेस्टिचर समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया, जो जापान में भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार की औपचारिक स्वीकृति का प्रतीक है।
हिरोशिमा में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोफेसर मिजोकामी से भेंट कर उनके आजीवन योगदान की सराहना की। प्रधानमंत्री ने कहा – प्रोफेसर मिजोकामी जैसे विद्वानों ने भाषा और साहित्य के माध्यम से भारत और जापान के बीच स्थायी पुल बनाए हैं। इस मुलाकात को भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सशक्त उदाहरण माना गया। 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस हिंदी को वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रतीक है। प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी ने इस उद्देश्य को दशकों पहले ही अपने जीवन का मिशन बना लिया था। जापान में हिंदी को अकादमिक सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक और प्रेरणादायक रही है। जब भारत और जापान के रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध नई ऊंचाइयों पर हैं। प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी का जीवन यह सिद्ध करता है कि भाषा, ज्ञान और संस्कृति सीमाओं से परे लोगों को जोड़ते हैं। वे केवल एक विद्वान नहीं, बल्कि भारत–जापान मित्रता के जीवंत प्रतीक हैं – और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रेरणा भी।





